मातृत्व अधिकारों और कार्यस्थल पर लैंगिक न्याय को लेकर एक अहम फैसले में जम्मू-कश्मीर व लद्दाख हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड की दो अपीलों को खारिज कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला कर्मचारियों को केवल इसलिए नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता क्योंकि उन्होंने मातृत्व अवकाश लिया है। ये मामले तनु गुप्ता, बासु मगोत्रा, ईशा सूदन और बिनतुल हुदा की ओर से बैंक के खिलाफ दायर याचिका से जुड़े थे। बैंक ने 25 अगस्त 2025 के हाईकोर्ट के सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती दी थी।
सिंगल बेंच ने बैंक को निर्देश दिया था कि महिला कर्मचारियों द्वारा मातृत्व अवकाश पर बिताई गई अवधि को उनकी दो साल की मूल्यांकन अवधि के लिए लगातार सेवा मानी जाए। बैंक का तर्क था कि याची महिलाओं को शुरू में दो साल के लिए अनुबंध पर रखा गया था और सफल मूल्यांकन के बाद ही उन्हें नियमित किया जाना था।
मातृत्व के नाम पर लाभ से वंचित करना अस्वीकार्य
बैंक ने कहा कि मातृत्व अवकाश से इंकार नहीं किया गया, लेकिन जितने दिन अवकाश लिया गया, अनुबंध अवधि उतनी ही बढ़ा दी गई। बैंक के अनुसार कर्मचारियों ने बिना विरोध के अवकाश शर्तें स्वीकार की थीं, इसलिए वे बाद में देरी से नियमितीकरण को चुनौती नहीं दे सकतीं।
हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच ने बैंक के रुख को खारिज करते हुए कहा कि मातृत्व अवकाश को सेवा की गणना से बाहर रखना महिला कर्मचारियों के लिए स्पष्ट नुकसान है और यह उन्हें मातृत्व के लिए दंडित करने जैसा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश को सेवा में ब्रेक मानकर उन लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता जो उन्हें अन्यथा मिलते। ऐसे प्रावधान महिला कर्मचारियों के हित को आगे बढ़ाने के लिए हैं, न कि उन्हें अधिकारों से वंचित करने के लिए।
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