उत्तराखंड में ड्राफ्ट्समैन (मानचित्रकार) भर्ती प्रक्रिया को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने एकल पीठ के उस पुराने आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसमें केवल 'ड्राफ्ट्समैन ट्रेड' के सर्टिफिकेट धारकों को ही शहरी विकास विभाग में नियुक्ति के योग्य माना गया था.

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि नियोक्ता विभाग किसी तकनीकी पद के लिए योग्यता की व्याख्या करता है, तो अदालत को उसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब तक वो मनमाना या नियमों के विरुद्ध न हो. इस फैसले से अब सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा और आर्किटेक्चरल असिस्टेंटशिप वाले उम्मीदवारों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है.

क्या है पूरा मामला?

 दरअसल, यह पूरा मामला साल 2023 में उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की ओर से निकाली गई 77 पदों की भर्ती से शुरू हुआ था. विज्ञापन में शहरी विकास विभाग के लिए योग्यता 'संबंधित ट्रेड में डिप्लोमा/आईटीआई' मांगी गई थी. इस पर आयोग ने विभाग से स्पष्टीकरण मांगा, जिस पर विभाग ने कहा कि 'संबंधित ट्रेड' में सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चरल असिस्टेंटशिप भी शामिल हैं.

हालांकि, प्रकाश सिंह नामक एक अभ्यर्थी, जिसके पास केवल ड्राफ्ट्समैन का डिप्लोमा था, उसने इसे चुनौती दी. एकल पीठ ने दिसंबर 2025 में फैसला सुनाते हुए कहा था कि ड्राफ्ट्समैन के पद के लिए 'संबंधित ट्रेड' का अर्थ केवल 'ड्राफ्ट्समैन' ही हो सकता है और अन्य डिप्लोमा धारकों को

न्यायालय ने कहा कि शहरी विकास विभाग अपने काम की प्रकृति को बेहतर समझता है. ड्राफ्ट्समैन के काम में केवल नक्शा बनाना ही नहीं, बल्कि सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चरल प्लानिंग की बुनियादी समझ भी शामिल होती है. कोर्ट ने 'खेल के बीच में नियम बदलने' के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि विभाग ने कोई नया नियम नहीं बनाया, बल्कि केवल विज्ञापन में मौजूद 'ओपन टेक्स्चर्ड' (अस्पष्ट) शब्द 'संबंधित ट्रेड' की व्याख्या की थी.

कोर्ट ने माना कि शहरी विकास विभाग के नियमों में 'समकक्षता' शब्द नहीं था, इसलिए इसके लिए किसी बाहरी विशेषज्ञ समिति की आवश्यकता नहीं थी, विभाग का स्पष्टीकरण ही पर्याप्त था. चयनित उम्मीदवारों (अपीलकर्ताओं) ने दलील दी थी कि उनके अंक याचिकाकर्ता से काफी ज्यादा थे. कोर्ट ने माना कि केवल दस्तावेज सत्यापन सूची में नाम आने से नियुक्ति का कोई अटूट अधिकार नहीं मिल जाता.

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के 'जहूर अहमद रादर' मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को नियोक्ता की ओर से निर्धारित योग्यता के दायरे को खुद से छोटा या बड़ा नहीं करना चाहिए. हाईकोर्ट ने अफसोस जताया कि न्यायिक हस्तक्षेप के कारण चयन प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हुई, जिससे पूरी प्रक्रिया पटरी से उतर गई थी. कोर्ट ने सभी अंतरिम रोक हटाते हुए उत्तराखंड लोक सेवा आयोग को तत्काल चयन प्रक्रिया पूरी करने और नियुक्तियां देने की स्वतंत्रता दे दी है

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