आसूचना संगठन (अधिकार निर्बन्धन) अधिनियम, 1985
(1985 का अधिनियम संख्यांक 58)
[6 सितम्बर, 1985]
संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त कुछ अधिकारों को, आसूचना या प्रति
आसूचना के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित
कुछ संगठनों के सदस्यों को लागू होने में, निर्बन्धित करने
के लिए, जिससे उनके कर्तव्यों का उचित पालन और
उनमें अनुशासन बना रहना सुनिश्चित रहे,
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम आसूचना संगठन (अधिकार निर्बन्धन) अधिनियम, 1985 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) आसूचना संगठन" से आसूचना या प्रति आसूचना के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित और अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई संगठन अभिप्रेत है ;
(ख) आसूचना संगठन का सदस्य" से किसी आसूचना संगठन में नियुक्त या नियोजित कोई व्यक्ति अभिप्रेत है ;
(ग) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।
3. संगम बनाने, वाक स्वातंत्र्य, आदि के अधिकार के बारे में निर्बन्धन-(1) आसूचना संगठन का कोई सदस्य-
(क) किसी व्यवसाय संघ, श्रमिक संघ, राजनीतिक संगम अथवा किसी वर्ग के व्यवसाय संघ, श्रमिक संघ या राजनीतिक संगम का सदस्य नहीं होगा या उससे किसी रूप में सहयुक्त नहीं होगा ; या
(ख) किसी अन्य ऐसी सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन का, जो उस आसूचना संगठन के, जिसका वह सदस्य है, भाग के रूप में केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है या जो केवल सामाजिक, आमोद-प्रमोदात्मक या धार्मिक प्रकृति का नहीं है, सदस्य नहीं होगा, या उससे किसी रूप में सहयुक्त नहीं होगा अथवा उसके लिए निधियां नहीं जुटाएगा या उसमें कोई पद धारण नहीं करेगा या उसके लिए किसी अन्य रीति से कृत्य नहीं करेगा ; या
(ग) आसूचना संगठन के प्रधान की पूर्व अनुज्ञा के बिना, प्रेस से संपर्क नहीं करेगा या कोई पुस्तक, पत्र, पुस्तिका, पोस्टर या अन्य दस्तावेज प्रकाशित नहीं करेगा या करवाएगा ; या
(घ) ऐसे आसूचना संगठन के, जिसका वह सदस्य है, कार्यकरण, संरचना, कार्मिक या संगठनात्मक क्रियाकलापों से सम्बन्धित किसी विषय पर किसी व्यक्ति से सम्पर्क या पत्र-व्यवहार, पदीय कर्तव्य के प्रयोजनों के सिवाय, नहीं करेगा ; या
(ङ) ऐसे आसूचना संगठन के, जिसका वह सदस्य है, नाम का प्रयोग, ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो आसूचना संगठन के प्रधान द्वारा प्राधिकृत नहीं है या किसी अन्य रीति से, पदीय कार्य और स्वयं संगठन के कार्यकरण से संबंधित प्रयोजनों के सिवाय, नहीं करेगा ।
स्पष्टीकरण-यदि यह प्रश्न उठता है कि क्या कोई सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन इस उपधारा के खण्ड (ख) के अधीन केवल सामाजिक, आमोद-प्रमोदात्मक या धार्मिक प्रकृति का है या नहीं तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(2) आसूचना संगठन का कोई सदस्य, व्यक्तियों के किसी निकाय द्वारा किन्हीं राजनीतिक प्रयोजनों के लिए या ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए, जो विहित किए जाएं, आयोजित किसी अधिवेशन में भाग नहीं लेगा या भाषण नहीं करेगा या किसी प्रदर्शन में भाग नहीं लेगा ।
4. शास्ति-जो कोई व्यक्ति धारा 3 के किन्हीं उपबन्धों का उल्लंघन करेगा वह किसी अन्य ऐसी कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो उसके विरुद्ध की जा सकेगी, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
5. अपराधों का संज्ञेय होना-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 4 के अधीन दण्डनीय सभी अपराध संज्ञेय होंगे ।
6. अनुसूची का संशोधन करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अनुसूची का, उसमें आसूचना या प्रति आसूचना के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित किसी अन्य संगठन को सम्मिलित करके या उसमें से ऐसे संगठन का जो उसमें पहले से ही विनिर्दिष्ट है, लोप करके संशोधन कर सकेगी और अधिसूचना के प्रकाशन पर ऐसे संगठन के बारे में यह समझा जाएगा कि वह, यथास्थिति, अनुसूची में विनिर्दिष्ट है या उसमें से उसका लोप किया गया है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना की प्रति, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
7. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन, केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
अनुसूची
[धारा 2(क) और धारा 6(1) देखिए]
1. आसूचना ब्यूरो ।
2. अनुसंधान और विश्लेषण खंड ।
[3. सुरक्षा महानिदेशालय ।]
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