इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ फेसबुक पर ‘राष्ट्र-विरोधी’ और अपमानजनक पोस्ट शेयर करने के आरोपित जुबैर अंसारी व इजहार आलम के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद करने से इन्कार कर दिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने यह आदेश दिया है।

अर्जी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत दाखिल की गई थी। आरोपितों ने पूरी आपराधिक कार्यवाही, चार्जशीट और पिछले साल नवंबर में सोनभद्र की सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कोर्ट नंबर तीन के आदेश को रद करने की मांग की थी। प्रकरण अनपरा थाने में दर्ज है।

एफआइआर के मुताबिक आरोपितों ने कथित तौर पर पाकिस्तानी यूट्यूबर के फेसबुक अकाउंट से आपत्तिजनक और राष्ट्र-विरोधी पोस्ट शेयर किए थे। कई पोस्ट प्रधानमंत्री तथा आरएसएस के खिलाफ हैं। प्राथमिकी अशांति फैलाने, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और आपराधिक धमकी देने से संबंधित बीएनएस की धाराओं में दर्ज की गई है।

आवेदकों के वकील ने दलील दी कि आरोप अस्पष्ट हैं और सिर्फ फेसबुक पोस्ट पर आधारित हैं। मजिस्ट्रेट ने बिना सोचे-समझे यांत्रिक तरीके से संज्ञान लिया। अभियोजन ने कहा कि विवादित सवाल पर ट्रायल के दौरान साक्ष्य देखकर ही फैसला हो सकता है।

पीठ ने कहा कि इंटरनेट मीडिया पर बोलने की आजादी के साथ जिम्मेदारी भी आती है। यह ऐसे कंटेंट तक नहीं बढ़ सकती जो समुदायों के बीच नफरत या अशांति भड़काने के लिए हो। बीएनएस की धारा 196(1)(ए) का दायरा समझाते हुए कोर्ट ने कहा कि यह प्रविधान तब लागू होता है जब कोई पोस्ट जानबूझकर धर्म, जाति, भाषा, नस्ल या समुदाय के आधार पर समूहों के बीच दुश्मनी, नफरत या दुर्भावना को बढ़ावा दे।

इस प्रविधान के लिए अशांति पैदा करने का साफ और जानबूझकर इरादा जरूरी है। याचीगण के खिलाफ आरोप जांच में जुटाए गए साक्ष्यों से प्रथमदृष्टया सही लगते हैं। समन में मजिस्ट्रेट को सिर्फ यह देखना होता है कि आगे कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है अथवा नहीं?

रिकार्ड में मौजूद सामग्री देखकर इस चरण में यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदकों के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता। अंतर्निहित शक्ति के तहत हस्तक्षेप का कोई मामला न बनने पर कोर्ट ने अर्जी को योग्यता से रहित बताकर खारिज कर दिया है।

Source link

Picture Source :