देश में कई मामले में ऐसे हैं जिसमें आरोपी लंबे समय से जेल में बंद हैं, और उनके केसेज का ट्रायल नहीं शुरू हुआ है। इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने आलिमेदीन मोहम्मद अब्दुर्रहमान को जमानत देने से इनकार किया है, लेकिन साथ ही अहम फैसला दिया है। अदालत ने मोहम्मद अब्दुर्रहमान के मामले में यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं कि मुकदमे की सुनवाई तय समय के भीतर पूरी हो और देरी न हो।

आलिमेदीन मोहम्मद अब्दुर्रहमान के पर यह मामला गैर कानूनी गतिविधियों की रोकथाम (UAPA) से जुड़े कानून के तहत दर्ज है। मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्या बागची की पीठ ने की। इस दौरान कोर्ट कटक की निचली अदालत को निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई हफ्ते में कम से कम दो बार की जाए और तीन महीने के भीतर पूरा मुकदमा निपटाया जाए।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस मामले को दूसरे मामलों के मुकाबले पहले तरजीह दी जाए। जिस दिन इस पर सुनवाई हो, उस दिन अदालत में कोई दूसरा मामला लिस्ट में शामिल न किया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि सुनवाई के दौरान किसी भी तरह की तारीख आगे नहीं बढ़ाई जाएगी, ताकि मामला लंबा न खिंचे। इतना ही नहीं, न्यायालय ने अभियोजन पक्ष को भी निर्देश दिया है कि हर सुनवाई पर गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित की जाए। 

सुप्रीम कोर्ट डबल बेंच ने कहा कि अगर कोई गवाह अदालत में मौजूद नहीं हो सकता, तो उसे ऑनलाइन मोड में अपनी मौज दर्ज करानी होगी। अदालत ने दोनों पक्षों के वकीलों से भी कहा कि वे पूरे समय मौजूद रहें और बिना वजह देरी न होने दें। खास कदम उठाते हुए अदालत ने यह भी आदेश दिया कि गर्मियों की छुट्टियों के दौरान भी इस मामले की सुनवाई जारी रखी जाए। अदालत का कहना है कि अगर जरूरत हो तो न्यायाधीश बाद में छुट्टी ले सकते हैं, लेकिन इस मामले को जल्द पूरा करना ज्यादा जरूरी है। 

गौर करने वाली बात यह है कि मोहम्मद अब्दुर्रहमान के खिलाफ इस कानून के तहत दो अलग-अलग मामले दर्ज हैं। एक दिल्ली में और दूसरा ओडिशा में। दिल्ली वाले मामले में वह करीब साढ़े सात साल जेल में रह चुके हैं, जबकि ओडिशा के मामले में अब भी विचाराधीन कैदी के रूप में हिरासत में हैं। कोर्ट का यह फैसला कई मायनों में खास है, और उम्मीद की जा सकती है कि लंबे समय से जेल में बंद अब्दुर्रहमान को जल्द ही दोनों मामलों में बड़ी राहत मिलेगी। 

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