भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992
(1992 का अधिनियम संख्यांक 15)
[4 अप्रैल, 1992]
प्रतिभूतियों में विनिधानकर्ताओं के हितों का संरक्षण करने तथा प्रतिभूति
बाजार के विकास का संवर्धन और विनियमन करने
के लिए बोर्ड की स्थापना का और उससे संबंधित
या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के तैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह 30 जनवरी, 1992 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) बोर्ड" से धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अभिप्रेत है ;
(ख) अध्यक्ष" से बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;
[(खक) सामूहिक विनिधान स्कीम" से ऐसी कोई स्कीम या इंतजाम अभिप्रेत है जो धारा 11कक में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा करती हो ;]
(ग) विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" से भारत सरकार के आर्थिक कार्य विभाग के संकल्प सं० 1 (44) एस ई/86, तारीख 12 अप्रैल, 1988 के अधीन गठित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अभिप्रेत है ;
(घ) निधि" से धारा 14 के अधीन गठित निधि अभिप्रेत है ;
(ङ) सदस्य" से बोर्ड का कोई सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष है ;
(च) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;
(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ज) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ;
[(जक) रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है ;]
(झ) प्रतिभूति" का वही अर्थ है जो प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 2 में है ।
[(2) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु [प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) या निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22)] में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं जो उस अधिनियम में हैं ।]
अध्याय 2
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की स्थापना
3. बोर्ड की स्थापना और निगमन-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के नाम से एक बोर्ड की स्थापना की जाएगी ।
(2) बोर्ड पूर्वोक्त नाम का एक शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) बोर्ड का मुख्य कार्यालय मुंबई में होगा ।
(4) बोर्ड भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा ।
4. बोर्ड का प्रबंध-(1) बोर्ड निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-
(क) एक अध्यक्ष ;
(ख) वित्त [और कंपनी अधिनियम, 1956 के प्रशासनट से संबंधित केन्द्रीय सरकार के 1[मंत्रालय] के पदधारियों में से दो सदस्य ;
(ग) 1[रिजर्व बैंक] के पदधारियों में से एक सदस्य ;
1[(घ) पांच अन्य सदस्य जिनमें से कम से कम तीन पूर्णकालिक सदस्य होंगे,]
जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे ।
(2) बोर्ड के कार्यकलाप का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंध सदस्यों के एक बोर्ड में निहित होगा जो ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा जो बोर्ड द्वारा प्रयोग में लाई जा सकती हैं या की जा सकती हैं ।
(3) विनियमों द्वारा अन्यथा अवधारित के सिवाय, अध्यक्ष को भी बोर्ड के कार्यकलाप के साधारण अधीक्षण और निदेशन की शक्तियां होंगी तथा वह ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा जो उस बोर्ड द्वारा प्रयोग में लाई जा सकती हैं या की जा सकती हैं ।
(4) उपधारा (1) के खंड (क) और खंड (घ) में निर्दिष्ट अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी और उस उपधारा के खंड (ख) और खंड (ग) में निर्दिष्ट सदस्यों का नामनिर्देशन क्रमशः केन्द्रीय सरकार और 1[रिजर्व बैंक] द्वारा किया जाएगा ।
(5) उपधारा (1) के खंड (क) और खंड (घ) में निर्दिष्ट अध्यक्ष और अन्य सदस्य ऐसी योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति होंगे जिन्होंने प्रतिभूति बाजार से संबंधित समस्याओं के बारे में कार्रवाई करने में क्षमता दर्शित की है या जिन्हें विधि, वित्त, अर्थशास्त्र, लेखाकर्म, प्रशासन या किसी ऐसे अन्य विषय का विशेष ज्ञान या अनुभव है जो केन्द्रीय सरकार की राय में बोर्ड के लिए उपयोगी होगी ।
5. बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें-(1) अध्यक्ष और धारा 4 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) में निर्दिष्ट सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार को, अध्यक्ष या धारा 4 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) के अधीन नियुक्त किसी सदस्य की सेवाओं को, उपधारा (1) के अधीन विहित अवधि की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय उसे लिखित रूप में कम से कम तीन मास की सूचना देकर अथवा उसके बदले में तीन मास के वेतन और भत्ते देकर समाप्त कर देने का अधिकार होगा और, यथास्थिति, अध्यक्ष या किसी किसी सदस्य को भी, उपधारा (1) के अधीन विहित अवधि की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में कम से कम तीन मास की सूचना देकर अपना पद छोड़ने का अधिकार होगा ।
6. सदस्य का पद से हटाया जाना- । । । केन्द्रीय सरकार किसी सदस्य को पद से हटा देगी यदि-
(क) वह दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है या किसी समय न्यायनिर्णीत किया गया है ;
(ख) वह विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है ;
(ग) वह किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्ग्रस्त है ;
। । । । । ।
(ङ) उसने केन्द्रीय सरकार की राय में अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है जिसके कारण उसका पद पर बने रहना लोकहित में हानिकारक है :
परंतु कोई भी सदस्य इस खण्ड के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे उस मामले में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
7. अधिवेशन-(1) बोर्ड ऐसे समयों और स्थानों पर अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के (जिसके अंतर्गत उसके अधिवेशनों में गणपूर्ति है) संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगा जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
(2) अध्यक्ष, या यदि किसी कारण से वह बोर्ड के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से चुना गया कोई अन्य सदस्य, उस अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(3) बोर्ड के किसी अधिवेशन में उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
[7क. कतिपय दशाओं में सदस्यों का अधिवेशनों में भाग न लेना-कोई सदस्य जो किसी कंपनी का निदेशक है और जिसका ऐसे निदेशक के रूप में किसी ऐसे विषय में जो बोर्ड के अधिवेशन में विचार के लिए आने वाला है, कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष धन-संबंधी हित है, सुसंगत परिस्थितियों के उसकी जानकारी में आने के पश्चात् यथाशीघ्र, ऐसे अधिवेशन में अपने हित की प्रकृति को प्रकट करेगा और ऐसा प्रकटन, बोर्ड की कार्यवाहियों में अभिलिखित किया जाएगा तथा सदस्य, ऐसे विषय की बाबत बोर्ड के किसी विचार-विमर्श या विनिश्चय में कोई भाग नहीं लेगा ।]
8. रिक्तियों, आदि से बोर्ड की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-बोर्ड का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगी कि-
(क) बोर्ड में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ; या
(ख) बोर्ड के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है ; या
(ग) बोर्ड की प्रक्रिया में ऐसी अनियमितता है जिससे मामले के गुणागुण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।
9. बोर्ड के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) बोर्ड उतने अन्य अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त कर सकेगा जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझता है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किए गए बोर्ड के अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और अन्य शर्तें वे होंगी जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।
अध्याय 3
विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की आस्तियों, दायित्वों, आदि का बोर्ड को अंतरण
10. विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की आस्तियों, दायित्वों, आदि का बोर्ड को अंतरण-(1) बोर्ड की स्थापना की तारीख को और उससे,-
(क) इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि में अथवा किसी संविदा या अन्य लिखत में विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के प्रति किसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह बोर्ड के प्रति निर्देश है ;
(ख) विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की सभी जंगम और स्थावर संपत्ति और आस्तियां, बोर्ड में निहित हो जाएंगी ;
(ग) विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के सभी अधिकार और दायित्व बोर्ड को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार और दायित्व होंगे ;
(घ) खण्ड (ग) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के प्रयोजन के लिए या उसके संबंध में उक्त विद्यमान बोर्ड द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उस तारीख के ठीक पूर्व उपगत सभी ऋण, बाध्यताएं और दायित्व, की गई सभी संविदाएं तथा किए जाने के लिए वचनबद्ध सभी मामले और बातें बोर्ड द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत, की गई या किए जाने के लिए वचनबद्ध समझी जाएंगी ;
(ङ) विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को उस तारीख के ठीक पूर्व देय सभी धनराशियां, बोर्ड को देय समझी जाएंगी ;
(च) ऐसे सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां जो विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा या उसके विरुद्ध ऐसी तारीख के ठीक पूर्व संस्थित की गई हैं या संस्थित की जा सकती थी, बोर्ड द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेंगी या संस्थित की जा सकेंगी ; और
(छ) विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के अधीन उस तारीख के ठीक पूर्व कोई पद धारण करने वाला प्रत्येक कर्मचारी, बोर्ड में अपना पद उसी अवधि तक और पारिश्रमिक, छुट्टी, भविष्य निधि, सेवा-निवृत्ति और अन्य सेवांत प्रसुविधाओं की बाबत सेवा के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर धारण करेगा जिन पर वह ऐसा पद बोर्ड के स्थापित न होने की दशा धारण करता और बोर्ड के कर्मचारी के रूप में ऐसा करता रहेगा अथवा वह उस तारीख से छह मास की अवधि की समाप्ति तक ऐसा करता रहेगा, यदि ऐसा कर्मचारी ऐसी अवधि के भीतर अपना यह विकल्प करता है कि वह बोर्ड का कर्मचारी नहीं होना चाहता ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड द्वारा इस धारा के अधीन किसी कर्मचारी का अपनी नियमित सेवा में आमेलन, ऐसे कर्मचारी को उस अधिनियम या अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकार का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
अध्याय 4
बोर्ड की शक्तियां और कृत्य
11. बोर्ड के कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, बोर्ड का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिभूतियों में विनिधानकर्ताओं के हितों का संरक्षण करे और प्रतिपूर्ति बाजार के, ऐसे अध्युपायों द्वारा जो वह ठीक समझे, विकास का संवर्धन और विनियमन करे ।
(2) पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसमें निर्दिष्ट अध्युपायों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) स्टाक एक्सचेंजों और किन्हीं अन्य प्रतिभूति बाजारों में कारबार का विनियमन करना ;
(ख) स्टाक दलालों, उप-दलालों, शेयर अंतरण अभिकर्ताओं, निर्गमन के बैंककारों, न्यास विलेखों के न्यासियों, निर्गमन के रजिस्ट्रारों, मर्चेंट बैंककारों, निम्नांककों, पोर्टफोलियो प्रबन्धकों, विनिधान सलाहकारों और ऐसे अन्य मध्यवर्तियों को, जो प्रतिभूति बाजारों से किसी प्रकार सहयुक्त हों, रजिस्टर करना और उनके कार्यकरण का विनियमन करना ;
[(खक) [निक्षेपागारों, सहभागियों, प्रतिभूतियों के अभिरक्षकों,] विदेशी संस्थागत विनिधानकर्ताओं, प्रत्ययमापी अभिकरणों और ऐसे अन्य मध्यवर्तियों को, जिन्हें बोर्ड, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, रजिस्टर करना और उनके कार्यकरण का विनियमन करना ;]
(ग) 3[साहसिक पूंजी निधियों और सामूहिक विनिधान स्कीमोंट को, जिनके अंतर्गत पारस्परिक निधियां हैं, रजिस्टर करना और उनके कार्यकरण का विनियमन करना ;
(घ) स्वतः विनियमनकारी संगठनों का संवर्धन और विनियमन करना ;
(ङ) प्रतिभूति बाजारों से संबंधित कपटपूर्ण और अनुचित व्यापारिक व्यवहार का प्रतिषेध करना ;
(च) विनिधानकर्ताओं की शिक्षा और प्रतिभूति बाजारों के मध्यवर्तियों के प्रशिक्षण का संवर्धन करना ;
(छ) प्रतिभूतियों में अन्तरंगी व्यापार का प्रतिषेध करना ;
(ज) शेयरों के पर्याप्त अर्जन का और कंपनियों के अधिग्रहण का विनियमन करना ;
(झ) [स्टाक एक्सचेंजों, पारस्परिक निधियों, प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त अन्य व्यक्तियों,] प्रतिभूति बाजार में मध्यवर्तियों और स्वतः विनियमनकारी संगठनों से जानकारी मंगाना, उनका निरीक्षण करना, उनकी जांच और संपरीक्षा करना ;
[(झक) किसी केंद्रीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित या गठित किसी बैंक या किसी अन्य प्राधिकारी या बोर्ड या निगम सहित किसी व्यक्ति से ऐसी सूचना और अभिलेख मंगाना, जो बोर्ड की राय में प्रतिभूतियों में किसी संव्यवहार की बाबत बोर्ड द्वारा किसी अन्वेषण या जांच के लिए सुसंगत होगा ;]
1[(झख) प्रतिभूति विधियों के संबंध में अतिक्रमणों के निवारण या उनका पता लगाने से संबंधित मामलों में, इस संबंध में तत्समय प्रवृत्त किन्हीं अन्य विधियों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, बोर्ड के समान कृत्य करने वाले अन्य प्राधिकारियों से, चाहे वे भारत में हों या भारत के बाहर, सूचना मंगाना या उनको सूचना देना :
परंतु बोर्ड, भारत से बाहर किसी प्राधिकारी को किसी सूचना को देने के प्रयोजन के लिए, केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से ऐसे प्राधिकारी के साथ कोई ठहराव या करार या बात तय कर सकेगा ;]
(ञ) । । । प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) के उपबंधों के अधीन ऐसे कृत्यों का पालन करना और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करना जो उसे केंद्रीय सरकार द्वारा प्रत्यायोजित की जाएं ;
(ट) इस धारा के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए फीस या अन्य प्रभार उद्गृहीत करना ;
(ठ) उपरोक्त प्रयोजनों के लिए अनुसंधान करना ;
[(ठक) ऐसे किन्हीं अधिकरणों से, जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसी जानकारी मंगाना या उसको देना जो उसके द्वारा अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण, निर्वहन के लिए आवश्यक समझी जाए ;]
(ड) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना जो विहित किए जाएं ।
[(2क) बोर्ड, उपधारा (2) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी सूचीबद्ध पब्लिक कंपनी या ऐसी पब्लिक कंपनी की (जो धारा 12 में निर्दिष्ट मध्यवर्तियां नहीं हैं) जो ऐसे किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में अपनी प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध कराने का आशय रखती है, किसी बही, या रजिस्टर, या अन्य दस्तावेज या अभिलेख का निरीक्षण करने के लिए उपाय कर सकेगा, जहां बोर्ड के पास यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार है कि ऐसी कंपनी प्रतिभूति बाजार के संबंध में अंतरंगी व्यापार या कपटपूर्ण और अनुचित व्यापार प्रथाओं में लगी हुई है ।]
3[(3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जब बोर्ड [उपधारा (2) के खंड (झ) या खंड (झक) या उपधारा (2क)] के अधीन शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो तब उसे निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन वाद का विचारण करते समय, सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(i) ऐसे स्थान और समय पर जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, लेखाबहियों और अन्य दस्तावेजों का प्रकटीकरण और पेश किया जाना ;
(ii) व्यक्तियों को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उनकी परीक्षा करना ;
(iii) धारा 12 में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति की किन्हीं बहियों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों का किसी भी स्थान पर निरीक्षण करना ;]
4[(iv) उपधारा (2क) में निर्दिष्ट कंपनी की किसी बही या रजिस्टर या अन्य दस्तावेज या अभिलेख का निरीक्षण ;
(v) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।]
4[(4) बोर्ड, उपधारा (1), उपधारा (2), उपधारा (2क) और उपधारा (3) तथा धारा 11ख के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, विनिधानकर्ताओं या प्रतिभूति बाजार के हित में, या तो अन्वेषण या जांच के लंबित रहते हुए या ऐसे अन्वेषण या जांच के पूरा होने पर, आदेश द्वारा, निम्नलिखित कोई अध्युपाय कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में किसी प्रतिभूति के व्यापार का निलंबन करना ;
(ख) किसी प्रतिभूति बाजार में व्यक्तियों की पहुंच को रोकना और प्रतिभूति बाजार से सहबद्ध किसी व्यक्ति को प्रतिभूतियों का क्रय, विक्रय या संव्यवहार करने से प्रतिषिद्ध करना ;
(ग) किसी स्टाक एक्सचेंज या स्वतः विनियामक संगठन के किसी पदधारी को ऐसा पद धारण करने से निलंबित करना ;
(घ) ऐसे किसी संव्यवहार के संबंध में, जो कि अन्वेषण के अधीन है, आगमों या प्रतिभूतियों को परिबद्ध या प्रतिधारित करना ;
(ङ) अधिकारिता रखने वाले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमोदन के लिए किए गए आवेदन पर आदेश पारित करने के पश्चात् किसी भी रीति में प्रतिभूति बाजार से सहबद्ध किसी मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों में से किसी के उल्लंघन में अन्तर्वलित हो, एक या अधिक बैंक खाते या खातों को एक मास से अनधिक की अवधि के लिए कुर्क करना :
परंतु केवल वही बैंक खाता या खाते या उनमें दर्ज किसी संव्यवहार को ही, जहां तक उसका संबंध, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों में से किसी के उल्लंघन में वास्तविक रूप से अंतर्वलित आगमों से है, कुर्क करने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा ;
(च) किसी भी रीति में प्रतिभूति बाजार से सहबद्ध किसी मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति को, किसी ऐसी आस्ति का, जो उस संव्यवहार का भाग है जिसका अन्वेषण किया जा रहा है, व्ययन या अन्य संक्रामण न करने का निदेश देना :
परंतु बोर्ड, उपधारा (2) या उपधारा (2क) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी सूचीबद्ध पब्लिक कंपनी या पब्लिक कंपनी (जो धारा 12 में निर्दिष्ट मध्यवर्तियां नहीं हैं) की बाबत, जो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में अपनी प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध कराने का आशय रखती है, खंड (घ) या खंड (ङ) या खंड (च) में विनिर्दिष्ट कोई अध्युपाय कर सकेगा जहां बोर्ड के पास यह विश्वास करने के युक्तियुक्त आधार हों कि ऐसी कंपनी प्रतिभूति बाजार के संबंध में अंतरंगी व्यापार या कपटपूर्ण और अनुचित व्यापार प्रथाओं में लगी हुई है :
परंतु यह और कि बोर्ड, ऐसा आदेश पारित करने के पूर्व या पश्चात्, ऐसे मध्यवर्तियों या संबद्ध व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर देगा ।]
[(5) यथास्थति, इस अधिनियम की धारा 11ख या प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 12क या निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 19 के अधीन जारी निदेश के अनुसरण में प्रत्यर्पित रकम को, बोर्ड द्वारा स्थापित विनिधानकर्ता संरक्षण और शिक्षा निधि में जमा किया जाएगा ओर ऐसी रकम का, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार बोर्ड द्वारा उपयोग किया जाएगा ।]
[ [11क. प्रतिभूतियों के निर्गमन के लिए धन की मांग करने वाले प्रास्पेक्टस, प्रस्थापना दस्तावेज या विज्ञापन जारी करने का बोर्ड द्वारा विनियमन या प्रतिषेध-(1) बोर्ड, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 42) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, विनिधानकर्ताओं के संरक्षण के लिए,-
(क) विनियमों द्वारा,-
(i) पूंजी के प्रोद्धरण, प्रतिभूतियों के अंतरण से संबंधित विषयों और उनके आनुषंगिक अन्य विषयों को ; और
(ii) उस रीति को, जिसमें कंपनियों द्वारा ऐसे विषयों को प्रकट किया जाएगा,
विनिर्दिष्ट कर सकेगा ;
(ख) साधारण या विशेष आदेशों द्वारा-
(i) किसी कंपनी को प्रतिभूतियों के निर्गमन के लिए जनता से धन की मांग करने वाले प्रास्पेक्टस, किसी प्रस्थापना दस्तावेज, या विज्ञापन जारी करने से प्रतिषिद्ध कर सकेगा ;
(ii) उन शर्तों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिनके अधीन रहते हुए प्रोस्पेक्टस, ऐसे प्रस्थापना दस्तावेज या विज्ञापन, यदि प्रतिषिद्ध नहीं किए गए हैं तो, जारी किए जा सकेंगे ।
(2) बोर्ड, प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 21 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध और अंतरित करने के लिए अपेक्षाओं तथा उनसे आनुषंगिक अन्य विषयों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।]
[11कक. सामूहिक विनिधान स्कीम-(1) ऐसी कोई स्कीम या इंतजाम जो उपधारा (2) 1[या उपधारा (2क)] में निर्दिष्ट शर्तों को पूरा करती है, सामूहिक विनिधान स्कीम होगी :
1[परन्तु किसी ऐसी स्कीम या ठहराव के अधीन निधियों का पूल किया जाना, जो बोर्ड के पास रजिस्ट्रीकृत नहीं हैं या उपधारा (3) के अधीन समाविष्ट नहीं हैं, जिसमें एक सौ करोड़ रुपए या अधिक की समग्र रकम अंतर्वलित है, सामूहिक विनिधान स्कीम होना समझा जाएगा ।]
(2) किसी 1[व्यक्ति] द्वारा बनाई गई या प्रस्थापित कोई स्कीम या इंतजाम जिसके अधीन,-
(i) विनिधानकर्ताओं द्वारा किए गए अभिदाय या संदाय, चाहे वे किसी भी नाम से ज्ञात हों, स्कीम या इंतजाम के प्रयोजनों के लिए पूल किए जाते हैं या उपयोग में लाए जाते हैं ;
(ii) विनिधानकर्ताओं द्वारा ऐसी स्कीम या इंतजाम में अभिदाय या संदाय ऐसी स्कीम या इंतजाम से लाभ, आय, उत्पादन या सम्पत्ति, चाहे वह जंगम है या स्थावर, प्राप्त करने की दृष्टि से, किए जाते हैं ;
(iii) स्कीम या इंतजाम के भाग रूप संपत्ति, अभिदाय या विनिधान का, चाहे उसकी पहचान की जा सकती है या नहीं, प्रबंध विनिधानकर्ताओं की ओर से किया जाता है ;
(iv) विनिधानकर्ता स्कीम या इंतजाम के प्रबंध और कार्यान्वयन में दिन-प्रतिदिन का नियंत्रण नहीं रखते हैं ।
[(2क) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार विनिर्दिष्ट की जाने वाली शर्तों का समाधान करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा बनाई गई या प्रस्थापित की गई कोई स्कीम या ठहराव ।]
(3) उपधारा (2) 1[या उपधारा (2क)] में किसी बात के होते हुए भी, कोई ऐसी स्कीम या इंतजाम-
(i) जो सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी सहकारी सोसाइटी द्वारा किया गया या ऐसी किसी सोसाइटी द्वारा जो किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त सहकारी सोसाइटियों से संबंधित किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या रजिस्टर की गई समझी गई है प्रस्थापित किया गया है ;
(ii) जिसके अधीन भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 45झ के खंड (च) में परिभाषित रूप में गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों द्वारा निक्षेप स्वीकार किए जाने हैं ;
(iii) जो ऐसी बीमा की संविदा है जिसे बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) लागू होता है ;
(iv) जो कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) के अधीन बनाई गई किसी स्कीम, पेंशन स्कीम या बीमा स्कीम का उपबंध करती है ;
(v) जिसके अधीन कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 58क के अधीन निक्षेप स्वीकार किए जाते हैं ;
(vi) जिसके अधीन कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 620क के अधीन निधि या पारस्परिक फायदा सोसाइटी के रूप में घोषित किसी कंपनी द्वारा निक्षेप स्वीकार किए जाने हैं ;
(vii) जो चिट फंड अधिनियम, 1982 (1982 का 4) की धारा 2 के खंड (घ) में परिभाषित चिट कारबार के अर्थांतर्गत आती है ;
(viii) जिसके अधीन किए गए अभिदाय, पारस्परिक निधि में अभिदान प्रकृति के हैं,
सामूहिक विनिधान स्कीम नहीं होगी ।]
1[(ix) ऐसी अन्य स्कीम या ठहराव जिसको केन्द्रीय सरकार, बोर्ड के परामर्श से अधिसूचित करे ।]
11ख. निदेश देने की शक्ति-धारा 11 में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, यदि कोई जांच करने या कराए जाने के पश्चात्, बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि-
(i) विनिधानकर्ताओं के हित में या प्रतिभूति बाजार के व्यवस्थित विकास के लिए ; या
(ii) धारा 12 में निर्दिष्ट किसी मध्यवर्ती या अन्य व्यक्तियों के ऐसे कार्यकलापों को, जो ऐसी रीति से संचालित किए जाते हैं जो विनिधानकर्ताओं अथवा प्रतिभूति बाजार के हितों के लिए हानिकर है, रोकने के लिए ; या
(iii) ऐसे किसी मध्यवर्ती या व्यक्ति का उचित प्रबंध सुनिश्चित करने के लिए,
ऐसा करना आवश्यक है तो वह-
(क) धारा 12 में निर्दिष्ट या प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को ; या
(ख) धारा 11क में विनिर्दिष्ट विषयों की बाबत किसी कम्पनी को, ऐसे निदेश दे सकेगा, जो प्रतिभूतियों में विनिधानकर्ताओं और प्रतिभूति बाजार के हित में उचित हो ।]
[स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस धारा के अधीन निदेशों को जारी करने की शक्ति में, किसी ऐसे व्यक्ति को, निदेश करने की शक्ति सम्मिलित होगी और सदैव उसका सम्मिलित होना समझा जाएगा, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के उल्लंघन में, किसी संव्यवहार या क्रियाकलाप में लगकर, ऐसे उल्लंघन से कमाए गए सदोष अभिलाभ या टाली गई हानि के समान रकम का प्रत्यर्पण करने के लिए लाभ कमाता है या हानि को टालता है ।]
[11ग. अन्वेषण-(1) जहां बोर्ड के पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि-
(क) प्रतिभूतियों में संव्यवहार ऐसी रीति में किए जा रहे हैं जो विनिधानकर्ताओं या प्रतिभूति बाजार के लिए हानिकारक हैं ; या
(ख) किसी मध्यवर्ती या प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों या बोर्ड द्वारा जारी किए गए निदेशों में से किसी का अतिक्रमण किया है,
तो वह, किसी समय, लिखित आदेश द्वारा, उक्त आदेश में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति को (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् अन्वेषक प्राधिकारी कहा गया है) ऐसे मध्यवर्ती या प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त व्यक्तियों के कार्यकलापों का अन्वेषण करने और उस पर बोर्ड को रिपोर्ट देने के लिए निदेश दे सकेगा ।
(2) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 235 से धारा 241 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कंपनी के प्रत्येक प्रबंधक, प्रबंध निदेशक, अधिकारी और अन्य कर्मचारी और धारा 12 में निर्दिष्ट प्रत्येक मध्यवर्ती या प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य होगा कि वह, यथास्थिति, कंपनी की या उससे संबंधित या मध्यवर्ती या ऐसे व्यक्ति की या उससे संबंधित सभी बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख को, जो उसकी अभिरक्षा या शक्ति में हैं, परिरक्षित रखे और अन्वेषक प्राधिकारी या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को प्रस्तुत करे ।
(3) अन्वेषक प्राधिकारी, किसी मध्यवर्ती या प्रतिभूति बाजार से किसी रीति से सहयुक्त किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसे या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को ऐसी जानकारी दे या उसके समक्ष ऐसी बहियों या रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों या अभिलेख को पेश करे जिन्हें वह आवश्यक समझे, यदि ऐसी जानकारी का दिया जाना या ऐसी बहियों या रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों अथवा अभिलेख का पेश किया जाना, उसके अन्वेषण के प्रयोजनों के लिए सुसंगत या आवश्यक है ।
(4) अन्वेषक प्राधिकारी, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन पेश की गई किन्हीं बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख को छह मास के लिए अपनी अभिरक्षा में रख सकेगा और उसके पश्चात् उन्हें ऐसे मध्यवर्ती या प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त किसी व्यक्ति को, जिसके द्वारा या जिसकी ओर से उक्त बहियां, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख पेश किए गए हैं, वापस कर देगा :
परंतु अन्वेषक प्राधिकारी, यदि उन बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख की पुनः आवश्यकता हो तो, उनमें से किसी की मांग कर सकेगा :
परंतु यह और कि यदि वह व्यक्ति, जिसकी ओर से बहियां, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख प्रस्तुत किए गए हैं, अन्वेषक प्राधिकारी के समक्ष पेश की गई बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों तथा अभिलेख की प्रमाणित प्रतियों की अपेक्षा करता है तो वह उन बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख की प्रमाणित प्रतियां ऐसे व्यक्ति को देगा जिसके द्वारा बहियां, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख पेश किए गए हैं ।
(5) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण करने का निदेश दिया गया है, किसी मध्यवर्ती या प्रतिभूति बाजार से किसी रीति से सहयुक्त किसी व्यक्ति के किसी प्रबंधक, प्रबंध निदेशक, अधिकारी तथा अन्य कर्मचारी की उसके कारबार के कार्यकलापों के संबंध में शपथ पर परीक्षा कर सकेगा तथा तद्नुसार, शपथ दिला सकेगा और उस प्रयोजन के लिए उन व्यक्तियों में से किसी से व्यक्तिगत रूप से पेश होने की अपेक्षा कर सकेगा ।
(6) यदि कोई व्यक्ति, युक्तियुक्त कारण के बिना,-
(क) किसी अन्वेषक प्राधिकारी या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को कोई बही, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख पेश करने में, जहां उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन उनको पेश करने का उसका कर्तव्य है ; या
(ख) कोई जानकारी देने में, जहां उपधारा (3) के अधीन ऐसी जानकारी देना उसका कर्तव्य है ; या
(ग) अन्वेषक प्राधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपसंजात होने में जब उपधारा (5) के अधीन ऐसा करने की उससे अपेक्षा की गई हो या ऐसे किसी प्रश्न का उत्तर देने में जो उस उपधारा के अनुसरण में अन्वेषक प्राधिकारी द्वारा उससे पूछा गया हो ; या
(घ) उपधारा (7) में निर्दिष्ट किसी परीक्षा के टिप्पणों पर हस्ताक्षर करने में,
असफल रहेगा या ऐसा करने से इंकार करेगा, तो वह, कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक करोड़ रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, और ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से भी, जो प्रथम असफलता या इंकार के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान असफलता या इंकार जारी रहता है, पांच लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(7) उपधारा (5) के अधीन किसी परीक्षा के टिप्पणों को लेखबद्ध किया जाएगा और उस व्यक्ति को, जिसकी परीक्षा की गई है, पढ़कर सुनाया जाएगा या वह उन्हें पढ़ेगा तथा उसके द्वारा उन पर हस्ताक्षर किए जाएंगे और उसके पश्चात् वे उसके विरुद्ध साक्ष्य में उपयोग में लाए जा सकेंगे ।
(8) जहां अन्वेषण के दौरान, अन्वेषक प्राधिकारी के पास यह विश्वास करने के लिए युक्तियक्त आधार है कि मध्यवर्ती या प्रतिभूति बाजार से किसी रीति से सहयुक्त किसी व्यक्ति की या उससे संबंधित बहियां, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख नष्ट, विकृत, परिवर्तित, मिथ्याकृत किए या छिपाए जा सकते हैं, वहां अन्वेषक प्राधिकारी, [मुंबई में ऐसे नामनिर्दिष्ट न्यायालय के मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए] की ऐसी बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख के अभिग्रहण के आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा ।
1[(8क) प्राधिकृत अधिकारी, किसी पुलिस अधिकारी या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या दोनों की सेवाओं की, उपधारा (8) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए उसकी सहायता करने के लिए अपेक्षा कर सकेगा और ऐसी अपेक्षा का अनुपालन करना प्रत्येक ऐसे अधिकारी का कर्तव्य होगा ।]
(9) 1[नामनिर्दिष्ट न्यायालय का मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश] आवेदन पर विचार करने और अन्वेषक प्राधिकारी को सुनने के पश्चात्, यदि आवश्यक हो तो, आदेश द्वारा अन्वेषक प्राधिकारी को-
(क) ऐसे स्थान या स्थानों में जहां ऐसी बहियां, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख रखे गए हैं, यथा अपेक्षित सहायता के साथ प्रवेश करने के लिए ;
(ख) उस स्थान या उन स्थानों की आदेश में विनिर्दिष्ट रीति से तलाशी लेने के लिए ; और
(ग) उन बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख को अभिगृहीत करने के लिए, जिन्हें वह ऐसे अन्वेषण के प्रयोजन के लिए आवश्यक समझता है,
प्राधिकृत कर सकेगा :
परंतु 1[नामनिर्दिष्ट न्यायालय का मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश] सूचीबद्ध पब्लिक कंपनी या ऐसी पब्लिक कंपनी (जो धारा 12 के अधीन विनिर्दिष्ट मध्यवर्तियां नहीं हैं) की, जो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध कराने का आशय रखती है, बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख के अभिग्रहण को तब तक प्राधिकृत नहीं करेगा जब तक कि ऐसी कंपनी अंतरंग व्यापार या बाजार छलसाधन में नहीं लगी है ।
(10) अन्वेषक प्राधिकारी, इस धारा के अधीन अभिगृहीत बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख को, ऐसी अवधि के लिए, जो अन्वेषण के पूरा होने के बाद की नहीं होगी, अपनी अभिरक्षा में रखेगा जैसा वह आवश्यक समझे तथा उसके पश्चात् उनको, कंपनी या अन्य निगमित निकाय को या, यथास्थिति, उस प्रबंध निदेशक या प्रबंधक या किसी अन्य व्यक्ति को वापस करेगा जिसकी अभिरक्षा या नियंत्रण में से वे अभिगृहीत किए गए थे, और इस प्रकार लौटाने के बारे में 1[नामनिर्दिष्ट न्यायालय कि मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश] को सूचना देगा :
परंतु अन्वेषक प्राधिकारी, यथापूर्वोक्त ऐसी बहियों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख को वापस करने से पूर्व, उन पर या उनके किसी भाग पर पहचान चिह्न लगा सकेगा ।
(11) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक तलाशी या अभिग्रहण, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में, उस संहिता के अधीन की गई तलाशियों या किए गए अभिग्रहणों से संबंधित उपबंधों के अनुसार किया जाएगा ।
11घ. बंद करने या प्रतिविरत रहने की कार्यवाहियां-यदि बोर्ड का, कोई जांच कराए जाने के पश्चात्, यह निष्कर्ष है कि किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के किन्हीं उपबंधों का अतिक्रमण किया है या उसके द्वारा अतिक्रमण किए जाने की संभावना है तो वह, ऐसे व्यक्ति से ऐसा अतिक्रमण बंद करने या कराने और उससे प्रतिविरत रहने की अपेक्षा करने वाला आदेश पारित कर सकेगा :
परंतु बोर्ड, ऐसी सूचीबद्ध पब्लिक कंपनी या (धारा 12 के अधीन विनिर्दिष्ट मध्यवर्तियों से भिन्न) पब्लिक कंपनी की बाबत, जो कि किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में अपनी प्रतिभूतियां सूचीबद्ध कराने का आशय रखती हैं, तब तक ऐसा आदेश पारित नहीं करेगा जब तक कि बोर्ड के पास यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार न हों कि ऐसी कंपनी अंतरंगी व्यापार या बाजार छलसाधन में नहीं लगी है ।]
अध्याय 5
रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र
12. स्टाक दलालों, उप-दलालों, शेयर अंतरण अभिकर्ताओं, आदि का रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई स्टाक दलाल, उप-दलाल, शेयर अंतरण अभिकर्ता, निर्गमन का बैंककार, न्यास विलेख का न्यासी, निर्गमन का रजिस्ट्रार, मर्चेंट बैंककार, निम्नांकक, पोर्टफोलियो प्रबंधक, विनिधान सलाहकार और ऐसा अन्य मध्यवर्ती, जो प्रतिभूति बाजार से सहुयक्त हो, प्रतिभूतियों का क्रय, विक्रय या उनमें व्यवहार, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए [विनियमोंट के अनुसार बोर्ड से अभिप्राप्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की शर्तों के अधीन और उनके अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं :
परंतु स्टाक दलाल, उप-दलाल, शेयर अंतरण अभिकर्ता, निर्गमन के बैंककार, न्यास विलेख के न्यासी, निर्गमन के रजिस्ट्रार मर्चेट बैंककार, निम्नांकक, पोर्टफोलियो प्रबंधक, विनिधान सलाहकार और ऐसे अन्य मध्यवर्ती के रूप में जो बोर्ड की स्थापना के ठीक पूर्व प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त हो, जिसके लिए कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसी स्थापना के पूर्व आवश्यक नहीं था, प्रतिभूतियों का क्रय या विक्रय करने वाला या प्रतिभूति बाजार से अन्यथा व्यवहार करने वाला कोई व्यक्ति, ऐसी स्थापना से तीन मास की अवधि तक अथवा, यदि उसने तीन मास की उक्त अवधि के भीतर ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन किया है तो ऐसे आवेदन के निपटाए जाने तक, ऐसा करता रह सकेगा :
[परन्तु यह और कि प्रतिभूति विधि (संशोधन) अधिनियम, 1995 के प्रारंभ के ठीक पूर्व अभिप्राप्त किसी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए उपबंधित विनियमों के अनुसार बोर्ड से अभिप्राप्त किया गया है ।]
2[(1क) कोई [निक्षेपागार, सहभागी] प्रतिभूतियों का अभिरक्षक, विदेशी संस्थागत विनिधानकर्ता, प्रत्ययमापी अभिकरण या प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त कोई अन्य मध्यवर्ती, जिसे बोर्ड, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, प्रतिभूतियों का क्रय या विक्रय या उनमें व्यवहार, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार बोर्ड से अभिप्राप्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की शर्तों के अधीन और उनके अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं :
परन्तु कोई व्यक्ति जो, प्रतिभूति विधि (संशोधन), अधिनियम, 1995 के प्रारंभ के ठीक पूर्व 3[निक्षेपागार, सहभागी] प्रतिभूतियों के अभिरक्षक, विदेशी संस्थागत विनिधानकर्ता या प्रत्ययमापी अभिकरण के रूप में प्रतिभूतियों का क्रय या विक्रय कर रहा है या प्रतिभूति बाजार में अन्यथा व्यवहार कर रहा है जिसके लिए ऐसे प्रारंभ के पूर्व कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अपेक्षित नहीं था, उस समय तक प्रतिभूतियों का क्रय या विक्रय करता रहेगा या प्रतिभूति बाजार में व्यवहार करता रहेगा जब तक कि धारा 30 की उपधारा (2) के खंड (घ) के अधीन विनियम नहीं बनाए जाते ।
(1ख) कोई व्यक्ति, जब तक कि वह विनियमों के अनुसार बोर्ड से रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त नहीं कर लेता है तब तक, किन्हीं साहसिक पूंजी निधियों या सामूहिक विनिधान स्कीम को, जिसके अन्तर्गत पारस्परिक निधियां हैं, प्रायोजित नहीं करेगा या प्रायोजित नहीं करने देगा अथवा नहीं चलाएगा या चलाने देगा :
परन्तु कोई व्यक्ति, जो प्रतिभूति विधि (संशोधन) अधिनियम, 1995 के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रतिभूति बाजार में प्रवर्तनशील किन्हीं साहसिक पूंजी निधियों पर सामूहिक विनिधान स्कीम को प्रायोजित कर रहा है या प्रायोजित करा रहा है अथवा चला रहा है, चालने दे रहा है, जिसके लिए ऐसे प्रारंभ के पूर्व कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अपेक्षित नहीं था, उस समय तक उसका प्रवर्तन करता रहेगा जब तक कि धारा 30 की उपधारा (2) के खंड (घ) के अधीन विनियम नहीं बनाए जाते ।]
[स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी सामूहिक विनिधान स्कीम या पारस्परिक निधि में ऐसी कोई यूनिटबद्ध बीमा पालिसी या स्क्रिप या ऐसी कोई लिखत या यूनिट, चाहे जिस नाम से ज्ञात हो, सम्मिलित नहीं होगी, जिसमें किसी बीमाकर्ता द्वारा जारी किए गए बीमा के घटक के अतिरिक्त विनिधान के किसी घटक का उपबंध है ।]
(2) रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन ऐसी रीति से और ऐसी फीस के संदाय पर किया जाएगा जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए ।
(3) बोर्ड, आदेश द्वारा, ऐसी रीति से जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को निलंबित कर सकेगा या रद्द कर सकेगा :
परंतु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
[अध्याय 5क
छल साधनयुक्त और प्रवंचक युक्तियों, अंतरंगी व्यापार और प्रतिभूतियों के सारवान् अर्जन या नियंत्रण का प्रतिषेध
12क. छल साधनयुक्त और प्रवंचक युक्तियों, अंतरंगी व्यापार और प्रतिभूतियों के सारवान् अर्जन का प्रतिषेध या नियंत्रण-कोई व्यक्ति, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः-
(क) किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में किन्हीं सूचीबद्ध या सूचीबद्ध किए जाने के लिए प्रस्तावित प्रतिभूतियों के पुरोधरण, क्रय या विक्रय के संबंध में, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों के उल्लंघन में किसी छल साधनयुक्त या प्रवंचक युक्ति, या प्रयुक्ति का उपयोग या प्रयोग नहीं करेगा ;
(ख) ऐसी प्रतिभूतियों के, जो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं या जिनको सूचीबद्ध किए जाने का प्रस्ताव है, पुरोधरण या व्यवहार के संबंध में कपट-वंचित करने के लिए किसी युक्ति, स्कीम या चालाकी का प्रयोग नहीं करेगा ;
(ग) ऐसी प्रतिभूतियों के, जो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं या जिनको सूचीबद्ध किए जाने का प्रस्ताव है, पुरोधरण या व्यवहार के संबंध में इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों के उल्लंघन में ऐसे किसी कार्य, व्यवहार या कारबार के अनुक्रम में नहीं लगेगा, जो किसी व्यक्ति पर कपट या प्रवंचना के रूप में प्रवर्तित होता है या होगा ;
(घ) अंतरंगी व्यापार में नहीं लगेगा ;
(ङ) जब सारवान् या असार्वजनिक जानकारी उसके पास हो, तब प्रतिभूतियों में व्यवहार नहीं करेगा या किसी अन्य व्यक्ति को इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों के उल्लंघन में किसी भी रीति से, ऐसी सारवान् या असार्वजनिक जानकारी संसूचित नहीं करेगा ;
(च) किसी ऐसी कंपनी का नियंत्रण या ऐसी कंपनी की, जिसकी प्रतिभूतियां किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं या सूचीबद्ध किए जाने के लिए प्रस्तावित हैं, साधारण शेयर पूंजी के उस प्रतिशत से अधिक प्रतिभूतियों का इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के उल्लंघन में अर्जन नहीं करेगा ।]
अध्याय 6
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
13. केंद्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केंद्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, बोर्ड को ऐसी धनराशियों का अनुदान दे सकेगी जो वह सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए ठीक समझे ।
14. निधि-(1) एक निधि का गठन किया जाएगा जिसका नाम भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड साधारण निधि होगा और उसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे, अर्थात् :-
(क) इस अधिनियम के अधीन बोर्ड द्वारा प्राप्त सभी अनुदान, फीस और प्रभार ; । । ।
। । । । । ।
(ख) ऐसे अन्य स्रोतों से, जो केंद्रीय सरकार द्वारा विनिश्चित किए जाएं, बोर्ड द्वारा प्राप्त सभी राशियां ।
(2) निधि का उपयोजन निम्नलिखित की पूर्ति के लिए किया जाएगा, अर्थात् :-
(क) बोर्ड के सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य पारिश्रमिक ;
(ख) धारा 11 के अधीन बोर्ड के कृत्यों का निर्वहन करने में बोर्ड के व्यय ;
(ग) इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए व्यय ।
15. लेखा और संपरीक्षा-(1) बोर्ड, उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा तथा लेखाओं का एक वार्षिक विवरण ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केंद्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके, विहित करे ।
(2) बोर्ड के लेखाओं की संपरीक्षा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय बोर्ड द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के, और बोर्ड के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के, उस संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के, साधारणतया, सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में हैं और उसे, विशिष्टतया, बहियों, लेखाओं से संबंधित वाऊचरों, अन्य दस्तावेजों और कागजपत्रों के पेश किए जाने की मांग करने और बोर्ड के किसी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित बोर्ड के लेखे, तद्विषयक संपरीक्षा रिपोर्ट सहित केंद्रीय सरकार को प्रत्येक वर्ष भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएंगी ।
[अध्याय 6क
शास्तियां और न्यायनिर्णयन
15क. जानकारी, विवरणी आदि देने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति जिससे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के अधीन,-
(क) बोर्ड को कोई दस्तावेज, विवरणी या रिपोर्ट देने की अपेक्षा की जाती है उसे देने में असफल रहेगा तो वह [ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(ख) विनियमों में उसके लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर कोई विवरणी फाइल करने या कोई जानकारी, बहियां या अन्य दस्तावेज देने की अपेक्षा की जाती है, विनियमों में उसके लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर विवरणी फाइल करने या उसे देने में असफल रहेगा तो वह 2[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(ग) लेखाबहियों या अभिलेखों के अभिरक्ष की अपेक्षा की जाती है, उसके अभिरक्षण में असफल रहेगा तो वह 2[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ।
15ख. किसी व्यक्ति द्वारा मुवक्किलों के साथ करार करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जो मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकृत है और जिसमें इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के अधीन अपने मुवक्किल के साथ करार करने के लिए अपेक्षा की जाती है, ऐसा करार करने में असफल रहेगा, तो वह 2[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ।
[15ग. विनिधानकर्ताओं की शिकायतों को दूर करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई सूचीबद्ध कंपनी, या कोई ऐसा व्यक्ति जो मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, विनिधानकर्ताओं की शिकायतों को दूर करने के लिए बोर्ड द्वारा लिखित रूप में मांग किए जाने के पश्चात्, बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर ऐसी शिकायतों को दूर करने में असफल रहेगा तो ऐसी कंपनी या मध्यवर्ती, 2[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ।]
15घ. पारस्परिक निधियों की दशा में कतिपय व्यतिक्रमों के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति,-
(क) जिससे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के अधीन किसी सामूहिक विनिधान स्कीम को जिसके अन्तर्गत पारस्परिक निधियां हैं, प्रायोजित करने या चलाने के लिए बोर्ड से रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है, ऐसा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किए बिना, किसी सामूहिक विनिधान स्कीम को जिसके अन्तर्गत पारस्परिक निधियां हैं, प्रायोजित करेगा या चलाएगा तो वह 2[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान वह ऐसी किसी सामूहिक विनिधान स्कीम को, जिसके अंतर्गत पारस्परिक निधियां हैं, प्रायोजित करता है या चलाता है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(ख) जो किसी विनिधान स्कीम को प्रायोजित करने या चलाने के लिए सामूहिक विनिधान स्कीम के रूप में, जिसके अन्तर्गत पारस्परिक निधियां हैं, बोर्ड द्वारा रजिस्ट्रीकृत हैं, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के निबंधनों और शर्तों का अनुपालन करने में असफल रहेगा तो वह [ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(ग) जो सामूहिक विनिधान स्कीम के रूप में, जिसके अन्तर्गत पारस्परिक निधियां हैं, बोर्ड द्वारा रजिस्ट्रीकृत है, अपनी स्कीमों को सूचीबद्ध करने के लिए, जैसी ऐसी सूचीकरण को विनियमित करने वाले विनियमों में उपबंधित हैं, आवेदन करने में असफल रहेगा तो वह 1[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो, ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(घ) जो सामूहिक विनिधान स्कीम के रूप में जिसके अन्तर्गत, पारस्परिक निधियां हैं, रजिस्ट्रीकृत हैं, किसी स्कीम के यूनिट प्रमाणपत्रों को ऐसी रीति से, जो ऐसे प्रेषण को विनियमित करने वाले विनियमों में उपबंधित है, प्रेषित करने में असफल रहेगा तो वह 1[ ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(ङ) जो सामूहिक विनिधान स्कीम के रूप में, जिसके अन्तर्गत पारस्परिक निधियां भी हैं, रजिस्ट्रीकृत हैं, विनिधानकर्ताओं द्वारा संदत्त आवेदन धन को विनियमों में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर वापस करने में असफल रहेगा तो वह 1[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(च) जो सामूहिक विनिधान स्कीम के रूप में जिसके अन्तर्गत पारस्परिक निधियां हैं, रजिस्ट्रीकृत हैं, ऐसी सामूहिक विनिधान स्कीमों द्वारा संगृहीत धन का, विनियमों में विनिर्दिष्ट रीति से और अवधि के भीतर विनिधान करने में असफल रहेगा तो वह 1[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ।
15ङ. किसी आस्ति प्रबंध कंपनी द्वारा नियमों और विनियमों का पालन करने में असफलता के लिए शास्ति-जहां इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत पारस्परिक निधि की कोई आस्ति प्रबंध कम्पनी, किसी ऐसे विनियम का जिसमें आस्ति प्रबंध कम्पनी के क्रियाकलापों पर निबंधन के लिए उपबंध किया गया है, अनुपालन करने में असफल रहेगा वहां ऐसी आस्ति प्रबंध कम्पनी [ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ।
15च. स्टाक दलाल की दशा में व्यतिक्रम के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन स्टाक दलाल के रूप में रजिस्ट्रीकृत है,-
(क) उस प्ररूप में और उस रीति से जो उस स्टाक एक्सचेंज द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए जिसका वह सदस्य है, संविदा नोट जारी करने में असफल रहेगा तो वह 2[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो उस रकम तक की हो सकेगी,] जिसके लिए उक्त दलाल द्वारा संविदा नोट जारी किया जाना अपेक्षित था, दायी होगा ;
(ख) किसी प्रतिभूति का परिदान करने में असफल रहेगा अथवा विनिधानकर्ता को शोध्य रकम का विनियमों में विनिर्दिष्ट रीति से या अवधि के भीतर संदाय करने में असफल रहेगा वहां वह 2[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान वह ऐसी किसी सामूहिक विनिधान स्कीम को, जिसके अंतर्गत पारस्परिक निधियां हैं, प्रायोजित करता है या चलाता है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ;
(ग) दलाली की ऐसी रकम प्रभारित करेगा जो विनियमों में विनिर्दिष्ट दलाली से अधिक है वहां वह [शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो विनिर्दिष्ट दलाली के अधिक्य में प्रभारित दलाली की रकम के पांच गुने तक की हो सकेगी,] इनमें से जो भी अधिक हो, दायी होगा ।
15छ. अंतरंगी व्यापार के लिए शास्ति-यदि कोई अंतरंगी व्यक्ति,-
(i) अपनी ओर से या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से, किसी अप्रकाशित कीमत संवेदनशील सूचना के आधार पर किसी स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किसी निगमित निकाय की प्रतिभूतियों में व्यवहार करेगा ; या
(ii) कारबार के मामूली अनुक्रम में या किसी विधि के अधीन जैसा अपेक्षित है उसके सिवाय, किसी व्यक्ति को, ऐसी सूचना के लिए उसके अनुरोध पर या उसके बिना, कोई अप्रकाशित कीमत संवेदनशील सूचना, संसूचित करेगा ; या
(iii) अप्रकाशित कीमत संवेदनशील सूचना के आधार पर किसी निगमित निकाय की किसी प्रतिभूति में किसी अन्य व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए परमार्श देगा या उसे उपाप्त करेगा,
तो वह ऐसी शास्ति का, जो [दस लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो पच्चीस करोड़ रुपए तक की हो सकेगी या ऐसी असफलता से प्राप्त लाभ की रकम का तीन गुना हो सकेगी, इनमें से जो अधिक हो,] दायी होगा ।
15ज. शेयरों के अर्जन और अधिग्रहण को प्रकट न करने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के अधीन या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों की अपेक्षानुसार,-
(i) किसी निगमित निकाय के किन्हीं शेयरों का अर्जन करने के पूर्व उस निगमित निकाय में के अपने कुल शेयरों को प्रकट करने में, या
(ii) न्यूनतम कीमत पर शेयरों का अर्जन करने की सार्वजनिक घोषणा करने में,
[(iii) संबंधित कंपनी के शेयर धारकों को प्रस्थापना पत्र भेजकर सार्वजनिक प्रस्थापना करने में, या
(iv) उन शेयरधारकों को, जिन्होंने प्रस्थापना पत्र के अनुसरण में अपने शेयर बेचे हैं, प्रतिफल का संदाय करने में,]
असफल रहेगा तो वह ऐसी शास्ति का, जो 1[दस लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो पच्चीस करोड़ रुपए तक की हो सकेगी या ऐसी प्रथाओं से प्राप्त लाभ की रकम के तीन गुना हो सकेगी, इनमें से जो अधिक हो,] दायी होगा ।
[15जक. कपटपूर्ण और अनुचित व्यापार प्रथा के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, प्रतिभूतियों के संबंध में कपटपूर्ण और अनुचित व्यापार प्रथाओं में संलिप्त होगा तो वह ऐसी शास्ति का, जो 1[पांच लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो पच्चीस करोड़ रुपए तक की हो सकेगी या ऐसी प्रथाओं से प्राप्त लाभ की रकम के तीन गुना हो सकेगी, इनमें से जो अधिक हो,] दायी होगा ।
15जख. ऐसे उल्लंघन के लिए शास्ति जहां किसी पृथक् शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है-जो कोई, इस अधिनियम, उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनिमयों के किसी उपबंध या बोर्ड द्वारा जारी किए गए निदेशों का पालन करने में असफल रहेगा जिसके लिए किसी पृथक् शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है, तो वह 1[ऐसी शास्ति का, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो एक करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा] ।
15झ. न्यायनिर्णयन करने की शक्ति-(1) धारा 15क, धारा 15ख, धारा 15ग, धारा 15घ, धारा 15ङ, धारा 15च, धारा 15छ [, धारा 15ज, धारा 15 जक और 15जख] के अधीन न्यायनिर्णयन करने के प्रयोजन के लिए कोई बोर्ड शास्ति अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, विहित रीति से जांच करने के लिए प्रभाग प्रमुख से अनिम्न पंक्ति के किसी अधिकारी को न्यायानिर्णायक अधिकारी नियुक्त करेगा ।
(2) न्यायनिर्णायक अधिकारी को, कोई जांच करते समय, ऐसे व्यक्ति को, जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित है, साक्ष्य देने या कोई ऐसी दस्तावेज पेश करने के लिए, जो न्यायनिर्णायक अधिकारी की राय में, जांच की विषयवस्तु के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत हो सकती है, समन करने और उसे हाजिर कराने की शक्ति होगी और यदि, ऐसी जांच करने पर, उसका यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट धाराओं में से किसी के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहा है तो वह उन धाराओं में से किसी के उपबंधों के अनुसार ऐसी शास्ति अधिरोपित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
1[(3) बोर्ड, इस धारा के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के अभिलेख को मंगा सकेगा और उनकी परीक्षा कर सकेगा तथा यदि उसका यह विचार है कि न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित आदेश उस विस्तार तक गलत है, जहां तक यह प्रतिभूति बाजार के हितों में नहीं है तो वह ऐसी जांच करने या करवाने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, यदि मामले की परिस्थितियां उसको न्यायोचित ठहराती हैं, शास्ति की मात्रा में वृद्धि करते हुए, आदेश पारित कर सकेगा :
परन्तु ऐसा आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक संबद्ध व्यक्ति को मामले में सुने जाने का अवसर प्रदान नहीं किया जाता है :
परन्तु यह और कि इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात, न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित आदेश की तारीख से तीन मास की अवधि के अवसान या धारा 15न के अधीन अपील के निपटान के पश्चात्, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, लागू नहीं होगी ।]
15ञ. न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा ध्यान में रखी जाने वाली बातें-न्यायनिर्णायक अधिकारी, धारा 15झ के अधीन शास्ति की मात्रा का न्यायनिर्णयन करते समय, निम्नलिखित बातों का सम्यक् ध्यान रखेगा, अर्थात् :-
(क) व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप हुए अननुपाती अभिलाभ या अनुचित फायदे की रकम, जहां कहीं अनुमान लगाया जा सकता हो ;
(ख) व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप किसी विनिधानकर्ता या विनिधानकर्ताओं के समूह को कारित हानि की रकम ;
(ग) व्यतिक्रम की आवृतीय प्रकृति ।
[15ञक. शास्तियों के रूप में वसूल की गई धनराशि का भारत की संचित निधि में जमा किया जाना-इस अधिनियम के अधीन शास्तियों के रूप में वसूल की गई सभी धनराशि भारत की संचित निधि में जमा की जाएगी ।
15ञख. प्रशासनिक और सिविल कार्यवाहियों का निपटारा-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध कोई कार्यवाही धारा 11, धारा 11ख, धारा 11घ, धारा 12 की उपधारा (3) या धारा 15झ के अधीन आरंभ की गई है या आरंभ की जा सकेगी, अभिकथित व्यतिक्रमों के लिए आरंभ की गई या आरंभ की जाने वाली कार्यवाहियों के निपटारे का प्रस्ताव करने के लिए बोर्ड को लिखित में आवेदन फाइल कर सकेगा ।
(2) बोर्ड, व्यतिक्रमों की प्रकृति, गंभीरता और समाघात पर विचार करने के पश्चात्, व्यतिक्रमी द्वारा ऐसी राशि के संदाय पर या ऐसे अन्य निबंधनों पर, जो बोर्ड द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार अवधारित किए जाएं, निपटारे के लिए प्रस्ताव से सहमत हो सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन निपटारा कार्यवाहियों को, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार संचालित किया जाएगा ।
(4) इस धारा के अधीन, यथास्थिति, बोर्ड या न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश के विरुद्ध धारा 15न के अधीन कोई अपील नहीं होगी ।]
अध्याय 6ख
अपील अधिकरण की स्थापना, अधिकारिता, प्राधिकार और प्रक्रिया
15ट. प्रतिभूति अपील अधिकरण की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक अपील अधिकरणों की, जिसका नाम प्रतिभूति अपील अधिकरण होगा, स्थापना करेगी, जो इस अधिनियम [या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि] द्वारा या इसके अधीन ऐसे अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिसूचना में ऐसे विषयों और स्थानों को भी विनिर्दिष्ट करेगी जिनके संबंध में प्रतिभूति अपील अधिकरण अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगा ।
[15ठ. प्रतिभूति अपील अधिकरण की, संरचना-प्रतिभूति अपील अधिकरण में एक पीठासीन अधिकारी और दो अन्य सदस्य होंगे, जिन्हें केंद्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, नियुक्त किया जाएगा :
परंतु भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ के पूर्व स्थापित केवल एक व्यक्ति वाला प्रतिभूति अपील अधिकरण, इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन उसे प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उस समय तक करता रहेगा जब तक कि इस धारा के अधीन दो अन्य सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो जाती ।
15ड. प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी या सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं- [(1) कोई व्यक्ति प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब-
(क) वह उच्चतम न्यायालय का कोई आसीन या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा किसी उच्च न्यायालय का कोई आसीन या सेवानिवृत्त मुख्य न्यायमूर्ति है ; या
(ख) वह किसी उच्च न्यायालय का ऐसा कोई आसीन या सेवानिवृत्त न्यायाधीश है, जिसने किसी उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कम से कम सात वर्ष की सेवा पूरी की हुई है ।
(1क) प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति या उसके नामनिर्देशिती के परामर्श से की जाएगी ।]
(2) कोई भी व्यक्ति प्रतिभूति अपील अधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह योग्य, ईमानदार और प्रतिष्ठित ऐसा व्यक्ति न हो, जिसने प्रतिभूति बाजार से संबंधित समस्याओं से निपटने में अपनी क्षमता साबित की हो और उसके पास कारपोरेट विधि, प्रतिभूति विधि, वित्त, अर्थशास्त्र या लेखाकर्म या अर्हता और अनुभव हो :
परन्तु बोर्ड के सदस्य या बोर्ड में कार्यपालक निदेशक के समतुल्य ज्येष्ठ प्रबंध स्तर का पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति, प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी या सदस्य के पद पर बोर्ड में अपनी ऐसी सेवा या पदावधि के दौरान या बोर्ड में इस प्रकार के पद पर न रह जाने की तारीख से दो वर्ष के भीतर नियुक्त नहीं किया जाएगा ।]
[15ढ. प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी और सदस्यों की पदावधि-प्रतिभूति अपील अधिकरण का पीठासीन अधिकारी और प्रत्येक अन्य सदस्य, पद धारण करने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा और पुनः नियुक्ति का पात्र होगा :
परंतु कोई भी व्यक्ति, अड़सठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी का पद धारण नहीं करेगा :
परंतु यह और कि कोई भी व्यक्ति, बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् प्रतिभूति अपील अधिकरण के सदस्य का पद धारण नहीं करेगा ।]
15ण. [पीठासीन अधिकारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें-प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी और अन्य सदस्य] को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे हैं, ऐसी होंगी जो विहित की जाएं :
परन्तु उक्त 2[प्रतिभूति अपील अधिकरण का पीठासीन अधिकारी और अन्य सदस्यों] के वेतन और भत्तों में और उसकी सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
15त. रिक्तियों का भरा जाना-यदि प्रतिभूति अपील अधिकरण के [पीठासीन अधिकारी या किसी अन्य सदस्य के पद] में अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न किसी कारण से कोई रिक्ति हो जाती है तो केन्द्रीय सरकार, किसी अन्य व्यक्ति को उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार नियुक्त करेगी और कार्यवाहियां उस प्रक्रम से जब रिक्ति भरी जाती हैं, प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष चालू रखी जा सकेगी ।
15थ. पदत्याग और हटाया जाना-(1) [प्रतिभूति अपील अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या कोई अन्य सदस्य], केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा :
परन्तु 4[पीठासीन अधिकारी या किसी अन्य सदस्य], जब तक कि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा पहले ही पद त्याग करने की अनुज्ञा नहीं दे दी जाती है, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक ऐसी सूचना के प्राप्त होने की तारीख से तीन मास समाप्त नहीं हो जाते हैं अथवा जब तक उसके उत्तराधिकारी के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है अथवा जब तक उसकी पदावधि समाप्त नहीं हो जाती है, इनमें से जो भी पूर्वतर हो ।
(2) किसी प्रतिभूति अपील अधिकरण के 4[पीठासीन अधिकारी या किसी अन्य सदस्य] को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर, उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा ऐसी जांच किए जाने के पश्चात्, जिसमें ऐसे 4[पीठासीन अधिकारी या किसी अन्य सदस्य] को उसके विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गई है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का उचित अवसर दे दिया गया है, केन्द्रीय सरकार ने आदेश नहीं दे दिया है ।
(3) केन्द्रीय सरकार, 4[पीठासीन अधिकारी या किसी अन्य सदस्य] के कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण करने की प्रक्रिया का, नियमों द्वारा, विनियमन कर सकेगी ।
15द. अपील अधिकरण गठित करने वाले आदेशों का अंतिम होना और उनसे कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-प्रतिभूति अपील अधिकरण के [पीठासीन अधिकारी या सदस्य] के रूप में किसी व्यक्ति को नियुक्त करने वाला केन्द्रीय सरकार का कोई आदेश, किसी रीति से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा और प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष कोई कार्य या कार्यवाही, किसी रीति से केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि प्रतिभूति अपील अधिकरण के गठन में कोई त्रुटि है ।
15ध. प्रतिभूति अपील अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, प्रतिभूति अपील अधिकरण के लिए ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों की व्यवस्था करेगी, जो वह सरकार ठीक समझे ।
(2) प्रतिभूति अपील अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी, पीठासीन अधिकारी के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।
(3) प्रतिभूति अपील अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।
15न. प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील- [(1) उपधारा (2) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई व्यक्ति जो-
(क) प्रतिभूति विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1999 के प्रारम्भ को और उसके पश्चात् इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन किए गए बोर्ड के किसी आदेश से ; या
(ख) इस अधिनियम के अधीन किसी न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा किए गए किसी आदेश से,
व्यथित है, उस विषय पर अधिकारिता रखने वाले प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।]
। । । । । । ।
(3) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील, उस तारीख से जिसको 1[यथास्थिति, बोर्ड या न्यायनिर्णायक अधिकारी] द्वारा किए गए आदेश की प्रति उसे प्राप्त होती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए :
परन्तु प्रतिभूति अपील अधिकरण पैंतालीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् कोई अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर उसे फाइल न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
(4) उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, प्रतिभूति अपील अधिकरण, अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उस पर उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करने वाला, उसे उपांतरित करने वाला या उसे अपास्त करने वाला ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(5) प्रतिभूति अपील अधिकरण, अपने द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की प्रति, 1[बोर्ड, अपील के पक्षकारों] को तथा संबंधित न्यायनिर्णायक अधिकारी को भेजेगा ।
(6) प्रतिभूति अपील अधिकरण द्वारा अपने समक्ष उपधारा (1) के अधीन फाइल की गई अपील पर यथासंभव शीघ्रता से कार्यवाही की जाएगी और वह ऐसी अपील का, ऐसी अपील की प्राप्ति की तारीख से छह मास के भीतर, निपटारा करने का प्रयास करेगा ।
15प. प्रतिभूति अपील अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) प्रतिभूति अपील अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908(1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा, किन्तु वह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करेगा तथा इस अधिनियम के और किन्हीं नियमों के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपनी प्रक्रिया का विनियमन करने की शक्तियां होंगी, जिनके अंतर्गत उन स्थानों को नियत करना है, जहां पर वह अपनी बैठकें कर सकेगा ।
(2) प्रतिभूति अपील अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908(1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना ;
(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना ;
(घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ;
(ङ) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना ;
(च) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना ;
(छ) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करने के किसी आदेश को या अपने द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना ;
(ज) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।
(3) प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में तथा धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और प्रतिभूति अपील अधिकरण, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
[15फ. विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार-अपीलार्थी, प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या एक या अधिक चार्टर्ड अकाउन्टेंट या कंपनी सचिव या लागत लेखापाल या विधि व्यवसायी या अपने अधिकारियों में से किसी को प्राधिकृत कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) चार्टर्ड अकाउन्टेंट" से चार्टर्ड अकाउन्टेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथापरिभाषित ऐसा चार्टर्ड अकाउन्टेंट अभिप्रेत है, जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है ;
(ख) कंपनी सचिव" से कंपनी सचिव अधिनियम, 1980 (1980 का 56) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ग) में यथापरिभाषित ऐसा कंपनी सचिव अभिप्रेत है, जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है ;
(ग) लागत लेखापाल" से लागत और संकर्म लेखापाल अधिनियम, 1959 (1959 का 23) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथापरिभाषित ऐसा कोई लागत लेखापाल अभिप्रेत है, जिसने उस अधिनियम की धारा 6 के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है ;
(घ) विधि व्यवसायी" से कोई अधिवक्ता, वकील या उच्च न्यायालय का कोई अटर्नी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत व्यवसायरत कोई प्लीडर भी है ।]
15ब. परिसीमा-परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपबन्ध, प्रतिभूति अपील अधिकरण को की गई अपील को, जहां तक हो सके, लागू होंगे ।
[15भ. प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी, सदस्यों और कर्मचारिवृंद का लोक सेवक होना-प्रतिभूति अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी, सदस्य और अन्य अधिकारी और कर्मचारी, भारतीय दंड सहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।]
15म. सिविल न्यायालय की अधिकारिता का न होना-किसी सिविल न्यायालय को, किसी ऐसे विषय के संबंध में जिसका अवधारण करने के लिए इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किसी न्यायनिर्णायक अधिकारी या इस अधिनियम के अधीन गठित किसी प्रतिभूति अपील अधिकरण को इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन सशक्त किया गया है, कोई वाद या कार्यवाही ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी और किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकरण द्वारा, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत कोई व्यादेश, नहीं दिया जाएगा ।
2[15य. उच्चतम न्यायालय को अपील-प्रतिभूति अपील अधिकरण के किसी भी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई भी व्यक्ति, ऐसे आदेश से उद्भूत विधि के किसी प्रश्न पर, उसको प्रतिभूति अपील अधिकरण के विनिश्चय या आदेश की संसूचना की तारीख से साठ दिन के भीतर, उच्चतम न्यायालय को अपील कर सकेगा :
परन्तु उच्चतम न्यायालय, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि आवेदक उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारणों से निवारित किया गया था तो वह उसे साठ दिन से अनधिक की अतिरिक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।] ]
अध्याय 7
प्रकीर्ण
16. निदेश देने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-(1) [इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर या निक्षेपागार अधिनियम,1996 पर] प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग या अपने कृत्यों के पालन में, नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जो केन्द्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित रूप में दे :
परंतु जहां तक साध्य हो, इस उपधारा के अधीन कोई निदेश दिए जाने से पूर्व बोर्ड को अपने विचार अभिव्यक्त करने का अवसर दिया जाएगा ।
(2) इस बात पर कि कोई प्रश्न नीति का है या नहीं, केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
17. बोर्ड का अधिक्रमण करने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि किसी समय केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि-
(क) गंभीर आपात के कारण, बोर्ड इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन करने में असमर्थ है ; या
(ख) बोर्ड ने इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए किसी निदेश के अनुपालन में अथवा इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में बार-बार व्यतिक्रम किया है और ऐसे व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप बोर्ड की वित्तीय स्थिति में या बोर्ड के प्रशासन में गिरावट आई है ; या
(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण लोकहित में ऐसा करना आवश्यक हो गया है,
तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, बोर्ड का, छह मास से अनधिक ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, अधिक्रमण कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन बोर्ड का अधिक्रमण करने वाली किसी अधिसूचना के प्रकाशन पर,-
(क) सभी सदस्य, अधिकमण की तारीख से, उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे ;
(ख) ऐसी सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का प्रयोग और निर्वहन, जिनका इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्रयोग या निर्वहन बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकता है, जब तक उपधारा (3) के अधीन बोर्ड का पुनर्गठन नहीं किया जाता है, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा, जिन्हें केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट करे ; और
(ग) बोर्ड के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन सभी संपत्ति, जब तक उपधारा (3) के अधीन बोर्ड का पुनर्गठन नहीं किया जाता है, केन्द्रीय सरकार में निहित होगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति पर, केंद्रीय सरकार, नई नियुक्ति द्वारा बोर्ड का पुनर्गठन कर सकेगी और ऐसी दशा में ऐसा व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति जिन्होंने उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन अपना पद रिक्त किया है, नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझे जाएंगे:
परंतु केन्द्रीय सरकार, अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति के पूर्व किसी समय, इस उपधारा के अधीन कार्रवाई कर सकेगी ।
(4) केंद्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना तथा इस धारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई और उन परिस्थितियों की जिनके कारण ऐसी कार्रवाई की गई है, पूरी रिपोर्ट यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
18. विवरणियां और रिपोर्टें-(1) बोर्ड, केन्द्रीय सरकार को ऐसे समय पर और ऐसे प्ररूप में, तथा ऐसी रीति से, जो विहित की जाए या जो केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट करे, ऐसी विवरणियां और विवरण तथा प्रतिभूति बाजार के संवर्धन और विकास के लिए किसी प्रस्थापित या विद्यमान कार्यक्रम के संबंध में ऐसी विशिष्टियां देगा जिनकी केंद्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड, प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् [नब्बे दिन] के भीतर, केन्द्रीय सरकार को ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, ऐसी रिपोर्ट देगा जिसमें पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों, नीति और कार्यक्रमों का सही और पूरा विवरण दिया जाएगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन प्राप्त रिपोर्ट की प्रति, प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
19. प्रत्यायोजन-बोर्ड, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा, बोर्ड के किसी सदस्य, अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को, ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों का (धारा 29 के अधीन शक्तियों को छोड़कर) जो वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजन कर सकेगा ।
20. अपीलें-(1) इस अधिनियम के अधीन [प्रतिभूति विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1999 के पूर्व, बोर्ड द्वारा किए गए किसी आदेश से] या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या विनियम से व्यथित कोई व्यक्ति, केंद्रीय सरकार को कोई अपील ऐसे समय के भीतर कर सकेगा जो विहित की जाए ।
(2) कोई अपील ग्रहण नहीं की जाएगी यदि वह उसके लिए विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् की जाती है :
परंतु कोई अपील उसके लिए विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण की जा सकेगी यदि अपीलार्थी, केंद्रीय सरकार का यह समाधान कर देता है कि उसके पास विहित अवधि के भीतर अपील न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
(3) इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप में की जाएगी और उसके साथ उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, एक प्रति और ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए ।
(4) किसी अपील को निपटाने की प्रक्रिया ऐसी होगी जो विहित की जाए :
परंतु किसी अपील को निपटाने के पूर्व अपीलार्थी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।
[20क. अधिकारिता का वर्जन-इस अधिनियम के अधीन [बोर्ड या न्यायनिर्णायक अधिकारी] द्वारा पारित कोई आदेश, 2[धारा 15न या धारा 20] में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय अपीलीय नहीं होगा और किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे विषय की बाबत अधिकारिता नहीं होगी जिसको 2[बोर्ड या न्यायनिर्णायक अधिकारी], इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन कोई आदेश पारित करने के लिए सशक्त है और इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन 2[बोर्ड या न्यायनिर्णायक अधिकारी] द्वारा पारित किसी आदेश के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्यवाही की बाबत कोई आदेश किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा नहीं दिया जाएगा ।]
21. व्यावृत्तियां-इस अधिनियम की किसी बात से, किसी भी व्यक्ति को, किसी ऐसे वाद या अन्य कार्यवाहियों से छूट प्राप्त नहीं होगी जो, इस अधिनियम के अलावा, उसके विरुद्ध की जा सकती हों ।
22. बोर्ड के सदस्यों, अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-बोर्ड के सभी सदस्य, अधिकारी और अन्य कर्मचारी जब वे इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या जब उनका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित हो, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
23. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार के [या बोर्ड के] अथवा केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी के अथवा बोर्ड के किसी सदस्य, अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।
[24. अपराध-(1) इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा शास्ति के किसी अधिनिर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उल्लंघन का दुष्प्रेरण करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि [दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से,] दंडनीय होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहेगा अथवा उसके किन्हीं निदेशों या आदेशों का पालन करने में असफल रहेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक मास से कम की नहीं होगी किन्तु 5[दस वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से,] दण्डनीय होगा ।]
[24क. कतिपय अपराधों का शमन-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, जो केवल कारावास से या कारावास और जुर्माने से भी दंडनीय अपराध नहीं है, किसी कार्यवाही के संस्थित किए जाने के पूर्व या पश्चात् उस प्रतिभूति अपील अधिकरण या न्यायालय द्वारा, जिसके समक्ष ऐसी कार्यवाहियां लंबित हैं, शमन किया जा सकेगा ।
24ख. उन्मुक्ति प्रदान करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड की सिफारिश पर, यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति ने, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि उसने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों के उपबंधों का उल्लंघन किया है, अभिकथित उल्लंघन के संबंध में पूर्ण और सत्य प्रकटन किया है तो ऐसे व्यक्ति को, उन शर्तों के अधीन रहते हुए, जिन्हें वह अधिरोपित करना ठीक समझे, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन से या इस अधिनियम के अधीन अभिकथित उल्लंघन की बाबत किसी शास्ति के अधिरोपण से उन्मुक्ति प्रदान कर सकेगी :
परंतु केन्द्रीय सरकार द्वारा उन मामलों में ऐसी कोई उन्मुक्ति प्रदान नहीं की जाएगी जिनमें ऐसी अन्मुक्ति प्रदान करने के लिए आवेदन प्राप्त होने की तारीख से पूर्व ऐसे अपराध के लिए अभियोजन हेतु कार्यवाहियां संस्थित की जा चुकी हैं :
परंतु यह और कि इस उपधारा के अधीन बोर्ड की सिफारिश केंद्रीय सरकार पर आबद्धकारी नहीं होगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को प्रदान की गई उन्मुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी भी समय वापस ली जा सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस व्यक्ति ने कार्यवाहियों के दौरान उन शर्तों का अनुपालन नहीं किया है,जिन पर उन्मुक्ति प्रदान की गई थी या मिथ्या साक्ष्य दिया है, और तदुपरि उस व्यक्ति का उस अपराध के लिए, जिसके लिए,उसे उन्मुक्ति प्रदान की गई थी या किसी अन्य अपराध के लिए, जिसके उल्लंघन के संबंध में वह दोषी प्रतीत होता है, विचारण किया जा सकेगा और वह इस अधिनियम के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपित किए जाने के लिए भी दायी होगा जिसके लिए ऐसा व्यक्ति उस दशा में दायी होता जिसमें ऐसी उन्मुक्ति प्रदान न की गई होती ।]
25. धन और आय-कर पर से छूट-धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27), आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या धन, आय, लाभ या अभिलाभ पर कर से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) बोर्ड ;
(ख) विद्यमान प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अपने गठन की तारीख से बोर्ड की स्थापना की तारीख तक,
अपने व्युत्पन्न धन, आय, लाभ या अभिलाभ की बाबत धन-कर, आय-कर या किसी अन्य कर का संदाय के लिए दायी नहीं होगा ।
26. न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, । । । बोर्ड द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
। । । । । । ।
[26क. विशेष न्यायालयों की स्थापना-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन अपराधों का शीघ्र विचारण प्रदान करने के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा, उतने विशेष न्यायालयों को, जितने आवश्यक हों, स्थापित या नामनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
(2) विशेष न्यायालय, ऐसे एकल न्यायाधीश से गठित होगा, जो केंद्रीय सरकार द्वारा ऐसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से, जिसकी अधिकारिता के भीतर नियुक्त किया जाने वाला न्यायाधीश कार्यरत है, नियुक्त किया जाएगा ।
(3) कोई व्यक्ति, किसी विशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक वह ऐसी नियुक्ति से ठीक पूर्व, यथास्थिति, किसी सेशन न्यायाधीश या किसी अपर सेशन न्यायाधीश का पद धारण नहीं कर रहा है ।
26ख. विशेष न्यायालयों द्वारा विचारणीय अपराध-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, प्रतिभूति विधि (संशोधन) अधिनियम, 2014 के प्रारंभ की तारीख से पूर्व या ऐसे प्रारंभ की तारीख को या उसके पश्चात् किए गए इस अधिनियम के अधीन सभी अपराधों का, ऐसे क्षेत्र के लिए, जिसमें अपराध किया गया है, स्थापित विशेष न्यायालय द्वारा या जहां ऐसे क्षेत्र के लिए एक से अधिक विशेष न्यायालय हैं, उनमें से ऐसे किसी एक द्वारा, जो संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, संज्ञान लिया जाएगा और विचारण किया जाएगा ।
26ग. अपील और पुनरीक्षण-उच्च न्यायालय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 29 और अध्याय 30 द्वारा, उच्च न्यायालय को प्रदत्त सभी शक्तियों का, जहां तक लागू हो, उसी प्रकार प्रयोग कर सकेगा मानो उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कोई विशेष न्यायालय, उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर मामलों का विचारण करने वाला कोई सेशन न्यायालय हो ।
26घ. विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों में संहिता का लागू होना-(1) इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के उपबंध, विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय का, सेशन न्यायालय होना समझा जाएगा तथा विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति का, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 2 के खंड (प) के अर्थांतर्गत लोक अभियोजक होना समझा जाएगा ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति को, सात वर्ष से अन्यून के लिए अधिवक्ता के रूप में व्यवसाय में होना चाहिए या संघ या राज्य के अधीन सात वर्ष से अन्यून की अवधि के लिए विधि के विशेष ज्ञान की अपेक्षा करने वाले किसी पद को धारण करना चाहिए ।
26ङ. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी अपराध का, जो विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय है, जब तक विशेष न्यायालय स्थापित न किया जाए, तब तक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, क्षेत्र पर अधिकारिता का प्रयोग करने वाले सेशन न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जाएगा और विचारण किया जाएगा :
परंतु इस धारा में अंतिर्विष्ट कोई बात, इस धारा के अधीन सेशन न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए गए किसी मामले या मामलों के वर्ग को अंतरित करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 407 के अधीन उच्च न्यायालय की शक्तियों को प्रभावित नहीं करेगी ।]
27. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्रवाई किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध, उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध, कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव य अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ; और
(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
। । । । । । ।
[28क. रकमों की वसूली-(1) यदि कोई व्यक्ति, न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहता है या धन के प्रतिदाय के लिए बोर्ड के किसी निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है या धारा 11ख के अधीन जारी प्रत्यर्पण आदेश के निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है या बोर्ड को देय किन्हीं फीसों का संदाय करने में असफल रहता है तो वसूली अधिकारी, व्यक्ति से देय रकम विनिर्दिष्ट करते हुए, विनिर्दिष्ट प्ररूप में अपने लेख में एक कथन (ऐसे कथन को इस अध्याय में इसके पश्चात् प्रमाणपत्र कहा गया है) तैयार कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति से प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम को निम्नलिखित एक या अधिक पद्धतियों से वसूल के लिए कार्यवाही करेगा, अर्थात् :-
(क) व्यक्ति की जंगम संपत्ति की कुर्की और विक्रय ;
(ख) व्यक्ति के बैंक खातों की कुर्की ;
(ग) व्यक्ति की स्थावर संपत्ति की कुर्की और विक्रय ;
(घ) व्यक्ति की गिरफ्तारी और कारागार में उसका निरोध ;
(ङ) व्यक्ति की जंगम और स्थावर संपत्तियों के प्रबंध के लिए प्रापक की नियुक्ति,
और इस प्रयोजन के लिए आय-कर अधिनियम, 1961 की धारा 220 से धारा 227, धारा 228क, धारा 229, धारा 232, दूसरी और तीसरी अनुसूचियों तथा समय-समय पर प्रवृत्त आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 के उपबंध, जहां तक हो सके ऐसे आवश्यक उपांतरणों के साथ लागू हो सकेंगे मानो उक्त उपबंध और उसके अधीन बनाए गए नियम, इस अधिनियम के उपबंध थे और आय-कर अधिनियम, 1961 के अधीन आय कर के स्थान पर, इस अधिनियम के अधीन देय रकम के प्रति निर्देश हैं ।
स्पष्टीकरण 1-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए व्यक्ति की जंगम या स्थावर संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन में, ऐसी कोई संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन सम्मिलित हैं, जो ऐसी तारीख को या उसके पश्चात्, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः, अंतरित किए गए हैं, जब प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट कोई रकम, व्यक्ति द्वारा पर्याप्त प्रतिफल से भिन्न उसके पति या पत्नी या अप्राप्तवय बालक या पुत्र की पत्नी या पुत्र के अप्राप्तवय बालक को देय हो चुकी थी और जो पूर्वोक्त किन्हीं व्यक्तियों द्वारा धारित की गई है या उनके नाम पर है और जहां तक उसके अप्राप्तवय बालक या उसके पुत्र के अप्राप्तवय बालक को इस प्रकार अंतरित जंगम या स्थावर संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन का संबंध है वहां उसका, यथास्थिति, ऐसे अप्राप्तवय बालक या पुत्र के अप्राप्तवय बालक के वयस्क होने की तारीख के पश्चात् भी इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति से देय किसी रकम की वसूली करने के लिए व्यक्ति की जंगम या स्थावर संपत्ति या बैंक में धारित धन में सम्मिलित होना बना रहेगा ।
स्पष्टीकरण 2-आय-कर अधिनियम, 1961 की दूसरी और तीसरी अनुसूचियों और आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 के उपबंधों के अधीन निर्धारिती के प्रति किसी निर्देश का, प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट व्यक्ति के बारे में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उसके प्रति निर्देश है ।
स्पष्टीकरण 3-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अध्याय 17घ और दूसरी अनुसूची में अपील के प्रति किसी निर्देश का, इस अधिनियम की धारा 15न के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील के बारे में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उसके प्रति निर्देश है ।
(2) वसूली अधिकारी, उपधारा (1) के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते समय स्थानीय जिला प्रशासन की सहायता प्राप्त करने के लिए सशक्त होगा ।
(3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, धारा 11ख के अधीन बोर्ड द्वारा जारी किसी निदेश के अननुपालन के अनुसरण में उपधारा (1) के अधीन किसी वसूली अधिकारी द्वारा रकमों की वसूली की, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध किसी अन्य दावे पर अग्रता होगी ।
(4) उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए वसूली अधिकारी" पद से बोर्ड का कोई ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जिसको लिखित में सामान्य या विशेष आदेश द्वारा वसूली अधिकारी की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जाए ।]
29. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें ;
(ख) ऐसे अतिरिक्त कृत्य, जिनका धारा 11 के अधीन बोर्ड द्वारा पालन किया जा सकेगा ;
। । । । । ।
(घ) वह रीति, जिससे बोर्ड के लेखे धारा 15 के अधीन रखे जाएंगे ;
[(घक) धारा 15झ की उपधारा (1) के अधीन जांच की रीति ;
(घख) धारा 15ण और धारा 15ध की उपधारा (3) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के [पीठासीन अधिकारयों, सदस्यों] तथा अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ;
(घग) धारा 15थ की उपधारा (3) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के 3[पीठासीन अधिकारियों या अन्य सदस्यों] के कदाचार या असमर्थता का अन्वेषण करने के लिए प्रक्रिया ;
(घघ) वह प्ररूप जिसमें धारा 15न के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल की जा सकेगी और ऐसी अपील की बाबत संदेय फीस ।]
(ङ) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे, धारा 18 के अधीन केन्द्रीय सरकार को विवरणियां और रिपोर्ट दी जानी हैं ;
(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए अथवा जिसकी बाबत नियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।
30. विनियम बनाने की शक्ति-(1) बोर्ड, । । । अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से असंगत न हों ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) बोर्ड के अधिवेशनों का समय और स्थान और धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन ऐसे अधिवेशनों में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया जिसके अंतर्गत कारबार के संव्यवहार के लिए आवश्यक गणपूर्ति है ;
(ख) धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन बोर्ड के अधिकारियों और कर्मचारियों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें ;
[(ग) पूंजी निर्गमन, प्रतिभूतियों के अंतरण से संबंधित विषय और उनके आनुषंगिक अन्य विषय तथा वह रीति जिससे ऐसे विषय धारा 11क के अधीन कम्पनियों द्वारा प्रकट किए जाएंगे ;
[(गक) धारा 11 की उपधारा (5) के अधीन जमा की गई रकम का उपयोग किया जाना ;
(गख) धारा 11कक की उपधारा (2क) के अधीन सामूहिक विनिधान स्कीम से संबंधित अन्य शर्तों का पूरा किया जाना ;]
(घ) वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए धारा 12 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी किया जाता है, और रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए फीस की रकम संदत्त की जानी है तथा उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के निलंबन या रद्दकरण की रीति ।]
[(घक) धारा 15ञख की उपधारा (2) के अधीन कार्यवाहियों के निपटारे के लिए बोर्ड द्वारा अवधारित निबंधन और उपधारा (3) के अधीन निपटारा कार्यवाहियों के संचालन के लिए प्रक्रिया ;
(घख) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसको विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है या विनिर्दिष्ट किया जाए या जिसके संबंध में विनियमों द्वारा उपबंध किया जाना है ।]
31. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
32. अन्य विधियों का लागू किया जाना वर्जित न होना-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।
33. कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन-इस अधिनियम की अनुसूची के भाग 1 और भाग 2 में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियां, उसमें विनिर्दिष्ट रीति से संशोधित की जाएंगी और ऐसे संशोधन, बोर्ड की स्थापना की तारीख को प्रभावी होंगे ।
34. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों :
परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से पांच वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
[34क. कुछ अधिनियमों का विधिमान्यकरण-बोर्ड के समरूप कृत्य करने वाले अन्य प्राधिकरणों से, चाहे वे भारत में हैं या भारत के बाहर हैं, जानकारी मांगने या उनको जानकारी देने के संबंध में और प्रशासनिक तथा सिविल कार्यवाहियों के निपटान के संबंध में मूल अधिनियम के अधीन किया गया या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई कार्य या कोई बात, सभी प्रयोजनों के लिए इस प्रकार विधिमान्य और प्रभावी समझी जाएगी मानो मूल अधिनियम में किए गए संशोधन सभी तात्त्विक समयों पर प्रवृत्त थे ।]
35. निरसन और व्यावृत्ति-(1) भारतीय प्रतिभूति और विनमय बोर्ड अध्यादेश, 1992 (1992 का अध्यादेश संख्यांक 5) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
अनुसूची
(धारा 33 देखिए)
कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन
भाग 1
पूंजी निर्गमन (नियंत्रण) अधिनियम, 1947 (1947 का 29) का संशोधन
धारा 10 में, उस सरकार" शब्दों के स्थान पर उस सरकार या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" शब्द रखें ।
भाग 2
प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) का संशोधन
1. धारा 2 के खण्ड (त) के उपखण्ड (ii) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-
(ii) सरकारी प्रतिभूतियां हैं ;
(iiक) ऐसी अन्य लिखतें हैं जो केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रतिभूति घोषित की जाएं ; और" ।
2. धारा 6 में,-
(i) उपधारा (1) में, केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" शब्द रखें ;
(ii) उपधारा (2) में, केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" शब्द रखें ;
(iii) उपधारा (3) में, केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर, जहां-जहां वे आते हैं, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" शब्द रखें ।
3. धारा 9 में, केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर, जहां-जहां वे आते हैं, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" शब्द रखें ।
4. धारा 10 में, केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर, जहां-जहां वे आते हैं, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" शब्द रखें ।
5. धारा 17 की उपधारा (1) में, केन्द्रीय सरकार द्वारा की गई अनुमति" शब्दों के स्थान पर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा की गई अनुज्ञप्ति" शब्द रखें ।
6. धारा 21 में, केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" शब्द रखें ।
7. धारा 22क की उपधारा (3) के खण्ड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-
(ख) प्रतिभूतियों का अंतरण किसी विधि या उसके अधीन बनाए गए नियमों अथवा ऐसी विधियां या नियमों के अनुसरण में अधिकथित किन्हीं प्रशासनिक अनुदेशों या सूचीकरण करार की शर्तों के उल्लंघन में है ; " ;
8. धारा 23 की उपधारा (2) में, या जो धारा 21 या धारा 22 के अधीन केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर अथवा जो धारा 21 के अधीन भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या धारा 22 के अधीन केन्द्रीय सरकार" शब्द रखें ।
9. धारा 29 के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-
29क. प्रत्यायोजित करने की शक्ति-केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य शक्तियां, ऐसे विषयों के संबंध में और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा भी प्रयोक्तव्य होंगी ।" ।
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