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औद्योगिक विवाद (बैंककारी तथा बीमा कम्पनियां) अधिनियम, 19491 ( Industrial Disputes (Banking and Insurance Companies) Act, 1949 )


 

औद्योगिक विवाद (बैंककारी तथा बीमा कम्पनियां) अधिनियम, 19491

(1949 का अधिनियम संख्यांक 54)

[14 दिसम्बर, 1949]

कतिपय बैंककारी और बीमा कम्पनियों से सम्पृक्त औद्योगिक विवादों के

न्यायनिर्णयन का उपबंध करने के लिए

अधिनियम

एक से अधिक राज्यों में शाखाएं या अन्य स्थापन रखने वाली बैंककारी और बीमा कम्पनियों से सम्पृक्त औद्योगिक विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए उपबन्ध करना समीचीन है;

                अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) यह अधिनियम औद्योगिक विवाद (बैंककारी तथा बीमा कम्पनियां) अधिनियम, 1949 कहा जा सकेगा

                (2) इसका विस्तार 2[जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय] सम्पूर्ण भारत पर है

                2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या सन्दर्भ में कोई बात विरुद्ध हो, अधिनिर्णय", बैंककारी कम्पनी", औद्योगिक विवाद" और बीमा कम्पनी" पदों के वे ही अर्थ हैं जो उन्हें इस अधिनियम द्वारा यथासंशोधित औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 2 में क्रमशः समनुदिष्ट हैं

                3. [1947 के अधिनियम सं० 14 की धारा 2 का संशोधन - [निरसन तथा संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 48) की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा निरसित

                4. न्यायनिर्णयन, जांच या परिनिर्धारण के लिए कतिपय औद्योगिक विवादों के राज्य सरकारों द्वारा निर्देशित किए जाने का प्रतिषेध-किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार या ऐसी सरकार का अधीनस्थ कोई आफिसर या प्राधिकारी इस बात के लिए सक्षम नहीं होगा कि वह किसी बैंककारी या बीमा कम्पनी से सम्पृक्त किसी औद्योगिक विवाद को या ऐसे विवाद से सम्बन्धित किसी अन्य मामले को न्यायनिर्णयन, जांच या परिनिर्धारण के लिए किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकारी को निर्देशित करे

                5. राज्य अधिकरणों के समक्ष लम्बित विवादों से सम्बन्धित कार्यवाहियों का उपशमन और ऐसे विवादों का केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित अधिकरण को निर्देशित किया जाना-(1) जहां कि किसी बैंककारी या बीमा कम्पनी से सम्पृक्त कोई औद्योगिक विवाद या ऐसे विवाद से संबंधित कोई मामला किसी राज्य सरकार द्वारा या ऐसी सरकार के अधीनस्थ किसी आफिसर या प्राधिकारी द्वारा किसी विधि के अधीन किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकारी को न्यायनिर्णयन या परिनिर्धारण के लिए 30 अप्रैल, 1949 के पहले निर्देशित किया जा चुका है और ऐसे निर्देश के बारे में या उससे उद्भूत कार्यवाहियां उस तारीख से अव्यवहित पूर्व किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लम्बित थीं वहां यह समझा जाएगा कि पूर्वोक्त तारीख को ऐसा निर्देश प्रत्याहृत कर लिया गया था और ऐसी सभी कार्यवाहियां उपशमित हो गई थीं

                (2) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, हर ऐसे औद्योगिक विवाद को, जिसे उपधारा (1) के उपबंध लागू होते हैं, उक्त अधिनियम के अधीन गठित औद्योगिक अधिकरण को न्यायनिर्णयन के लिए लिखित आदेश द्वारा उक्त अधिनियम की धारा 10 के अधीन निर्देशित करेगी

  1. इसका विस्तार उड़ीसा राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में 1956 के उड़ीसा विनियम 1 द्वारा किया गया तथा 1951 के उत्तर प्रदेश अधिनियम सं० 25 द्वारा उत्तर प्रदेश में संशोधित
  2. 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 तथा अनुसूची द्वारा (1-4-1951 से) भाग राज्यों के सिवाय के स्थान पर प्रतिस्थापित  

 

6. जिन विवादों के बारे में अधिनिर्णय या विनिश्चय किए जा चुके हैं उन्हें पुनर्न्यायनिर्णयन के लिए निर्देशित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्तियां-(1) जहां कि किसी बैंककारी या बीमा कम्पनी से सम्पृक्त किसी औद्योगिक विवाद के बारे में किसी राज्य सरकार द्वारा या ऐसी सरकार के अधीनस्थ किसी आफिसर या प्राधिकारी द्वारा गठित या नियुक्त किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई अधिनिर्णय या विनिश्चय किया जा चुका है, वहां केन्द्रीय सरकार, इस बात के होते हुए भी कि उक्त अधिनिर्णय या विनिश्चय प्रवृत्त है, उस विवाद को या विवादग्रस्त मामलों में से किसी को उक्त अधिनियम के अधीन गठित औद्योगिक अधिकरण को पुनर्न्यायनिर्णयन के लिए लिखित आदेश द्वारा उक्त अधिनियम की धारा 10 के अधीन निर्देशित कर सकेगी और इस प्रकार किए गए अधिनिर्णय या विनिश्चय के या ऐसे अधिनिर्णय या विनिश्चय के किसी भाग के कार्यान्वयन को तब तक के लिए, जब तक कि वह औद्योगिक अधिकरण, जिसे वह विवाद या विवादग्रस्त मामलों में से कोई पुनर्न्यायनिर्णयन के लिए निर्देशित किया गया है, अपना अधिनिर्णय निवेदित कर दे या ऐसी अतिरिक्त कालावधि के लिए, जैसी केन्द्रीय सरकार आवश्यक समझे, रोक सकेगी

(2) उस औद्योगिक अधिकरण द्वारा, जिसे वह विवाद या विवादग्रस्त मामलों में से कोई पुनर्न्यायनिर्णयन के लिए इस प्रकार निर्देशित किया गया है, अपना अधिनिर्णय, उक्त अधिनियम की धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन निवेदित कर दिए जाने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार, लिखित आदेश द्वारा यह घोषित कर सकेगी कि उस विवाद के बारे में राज्य सरकार द्वारा या ऐसी सरकार के अधीनस्थ किसी आफिसर या प्राधिकारी द्वारा गठित या नियुक्त अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा पहले किया गया अधिनिर्णय या विनिश्चय अथवा उस अधिनिर्णय या विनिश्चय का वह भाग जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, प्रवृत्त नहीं रह जाएगा

7. 1949 के अध्यादेश 28 का निरसन-(1) इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स (बैंकिंग ऐन्ड इन्श्योरेंस कम्पनीज) सैकण्ड आर्डिनेंस, 1949 (1949 का 28) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि उक्त आर्डिनेंस के द्वारा या अधीन प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग करने में की गई कोई भी बात या कार्रवाई इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करके ऐसे की गई समझी जाएगी, मानो यह अधिनियम उस दिन प्रवृत्त था जिस दिन वह बात या कार्रवाई की गई

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