अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि और बैंक अधिनियम, 19451
[24 दिसम्बर, 1945]
अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि और बैंक करारों को
कार्यान्वित करने के लिए
2[अधिनियम]
जुलाई, 1944 में ब्रटेन वुड्स, न्यू हैम्पशायर में हुए संयुक्त राष्ट्र मुद्रा और वित्तीय सम्मेलन में निम्नलिखित करारों के अनुच्छेद लेखबद्ध किए गए थे और उक्त सम्मेलन के अन्तिम निर्णय में उपवर्णित किए गए थे, अर्थात्ः-
(क) अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि (जिसे इसमें इसके पश्चात् अन्तरराष्ट्रीय निधि कहा गया है) नामक एक अन्तरराष्ट्रीय निकाय की स्थापना और प्रचालन के लिए एक करार (जिसे इसमें इसके पश्चात् निधि करार कहा गया है); और
(ख) अन्तरराष्ट्रीय पुनर्निर्णाण और विकास बैंक (जिसे इसमें इसके पश्चात् अन्तरराष्ट्रीय बैंक कहा गया है) नामक एक अन्तरराष्ट्रीय निकाय की स्थापना और प्रचालन के लिए एक करार (जिसे इसमें इसके पश्चात् बैंक करार कहा गया है);
3[अतः निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-]
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस 2[अधिनियम] का संक्षिप्त नाम अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि और बैंक 2[अधिनियम], 1945 है ।
(2) इसका विस्तार 4[ 5॥।] सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह तुरन्त प्रवृत्त होगा ।
2. अन्तरराष्ट्रीय निधि और बैंक में संदाय-(1) 6[संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात् भारत की संचित निधि में से] ऐसी सब धनराशियां जो निम्नलिखित के संदाय के लिए समय-समय पर अपेक्षित हों, संदत्त की जाएंगीः-
(क) निधि करार के अनुच्छेद 3 की धारा 3 के पैरा (क), 7॥। के अधीन अन्तरराष्ट्रीय निधि को, और बैंक करार के अनुच्छेद 2 की धारा 3 के 8[पैरा (क) और (ग) के अधीन] केन्द्रीय सरकार द्वारा 8[अन्तरराष्ट्रीय बैंक को] संदेय अभिदाय;
(ख) निधि करार के 9[अनुच्छेद 5 की धारा 11] के अधीन, अन्तरराष्ट्रीय निधि को, और बैंक करार के अनुच्छेद 2 की धारा 9 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्तरराष्ट्रीय बैंक को संदेय कोई धनराशियां;
- भारत का राजपत्र, असाधारण, तारीख 24 दिसंबर, 1945 में 1945 का अध्यादेश सं० 47 के रूप में प्रकाशित । भारत शासन अधिनियम की धारा 72 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए बनाए गए अध्यादेश को जैसा कि वह भारत शासन अधिनियम, 1935 (26 जियो० 5 सी 2) की नौवीं अनुसूची में दिया गया है, 1959 के अधिनियम सं० 25 द्वारा एक अधिनियम के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है ।
- 1959 के अधिनियम सं० 25 की धारा 2 द्वारा अध्यादेश के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1959 के अधिनियम सं० 25 की धारा 3 द्वारा उद्देशिका के अंतिम पैरा और अधिनियम सूत्र के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा भारत के सभी प्रांतों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग ख राज्यों के सिवाय शब्दों का लोप किया गया ।
- 1969 के अधिनियम सं० 41 की धारा 2 द्वारा (26-12-1981 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 2 द्वारा (15-1-1983 से) लोप किया गया ।
- 1959 के अधिनियम सं० 25 की धारा 4 द्वारा पैरा (क) के अधीन अंतरराष्ट्रीय बैंक को के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 2 द्वारा (15-1-1983 से) अनुच्छेद 4 की धारा 8 के पैरा (ख) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(ग) निधि करार के अनुच्छेद 5 की धारा 8 1[या 2[अनुच्छेद 20] की धारा 2, धारा 3 या धारा 5 के अधीन] केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्तरराष्ट्रीय निधि को संदेय कोई प्रभार;]
(घ) निधि करार के अनुच्छेद 13 की धारा 3 में निर्दिष्ट केन्द्रीय सरकार की गारंटी को कार्यान्वित करने के लिए अपेक्षित कोई धनराशियां;
10[(घघ) ऐसे कोई निर्धारण, जिनका निधि करार के 11[अनुच्छेद 20] की धारा 4 या धारा 5 के अधीन अन्तरराष्ट्रीय निधि को केन्द्रीय सरकार द्वारा दिया जाना अपेक्षित हो;]
(ङ) ऐसा कोई प्रतिकर, जिसका निधि करार की 3[अनुसूची झ, अनुसूची ञ या अनुसूची ट] के अधीन अन्तरराष्ट्रीय निधि या उसके किसी सदस्य को केन्द्रीय सरकार द्वारा दिया जाना अपेक्षित हो ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार ऐसा करना ठीक समझे, तो वह ऐसे प्ररूप में, जिसे वह ठीक समझे, ऐसे कोई ब्याज रहित और अपक्राम्य नोट या अन्य बाध्यताएं, जिनके लिए निधि करार के अनुच्छेद 3 की 4[धारा 4] द्वारा और बैंक करार के अनुच्छेद 5 की धारा 12 में उपबंध है, सृष्ट कर सकेगी और अन्तरराष्ट्रीय निधि या अन्तरराष्ट्रीय बैंक को पुरोधृत कर सकेगी ।
3. रिजर्व बैंक का अंतरराष्ट्रीय निधि और बैंक के लिए निक्षेपागार होना-भारतीय रिजर्व बैंक (जिसे इसमें इसके पश्चात् रिजर्व बैंक कहा गया है), अन्तरराष्ट्रीय निधि और अन्तरराष्ट्रीय बैंक के 5॥। भारतीय करेंसी की अधिकृत पूंजी का निक्षेपागार होगा ।
6[3क. केन्द्रीय सरकार की ओर से विशेष आहरण-अधिकारों का रिजर्व बैंक द्वारा प्रयोग, उनकी प्राप्ति या उनका अर्जन, आदि-रिजर्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय निधि में केन्द्रीय सरकार के विशेष आहरण-अधिकारों को उस सरकार की ओर से प्रयोग में ला सकेगा, प्राप्त कर सकेगा, अर्जित कर सकेगा, धारित कर सकेगा, अन्तरित कर सकेगा या प्रचालित कर सकेगा, और उससे अनुपूरक या आनुषंगिक सभी कार्य कर सकेगा ।]
4. जानकारी प्राप्त करने की शक्ति-(1) जहां निधि करार के 7[अनुच्छेद 4 की धारा 3 के पैरा (ख) या] अनुच्छेद 8 की धारा 5 के अधीन अन्तरराष्ट्रीय निधि केन्द्रीय सरकार से यह अपेक्षा करती है कि वह उसे कोई जानकारी दे, वहां केन्द्रीय सरकार या यदि केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त साधारणतया या विशेषतया प्राधिकृत है, तो रिजर्व बैंक, लिखित आदेश दे कर किसी भी व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसे अधिकारी या अन्य व्यक्ति को, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया गया है, ऐसी विस्तृत जानकारी दे, जिसे, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक अन्तरराष्ट्रीय निधि के अनुरोध का अनुपालन करने के प्रयोजनार्थ आवश्यक अवधारित करे; और कोई व्यक्ति, जिससे ऐसी अपेक्षा की गई है, ऐसी जानकारी देने के लिए आबद्ध होगा ।
(2) प्रत्येक अधिकारी या व्यक्ति, जिससे इस धारा के अधीन कोई जानकारी देना अपेक्षित है, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।
(3) इस धारा के अधीन प्राप्त कोई जानकारी अन्तरराष्ट्रीय निधि को इतने ब्यौरे के साथ नहीं दी जाएगी, जिससे किसी व्यक्ति का कार्यकलाप प्रकट होता है 8॥। ।
(4) जानकारी किस ब्यौरे तक दी जाए इस बात का उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक द्वारा अवधारण अन्तिम होगा, और इस धारा के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित किसी जानकारी के संबंध में भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 176 या धारा 177 के अधीन किसी अभियोजन में प्रतिवाद के लिए इस बात का प्राख्यान नहीं किया जाएगा कि अन्तरराष्ट्रीय निधि के अनुरोध का अनुपालन करने के प्रयोजनार्थ जितनी जानकारी देना आवश्यक थी, उससे अधिक ब्यौरे में उस जानकारी का देना अपेक्षित था ।
- 1969 के अधिनियम सं० 41 की धारा 2 द्वारा (26-12-1981 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 2 द्वारा (15-1-1983 से) अनुच्छेद 26ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 2 द्वारा (15-1-1983 से) अनुच्छेद घ या अनुसूची ङ के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 2 द्वारा (15-1-1983 से) अनुच्छेद 5ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1952 के अधिनियम सं० 48 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा ब्रिटिश शब्द का लोप किया गया ।
- 1969 के अधिनियम सं० 41 की धारा 3 द्वारा (26-12-1981 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 3 द्वारा (15-1-1983 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 3 द्वारा (15-1-1983 से) कतिपय शब्दों का लोप किया गया ।
(5) इस धारा के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित किसी जानकारी के संबंध में किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना संस्थित नहीं किया जाएगा ।
5. करारों के कुछ उपबन्धों को विधि का बल प्राप्त होना-किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, निधि और बैंक करारों के उपबन्धों को, जो अनुसूची में दिए गए हैं, 1[भारत] में विधि का बल प्राप्त होगाः
परन्तु निधि करार के अनुच्छेद 9 की धारा 9 में या बैंक करार के अनुच्छेद 7 की धारा 9 में किसी भी बात का अर्थ यह नहीं लगाया जाएगा कि वह-
(क) सीमाशुल्क से मुक्त माल का भारत में आयात करने का हक, वहां उसके पश्चात्वर्ती विक्रय पर किसी निर्बन्धन के बिना, अन्तरराष्ट्रीय निधि या अन्तरराष्ट्रीय बैंक को देती है;
(ख) अन्तरराष्ट्रीय निधि या अन्तरराष्ट्रीय बैंक को उन शुल्कों या करों से कोई छूट प्रदान करती है, जो बेचे गए माल की कीमत का कोई भाग हो या की गई सेवाओं के प्रभारों के सिवाय वास्तव में कुछ नहीं है ।
6. [1934 के अधिनियम सं० 2 की धारा 17 का संशोधन ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 48) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।
7. नियम बनाने की शक्ति- 2[(1)] केन्द्रीय सरकार, अनुसूची में दिए गए उपबन्धों को प्रभावी बनाने के लिए और साधारणतया इस 3[अधिनियम] के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
4[(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा 5[दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में] पूरी हो सकेगी । 6[यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के] अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
अनुसूची
(धारा 5 देखिए)
करारों के उपबन्ध, जिन्हें विधि बल प्राप्त होगा
भाग 1
निधि करार
अनुच्छेद 8 की धारा 2 का पैरा (ख)
वे विनिमय-संविदाएं, जिनमें किसी सदस्य की करेन्सी अन्तर्ग्रस्त है और जो उस सदस्य के विनिमय नियन्त्रण विनियमों के प्रतिकूल इस करार से संगत बनाए रखी जाती है या अधिरोपित की जाती है, किसी सदस्य के राज्यक्षेत्र में अप्रवर्तनीय होंगी...............।
- 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग क राज्यों और भाग ग राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1959 के अधिनियम सं० 25 की धारा 5 द्वारा उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित ।
- 1959 के अधिनियम सं० 25 की धारा 2 द्वारा अध्यादेश के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1959 के अधिनियम सं० 25 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 4 द्वारा (15-1-1983 से) दो आनुक्रमिक सत्रों में के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 4 द्वारा (15-1-1983 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
अनुच्छेद 9
प्रास्थिति, उन्मुक्तियां तथा विशेषाधिकार
धारा 1-अनुच्छेद का प्रयोजन
निधि को ऐसे कृत्यों को, जो उसे सौंपे गए हैं, पूरा करने में समर्थ बनाने के लिए इस अनुच्छेद में उपवर्णित प्रास्थिति उन्मुक्तियां तथा विशेषाधिकार प्रत्येक सदस्य के राज्यक्षेत्रों में निधि को दिए जाएंगे ।
धारा 2-निधि की प्रास्थिति
निधि को पूर्ण विधिक व्यक्तित्व और विशिष्टतया, -
(i) संविदा करने;
(ii) स्थावर तथा जंगम सम्पत्ति अर्जित करने तथा उसका व्ययन करने;
(iii) विधिक कार्यवाहियां संस्थित करने,
का पूर्ण सामर्थ्य होगा ।
धारा 3-न्यायिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति
निधि, उसकी सम्पत्ति और उसकी आस्तियां, चाहे वे कहीं भी स्थित हों और किसी के भी द्वारा धारित हों, प्रत्येक प्रकार की न्यायिक प्रक्रिया से वहां तक के सिवाय उन्मुक्त रहेंगी, जहां तक कि वह किन्हीं कार्यवाहियों के प्रयोजनार्थ या किसी संविदा के निबन्धनों के अनुसार अपनी उन्मुक्ति को अभिव्यक्त रूप से अधित्यक्त करे ।
धारा 4-अन्य कार्रवाई से उन्मुक्ति
निधि की सम्पत्ति और आस्तियां, चाहे वे कहीं स्थित हों और किसी के भी द्वारा धारित हों, कार्यपालिका या विधायी कार्रवाई द्वारा की जाने वाली तलाशी, अधिग्रहण, अधिहरण, स्वत्वहरण या किसी अन्य प्रकार के अभिग्रहण से उन्मुक्ति होंगी ।
धारा 5-अभिलेखागारों की उन्मुक्ति
निधि के अभिलेखागार अनतिक्रमणीय होंगे ।
धारा 6-आस्तियों की निर्बन्धनों से मुक्ति
निधि की सब सम्पत्ति और आस्तियां किसी भी प्रकृति के निर्बन्धनों, विनियमनों, नियन्त्रण और अधिस्थगनों से वहां तक मुक्त रहेगी, जहां तक कि इस करार में उपबन्धित 1[क्रियाकलाप के] कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हो ।
धारा 7-संसूचनाओं के लिए विशेषाधिकार
सदस्य निधि की शासकीय संसूचनाओं को वही महत्व देंगे, जो वे अन्य सदस्यों की शासकीय संसूचनाओं को देते हैं ।
धारा 8-अधिकारियों तथा कर्मचारियों की उन्मुक्तियां और विशेषाधिकार
निधि के सभी गवर्नरों, कार्यपालक निदेशकों, एवजियों, 2[समितियों के सदस्यों, अनुच्छेद 12, धारा 3 (ञ) के अधीन नियुक्त प्रतिनिधियों, पूर्वगामी व्यक्तियों में से किसी के सलाहकारों, अधिकारियों तथा कर्मचारियों को]: -
(i) अपनी पदीय हैसियत में अपने द्वारा किए गए कार्यों की बाबत विधिक प्रक्रिया से तब के सिवाय उन्मुक्ति प्राप्त होगी, जब कि निधि ने यह उन्मुक्ति अधित्यक्त कर दी हो;
(ii) जो स्थानीय राष्ट्रीक नहीं है, आप्रवास सम्बन्धी निर्बन्धनों, अन्यदेशीय रजिस्ट्रीकरण अपेक्षाओं और राष्ट्रीय सेवा की बाध्यताओं से वही उन्मुक्तियां और विनिमय निर्बन्धनों के सम्बन्ध में वही सुविधाएं दी जाएंगी, जो कि सदस्यों द्वारा अन्य सदस्यों के सदृश रैंक के प्रतिनिधियों, पदधारियों तथा कर्मचारियों की दी जाती हैं;
(iii) वही यात्रा सुविधाएं दी जाएंगी, जो सदस्यों द्वारा अन्य सदस्यों के सदृश रैंक के प्रतिनिधियों, पदधारियों तथा कर्मचारियों की दी जाती हैं ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 5 द्वारा (15-1-1983 से) कार्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 5 द्वारा (15-1-1983 से) अधिकारियों तथा कर्मचारियों को के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
धारा 9-कराधान से उन्मुक्तियां
(क) निधि, उसकी आस्तियां, सम्पत्ति, आय तथा इस करार द्वारा प्राधिकृत उसके प्रचालन तथा संव्यवहार सभी कराधान से तथा सभी सीमाशुल्कों से उन्मुक्त होंगे । निधि किसी कर या शुल्क के संग्रहण या संदाय के दायित्व से भी उन्मुक्त होगी ।
(ख) निधि द्वारा अपने कार्यपालक निदेशकों, एवजियों, पदधारियों या कर्मचारियों को, जो स्थानीय नागरिक, स्थानीय प्रजा या अन्य स्थानीय राष्ट्रीक नहीं है, दिए गए वेतन तथा उपलब्धियों पर या उनकी बाबत कोई भी कर उद्गृहीत नहीं किया जाएगा ।
(ग) निधि द्वारा पुरोधृत किसी बाध्यता या प्रतिभूति पर, जिसके अन्तर्गत उस पर का लाभांश या ब्याज भी है, चाहे वह बाध्यता या प्रतिभूति किसी के भी द्वारा धारित हो, किसी भी प्रकार का ऐसा कोई विनिर्धारण उद्गृहीत नहीं किया जाएगाः-
(i) जो ऐसी बाध्यता या प्रतिभूति के विरुद्ध एकमात्र उसके उद्गम को कारण ही विभेद करता है; अथवा
(ii) यदि ऐसे विनिर्धारण के लिए अधिकारिता विषयक एकमात्र आधार स्थान या करेन्सी है, जिसमें वह पुरोधृत, संदेय या संदत्त की जाती है, अथवा निधि द्वारा बनाए रखे गए किसी कार्यालय का अवस्थान या कारबार का स्थान है ।
1[अनुच्छेद 21
साधारण विभाग और विशेष आहरण अधिकार विभाग का प्रशासन
। । । ।
(ख) उन विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के साथ-साथ जो इस करार के अनुच्छेद 9 के अधीन प्रदान की गई है, विशेष आहरण अधिकारों पर या विशेष आहरण अधिकारों के प्रति संक्रियाओं या संव्यवहारों पर किसी प्रकार का कोई भी कर उद्गृहीत नहीं किया जाएगा ।]
भाग 2
बैंक करार
अनुच्छेद 7
प्रास्थिति, उन्मुक्तियां तथा विशेषाधिकार
धारा 1-अनुच्छेद का प्रयोजन
बैंक को ऐसे कृत्यों को, जो उसे सौंपे गए हैं, पूरा करने में समर्थ बनाने के लिए इस अनुच्छेद में उपवर्णित प्रास्थिति, उन्मुक्तियां तथा विशेषाधिकार प्रत्येक सदस्य के राज्यक्षेत्र में बैंक को दिए जाएंगे ।
धारा 2-बैंक की प्रास्थिति
बैंक को पूर्ण विधिक व्यक्तित्व और विशिष्टतया, -
(i) संविदा करने;
(ii) स्थावर तथा जंगम सम्पत्ति अर्जित करने तथा उसका व्ययन करने;
(iii) विधिक कार्यवाहियां संस्थित करने,
का पूर्ण सामर्थ्य होगा ।
धारा 3-न्यायिक प्रक्रिया के बारे में बैंक की स्थिति
बैंक के विरुद्ध कार्रवाई केवल सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय में उस सदस्य के राज्यक्षेत्र में ही लाई जा सकेगी जिसमें बैंक का कार्यालय है, जिसमें बैंक ने आदेशिका की तामील या सूचना के प्रतिग्रहण के प्रयोजनार्थ कोई अभिकर्ता नियुक्त किया है, या जिसमें बैंक ने प्रतिभूतियां पुरोधृत या प्रत्याभूत की हैं । किन्तु कोई भी कार्रवाई सदस्यों या ऐसे व्यक्तियों द्वारा नहीं की जाएगी जो सदस्यों के लिए कार्य कर रहे हों या उनसे उन्हें दावा व्युत्पन्न हो रहा हो । बैंक की सम्पत्ति और आस्तियां, चाहे वे जहां कहीं भी स्थित हों और किसी के भी द्वारा धारित की गई हों, बैंक के विरुद्ध अन्तिम निर्णय देने के पूर्व सब प्रकार के अभिग्रहण, कुर्की या निष्पादन से मुक्त होंगी ।
- 1982 के अधिनियम सं० 67 की धारा 5 द्वारा (15-1-1983 से) अंतःस्थापित ।
धारा 4-अभिग्रहण से आस्तियों की उन्मुक्ति
बैंक की सम्पत्ति और आस्तियां, चाहे वे कहीं भी स्थित हों और किसी के भी द्वारा धारित की गई हों, कार्यपालिका या विधायी कार्रवाई द्वारा की जाने वाली तलाशी, अधिग्रहण, अधिहरण, स्वत्वहरण या किसी अन्य प्रकार के अभिग्रहण से उन्मुक्त होंगी ।
धारा 5-अभिलेखागारों की उन्मुक्ति
बैंक के अभिलेखागार अनतिक्रमणीय होंगे ।
धारा 6-आस्तियों की निर्बन्धनों से मुक्ति
इस करार के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, बैंक की सब सम्पत्ति और आस्तियां किसी भी प्रकार के निर्बन्धनों, विनियमनों, नियन्त्रणों और अधिस्थगनों से वहां तक मुक्त रहेंगी जहां तक कि इस करार में उपबन्धित कार्यों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हों ।
धारा 7-संसूचनाओं के लिए विशेषाधिकार
हर एक सदस्य बैंक की शासकीय संसूचनाओं को वही महत्व देंगे जो वे अन्य सदस्यों की शासकीय संसूचनाओं को देते हैं ।
धारा 8-अधिकारियों तथा कर्मचारियों की उन्मुक्ति और विशेषाधिकार
बैंक के सभी गवर्नरों, कार्यपालक निदेशकों, एवजियों, अधिकारियों तथा कर्मचारियों को-
(i) अपनी पदीय हैसियत में अपने द्वारा किए गए कार्यों की बाबत विधिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति प्राप्त होगी किन्तु तब नहीं जब कि बैंक ने यह उन्मुक्ति अधित्यक्त कर दी हो;
(ii) जो स्थानीय राष्ट्रिक नहीं है, आप्रवास संबंधी निर्बन्धनों, अन्यदेशीय रजिस्ट्रीकरण अपेक्षाओं और राष्ट्रीय सेवा की बाध्यताओं से वही उन्मुक्तियों और विनिमय निर्बन्धनों के संबंध में वहीं सुविधाएं दी जाएंगी जो कि सदस्यों द्वारा अन्य सदस्यों के सदृश रैंक के प्रतिनिधियों, पदधारियों तथा कर्मचारियों को दी जाती हैं;
(iii) वही यात्री सुविधाएं दी जाएंगी जो सदस्यों द्वारा अन्य सदस्यों के सदृश रैंक के प्रतिनिधियों, पदधारियों तथा कर्मचारियों को दी जाती हैं ।
धारा 9-कराधान की उन्मुक्तियां
(क) बैंक, उसकी आस्तियां, सम्पत्ति, आय तथा इस करार द्वारा प्राधिकृत उसके प्रचालन तथा संव्यवहार सभी कराधान से तथा सभी सीमाशुल्कों से उन्मुक्त होंगे । बैंक किसी कर या शुल्क के संग्रहण या संदाय के दायित्व से भी उन्मुक्त होगा ।
(ख) बैंक द्वारा अपने कार्यपालक निदेशकों, एवजियों, पदधारियों या कर्मचारियों की, जो स्थानीय नागरिक, स्थानीय प्रजा या अन्य स्थानीय राष्ट्रिक नहीं है, दिए गए वेतन तथा उपलब्धियों पर या उनकी बाबत कोई भी कर उद्गृहीत नहीं किया जाएगा ।
(ग) बैंक द्वारा पुरोधृत किसी बाध्यता या प्रतिभूति पर (जिसके अन्तर्गत उस पर का लाभांश या ब्याज भी है), चाहे वह बाध्यता या प्रतिभूति किसी के भी द्वारा धारित हो, किसी भी प्रकार का ऐसा कोई विनिर्धारण उद्गृहीत नहीं किया जाएगा-
(i) जो ऐसी बाध्यता या प्रतिभूति के विरुद्ध एकमात्र उसके उद्गम के कारण ही विभेद करता है; अथवा
(ii) यदि ऐसे विनिर्धारण के लिए अधिकारिता विषयक एकमात्र आधार वह स्थान या करेंसी है जिसमें वह पुरोधृत, संदेय या संदत्त की जाती है अथवा बैंक द्वारा बनाए रखे गए किसी कार्यालय का अवस्थान या कारबार का स्थान है ।
(घ) बैंक द्वारा प्रत्याभूत किसी बाध्यता या प्रतिभूति पर (जिसके अन्तर्गत उस पर लाभांश या ब्याज भी है), चाहे वह बाध्यता या प्रतिभूति किसी के भी द्वारा धारित हो, किसी भी प्रकार का ऐसा कोई विनिर्धारण उद्गृहीत नहीं किया जाएगा-
(i) जो ऐसी बाध्यता या प्रतिभूति के विरुद्ध एकमात्र इस कारण कि वह बैंक द्वारा प्रत्याभूत किया गया है, विभेद करता है, अथवा
(ii) यदि ऐसे विनिर्धारण के लिए अधिकारिता विषयक एक मात्र आधार बैंक द्वारा बनाए रखे गए किसी कार्यालय का अवस्थान या कारबार का स्थान है ।
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