संयुक्त राष्ट्र (विशेषाधिकर और उन्मुक्ति)
अधिनियम, 1947
(1947 का अधिनियम संख्यांक 46)1
[20 दिसंबर, 1947]
संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषाधिकार और उन्मुक्ति सम्बन्धी कन्वेन्शन
को प्रभावी करने के लिए
अधिनियम
संयुक्त राष्ट्र के विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों सम्बन्धी कन्वेन्शन को प्रभावी करना तथा अन्य अन्तरराष्ट्रीय संगठनों और उनके प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों को वैसे ही विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का उपयोग करने के लिए समर्थ बनाना समीचीन है;
अतः इसके द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम संयुक्त राष्ट्र (विशेषाधिकार और उन्मुक्ति) अधिनियम, 1947 है ।
2. संयुक्त राष्ट्र तथा उसके प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों को कुछ विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का प्रदन किया जाना-(1) किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों सम्बन्धी कन्वेन्शन के उपबंध, जो इस अधिनियम की अनुसूची में उपवर्णित है और जिसे संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा ने 13 फरवरी, 1946 को अंगीकृत किया था, भारत में विधि का बल रखेंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, समय-समय पर अनुसूची का संशोधन, किन्हीं ऐसे संशोधनों के अनुरूप कर सकेगी, जो उक्त कन्वेन्शन के उन उपबन्धों में, जो अनुसूची में उपवर्णित हैं, सम्यक् रूप से किए हैं और अंगीकार किए गए हैं ।
3. अन्य अन्तरराष्ट्रीय संगठनों और उनके प्रतिनिधियों और अधिकारियों को कुछ विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां प्रदान करने की शक्ति-जहां किसी अन्तरराष्ट्रीय करार, कन्वेन्शन या अन्य लिखत के अनुसरण में, भारत में किसी अन्तरराष्ट्रीय संगठन और उसके प्रतिनिधियों और अधिकारियों को अनुसूची में उपवर्णित उपबन्धों के समान विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां देना आवश्यक हो, वहां केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना2 द्वारा यह घोषित कर सकेगी कि अनुसूची में उपवर्णित उपबन्ध ऐसे उपान्तरणों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जिन्हें वह उक्त करार, कन्वेंशन या अन्य लिखत को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या समीचीन समझे, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अन्तरराष्ट्रीय संगठन और उसके प्रतिनिधियों और अधिकारियों को, आवश्यक परिवर्तनों सहित, लागू होंगे, और तदुपरि उक्त उपबंध तदनुसार लागू होंगे और किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, ऐसे लागू होने में भारत में विधि का बल रखेंगे ।
- इस अधिनियम का 1968 के अधिनियम सं० 26 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र पर और अधिसूचना सं० सा० का० नि० 19 (अ), तारीख 12-1-1976 द्वारा (12-1-1976 से) सिक्किम राज्य पर विस्तार किया गया ।
- अनुसूची में उपवर्णित उपबंधों का कुछ उपांतरणों सहित निम्नलिखित संगठनों पर विभिन्न अधिसूचनाओं द्वारा विस्तार किया गया है, अर्थात्:
- इंटरनेशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन ।
- वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन ।
- इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन ।
- फूड एण्ड एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन आफ यू० एन० ।
- यू० एन० ई० एस० सी० ओ० ।
- आई० एम० एफ० ।
- आई० वी० आर० डी० ।
- यू० पी० यू० ।
- आई० टी० यू० ।
- डब्लू० एम० ओ० ।
- परमानेंट सेंट्रल ओपियम बोर्ड (1-1-1957) ।
4. नियम बनाने की शक्ति- 1[(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, 2[राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,] बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । ]
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अनुसूची
(धारा 2 और धारा 3 देखिए)
अनुच्छेद 1
वैधिक व्यक्तित्व
धारा 1. संयुक्त राष्ट्र का वैधिक व्यक्तित्व होगा । इसे
(क) संविदा करने;
(ख) स्थावर तथा जंगम सम्पत्ति अर्जित करने तथा उसका व्ययन करने,
(ग) विधिक कार्यवाहियां संस्थित करने,
के लिए सामर्थ्य प्राप्त होगा ।
अनुच्छेद 2
सम्पत्ति, निधियां और आस्तियां
धारा 2. संयुक्त राष्ट्र, उसकी संपत्ति और आस्तियां, चाहे जहां भी वे स्थित हों और चाहे किसी के भी द्वारा धारण की गई हों, प्रत्येक प्रकार की विधिक प्रक्रिया से, वहां तक के सिवाय जहां तक किसी विशिष्ट मामलों में उसने अपनी उन्मुक्ति को अभिव्यक्त रूप से अधित्यक्त न कर दिया हो, उन्मुक्त रहेंगी । किन्तु यह समझा जाता है कि उन्मुक्ति के अधित्यजन का विस्तार, निष्पादन संबंधी किसी कार्रवाई पर नहीं होगा ।
धारा 3. संयुक्त राष्ट्र के परिसर अनतिक्रमणीय होंगे । संयुक्त राष्ट्र की सम्पत्ति और आस्तियां चाहे वे जहां कहीं भी स्थित हों और किसी के भी द्वारा धारण की गई हों, तलाशी, अधिग्रहण, अधिहरण, स्वत्वहरण और किसी भी अन्य प्रकार के हस्तक्षेप से, चाहे वह कार्यपालक, प्रशासनिक, न्यायिक, या विधायी कार्यवाही द्वारा हों, उन्मुक्त होंगी ।
धारा 4. संयुक्त राष्ट्र के अभिलेखागार, और सामान्यतया उसकी या उसके द्वारा धारित सभी दस्तावेजें, चाहे वे कहीं भी स्थित हों, अनतिक्रमणीय होंगी ।
धारा 5. वित्तीय नियंत्रण, विनियमों या किसी भी प्रकार के अधिस्थगनों द्वारा लगाए गए निर्बन्धनों से मुक्त रहते हुए,
(क) संयुक्त राष्ट्र निधियां, स्वर्ण या किसी भी प्रकार की करेन्सी रख सकेगा और किसी भी करेन्सी में खाते संचालित कर सकेगा, और
(ख) संयुक्त राष्ट्र अपनी निधियां, स्वर्ण या करेन्सी को एक देश से दूसरे देश को या किसी भी देश के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर अन्तरित करने और अपने पास रखी किसी भी करेन्सी को किसी अन्य करेन्सी में परिवर्तित करने के लिए स्वतंत्र होगा ।
(12) इंटरनेशनल हाइड्रोग्राफिक ब्यूरो झ्र्अधिसूचना संख्यांक कानूनी आदेश, 2480, तारीख 10-10-1960, भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), भाग 2, अनुभाग 3(ii), पृष्ठ, 3001 देखिए] ।
(13) सिंधु जल आयुक्त, पाकिस्तान सरकार और उसके सलाहकारों और सहायकों को (अनुच्छेद iv देखिए) ।
- 1986 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-5-1986 से) पुनःसंख्यांकित ।
- 1986 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-5-1986 से) अंतःस्थापित ।
धारा 6. उपर्युक्त धारा 5 के अधीन अपने अधिकारों का प्रयोग करने में संयुक्त राष्ट्र, किसी सदस्य सरकार द्वारा किए गए किसी भी अभ्यावेदन पर, वहां तक जहां तक यह समझा जाए कि संयुक्त राष्ट्र के हितों को नुकसान पंहुचाए बिना ऐसे अभ्यावेदनों को प्रभावी किया जा सकता है, सम्यक् ध्यान देगा ।
धारा 7. संयुक्त राष्ट्र, उसकी आस्तियों, आय और अन्य सम्पत्ति को
(क) सभी प्रत्यक्ष करों से छूट प्राप्त होगी, किन्तु यह समझा जाता है कि संयक्त राष्ट्र ऐसे करों से, जो वास्तव में सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं के लिए प्रभारों के सिवाय कुछ नहीं है, छूट प्राप्त करने का दावा नहीं करेगा;
(ख) सीमाशुल्कों और अपने शासकीय उपयोग के लिए आयात या निर्यात की गई वस्तुओं के सम्बन्ध में आयात और निर्यात सम्बन्धी प्रतिषेधों और निर्बन्धनों से छूट प्राप्त होगी, किन्तु यह समझा जाता है कि ऐसी छूट के अधीन आयात की गई वस्तुएं उस देश में, जिसमें उनका आयात किया गया था, केवल उन्हीं शर्तों पर बेची जा सकेगी जिन पर उस देश की सरकार सहमत हुई हो, अन्यथा नहीं;
(ग) अपने प्रकाशनों की बाबत सीमाशुल्कों और आयात और निर्यात सम्बन्धी प्रतिषेधों और निबन्धनों से छूट प्राप्त होगी ।
धारा 8. साधारणतया संयुक्त राष्ट्र, उत्पाद-शुल्कों तथा जंगम और स्थावर सम्पत्ति के विक्रय पर करों से, जो संदाय की जाने वाली कीमत का भाग हो, छूट का दावा नहीं करेगा, फिर भी जब संयुक्त राष्ट्र शासकीय उपयोग के लिए ऐसी सम्पत्ति का महत्वपूर्ण क्रय कर रहा हो, जिस पर ऐसा शुल्क और कर प्रभारित किया गया है या प्रभार्य है तब सदस्य, जहां संभव हो, शुल्क या कर की रकम का परिहार करने या उसे वापस करने के लिए समुचित प्रशासकीय व्यवस्था करेंगे ।
अनुच्छेद 3
संचार साधनों के बारे में सुविधाएं
धारा 9. संयुक्त राष्ट्र के साथ प्रत्येक सदस्य सरकार के राज्यक्षेत्र में शासकीय संचार साधनों के लिए, डाक, केबल, तार, रेडियोग्राम, टेलिफोटो, टेलिफोन और अन्य संचार साधनों पर पूर्विकताओं, दरों और करों के मामलों में और प्रेस और रेडियो को भेजी जाने वाली जानकारी के लिए प्रेस दरों के मामलों में सदस्य सरकार द्वारा किसी अन्य सरकार के प्रति, जिसके अन्तर्गत उसका राजनयिक मिशन भी है, व्यवहार, से कम अनुकूल व्यवहार नहीं किया जाएगा । संयुक्त राष्ट्र के शासकीय पत्र-व्यवहार तथा अन्य शासकीय संचार साधनों पर कोई भी सेंसर लागू नहीं किया जाएगा ।
धारा 10. संयुक्त राष्ट्र को संकेतकी प्रयोग करने और वार्ताहर द्वारा या थैलियों में अपने पत्रादि को भेजने और उन्हें प्राप्त करने का अधिकार होगा । इन्हें वही उन्मुक्तियां और विशेषाधिकार प्राप्त हैं जो राजनयिक वार्ताहरों और थैलियों के संबंध में हैं ।
अनुच्छेद 4
सदस्यों के प्रतिनिधि
धारा 11. संयुक्त राष्ट्र के प्रधान और सहायक अंगों के तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा संयोजित सम्मेलनों में सदस्यों के प्रतिनिधियों को, अपने कृत्यों का प्रयोग करते समय और अधिवेशन के स्थान तक और से अपनी यात्रा के दौरान, निम्निलिखित विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां होंगी, अर्थात्:
(क) वैयक्तिक रूप से गिरफ्तार किए जाने या निरोध में रखे जाने से तथा निजी माल-असबाब के अभिग्रहण से उन्मुक्ति, और बोले गए या लिखे गए शब्दों तथा प्रतिनिधियों की हैसियत में किए गए सभी कार्यों के लिए प्रत्येक प्रकार की विधिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति;
(ख) सभी कागज-पत्रों और दस्तावेजों के लिए अनतिक्रमणीयता;
(ग) संकेतकियों का प्रयोग करने और वार्ताहर द्वारा या मोहरबन्द थैलियों में कागज-पत्र या पत्रादि प्राप्त करने का अधिकार;
(घ) उस राज्य में जिसमें वे जा रहे हों या जिससे होकर वे गुजर रहें हों, अपने कृत्यों के पालन में आप्रवास सम्बन्धी निर्बन्धनों, अन्यदेशीय रजिस्ट्रीकरण या राष्ट्रीय सेवा की बाध्यताओं से अपने तथा पत्नी/अपने पति के बारे में छूट;
(ङ) करेंसी या विनिमय संबंधी निर्बन्धनों के बारे में वही सुविधाएं, जो अस्थायी शासकीय मिशनों पर जाने वाले विदेशी सरकारों के प्रतिनिधियों को दी जाती हैं;
(च) निजी माल-असबाब के लिए वही उन्मुक्तियां और सुविधाएं जो राजनयिक दूतों को दी जाती हैं, और साथ ही ;
(छ) अन्य ऐसे विशेषाधिकार, उन्मुक्तियां और सुविधाएं जो राजनयिक दूतों को प्राप्त हैं, और जो पूर्वोक्त से असंगत न हों । किन्तु उन्हें (निजी माल-असबाब के भाग के रूप में आयात किए गए माल-असबाव से अन्यथा) आयात किए गए माल पर सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क या विक्रय-कर से छूट का दावा करने का अधिकार नहीं होगा ।
धारा 12. संयुक्त राष्ट्र के प्रधान और सहायक अंगों के तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा संयोजित सम्मेलनों के सदस्यों के प्रतिनिधियों के लिए पूर्ण वाक्-स्वातन्त्रय और उनके कर्तव्यों के निर्वहन में स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की दृष्टि से, बोले गए या लिखे गए शब्दों तथा उनके कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए सभी कार्यों के बारे में इस बात के होते हुए भी कि सम्बद्ध व्यक्ति सदस्यों के प्रतिनिधि नहीं रह गए हैं, विधिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति मिलती रहेगी ।
धारा 13. जहां किसी भी प्रकार के कर का भार निवास पर निर्भर है वहां वे अवधियां, जिनके दौरान संयुक्त राष्ट्र के प्रधान और सहायक अंगों के तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा संयोजित सम्मेलनों के सदस्यों के प्रतिनिधि अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किसी राज्य में उपस्थित हों, निवास की अवधियां नहीं मानी जाएंगी ।
धारा 14. सदस्यों के प्रतिनिधियों को विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां उनके वैयक्तिक फायदे के लिए नहीं दी गई हैं बल्कि इसलिए दी गई हैं कि वे संयुक्त राष्ट्र के संबंध में अपने कृत्यों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से कर सकें । परिणामस्वरूप किसी सदस्य को अपने प्रतिनिधि की उन्मुक्ति अधित्यक्त करने का न केवल अधिकार है बल्कि ऐसा करना उसका कर्तव्य भी हो जाता है, यदि उसकी राय में ऐसी उन्मुक्ति न्याय में अड़चन डाल सकती है और उसका अधित्यजन उस प्रयोजन पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किया जा सकता है जिसके लिए यह उन्मुक्ति दी गई है ।
धारा 15. धारा 11, धारा 12 और धारा 13 के उपबन्ध उस राज्य के किसी प्रतिनिधि और अधिकारियों के बीच लागू नहीं हैं जिसका कि वह राष्ट्रिक या प्रतिनिधि है या रहा है ।
धारा 16. इस अनुच्छेद में प्रतिनिधि पद से यह समझा जाएगा कि इसके अन्तर्गत सभी डेलीगेट, उप-डेलीगेट, सलाहकार, तकनीकी विशेषज्ञ और शिष्टमंडलों के सचिव भी हैं ।
अनुच्छेद 5
पदधारी
धारा 17. महासचिव, पदधारियों के उन प्रवर्गों को विनिर्दिष्ट करेगा जिन्हें इस अनुच्छेद और अनुच्छेद 7 के उपबन्ध लागू होंगे । वह इन प्रवर्गों को महासभा के समक्ष प्रस्तुत करेगा । तत्पश्चात् ये प्रवर्ग सभी सदस्य सरकारों को संसूचित किए जाएंगे । इन प्रवर्गों में सम्मिलित किए गए पदधारियों के नाम सदस्य की सरकारों को समय-समय पर सूचित किए जाएंगे ।
धारा 18. संयुक्त राष्ट्र के पदधारियों को:
(क) उनके बोले गए या लिखे गए शब्दों के बारे में तथा उनकी अपनी पदीय हैसियत में किए गए सभी कार्यों के बारे में विधिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति होगी;
(ख) संयुक्त राष्ट्र द्वारा संदत्त वेतन और उपलब्धियों पर कर से छूट प्राप्त होगी;
(ग) राष्ट्रीय सेवा बाध्यताओं से उन्मुक्ति होगी;
(घ) अपनी पत्नी/अपने पति तथा उन पर आश्रित नातेदारों को आप्रवास संबंधी निर्बन्धनों और अन्य देशीय रजिस्ट्रीकरण से उन्मुक्ति होगी;
(ङ) विनिमय सुविधाओं के बारे में वही विशेषाधिकार दिए जाएंगे जो सम्बद्ध सरकार के राजनयिक मिशनों के तुल्य पंक्ति के पदधारियों को दिए जाते हैं;
(च) अपनी पत्नी/अपने पति तथा उन पर आश्रित नातेदारों को अन्तरराष्ट्रीय संकट के समय स्वदेश वापसी की वही सुविधाएं प्राप्त होंगी जो राजनयिक दूतों को दी जाती हैं;
(छ) सम्बद्ध देश में प्रथम बार अपना पद ग्रहण करने पर अपना फर्नीचर और चीज-बस्त निःशुल्क आयात करने का अधिकार होगा ।
धारा 19. धारा 18 में विनिर्दिष्ट उन्मुक्तियों और विशेषाधिकारों के अतिरिक्त महासचिव और सभी सहायक महासचिवों को, अपने बारे में, अपनी पत्नियों, अपने पतियों तथा अपने अवयस्क बच्चों के बारे में, वही विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां, छूट तथा सुविधाएं प्राप्त होंगी, जो अन्तरराष्ट्रीय विधि के अनुसार, राजनयिक दूतों को दी जाती हैं ।
धारा 20. संयुक्त राष्ट्र के हित में ही पदधारियों को, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां दी जाती हैं न कि व्यक्तियों के निजी फायदे के लिए । महासचिव को, किसी ऐसे मामले में, जहां उसकी राय में, कोई उन्मुक्ति न्याय में अड़चन डाल सकती है और संयुक्त राष्ट्र के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उसे अधित्यक्त किया जा सकता है, वहां किसी पदधारी की उन्मुक्ति को अधित्यक्त करने का अधिकार और कर्तव्य होगा । महासचिव के मामले में, उन्मुक्ति को अधित्यक्त करने का अधिकार सुरक्षा परिषद् को होगा ।
धारा 21. संयुक्त राष्ट्र, समुचित न्याय प्रशासन को सुकर बनाने के लिए, पुलिस संबंधी विनियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए और इस अनुच्छेद में उपवर्णित विशेषधिकारों, उन्मुक्तियों और सुविधाओं के सम्बन्ध में, किसी दुरुपयोग को रोकने के लिए, सदस्यों के समुचित प्राधिकरणों के साथ हर समय सहयोग करेगा ।
अनुच्छेद 6
संयुक्त राष्ट्र के मिशनों में विशेषज्ञ
धारा 22. संयुक्त राष्ट्र के मिशनों को पूरा करने वाले विशेषज्ञों को (अनुच्छेद 5 के कार्यक्षेत्र में आने वाले पदधारियों से भिन्न) ऐसे विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां दी जाएंगी, जो उनके मिशनों की अवधि के दौरान, जिसके अन्तर्गत उनके मिशनों के सम्बन्ध में यात्रा में लगा समय भी है, उनके कृत्यों के स्वतंत्र रूप से पालन करने के लिए आवश्यक हों । विशेष रूप से उन्हें
(क) वैयक्तिक रूप से गिरफ्तार किए जाने या निरोध में रखे जाने से, तथा निजी माल-असबाब के अभिग्रहण से उन्मुक्ति दी जाएगी;
(ख) अपने मिशन को पूरा करने के दोरान उनके बोले गए या लिखे गए शब्दों और किए गए कार्यों के बारे में प्रत्येक प्रकार की विधिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति दी जाएगी । इस बात के होते हुए कि संबद्ध व्यक्ति संयुक्त राष्ट्र के मिशनों के नियोजन में नहीं है, विधिक प्रक्रिया से यह उन्मुक्ति मिलती रहेगी;
(ग) सभी कागज-पत्रों और दस्तावेजों के लिए अनतिक्रमणीयता रहेगी;
(घ) संयुक्त राष्ट्र से संचार साधनों के प्रयोजन से संकेतकी प्रयोग तथा वार्ताहर द्वारा या मोहरबन्द थैलियों में से कागज-पत्र या पत्र-व्यवहार प्राप्त करने का अधिकार होगा;
(ङ) करेन्सी या विनिमय संबंधी निर्बन्धनों के बारे में वही सुविधाएं दी जाएगी जो अस्थायी शासकीय मिशनों पर जाने वाले विदेशी सरकारों के प्रतिनिधियों को दी जाती हैं;
(च) निजी माल-असबाब के बारे में वही उन्मुक्तियां और सुविधाएं दी जाएंगी जो राजनायिक दूतों को दी जाती हैं ।
धारा 23. संयुक्त राष्ट्र के हित में ही विशेषज्ञों को विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां दी जाती हैं न कि व्यक्तियों के निजी फायदे के लिए । महासचिव को किसी ऐसे मामले में, किसी विशेषज्ञ की उन्मुक्ति को अधित्यक्त करने का अधिकार और कर्तव्य होगा जहां उसकी राय में, कोई उन्मुक्ति न्याय में अड़चन डाल सकती है और संयुक्त राष्ट्र के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उसे अधित्यक्त किया जा सकता है ।
अनुच्छेद 7
संयुक्त राष्ट्र पास
धारा 24. संयुक्त राष्ट्र अपने पदधारियों को संयुक्त राष्ट्र पास जारी कर सकेगा । इन पासों को, धारा 25 के उपबन्ध को ध्यान में रखते हुए, सदस्यों के प्राधिकारियों द्वारा विधिमान्य यात्रा-दस्तावेजों के रूप में मान्यता दी जाएगी और स्वीकार किया जाएगा ।
धारा 25. संयुक्त राष्ट्र, पास धारकों से प्राप्त वीसा के (जहां अपेक्षित हो) आवेदनों पर, जब उनके साथ इस आशय का कोई प्रमाणपत्र हो कि वे संयुक्त राष्ट्र के कार्य से यात्रा कर रहे हैं, यथासंभव शीघ्रता से, कार्रवाई की जाएगी । इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्तियों को शीघ्र यात्रा के लिए सुविधाएं दी जाएंगी ।
धारा 26. ऐसे विशेषज्ञों और अन्य व्यक्तियों को, जिनके पास संयुक्त राष्ट्र पास नहीं है, किन्तु उनके पास इस आशय का कोई प्रमाणपत्र है कि वे संयुक्त राष्ट्र के कार्य से यात्रा कर रहे हैं, धारा 25 में विनिर्दिष्ट सुविधाओं के समान सुविधाएं दी जाएंगी ।
धारा 27. महासचिव, सहायक महासचिव तथा निदेशक को, जब वे संयुक्त राष्ट्र के कार्य से संयुक्त राष्ट्र पास पर यात्रा कर रहे हों, वही सुविधाएं दी जाएंगी जो राजनयिक दूतों को दी जाती हैं ।
धारा 28. इस अनुच्छेद के उपबन्धों को विशेषज्ञ अभिकरणों के तुल्य पंक्ति के पदधारियों को भी लागू किया जा सकेगा यदि चार्टर के अनुच्छेद 63 के अधीन संबंधों के लिए करार में ऐसे उपबंध हों ।
अनुच्छेद 8
विवादों का निपटारा
धारा 29. संयुक्त राष्ट्र
(क) संविदाओं या प्राइवेट विधि प्रकृति के अन्य विवादों से उद्भूत होने वाले विवादों के, जिसमें संयुक्त राष्ट्र पक्षकार हो,
(ख) ऐसे विवादों के जिसमें संयुक्त राष्ट्र से संबंधित कोई ऐसा पदधारी अपनी पदीय स्थिति के कारण उन्मुक्ति प्राप्त है, यदि महासचिव द्वारा उन्मुक्ति अधित्यक्त न कर दी गई हो,
निपटारे के समुचित ढ़ंगों के लिए उपबन्ध करेगा ।
धारा 30. वर्तमान कन्वेंशन के लागू होने के सम्बन्ध में निर्वचन से उद्भूत होने वाले सभी मतभेद, जब तक कि किसी मामले के पक्षकारों के बीच यह सहमति न हो जाए कि वे निपटारे के कोई अन्य ढंग अपनाएंगे, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय को निर्दिष्ट किए जाएंगे । यदि एक ओर संयक्त राष्ट्र और दूसरी ओर किसी सदस्य के बीच कोई मतभेद उत्पन्न होता है तो अन्तर्ग्रस्त किसी विधि प्रश्न पर सलाह लेने के लिए अनुरोध, चार्टर के अनुच्छेद 96 और कोर्ट के स्टैट्यूट के अनुच्छेद 6 के अनुसार किया जाएगा । कोर्ट द्वारा दी गई राय पक्षकारों द्वारा अंतिम रूप से स्वीकार की जाएगी ।
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