भारतीय समुद्र द्वारा माल वहन अधिनियम, 1925
(1925 का अधिनियम संख्यांक 26)1
[21 सितम्बर, 1925]
समुद्र द्वारा माल वहन से संबंधित विधि को
संशोधित करने के लिए
अधिनियम
यतः, 1922 के अक्तूबर में ब्रुसेल्स में हुए अन्तरराष्ट्रीय समुद्री विधि सम्मेलन में, सम्मेलन के प्रतिनिधि 2॥। अपनी-अपनी सरकारों से यह सिफारिश करने के लिए सर्वसम्मति से सहमत हुए थे कि वे वहन-पत्रों से संबंधित कुछ नियमों के एकीकरण के लिए एक प्रारूप-कन्वेंशन को कन्वेंशन के आधार के रूप में, अंगीकार कर लें;
और यतः, 1923 के अक्तूबर में ब्रुसेल्स में हुई एक बैठक में उक्त प्रारूप कन्वेंशन में अन्तर्विष्ट नियम, उक्त सम्मेलन द्वारा नियुक्त समिति द्वारा संशोधित किए गए थे;]
3[और यतः, उक्त नियम, 23 फरवरी, 1968 को ब्रुसेल्स में हस्ताक्षरित प्रोटोकोल द्वारा और 21 दिसंबर, 1979 को ब्रूसेल्स में हस्ताक्षरित प्रोटोकोल द्वारा संशोधित किए गए थे;]
4[और यतः यह समीचीन है कि वचन-पत्रों के अधीन वाहकों के उत्तरदायित्वों, दायित्वों, अधिकारों और उन्मुक्तियों को निश्चित करने की दृष्टि से ऐसे यथा-संशोधित, और परिवर्तनों सहित अनुसूची में यथा उपवर्णित, उक्त नियमों को, इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन, विधि का बल प्राप्त होना चाहिए, अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है: -]
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय समुद्र द्वारा माल वहन अधिनियम, 1925 है ।
(2) इसका विस्तार 5[सम्पूर्ण भारत] पर है ।
2. नियमों का लागू होना-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन यह है कि अनुसूची में उपवर्णित नियम (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् “नियम" कहा गया है), 6[भारत] में किसी पत्तन से 6[भारत] में या उसके बाहर किसी अन्य पत्तन को माल का वहन करने वाले पोतों में समुद्र द्वारा माल वहन के संबंध में और उसके बारे में प्रभावी होंगे ।
3. जिन संविदाओं को नियम लागू होते हैं उनमें यात्रा-योग्यता की स्पष्ट वारंटी का विवक्षित न होना-समुद्र द्वारा माल वहन के लिए किसी संविदा में, जिसको नियम लागू होते हैं, माल के वाहक द्वारा यात्रा-योग्य पोत उपलब्ध करने का कोई स्पष्ट परिवचन विवक्षित नहीं होगा ।
4. नियमों के लागू होने के बारे में कथन का वहन पत्र में सम्मिलित किया जाना-भारत में जारी किए गए प्रत्येक वहन-पत्र में, या वैसी ही एक की दस्तावेज में, जिसमें कोई ऐसी संविदा अन्तर्विष्ट है या जो किसी ऐसी संविदा की साक्ष्य है,
- इस अधिनियम का विस्तार 1962 के विनियम सं० 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा गोवा, दमण और दीव पर, 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा पांडिचेरी पर और 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा सम्पूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 52 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा हिज मैसेस्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रतिनिधियों को सम्मिलित करते हुए शब्दों का लोप किया गया ।
- 1993 के अधिनियम सं० 28 की धारा 31 और अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 52 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा तीसरे और चौथे पैरा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा भारत के सभी प्रान्तों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा प्रान्तों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
जिसको नियम लागू होते हैं, इस बात का स्पष्ट कथन होगा कि वह इस अधिनियम द्वारा यथा लागू उक्त नियमों के उपबंधों के अधीन प्रभावी होनी है ।
5. पाल पोतों में और विहित मार्गों से वहन किए जाने वाले माल के संबंध में नियम के अनुच्छेद 6 का परिवर्तन-नियमों का अनुच्छेद 6, -
(क) 6[भारत] में किसी पत्तन से 6[भारत] में या उसके बाहर किसी अन्य पत्तन को माल का वहन करने वाले पाल पोतों में समुद्र द्वारा माल वहन के संबंध में, और
(ख) भारत में किसी ऐसे पत्तन से, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में इस निमित्त अधिसूचित किया गया है, श्रीलंका में किसी ऐसे पत्तन को, जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट है, माल का वहन करने वाले पोतो में समुद्र द्वारा माल वहन के संबंध में,
इस प्रकार प्रभावी होगा मानो उक्त अनुच्छेद में विशेष माल की बजाय किसी वर्ग के माल के प्रति निर्देश हो और मानो उक्त अनुच्छेद के दूसरे पैरा के परन्तुक का लोप कर दिया गया हो ।
6. खुला स्थोरा के संबंध में अनुच्छेद 3 के नियम 4 और 5 का परिवर्तन-जब किसी व्यापार की प्रथा के अनुसार वहन-पत्र में अन्तर्लिखित किसी खुला स्थोरा का भार ऐसा भार है जो वाहक या माल भेजने वाले से भिन्न किसी तृतीय पक्षकार द्वारा अभिनिश्चित या स्वीकृत किया गया है और यह बात कि वह भार इस प्रकार अभिनिश्चित या स्वीकृत किया गया है वहन-पत्र में कथित है तब नियमों में किसी बात के होते हुए भी वहन-पत्र को वाहक के विरुद्ध उस भार के, जो वहन-पत्र में ऐसे अन्तर्लिखित है, माल की प्राप्ति का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य नहीं समझा जाएगा, और लदाई के समय उसका सही होना माल भेजने वाले द्वारा प्रत्याभूत किया गया नहीं समझा जाएगा ।
7. व्यावृत्ति और प्रवर्तन-(1) इस अधिनियम की कोई बात 1[वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) की 1[धारा 331 और भाग 10क] के प्रवर्तन को अथवा समुद्रगामी जलयानों के स्वामियों के दायित्व को सीमित करने वाली तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के प्रवर्तन को प्रभावी नहीं करेगी ।
(2) इस अधिनियम के आधार पर नियम, 1926 की जनवरी की 1 तारीख से पहने न होने वाले किसी ऐसे दिन2 के पूर्व जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, समुद्र द्वारा माल वहन के लिए किसी संविदा को और पूर्वोक्त की किसी संविदा के अनुसरण में, चाहे यथापूर्वोक्त दिन के पूर्व या पश्चात्, जारी किए गए किसी वहन-पत्र या वैसी ही हक की दस्तावेज, को लागू नहीं होंगे ।
अनुसूची
वहन-पत्रों के बारे में नियम
अनुच्छेद 1-परिभाषाएं
इन नियमों में निम्नलिखित पदों के वे अर्थ होंगे जो उन्हें इसमें दिए गए हैं, अर्थात्: -
(क) “वाहक" के अन्तर्गत कोई स्वामी या भाड़े पर लेने वाला व्यक्ति है जो माल भेजने वाले के साथ वहन की संविदा करता है;
(ख) “वहन की संविदा" किसी वहन-पत्र या किसी वैसी ही हक की दस्तावेज के अन्तर्गत आने वाले वहन की संविदाओं को ही लागू होती है जहां तक ऐसी दस्तावेज समुद्र द्वारा माल वहन से संबंधित है और किसी पोत भाटक पत्र के अधीन या उसके अनुसरण में जारी किया गया कोई वहन-पत्र या पूर्वोक्त प्रकार की कोई वैसी ही दस्तावेज उस समय से इसके अन्तर्गत आती है जब से ऐसा वहन-पत्र या वैसी ही हक की दस्तावेज उसके वाहक और धारक की बीच सम्बन्धों को विनियमित करती है;
- 1964 के अधिनियम सं० 52 की धारा 31 और अनुसूची द्वारा धारा 331 और 352 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- जनवरी 1926, देखिए भारत का राजपत्र, 1925, भाग 1, पृ० 950 ।
1[(ग) माल" के अंतर्गत कोई ऐसी संपत्ति है जिसमें जीवित पशु तथा आधान, पट्टिकाएं या परिवहन अथवा पैक करने की वैसी ही वस्तुएं सम्मिलित हैं जो परेषक द्वारा इस बात पर ध्यान दिए बिना प्रदाय की गई हैं कि ऐसी संपत्ति डैक पर है या उसमें ले जाई जानी है या ले जाई जाती है;]
(घ) “पोत" के समुद्र द्वारा माल वहन के लिए प्रयुक्त कोई जलयान अभिप्रेत है;
(ङ) “माल वहन" के अन्तर्गत उस समय से, जब माल पोत पर लादा जाता है, उस समय तक की जब वह उससे उतारा जाता है, अवधि आती है ।
अनुच्छेद 6 के उपबंधों के अधीन रहते हुए समुद्र द्वारा माल वहन की प्रत्येक संविदा के अधीन वाहक, ऐसे माल की लदाई, उठाई-धराई, भराई, वहन, अभिरक्षा, देख-रेख और उतराई के संबंध में उन उत्तरदायित्वों और दायित्वों के अधीन होगा तथा उन अधिकारों और उन्मुक्तियों का हकदार होगा जो इसमें इसके पश्चात् उपवर्णित हैं ।
अनुच्छेद 3-उत्तरदायित्व और दायित्व
1. वाहक, समुद्र यात्रा के पूर्व और प्रारम्भ पर, निम्नलिखित बातों के लिए सम्यक् तत्परता का प्रयोग करने के लिए आबद्ध होगा-
(क) पोत को यात्रा-योग्य बनाना;
(ख) पोत में काम करने वालों, साज-समान और संभरण की उचित व्यवस्था करना;
(ग) पेटों, पशीतक और ठंडे कक्षों को तथा पोत के सब अन्य भागों को, जिनमें माल ले जाया जाता है, माल ग्रहण, वहन और परिरक्षण के लिए उपयुक्त और निरापद बनाना ।
2. अनुच्छेद 4 के अधीन रहते हुए वाहक ले जाए जाने वाले माल की लदाई, उठाई-धराई, भराई-वहन, संरक्षण, देख-रेख और उतराई उचित रूप से और सावधानी के साथ करेगा ।
3. माल को अपने भाराधीन प्राप्त करने पर वाहक अथवा मास्टर या वाहक का अभिकर्ता, माल भेजने वाले की मांग पर, एक वहन-पत्र माल भेजने वाले को देगा जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित बातें होंगी: -
(क) माल की पहचान के लिए आवश्यक मुख्य चिह्न जैसे कि वे माल की लदाई आरम्भ होने से पूर्व माल भेजने वाले द्वारा लिखित रूप में दिए जाते हैं, परन्तु ऐसे चिह्न माल के खुले होने की दशा में माल पर अथवा उन पेटियों या आवेष्टकों में, जिनमें ऐसा माल है, ऐसी रीति से स्टाम्पित या अन्यथा स्पष्ट रूप से दर्शित होने चाहिएं जिससे कि वे समुद्र-यात्रा की समाप्ति तक सामान्य रूप से पढ़े जाने योग्य रहें;
(ख) या तो पैकजों अथवा मदों की संख्या या, यथास्थिति, परिमाण या भार, जैसा कि माल भेजने वाले द्वारा लिखित रूप में दिया गया है;
(ग) माल की दृष्यमान अवस्था और दशा:
परन्तु कोई भी वाहक, मास्टर या वाहक का अभिकर्ता वहन-पत्र में किन्हीं ऐसे चिह्न, संख्या, परिमाण, या भार को कथित करने या दर्शित करने के लिए आबद्ध नहीं होगा जिनके बारे में उसके पास यह संदेह करने का उचित आधार है कि वे वास्तव में प्राप्त माल को सही रूप में प्रतिदर्शित नहीं करते हैं या जिनकी जांच पड़ताल करने का उसके पास कोई समुचित साधन नहीं है ।
4. ऐसा वहन-पत्र, वाहक द्वारा माल की, जैसा कि वह पैरा 3(क), (ख) और (ग) के अनुसार उसमें वर्णित है, प्राप्ति का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होगा । 2[तथापि, तत्प्रतिकूल सबूत तब ग्राह्य नहीं होगा, जब वहन-पत्र सद्भावपूर्वक कार्य करते हुए किसी तृतीय पक्षकार को अन्तरित कर दिया गया है ।]
- 2000 के अधिनियम सं० 44 की धारा 11 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1993 के अधिनियम सं० 28 की धारा 31 और अनुसूची द्वारा (16-10-1992 से) जोड़ा गया ।
5. माल भेजने वाले के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने चिह्नों, संख्या, परिमाण और भार की, जैसा कि वे उसके द्वारा दिए गए हैं, लदान समय पर सही होने की वाहक को प्रत्याभूति दी है और माल भेजने वाला ऐसी विशिष्टियों में गलतियों से पैदा होने या परिणामित होने वाली किसी भी हानि, नुकसान और व्यय के लिए वाहक की क्षतिपूर्ति करेगा । ऐसी क्षतिपूर्ति के बारे में वाहक का अधिकार माल भेजने वाले से भिन्न किसी व्यक्ति के प्रति, वहन की संविदा के अधीन उसके उत्तरदायित्व और दायित्व को किसी भी प्रकार सीमित नहीं करेगा ।
6. यदि हानि या नुकसान की और ऐसी हानि या नुकसान के सामान्य स्वरूप की लिखित सूचना वाहक को या उसके अभिकर्ता को उतराई के पत्तन पर, वहन की संविदा के अधीन माल के परिदान के हकदार व्यक्ति की अभिरक्षा में माल हटाए जाने से पूर्व या हटाए जाने के समय अथवा यदि हानि या नुकसान दृश्यमान नहीं है तो तीन दिन के अन्दर, नहीं दी जाती है तो ऐसा हटाया जाना वहन-पत्र में यथावर्णित माल के वाहक द्वारा परिदान का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होगा ।
लिखित रूप में सूचना देना उस दशा में आवश्यक नहीं होगा जब माल की हालत का उसकी प्राप्ति के समय, संयुक्त सर्वेक्षण या निरीक्षण किया गया है ।
किसी भी दशा में वाहक और पोत का हानि या नुकसान के संबंध में समस्त दायित्व से उन्मोचन हो जाएगा जब तक कि माल के परिदान के, या उस तारीख के, जिसको माल का परिदान किया जाना चाहिए था, पश्चात् एक वर्ष के अन्दर वाद नहीं लाया जाता है ।
1[तथापि इस अवधि को बढ़ाया जा सकेगा यदि पक्षकार वाद हेतुक के उद्भूत होने के पश्चात् इस प्रकार सहमत हो जाएं:
परन्तु यह कि कोई वाद इस उपपैरा में निर्दिष्ट एक वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात्, न्यायालय द्वारा अनुज्ञात तीन मास से अनधिक अतिरिक्त अवधि के भीतर लाया जा सकेगा ।]
किसी वास्तविक या आशंकित हानि या नुकसान की दशा में वाहक और प्रापक माल का निरीक्षण करने और मिलान करने के लिए एक दूसरे को सभी उचित सुविधाएं देंगे ।
7. माल के लादे जाने के पश्चात् वाहक, मास्टर या वाहक के अभिकर्ता द्वारा माल भेजने वाले को दिया जाने वाला वहन-पत्र, माल भेजने वाले द्वारा ऐसी मांग किए जाने पर, “पोत-भरित" वहन-पत्र होगा । परन्तु यदि माल भेजने वाले ने ऐसे माल के लिए कोई हक की दस्तावेज पहले ली है तो वह उसे “पोत-भरित" वहन-पत्र दिए जाने के बदले में अभ्यर्पित कर देगा, किन्तु वाहक के विकल्प पर, ऐसी हक की दस्तावेज पर वाहक, मास्टर या अभिकर्ता द्वारा लदान पत्तन पर उस पोत के नाम या उन पोतों के नाम, जिसमें या जिनमें माल लादा गया है तथा लदान की तारीख या तारीखें लिख ली जा सकेंगी और ऐसे लिख लिए जाने पर वह इस अनुच्छेद के प्रयोजन के लिए पोत-भरित" वहन-पत्र समझा जाएगा ।
8. वहन की संविदा का जो कोई खंड, प्रसंविदा या करार, इस अनुच्छेद में उपबंधित कर्तव्यों और बाध्यताओं में उपेक्षा, गलती या असफलता से माल को या उसके संबंध में, होने वाली हानि या नुकसान के दायित्व से वाहक या पोत को अवमुक्त करता है अथवा ऐसे दायित्व को, इन नियमों में जैसा उपबंधित है उसे अन्यथा कम करता है, वह अकृत और शून्य तथा प्रभावहीन होगा ।
बीमा-प्रसुविधा या वैसा ही कोई खंड वाहक को दायित्व से अवमुक्त करने वाला खण्ड समझा जाएगा ।
अनुच्छेद 4-अधिकार और उन्मुक्तियां
1. यात्रा-योग्य न होने से पैदा होने या परिणामित होने वाली किसी हानि या नुकसान के दायित्वाधीन न तो कोई वाहक और न पोत ही होगा जब तक कि उसका कारण वाहक की ओर से, अनुच्छेद 3 पैरा 1 के उपबन्धों के अनुसार पोत को यात्रा-योग्य बनाने में और यह सुनिश्चित करने में कि पोत में काम करने वालों, साज-समान और संभरण की उचित व्यवस्था है, और पेटे, प्रशीतक तथा ठंडे कक्षों को, और पोत के सब अन्य भागों को, जिनमें माल ले जाया जाता है । माल के ग्रहण, वहन और परिरक्षण के लिए उपयुक्त और निरापद बनाने में सम्यक् तत्परता का अभाव न हो ।
जब कभी यात्रा-योग्य न होने के परिणामस्वरूप हानि या नुकसान होता है, तब यह सिद्ध करने का भार कि सम्यक् तत्परता का प्रयोग किया गया था वाहक या अन्य व्यक्ति पर होगा जो इस धारा के अधीन छूट का दावा करता है ।
2. न तो वाहक न पोत ही उस हानि या नुकसान के लिए उत्तरदायी होगा जो निम्नलिखित से पैदा हो या परिणामित हो: -
(क) पोत के संचालन या प्रबंध में मास्टर, जहाजी, पाइलट या वाहक सेवाओं का कोई कार्य, उपेक्षा या व्यतिक्रम;
(ख) अग्नि, जब तक कि वह वाहक की वास्तविक गलती या मौनानुकूलता से नहीं हुई है;
(ग) समुद्र या अन्य नाव्य जल के खतरे, संकट और दुर्घटनाएं;
(घ) देवकृत;
(ङ) युद्धकृत;
(च) लोकशत्रु कार्य;
(छ) राजाओं, शासकों या साधारण जनता की गिरफ्तारी या अवरोध, अथवा अभिग्रहण जो विधिक आदेशिका के अधीन किया जाए;
(ज) करन्तीन निर्बन्धन;
(झ) माल भेजने वाले या माल के स्वामी, उसके अभिकर्ता या प्रतिनिधि का कोई कार्य या लोप;
(ञ) किसी भी कारण से हड़तालें या तालाबंदियों, या श्रमिकों का रोका जाना या अवरोध, चाहे वह आंशिक हो या आम;
(ट) बलवे और सिविल अशान्ति;
(ठ) समुद्र में जीवन या सम्पत्ति को बचाना या बचाने का प्रयत्न;
(ड) माल के अन्तर्निहित नुक्स, क्वालिटी या खराबी से उसके परिमाण या भार में कमी, या कोई अन्य हानि या नुकसान;
(ढ) अपर्याप्त पैकिंग;
(ण) अपर्याप्त या अनुपयुक्त चिह्न;
(त) अप्रकट खराबियां जो सम्यक् तत्परता बरतने में प्रकट नहीं होती हैं;
(थ) कोई अन्य कारण जो वाहक की वास्तविक गलती या मौनानुकूलता से अथवा वाहक के अभिर्कताओं या सेवकों की गलती या उपेक्षा से न हुआ हो, किंतु यह साबित करने का भार कि वह हानि या नुकसान न तो वाहक की वास्तविक गलती या मौनानुकूलता से और न वाहक के अभिकर्ताओं या सेवकों की गलती या उपेक्षा से ही हुआ है उस व्यक्ति पर होगा जो इस अपवाद के लाभ का दावा करता है ।
3. माल भेजने वाला, वाहक या पोत को हुई किसी ऐसी हानि या नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं होगा जो माल भेजने वाले, उसके अभिकर्ता या उसके सेवकों के किसी कार्य, गलती या उपेक्षा के बिना किसी कारण से पैदा हुआ या परिणामित हुआ हो ।
4. समुद्र में जीवन या सम्पत्ति को बचाने या बचाने के प्रयत्न में किसी विचलन अथवा किसी युक्तियुक्त विचलन को इन नियमों का अथवा वहन की संविदा का अतिलंघन या भंग नहीं समझा जाएगा और उसके परिणामस्वरूप होने वाली किसी हानि या नुकसान के लिए वाहक दायित्वाधीन नहीं होगा ।
5. माल को या उसके संबंध में 1[प्रति पैकेज या यूनिट पर 666.67 विशेष आहरण अधिकारों से अथवा हानिग्रस्त या नुकसानग्रस्त माल के सकल भार के प्रति किलोग्राम दो विशेष आहरण अधिकारों से, इनमें से जो भी उच्चतर हो,] अथवा अन्य करेंसी में उस राशि की समतुल्य रकम से अधिक की किसी हानि या नुकसान के लिए किसी भी दशा में न तो वाहक और न पोत ही दायित्वाधीन होगा या हो जाएगा, जब तक कि ऐसे माल की प्रकृति और उसका मूल्य माल भेजने वाले ने, लदान से पूर्व, घोषित न कर दिया हो और वहन-पत्र में अन्तर्लिखित न कर दिया हो ।
यदि यह घोषणा वहन-पत्र से सम्मिलित होगी तो वह प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होगी, किंतु वाहक के लिए आबद्धकर या निश्चायक नहीं होगी ।
2[जहां किसी आधान, पट्टिका या परिवहन की वैसी ही वस्तु का प्रयोग माल समेकित करने के लिए किया जाता है वहां वहन-पत्र में प्रगणित पैकेजों या यूनिटों की वह संख्या, जो परिवहन की ऐसी वस्तु में पैक की गई है, जहां तक का ऐसे पैकेजों या यूनिटों का संबंध है, इस पैरा के प्रयोजनों के लिए पैकेजों या यूनिटों की संख्या समझी जाएगी ।
इस पैरा में उपबन्धित दायित्व की सीमा के फायदे का न तो वाहक और न पोत ही हकदार होगा, यदि यह साबित हो जाता है कि नुकसान, वाहक के ऐसे कार्य या लोप के परिणामस्वरूप हुआ है, जो नुकसान पहुंचाने के आशय से किया गया था जो बिना सोचे-विचारे और ऐसी जानकारी के साथ किया गया था कि उससे नुकसान होना अधिसंभाव्य है ।
जहां माल की प्रकृति या मूल्य का माल भेजने वाले द्वारा वहन-पत्र में जानबूझकर मिथ्या कथन किया गया है वहां वाहक या पोत का दायित्व इस प्रकार कथित मूल्य से अधिक नहीं होगा ।]
इस पैरा में उल्लिखित रकम से भिन्न अधिकतम रकम वाहक, मास्टर या वाहक के अभिकर्ता और माल भेजने वाले के बीच करार से नियत की जा सकती है, परन्तु ऐसी अधिकतम रकम ऊपर दी गई रकम से कम नहीं होगी ।
माल को या उसके संबंध में होने वाले किसी हानि या नुकसान के लिए किभी भी दशा में न तो वाहक और न पोत ही उत्तरदायी होगा यदि उसकी प्रकृति या मूल्य का माल भेजने वाले द्वारा वहन-पत्र में जानबूझकर मिथ्या कथन किया गया है ।
6. ज्वलनशील, विस्फोटक या खतरनाक प्रकार का माल, जिसके लदान के लिए, उसके प्रकृति और लक्षण को जानते हुए, वाहक, मास्टर या वाहक के अभिकर्ता ने सम्मति नहीं दी है, उतराई से पूर्व किसी भी समय वाहक द्वारा प्रतिकर के बिना किसी भी स्थान पर उतारा जा सकेगा, या नष्ट किया जा सकेगा या हानि रहित कर दिया जा सकेगा और ऐसे माल का भेजने वाला ऐसे लदान से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पैदा होने वाले या परिणामित होने वाले सभी प्रकार के नुकसान और व्यय के दायित्वाधीन होगा ।
यदि ऐसी जानकारी और सम्मति से लादा गया कोई माल पोत या स्थोरा के लिए खतरनाक हो जाता है तो उसे वाहक द्वारा उसी प्रकार से किसी स्थान पर उतारा जा सकेगा या नष्ट किया जा सकेगा या हानि रहित कर दिया जा सकेगा तथा सामान्य औसत के अतिरिक्त, यदि कोई हो, वाहक का और किसी भी प्रकार का दायित्व नहीं होगा ।
अनुच्छेद 5-अधिकारों और उन्मुक्तियों का अभ्यर्पण तथा उत्तरदायित्वों और दायित्वों की वृद्धि
कोई भी वाहक इन अनुच्छेदों में से किन्हीं अन्तर्विष्ट नियमों के अधीन अपने सब अधिकारों और उन्मुक्तियों को या उनमें से किसी को पूर्णतः या भागतः अभ्यर्पित करने के लिए अथवा अपने उत्तरदायित्वों और दायित्वों में से किसी को बढ़ाने के लिए स्वतन्त्र होगा, परन्तु ऐसा अभ्यर्पण या ऐसी वृद्धि माल भेजने वाले को दिए गए वहन-पत्र में उल्लिखित की जाएगी ।
- 1993 के अधिनियम सं० 28 की धारा 31 और अनुसूची द्वारा (16-10-1992 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1993 के अधिनियम सं० 28 की धारा 31 और अनुसूची द्वारा (16-10-1992 से) अंतःस्थापित ।
इन नियमों के उपबन्ध पोत भाटक पत्रों को लागू नहीं होंगे, किन्तु यदि किसी पोत भाटक पत्र के अधीन किसी पोत के संबंध में वहन-पत्र जारी किए जाते हैं तो वे नियमों के निबंधनों का अनुपालन करेंगे । इन नियमों की कोई बात सामान्य औसत के बारे में किसी भी विधिपूर्ण उपबन्ध को किसी वहन-पत्र में अन्तर्लिखित करने से रोकने वाली नहीं समझी जाएगी ।
अनुच्छेद 6-विशेष शर्तें
पूर्वगामी अनुच्छेदों के उपबन्धों के होते हुए भी यह है कि कोई वाहक, मास्टर या वाहक का अभिकर्ता और कोई माल भेजने वाले किसी विशेष माल के संबंध में इस बात के लिए स्वतन्त्र होगा कि ऐसे माल के लिए वाहक के उत्तरदायित्व और दायित्व के बारे में, तथा ऐसे माल के संबंध में वाहक के अधिकारों और उन्मुक्तियों के बारे में, अथवा यात्रा-योग्यता से संबंधित उसकी बाध्यता के बारे में, किन्हीं भी निबन्धनों के अनुसार कोई करार करे जहां तक कि ऐसा अनुबंध लोकनीति के, अथवा समुद्र द्वारा ले जाए गए माल की लदाई, उठाई-धराई, भराई, वहन, अभिरक्षा, देख-रेख और उतराई से संबंधित उसके सेवकों या अभिकर्ताओं की देख-रेख या तत्परता के प्रतिकूल न हो, परन्तु तब जब कि ऐसे मामले में कोई वहन-पत्र नहीं दिया गया है या नहीं दिया जाएगा, और करार पाए गए निबंधन एक पावती में समाविष्ट किए जाएंगे जो अपरक्राम्य दस्तावेज होगी और वैसे चिह्नित की जाएगी ।
ऐसे किए गए करार का पूरा विधिक प्रभाव होगा:
परन्तु यह अनुच्छेद व्यापार के सामान्य अनुक्रम में किए गए सामान्य वाणिज्यिक लदानों को लागू नहीं होगा, किन्तु केवल ऐसे अन्य लदानों को लागू होगा, जिनमें ले जाई जाने वाली सम्पत्ति की प्रकृति या दशा अथवा वे परिस्थितियां, निबंधन और शर्तें जिनके अधीन वहन किया जाना है, ऐसी हैं जिनसे विशेष करार उचित रूप से युक्तिसंगत प्रतीत होता है ।
इसमें अन्तर्विष्ट कोई बात किसी वाहक या माल भेजने वाले को उस पोत पर लादने के पूर्व और उससे उतारने के पश्चात् जिस पर कि माल समुद्र द्वारा ले जाया जाता है, माल को या उसके संबंध में, उसकी अभिरक्षा और देख-रेख और उठाई-धराई से, होने वाली हानि या नुकसान के लिए वाहक या पोत के उत्तरदायित्व और दायित्व के बारे में कोई करार, अनुबंध, शर्तें, आरक्षण या छूट की व्यवस्था करने से नहीं रोकेगी ।
अनुच्छेद 8-दायित्व का परिसीमन
इन नियमों के उपबन्ध समुद्रगामी जलयानों के स्वामियों के दायित्व को सीमित करने से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी कानून के अधीन वाहक के अधिकारों और उसकी बाध्यताओं को प्रभावी नहीं करेंगे ।
अनुच्छेद 9
इस नियमों में उल्लिखित मुद्रा-यूनिटों को स्वर्ण मूल्य माना जाएगा ।
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