पाण्डिचेरी (विधि विस्तारण) अधिनियम, 1968
(1968 का अधिनियम संख्यांक 26)
[24 मई, 1968]
पाण्डिचेरी संघ राज्यक्षेत्र पर कुछ केन्द्रीय अधिनियमों
का विस्तार करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के उन्नीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पाण्डिचेरी (विधि विस्तारण) अधिनियम, 1968 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “अधिनियम" से अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई अधिनियम या अध्यादेश अभिप्रेत है ;
(ख) “प्रशासक" से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त पाण्डिचेरी का प्रशासक अभिप्रेत है ;
(ग) “पाण्डिचेरी" से पाण्डिचेरी संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ।
3. संशोधनों सहित कुछ विधियों का पाण्डिचेरी पर विस्तार और उनका वहां प्रारम्भ-(1) अनुसूची के भाग 1 में विनिर्दिष्ट ऐसे अधिनियम जिस रूप में वे साधारणतया उन राज्यक्षेत्रों में प्रवृत्त हैं जिन पर उनका विस्तार है और अनुसूची के भाग 2 में विनिर्दिष्ट ऐसे अधिनियम जिस रूप में वे ऐसे राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में, जो उनके नामों के आगे वर्णित हैं, 1 अगस्त, 1966 को प्रवृत्त थे, अनुसूची में विनिर्दिष्ट उपांतरणों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, पाण्डिचेरी पर विस्तारित होंगे ।
(2) उपधारा (1) में या प्रत्येक ऐसे अधिनियम के प्रारम्भ के लिए सुसंगत उपबन्ध में, यदि कोई हो, किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक ऐसे अधिनियम के उपबंध, पाण्डिचेरी में उस तारीख को प्रवृत्त होंगे, जो प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे :
परन्तु किसी अधिनियम के विभिन्न उपबंधों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध में, अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।
4. निरसन और व्यावृत्ति-(1) पाण्डिचेरी में या उसके किसी ऐसे क्षेत्र में जो धारा 3 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, या उसके किसी भाग में प्रवृत्त किसी अधिनियम के समरूप प्रवृत्त कोई विधि (उस दशा को छोड़कर जहां ऐसी विधि रेनोसांओं को लागू रहती है) पाण्डिचेरी में, ऐसे अधिनियम के प्रवृत्त होने की तारीख से निरसित हो जाएगी ।
(2) उपधारा (1) की कोई बात-
(क) इस प्रकार निरसित किसी विधि के पूर्व प्रवर्तन या उसके अधीन सम्यक् रूप से की गई या सहन की गई किसी बात पर ; या
(ख) इस प्रकार निरसित किसी विधि के अधीन अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व पर ; या
(ग) इस प्रकार निरसित किसी विधि के विरुद्ध किए गए किसी अपराध की बाबत, उपगत किसी शास्ति, समपहरण या किसी दण्ड पर ; या
(घ) पूर्वोक्त जैसे किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति, समपहरण या दण्ड के बारे में किसी अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार पर,
प्रभाव नहीं डालेगी और ऐसा कोई अन्वेषण, ऐसी विधिक कार्यवाही या ऐसे उपचार, संस्थित किया जा सकेगा, जारी रखी जा सकेगी या प्रवर्तित किया जा सकेगा और कोई ऐसी शास्ति, समपहरण या दण्ड अधिरोपित किया जा सकेगा, मानो यह अधिनियम पारित नहीं किया गया था :
परन्तु ऐसी किसी विधि के अधीन की गई कोई बात या की गई कोई कार्यवाही (जिसके अन्तर्गत की गई कोई नियुक्ति या किया गया प्रत्यायोजन, जारी की गई अधिसूचना, जारी किया गया अनुदेश या निदेश, विरचित प्ररूप, उपविधि या स्कीम, अभिप्राप्त प्रमाणपत्र, अनुदत्त परमिट या अनुज्ञप्ति या किया गया रजिस्ट्रीकरण है) इस अधिनियम द्वारा पाण्डिचेरी पर विस्तारित तत्स्थानी अधिनियम के उपबन्ध के अधीन की गई समझी जाएगी और तद्नुसार प्रवृत्त रहेगी जब तक कि उक्त अधिनियम के अधीन की गई किसी बात या की गई किसी कार्यवाही द्वारा उसे अतिष्ठित नहीं कर दिया जाता है ।
5. कुछ विधियों के अधीन नियमों, आदेशों आदि का विस्तारण-किसी अधिनियम के ऐसे उपबन्धों के अधीन, जो साधारणतया ऐसे राज्यक्षेत्रों के लिए हैं, जिन पर ऐसे अधिनियम का विस्तार है, केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए या जारी किए गए सभी नियमों, अधिसूचनाओं, आदेशों, विनियमों और उपविधियों का, ऐसे अधिनियम के उपबन्धों के प्रारम्भ से, पाण्डिचेरी पर विस्तार होगा और वे पाण्डिचेरी में प्रवृत्त होंगे ।
6. अर्थान्वयन के नियम-(1) किसी अधिनियम में, या उसके अधीन बनाए गए या जारी किए गए किन्हीं नियमों, अधिसूचनाओं, आदेशों, विनियमों और उपविधियों में, और जिनका विस्तार इस अधिनियम द्वारा पाण्डिचेरी राज्य पर किया गया है-
(क) किसी विधि के किसी ऐसे उपबन्ध के प्रति निर्देश का, जो पाण्डिचेरी में प्रवृत्त नहीं है, या किसी ऐसे कृत्यकारी के प्रति निर्देश का जो पाण्डिचेरी में विद्यमान नहीं है, इस प्रकार अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि या विद्यमान तत्स्थानी कृत्यकारी के प्रति निर्देश हैं :
परन्तु-
(i) यदि यह प्रश्न उठता है कि ऐसा तत्स्थानी कृत्यकारी कौन है, या
(ii) यदि ऐसा कोई तत्स्थानी कृत्यकारी नहीं है, तो प्रशासक यह विनिश्चय करेगा कि ऐसा कृत्यकारी कौन होगा और उसका विनिश्चय अन्तिम होगा ;
(ख) राज्य सरकार के प्रति किसी निर्देश का अर्थ इस प्रकार लगाया जाएगा कि वह केन्द्रीय सरकार के प्रति निर्देश है और उसके अन्तर्गत प्रशासक के प्रति निर्देश भी है ।
(2) पाण्डिचेरी के संबंध में किसी अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए या जारी किए गए किसी नियम, अधिसूचना, आदेश, विनियम, उपविधि को लागू करने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए कोई न्यायालय या अन्य प्राधिकरण उसके सार पर प्रभाव डाले बिना ऐसी रीति से अर्थ लगा सकेगा जो न्यायालय या अन्य प्राधिकरण के समक्ष किसी मामले के लिए अनुकूलित करना आवश्यक या उचित हो ।
7. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-यदि, पाण्डिचेरी में इस अधिनियम द्वारा विस्तारित किसी अधिनियम के उपबन्धों को पाण्डिचेरी में प्रभावी करने के लिए कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार, जैसा कि अवसर के अनुसार अपेक्षित हो, आदेश द्वारा ऐसे उपबन्ध कर सकेगी या ऐसे निदेश दे सकेगी जो ऐसे अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हों, और जो कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक प्रतीत हों, और ऐसे किसी आदेश में, पाण्डिचेरी में ऐसे अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के समक्ष, लम्बित किसी मामले को, किसी तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण को, निपटारे के लिए अन्तरण करने का उपबंध हो सकेगा :
परन्तु किसी अधिनियम की बाबत इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश, ऐसी तारीख से, जिसको पाण्डिचेरी में ऐसा अधिनियम प्रवृत्त होता है, दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात्, नहीं किया जाएगा और किसी ऐसे अधिनियम की बाबत जिसके उपबन्ध पाण्डिचेरी में विभिन्न तारीखों पर प्रवर्तित किए जाते हैं, उक्त दो वर्ष की अवधि की गणना, धारा 3 की उपधारा (2) के परन्तुक में विनिर्दिष्ट सुसंगत उपबन्ध के प्रारम्भ के प्रति निर्देश से की जाएगी ।
अनुसूची
[धारा 3 (1) देखिए]
भाग 1
|
वर्ष |
संख्यांक |
संक्षिप्त नाम |
उपांतरण |
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1 |
2 |
3 |
4 |
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1839 |
32 |
इन्टरेस्ट ऐक्ट, 1839 |
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1850 |
12 |
लोक लेखापाल चूक अधिनियम, 1850 |
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1850 |
18 |
न्यायिक अधिकारी संरक्षण अधिनियम, 1850 |
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1850 |
21 |
जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850 |
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|
1851 |
8 |
भारतीय पथकर अधिनियम, 1851 |
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|
1855 |
12 |
विधिक प्रतिनिधि वाद अधिनियम, 1855 |
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|
1855 |
13 |
भारतीय घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 |
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|
1856 |
9 |
भारतीय वहन-पत्र अधिनियम, 1856 |
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|
1856 |
12 |
सिविल न्यायालय अमीन अधिनियम, 1856 |
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|
1859 |
9 |
समपहरण अधिनियम, 1859 |
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|
1863 |
23 |
बंजर भूमि (दावे) अधिनियम, 1863 |
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1864 |
15 |
भारतीय पथकर अधिनियम, 1864 |
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1865 |
3 |
वाहक अधिनियम, 1865 |
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1866 |
21 |
संपरिवर्ती विवाह विघटन अधिनियम, 1866 |
धारा 1 के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- 2. इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" ।
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1872 |
9 |
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 |
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|
1872 |
15 |
भारतीय क्रिश्चियन विवाह अधिनियम, 1872 |
धारा 1 के अन्त में निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1873 |
10 |
इण्डियन ओथ्स ऐक्ट, 1873 |
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|
1875 |
9 |
भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 |
धारा 1 के अन्त में निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1880 |
1 |
धार्मिक सोसाइटी अधिनियम, 1880 |
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1880 |
12 |
काजी अधिनियम, 1880 |
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|
1880 |
13 |
टीका अधिनियम, 1880 |
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|
1882 |
4 |
संपत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 |
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1 |
2 |
3 |
4 |
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1882 |
5 |
भारतीय सुखाचार अधिनियम, 1882 |
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|
1882 |
7 |
मुखतारनामा अधिनियम, 1882 |
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1887 |
7 |
वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1887 |
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|
1887 |
9 |
प्रांतीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 |
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|
1890 |
1 |
राजस्व वसूली अधिनियम, 1890 |
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|
1890 |
8 |
संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 |
धारा 1 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1891 |
18 |
बैंककार बही साक्ष्य अधिनियम, 1891 |
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|
1893 |
4 |
विभाजन अधिनियम, 1893 |
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|
1894 |
9 |
बन्दी अधिनियम, 1894 |
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|
1897 |
3 |
महामारी अधिनियम, 1897 |
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|
1899 |
4 |
सरकारी इमारत अधिनियम, 1899 |
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1900 |
3 |
बन्दी अधिनियम, 1900 |
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1908 |
16 |
भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 |
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1914 |
9 |
स्थानीय प्राधिकरण उधार अधिनियम, 1914 |
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|
1916 |
15 |
हिन्दू संपत्ति व्ययन अधिनियम, 1916 |
धारा 1 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" ।
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1917 |
5 |
अभिलेख नाशकरण अधिनियम, 1917 |
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1918 |
10 |
अतिब्याज उधार अधिनियम, 1918 |
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|
1919 |
12 |
विष अधिनियम, 1919 |
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|
1920 |
5 |
प्रान्तीय दिवाला अधिनियम, 1920 |
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|
1920 |
10 |
भारतीय प्रतिभूति अधिनियम, 1920 |
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|
1920 |
15 |
भारतीय रेडक्रास सोसाइटी अधिनियम, 1920 |
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|
1920 |
33 |
बन्दी शनाख्त अधिनियम, 1920 |
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|
1921 |
18 |
भरणपोषण आदेश प्रवर्तन अधिनियम, 1921 |
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|
1922 |
7 |
उत्प्रवास अधिनियम, 1922 |
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|
1922 |
22 |
पुलिस (द्रोह-उद्दीपन) अधिनियम, 1922 |
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|
1923 |
5 |
भारतीय बायलर अधिनियम, 1923 |
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|
1 |
2 |
3 |
4 |
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1928 |
12 |
हिंदू विरासत (निर्योग्यता निराकरण) अधिनियम, 1928 |
धारा 1 की उपधारा (3) में किसी व्यक्ति को यह लागू नहीं होगा" शब्दों के स्थान पर निम्नलिखित रखें, अर्थात् :- या पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1929 |
19 |
बाल-विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 |
धारा 1 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1930 |
3 |
माल विक्रय अधिनियम, 1930 |
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1930 |
30 |
हिन्दू विद्याधन अधिनियम, 1930 |
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1936 |
3 |
पारसी विवाह और विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1936 |
धारा 1 की उपधारा (2) में परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु यह और कि इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1937 |
26 |
मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) अधिनियम, 1937 |
धारा 1 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1939 |
8 |
मुस्लिम विवाह-विघटन अधिनियम, 1939 |
धारा 1 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
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1939 |
30 |
वाणिज्यिक दस्तावेज साक्ष्य अधिनियम, 1939 |
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1940 |
10 |
माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 |
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|
1943 |
9 |
पारस्परिकता अधिनियम, 1943 |
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|
1944 |
38 |
दण्ड विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 |
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|
1945 |
.. |
अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि और बैंक अधिनियम, 1945 |
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|
1947 |
43 |
संयुक्त राष्ट्र (सुरक्षा परिषद्) अधिनियम, 1947 |
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|
1947 |
46 |
संयुक्त राष्ट्र (विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां) अधिनियम, 1947 |
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1948 |
41 |
राजनयिक और कौंसलीय आफिसर (शपथ और फीस) अधिनियम, 1948 |
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1950 |
29 |
बन्दी अन्तरण अधिनियम, 1950 |
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1950 |
64 |
सड़क परिवहन निगम अधिनियम, 1950 |
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|
1 |
2 |
3 |
4 |
|
1950 |
74 |
तारयंत्र संबंधी तार (विधिविरुद्ध कब्जा) अधिनियम, 1950 |
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1951 |
50 |
टैरिफ कमीशन ऐक्ट, 1951 |
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|
1951 |
54 |
कम्पनी (राष्ट्रीय निधियों में दान) अधिनियम, 1951 |
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|
1951 |
61 |
अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 |
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|
1952 |
35 |
खान अधिनियम, 1952 |
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|
1952 |
53 |
नोटरी अधिनियम, 1952 |
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|
1954 |
29 |
वक्फ अधिनियम, 1954 |
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|
1955 |
32 |
बन्दी (न्यायालयों में उपस्थिति) अधिनियम, 1955 |
|
|
1955 |
42 |
पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम, 1955 |
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|
1955 |
45 |
श्रमजीवी पत्रकार (सेवा की शर्तें) और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1955 |
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|
1956 |
3 |
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 |
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|
1956 |
31 |
जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 |
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|
1956 |
32 |
हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 |
धारा 3 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- “(2क) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
|
1956 |
42 |
प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 |
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|
1956 |
78 |
हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 |
धारा 2 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- “(2क) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोंसांओं को लागू नहीं होगी ।" । |
|
1956 |
93 |
अल्पवय व्यक्ति (अपहानिकर प्रकाशन) अधिनियम, 1956 |
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|
1956 |
96 |
गन्दी बस्ती क्षेत्र (सुधार तथा उन्मूलन) अधिनियम, 1956 |
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|
1956 |
104 |
स्त्री तथा लड़की अनैतिक व्यापार दमन अधिनियम, 1956 |
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|
1958 |
20 |
अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 |
|
|
1958 |
21 |
धान कुटाई उद्योग (विनियमन) अधिनियम, 1958 |
|
|
1958 |
29 |
श्रमजीवी पत्रकार (मजदूरी दर नियतन) अधिनियम, 1958 |
|
|
1 |
2 |
3 |
4 |
|
1958 |
42 |
अन्तरराष्ट्रीय वित्त निगम (प्रास्थिति, उन्मुक्ति तथा विशेषाधिकार) अधिनियम, 1958 |
|
|
1960 |
6 |
जिनेवा कन्वेंशन अधिनियम, 1960 |
|
|
1960 |
32 |
अन्तरराष्ट्रीय विकास संगम (प्रास्थिति, उन्मुक्ति तथा विशेषाधिकार) अधिनियम, 1960 |
|
|
1960 |
63 |
अधिमानी शेयर (लाभांशों का विनियमन) अधिनयम, 1960 |
धारा 1 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- “(3) उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के उपबंध पाण्डिचेरी संघ राज्यक्षेत्र को लागू होने के संबंध में, अनुसूची में विनिर्दिष्ट उपान्तरों के अधीन रहते हुए, प्रभावी होंगे ।" । धारा 7 के पश्चात् निम्नलिखित जोड़ें :- ‘अनुसूची [धारा 1 (3) देखिए] पाण्डिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र को लागू होने के संबंध में इस अधिनियम में उपान्तरण 1. धारा 3 और धारा 4 का लोप किया जाएगा । 2. धारा 4क में (त्) अनुबद्ध लाभांश ; और (त्त्) धारा 3 की उपधारा (3) में यथाविनिर्दिष्ट अनुबद्ध लाभांश के ग्यारह प्रतिशत के बराबर रकम के योग के साढ़े सत्ताईस प्रतिशत से अधिक नहीं होगी ।" शब्दों, कोष्ठकों और अंकों के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :- अनुबद्ध लाभांश का साढ़े सत्ताईस प्रतिशत : परन्तु उस दशा में जिसमें वे अधिमानी शेयर जिनकी बाबत लाभांश घोषित किया गया है या संदत्त किया जाता है उस कम्पनी की अधिमानी शेयर पूंजी का भाग है जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 294क के अधीन जारी की गई अधिसूचना के अधीन अपने प्रभार्य कर से उस अधिनियम के अधीन कटौती का हकदार है, अनुबद्ध लाभांश के साढ़े सत्ताईस प्रतिशत के प्रति निर्देश का निम्न रूप में अर्थ लगाया जाएगा, अर्थात् :- (i) जहां, ऐसे अधिमानी शेयर की बाबत 1965 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष की बाबत अनुबद्ध लाभांश घोषित किया जाता है या संदत्त किया जाता है, वहां उक्त साढ़े सत्ताईस प्रतिशत जिसमें से उसके पैंतालीस प्रतिशत कटौती की जाएगी : (ii) जहां, 1966 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष की बाबत ऐसा लाभांश घोषित किया जाता है या संदत्त किया जाता है, वहां उक्त साढ़े सत्ताईस प्रतिशत जिसमें से उसके पच्चीस प्रतिशत के बराबर कटौती की जाएगी :
(iii) जहां, 1967 के अप्रैल के प्रथम दिन को या 1968 के अप्रैल के प्रथम दिन को या 1969 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष के सुसंगत पूर्ववर्ष की बाबत ऐसा लाभांश घोषित किया जाता है या संदत्त किया जाता है, वहां उक्त साढ़े सत्ताईस प्रतिशत जिसमें से उसके दस प्रतिशत के बराबर कटौती की जाएगी । स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि इस धारा में कम्पनी द्वारा संदेय आय-कर के कारण किसी लाभांश से की गई कटौती के प्रति निर्देश के अन्तर्गत उस लाभांश में से उस कम्पनी द्वारा आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 194 के अधीन काटी गई कोई रकम नहीं आती है ।" । 3. धारा 5 की उपधारा (2) का लोप किया जाएगा । 4. धारा 6 का लोप किया जाएगा ।
|
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1961 |
25 |
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 |
धारा 3 की उपधारा (1) में,- (1) खण्ड (क) में मद्रास" का लोप करें : (2) खण्ड (गग) को (1963 के विनियम संख्यांक 8 द्वारा अन्तःस्थापित) खण्ड (गगग) के रूप में पुनःअक्षरांकित करें और इस प्रकार पुनःअक्षरांकित खण्ड के पूर्व निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें :- (गग) मद्रास राज्य तथा पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के लिए मद्रास विधिज्ञ परिषद् ;" । धारा 58क के पश्चात् अन्तःस्थापित करें :- 58कक. पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में विशेष उपबन्ध :- (1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे सभी व्यक्ति जो उस तारीख से ठीक पूर्व, जिसको अध्याय 3 के उपबन्ध पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किए गए हैं, उक्त संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन (चाहे अभिवचन द्वारा या कार्य द्वारा या दोनों के द्वारा) विधि-व्यवसाय करने के हकदार थे, या जो यदि वे उक्त तारीख को लोक सेवा में होते तो इस प्रकार हकदार होते, धारा 17 की उपधारा (1) के खण्ड (क) के प्रयोजनों के लिए, भारतीय विधिज्ञ परिषद् अधिनियम, 1926 (1926 का 38) के अधीन किसी उच्च न्यायालय की नामावली में अधिवक्ता के रूप में प्रविष्ट किए गए व्यक्ति समझे जाएंगे, और प्रत्येक ऐसा व्यक्ति ऐसी अवधि के भीतर, जो मद्रास विधिज्ञ परिषद् द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए इस निमित्त किए गए आवेदन पर, उक्त संघ राज्यक्षेत्र के लिए रखी गई राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में प्रविष्ट किया जा सकेगा । (2) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस तारीख से ठीक पूर्व, जिसको अध्याय 4 के उपबन्ध पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किए गए हैं, उक्त संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किसी विधि के उपबंधों के आधार पर (चाहे अभिवचन द्वारा या कार्य द्वारा तथा दोनों के द्वारा) या किसी अन्य प्रकार से विधि-व्यवसाय करता था और जो उपधारा (1) के अधीन अधिवक्ता के रूप में नामांकित किए जाने का चयन नहीं करता है या नामांकित किए जाने के लिए अर्हित नहीं है पांडिचेरी (विधि विस्तारण) अधिनियम, 1968 द्वारा ऐसी विधि के सुसंगत उपबंधों के निरसन के होते हुए भी, किसी न्यायालय में, या राजस्व कार्यालय में, या किसी प्राधिकारी या व्यक्ति के समक्ष विधि-व्यवसाय की बाबत उन्हीं अधिकारों का उपभोग करता रहेगा और उसी प्राधिकारी की अनुशासनिक अधिकारिता के अधीन बना रहेगा, जिसका, उक्त तारीख के ठीक पूर्व, यथास्थिति, उसने उपभोग किया था या जिसके अधीन वह था और तद्नुसार पूर्वोक्त विधि के सुसंगत उपबंध, ऐसे व्यक्तियों के संबंध में वैसे ही प्रभावी होंगे, मानो वे निरसित न किए गए हों ।" । |
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1961 |
28 |
दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 |
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1961 |
45 |
विदेशी पंचाट (मान्यता और प्रवर्तन) अधिनियम, 1961 |
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भाग 2
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वर्ष |
संख्यांक |
संक्षिप्त नाम |
किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त |
उपांतरण |
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1 |
2 |
3 |
4 |
5 |
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1870 |
7 |
न्यायालय फीस अधिनियम, 1870 |
अंदमान और निकोबार द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र में 1966 के अगस्त के प्रथम दिन को यथा प्रवृत्त । |
धारा 2 के खंड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित रखें- ‘(ख) पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में राज्य सरकार" से उसका प्रशासक अभिप्रेत है ।‘ ।
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1899 |
2 |
भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 |
मद्रास राज्य में 1966 के अगस्त के प्रथम दिन को यथा प्रवृत्त । |
धारा 2 के खंड (25) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें :- (26) पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में राज्य सरकार से उसका प्रशासक अभिप्रेत है ।" । धारा 3 के प्रथम और द्वितीय परन्तुक का लोप करें । धारा 19क में, - (क) “मद्रास प्रेसिडेन्सी" के स्थान पर पांडिचेरी का संघ राज्यक्षेत्र" रखें ; (ख) “प्रेसिडेन्सी" के स्थान पर संघ राज्यक्षेत्र" रखें । धारा 57 की उपधारा (1) के खंड (घ) के अन्त में आने वाले “शब्द और" का लोप करें और खंड (ङ) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :- “(ङङ) उस दशा में जिसमें कि वह पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र में उद्भूत हुआ है मद्रास उच्च न्यायालय को" । धारा 75क में, उपधारा (2) के स्थान पर, निम्नलिखित प्रतिस्थापित करें, अर्थात् :-
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(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र विधान सभा के समक्ष, जब वह सत्र में हो, 14 दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । एक अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या, जिसमें वह इस प्रकार रखा गया है या ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व विधान सभा उस नियम में कोई परिवर्तन करती है या परिवर्तन करने के लिए विनिश्चय करती है कि ऐसा नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह नियम, यथास्थिति, परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।" । अनुसूची 1- (i) प्रविष्टि 9 में छूट का लोप करें ; (ii) प्रविष्टि 15 में मद्रास कोर्ट फीस एण्ड सूट्स रेग्यूलेशन ऐक्ट, 1955 (1955 का मद्रास अधिनियम 14)" के स्थान पर न्यायालय फीस अधिनियम, 1870 (1870 का 7)" रखें; (iii) प्रविष्टि 20क का लोप करे ; (iv) प्रविष्टि 62 के खण्ड (घ) में एडमिनिस्ट्रेटर जनरल ऐक्ट, 1913 (1913 का केन्द्रीय अधिनियम 3), धारा 25" के स्थान पर महाप्रशासक अधिनियम, 1963 (1963 का 45), धारा 22" रखें ।
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1908 |
5 |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 |
मद्रास राज्य में 1966 के अगस्त के प्रथम दिन को यथा प्रवृत्त । |
धारा 45 के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें, अर्थात् :-
“45क. पांडिचेरी में संहिता के प्रारम्भ होने से पूर्व पारित या की गई डिक्रियों, आदि का निष्पादन-पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र में किसी सिविल न्यायालय द्वारा इस संहिता के प्रारम्भ के पूर्व पारित या किए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के बारे में निष्पादन के प्रयोजन के लिए यह समझा जाएगा कि वह इस संहिता के अधीन पारित किया गया है |
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