हिमाचल प्रदेश विधान सभा (गठन और कार्यवाहियां) विधिमान्यकरण अधिनियम, 1958
(1958 का अधिनियम संख्यांक 56)
[30 दिसम्बर, 1958]
हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर (नया राज्य) अधिनियम, 1954 के अधीन बनाए गए
नए हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा के गठन और कार्यवाहियों को
विधिमान्य बनाने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के नवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम हिमाचल प्रदेश विधान सभा (गठन और कार्यवाहियां) विधिमान्यकरण अधिनियम, 1958 है ।
2. परिभाषा-इस अधिनियम में नई विधान सभाञ्ज् से ऐसा व्यक्ति-निकाय अभिप्रेत है, जो धारा 3 के खंड (क) के अधीन नए हिमाचल प्रदेश राज्य के सम्यक् रूप से गठित समझी गई विधान सभा है ।
3. नए हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा का गठन और कार्यवहियों का विधिमान्यकरण-किसी विधि में या न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में अन्तर्विष्ट किसी बात के होने पर भी,-
(क) हिमाचल प्रदेश के उप-राज्यपाल द्वारा 1 जुलाई, 1954 से प्रारंभ और 31 अक्तूबर, 1956 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान भाग स्त्र्गऱ् राज्य अधिनियम, 1951 (1951 का 49) की धारा 9 द्वारा उस पर प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में या तात्पर्यित प्रयोग में हिमाचल प्रदेश विधान सभा के रूप में समय-समय पर अधिवेशन के लिए आहूत व्यक्ति-निकाय को सभी प्रयोजनों के लिए, हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर (नया राज्य) अधिनियम, 1954 (1954 का 32) की धारा 3 के अधीन बनाए गए नए हिमाचल प्रदेश राज्य की सम्यक् रूप से गठित विधान सभा समझा जाएगा;
(ख) उन व्यक्तियों के बारे में, जो नई विधान सभा में उपस्थित थे या जिन्होंने मत दिया था या अन्यथा उसकी कार्यवाहियों में भाग लिया था, यह समझा जाएगा कि वे सदस्य के रूप में ऐसा करने के हकदार हैं;
(ग) उन व्यक्तियों के बारे में, जिन्होंने नई विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया था, यह समझा जाएगा कि वे क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में सम्यक् रूप से चुने हुए हैं,
और तदनुसार-
(i) नई विधान सभा द्वारा पारित किए गए किसी ऐसे विधेयक के बारे में (चाहे वह विधेयक नई विधान सभा में अथवा 1 जुलाई, 1954 के ठीक पूर्व कार्य करने वाली हिमाचल प्रदेश की विधान सभा में पुरःस्थापित किया गया हो) और जिसे राष्ट्रपति द्वारा अनुमति दे दी गई है, यह समझा जाएगा कि वह विधिमान्य रूप से अधिनियमित किया गया है और विधि का बल रखता है;
(ii) नई विधान सभा द्वारा दिया गया कोई अनुदान, पारित या अंगीकृत किया गया संकल्प या उसके समक्ष की गई कार्यवाही या की गई अन्य बात के बारे में यह समझा जाएगा कि वह विधि के अनुसार दिया गया है, पारित किया गया है, अंगीकृत किया गया है या की गई है ।
4. गठन, आदि में त्रुटि के आधार पर नई विधान सभा की कार्यवाहियों की विधिमान्यता का न्यायालय में प्रश्नगत न होना-केवल इस आधार पर कि नई विधान सभा सम्यक् रूप से गठित नहीं की गई थी या इस आधार पर कि ऐसे किसी व्यक्ति ने, जो इस प्रकार कार्य करने का हकदार नहीं था, नई विधान सभा की अध्यक्षता की थी या उसमें उपस्थित था या उसने मत दिया था या उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लिया था, नई विधान सभा द्वारा पारित किए गए किसी अधिनियम या दिए गए किसी अनुदान, अंगीकृत किए गए किसी संकल्प, या उसके समक्ष की गई किसी कार्यवाही या की गई किसी बात को न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
5. [निरसन]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
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