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अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 2001 ( Advocates' Welfare Fund Act, 2001 )


 

अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 2001

(2001 का अधिनियम संख्यांक 45)

[14 सितम्बर, 2001]

अधिवक्ताओं के फायदे के लिए एक कल्याण निधि का गठन करने और उससे संबंधित या

उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के बावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 2001 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा नियत करे; और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए और भिन्न-भिन्न राज्यों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का किसी राज्य के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) अधिवक्ता" से कोई ऐसा अधिवक्ता अभिप्रेत है जिसका नाम अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 17 के अधीन किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा तैयार की गई और रखी गई नामावली में दर्ज किया गया है और जो किसी राज्य विधिज्ञ संगम या राज्य अधिवक्ता संगम का सदस्य है;           

(ख) समुचित सरकार" से अभिप्रेत है, -

(i) किसी राज्य की विधिज्ञ परिषद् की नामावली में सम्मिलित अधिवक्ताओं की दशा में राज्य सरकार;

(ii) किसी संघ राज्यक्षेत्र की विधिज्ञ परिषद् की नामावली में सम्मिलित अधिवक्ताओं की दशा में केन्द्रीय सरकार;       

(ग) विधि व्यवसाय बंद किया जाना" से अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 26क के अधीन राज्य नामावली से किसी अधिवक्ता के नाम का हटाया जाना अभिप्रेत है;

(घ) अध्यक्ष" से धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (क) मे निर्दिष्ट न्यासी समिति का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ङ) चार्टर्ड अकाउंटेंट" से चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथापरिभाषित ऐसा चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र प्राप्त किया हो;

(च) आश्रितों" से निधि के किसी सदस्य के पति या पत्नी, माता-पिता या अवस्यक संतान अभिप्रेत है;

(छ) निधि" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित अधिवक्ता कल्याण निधि अभिप्रेत है;

(ज) बीमाकर्ता" का वही अर्थ है जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (9) में है;

(झ) निधि का सदस्य" से निधि के फायदों के लिए सम्मिलित ऐसा अधिवक्ता अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन उसके सदस्य के रूप में बना रहता है;

(ञ) अधिसूचना" से समुचित सरकार के राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है और अधिसूचित" पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा; 

(ट) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ठ) अनुसूची" से इस अधिनियम की अनुसूची अभिप्रेत है;

() अनुसूचित बैंक" का वही अर्थ है जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 2 के खंड () में है;

(ढ) स्टांप" से धारा 26 के अधीन मुद्रित और वितरित अधिवक्ता कल्याण निधि स्टांप अभिप्रेत है;

() राज्य" से संविधान की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट राज्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत संघ राज्यक्षेत्र भी है;

(त) राज्य अधिवक्ता संगम" से धारा 16 के अधीन किसी राज्य की विधिज्ञ परिषद् द्वारा मान्यताप्राप्त उस राज्य में कोई अधिवक्ता संगम अभिप्रेत है;

(थ) राज्य विधिज्ञ संगम" से धारा 16 के अधीन किसी राज्य में, उस राज्य की विधिज्ञ परिषद् द्वारा मान्यताप्राप्त अधिवक्ताओं का संगम अभिप्रेत है;

(द) राज्य विधिज्ञ परिषद्" से अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 3 में निर्दिष्ट कोई विधिज्ञ परिषद् अभिप्रेत है;

(ध) विधि व्यवसाय का निलंबन" से अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय का स्वैच्छिक निलंबन या अवचार के लिए किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा किसी अधिवक्ता का निलंबन अभिप्रेत है;

() न्यासी समिति" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित अधिवक्ता कल्याण निधि न्यासी समिति अभिप्रेत है;

() वकालतनामा" के अंतर्गत उपसंजाति ज्ञापन या कोई अन्य दस्तावेज आता है जिसके द्वारा कोई अधिवक्ता किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष उपसंजात होने या अभिवाक् करने के लिए सशक्त किया गया है;

(फ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किंतु अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो क्रमशः उनके उस अधिनियम मे हैं ।

अध्याय 2

अधिवक्ता कल्याण निधि का गठन

3. अधिवक्ता कल्याण निधि-(1) समुचित सरकार, एक कल्याण निधि का गठन करेगी जिसका नाम, अधिवक्ता कल्याण निधि" होगा ।

(2) निधि में निम्नलिखित जमा किया जाएगा-

 (क) धारा 15 के अधीन राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा संदत्त सभी रकमें;

(ख) राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा किया गया कोई अन्य अभिदाय;

(ग) भारतीय विधिज्ञ परिषद्, किसी राज्य विधिज्ञ संगम, किसी राज्य अधिवक्ता संगम या अन्य संगम या संस्था या किसी अधिवक्ता या अन्य व्यक्ति द्वारा निधि को किया गया कोई स्वैच्छिक संदान या अभिदाय;

(घ) कोई ऐसा अनुदान जो इस निमित्त किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात् केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा निधि को किया जाए;

(ङ) धारा 12 के अधीन उधार ली गई कोई राशि;

(च) धारा 18 के अधीन संगृहीत सभी राशियां;

(छ) निधि के किसी सदस्य की मृत्यु पर, किसी समूह बीमा पालिसी के अधीन भारतीय जीवन बिना निगम या किसी अन्य बीमाकर्ता से प्राप्त सभी राशियां;

(ज) निधि के सदस्यों की समूह बीमा पालिसियों की बाबत भारतीय जीवन बीमा निगम या किसी अन्य बीमाकर्ता से प्राप्त कोई लाभ या लाभांश या प्रतिदाय;

(झ) निधि के किसी भाग से किए गए किसी विनिधान पर कोई ब्याज या लाभांश या अन्य प्रत्यागम;

(ञ) धारा 26 के अधीन स्टांपों के विक्रय द्वारा संगृहीत सभी राशियां ।

(3) उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट राशि का संदाय या उनका संग्रहण ऐसे अभिकरणों द्वारा, ऐसे अंतरालों पर और ऐसी रीति से किया जाएगा, जो विहित की जाए ।

अध्याय 3

न्यासी समिति की स्थापना

4. न्यासी समिति की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से जो समुचित सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, एक न्यासी समिति की स्थापना की जाएगी जिसका नाम, अधिवक्ता कल्याण निधि न्यासी समिति" होगा

(2) न्यासी समिति एक निगमित निकाय होगी जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और जिसे संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की शक्ति होगी और जो उक्त नाम से वाद ला सकेगी और उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा ।

(3) न्यासी समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी-

(क)         किसी राज्य का महाधिवक्ता                                                                                                -अध्यक्ष, पदेन:

परंतु जहां किसी राज्य का कोई महाधिवक्ता नहीं है वहां समुचित सरकार किसी वरिष्ठ अधिवक्ता को अध्यक्ष के रूप में नामनिर्दिष्ट करेगी;              

(ख)         समुचित सरकार के अपने विधि विभाग या

               मंत्रालय का सचिव                                                                                                                   -सदस्य, पदेन ;

(ग)         समुचित सरकार के अपने गृह विभाग या

       मंत्रालय का सचिव                                                                                                                   -सदस्य, पदेन;

(घ)         राज्य विधिज्ञ परिषद् का अध्यक्ष                                                                                          -सदस्य, पदेन;

(ङ)          सरकारी प्लीडर या लोक अभियोजक जो समुचित

       सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाए                                                                                -सदस्य, पदेन; 

(च)         दो अधिवक्ता, जो राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा

       नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे                                                                                                       -सदस्य, पदेन; 

(छ)         राज्य विधिज्ञ परिषद् का सचिव                                                                                             -सदस्य, पदेन ।

(4) उपधारा (3) के खंड (क) के परन्तुक के अधीन नामनिर्दिष्ट अध्यक्ष, पद ग्रहण करने की तारीख से तीन वर्ष से अनधिक अवधि के लिए पद धारण करेगा ।

(5) उपधारा (3) के खंड (ङ) या खंड (च) के अधीन नामनिर्दिष्ट न्यासी समिति का प्रत्येक सदस्य पद ग्रहण करने की तारीख से तीन वर्ष से अनधिक अवधि के लिए पद धारण करेगा ।

5. न्यासी समिति के अध्यक्ष या सदस्य की निरर्हताएं और उसका हटाया जाना-(1) समुचित सरकार, न्यासी समिति के अध्यक्ष या किसी ऐसे सदस्य को पद से हटाएगी-

(क) जो अनुन्मोचित दिवालिया है या किसी समय इस रूप में न्यायनिर्णीत किया गया है; या

(ख) जो न्यासी समिति के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में कार्य करने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम हो गया है; या

(ग) जो किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें समुचित सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्वलित है; या

(घ) जिसने ऐसे वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिए हैं जिससे न्यासी समिति के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

() जिसने अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है जिससे उसका पद पर बने रहना लोकहित के लिए हानिकर होगा; या

(च) जो किसी समय न्यासी समिति के लगातार तीन से अधिक अधिवेशनों में न्यासी समिति की इजाजत के बिना अनुपस्थित है या रहा है:

परंतु न्यासी समिति, पर्याप्त आधारों पर ऐसे अध्यक्ष या सदस्य की अनुपस्थिति माफ कर सकेगी ।

(2) न्यासी समिति का अध्यक्ष या कोई सदस्य उपधारा (1) के खंड (घ) या खंड (ङ) के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।

6. न्यासी समिति के नामनिर्दिष्ट अध्यक्ष और सदस्यों द्वारा पद त्याग और आकस्मिक रिक्ति का भरा जाना-(1) धारा 4 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट अध्यक्ष या उस धारा की उपधारा (3) के खंड (ङ) के अधीन नामनिर्देशित सदस्य, समुचित सरकार को लिखित में तीन मास की सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और समुचित सरकार द्वारा ऐसा त्यागपत्र स्वीकार कर लिए जाने पर ऐसा अध्यक्ष या सदस्य अपना पद रिक्त कर देगा ।

(2) धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (च) के अधीन नामनिर्देशित कोई सदस्य, राज्य विधिज्ञ परिषद् को लिखित में तीन मास की सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा ऐसा त्यागपत्र स्वीकार कर लिए जाने पर ऐसा सदस्य अपना पद रिक्त कर देगा ।

(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट ऐसे अध्यक्ष और किसी सदस्य के जिसने पद त्याग किया है, पद में कोई आकस्मिक रिक्ति, यथाशक्यशीघ्र समुचित सरकार द्वारा भरी जा सकेगी और इस प्रकार नामनिर्देशित अध्यक्ष या सदस्य, केवल तब तक पद धारण करेगा जब तक कि ऐसा अध्यक्ष या सदस्य, जिसके स्थान पर उसका नामनिर्देशन किया गया है, पद धारण करने का हकदार होता, यदि रिक्ति न हुई होती ।

(4) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी सदस्य के, जिसने पद त्याग किया है, पद में कोई आकस्मिक रिक्ति, यथाशक्यशीघ्र, राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा भरी जा सकेगी और इस प्रकार नामनिर्देशित सदस्य, तब तक पद धारण करेगा जब तक कि वह सदस्य जिसके स्थान पर उसका नामनिर्देशन किया गया है, पद धारण करने का हकदार होता, यदि रिक्ति न हुई होती ।

7. रिक्तियों आदि से न्यासी समिति की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-न्यासी समिति का कोई कार्य या कार्यवाही, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-

(क) न्यासी समिति में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या

(ख) न्यासी समिति के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के नामनिर्देशन में कोई त्रुटि या अनियमितता है; या

(ग) न्यासी समिति का प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणावगुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।

8. न्यासी समिति के अधिवेशन-(1) न्यासी समिति प्रत्येक तीन कलैंडर मास में कम-से-कम एक बार अधिवेशन करेगी और इस अधिनियम तथा तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन कारबार के संव्यवहार के लिए प्रत्येक वर्ष कम-से-कम ऐसे चार अधिवेशन किए जाएंगे ।

(2) न्यासी समिति के तीन सदस्यों से न्यासी समिति के किसी अधिवेशन की गणपूर्ति होगी ।

(3) न्यासी समिति का अध्यक्ष या, यदि वह किसी अन्य कारण से न्यासी समिति के अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है, तो अधिवेशन में उपस्थित न्यासी समिति के सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित कोई अन्य सदस्य, अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(4) ऐसे सभी प्रश्न जो न्यासी समिति के अधिवेशन में आते हैं, उपस्थित और मतदान करने वाले न्यासी समिति के सदस्यों के बहुमत द्वारा विनिश्चित किए जाएंगे और मतों के समान होने की दशा में अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में न्यासी समिति की अध्यक्षता करने वाले सदस्य का, निर्णायक मत होगा ।

9. न्यासी समिति के नामनिर्दिष्ट अध्यक्ष और सदस्यों को यात्रा और दैनिक भत्ते-धारा 4 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट अध्यक्ष और उस धारा की उपधारा (3) के उपखंड () और उपखंड () में निर्दिष्ट न्यासी सीमिति के सदस्य ऐसे यात्रा और दैनिक भत्ते संदत्त किए जाने के हकदार होंगे, जो राज्य विधिज्ञ परिषद् के सदस्यों को ग्राह्य हैं

10. निधि का निहित होना और उसका उपयोजन-निधि इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए और उसके प्रयोजनों के लिए न्यासी समिति में निहित होगी और उसके द्वारा धारित तथा उपयोजित की जाएगी ।

11. न्यासी समिति के कृत्य-(1) इस अधिनियम और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यासी समिति निधि का प्रशासन करेगी ।

(2) उपधारा (1) में अतंर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना न्यासी समिति, - 

(क) निधि की रकमों और आस्तियों को न्यास में धारण करेगी;

(ख) निधि में सदस्यों के रूप में प्रवेश या पुनः प्रवेश के लिए आवेदन प्राप्त करेगी और ऐसे आवेदनों का उनकी प्राप्ति तारीख से नब्बे दिन के भीतर निपटान करेगी;

(ग) यथास्थिति, निधि के सदस्यों, उनके नामनिर्देशितियों या विधिक वारिसों से निधियों से संदाय के लिए आवेदन प्राप्त करेगी, ऐसी जांच करेगी जो वह आवश्यक समझे और आवेदनों को उनकी प्राप्ति की तारीख से पांच मास के भीतर निपटाएगी;

(घ) न्यासी समिति की कार्यवृत्त पुस्तक में, आवेदनों के संबंध में अपने विनिश्चय अभिलिखित करेगी;

(ङ) निधि के सदस्यों या, यथास्थिति, उनके नामनिर्देशितियों या विधिक वारिसों को अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट दरों पर रकमों का संदाय करेगी;

(च) समुचित सरकार और राज्य विधिज्ञ परिषद् को ऐसी कालिक और वार्षिक रिपोर्टें भेजेगी जो विहित की जाएं;

() आवेदकों को रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा या इलेक्ट्रानिक पद्धति के माध्यम से, निधि में सदस्यों के रूप में प्रवेश या पुनः प्रवेश के लिए आवेदनों के संबंध में न्यासी समिति के विनिश्चय या निधि के फायदे के दावों को संसूचित करेगी

(ज) ऐसे अन्य कार्य करेगी, जो इस अधिनियम के अधीन या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन किए जाते हैं, या किए जाएं या किए जाने के लिए अपेक्षित हों ।

12. उधार लेना और विनिधान-(1) न्यासी समिति, समुचित सरकार और राज्य विधिज्ञ परिषद् के पूर्व अनुमोदन से, समय-समय पर, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए अपेक्षित राशि उधार ले सकेगी ।

(2) न्यासी समिति, सभी धनों और प्राप्तियों को, जो निधि का भाग हैं, किसी अनुसूचित बैंक में जमा करेगी या उसका समुचित सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगम की ऋण लिखतों में विनिधान करेगी या समुचित सरकार द्वारा प्लवित ऋणों में या ऐसी अन्य रीति में, जो राज्य विधिज्ञ परिषद्, समय-समय पर समुचित सरकार के पूर्व अनुमोदन से निदेश दे, विनिधान करेगी ।

(3) इस अधिनियम के अधीन देय और संदेय सभी रकम और निधि के प्रबंध और प्रशासन से संबंधित सभी व्यय निधि में से संदत्त किए जाएंगे ।

13. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) न्यासी समिति उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगी और लेखाओं का वार्षिक विवरण और वार्षिक रिपोर्ट ऐसे प्ररूप और ऐसी रीति में तैयार करेगी, जो विहित की जाए ।

(2) न्यासी समिति के लेखाओं की वार्षिक रूप से राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा नियुक्त चार्टर्ड अकाउन्टेंट द्वारा लेखा परीक्षा की जाएगी ।

(3) चार्टर्ड अकाउन्टेंट द्वारा लेखा परीक्षा किया गया न्यासी समिति का लेखा उसकी लेखा परीक्षा रिपोर्ट के साथ उस समिति द्वारा राज्य विधिज्ञ परिषद् को भेजा जाएगा और राज्य विधिज्ञ परिषद् उसके संबंध में न्यासी समिति को ऐसे निदेश जारी कर सकेगी, जो वह ठीक समझे ।

(4) न्यासी समिति, उपधारा (3) के अधीन राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा जारी निदेशों का अनुपालन करेगी ।

(5) न्यासी समिति, निधि में से लेखा परीक्षा के लिए ऐसे प्रभारों का संदाय करेगी जो राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा नियत किए जाएं ।

14. सचिव की शक्तियां और कर्तव्य-न्यासी समिति का सचिव, -

() न्यासी समिति का मुख्य कार्यकारी प्राधिकारी होगा और उसके विनिश्चयों को कार्यान्वित करने के लिए दायी होगा;

(ख) न्यासी समिति की ओर से और उसके विरुद्ध, सभी वादों और कार्यवाहियों में, न्यासी समिति का प्रतिनिधित्व करेगा;

(ग) न्यासी समिति के सभी विनिश्चयों और विलेखों को अपने हस्ताक्षर से प्राधिकृत करेगा;

(घ) अध्यक्ष के साथ संयुक्त रूप से न्यासी समिति के बैंक खाते का संचालन करेगा;

(ङ) न्यासी समिति के अधिवेशन बुलाएगा और ऐसे अधिवेशनों के कार्यवृत्त तैयार करेगा;

(च) सभी आवश्यक अभिलेखों और जानकारी के साथ न्यासी समिति के अधिवेशनों में उपस्थित होगा;

(छ) ऐसे प्ररूप, रजिस्टर और अन्य अभिलेख रखेगा, जो समय-समय पर विहित किए जाएं और न्यासी समिति से संबंधित सभी पत्र-व्यवहार करेगा;

(ज) वित्तीय वर्ष के दौरान न्यासी समिति द्वारा किए गए कारबार का वार्षिक विवरण तैयार करेगा;

(झ) ऐसे अन्य कार्य करेगा जो न्यासी समिति और राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा निदेशित हैं या किए जाएं ।

15. राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा कतिपय धनों का निधि में संदाय-राज्य विधिज्ञ परिषद्, निधि में वार्षिक रूप से ऐसी रकम का संदाय करेगी जो अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 24 के खंड (च) के अधीन प्राप्त की गई नामांकन फीस के बीस प्रतिशत के बराबर हो ।

अध्याय 4

अधिवक्ताओं के किसी संगम की मान्यता

16. अधिवक्ताओं के किसी संगम की राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा मान्यता-(1) अधिवक्ताओं का कोई संगम, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्व एक संगम के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, ऐसी तारीख से पूर्व, जो राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा इस निमित्त अधिसूचित की जाए, मान्यता के लिए राज्य विधिज्ञ परिषद् को ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, आवेदन कर सकेगा ।

(2) अधिवक्ताओं का कोई संगम, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से या उसके पश्चात् एक संगम के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, संगम के रूप में अपने रजिस्ट्रीकरण की तारीख से तीन मास के भीतर राज्य विधिज्ञ परिषद् को ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए, मान्यता के लिए आवेदन कर सकेगा

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन मान्यता के लिए प्रत्येक आवेदन के साथ, -

(क) संगम के नियमों और उपनियमों की एक प्रति होगी;

(ख) संगम के पदधारियों के नाम और पते होंगे;

(ग) संगम के सदस्यों की एक सूची होगी, जिसमें प्रत्येक सदस्य का नाम, पता, उम्र, राज्य विधिज्ञ परिषद् की नामांकन संख्या और नामंकन की तारीख तथा व्यवसाय का साधारण स्थान अंतर्विष्ट होगा ।

(4) राज्य विधिज्ञ परिषद् ऐसी जांच के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, संगम को मान्यता दे सकेगी और मान्यता का प्रमाणपत्र, ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए, जारी कर सकेगी । 

(5) उपधारा (4) के अधीन राज्य विधिज्ञ परिषद् का किसी संगम की मान्यता के बारे में किसी भी विषय पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में, रजिस्ट्रीकृत" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत या रजिस्ट्रीकृत समझा गया अभिप्रेत है ।

17. राज्य विधिज्ञ संगमों और राज्य अधिवक्ता संगमों के कर्तव्य-(1) प्रत्येक राज्य विधिज्ञ संगम और राज्य अधिवक्ता संगम, प्रत्येक वर्ष 15 अप्रैल को या उससे पूर्व राज्य विधिज्ञ परिषद् को उस वर्ष की 31 मार्च को यथाविद्यमान अपने सदस्यों की सूची भेजेगा ।

(2) प्रत्येक राज्य विधिज्ञ संगम और राज्य अधिवक्ता संगम, राज्य विधिज्ञ परिषद् को-

(क) सदस्यता में किसी परिवर्तन की, जिसके अंतर्गत प्रवेश और पुनः प्रवेश सम्मिलित हैं, ऐसे परिवर्तन के तीस दिन के भीतर सूचना देगा;

(ख) अपने सदस्यों में से किसी की मृत्यु या व्यवसाय की अन्यथा समाप्ति की या व्यवसाय के स्वैच्छिक निलंबन की घटना की तारीख से तीस दिन के भीतर, सूचना देगा;

(ग) ऐसे अन्य विषय की सूचना देगा, जो राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा समय-समय पर अपेक्षित हो ।

अध्याय 5

सदस्यता और अधिवक्ता कल्याण निधि में से संदाय

18. निधि की सदस्यता-(1) इस अधिनियम के प्रांरभ से पूर्व, राज्य के किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण में व्यवसायरत प्रत्येक अधिवक्ता, जो उस राज्य में किसी राज्य विधिज्ञ संगम या राज्य अधिवक्ता संगम का सदस्य है, इस अधिनियम के प्रारंभ से छह मास के भीतर न्यासी समिति को निधि के सदस्य के रूप में प्रवेश के लिए, ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए, आवेदन करेगा ।

(2) प्रत्येक व्यक्ति जो, -

() इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् राज्य विधिज्ञ परिषद् की नामावली में अधिवक्ता के रूप में सम्मिलित किया गया है;

(ख) राज्य के किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण में व्यवसाय कर रहा है और जो उस राज्य में राज्य विधिज्ञ संगम का या राज्य अधिवक्ता संगम का सदस्य है,

अधिवक्ता के रूप में अपने नामंकन के छह मास के भीतर न्यासी समिति को निधि के सदस्य के रूप में प्रवेश के लिए ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए, आवेदन करेगा ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर न्यासी समिति, ऐसी जांच करेगी जो वह उचित समझे और या तो आवेदक को निधि में प्रवेश देगी या अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से आवेदन को अस्वीकार कर देगी:

परंतु आवेदन को अस्वीकार करने वाला कोई आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक को सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो ।

(4) प्रत्येक आवेदक, आवेदन के साथ न्यासी समिति के खाते में दो सौ रुपए की आवेदन फीस का संदाय करेगा । 

(5) प्रत्येक अधिवक्ता, जो निधि का सदस्य है, निधि में प्रत्येक वर्ष 31 मार्च को या उससे पूर्व पचास रुपए के वार्षिक अभिदान का संदाय करेगा:

परंतु प्रत्येक अधिवक्ता, जिसने उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन आवेदन किया है अपने पहले वार्षिक अभिदान का निधि में सदस्य बनने के तीन मास के भीतर संदाय करेगा:

परंतु यह और कि कोई ज्येष्ठ अधिवक्ता, एक हजार रुपए का वार्षिक अभिदान करेगा ।

(6) निधि का ऐसा कोई सदस्य, जो किसी वर्ष के लिए वार्षिक अभिदाय का उस वर्ष के 31 मार्च से पूर्व संदाय करने में असफल रहा है, निधि की सदस्यता से हटाए जाने के लिए दायी होगा ।

(7) निधि के किसी सदस्य को, जिसे उपधारा (6) के अधीन निधि की सदस्यता से हटाया गया है, ऐसे हटाए जाने की तारीख से छह मास के भीतर दस रुपए की पुनः प्रवेश फीस के साथ बकायों का संदाय करने पर निधि में पुनः प्रवेश दिया जा सकेगा

(8) निधि का प्रत्येक सदस्य, निधि की सदस्यता में प्रवेश के समय अपने आश्रितों में से एक या अधिक का नामांकन, उसकी मृत्यु की दशा में इस अधिनियम के अधीन सदस्य को संदेय किसी राशि को प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करते हुए, करेगा ।

(9) यदि निधि का कोई सदस्य, उपधारा (8) के अधीन एक से अधिक व्यक्तियों का नामांकन करता है तो वह नामांकन में नामनिर्देशितियों में से प्रत्येक को संदेय रकम या अंश विनिर्दिष्ट करेगा । 

(10) निधि का कोई सदस्य किसी भी समय न्यासी समिति को लिखित में सूचना भेजकर नामांकन रद्द कर सकेगा

(11) निधि का प्रत्येक सदस्य, जिसने उपधारा (10) के अधीन अपना नामांकन रद्द किया है, पांच रुपए की रजिस्ट्रीकरण फीस के साथ नया नामांकन करेगा ।

(12) निधि का प्रत्येक ऐसा सदस्य, जिसका नाम अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 26 के अधीन राज्य की नामावली से हटा दिया गया है या जो स्वेच्छा से व्यवसाय निलंबित करता है, ऐसे हटाए जाने या निलंबन के पन्द्रह दिन के भीतर ऐसे हटाए जाने या निंलबन की जानकारी न्यासी समिति को देगा और यदि निधि का कोई सदस्य बिना किसी पर्याप्त कारण के ऐसा करने में असफल रहता है तो न्यासी समिति ऐसे सिद्धांतों के अनुसार जो विहित किए जाएं इस अधिनियम के अधीन उस सदस्य को संदेय रकम को कम कर सकेगी   

19. निधि के किसी सदस्य को अनुग्रह अनुदान-न्यासी समिति, निधि के किसी सदस्य द्वारा उसे किए गए आवेदन पर और दावे की सत्यता के बारे में अपना समाधान करने के पश्चात् निम्नलिखित आधार पर निधि में से ऐसे सदस्य को अनुग्रह अनुदान अनुज्ञात कर सकेगी, -

(क) उसके अस्पताल में भर्ती होने की दशा में या बड़ी शल्य क्रिया की दशा में; या

() यदि वह यक्ष्मा, कुष्ठरोग, लकवा, कैंसर, विकृतचित्त या ऐसी ही अन्य गंभीर बीमारी या निःशक्तता से पीड़ित है

20. पुनर्विलोकन-न्यासी समिति, स्वप्रेरणा से या किसी हितबद्ध व्यक्ति से प्राप्त आवेदन पर, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन उसके द्वारा आदेश पारित किए जाने के नब्बे दिन के भीतर, ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगी, यदि वह किसी भूल के अधीन पारित किया गया था, चाहे वह तथ्य की हो या विधि की या किसी तात्त्विक तथ्य की उपेक्षा से हो:

परंतु न्यासी समिति, इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला ऐसा कोई आदेश तब तक पारित नहीं करेगी जब तक कि ऐसे व्यक्ति को सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो ।

21. व्यवसाय के बंद करने पर रकम का संदाय-(1) प्रत्येक अधिवक्ता को, जो पांच वर्ष से अन्यून अवधि के लिए निधि का सदस्य रहा है, अपना व्यवसाय बंद करने पर, अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट दर पर रकम का संदाय किया जाएगा:

परन्तु जहां न्यासी समिति का यह समाधान हो गया है कि निधि के किसी सदस्य ने ऐसी निधि के सदस्य के रूप में उसके प्रवेश की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर अपना व्यवसाय किसी स्थायी निःशक्तता के कारण बंद किया है वहां न्यासी समिति ऐसे सदस्य को अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट दर पर रकम का संदाय कर सकेगी ।

(2) जहां निधि के किसी सदस्य की मृत्यु उपधारा (1) के अधीन संदेय रकम को प्राप्त करने से पूर्व हो जाती है वहां, यथास्थिति, उसके नामनिर्देशिती या विधिक वारिस को निधि के मृतक सदस्य को संदेय रकम संदत्त की जाएगी

22. निधि में सदस्य के हित के अन्य संक्रामण, कुर्की, आदि पर निर्बंधन-(1) निधि में किसी सदस्य के हित या निधि के किसी सदस्य या उसके नामनिर्देशित या विधिक वारिस का निधि से कोई रकम पाने का अधिकार, समनुदिष्ट, अन्य संक्रान्त या प्रभारित नहीं किया जाएगा और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरी की किसी डिक्री या आदेश के अधीन कुर्की के लिए दायी नहीं होगा ।

(2) कोई लेनदार, निधि के या निधि के किसी सदस्य या उसके नामनिर्देशिती या विधिक वारिस के उसमें किसी हित के विरुद्ध कार्यवाही करने का हकदार नहीं होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए लेनदार" के अन्तर्गत तत्समय प्रवृत्त दिवालियापन से संबंधित विधि के अधीन नियुक्त राज्य या कोई शासकीय समनुदेशिती या शासकीय रिसीवर भी आता है ।

23. आय-कर से छूट-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या आय, लाभ या अभिलाभ पर कर से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित निधि में उद्भूत आय को आय-कर से छूट प्राप्त होगी ।

24. निधि के सदस्यों के लिए समूह जीवन बीमा और अन्य फायदे-न्यासी समिति, निधि के सदस्यों के कल्याण के लिए, -

(क) भारतीय जीवन बीमा निगम या किसी अन्य बीमाकर्ता से निधि के सदस्यों के जीवन के लिए समूह बीमा पालिसियां प्राप्त करेगी; या

(ख) निधि के सदस्यों और उनके आश्रितों के लिए चिकित्सीय और शैक्षिक सुविधाओं के लिए ऐसी रीति से उपबंध करेगी जो विहित की जाए; या

(ग) निधि के सदस्यों को, पुस्तकें क्रय करने के लिए धन की व्यवस्था करेगी; या

() निधि के सदस्यों के लिए, सामूहिक सुविधाओं के निर्माण या उनके अनुरक्षण के लिए धन की व्यवस्था करेगी:

परन्तु न्यासी समिति, धारा 18 की उपधारा (5) के अधीन प्राप्त कुल वार्षिक अभिदान का दस प्रतिशत, अधीनस्थ न्यायालयों में विधि व्यवसाय करने वाले निधि के सदस्यों के लिए सामूहिक सुविधाओं के निर्माण या अनुरक्षण पर व्यय करेगी; या

() किसी ऐसे अन्य प्रयोजन के लिए निधियों का उपबंध करेगी जो न्यासी समिति द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं; या

(च) किन्हीं ऐसे अन्य फायदों के लिए उपबंध करेगी जो विहित किए जाएं ।

25. न्यासी समिति के विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध अपील-(1) न्यासी समिति के किसी विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध अपील राज्य विधिज्ञ परिषद् को होगी ।

(2) अपील विहित प्ररूप में होगी और उसके साथ निम्नलिखित होंगे-

(क) उस विनिश्चय या आदेश की प्रति जिसके विरुद्ध अपील की गई है; 

(ख) अनुसूचित बैंक की किसी भी शाखा में राज्य विधिज्ञ परिषद् के खाते में पच्चीस रुपए के संदाय के साक्ष्यस्वरूप रसीद ।

(3) जिस विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध अपील की गई है, उसकी प्राप्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर अपील फाइल की जाएगी ।                

(4) ऐसी अपील पर राज्य विधिज्ञ परिषद् का विनिश्चय अंतिम होगा ।

अध्याय 6

स्टाम्पों का मुद्रण, वितरण और रद्दकरण

26. अधिवक्ता कल्याण निधि स्टाम्पों का राज्य परिषद् द्वारा मुद्रण और वितरण-(1) समुचित सरकार, राज्य विधिज्ञ परिषद् से इस निमित्त अनुरोध प्राप्त होने पर पांच रुपए मूल्य के या ऐसे अन्य मूल्य के जो विहित किया जाए, अधिवक्ता कल्याण निधि स्टांपों का मुद्रण और वितरण करवाएगी जिसमें विहित किए जाने वाले डिजाइन में अधिवक्ता कल्याण निधि स्टाम्प" अंतर्लिखित होगा ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक स्टाम्प 2.54= से.मी. ज्र् 5.08 से.मी. आकार का होगा जो अधिवक्ताओं को विक्रय किया जाएगा ।

(3) स्टाम्प राज्य विधिज्ञ परिषद् की अभिरक्षा में रहेंगे ।

(4) राज्य विधिज्ञ परिषद्, स्टाम्पों के वितरण और विक्रय का नियंत्रण, राज्य विधिज्ञ संगमों और राज्य अधिवक्ता संगमों के माध्यम से करेगी ।

(5) राज्य विधिज्ञ परिषद्, राज्य विधिज्ञ संगम और राज्य अधिवक्ता संगम स्टाम्पों के उचित लेखे, विहित किए जाने वाले प्ररूप और रीति में रखेंगे ।

(6) राज्य विधिज्ञ संगम और राज्य अधिवक्ता संगम, राज्य विधिज्ञ परिषद् से उसके मूल्य का संदाय करने के पश्चात्, जिसमें से आनुषंगिक व्ययों के लिए दस प्रतिशत की कटौती की जाएगी, स्टाम्पों का क्रय करेंगे ।

27. वकालतनामों पर स्टाम्प का लगा होना-(1) प्रत्येक अधिवक्ता निम्नलिखित मूल्य के स्टाम्प लगाएगा-

(क) किसी जिला न्यायालय या जिला न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालयों में उसके द्वारा फाइल किए गए प्रत्येक वकालतनामे पर पांच रुपए का;

(ख) किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकरण या उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में उसके द्वारा फाइल किए गए प्रत्येक वकालतनामे पर दस रुपए का:

परन्तु समुचित सरकार, पच्चीस रुपए से अनधिक मूल्य के स्टाम्प इस उपधारा के अधीन लगाया जाना विहित कर सकेगी:

परन्तु यह और कि समुचित सरकार, किसी जिला न्यायालय या जिला न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालयों या किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकरण या उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में फाइल किए जाने वाले प्रत्येक वकालतनामे पर भिन्न-भिन्न मूल्यों के स्टाम्पों का लगाया जाना विहित कर सकती है ।

(2) स्टाम्प का मूल्य तो किसी मामले में स्त्र्खर्चऱ् होगा और ही किसी भी दशा में मुवक्किल से लिया जाएगा

(3) किसी अधिवक्ता द्वारा उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों के किसी उल्लंघन से वह निधि के फायदों से संपूर्णतः या भागतः वंचित हो जाएगा और न्यासी समिति ऐसे उल्लंघन की रिपोर्ट राज्य विधिज्ञ परिषद् को समुचित कार्रवाई किए जाने के लिए करेगी ।

(4) जिला न्यायालय या जिला न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय या किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकरण या उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के समक्ष फाइल किए गए प्रत्येक वकालतनामे पर लगाई गई प्रत्येक स्टाम्प ऐसे रीति से रद्द की जाएगी जो विहित की जाए ।

अध्याय 7

प्रकीर्ण

28. कतिपय व्यक्तियों का फायदों के लिए पात्र होना-(1) कोई ज्येष्ठ अधिवक्ता या ऐसा व्यक्ति, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार से पेंशन प्राप्त करता हो, धारा 19 के अधीन अनुग्रह अनुदान या धारा 21 के अधीन उसके द्वारा विधि व्यवसाय को बंद करने पर रकम के संदाय या धारा 24 के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन किसी फायदे का हकदार नहीं होगा ।   

29. सद्भावपूर्वक किए गए कार्य का संरक्षण-(1) समुचित सरकार या न्यासी समिति या न्यासी समिति के अध्यक्ष या किसी सदस्य या सचिव या राज्य विधिज्ञ परिषद् या किसी व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी किसी बात के लिए जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई है या की जाने के लिए आशयित है, कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।

30. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन-किसी सिविल न्यायालयों को ऐसे किसी प्रश्न को तय करने, विनिश्चित करने या निपटाने अथवा किसी मामले का अवधारण करने की अधिकारिता नहीं होगी जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन न्यासी समिति या राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा तय किया जाना, विनिश्चित किया जाना अथवा निपटाया जाना अपेक्षित है ।

31. साक्षियों को समन करने और साक्ष्य लेने की शक्ति-न्यासी समिति और राज्य विधिज्ञ परिषद् को, इस अधिनियम के अधीन किसी जांच के प्रयोजनार्थ, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित है, अर्थात्: - 

(क) किसी व्यक्ति को हाजिर करवाना या उसकी शपथ पर परीक्षा करना;

(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

(ग) शपथ पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना;

(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

(ङ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।

32. अनुसूची 1 और 2 का संशोधन करने की शक्ति-(1) समुचित सरकार, न्यासी समिति की सिफारिश पर और निधि में रकम की उपलभ्यता पर सम्यक् विचार करते हुए, अधिसूचना द्वारा, अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट दरों में संशोधन कर सकती है

(2) केन्द्रीय सरकार, जब कभी आवश्यक समझे, अधिसूचना द्वारा अनुसूची 2 में संशोधन कर सकती है ।

33. समुचित सरकार की निदेश जारी करने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, न्यासी समिति, इस अधिनियम के अधीन शक्तियों का प्रयोग या कृत्यों का निर्वहन करते समय, वृत्तिक और प्रशासनिक विषयों से भिन्न नीति के प्रश्नों पर, ऐसे निदेशों से आबद्ध होगी जो समुचित सरकार, समय-समय पर, उसे लिखित रूप में दे:

परन्तु न्यासी समिति को, जहां तक व्यवहार्य हो, इस उपधारा के अधीन कोई निदेश दिए जाने से पूर्व अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया जाएगा ।

(2) समुचित सरकार का विनिश्चय, चाहे वह प्रश्न नीति का हो या नहीं, अंतिम होगा ।

34. समुचित सरकार की न्यासी समिति को अधिक्रांत करने की शक्ति-(1) यदि किसी समय समुचित सरकार की यह राय हो कि-

(क) न्यासी समिति के नियंत्रण से परे परिस्थितियों के कारण, वह इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या इसके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों का निर्वहन या कर्तव्यों का अनुपालन करने में असमर्थ है; या

(ख) न्यासी समिति ने, समुचित सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन दिए गए किसी निदेश का पालन करने में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या इसके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों का निर्वहन या कर्तव्यों का अनुपालन करने में बार-बार व्यतिक्रम किया है; या

(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनसे लोकहित में ऐसा करना आवश्यक हो गया है,

तो समुचित सरकार, अधिसूचना द्वारा और उसमें विनिर्दिष्ट किए जाने वाले कारणों से, न्यासी समिति को छह मास से अनधिक उतनी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, अधिक्रान्त कर सकेगी और अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से, उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को न्यासी समिति के नियंत्रक के रूप में नियुक्त करेगी:

परन्तु समुचित सरकार, ऐसी कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व, न्यासी समिति को प्रस्थापित अधिक्रमण के विरुद्ध अभ्यावेदन देने के लिए युक्तियुक्त अवसर देगी और न्यासी समिति के अभ्यावेदनों, यदि कोई हों, पर विचार करेगी

(2) उपधारा (1) के अधीन न्यासी समिति का अधिक्रमण करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -

() न्यासी समिति के अध्यक्ष, सदस्य और सचिव अधिक्रमण की तारीख से ही उस रूप में अपने पदों को रिक्त   कर देंगे;

(ख) वे सभी शक्तियां, कृत्य और कर्तव्य, जो न्यासी समिति द्वारा या उसकी ओर से इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उसके अधीन प्रयोग या निर्वहन किए जा रहे हों, उपधारा (3) के अधीन न्यासी समिति का पुनर्गठन होने तक, न्यासी समिति के नियंत्रक द्वारा प्रयोग की जाएगी और निर्वहन किए जाएंगे; और

(ग) न्यासी समिति के स्वामित्व में या नियंत्रणाधीन सभी संपत्तियां और निधि, उपधारा (3) के अधीन न्यासी समिति के पुनर्गठित होने तक, समुचित सरकार में निहित होंगी ।

(3) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अधिक्रमण की अवधि के समाप्त होने पर या उससे पूर्व, समुचित सरकार, ऐसी समिति के अध्यक्ष, सदस्यों और सचिव की नई नियुक्ति द्वारा न्यासी समिति का पुनर्गठन करेगी और ऐसी दशा में, ऐसा व्यक्ति, जिसने उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन अपना पद रिक्त किया था, पुनर्नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझा जाएगा ।             

(4) समुचित सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना की एक प्रति और इस धारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई की पूर्ण रिपोर्ट और वे परिस्थितियां जिनके कारण ऐसी कार्रवाई की गई है, यथास्थिति, संसद् के प्रत्येक सदन या राज्य विधान-मंडल के प्रत्येक सदन, जहां उसके दो सदन हों, या जहां ऐसे विधान-मंडल का एक सदन हो वहां उस सदन के समक्ष शीघ्रतम रखवाएगी ।

35. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, जहां समुचित सरकार है, अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के कार्यान्वयन के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों द्वारा निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) धारा 11 के खंड (च) के अधीन भेजी जाने वाली नियतकालिक और वार्षिक रिपोर्टें;

() वह प्ररूप और रीति जिसमें धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन वार्षिक लेखा विवरण और वार्षिक रिपोर्ट तैयार की जाएगी;

(ग) धारा 14 के खंड (छ) के अधीन रखे जाने वाले प्ररूप, रजिस्टर और अन्य अभिलेख;

(घ) वह प्ररूप जिसमें अधिवक्ताओं का कोई संगम, धारा 16 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन राज्य विधिज्ञ परिषद् को मान्यता के लिए आवेदन कर सकेगा;

(ङ) वह प्ररूप जिसमें राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा धारा 16 की उपधारा (4) के अधीन मान्यता प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा;

(च) वह प्ररूप जिसमें कोई अधिवक्ता, धारा 18 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निधि के सदस्य के रूप में प्रवेश के लिए आवेदन देगा; 

(छ) वे सिद्धांत जिनके अनुसार निधि के किसी सदस्य को संदेय रकम में से धारा 18 की उपधारा (12) के अधीन कटौती की जाएगी;

(ज) धारा 24 के खंड (ख) के अधीन निधि के सदस्यों और उनके आश्रितों के लिए चिकित्सीय और शैक्षिक सुविधाएं देने की रीति;

(झ) धारा 24 के खंड (च) के अधीन दिए जाने वाले अन्य फायदे;

(ञ) धारा 25 की उपधारा (2) के अधीन अपील का प्ररूप;

(ट) धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन मुद्रित और वितरित किए जाने वाले स्टाम्पों का मूल्य और डिजाइन;

(ठ) वह प्ररूप और रीति जिसमें धारा 26 की उपधारा (5) के अधीन स्टाम्पों के लेखे रखे जाएंगे;

() पच्चीस रुपए से अनधिक स्टांपों का मूल्य, जो धारा 27 की उपधारा (1) के पहले परन्तुक के अधीन विहित किया जाए;

() धारा 27 की उपधारा (1) के दूसरे परन्तुक के अधीन प्रत्येक वकालतनामे पर लगाए जाने वाले स्टामों का मूल्य;

(ण) धारा 27 की उपधारा (4) के अधीन स्टाम्पों के रद्दकरण की रीति;

(त) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना हो या विहित किया जाए ।  

36. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, जहां समुचित सरकार हो, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों का कार्यान्वयन करने के लिए ऐसे नियम बना सकेगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों, यदि कोई हों, से अंसगत न हों ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्:-

(क) धारा 11 के खंड (च) के अधीन भेजी जाने वाली नियतकालिक और वार्षिक रिपोर्टें;

(ख) वह प्ररूप और रीति जिसमें वार्षिक लेखा विवरण और वार्षिक रिपोर्ट धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन तैयार किए जाएंगे;

(ग) धारा 14 के खंड (छ) के अधीन रखे जाने वाले प्ररूप, रजिस्टर और अन्य अभिलेख;

(घ) वह प्ररूप जिसमें अधिवक्ताओं का कोई संगम, धारा 16 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन राज्य विधिज्ञ परिषद् को मान्यता के लिए आवेदन कर सकेगा;

(ङ) वह प्ररूप जिसमें राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा धारा 16 की उपधारा (4) के अधीन मान्यता प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा;

(च) वह प्ररूप जिसमें कोई अधिवक्ता, धारा 18 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निधि के सदस्य के रूप में प्रवेश के लिए आवेदन करेगा;

(छ) वे सिद्धांत जिनके अनुसार निधि के किसी सदस्य को संदेय रकम में से धारा 18 की उपधारा (12) के अधीन कटौती की जाएगी;

(ज) धारा 24 के खंड (ख) के अधीन निधि के सदस्यों और उनके आश्रितों के लिए चिकित्सीय और शैक्षिक सुविधाएं देने की रीति ;

(झ) धारा 24 के खंड (च) के अधीन दिए जाने वाले अन्य फायदे;

(ञ) धारा 25 की उपधारा (2) के अधीन अपील का प्ररूप;

(ट) धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन मुद्रित और वितरित किए जाने वाले स्टाम्पों का मूल्य और डिजाइन;

(ठ) वह प्ररूप और रीति जिसमें धारा 26 की उपधारा (5) के अधीन स्टाम्पों के लेखे रखे जाएंगे;

() पच्चीस रुपए से अनधिक स्टाम्पों का मूल्य, जो धारा 27 की उपधारा (1) के पहले परन्तुक के अधीन विहित किया जाए;

() धारा 27 की उपधारा (1) के दूसरे परन्तुक के अधीन प्रत्येक वकालतनामे पर लगाए जाने वाले स्टाम्पों का मूल्य;

(ण) धारा 27 की उपधारा (4) के अधीन स्टाम्पों के रद्दकरण की रीति;

(त) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना हो या विहित किया जाए ।

37. नियमों और अधिसूचनाओं का संसद् और राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाना-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और धारा 32 के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उक्त सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा/होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हा जाएगा/जाएगी । किन्तु नियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(2) राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और धारा 32 के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र राज्य विधान-मंडल के, जहां इसके दो सदन हों, प्रत्येक सदन के समक्ष या जहां ऐसे राज्य विधान-मंडल में एक सदन हो, उस सदन के समक्ष रखा जाएगा/रखी जाएगी

38. व्यावृत्ति-इस अधिनियम के उपबंध, उन राज्यों को लागू नहीं होंगे जिनमें अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियां लागू हैं

अनुसूची 1

[धारा 21 (1) और धारा 32 (1) देखिए]

निधि के सदस्य के रूप मे वर्षों की संख्या

संदेय रकम की दर

30

30,000 रुपए

29

29,000 रुपए

28

28,000 रुपए

27

27,000 रुपए

26

26,000 रुपए

25

25,000 रुपए

24

24,000 रुपए

23

23,000 रुपए

22

22,000 रुपए

21

21,000 रुपए

20

20,000 रुपए

19

19,000 रुपए

18

18,000 रुपए

17

17,000 रुपए

16

16,000 रुपए

15

15,000 रुपए

14

14,000 रुपए

13

13,000 रुपए

12

12,000 रुपए

11

11,000 रुपए

10

10,000 रुपए

9

9,000 रुपए

8

8,000 रुपए

7

7,000 रुपए

6

6,000 रुपए

5

5,000 रुपए

4

4,000 रुपए

3

3,000 रुपए

2

2,000 रुपए

1

1,000 रुपए

अनुसूची 2

[धारा 32 (2) और धारा 38 देखिए]

1. उत्तर प्रदेश अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 1974 (1974 का 6) ।

2. बिहार राज्य अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 1983 (1983 का 16) ।

3. मध्य प्रदेश अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 1982 (1982 का 9) ।

4. दि आंध्र प्रदेश एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1987 (1987 का 33) ।

5. दि उड़ीसा एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1987 (1987 का 18) ।

6. राजस्थान अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 1987 (1987 का 15) ।

7. दि तमिलनाडु एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1987 (1987 का 49) ।  

8. दि गुजरात एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1991 (1991 का 14) ।

9. दि गोवा एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1995 (1997 का 2) ।

10. दि असम एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1998 (1999 का 18) ।

11. दि महाराष्ट्र एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1981 (1981 का 61) । 

12. हिमाचल प्रदेश अधिवक्ता कल्याण निधि अधिनियम, 1996 (1996 का 14) ।

13. दि केरल एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1980 (1980 का 21) ।

14. दि कर्नाटक एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1983 (1985 का 2) । 

15. दि वेस्ट बंगाल एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1991 (1991 का 13) ।

16. दि जम्मू एण्ड कश्मीर एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ऐक्ट, 1997 (1997 का 26) ।  

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