वकीलों (lawyers) द्वारा न्यायपालिका और जजों पर किए जाने वाले हमलों पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने भारी प्रहार किया है. शीर्ष अदालत ने कहा कि यह और कुछ नहीं बल्कि घोर अवमानना का मामला बनता है. न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा और न्यायमूर्ति विनीत शरण की पीठ ने कहा है कि जब कभी भी राजनीतिक मसला अदालत में आता है और उसका निपटारा किया जाता है तो विवेकहीन व्यक्ति या वकील अपने हिसाब से मसले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश करते हैं.

जजों के खिलाफ उचित फोरम पर शिकायतें दर्ज हों लेकिन पक्ष में फैसला न आने पर जजों पर प्रेस में हमला नहीं किया जा सकता. जजों पर संस्थान की गरिमा को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है. वे प्रेस में जाकर अपना पक्ष या विचार नहीं रख सकते. अवमानना की कार्रवाई ब्रहमास्त्र की तरह है और जरूरत पड़ने पर ही अदालत इसका इस्तेमाल करती है. न्यायपालिका में सर्व करना सेना की सेवाओं से कम नहीं है.पीठ ने कहा कि इस तरह का कृत्य न्यायपालिका को बदनाम करना है और आम लोगों के विश्वास को खत्म करना है। पीठ ने कहा कि यह दुखद है कि बार कौंसिल की निष्क्रियता के कारण कुछ वकील ऐसा महसूस करते हैं वे बार कौंसिल से ऊपर है और खुद को विषयों का चैंपियन समझते हैं। मालूम को जस्टिस अरूण मिश्रा पहले से एक्टिविस्ट वकीलों के निशाने पर रहे हैं।

यह फैसला जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ ने सुनाया है. दरअसल केसों के बंटवारों को लेकर जस्टिस मिश्रा पर कुछ फैसलों के लिए सवाल उठाए गए थे.दरअसल मद्रास हाईकोर्ट ने वकीलों के लिए अनुशासानात्मक नियम तैयार किए थे जिनके तहत हाईकोर्ट या जिला अदालत किसी वकील को कोर्ट में पेश होने से रोक सकती थी. इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरुण मिश्रा व जस्टिस विनीत शरण की बेंच ने हाईकोर्ट के नियम को रद्द कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बार की स्वायत्तत्ता को छीना नहीं जा सकता.

 

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