हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1980
(1980 का अधिनियम संख्यांक 70)
[27 दिसम्बर, 1980]
बाइसिकलों और उनके संघटक भागों तथा उपसाधनों का, जो देश की अर्थव्यवस्था
की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं, विनिर्माण, उत्पादन और वितरण
जारी रखना सुनिश्चित करके जनसाधारण के हित-साधन के लिए
हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड के उपक्रमों
का उचित प्रबन्ध सुनिश्चित करने की दृष्टि से उनके
उपक्रमों के अर्जन का तथा उससे
संबंधित या उसके आनुषंगिक
विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में उल्लिखित वस्तुओं का, अर्थात् बाइसिकलों और उनके संघटक भागों तथा उपसाधनों का, विनिर्माण और उत्पादन करती थीं ;
और हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड के उपक्रमों का प्रबंध केन्द्रीय सरकार ने उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) के उपबंधों के अधीन ग्रहण कर लिया था ;
और हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड के उपक्रमों का अर्जन यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि दोनों कंपनियों के उपक्रम, पूर्वोक्त वस्तुओं का, जो देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं, विनिर्माण, उत्पादन और वितरण जारी रखकर जनसाधारण का हित-साधन करते रहें ;
भारत गणराज्य के इकतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1980 है ।
(2) यह 15 अक्तूबर, 1980 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से 15 अक्तूबर, 1980 अभिप्रेत है ;
(ख) आयुक्त" से धारा 15 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है ;
(ग) अभिरक्षक" से दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के या दोनों कंपनियों के उपक्रमों का प्रबंध ग्रहण करने और चलाने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अभिरक्षक अभिप्रेत है ;
(घ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(च) सेन रेले लिमिटेड" के अंतर्गत, सेन एण्ड पंडित इंडस्ट्रीज लिमिटेड, एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (लग्स) प्राइवेट लिमिटेड, एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (फोर्जिंग्स) प्राइवेट लिमिटेड, एनसिलियरी इंस्डस्ट्रीज (क्रैंक्स) प्राइवेट लिमिटेड और नओखाली मशीन टूल्स लिमिटेड हैं । इन सभी के रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, 1, मिडिलटन स्ट्रीट, कलकत्ता में हैं ;
(छ) इस अधिनियम के किसी उपबंध के संबंध में, विनिर्दिष्ट तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार उस उपबंध के प्रयोजनों के लिए अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी ;
(ज) दोनों कंपनियों" से हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड अभिप्रेत हैं, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथा परिभाषित कंपनियां हैं और जिनके रजिस्ट्रीकृत कार्यालय क्रमशः बिरला ग्राम, नागदा (मध्य प्रदेश) और 1, मिडिलटन स्ट्रीट, कलकत्ता में हैं ;
(झ) उन शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 2
दोनों कंपनियों के उपक्रमों का अर्जन
3. दोनों कंपनियों के उपक्रमों का केन्द्रीय सरकार को अंतरण और उनका उसमें निहित होना-नियत दिन को दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी के उपक्रम और ऐसे उपक्रमों के संबंध में दोनों कंपनियों के अधिकार, हक और हित, इस अधिनियम के आधार पर, केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) धारा 3 में निर्दिष्ट प्रत्येक कंपनी के उपक्रमों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अंतर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, पट्टाधृतियां, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार और सभी स्थावर तथा जंगम सम्पत्ति, जिसके अंतर्गत भूमि, भवन, कर्मशालाएं, स्टोर, उपकरण, मशीनरी और उपस्कर, रोकड़ बाकी, हाथ की रोकड़, चैक, मांगदेय ड्राफ्ट, आरक्षित निधियां, विनिधान, बही ऋण और ऐसी सम्पत्ति में या उससे उत्पन्न होने वाले वे सभी अन्य अधिकार और हित हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व ऐसी कंपनी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में, चाहे भारत में या भारत के बाहर थे और सभी लेखा बहियां, रजिस्टर और तत्संबंधी अन्य सभी दस्तावेजें हैं, चाहे वे किसी भी प्रकार की हों, और यह समझा जाएगा कि उनके अंतर्गत धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दायित्व भी हैं ।
(2) यथापूर्वोक्त सभी संपत्तियां, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई हैं, ऐसे निहित होने के आधार पर किसी भी न्यास, बाध्यता, बंधक, भार, धारणाधिकार और उन्हें प्रभावित करने वाले अन्य सभी विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएंगी और किसी न्यायालय की ऐसी कुर्की, व्यादेश, डिक्री या आदेश को, जो ऐसी संपत्तियों के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बंधित करे या ऐसी संपूर्ण संपत्ति या उसके किसी भाग के संबंध में किसी रिसीवर को नियुक्त करे, वापस ले लिया गया समझा जाएगा ।
(3) किसी ऐसी संपत्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, प्रत्येक बंधकदार और किसी ऐसी संपत्ति में या उसके संबंध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे समय के अंदर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ऐसे बंधक, भार, धारणाधिकार और अन्य हित की सूचना आयुक्त को देगा ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी संपत्ति का बंधकदार या ऐसी किसी संपत्ति में या उसके संबंध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित रखने वाला अन्य व्यक्ति, उस कंपनी के संबंध में जो ऐसी संपत्ति की स्वामी है, पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट रकमों में से और धारा 8 के अधीन अवधारित रकमों में से भी बंधक धन या अन्य शोध्य रकमों के पूर्णतः या भागतः संदाय के लिए अपने अधिकारों और हितों के अनुसार दावा करने का हकदार होगा, किन्तु ऐसा कोई बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित किसी ऐसी संपत्ति के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है ।
(5) ऐसे किसी उपक्रम के संबंध में जो नियत दिन के ठीक पूर्व किसी भी समय धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, दोनों कंपनियों में से किसी को प्रदत्त और नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त कोई अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत, ऐसे उपक्रम के संबंध में और उसके प्रयोजनों के लिए ऐसे दिन को और उसके पश्चात्, अपने प्रकट शब्दानुसार प्रवृत्त बनी रहेगी तथा धारा 6 के अधीन ऐसे उपक्रम के किसी सरकारी कंपनी में निहित होने की तारीख से ही वह सरकारी कंपनी ऐसी अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत में इस प्रकार प्रतिस्थापित हो गई समझी जाएगी मानो ऐसी अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत उस सरकारी कंपनी को प्रदत्त की गई थी और वह सरकारी कंपनी उसे उस शेष अवधि के लिए धारण करेगी जिसके लिए उसे, उसके निबंधनों के अनुसार, वह कंपनी धारण करती जिसे वह प्रदत्त की गई थी ।
(6) यदि नियत दिन को दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के उपक्रम के बारे में धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में दोनों कंपनियों में से किसी के द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित कोई वाद या की गई कोई अपील या अन्य कार्यवाही, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो, लम्बित है तो दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के उपक्रमों के अंतरण या इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के कारण उसका उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी रूप में प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध या जहां दोनों कंपनियों के उपक्रम धारा 6 के अधीन सरकारी कंपनियों में निहित होने का निदेश दिया गया है, वहां संपृक्त सरकारी कंपनी द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी और प्रवर्तित की जा सकेगी ।
5. कुछ पूर्व दायित्वों के लिए दोनों कंपनियों के स्वामियों का दायी होना-(1) नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि के संबंध में दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी का, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दायित्व से भिन्न प्रत्येक दायित्व, संबंधित कंपनी का दायित्व होगा और उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा, न कि केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या, जहां दोनों कंपनियों के उपक्रम धारा 6 के अधीन सरकारी कंपनियों में निहित होने का निदेश दिया गया है वहां, सम्पृक्त सरकारी कंपनी के विरुद्ध ।
(2) ऐसी किसी सामग्री के संबंध में उत्पन्न होने वाला दायित्व, जो उस कंपनी के उपक्रमों का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण कर लिए जाने के पश्चात् दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी को प्रदाय की गई है, नियत दिन से ही, केन्द्रीय सरकार या पूर्वोक्त संपृक्त सरकारी कंपनी का दायित्व हो जाएगा और जब और जैसे ही ऐसे प्रदाय के लिए प्रतिसंदाय शोध्य और संदेय होगा तब और वैसे ही वह सरकार या सरकारी कंपनी उस दायित्व का उन्मोचन करेगी ।
(3) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि-
(क) इस धारा में या इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी का कोई दायित्व, जो उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दायित्व से भिन्न है, केन्द्रीय सरकार या, जहां दोनों कंपनियों के उपक्रम धारा 6 के अधीन सरकारी कंपनियों में निहित होने का निदेश दिया गया है वहां, संपृक्त सरकारी कंपनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा,
(ख) दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के उपक्रमों के संबंध में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण का कोई अधिनिर्णय, डिक्री या आदेश, जो नियत दिन के पूर्व उत्पन्न किसी मामले, दावे या विवाद के बारे में, जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में मामला, दावा या विवाद नहीं है, नियत दिन को या उसके पश्चात् पारित किया गया है, केन्द्रीय सरकार या, जहां दोनों कंपनियों के उपक्रम धारा 6 के अधीन सरकारी कंपनियों में निहित होने का निदेश दिया गया है वहां, संपृक्त सरकारी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ;
(ग) तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबंध के, नियत दिन के पूर्व किए गए, उल्लंघन के लिए दोनों कंपनियों में से किसी कम्पनी द्वारा उपगत कोई दायित्व केन्द्रीय सरकार या, जहां दोनों कंपनियों के उपक्रम धारा 6 के अधीन सरकारी कंपनियों में निहित होने का निदेश दिया गया है वहां, संपृक्त सरकारी कंपनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ।
6. दोनों कंपनियों के उपक्रमों के दो सरकारी कंपनियों में निहित होने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे, अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि दोनों कंपनियों के उपक्रमों में से प्रत्येक उपक्रम और उनके अपने-अपने ऐसे उपक्रमों के संबंध में दोनों कंपनियों के अधिकार, हक और हित, जो धारा 3 के अधीन उस सरकार में निहित हो गए हैं, और दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी के ऐसे दायित्व जो धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट हैं, केन्द्रीय सरकार में निहित रहने के बजाय या तो अधिसूचना की तारीख को या उससे पहले या बाद की ऐसी तारीख को (जो नियत दिन से पूर्व की तारीख न हो) जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, दो सरकारी कंपनियों में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी के उपक्रमों के संबंध में उसके अधिकार, हक और हित तथा धारा 5 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट दायित्व, उपधारा (1) के अधीन दो सरकारी कंपनियों में निहित हो गए हैं, वहां वे सरकारी कंपनियां ऐसे निहित होने की तारीख से ही ऐसे उपक्रमों के संबंध में स्वामी समझी जाएंगी और ऐसे उपक्रमों के संबंध में केन्द्रीय सरकार के सभी अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से, उन सरकारी कंपनियों के क्रमशः अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
अध्याय 3
रकमों का संदाय
7. रकम का संदाय-केन्द्रीय सरकार, दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी के उपक्रम और ऐसे उपक्रमों के संबंध में दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी के अधिकार, हक और हित, धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित होने के लिए, कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी को नकद और अध्याय 6 में विनिर्दिष्ट रीति से उतनी रकम देगी जो पहली अनुसूची में उस कंपनी के नाम के सामने विनिर्दिष्ट है ।
8. अतिरिक्त रकमों का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, दोनों कंपनियों के उपक्रमों के प्रबंध से उनको वंचित किए जाने के लिए, प्रत्येक कंपनी को उस तारीख से प्रारम्भ होकर जिसको, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) के उपबंधों के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए आदेशों के अनुसरण में, उस कंपनी के उपक्रमों का प्रबन्ध ग्रहण किया गया था, नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, दूसरी अनुसूची में उस कंपनी के नाम के सामने विनिर्दिष्ट दर से संगणित रकम, नकद देगी ।
(2) धारा 7 में विनिर्दिष्ट रकम और उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार संगणित रकम पर, नियत दिन से प्रारम्भ होकर केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को उस रकम का संदाय किए जाने की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज दिया जाएगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार, दोनों कंपनियों को उपधारा (1) और (2) के उपबंधों के अनुसार अवधारित रकम उस रकम के अतिरिक्त देगी, जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट है ।
अध्याय 4
दोनों कंपनियों के उपक्रमों का प्रबन्ध आदि
9. दोनों कंपनियों के उपक्रमों का प्रबंध आदि-(1) दोनों कंपनियों में से प्रत्येक के उपक्रमों के, जिनके संबंध में अधिकार, हक और हित धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन, नियंत्रण और प्रबंध-
(क) जहां केन्द्रीय सरकार ने धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया है वहां उस निदेश में विनिर्दिष्ट सरकारी कंपनी में निहित होगा ;
(ख) जहां केन्द्रीय सरकार ने ऐसा कोई निदेश नहीं दिया है वहां केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (2) के अधीन नियुक्त एक या अधिक अभिरक्षकों में निहित होगा,
और तब, यथास्थिति, इस प्रकार विनिर्दिष्ट सरकारी कंपनी या इस प्रकार नियुक्त एक या अधिक अभिरक्षक, अन्य सभी व्यक्तियों का अपवर्जन करते हुए, ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग करने और ऐसे सभी कार्य करने के हकदार होंगे, जिन शक्तियों का प्रयोग करने और जिन कार्यों को करने के लिए अपने उपक्रमों के संबंध में दोनों कंपनियों में से कोई कंपनी या दोनों कंपनियां प्राधिकृत हैं ।
(2) केन्द्रीय सरकार, दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के या दोनों कंपनियों के उन उपक्रमों के लिए, जिनके संबंध में उसने धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश नहीं किया है, अभिरक्षक या अभिरक्षकों के रूप में एक या अधिक व्यक्तियों को या किसी सरकारी कंपनी को नियुक्त कर सकेगी ।
(3) इस प्रकार नियुक्त एक या अधिक अभिरक्षक दोनों कम्पनियों के उपक्रमों की निधियों में से ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेंगे जो केन्द्रीय सरकार नियत करे और केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेंगे ।
10. दोनों कंपनियों के उपक्रमों के प्रबंध के भारसाधक व्यक्तियों का सभी आस्तियां आदि परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) दोनों कंपनियों के उपक्रमों का प्रबंध सरकारी कंपनियों में निहित हो जाने पर या अभिरक्षक या अभिरक्षकों की नियुक्ति हो जाने पर, ऐसे निहित होने के या ऐसी नियुक्ति के ठीक पहले दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध के भारसाधक सभी व्यक्ति, यथास्थिति, संपृक्त सरकारी कंपनी या अभिरक्षक या अभिरक्षकों को उन उपक्रमों से संबंधित वे सभी आस्तियां, लेखाबहियां, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज, जो उनकी अभिरक्षा में हैं, परिदत्त करने के लिए आबद्ध होंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार, सरकारी कंपनियों, अभिरक्षक या अभिरक्षकों को ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह मामले की परिस्थितियों में वांछनीय समझे और ऐसी सरकारी कंपनियां या एक या अधिक अभिरक्षक भी, यदि ऐसा करना आवश्यक समझा जाए तो, केन्द्रीय सरकार को किसी भी समय उस रीति के बारे में, जिसमें दोनों कंपनियों के उपक्रमों का प्रबंध संचालित किया जाएगा या किसी अन्य ऐसे विषय के बारे में जो ऐसे प्रबंध के दौरान उत्पन्न हो, अनुदेश देने के लिए आवेदन कर सकेंगे ।
11. व्यक्तियों का अपने कब्जे में की आस्तियों आदि का लेखा जोखा देने का कर्तव्य-(1) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसके कब्जे या नियंत्रण में नियत दिन को, दोनों कंपनियों के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम से संबंधित, कोई आस्तियां, बहियां, दस्तावेजें या अन्य कागजपत्र हैं, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में या सरकारी कंपनियों में निहित हो गए हैं और जो दोनों कंपनियों के हैं या, यदि दोनों कंपनियों के स्वामित्वाधीन उपक्रम केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कंपनियों में निहित न होते तो उनके होते, उक्त आस्तियों, बहियों, दस्तावेजों और अन्य कागजपत्रों का लेखा जोखा केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कंपनियों को देने के लिए दायी होगा और वह उनका परिदान केन्द्रीय सरकार को या ऐसी सरकारी कंपनियों को या ऐसे व्यक्ति अथवा व्यक्तियों को करेगा जिसे या जिन्हें केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी इस निमित विनिर्दिष्ट करे ।
(2) केन्द्रीय सरकार या पूर्वोक्त सरकारी कंपनियां दोनों कंपनियों के उन उपक्रमों का, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनियों में निहित हो गए हैं, कब्जा लेने के लिए सब आवश्यक कदम उठा सकेंगी या उठवा सकेंगी ।
(3) दोनों कंपनियां केन्द्रीय सरकार को अपनी उन सब संपत्तियों और आस्तियों की, जो नियत दिन को उन उपक्रमों की हैं जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, पूर्ण सूची ऐसी अवधि के भीतर देगी जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अनुज्ञात करे तथा इस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार या पूर्वोक्त सरकारी कंपनियां दोनों कंपनियों को सब युक्तियुक्त सुविधाएं देंगी ।
12. लेखे और लेखा परीक्षा-दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी या दोनों कंपनियों के उपक्रमों का/के अभिरक्षक संपृक्त कंपनी या कंपनियों के उपक्रमों का लेखा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रखेगा/रखेंगे जो विहित की जाएं और कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबंध इस प्रकार रखे गए लेखाओं की लेखा परीक्षा को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी कंपनी के लेखाओं की लेखा परीक्षा को लागू होते हैं ।
अध्याय 5
दोनों कंपनियों के कर्मचारियों के बारे में उपबंध
13. कर्मचारियों का बना रहना-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के किसी उपक्रम में नियोजित रहा है-
(क) नियत दिन से ही, केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी हो जाएगा, और
(ख) जहां दोनों कंपनियों के उपक्रम धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन सरकारी कंपनियों में निहित होने का निदेश दिया गया है वहां वह ऐसे निहित होने की या अंतरण की तारीख से ही संपृक्त सरकारी कंपनी का कर्मचारी हो जाएगा,
और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी के अधीन पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद या सेवा धारण करेगा जो उसे उस दशा में अनुज्ञेय होते जब ऐसा निधान न हुआ होता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी में उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक कि उसके पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तों में, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तन नहीं कर दिया जाता ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के किसी उपक्रम में नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य सरकारी कंपनी को अंतरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
14. भविष्य निधि तथा अन्य निधियां-(1) जहां दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी ने अपने उपक्रमों में से किसी उपक्रम में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि, या अन्य निधि स्थापित की है वहां ऐसे अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन केन्द्रीय सरकार या किसी सरकारी कंपनी को अन्तरित हो गई हैं, संबंधित धनराशियां, ऐसी भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि या अन्य निधि में नियत दिन को जमा धनराशियों में से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगी ।
(2) उन धनराशियों के सम्बन्ध में, जो उपधारा (1) के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनी को अंतरित हो गई हैं, उस सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा ऐसी रीति से कार्रवाई की जाएगी जो विहित की जाए ।
अध्याय 6
संदाय आयुक्त
15. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार धारा 7 और धारा 8 के अधीन दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी को संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए, अधिसूचना द्वारा, संदाय आयुक्त नियुक्त करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार, आयुक्त की सहायता के लिए ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे, और तब आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से एक या अधिक को इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को प्राधिकृत किया जा सकेगा ।
(3) कोई व्यक्ति, जिसे आयुक्त ने अपने द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उसका वही प्रभाव होगा मानो वे उस व्यक्ति को इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदान की गई हैं और प्राधिकार दिए जाने के रूप में प्राप्त नहीं हुई हैं ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे ।
16. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर, आयुक्त को दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी को संदाय करने के लिए उतनी रकम नकद देगी जो-
(क) पहली अनुसूची में ऐसी कंपनी के नाम के सामने विनिर्दिष्ट रकम के बराबर है ; और
(ख) धारा 8 के अधीन दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी को संदेय रकम के बराबर है ।
(2) केन्द्रीय सरकार भारत के लोक लेखा में आयुक्त के नाम से एक निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई प्रत्येक रकम उक्त निक्षेप खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा ।
(3) आयुक्त, दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी के उपक्रमों के संबंध में जिसकी बाबत उसे इस अधिनियम के अधीन संदाय किया गया है, पृथक् अभिलेख रखेगा ।
(4) उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकम पर प्रोद्भूत ब्याज दोनों कंपनियों के फायदे के लिए काम आएगा ।
17. केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनियों की कुछ शक्तियां-(1) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी, नियत दिन के पश्चात् वसूल किया गया ऐसा कोई धन, जो दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी को उसके उन उपक्रमों के संबंध में शोध्य है जो केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनी में निहित हो गए हैं, अन्य सभी व्यक्तियों का अपवर्जन करके, विनिर्दिष्ट तारीख तक प्राप्त करने की हकदार इस बात के होते हुए भी होगी कि ऐसी वसूली नियत दिन के पूर्व की अवधि से संबंध रखती है ।
(2) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी आयुक्त के समक्ष ऐसे प्रत्येक संदाय के संबंध में दावा कर सकेगी जो नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि के संबंध में दोनों कंपनियों में से किसी के किसी ऐसे दायित्व का, जो धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दायित्व नहीं है, उन्मोचन करने के लिए उस सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा नियत दिन के पश्चात् किया गया है, और ऐसे प्रत्येक दावे को उन पूर्विकताओं के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी जो इस अधिनियम के अधीन उस विषय को प्राप्त है जिसके संबंध में ऐसे दायित्व का उन्मोचन केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा किया गया है ।
(3) इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, नियत दिन के पूर्व के किसी संव्यवहार के संबंध में दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के ऐसे दायित्व, जिनका विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व उन्मोचन नहीं किया गया है, संबंधित कंपनी के दायित्व होंगे ।
18. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना-प्रत्येक व्यक्ति, जिसका दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के विरुद्ध उसके स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम के संबंध में तीसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी विषय की बाबत कोई दावा है, ऐसा दावा विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर आयुक्त के समक्ष करेगा :
परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि दावेदार पर्याप्त कारण से तीस दिन की उक्त अवधि के भीतर दावा करने से निवारित रहा था, तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर दावा ग्रहण कर सकेगा, किन्तु इसके पश्चात् नहीं ।
19. दावों की पूर्विकता-धारा 18 के अधीन किए गए दावों को निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी, अर्थात् :-
(क) प्रवर्ग 1 को अन्य सभी प्रवर्गों पर अग्रता दी जाएगी और प्रवर्ग 2 को प्रवर्ग 3 पर अग्रता दी जाएगी और इसी प्रकार आगे भी ;
(ख) प्रत्येक प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावे एक समान होंगे और उनका पूर्णतः संदाय किया जाएगा, किन्तु यदि रकम ऐसे दावों को पूर्णतः चुकाने के लिए अपर्याप्त है तो वे समान अनुपातों में कम कर दिए जाएंगे और तद्नुसार उनका संदाय किया जाएगा ;
(ग) किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट विषय की बाबत दायित्व को चुकाने का प्रश्न केवल तभी उठेगा जब उसके ठीक उच्चतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट सभी दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अधिशेष रह जाएगा ।
20. दावों की परीक्षा-(1) धारा 18 के अधीन दावे प्राप्त होने पर आयुक्त दावों को तीसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकता के अनुसार क्रमबद्ध करेगा और उस क्रम के अनुसार उनकी परीक्षा करेगा ।
(2) यदि दावों की परीक्षा करने पर आयुक्त की यह राय हो कि इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त रकम किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावों को चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह ऐसे निम्नतर प्रवर्ग की बाबत दायित्वों की परीक्षा करे ।
21. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) तीसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकताओं के प्रति निर्देश से दावों की परीक्षा करने के पश्चात् आयुक्त कोई ऐसी तारीख नियत करेगा जिसको या जिससे पूर्व प्रत्येक दावेदार अपने दावे का सबूत फाइल करेगा ।
(2) इस प्रकार नियत तारीख के बारे में कम से कम चौदह दिन की सूचना अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में जो देश के अधिकांश भाग में पढ़ा जाता है और ऐसी प्रादेशिक भाषा के दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में, जो आयुक्त उपयुक्त समझे, विज्ञापन द्वारा दी जाएगी और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने दावे का सबूत आयुक्त के समक्ष ऐसे विज्ञापन में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर फाइल करे ।
(3) ऐसे प्रत्येक दावेदार को जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट अवधि के अंदर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहेगा, आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरणों से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) आयुक्त ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात् जो उसकी राय में आवश्यक है और संबंधित कंम्पनी को दावे का खंडन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदार को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् लिखित आदेश द्वारा दावे को पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार करेगा ।
(5) आयुक्त को अपने कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में, जिनके अन्तर्गत वह या वे स्थान भी हैं जहां वह अपनी बैठकें कर सकेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए उसे निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य भौतिक पदार्थ का, जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य है, प्रकटीकरण और पेश किया जाना ;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना ;
(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(6) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(7) कोई दावेदार, जो आयुक्त के विनिश्चय से असंतुष्ट है, ऐसे विनिश्चय के विरुद्ध अपील आरम्भिक अधिकारिता वाले उस प्रधान सिविल न्यायालय में कर सकेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर संपृक्त कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है :
परन्तु जहां किसी ऐसे व्यक्ति को जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है, आयुक्त नियुक्त किया जाता है वहां ऐसी अपील उस स्थान पर, जिसमें संपृक्त कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है, अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय को की जाएगी और ऐसी अपील उस उच्च न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा सुनी और निपटाई जाएगी ।
22. आयुक्त द्वारा धन का संवितरण-इस अधिनियम के अधीन दावा स्वीकार करने के पश्चात् ऐसे दावे की बाबत शोध्य रकम आयुक्त द्वारा ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को संदत्त की जाएगी जिसे या जिन्हें ऐसी धनराशि शोध्य है और ऐसा संदाय किए जाने पर ऐसे दावे की बाबत दोनों कंपनियों में से प्रत्येक कंपनी के दायित्व का उन्मोचन हो जाएगा ।
23. दोनों कंपनियों को रकमों का संवितरण-(1) यदि दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के उपक्रमों के संबंध में आयुक्त को संदत्त धन में से तीसरी अनुसूची में यथा विनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अतिशेष रह जाता है तो वह उस अतिशेष का संवितरण संबंधित कंपनी को करेगा ।
(2) जहां किसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य संपत्ति का कब्जा इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या किसी सरकारी कंपनी में निहित हो गया है किन्तु ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य संपत्ति दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी की नहीं है, वहां केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य संपत्ति को ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कब्जे में रखे रहे जिनके अधीन वे नियत दिन से ठीक पूर्व दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के कब्जे में थी ।
24. असंवितरित या दावा न की गई रकमों का साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना-यदि आयुक्त को संदत्त कोई धन, उस तारीख से जिसको आयुक्त का पद अंतिम रूप से किया जाता है, ठीक पूर्ववर्ती तारीख को असंवितरित या दावा न किया गया रहता है तो आयुकतउसे अपने पद के अन्तिम रूप से परिसमापन के पूर्व केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अंतरित करेगा ; किन्तु इस प्रकार अंतरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकेगा और उस संबंध में कार्यवाही इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अंतरण नहीं किया गया था और दावे के संदाय के लिए आदेश, यदि कोई है, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश समझा जाएगा ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
25. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
26. केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनियों द्वारा अनुसमर्थन के अभाव में संविदाओं का प्रभावहीन हो जाना-किसी सेवा, विक्रय या प्रदाय के लिए दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी द्वारा अपने उपक्रमों में से किसी उपक्रम के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, की गई प्रत्येक संविदा, जो नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त है, नियत दिन से तीस दिन की समाप्ति से ही प्रभावहीन हो जाएगी, जब तक कि ऐसी संविदा का उस अवधि की समाप्ति के पूर्व, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी ने, जिसमें ऐसा उपक्रम इस अधिनियम के अधीन निहित हुआ है, लिखित रूप में अनुसमर्थन नहीं कर दिया है और केन्द्रीय सरकार या ऐसी संपृक्त सरकारी कंपनी ऐसी संविदा का अनुसमर्थन करने के लिए उसमें ऐसे परिवर्तन या उपान्तर कर सकेगी जो वह ठीक समझे :
परंतु, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कंपनी संविदा का अनुसमर्थन करने में लोप और संविदा में कोई परिवर्तन या उपान्तर तभी करेगी जबकि :-
(क) उसका यह समाधान हो गया हो कि ऐसी संविदा असम्यक् रूप से दुर्भर है या दुर्भाव से की गई है या वह केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी के लिए अहितकर है, और
(ख) संविदा के पक्षकारों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो और संविदा का अनुसमर्थन करने से इंकार करने या उसमें कोई परिवर्तन या उपान्तर करने के कारणों को लेखबद्ध कर दिया गया हो ।
27. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति-
(क) दोनों कंपनियों में किसी कंपनी के किसी उपक्रम की भागरूप किसी संपत्ति को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी से सदोष विधारित करेगा ; या
(ख) दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के किसी उपक्रम की भागरूप किसी संपत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा या उसे सदोष प्रतिधारित करेगा ; या
(ग) ऐसे उपक्रम से संबंधित किसी दस्तावेज को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी को या उस सरकार या ऐसी सरकारी कंपनी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने से जानबूझकर विधारित करेगा या उसे देने में असफल रहेगा ; या
(घ) दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के उपक्रमों से संबंधित किन्हीं आस्तियों, लेखाबहियों या रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, केन्द्रीय सरकार या संपृक्त सरकारी कंपनी या उस सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति को या व्यक्तियों के निकाय को देने में असफल रहेगा ; या
(ङ) दोनों कंपनियों में से किसी कंपनी के किसी उपक्रम की भागरूप किसी सम्पत्ति को सदोष हटाएगा या नष्ट करेगा अथवा ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वह मिथ्या या बिल्कुल गलत है,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से दंडनीय होगा ।
28. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी जो यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और वह तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, और
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का कोई भागीदार अभिप्रेत है ।
29. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के या उस सरकार के किसी अधिकारी के या अभिरक्षक के या सरकारी कंपनियों के या उस सरकार या सरकारी कंपनियों द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या उसके किसी अधिकारी या कर्मचारी के या अभिरक्षक के या सरकारी कंपनियों के या उन कंपनियों द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
30. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस धारा और धारा 31 तथा धारा 32 द्वारा प्रदत्त शक्तियों से भिन्न इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी किया जा सकेगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) जब कभी उपधारा (1) के अधीन शक्ति का कोई प्रत्यायोजन किया जाता है तब वह व्यक्ति, जिसको ऐसी शक्ति का प्रत्यायोजन किया गया है, केन्द्रीय सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगा ।
31. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) वह समय जिसके भीतर और वह रीति जिससे धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन कोई सूचना दी जाएगी ;
(ख) वह प्ररूप और वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन अभिरक्षक धारा 12 द्वारा अपेक्षित रूप में लेखा रखेगा या रखेंगे ;
(ग) वह रीति जिससे धारा 14 में निर्दिष्ट किसी भविष्य निधि या अन्य निधि की धनराशियों के संबंध में कार्रवाई की जाएगी ;
(घ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
32. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंध से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी :परन्तु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
33. निरसन और व्यावृत्ति-(1) हिंद साइकिल्स लिमिटेड और सेन रेले लिमिटेड (राष्ट्रीयकरण) अध्यादेश, 1980 (1980 का 16) को इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
पहली अनुसूची
[धाराएं 4(4), 7, 8(3) और 16(1) (क) देखिए]
|
क्रम सं० |
कंपनी का नाम |
रकम (लाख रुपयों में) |
|
1. |
हिंद साइकिल्स लिमिटेड . . . . . . . . |
241.47 |
|
2. |
सेन रेले लिमिटेड . . . . . . . . . |
708.00 |
|
3. |
सेन एंड पंडित इंडस्ट्रीज लिमिटेड . . . . . . . |
23.96 |
|
4. |
एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (लग्ज) प्राइवेट लिमिटेड . . . . . |
1.31 |
|
5. |
एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (फोर्जिंग्स) प्राइवेट लिमिटेड . . . . . |
1.44 |
|
6. |
एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (क्रैंक्स) प्राइवेट लिमिटेड . . . . . |
2.33 |
|
7. |
नओखाली मशीन टूल्स लिमिटेड . . . . . . . |
2.87 |
दूसरी अनुसूची
[धारा 8(1) देखिए]
|
क्रम सं० |
कंपनी का नाम |
वार्षिक दर (रुपए) |
|
1. |
हिंद साइकिल्स लिमिटेड . . . . . . . . |
8,000 |
|
2. |
सेन रेले लिमिटेड . . . . . . . . . |
8,000 |
|
3. |
सेन एंड पंडित इंडस्ट्रीज लिमिटेड . . . . . . . |
500 |
|
4. |
एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (लग्ज) प्राइवेट लिमिटेड . . . . . |
500 |
|
5. |
एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (फोर्जिंग्स) प्राइवेट लिमिटेड . . . . . |
500 |
|
6. |
एनसिलियरी इंडस्ट्रीज (क्रैंक्स) प्राइवेट लिमिटेड . . . . . |
500 |
तीसरी अनुसूची
[धाराएं 18, 20(1), 21(1) और 23(1) देखिए]
दोनों कंपनियों के उन्मोचन के लिए पूर्विकता-क्रम
प्रबन्ध ग्रहण के पश्चात् की अवधि
प्रवर्ग 1-
(क) कंपनी के कर्मचारियों को देय मजदूरियां, वेतन और अन्य शोध्य रकमें ।
(ख) भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा निधि, भारतीय जीवन बीमा निगम संबंधी प्रीमियम के लिए या किसी अन्य प्रयोजन के लिए कर्मचारियों के वेतन और मजदूरियों से की गई कटौतियां ।
प्रवर्ग 2-
निम्नलिखित द्वारा दिए गए उधारों का मूलधन, अर्थात् :-
(i) केन्द्रीय सरकार
(ii) कोई राज्य सरकार
(iii) बैंक और वित्तीय संस्थाएं
(iv) कोई अन्य स्रोत
प्रवर्ग 3-
(क) ऐसे अभिदायों के संबंध में बकाया, जो कंपनियों द्वारा भविष्य निधि में, कर्मचारी राज्य बीमा निधि में या तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी अन्य विधि के अधीन किए जाने हैं जो ऐसे अभिदायों के लिए उपबंध करती है ।
(ख) धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट से भिन्न कोई व्यापारिक या विनिर्माण संबंधी संक्रियाएं करने के प्रयोजन के लिए कंपनी द्वारा लिए गए ऋण ।
(ग) धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट से भिन्न माल या सेवाओं के प्रदाय के लिए राज्य विद्युत् बोर्डों या अन्य सरकारी या अर्द्ध सरकारी संस्थाओं को शोध्य रकमें ।
(घ) उधारों और अग्रिम धनों पर ब्याज की बकाया ।
प्रवर्ग 4-
(क) केंद्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण का राजस्व, कर, उपकर, रेट या अन्य शोध्य रकमें ।
(ख) कोई अन्य शोध्य रकमें ।
प्रबन्ध ग्रहण के पूर्व की अवधि
प्रवर्ग 5-
(क) कंपनी के कर्मचारियों को देय मजदूरियां, वेतन और अन्य शोध्य रकमें ।
(ख) भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा निधि, भारतीय जीवन बीमा निगम संबंधी प्रीमियम के लिए या किसी अन्य प्रयोजन के लिए कर्मचारियों के वेतन और मजदूरियों से की गई कटौतियां ।
प्रवर्ग 6-
(क) निम्नलिखित द्वारा दिए गए प्रतिभूत उधारों का मूलधन, अर्थात् :-
(i) केन्द्रीय सरकार
(ii) कोई राज्य सरकार
(iii) बैंक और वित्तीय संस्थाएं ।
(ख) ऐसे अभिदायों के संबंध में बकाया जो कंपनियों द्वारा भविष्य निधि में, कर्मचारी राज्य बीमा निधि में या तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी अन्य विधि के अधीन किए जाने हैं जो ऐसे अभिदायों के लिए उपबंध करती है ।
प्रवर्ग 7-
निम्नलिखित द्वारा दिए गए अप्रतिभूत उधारों का मूलधन, अर्थात् :-
(i) केन्द्रीय सरकार,
(ii) कोई राज्य सरकार,
(iii) बैंक और वित्तीय संस्थाएं ।
प्रवर्ग 8-
(क) कोई व्यापारिक या विनिर्माण संबंधी संक्रियाएं करने के प्रयोजन के लिए कंपनी द्वारा लिए गए कोई ऋण ।
(ख) माल या सेवाओं के प्रदाय के लिए राज्य विद्युत् बोर्ड या अन्य सरकारी या अर्द्ध सरकारी संस्थाओं को शोध्य रकमें ।
(ग) उधारों और अग्रिम धनों पर ब्याज की बकाया ।
(घ) केंद्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण का राजस्व, कर, उपकर, रेट या अन्य शोध्य रकमें ।
(ङ) कोई अन्य उधार या शोध्य रकमें ।
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