वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951
(1951 का अधिनियम संख्यांक 33)
[16 मई, 1951]
वित्त आयोग के सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए अपेक्षित
अर्हताओं तथा उनके चयन किए जाने की रीति
अवधारित करने और उनकी शक्तियां
विहित करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया जाता हैः-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951 है ।
2.परिभाषा-इस अधिनियम में आयोग" से संविधान के अनुच्छेद 280 के खण्ड (1) के अनुसरण में राष्ट्रपति द्वारा गठित वित्त आयोग अभिप्रेत है ।
3. आयोग के सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं और उनके चयन की रीति-आयोग के अध्यक्ष का चयन उन व्यक्तियों में से किया जाएगा, जिन्हें लोक कार्यों में अनुभव प्राप्त है और अन्य चार सदस्यों का चयन उन व्यक्तियों में से किया जाएगा जो-
(क) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं या रह चुके हैं या नियुक्त किए जाने के लिए अर्हित हों; अथवा
(ख) सरकार के वित्त और लेखों का विशेष ज्ञान रखते हों; अथवा
(ग) वित्त मामलों और प्रशासन में व्यापक अनुभव रखते हों; अथवा
(घ) अर्थ-शास्त्र का विशेष ज्ञान रखते हों ।
4. व्यक्तिगत हित से सदस्यों का निरर्हित होना-किसी व्यक्ति को आयोग का सदस्य नियुक्त करने से पहले राष्ट्रपति अपना समाधान करेंगे कि उस व्यक्ति के ऐसे वित्तीय या अन्य हित नहीं होंगे जो आयोग के सदस्य के रूप में कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने में संभाव्य हों, और राष्ट्रपति आयोग के प्रत्येक सदस्य के बारे में उसके समय-समय पर अपना यह भी समाधान करेंगे कि उसका ऐसा कोई हित नहीं है और कोई भी व्यक्ति जो कि आयोग का सदस्य है या उस रूप में जिसकी नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति प्रस्थापना करते हैं, जब भी राष्ट्रपति द्वारा यह अपेक्षित हो, उनको ऐसी सूचना देगा जो कि इस धारा के अधीन उसके द्वारा उसके कर्तव्यों का पालन करने के लिए राष्ट्रपति आवश्यक समझते हों ।
5. आयोग के सदस्य होने के लिए निरर्हताएं-कोई व्यक्ति आयोग का सदस्य नियुक्त किए जाने या होने के लिए निरर्हित होगा यदि-
(क) वह विकृतचित्त का है;
(ख) वह अनुन्मोचित दिवालिया है;
(ग) वह ऐसे अपराध का दोषसिद्ध है जिसमें कि नैतिक अधमता अन्तर्वलित है;
(घ) उसका ऐसा वित्तीय या अन्य हित है जिससे आयोग के सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना संभाव्य है ।
6. सदस्यों की पदावधि और पुनर्नियुक्ति की पात्रता-आयोग का प्रत्येक सदस्य ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा जो उसे नियुक्त करने वाले राष्ट्रपति के आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, किन्तु वह पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा :
परन्तु वह राष्ट्रपति को संबोधित पत्र द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
7. सदस्यों की सेवा की शर्तें और वेतन तथा भत्ते- [(1)] आयोग के सदस्य आयोग में पूर्णकालिक या अंशकालिक सेवा करेंगे जैसा राष्ट्रपति प्रत्येक दशा में विनिर्दिष्ट करें, और आयोग के सदस्यों को ऐसी फीस या वेतन तथा ऐसे भत्ते संदत्त किए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार 1[राजपत्र में अधिसूचना द्वारा] इस निमित्त बनाए गए नियमों द्वारा अवधारित करे ।
1[(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
8. आयोग की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) आयोग अपनी प्रक्रियाओं को अवधारित करेगा और अपने कृत्यों के अनुपालन में उसे वे समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद पर विचार करते समय सिविल न्यायालय को निम्नलिखित मामलों के बारे में प्राप्त हैं, अर्थात्: -
(क) साक्षियों को समन करना और उनकी उपस्थिति प्रवर्तित कराना;
(ख) किसी दस्तावेज को पेश कराने की अपेक्षा करना;
(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की अध्यपेक्षा करना ।
(2) आयोग को किसी व्यक्ति से ऐसी बातों और मामलों पर जो कि राय में आयोग के अधीन विचारार्थ किसी मामले में उपयोगी या उससे सुसंगत हों, सूचना देने की अपेक्षा करने की शक्ति होगी [और इस प्रकार अपेक्षित कोई व्यक्ति, भारतीय आय-कर अधिनियम, 1922 (1922 का 11) की धारा 54 की उपधारा (2) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 176 के अर्थ में ऐसी सूचना देने के लिए वैध रूप से आबद्ध समझा जाएगा] ।
(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 480 और 482 के प्रयोजनार्थ आयोग सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
स्पष्टीकरण-साक्षियों को उपस्थित न कराने के प्रयोजनार्थ आयोग की अधिकारिता की स्थानीय सीमाएं भारत राज्यक्षेत्र की सीमाएं होंगी ।
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