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हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिर्वतन) अधिनियम, 1979 ( Haryana and Uttar Pradesh (Alteration of Boundaries) Act, 1979 )


 

हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिर्वतन) अधिनियम, 1979

(1979 का अधिनियम संख्यांक 31)

[11 जून, 1979]

हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों की सीमाओं के

 परिवर्तन और उससे संबद्ध विषयों का 

उपबन्ध करने के लिए

 अधिनियम

                भारत गणराज्य के तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :- 

भाग 1

प्रारम्भिक

1 संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिवर्तन) अधिनियम, 1979 है । 

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) नियत दिन" से वह दिन अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे; 

(ख) सभा निर्वाचन-क्षेत्र", परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र" और संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र" के वही अर्थ हैं जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) में उनके हैं;

(ग) नियत सीमा" से धारा 3 के उपबंधों के अधीन सीमांकित सीमाएं अभिप्रेत हैं;

(घ) विधि" के अन्तर्गत कोई ऐसी अधिनियमिति, अध्यादेश, विनियम, आदेश, उपविधि, नियम, स्कीम, अधिसूचना या अन्य लिखत भी है जो सम्पूर्ण हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य में या उसके किसी भाग में विधि का बल रखती है;

(ङ) अधिसूचित आदेश" से राजपत्र में प्रकाशित आदेश अभिप्रेत है; 

(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा अभिप्रेत है; 

(छ) वर्तमान गहरी धारा रेखा" से यमुना नदी की वह गहरी धारा रेखा अभिप्रेत है जिसका 1974 के नवम्बर, 1974 के दिसम्बर, 1975 की जनवरी और 1975 की फरवरी मास के दौरान भारतीय सर्वेक्षण द्वारा सत्यापन और अवधारण किया गया है ; 

(ज) संसद् के या किसी राज्य विधान-मंडल के किसी सदन के सम्बन्ध में आसीन सदस्य" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो नियत दिन के ठीक पूर्व उस सदन का सदस्य है;  

(झ) अन्तरित राज्यक्षेत्र" से,-

(क) हरियाणा राज्य के सम्बन्ध में वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं जो इस अधिनियम द्वारा उस राज्य से उत्तर प्रदेश राज्य को अन्तरित किए गए हैं, और 

(ख) उत्तर प्रदेश राज्य के सम्बन्ध में वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं जो इस अधिनियम द्वारा उस राज्य से हरियाणा राज्य को अन्तरित किए गए हैं; 

(ञ) किसी राज्य के किसी जिले के प्रति किसी निेर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र के प्रति निर्देश है जो नियत दिन के ठीक पूर्व उस जिले में भैतिक रूप से समाविष्ट हो ।  

भाग 2

सीमाओं का परिवर्तन

3. अस्थिर सीमाओं का नियत सीमाओं द्वारा प्रतिस्थापन-(1) नियत दिन से, हरियाणा राज्य के करनाल और सोनीपत जिलों और उत्तर प्रदेश राज्य के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ जिलों के बीच की सीमा का तथा हरियाणा राज्य के गुड़गांव जिले और उत्तर प्रदेश राज्य के बुलंदशहर और अलीगढ़ जिलों के बीच की सीमा का, जो इस समय यमुना नदी की गहरी धारा है, नियत सीमाओं में परिवर्तन और उसके द्वारा प्रतिस्थापन किया जाएगा । 

(2) उक्त नियत सीमाओं का केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त प्राधिकारी द्वारा इस प्रकार सीमांकन किया जाएगा कि वे अनुसूची में वर्णित नियत सीमाओं के साधारणतः अनुरूप रहे । 

(3) ऐसी सीमांकन के प्रयोजनों के लिए-

(क) अनुसूची में दिए गए नियत सीमा के वर्णन के किसी भी भाग के निर्वचन से सम्बद्ध किसी भी विषय पर उक्त प्राधिकारी का विनिश्चय अन्तिम होगा ; 

(ख) उक्त प्राधिकारी को यह शक्ति होगी कि वह उन बिन्दुओं का अवस्थापन करे जिन पर सीमा-स्तम्भों का सन्निर्माण किया जाएगा और उस राज्य सरकार को विनिर्दिष्ट करे जो ऐसे बिन्दुओं पर सीमा-स्तम्भों का ऐसे विनिर्देशों के अनुसार सन्निर्माण और अनुरक्षण करने के लिए उत्तरदायी होगी जो वह प्राधिकारी (समान विनिर्देशों वाले स्तम्भ दोनों राज्य सरकारों में, यथासाध्य, बराबर-बराबर प्रभाजित करते हुए) उपदर्शित करे और उन विषयों के बारे में उक्त प्राधिकारी का विनिश्चय अन्तिम होगा ;

(ग) उक्त प्राधिकारी के लिए और उस प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी भी व्यक्ति के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह अनुसूची में वर्णित नियत सीमाओं में से किसी के सामीप्य वाले किसी क्षेत्र में प्रवेश करे और उसका सर्वेक्षण करे और वे सभी अन्य कार्य करे जो आवश्यक हों । 

(4) उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्राधिकारी, नियत सीमाओं के दोनों ओर के और उसके सामीप्य के क्षेत्रों के मानचित्र भी तैयार करेगा, जिनमें- 

(क) वर्तमान गहरी धारा रेखा और उसके सम्बन्ध में नियत सीमा दर्शित की जाएगी; और 

(ख) नियत सीमा के दोनों ओर के गांवों के नाम और सीमाएं, जैसी कि सम्बन्धित राज्य सरकार द्वारा, उस सरकार के राजस्व अभिलेखों के प्रति निर्देश से उपदर्शित की गई हों, दर्शित की जाएंगी,

और ऐसे मानचित्रों की अधिप्रमाणित प्रतियां केन्द्रीय सरकार को तथा हरियाणा और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों को भेजेगा ।

4. राज्यक्षेत्रों का अन्तरण-(1) नियत दिन से,-

(क) हरियाणा राज्य में उत्तर प्रदेश राज्य के वे सभी राज्यक्षेत्र, जो नियत सीमाओं से हरियाणा की ओर पड़ते हैं, जोड़ दिए जाएंगे और तदुपरि उक्त राज्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश राज्य के भाग न रह जाएंगे; और 

(ख) उत्तर प्रदेश राज्य में हरियाणा राज्य के वे सभी राज्यक्षेत्र, जो नियत सीमाओं से उत्तर प्रदेश की ओर पड़ते हैं, जोड़ दिए जाएंगे और तदुपरि उक्त राज्यक्षेत्र हरियाणा राज्य के भाग न रह जाएंगे । 

(2) हरियाणा और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों में से प्रत्येक राज्य सरकार, राज्य के राजपत्र में आदेश द्वारा, उपधारा (1) के अधीन उस राज्य को अन्तरित राज्यक्षेत्रों के नियत दिन से प्रशासन के लिए उपबंध, उन्हें या उनके किसी भाग को ऐसे जिले, उपखंड, पुलिस थाने या अन्य प्रशासनिक इकाई में सम्मिलित करके, करेगी जिसे उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए । 

5. संविधान की पहली अनुसूची का संशोधन-नियत दिन से संविधान की पहली अनुसूची में 1. राज्य" शीर्षक के नीचे,-

(क) 13. उत्तर प्रदेश" के सामने की प्रविष्टि के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाएगा, अर्थात् :-

वे राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले या तो संयुक्त प्रान्त नाम से ज्ञात प्रान्त में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित ये मानो वे उस प्रान्त के भाग रहे हों, वे राज्यक्षेत्र जो बिहार और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिवर्तन) अधिनियम, 1968  की धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट हैं और वे राज्यक्षेत्र जो हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिवर्तन) अधिनियम, 1979 की धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट हैं किन्तु वे राज्यक्षेत्र इसके अन्तर्गत नहीं हैं जो बिहार और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिवर्तन) अधिनियम,  1968 की धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट हैं और वे राज्यक्षेत्र भी इसके अन्तर्गत नही हैं जो हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिवर्तन) अधिनियम, 1979 की धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट हैं ।" ;

(ख) 17. हरियाणा" के सामने की प्रविष्टि के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाएगा, अर्थात् :- 

वे राज्यक्षेत्र जो पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 3 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं और वे राज्यक्षेत्र जो हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा-परिवर्तन) अधिनियम, 1979 की धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट हैं किन्तु वे राज्यक्षेत्र इसके अन्तर्गत नही हैं जो उस अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट हैं ।" ।

 

 

भाग 3

विधान-मण्डलों में प्रतिनिधित्व

6. परिसीमन आदेशों का अर्थान्वयन-नियत दिन से, संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों, सभा निर्वाचन-क्षेत्रों या परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन से सम्बन्धित किसी आदेश में,-

(क) (i) हरियाणा राज्य के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत वे राज्यक्षेत्र भी हैं जो उस राज्य को उत्तर प्रदेश राज्य से धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन अन्तरित किए गए हैं किन्तु वे राज्यक्षेत्र जो हरियाणा से उत्तर प्रदेश राज्य को उस उपधारा के खंड (ख) के अधीन अंतरित किए गए हैं, इससे अपवर्जित हैं; 

(ii) हरियाणा राज्य के किसी जिले, उपखंड, पुलिस थाने या अन्य प्रशासनिक इकाई के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत उस राज्य को अन्तरित राज्यक्षेत्रों का वह भाग, यदि कोई हो, भी है जो धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन किए गए आदेश द्वारा उस जिले, उपखंड, पुलिस थाने या अन्य प्रशासनिक इकाई में सम्मिलित किया गया है; 

(ख) (i) उत्तर प्रदेश राज्य के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत वे राज्यक्षेत्र भी हैं जो उस राज्य को हरियाणा राज्य से धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन अन्तरित किए गए हैं किन्तु वे राज्यक्षेत्र जो उत्तर प्रदेश राज्य से हरियाणा राज्य को उस उपधारा के खंड (क) के अधीन अन्तरित किए गए हैं, इससे अपवर्जित हैं; 

(ii) उत्तर प्रदेश राज्य के किसी जिले, उपखंड, पुलिस थाने या अन्य प्रशासनिक इकाई के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत उस राज्य को अन्तरित राज्यक्षेत्र का वह भाग, यदि कोई हो, भी है जो धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन किए गए आदेश द्वारा उस जिले, उपखंड, पुलिस थाने या अन्य प्रशासनिक इकाई में सम्मिलित किया गया है ।  

7. आसीन सदस्यों के बारे में उपबन्ध-(1) किसी ऐसे संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र का, जिसका विस्तार इस अधिनियम के उपबन्धों के फलस्वरूप परिवर्तित हो गया है, प्रतिनिधित्व करने वाले लोक सभा के हर सदस्य के बारे में ऐसे परिवर्तन के होते हुए भी, नियत दिन से यह समझा जाएगा कि वह इस प्रकार परिवर्तित निर्वाचन-क्षेत्र से उस सदन के लिए, निर्वाचित किया गया है । 

(2) किसी ऐसे सभा निर्वाचन-क्षेत्र का, जिसका विस्तार इस अधिनियम के उपबन्धों के फलस्वरूप परिवर्तित हो गया है, प्रतिनिधित्व करने वाले हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के हर आसीन सदस्य के बारे में ऐसे परिवर्तन के होते हुए भी, नियत दिन से यह समझा जाएगा कि वह इस प्रकार परिवर्तित निर्वाचन-क्षेत्र से उक्त विधान सभा के लिए, निर्वाचित किया गया है । 

(3) ऐसे किसी परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र का, जिसका विस्तार इस अधिनियम के उपबन्धों के फलस्वरूप परिवर्तित हो गया है, प्रतिनिधित्व करने वाले उत्तर प्रदेश राज्य की विधान परिषद् के हर आसीन सदस्य के बारे में ऐसे परिवर्तन के होते हुए भी, नियत दिन से यह समझा जाएगा कि वह इस प्रकार परिवर्तित निर्वाचन-क्षेत्र से उक्त विधान परिषद् के लिए, निर्वाचित किया गया है । 

भाग 4

उच्च न्यायालय

8. पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तारण और उसे कार्यवाहियों का अन्तरण-(1) इसमें इसके पश्चात् जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय,-

(क) पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार नियत दिन से उन राज्यक्षेत्रों पर हो जाएगा जो उत्तर प्रदेश राज्य से हरियाणा राज्य को इस अधिनियम द्वारा अन्तरित किए गए हैं; तथा 

(ख) इलाहाबाद उच्च न्यायालय को उस दिन से उक्त राज्यक्षेत्रों के बारे में अधिकारिता न रह जाएगी । 

(2) इलाहाबाद उच्च न्यायालय में नियत दिन के ठीक पूर्व लम्बित ऐसी कार्यवाहियां, जिनके बारे में उस उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति, वाद हेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान तथा अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित कर देता है कि वे ऐसी कार्यवाहियां हैं जिनकी सुनवाई और विनिश्चय पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय को अन्तरित कर दी जाएंगी । 

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, ऐसी अपीलें, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के आवेदन और अन्य कार्यवाहियां, उस दशा में जब ऐसी कार्यवाहियां इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा, नियत दिन से पूर्व, पारित किसी अनुतोष के लिए हों, ग्रहण करने, उनकी सुनवाई करने या उन्हें निपटाने की अधिकारिता इलाहाबाद उच्च न्यायालय को होगी, पंजाब-हरियाणा उच्च                        न्यायालय को नहीं :

परन्तु यदि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा ऐसी कार्यवाहियों के ग्रहण कर लिए जाने के पश्चात् उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत होता है कि वे पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय को अन्तरित कर दी जानी चाहिएं तो वह यह आदेश देगा कि वे इस प्रकार अन्तरित की जाएं और तदुपरि ऐसी कार्यवाहियां तद्नुसार अन्तरित कर दी जाएंगी ।

(4) इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा-

(क) ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में जो उपधारा (2) के आधार पर पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय को अन्तरित की गई हैं, नियत दिन से पूर्व किया गया आदेश, अथवा 

(ख) ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में जिनके बारे में इलाहाबाद उच्च न्यायालय उपधारा (3) के आधार पर अधिकारिता रखे रहता है, किया गया कोई आदेश,

सभी प्रयोजनों के लिए न केवल इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश में रूप में, अपितु पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी, प्रभावी होगा । 

(5) पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए किसी नियम या दिए गए किसी निदेश के अधीन रहते हुए, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने का हकदार अधिवक्ता है और जिसे इस निमित्त पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति, उत्तर प्रदेश राज्य से हरियाणा राज्य को राज्यक्षेत्रों के अन्तरण को ध्यान में रखते हुए विनिर्दिष्ट करे, पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने के हकदार अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी जाएगी । 

9. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तारण और उसे कार्यवाहियों का अन्तरण-(1) इसमें इसके पश्चात् जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, -

(क) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार नियत दिन से उन राज्यक्षेत्रों पर हो जाएगा जो हरियाणा राज्य से उत्तर प्रदेश राज्य को इस अधिनियम द्वारा अन्तरित किए गए हैं; और 

(ख) पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय को उस दिन से उक्त राज्यक्षेत्रों के बारे में अधिकारिता नहीं रह जाएगी । 

(2) पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में नियत दिन के ठीक पूर्व लंबित कार्यवाहियां, जिनके बारे में उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति वाद हेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान तथा अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित कर देता है कि वे ऐसी कार्यवाहियों हैं जिनकी सुनवाई और विनिश्चय इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अन्तरित कर दी जाएंगी ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, ऐसी अपीलें उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के आवेदन और अन्य कार्यवाहियां, उस दशा में, जब ऐसी कार्यवाहियों पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा, नियत दिन से पूर्व, पारित किसी आदेश के बारे में किसी अनुतोष के लिए हों, ग्रहण करने, उनकी सुनवाई करने या उन्हें निपटाने की अधिकारिता पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय को होगी, इलाहाबाद उच्च न्यायालय को नहीं :

परन्तु यदि पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा ऐसी कार्यवाहियों के ग्रहण कर लिए जाने के पश्चात् उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत होता है कि वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अन्तरित कर दी जानी चाहिएं तो वह यह आदेश देगा कि वे इस प्रकार अन्तरित की जाएं और तदुपरि ऐसी कार्यवाहियां तद्नुसार अन्तरित कर दी जाएंगी । 

(4) पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा-

(क) ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में, जो उपधारा (2) के आधार पर इलाहबाद उच्च न्यायालय को अन्तरित की गई हैं, नियत दिन से पूर्व किया गया कोई आदेश, अथवा

(ख) ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में, जिनके बारे में पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय उपधारा (3) के आधार पर अधिकारिता रखे रहता है, किया गया कोई आदेश,

सभी प्रयोजनों के लिए न केवल पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में, अपितु इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा किए गए आदेश के रूप में भी, प्रभावी होगा । 

(5) इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा बनाए किसी नियम या दिए गए किसी निदेश के अधीन रहते हुए, यह है कि किसी ऐसे व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने का हकदार अधिवक्ता है और जिसे इस निमित्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति, हरियाणा राज्य से उत्तर प्रदेश राज्य को राज्यक्षेत्रों के अन्तरण को ध्यान में रखते हुए, विनिर्दिष्ट करें, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने के हकदार अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी जाएगी ।

10. धारा 8 या धारा 9 के अधीन अन्तरित किन्हीं कार्यवाहियों में हाजिर होने का अधिकार-किसी भी व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय या इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने का हकदार अधिवक्ता है, और धारा 8 या धारा 9 के अधीन अन्तरित की गई किन्हीं कार्यवाहियों में हाजिर होने के लिए प्राधिकृत है, उन कार्यवाहियों के संबंध में, उस उच्च न्यायालय में हाजिर होने का अधिकार होगा जिसे वे कार्यवाहियां अन्तरित की गई हैं ।  

11. निर्वचन-धारा 8 और धारा 9 के प्रयोजनों के लिए, -

(क) कार्यवाहियां पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में या इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तब तक लम्बित समझी जाएंगी जब तक कि उस न्यायालय ने पक्षकारों के बीच के सभी विवाद्यक, जिनके अन्तर्गत कार्यवाहियों के खर्चे के विनिर्धारण से संबंधित कोई विवाद्यक भी है, न निपटा दिए हों, और ऐसी कार्यवाहियों के अन्तर्गत अपीलें, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के आवेदन, पुनरीक्षण की अर्जियां और रिटों की अर्जियां भी हैं; 

(ख) पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय या इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उस उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश या खण्ड न्यायालय के प्रति निर्देश भी हैं, और किसी न्यायालय या किसी न्यायाधीश द्वारा किए गए किसी आदेश के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उस न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा पारित या किए गए किसी दण्डादेश, निर्णय या डिक्री के प्रति निर्देश भी हैं । 

भाग 5

व्यय का प्राधिकरण

12. अन्तरित राज्यक्षेत्रों में व्यय के लिए धन का, विद्यमान विनियोग अधिनियमों के अधीन, विनियोग-(1) हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य के विधान-मंडल द्वारा, उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें नियत दिन पड़ता है, किसी भाग के बारे में किसी व्यय को पूरा करने के लिए, उस राज्य की संचित निधि में से धन का विनियोग करने के लिए, नियत दिन के पूर्व पारित कोई भी अधिनियम, उस दिन से उन राज्यक्षेत्रों के सम्बन्ध में भी प्रभावी होगा जो भाग 2 के उपबन्धों द्वारा उस राज्य को अन्तरित किए गए हैं और उस राज्य में उस वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा के लिए व्यय की जाने के लिए ऐसे अधिनियम द्वारा प्राधिकृत रकम में से कोई रकम उन राज्यक्षेत्रों में उस सेवा पर व्यय करना उस राज्य सरकार के लिए विधिपूर्ण होगा ।

(2) हरियाणा या उत्तर प्रदेश का राज्यपाल, नियत दिन के पश्चात्, उस राज्य की संचित निधि में से, नियत दिन से आरम्भ होने वाली छह मास से अनधिक की अवधि के लिए कोई ऐसा व्यय, जिसे वह उस राज्य को अन्तरित राज्यक्षेत्रों में किसी प्रयोजन या सेवा के लिए आवश्यक समझता है, उस राज्य के विधान-मंडल द्वारा व्यय की मंजूरी होने तक, प्राधिकृत कर सकेगा:

परन्तु ऐसा कोई व्यय नहीं किया जाएगा जो उस वित्तीय वर्ष की जिसमें नियत दिन पड़ता है, समाप्ति के पश्चात् की किसी अवधि के लिए प्रभावी हो । 

13. हरियाणा और उत्तर प्रदेश के लेखाओं के संबंध में रिपोर्ट-नियत दिन के पूर्व समाप्त होने वाले किसी वित्तीय वर्ष के बारे में हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य के लेखाओं के संबंध में भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्टें, जो संविधान के अनुच्छेद 151 के खण्ड (2) में निर्दिष्ट हैं, हरियाणा राज्य और उत्तर प्रदेश राज्य में से हर एक के राज्यपाल को प्रस्तुत की जाएंगी, जो उन्हें राज्य के विधान-मण्डल के समक्ष रखवाएगा । 

भाग 6

आस्तियों और दायित्वों का प्रभाजन

14. भूमि और माल-(1) इस भाग के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, यह है कि हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य की सब भूमि और सब भण्डार, वस्तुएं और अन्य माल जो अन्तरित राज्यक्षेत्रों में हों, नियत दिन से उस राज्य को संक्रान्त हो जाएंगे जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं । 

(2) इस धारा में भूमि पद के अन्तर्गत हर प्रकार की स्थावर सम्पत्ति और ऐसी सम्पत्ति में या उस पर, कोई अधिकार भी है ।

15. करों की बकाया-अन्तरित राज्यक्षेत्रों में स्थित संपत्ति पर किसी कर या शुल्क की, जिसके अन्तर्गत भू-राजस्व भी है, बकाया वसूल करने का या किसी ऐसी दशा में जिसमें किसी अन्य कर या शुल्क के निर्धारण का स्थान अन्तरित राज्यक्षेत्रों में है, उस अन्य कर या शुल्क की बकाया वसूल करने का हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य का अधिकार, उस राज्य को होगा जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं ।

16. उधार और अधिदाय वसूल करने का अधिकार-अन्तरित राज्यक्षेत्रों में किसी स्थानीय निकाय, सोसाइटी, कृषक या अन्य व्यक्ति को नियत दिन के पूर्व हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दिए गए किन्हीं उधारों या अधिदायों को वसूल करने का अधिकार उस राज्य को होगा जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं ।

17. वसूल किए गए करों के आधिक्य का प्रतिदाय-अन्तरित राज्यक्षेत्रों में स्थित संपत्ति पर किसी कर या शुल्क के, जिसके अन्तर्गत भू-राजस्व भी है, वसूल किए गए आधिक्य के प्रतिदाय करने का हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य का दायित्व, उस राज्य का दायित्व होगा जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं, और ऐसी किसी दशा में जिसमें किसी अन्य कर या शुल्क के निर्धारण का स्थान अन्तरित राज्यक्षेत्रों में है, उस अन्य कर या शुल्क के वसूल किए गए अधिक्य का प्रतिदाय करने का हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य का दायित्व भी उस राज्य का दायित्व होगा जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं ।

18. निक्षेप-अन्तरित राज्यक्षेत्रों में किए गए किसी सिविल निक्षेप या स्थानीय निधि निक्षेप के बारे में हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य का दायित्व, नियत दिन से ही उस राज्य का दायित्व होगा जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं ।

19. संविदाएं-(1) जहां हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य ने, नियत दिन के पूर्व कोई संविदा अपनी कार्यपालन शक्ति का प्रयोग करते हुए राज्य के किन्हीं प्रयोजनों के लिए, की है वहां वह संविदा- 

(क) उस दशा में जब वे प्रयोजन ऐसे हों जो उस दिन से ही अन्तरित राज्य-क्षेत्रों से अनन्यतः संबंधनीय हों, तब उस राज्य की कार्यपालन शक्ति के प्रयोग में की गई समझी जाएगी जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं; तथा 

(ख) किसी अन्य दशा में, उस राज्य की कार्यपालन शक्ति के प्रयोग में की गई समझी जाएगी जिसने संविदा की है, 

और वे सभी अधिकार और दायित्व, जो ऐसी किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हैं या प्रोद्भूत हों, उस विस्तार तक जिस तक वे उस राज्य के अधिकार या दायित्व हैं, जिसने संविदा की हो, उस राज्य के अधिकार और दायित्व हो जाएंगे जो उपरोक्त खंड (क) या खंड (ख) में विनिर्दिष्ट हैं । 

(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उन दायित्वों के अन्तर्गत जो किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हैं या प्रोद्भूत हों-

(क) उस संविदा से संबद्ध कार्यवाहियों में किसी न्यायालय या अन्य अधिकरण द्वारा किए गए किसी आदेश या अधिनिर्णय की तुष्टि करने का कोई दायित्व; तथा 

(ख) ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में या उसके संबंध में उपगत व्ययों के बारे में कोई दायित्व,

भी समझा जाएगा । 

(3) यह धारा इस भाग के उन अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी जो उधारों, प्रत्याभूतियों और अन्य वित्तीय बाध्यताओं के बारे में दायित्वों के प्रभाजन से संबद्ध हैं ।

20. अनुयोज्य दोष के बारे में दायित्व-जहां नियत दिन के ठीक पूर्व हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य संविदा भंग से भिन्न, किसी अनुयोज्य दोष के बारे में किसी दायित्व के अधीन है, वहां वह दायित्व, -

(क) उस दशा में जब वाद हेतुक अन्तरित राज्यक्षेत्रों में संपूर्णतः उद्भूत हुआ है, उस राज्य का दायित्व होगा जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं, तथा 

(ख) किसी अन्य दशा में उस राज्य का दायित्व बना रहेगा जो उस दिन के ठीक पूर्व ऐसे दायित्व के अधीन था ।

21. सहकारी सोसाइटियों का, प्रत्याभूतिदाता के रूप में, दायित्व-जहां नियत दिन के ठीक पूर्व हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य की रजिस्ट्रीकृत सहकारी सोसाइटी के किसी दायित्व के बारे में प्रत्याभूतिदाता के रूप में दायी है वहां यह दायित्व, -

(क) उस दशा में जब उस सोसाइटी की संक्रियाओं का क्षेत्र अन्तरित राज्यक्षेत्रों तक परिसीमित हो, उस राज्य का दायित्व होगा जिसे वे राज्यक्षेत्र अन्तरित किए गए हैं; तथा 

(ख) किसी अन्य दशा में, उस राज्य का दायित्व बना रहेगा जो उस दिन के ठीक पूर्व ऐसे दायित्व के अधीन था । 

22. उचन्त मदें-यदि किसी उचन्त मद के बारे में अन्ततोगत्वा यह पाया जाता है कि उसका इस भाग के पूर्वगामी उपबन्धों में से किसी में निर्दिष्ट प्रकृति की किसी आस्ति या दायित्व पर प्रभाव पड़ता है तो उसके बारे में उस उपबन्ध के अनुसार कार्रवाई की जाएगी ।

23. आस्तियों और दायित्वों का सहमति द्वारा प्रभाजन-जहां हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्य इस बात पर सहमत हो जाते हैं कि किसी विशिष्ट आस्ति के फायदे या दायित्व के भार का उनमें प्रभाजन ऐसी रीति से किया जाना चाहिए जो इस भाग के पूर्वगामी उपबन्धों द्वारा उपबंधित रीति से भिन्न है तो, उनमें किसी बात के होते हुए भी, उस आस्ति का फायदा या दायित्व का भार उस रीति से प्रभाजित किया जाएगा जिस पर सहमति हो गई है । 

24. कुछ दशाओं में आबंटन या समायोजन करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-जहां इस भाग के उपबन्धों में से किसी के आधार पर हरियाणा राज्य और उत्तर प्रदेश राज्य में से कोई, किसी सम्पत्ति का हकदार होता है या कोई फायदे अभिप्राप्त करता है या किसी दायित्व के अधीन होता है, और नियत दिन से तीन वर्ष की अवधि के भीतर, दोनों में से किसी राज्य द्वारा किए गए निर्देश पर, केन्द्रीय सरकार की यह राय होती है कि यह न्यायसंगत और साम्यापूर्ण है कि वह सम्पत्ति या वे फायदे दूसरे राज्य को अन्तरित किए जाने चाहिएं या उसके साथ बांटे जाने चाहिएं, या दूसरे राज्य द्वारा उस दायित्व के लिए अभिदाय किया जाना चाहिए, वहां उक्त संपत्ति या फायदे दोनों राज्यों के बीच ऐसी रीति से आबंटित किए जाएंगे या उस राज्य को, जो उस दायित्व के अधीन है, दूसरा राज्य उसके बारे में ऐसा अभिदाय करेगा जो केन्द्रीय सरकार दोनों राज्य सरकारों के परामर्श के पश्चात् आदेश द्वारा अवधारित करे ।

25. व्यय का संचित निधि पर भारित होना-हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्यों में से किसी के द्वारा दूसरे राज्य को इस भाग के उबपन्धों के आधार पर संदेय सभी राशियां उस राज्य की संचित निधि पर भारित होंगी जिसके द्वारा ऐसी राशियां संदेय हैं ।

भाग 7

विधिक और प्रकीर्ण उपबन्ध

26. राज्य वित्तीय निगम और राज्य विद्युत् बोर्ड-नियत दिन से, -

(क) राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 65) के अधीन हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों के लिए गठित वित्तीय निगमों, तथा 

(ख) विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, 1948 (1948 का 54) के अधीन उक्त राज्यों के लिए गठित राज्य विद्युत् बोर्डों,

के बारे में यह समझा जाएगा कि वे, धारा 4 के उपबन्धों द्वारा उनके यथापरिवर्तित क्षेत्रों सहित, उन राज्यों के लिए गठित किए गए हैं । 

27. विधियों का राज्य क्षेत्रीय विस्तार-धारा 4 के उपबन्धों के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि उन्होंने उन राज्यक्षेत्रों में कोई परिवर्तन किया है जिन पर नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त कोई विधि विस्तारित या लागू है और जब तक कि सक्षम विधान-मण्डल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्यथा उपबन्ध नहीं किया जाता, ऐसी किसी विधि में हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनसे वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं जो नियत दिन से ठीक पूर्व उस राज्य में थे । 

28. विधियों के अनुकूलन की शक्ति-हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य के संबंध में किसी विधि के लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए, समुचित सरकार, नियत दिन से दो वर्ष के अवसान के पूर्व आदेश द्वारा, विधि के ऐसे अनुकूलन और उपान्तर, चाहे वे निरसन के रूप में हों या संशोधन के रूप में, जो आवश्यक या समीचीन हों, कर सकेगी और तदुपरि हर ऐसी विधि, जब तक वह सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित नहीं कर दी जाती, इस प्रकार किए गए अनुकूलनों या उपान्तरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में समुचित सरकार" पद से संघ सूची में प्रगणित किसी विषय से संबंधित किसी विधि के बारे में, केन्द्रीय सरकार, और किसी अन्य विधि के बारे में, राज्य सरकार, अभिप्रेत है ।

29. विधियों के अर्थ लगाने की शक्ति-इस बात के होते हुए भी नियत दिन से पूर्व बनाई गई किसी विधि के अनुकूलन के लिए कोई उपबन्ध नहीं किया गया है या अपर्याप्त उपबन्ध किया गया है, कोई भी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी, जो ऐसी विधि का प्रवर्तन करने के लिए अपेक्षित या सशक्त है, हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य के संबंध में उसके लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए उस विधि का अर्थ, सार पर प्रभाव डाले बिना, ऐसी रीति से लगा सकेगा जो उस न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष मामले के बारे में आवश्यक या उचित हो ।

30. विधिक कार्यवाहियां-जहां नियत दिन से ठीक पूर्व, हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य, इस अधिनियम के अधीन दूसरे राज्य को अन्तरित किसी सम्पत्ति, अधिकारों या दायित्वों के बारे में किन्हीं विधिक कार्यवाहियों में पक्षकार है, वहां ऐसे दूसरे राज्य के बारे में यह समझा जाएगा कि वह उस राज्य के स्थान पर जिससे ऐसी सम्पत्ति, अधिकार या दायित्व अन्तरित किए गए हैं, उन कार्यवाहियों में, यथास्थिति, पक्षकार के रूप में प्रतिस्थापित किया गया है या पक्षकार के रूप में जोड़ा गया है और कार्यवाहियां तदनुसार चालू रह सकेंगी ।

 31. लम्बित कार्यवाहियों का अन्तरण-(1) हर कार्यवाही जो किसी ऐसे क्षेत्र में जो नियत दिन को हरियाणा या उत्तर प्रदेश राज्य के भीतर पड़ता है, उस दिन से ठीक पूर्व (उच्च न्यायालय से भिन्न) किसी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी के समक्ष लम्बित है, उस दशा में जब वह ऐसी कार्यवाही है जो अनन्यतः उन राज्यक्षेत्रों के किसी भाग से सम्बद्ध है जो उस दिन से दूसरे राज्य के राज्यक्षेत्र हैं, दूसरे राज्य के तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी को अन्तरित हो जाएगी । 

(2) यदि कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न होता है कि कोई कार्यवाही उपधारा (1) के अधीन अन्तरित हो जानी चाहिए या नहीं तो, उसे उस क्षेत्र के बारे में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय को निर्देशित किया जाएगा जिसमें वह न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी, जिसके समक्ष वह कार्यवाही नियत दिन को लम्बित है, कृत्य कर रहा है और उस उच्च न्यायालय का विनिश्चय अन्तिम होगा । 

(3) इस धारा में, -

(क) कार्यवाही" के अन्तर्गत कोई वाद, मामला या अपील भी है; तथा 

(ख) किसी राज्य में तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी" से, -

(i) वह न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी अभिप्रेत है जिसमें या जिसके समक्ष कार्यवाही उस दशा में हुई होती, जब वह नियत दिन के पश्चात् संस्थित की गई होती, अथवा 

(ii) शंका की दशा में उस राज्य का ऐसा न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी अभिप्रेत है जिसे नियत दिन के पश्चात् उस राज्य की सरकार, या नियत दिन से पूर्व दूसरे राज्य की सरकार, तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी अवधारित करती है । 

32. सीमा स्तम्भों आदि का सन्निर्माण-(1) उस राज्य सरकार के लिए, जो धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन किसी सीमा स्तम्भ के सन्निर्माण के लिए उत्तरदायी है, यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसे स्तम्भ सन्निर्मित और अनुरक्षित कराए और कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही ऐसी किसी बात के लिए जो इस धारा के अधीन सद्भावपूर्वक की गई है या की जाने के लिए आशयित है, उस राज्य सरकार या उसके किसी अधिकारी के विरुद्ध न होगी । 

(2) सीमा स्तम्भों का निरीक्षण हरियाणा और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों के अधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से ऐसे नियमों के अनुसार किया जाएगा जिन्हें केन्द्रीय सरकार इस निमित्त बनाए ।

(3) जो कोई किसी सीमा स्तम्भ को जानबूझकर हटाएगा या क्षति पहुंचाएगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

(4) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (3) के अधीन किसी अपराध की जांच और उसका विचारण हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों में से किसी के भी न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा ।  

33. अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व किए गए सीमांकन की विधिमान्यता- नियत सीमा के सीमांकन के संबंध में इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व की गई सभी बातें और कार्रवाइयां, वहां तक जहां तक कि वे धारा 3 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबन्धों के अनुरूप है, विधि के अनुसार की गई समझी जाएंगी । 

34. अन्य विधियों से असंगत उपबन्धों का प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध उनसे असंगत किसी विधि, रूढ़ि या प्रथा के होते हुए भी, प्रभावी होंगे । 

35. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राष्ट्रपति, अधिसूचित आदेश द्वारा, ऐसी कोई बात कर सकेगा जो उन उपबन्धों से असंगत न हो और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो । 

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

36. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

अनुसूची

[धारा 3(2) देखिए]

नियत सीमाओं का वर्णन

1. एक ओर हरियाणा के करनाल और सोनीपत जिलों के तथा दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ जिलों के बीच नियत सीमा वर्तमान गहरी धारा रेखा होगी । 

2. (1) एक ओर हरियाणा के गुड़गांव जिले के तथा दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर और अलीगढ़ जिलों के बीच नियत सीमा उस बिन्दु से प्रारम्भ होगी जहां वर्तमान गहरी धारा रेखा बसंतपुर की उत्तर पश्चिम सीमा को पार करती है और उक्त सीमा के साथ-साथ उस बिन्दु तक चलेगी जहां वह भारतीय सर्वेक्षण द्वारा वर्ष 1971-72 में किए गए नदी सर्वेक्षण में यथा अभिनिश्चित यमुना नदी के उत्तरी किनारे को पार करती है । 

(2) इसके बाद वह उक्त उत्तरी किनारे के साथ-साथ उस बिन्दु तक जाएगी जहां वह बंसतपुर और सालारपुर के बीच सीमा से मिलती है । वहां से वह सालारपुर की उत्तरी और पूर्वी सीमाओं, असालतपुर की पूर्व सीमा, ददसिया की उत्तर पूर्व सीमा, किरावली की उत्तरी और उत्तर पूर्व सीमाओं, लालपुर की उत्तरी सीमा, महावतपुर की उत्तरी और पूर्वी सीमाओं, मोजामाबाद की पूर्वी सीमा, भसकोला की पूर्वी सीमा, राजपुरकलां की जिसके अन्तर्गत चक फलेरा भी है, पूर्वी और उत्तरी सीमाओं, शिकारगढ़ की उत्तरी और पूर्वी सीमाओं, अमीनपुर की उत्तरी और पूर्वी सीमाओं, चिरसी की पूर्वी सीमा, अकबरपुर की पूर्वी सीमा, मोजामाबाद-माजरा-शेखपुर की पूर्वी सीमा, शेखपुर की पूर्वी सीमा, मंझावली की पूर्वी सीमा, गढ़ी बेगमपुर की पूर्वी सीमा, दलेलगढ़ की दक्षिण-पूर्वी सीमा,                 नंगला-माजरा-चांदपुर की पूर्वी सीमा, शाहजहांपुर की उत्तरी पूर्वी सीमा, लतीफपुर की पूर्वी सीमा, परसरामपुर उर्फ दलेहपुर की पूर्वी सीमा, माकनपुर की पूर्वी सीमा, वलीपुर की उत्तर-पूर्वी सीमा, शेखपुर की पश्चिमी उत्तरी और पूर्वी सीमाओं, बहरामपुर की उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमाओं और नंगलिया की उत्तर-पश्चिमी सीमा के साथ-साथ उस बिन्दु तक जाएगी जहां वह वर्तमान गहरी धारा रेखा से मिलती है ।

(3) इस बिन्दु से वह नंगलिया, झुपा, बाघपूरकलां, बाघपुर खुर्द, सोलरा, भौलरा, दोस्तपुर, गोडवारी और चांघात से उत्तर प्रदेश की ओर की सीमा से होती हुई वर्तमान गहरी धारा रेखा के साथ-साथ यमुना नदी की पुरानी मुख्य धारा और जेरनाले के नाम से सामान्यतः ज्ञात नाली या शाखा के मिलने के स्थान तक जाएगी और वहां से वह वर्तमान गहरी धारा रेखा के साथ-साथ महौली की दक्षिण सीमा तक जाएगी ।

स्पष्टीकरण-इस पैरा में, -

(क) उपपैरा (1) और उपपैरा (2) में नामित किसी गांव की सीमा के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस गांव की सीमा के प्रति निर्देश है जैसा कि वह वर्ष 1943 में पूरे किए गुडगांव जिले के बन्दोबस्त अभिनिश्चित और मानचित्रित है; 

(ख) उपपैरा (2) के अन्त में और उपपैरा (3) के प्रारम्भ में वर्तमान गहरी धारा रेखा के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह यमुना नदी की पुरानी मुख्य धारा से संबंध रखने वाली वर्तमान गहरी धारा रेखा के प्रति निदेश है ।

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