राष्ट्रीय राजमार्ग नियंत्रण (भूमि और यातायात) अधिनियम, 2002
(2003 का अधिनियम संख्यांक 13)
[14 जनवरी, 2003]
राष्ट्रीय राजमार्गों के अन्तर्गत भूमि, मार्गाधिकार और राष्ट्रीय राजमार्गों
पर गतिमान यातायात का नियंत्रण तथा उन पर
अप्राधिकृत अधिभोग को हटाने का भी
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के तिरपनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय राजमार्ग नियंत्रण (भूमि और यातायात) अधिनियम, 2002 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) अधिकरण के संबंध में नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है जिसको धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन ऐसा अधिकरण स्थापित किया जाता है;
(ख) भवन" से किसी सामग्री का उपयोग करके किसी भी रीति से किया गया कोई सन्निर्माण का कार्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत कृषि प्रयोजनों के लिए कोई फार्म हाउस, स्तम्भमूल, ड्योडी, दीवार, नाला, विज्ञापन बोर्ड और ऐसे भवन से जुड़ी हुई अन्य वस्तुएं हैं;
(ग) किसी भवन के संबंध में सन्निर्माण करना" से उसके व्याकरणिक रूपभेदों के साथ, किसी भवन का सन्निर्माण, पुनः सन्निर्माण, परिनिर्माण, पुनः परिनिर्माण, विस्तार करना या संरचना में परिवर्तन करना अभिप्रेत है;
(घ) भूमि की लागत" से भूमि का बाजार मूल्य अभिप्रेत है जो उसके अवधारण के लिए नियुक्त, यथास्थिति, राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र की सरकार के सक्षम प्राधिकारी द्वारा अवधारित किया गया हो;
(ङ) राजमार्ग" से राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 (1956 का 48) की धारा 2 के अधीन राष्ट्रीय राजमार्ग के रूप में घोषित राष्ट्रीय राजमार्ग अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार में निहित कोई द्रुतगामी मार्ग या द्रुतगामी राजमार्ग, चाहे वह धरातल पर है या धरातल पर नहीं है और इसके अंतर्गत निम्नलिखित भी है, अर्थात्: -
(i) राजमार्ग से अनुलग्न ऐसी संपूर्ण भूमि, चाहे वह सीमांकित हो या नहीं, जो राजमार्ग के प्रयोजन के लिए अर्जित की गई हो या राज्य सरकार द्वारा ऐसे प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार को अंतरित की गई हो;
(ii) ऐसे राजमार्ग पर या उसके आरपार सन्निर्मित सभी पुल, पुलियाएं, सुरंगें, सेतु मार्ग, यानमार्ग और अन्य संरचनाएं; और
(iii) ऐसे राजमार्गों पर सभी वृक्ष, रेलिंग, बाड़, स्तंभ, रास्ते, चिह्न, संकेत, किलोमीटर पत्थर और अन्य राजमार्ग उपसाधन तथा सामग्रियां;
(च) राजमार्ग प्रशासन" से धारा 3 के अधीन स्थापित राजमार्ग प्रशासन अभिप्रेत है;
(छ) राजमार्ग भूमि" से ऐसी भूमि अभिप्रेत है जिसकी, केन्द्रीय सरकार, धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन स्वामी है या स्वामी समझी जाती है;
(ज) भूमि" के अन्तर्गत भूमि से उ-ूत होने वाले फायदे और भूबद्ध चीजें या भूबद्ध किसी चीज से स्थायी रूप से जकड़ी हुई चीजें हैं;
(झ) पहुंच के साधन" से किसी प्रकार के यानों के लिए, चाहे निजी हों या सार्वजनिक, पहुंच के कोई स्थायी साधन अभिप्रेत हैं;
(ञ) परिसर" से कोई भूमि या भवन या भवन का कोई भाग अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं-
(i) ऐसे भवन या भवन के भाग से अनुलग्न उद्यान, मैदान और उपगृह, यदि कोई हों; और
(ii) ऐसे भवन या भवन के भाग में उसके अधिक फायदाप्रद उपभोग के लिए कोई फिटिंग;
(ट) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ठ) अधिकरण" से धारा 5 की उपाधारा (1) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकरण अभिप्रेत है;
(ड) अप्राधिकृत अधिभोग" से ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा जो-
(i) राजमार्ग पर अतिचारी है; या
(ii) तत्समय राजमार्ग पर परिसर के किराए या किराए के किसी भाग का किसी अन्य व्यक्ति को संदाय कर रहा है या करने के लिए दायी है; या
(iii) राजमार्ग पर किसी परिसर में रहता है या अन्यथा उसका उपयोग करता है; या
(iv) राजमार्ग पर किसी परिसर का किरायामुक्त किराएदार है; या
(v) राजमार्ग पर किसी परिसर का उसके कब्जे के लिए अनुज्ञप्तिधारी है; या
(vi) राजमार्ग पर किसी परिसर के स्वामी को, ऐसे परिसर के उपयोग या कब्जे के लिए नुकसानी का संदाय करने के लिए दायी है, अधिभोग के प्रयोजन के लिए इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञा के बिना राजमार्ग भूमि का कोई अधिभोग अभिप्रेत है;
(ढ) यान" से कोई हथगाड़ी, हिमगाड़ी, लांगल, खींचने वाला और किसी वर्णन का कोई पहिए वाला या ट्रैक वाला कोई वाहन जो किसी राजमार्ग पर उपयोग किए जाने के लिए सक्षम हो, अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
राजमार्ग प्रशासनों और अधिकरणों की स्थापना, आदि
3. राजमार्ग प्रशासनों की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, -
(क) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए राजमार्ग प्रशासन के नाम से ज्ञात एक निकाय या प्राधिकरण की स्थापना करेगी जो इस अधिनियम के अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के एक या अधिक अधिकारियों से मिलकर बनेगा; और
(ख) उस राजमार्ग की सीमाएं जिनके भीतर या राजमार्ग की वह लम्बाई जिस पर राजमार्ग प्रशासन की अधिकारिता होगी, परिनिश्चित करेगी:
परंतु केन्द्रीय सरकार, इस उपधारा के अधीन जारी की गई अधिसूचना में या किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा, ऐसी कोई शर्त या परिसीमा अधिरोपित कर सकेगी जिसके अधीन रहते हुए राजमार्ग प्रशासन, इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार उपधारा (1) के अधीन किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र या किसी राजमार्ग के लिए एक या अधिक राजमार्ग प्रशासनों की स्थापना कर सकेगी ।
(3) राजमार्ग प्रशासन, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन ऐसी रीति से करेगा जो विहित की जाए ।
4. राजमार्ग प्रशासन की शक्तियां और कृत्य-कोई राजमार्ग प्रशासन, इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट अपनी समग्र अधिकारिता में अपनी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए करेगा जो धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना द्वारा और केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त किए गए किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा, अधिरोपित की जाएं ।
5. अधिकरणों की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन ऐसे अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकरण के नाम से ज्ञात एक या अधिक अधिकरणों की स्थापना कर सकेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिसूचना में राजमार्ग की सीमाएं, जिनके भीतर या राजमार्ग की लंबाई, जिस पर अधिकरण अपने समक्ष फाइल की गई अपीलों को ग्रहण करने और उनका विनिश्चय करने के लिए अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगा, भी विनिर्दिष्ट करेगी ।
6. अधिकरण की संरचना-(1) अधिकरण में केवल एक ही व्यक्ति होगा (जिसे इसमें इसके पश्चात् पीठासीन अधिकारी कहा गया है) जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त किया जाएगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, एक अधिकरण के पीठासीन अधिकारी को किसी दूसरे अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगी ।
7. पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं-कोई व्यक्ति किसी अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि, -
(क) वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए अर्हित न हो; या
(ख) भारतीय विधि सेवा का सदस्य न रहा हो और उसने उस सेवा की कम से कम श्रेणी -2 का पद धारण न किया हो ।
8. पदावधि-अधिकरण का पीठासीन अधिकारी, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, बासठ वर्ष की आयु पूरी होने तक पद धारण करेगा ।
9. अधिकरण का कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिकरण को उतने अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जितने वह सरकार ठीक समझे ।
(2) अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी, अपने कृत्यों का निर्वहन, पीठसीन अधिकारी के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।
(3) अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।
10. पीठासीन अधिकारी के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें-अधिकरण के पीठासीन अधिकारी को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें जिनमें पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे सम्मिलित हैं, ऐेसी होंगी, जो विहित की जाएं:
परंतु पीठासीन अधिकारी के वेतन और भत्तों तथा सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
11. अधिकरण में रिक्तियां-यदि अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के पद में, अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न किसी कारण से, कोई रिक्ति होती है तो केन्द्रीय सरकार, उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करेगी और अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियां उसी प्रक्रम से जारी रखी जा सकेंगी जिस पर वह रिक्ति भरी गई है ।
12. त्यागपत्र और हटाया जाना-(1) अधिकरण का पीठासीन अधिकारी, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:
परंतु उक्त पीठासीन अधिकारी, जब तक कि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा उससे पहले पद त्याग करने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाती है, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास की समाप्ति तक या उसके पदोत्तरवर्ती के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा अपना पद ग्रहण कर लेने तक या उसकी पदावधि की समाप्ति तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करता रहेगा ।
(2) अधिकरण के पीठासीन अधिकारी को, केवल साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर, केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए ऐसे आदेश द्वारा उसके पद से हटाया जाएगा जो उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा ऐसी जांच किए जाने के पश्चात्, जिसमें ऐसे पीठासीन अधिकारी को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दे दी गई है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है, किया गया हो ।
(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (2) में निर्दिष्ट पीठासीन अधिकारी के कदाचार या असमर्थता का अन्वेषण करने के लिए प्रक्रिया को नियमों द्वारा विनियमित कर सकेगी ।
13. पीठासीन अधिकारी की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां-अधिकरण का पीठासीन अधिकारी, ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो विहित की जाएं ।
14. अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-अधिकरण, नियत दिन से ही, यथास्थिति, राजमार्ग प्रशासन या उसकी ओर से प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा धारा 26, धारा 27, धारा 28, धारा 36, धारा 37 और धारा 38 के अधीन पारित आदेशों या की गई कार्रवाइयों (सूचनाओं के जारी किए जाने या तामील किए जाने को छोड़कर) के विरुद्ध अपीलों को ग्रहण करने की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।
15. अधिकारिता का वर्जन-नियत दिन से ही, अधिकरण के सिवाय, किसी न्यायालय (उच्चतम न्यायालय और संविधान के अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी उच्च न्यायालय को छोड़कर) या अन्य प्राधिकारी को, धारा 14 में विनिर्दिष्ट विषयों के संबंध में कोई अधिकारिता, शक्तियां या प्राधिकार नहीं होंगे या उनका प्रयोग करने का हक नहीं होगा ।
16. अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा किन्तु वह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शन प्राप्त करेगा और इस अधिनियम के तथा किन्हीं नियमों के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण को अपनी प्रक्रिया का विनियमन करने की शक्ति होगी, जिसके अंतर्गत वे स्थान भी होंगे जहां उसकी बैठकें होंगी ।
(2) धारा 14 के अधीन अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथांसभव शीघ्रता से कार्रवाई की जाएगी और उसके द्वारा यह प्रयास किया जाएगा कि अपील के प्राप्त होने की तारीख से चार मास के भीतर उसे अंतिम रूप से निपटा दिया जाए ।
(3) अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित विषयों के संबंध में वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथ पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(ङ) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;
(च) किसी अपील या आवेदन को व्यतिक्रम के कारण खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना;
(छ) व्यतिक्रम के कारण किसी अपील या आवेदन को खारिज करने के किसी आदेश को या अपने द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना;
(ज) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
(4) अधिकरण के समक्ष कोई भी कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी तथा अधिकरण को, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
17. अंतरिम आदेश करने के बारे में शर्तें-इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी आवेदन या अपील पर या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में (व्यादेश के रूप में या रोक के रूप में या किसी अन्य रीति से) कोई अंतरिम आदेश तभी किया जाएगा जब-
(क) ऐसे पक्षकार को, जिसके विरुद्ध ऐसा आवेदन किया जाता है या अपील की जाती है, ऐसे आवेदन या अपील की और ऐसे अंतरिम आदेश के लिए अभिवाक् के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतिलिपियां दे दी जाती हैं; और
(ख) ऐसे पक्षकार को मामले में सुनवाई का अवसर दे दिया जाता है:
परन्तु यदि अधिकरण का, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि, यथास्थिति, आवेदक या आपीलार्थी को कोई ऐसी हानि पहुंचाए जाने से जिसकी धन के रूप में पर्याप्त रूप से प्रतिपूर्ति नहीं की जा सकती है, निवारण के लिए ऐसा करना आवश्यक है, तो वह खंड (क) और खंड (ख) की अपेक्षाओं से अभिमुक्ति दे सकेगा और आपवादिक उपाय के रूप में अंतरिम आदेश कर सकेगा; किन्तु ऐसा अंतरिम आदेश, यदि पहले ही निरस्त नहीं किया जाता है तो ऐसी तारीख से जिसको वह किया गया था, चौदह दिन की अवधि की समाप्ति पर प्रभावहीन हो जाएगा, जब तक कि उक्त अपेक्षाओं का उस अवधि की समाप्ति के पहले अनुपालन नहीं कर दिया गया है और अधिकरण ने अंतरिम आदेश के प्रवर्तन को जारी नहीं रखा है ।
18. अधिकरण के आदेशों का निष्पादन-(1) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण द्वारा पारित कोई आदेश अधिकरण द्वारा सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादनीय होगा और इस प्रयोजन के लिए, अधिकरण को सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी ।
(2) अधिकरण, उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अपने द्वारा किए गए किसी आदेश को, स्थानीय अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को भेज सकेगा और वह सिविल न्यायालय उक्त आदेश का निष्पादन उसी प्रकार करेगा मानो वह उसके द्वारा की गई डिक्री हो ।
19. परिसीमा-इस अधिनियम के अधीन अधिकरण को प्रत्येक अपील, उस तारीख से जिसको वह आदेश, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, किया गया था, साठ दिन की अवधि के भीतर की जाएगी:
परन्तु साठ दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी कोई अपील ग्रहण की जा सकेगी, यदि अपीलार्थी अधिकरण का यह समाधान कर देता है कि विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अपील न करने के लिए उसके पास पर्याप्त हेतुक था ।
20. राजमार्ग प्रशासन की ओर से कार्य करने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति-(1) राजमार्ग प्रशासन, यदि वह ठीक समझे तो, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे-
(क) केन्द्रीय सरकार के राजपत्रित अधिकारी; या
(ख) राज्य सरकार के राजपत्रित अधिकारी; या
(ग) भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1988 (1988 का 68) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण या किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन गठित किसी अन्य प्राधिकरण के अधिकारी, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के राजपत्रित अधिकारी के समतुल्य हो,
उक्त अधिसूचना में यथाविनिर्दिष्ट राजमार्ग प्रशासन की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त कर सकेगा ।
(2) राजमार्ग प्रशासन, उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना में, राजमार्ग की सीमाएं जिनके भीतर या राजमार्ग की लंबाई जिस पर उस उपधारा के अधीन नियुक्त अधिकारी शक्तियों का प्रयोग करेगा और कृत्यों का निर्वहन करेगा, विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
21. शक्तियों का प्रत्यायोजन-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य कोई शक्ति (धारा 50 द्वारा प्रदत्त शक्तियों को छोड़कर), ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, अधीन रहते हुए, उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी या राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा प्रयोक्तव्य होगी ।
22. अधिकारिता अंतरित करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, किसी भी समय, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (ख) में परिभाषित राजमार्ग प्रशासन की अधिकारिता को किसी अन्य राजमार्ग प्रशासन को अंतरित कर सकेगी और ऐसे अंतरण पर, उस राजमार्ग प्रशासन के पास वे शक्तियां और प्राधिकार नहीं रहेंगे और ऐसे अन्य राजमार्ग प्रशासन को, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट शर्तों, यदि कोई हों, के अधीन रहते हुए, वे सभी शक्तियां और प्राधिकार होंगे, जो अधिकारिता के ऐसे अंतरण से पूर्व ऐसे अन्य राजमार्ग प्रशासन द्वारा प्रयोक्तव्य थे ।
अध्याय 3
राजमार्ग भूमि के अप्राधिकृत अधिभोग का निवारण और उसका हटाया जाना
23. राजमार्ग भूमि का केन्द्रीय सरकार की संपत्ति समझा जाना-(1) किसी राजमार्ग की भागरूप सभी भूमि, जो केन्द्रीय सरकार में निहित है या पहले से केन्द्रीय सरकार में निहित नहीं है किन्तु राजमार्ग के प्रयोजन के लिए अर्जित की गई है, इस अधिनियम और अन्य केन्द्रीय अधिनियमों के प्रयोजनों के लिए, उसके स्वामी के रूप में केन्द्रीय सरकार की संपत्ति समझी जाएगी ।
(2) राजमार्ग प्रशासन विहित रीति से अभिलेख रखवाएगा जिसमें राजमार्ग से संबंधित भूमि की जिसकी केन्द्रीय सरकार स्वामी है, विशिष्टियां दर्ज की जाएंगी और इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व ऐसे प्रयोजन के लिए रखे गए किसी अभिलेख में ऐसी भूमि की विशिष्टियों से संबंधित प्रविष्टियां प्रथम उक्त अभिलेख में ऐसी भूमि की विशिष्टियों से संबंधित प्रविष्टियां समझी जाएंगी और तद्नुसार केन्द्रीय सरकार उक्त भूमि की स्वामी समझी जाएगी जिसकी बाबत इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व रखे गए ऐसे अभिलेखों में प्रविष्टियां की गई हैं ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व के विरुद्ध दावा करने वाला कोई व्यक्ति राजमार्ग प्रशासन को लिखित परिवाद करेगा और उसके समक्ष अपने दावे को साबित करेगा तथा राजमार्ग प्रशासन, ऐसे व्यक्ति द्वारा पेश किए गए साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात्, ऐसे अभिलेखों को सही कर सकेगा या दावे को नामंजूर कर सकेगा ।
24. राजमार्ग भूमि के अधिभोग का निवारण-(1) कोई भी व्यक्ति, राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन की ओर से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी से लिखित में ऐसे प्रयोजन के लिए पूर्व अनुज्ञा अभिप्राप्त किए बिना किसी राजमार्ग भूमि को अधिभोग में नहीं लेगा या ऐसी भूमि पर किसी नाले के माध्यम से किसी साम्रगी का निस्सारण नहीं करेगा ।
(2) राजमार्ग प्रशासन या उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत अधिकारी, किसी व्यक्ति द्वारा इस निमित्त किए गए आवेदन पर और यातायात की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए ऐसे व्यक्ति को, -
(i) उसके स्वामित्वाधीन किसी भवन के सामने राजमार्ग पर कोई जंगम संरचना या ऐसा भवन खड़ा करने और राजमार्ग के ऊपर कोई जंगम संरचना बनाने के लिए; या
(ii) राजमार्ग पर कोई अस्थायी लान या तंबू या अन्य समरूप सन्निर्माण या अस्थायी स्टाल, पाड़ बांधने के लिए; या
(iii) किसी राजमार्ग पर विक्रय के लिए निर्माण सामग्री, माल या अन्य वस्तुओं को जमा करने या करवाने के लिए, या
(iv) पार्श्वस्थ भवनों में मरम्मत या सुधार करने के लिए कोई अस्थायी खुदाई करने के लिए,
अनुज्ञा प्रदान कर सकेगा तथा ऐसी अनुज्ञा ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, और ऐसे किराए तथा अन्य प्रभारों का संदाय करने पर, ऐसे प्ररूप में जो विहित किए जाएं, अनुज्ञापत्र जारी करके प्रदान की जाएगी:
परन्तु ऐसी कोई अनुज्ञा एक समय में, उस तारीख से, जिसको अनुज्ञा अनुदत्त की जाती है, एक मास की अवधि से अधिक के लिए तब तक विधिमान्य नहीं होगी जब तक कि ऐसे व्यक्ति द्वारा अनुज्ञा के नवीकरण के लिए किए गए आवेदन पर राजमार्ग प्रशासन या ऐसे अधिकारी द्वारा उसे नवीकृत न किया गया हो ।
(3) उपधारा (2) के अधीन अनुदत्त अनुज्ञा में निम्नलिखित विनिर्दिष्ट होगा-
(i) वह समय जिस तक अनुज्ञा अनुदत्त की गई है;
(ii) ऐसी अनुज्ञा का प्रयोजन;
(iii) राजमार्ग का वह भाग जिसकी बाबत अनुज्ञा अनुदत्त की गई है, और उसके साथ राजमार्ग के उस भाग का रेखांक या रेखाचित्र होगा ।
(4) वह व्यक्ति, जिसे उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञा-पत्र जारी किया गया है, राजमार्ग प्रशासन के किसी अधिकारी द्वारा जब भी उससे कहा जाए, निरीक्षण के लिए अनुज्ञा-पत्र पेश करेगा और ऐसे अनुज्ञा-पत्र के अधीन अनुदत्त अनुज्ञा की समाप्ति पर, अनुज्ञा-पत्र में विनिर्दिष्ट राजमार्ग के भाग को ऐसी दशा में प्रत्यावर्तित करेगा जिसमें उक्त अनुज्ञा-पत्र जारी किए जाने से ठीक पूर्व वह था तथा ऐसे भाग का कब्जा राजमार्ग प्रशासन को परिदत्त करेगा ।
(5) उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञा-पत्र जारी करने वाला राजमार्ग प्रशासन या अधिकारी, जारी किए गए ऐसे सभी अनुज्ञा-पत्रों का पूर्ण अभिलेख रखेगा और यह भी सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक मामले में उस अवधि की समाप्ति पर, जिस तक उस उपधारा के अधीन अनुज्ञा-पत्र के अन्तर्गत अनुज्ञा दी गई थी, उक्त राजमार्ग के उस भाग का जिसकी बाबत उक्त अनुज्ञा अनुदत्त की गई थी, कब्जा राजमार्ग प्रशासन को परिदत्त कर दिया गया है ।
25. अस्थायी उपयोग के लिए राजमार्ग भूमि का पट्टा या अनुज्ञप्ति देना-राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी, यातायात की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं तथा विहित किराए या अन्य प्रभारों का संदाय करने पर, किसी व्यक्ति को अस्थायी उपयोग के लिए राजमार्ग भूमि का पट्टा या अनुज्ञप्ति दे सकेगा:
परन्तु ऐसा कोई पट्टा, एक समय में, उस तारीख से, जिसको ऐसा पट्टा दिया गया है, पांच वर्ष से अधिक के लिए विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि राजमार्ग प्रशासन या ऐसे अधिकारी द्वारा उसे नवीकृत न किया गया हो ।
26. अप्राधिकृत अधिभोग का हटाया जाना-(1) जहां राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी की यह राय हो कि यातायात की सुरक्षा या सुविधा के हित में यह आवश्यक है कि धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन जारी किए गए किसी अनुज्ञा-पत्र को रद्द किया जाए तो वह ऐसा करने के लिए कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् ऐसे अनुज्ञा-पत्र को रद्द कर सकेगा और तदुपरि ऐसा व्यक्ति, जिसे अनुज्ञा दी गई थी, राजमार्ग प्रशासन या ऐसे अधिकारी द्वारा किए गए आदेश में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, अनुज्ञा-पत्र में विनिर्दिष्ट राजमार्ग के उक्त भाग को उस दशा में प्रत्यावर्तित करेगा जिसमें वह ऐसे अनुज्ञा-पत्र के जारी किए जाने से ठीक पूर्व था और ऐसे भाग का कब्जा राजमार्ग प्रशासन को परिदत्त करेगा और यदि ऐसा व्यक्ति उक्त अवधि के भीतर ऐसा कब्जा परिदत्त करने में असफल रहता है तो इस धारा और धारा 27 के प्रयोजन के लिए राजमार्ग भूमि पर उसका अप्राधिकृत कब्जा समझा जाएगा ।
(2) जब राजमार्ग भूमि के सावधिक निरीक्षण के परिणामस्वरूप या अन्यथा, राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी का समाधान हो जाता है कि राजमार्ग भूमि पर कोई अप्राधिकृत अधिभोग किया गया है तो राजमार्ग प्रशासन या इस प्रकार प्राधिकृत अधिकारी, ऐसा अप्राधिकृत अधिभोग कारित करने वाले या उसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति पर विहित प्ररूप में एक सूचना की तामील करेगा जिसमें उससे ऐसी सूचना में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अप्राधिकृत अधिभोग को हटाने और ऐसी राजमार्ग भूमि को उसकी उस मूल दशा में प्रत्यावर्तित करने की अपेक्षा की जाएगी जिसमें वह अप्राधिकृत अधिभोग से पूर्व थी ।
(3) उपधारा (2) के अधीन सूचना में वह राजमार्ग भूमि, जिसके संबंध में ऐसी सूचना जारी की गई है, वह अवधि जिसके भीतर उक्त भूमि पर अप्राधिकृत अधिभोग का हटाया जाना अपेक्षित है, ऐसे किसी अभ्यावेदन, यदि कोई हो, जो वह व्यक्ति, जिसे सूचना संबोधित है, सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर कर सकेगा, की सुनवाई का स्थान और समय, विनिर्दिष्ट होंगे और ऐसी सूचना के अनुपालन में असफलता, उक्त सूचना में विनिर्दिष्ट व्यक्ति को, शास्ति और उस राजमार्ग भूमि से, जिसके संबंध में सूचना जारी की जाती है उपधारा (6) के अधीन संक्षेपतः बेदखली के लिए दायी बनाएगी ।
(4) उपधारा (2) के अधीन सूचना की तामील, उस व्यक्ति को जिसे वह सूचना संबोधित है या उसके अभिकर्ता को या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति को उसकी एक प्रति का परिदान करके या जिस व्यक्ति को सूचना संबोधित है, उसको संबोधित रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा की जाएगी और ऐसे व्यक्ति या उसके अभिकर्ता या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के लिए तात्पर्यित अभिस्वीकृति या किसी डाक कर्मचारी द्वारा ऐसा पृष्ठांकन कि ऐसे व्यक्ति या उसके अभिकर्ता या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति ने परिदान लेने से इंकार किया है, तामील का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य समझा जाएगा ।
(5) जहां उपधारा (4) के अधीन उपबंधित रीति में सूचना की तामील नहीं की जाती है, वहां सूचना की अंतर्वस्तु को उस व्यक्ति की जानकारी के लिए, जिसे सूचना संबोधित है, किसी स्थानीय समाचार-पत्र में विज्ञापित किया जाएगा और ऐसे विज्ञापन को ऐसे व्यक्ति पर उस सूचना की तामील समझा जाएगा ।
(6) जहां उपधारा (2) के अधीन सूचना की तामील, उपधारा (4) या उपधारा (5) के अधीन की गई है और राजमार्ग भूमि पर अप्राधिकृत अधिभोग, जिसके संबंध में ऐसी सूचना की तामील की गई है, ऐसे प्रयोजन के लिए सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर नहीं हटाया गया है, तथा राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष अप्राधिकृत अधिभोग को न हटाने के लिए कोई युक्तियुक्त हेतुक दर्शित नहीं किया गया है, वहां, यथास्थिति, राजमार्ग प्रशासन या ऐसा अधिकारी, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के खर्चे पर उस अप्राधिकृत अधिभोग को हटवाएगा और उस व्यक्ति पर, जिसे वह सूचना संबोधित है, शास्ति अधिरोपित करेगा, जो इस प्रकार अप्राधिकृत रूप से अधिभोगाधीन भूमि के प्रति वर्ग मीटर के लिए पांच सौ रुपए होगी और जहां इस प्रकार अधिरोपित शास्ति उक्त भूमि की लागत से कम हो, वहां शास्ति को ऐसी लागत के बराबर तक बढ़ाया जा सकेगा ।
(7) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी को, इस धारा के अधीन कोई सूचना जारी किए बिना, राजमार्ग भूमि पर अप्राधिकृत अधिभोग को हटाने की शक्ति होगी यदि उक्त अप्राधिकृत अधिभोग निम्नलिखित प्रकृति का है-
(क) किसी माल या वस्तु को-
(i) खुले में; या
(ii) अस्थायी स्टाल, छतरी, बूथ या अस्थायी प्रकृति की किसी अन्य दुकान पर, अभिदर्शित करना है,
(ख) अस्थायी या स्थायी सन्निर्माण या परिनिर्माण, या
(ग) अतिचार या अन्य अप्राधिकृत अधिभोग जो किसी मशीन या अन्य युक्ति के उपयोग के बिना सुगमता से हटाया जा सकता है, और राजमार्ग प्रशासन या ऐसा अन्य अधिकारी, ऐसे अधिभोग को हटाने में, यदि आवश्यक हो, पुलिस की सहायता ले सकेगा और ऐसे अधिभोग को हटाने के लिए आवश्यक युक्तियुक्त बल का प्रयोग कर सकेगा ।
(8) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, यदि राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी की यह राय हो कि राजमार्ग भूमि पर कोई अप्राधिकृत अधिभोग ऐसी प्रकृति का है कि-
(क) राजमार्ग पर यातायात की सुरक्षा; या
(ख) राजमार्ग के भागरूप किसी संरचना की सुरक्षा; के हित में उसका तुरंत हटाया जाना आवश्यक है और इस धारा के अधीन ऐसे अप्राधिकृत अधिभोग के लिए उत्तरादायी व्यक्ति पर उसकी अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से असम्यक् विलंब के बिना किसी सूचना की तामील नहीं की जा सकती है तो राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा प्राधिकृत अधिकारी, खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट सुरक्षा के लिए विहित आवश्यक लागत पर ऐसा सन्निर्माण, जिसमें किसी सन्निर्माण में परिवर्तन सम्मिलित है, जो साध्य हो, कर सकेगा, या ऐसे अप्राधिकृत अधिभोग को उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट रीति से हटवा सकेगा ।
(9) राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी को, इस धारा या धारा 27 के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित विषयों के संबंध में वही शक्तियां होंगी जो किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसे हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना; और
(घ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए, और ऐसे प्रशासन या अधिकारी के समक्ष कोई कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत तथा धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और प्रशासन या उक्त अधिकारी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
27. अप्राधिकृत अधिभोग को हटाने की लागत और अधिरोपित जुर्माने की वसूली-(1) जहां राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी ने किसी अप्राधिकृत अधिभोग को हटा दिया है या किसी अप्राधिकृत अधिभोग से संबंधित कोई सन्निर्माण किया है, जिसके अंतर्गत सन्निर्माण में परिवर्तन भी है, या धारा 36 की उपधारा (2) के अधीन किसी नुकसान की मरम्मत की है, वहां ऐसे हटाए जाने या मरम्मत पर उपगत व्यय, पंद्रह प्रतिशत अतिरिक्त प्रभारों सहित या इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित कोई जुर्माना, इस धारा में इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से वसूलनीय होगा ।
(2) राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी, विहित प्ररूप में, बिल की एक प्रति, जिसमें उपधारा (1) के अधीन वसूलनीय व्यय, अतिरिक्त प्रभार या जुर्माना उपदर्शित होगा, ऐसे व्यक्ति पर तामील करेगा, जिससे ऐसा व्यय, अतिरिक्त प्रभार या जुर्माना वसूलनीय है और सूचना की तामील से संबंधित धारा 26 के उपबंध, इस उपधारा के अधीन बिल की प्रति की तामील को इस प्रकार लागू होंगे मानो उस धारा में सूचना" शब्द के स्थान पर, बिल" शब्द रखा गया हो ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट बिल की एक प्रति के साथ राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी द्वारा जारी किया गया प्रमाणपत्र होगा और बिल में उपदर्शित रकम, इस बात का निर्णायक सबूत होगी कि वह रकम बिल में यथाउपदर्शित उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी या सभी प्रयोजनों के लिए वास्तव में उपगत व्यय है ।
(4) जहां राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी ने किसी अप्राधिकृत अधिभोग को हटा दिया है या किसी अप्राधिकृत अधिभोग से संबंधित कोई सन्निर्माण किया है, जिसमें सन्निर्माण में परिवर्तन सम्मिलित है या धारा 36 की उपधारा (2) के अधीन किसी नुकसान की मरम्मत की है, वहां ऐसे हटाए जाने, सन्निर्माण, परिवर्तन या मरम्मत के परिणामस्वरूप वसूल की गई सामग्री, यदि कोई हो, राजमार्ग प्रशासन या ऐसे अधिकारी के कब्जे में तब तक प्रतिधारित रहेगी जब तक कि उपधारा (2) के अधीन उसके संबंध में तामील किए गए बिल का संदाय न कर दिया जाए और ऐसे बिल का संदाय कर दिए जाने पर ऐसी सामग्री, उक्त सामग्री के हकदार व्यक्ति को लौटा दी जाएगी किंतु बिल में संदाय के लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर संदाय करने में असफलता की दशा में, सामग्री का, राजमार्ग प्रशासन या ऐसे अधिकारी द्वारा नीलामी से विक्रय किया जा सकेगा और नीलामी के आगमों से बिल के अधीन संदेय रकम की कटौती किए जाने के पश्चात् शेष, यदि कोई हो, उसके हकदार व्यक्ति को लौटा दिया जाएगा ।
(5) उस दशा में, जहां उपधारा (4) के अधीन नीलामी के आगम उस उपधारा में निर्दिष्ट बिल के अधीन वसूलनीय रकम से कम हैं, वहां ऐसे आगमों और इस प्रकार वसूलनीय रकम के बीच अंतर या जहां ऐसी कोई नीलामी नहीं की गई है वहां, बिल के अधीन वसूलनीय रकम, बिल में विनिर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर संदाय करने में असफल रहने की दशा में, भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूलनीय होगी ।
अध्याय 4
राष्ट्रीय राजमार्गों तक पहुंच पर नियंत्रण
28. पहुंच का अधिकार-(1) किसी व्यक्ति को किसी राजमार्ग पर, किसी यान द्वारा या पैदल, पांच या अधिक व्यक्तियों के समूह में पहुंचने का अधिकार नहीं होगा, सिवाय तब के जबकि राजमार्ग प्रशासन द्वारा या तो साधारणतया या विनिर्दिष्टतया धारा 29 में विनिर्दिष्ट रीति से अनुज्ञात कर दिया गया हो ।
(2) उपधारा (1) के अधीन राजमार्ग पर पहुंच, केंद्रीय सरकार द्वारा, समय-समय पर, जारी किए गए मार्गदर्शी सिद्धांतों और अनुदेशों के अधीन रहते हुए होगी ।
(3) राजमार्ग प्रशासन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी राजमार्ग या उसके किसी भाग को ऐसी अधिसूचना में यथाविनिर्दिष्ट रीति में पहुंच के लिए परिसीमित घोषित कर सकेगा और ऐसे राजमार्ग से या उसके आर-पार ऐसी पहुंच पर उक्त अधिसूचना में यथाविनिर्दिष्ट कोई निर्बंधन या नियंत्रण भी अधिरोपित कर सकेगा ।
29. राजमार्ग पर पहुंच की अनुज्ञा के लिए प्रक्रिया-(1) धारा 28 उपधारा (1) के अधीन साधारण अनुज्ञा, ऐसे प्रयोजन के लिए राजपत्र में अधिसूचना जारी करके दी जाएगी और उस उपधारा के अधीन विनिर्दिष्ट अनुज्ञा, इस धारा के अधीन इसमें इसके पश्चात् विनिर्दिष्ट रीति से दी जाएगी ।
(2) उपधारा (1) में उल्लिखित विनिर्दिष्ट अनुज्ञा अभिप्राप्त करने का इच्छुक कोई व्यक्ति, राजमार्ग प्रशासन को विहित प्ररूप में आवेदन कर सकेगा जिसमें उस पहुंच के साधन विनिर्दिष्ट होंगे, जिससे ऐसी अनुज्ञा संबंधित है और उसके साथ ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए और राजमार्ग प्रशासन, आवेदन पर विचार करने के पश्चात्, जैसा वह ठीक समझे, या तो उन निबंधनों और शर्तों के साथ या उनके बिना जो विहित की जाएं, अनुज्ञा दे सकेगा या आवेदन को नामंजूर कर सकेगा ।
(3) उस दशा में, जहां उपधारा (2) के अधीन किए गए आवेदन के संबंध में अनुज्ञा दी गई है, वह व्यक्ति जिसे ऐसी अनुज्ञा दी गई है, राजमार्ग प्रशासन से विहित प्ररूप में अनुज्ञप्ति अभिप्राप्त करेगा जिसमें वे निबंधन और शर्तें, यदि कोई हों, वर्णित होंगी जिनके अधीन रहते हुए ऐसी अनुज्ञा दी गई है, और ऐसी अनुज्ञा, ऐसी अवधि के पश्चात्, और ऐसी रीति से जो विहित की जाए, नवीकृत की जाएगी ।
(4) यदि कोई व्यक्ति, धारा 28 की उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करता है या ऐसे किन्हीं निबंधनों और शर्तों का अतिक्रमण करता है जिनके अधीन रहते हुए उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञा दी गई है, जिसमें उपधारा (3) के अधीन अभिप्राप्त अनुज्ञप्ति का नवीकरण न किया जाना भी सम्मिलित है, तो, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञा के अधीन राजमार्ग पर उसकी पहुंच को अप्राधिकृत पहुंच समझा जाएगा और राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा प्राधिकृत अधिकारी को उसे वहां से हटाने की शक्ति होगी और जहां आवश्यक हो, राजमार्ग प्रशासन या ऐसा अधिकारी उसे वहां से हटाने के लिए पुलिस की सहायता से आवश्यक बल का प्रयोग कर सकेगा ।
30. पहुंच आदि का विनियमन और अपयोजन-(1) धारा 29 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन दी गई किसी अनुज्ञा के होते हुए भी, राजमार्ग प्रशासन को यातायात की सुरक्षा और सुविधा के हित में राजमार्ग पर किसी प्रस्तावित या विद्यमान पहुंच के लिए इंकार करने, उसे विनियमित करने या अपयोजित करने की शक्ति होगी ।
(2) जहां किसी विद्यमान पहुंच का अपयोजन किया जाता है, वहां उसके बदले में दी गई आनुकल्पिक पहुंच, विद्यमान पहुंच से अनुचित रूप से दूर नहीं होगी ।
अध्याय 5
राष्ट्रीय राजमार्गों पर विभिन्न किस्मों के यातायात का विनियमन
31. राजमार्ग प्रशासन द्वारा, राजमार्ग असुरक्षित समझे जाने पर यातायात का विनियमित किया जाना-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, राजमार्ग प्रशासन के पास राजमार्ग पर यानों के उचित प्रबंध के लिए उनके चलाने को विनियमित और नियंत्रित करने की शक्ति होगी ।
(2) यदि किसी समय राजमार्ग प्रशासन का, उसे प्राप्त सूचना के आधार पर या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि उसकी अधिकारिता के भीतर कोई राजमार्ग या उसका भाग नुकसान के कारण या अन्यथा यानीय या पैदल यातायात के लिए भीड़ वाला है या हो गया है या असुरक्षित है या हो गया है तो वह, उक्त राजमार्ग या उसके उस भाग को सभी यातायात या यातायात के किसी वर्ग के लिए बंद कर सकेगा या, यथास्थिति, उक्त राजमार्ग या उसके उस भाग पर उपयोग किए जाने वाले यानों की संख्या और गति को ऐसी रीति से विनियमित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
32. कतिपय राजमार्गों पर भारी यानों के उपयोग का प्रतिषेध-जहां राजमार्ग प्रशासन का यह समाधान हो जाता है कि राजमार्ग का भूतल या उसका कोई भाग अथवा उस राजमार्ग पर या उसके आर-पार बना हुआ कोई पुल, पुलिया, उपसेतु ऐसे यानों को ले जाने के लिए परिकल्पित नहीं किया गया है, जिन पर लदा हुआ भार विहित सीमा से अधिक है, तो वह, इस निमित्त बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, ऐसे यानों का उक्त राजमार्ग या उस राजमार्ग के भाग पर या, यथास्थिति, उस पुल, पुलिया या उपसेतु पर चलाया जाना प्रतिषिद्धि कर सकेगा या उसे निर्बंधित कर सकेगा ।
33. राजमार्ग पर यातायात का अस्थायी रूप से बंद किया जाना-जहां, धारा 31 या धारा 32 के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए, राजमार्ग प्रशासन, उक्त धारा के प्रयोजनों के लिए यह उचित समझता है कि किसी राजमार्ग या उसके किसी भाग को अस्थायी रूप से बंद कर देना चाहिए या उस राजमार्ग या उसके उस भाग पर यातायात को निर्बंधित या नियंत्रित करना चाहिए तो वह ऐसा, ऐसी रीति से कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
34. राजमार्ग का स्थायी रूप से बंद किया जाना-(1) जहां धारा 31 के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए, राजमार्ग प्रशासन राजमार्ग की सुरक्षा के हित में किसी राजमार्ग या उसके किसी भाग को बंद करना आवश्यक समझता है, वहां वह, जनता को अपने ऐसा करने के आशय की सूचना राजपत्र में अधिसूचना द्वारा देगा, जिसमें वह समय विनिर्दिष्ट किया जाएगा जिसके भीतर प्राप्त आक्षेपों और सुझावों पर, उपधारा (3) के अधीन विचार किया जाएगा और ऐसी सूचना के अतिरिक्त, वह ऐसी सूचना की अंतर्वस्तु को कम से कम दो समाचारपत्रों में, जिनमें से एक उस क्षेत्र, जिससे वह राजमार्ग गुजरता है, की स्थानीय भाषा में होगा और दूसरा उस क्षेत्र में परिचालित किया जाने वाला समाचारपत्र होगा, भी अधिसूचित करेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन सूचना में बंद किए जाने के लिए आशयित राजमार्ग या उसके भाग के बदले में व्यवस्था किए जाने के लिए प्रस्तावित आनुकल्पिक मार्ग उपदर्शित होगा, जिसमें यह भी विनिर्दिष्ट होगा कि क्या ऐसा आनुकल्पिक मार्ग, पहले से विद्यमान राजमार्ग है या वह नया सन्निर्मित किया जाएगा और ऐसे प्रस्ताव से प्रभावित व्यक्तियों से उस सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर आक्षेप और सुझाव भी आमंत्रित किए जाएंगे जो उस सूचना में विनिर्दिष्ट अधिकारी को संबोधित होंगे ।
(3) राजमार्ग प्रशासन, उक्त सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर प्राप्त आक्षेपों और सुझावों, यदि कोई हों, पर विचार करने के पश्चात् सूचना के अधीन बंद किए जाने के प्रस्ताव पर विनिश्चय करेगा और ऐसे विनिश्चय के अनुसार कार्य करेगा ।
35. यानों के उपयोग को निर्बंधित करने की शक्ति-यदि राजमार्ग प्रशासन का यह समाधान हो जाता है कि लोक सुरक्षा या सुविधा के हित में अथवा किसी सड़क या पुल की प्रकृति के कारण ऐसा करना आवश्यक है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे अपवादों या शर्तों के अधीन रहते हुए, जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, किसी राजमार्ग या उसके भाग के, यातायात के किसी वर्ग या वर्गों के लिए साधारणतया या ऐसे विनिर्दिष्ट अवसर या समय पर, उपभोग को, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, प्रतिषिद्ध या निर्बंधित कर सकेगा और जब ऐसा प्रतिषेध या निर्बंधन अधिरोपित किया जाएं तो राजमार्ग प्रशासन, यातायात की सुविधा के लिए उपयुक्त स्थानों पर यातायात चिह्नों को जो विहित किए जाएं, लगाएगा या परिनिर्मित करेगा :
परंतु जहां इस धारा के अधीन कोई प्रतिषेध या निर्बंधन एक मास या उससे कम अवधि के लिए हो वहां ऐसा प्रतिषेध या निर्बंधन, राजपत्र में अधिसूचना जारी किए बिना, अधिरोपित किया जा सकेगा:
परंतु यह और कि पहले परंतुक के अधीन अधिरोपित प्रतिषेध या निर्बंधन, उपयोक्ताओं की जानकारी के लिए अन्य संभव साधनों द्वारा व्यापक रूप से प्रचारित किया जाएगा ।
36. राजमार्ग के नुकसान का निवारण और उसकी मरम्मत-(1) ऐसा व्यक्ति, जिसके प्रभार या कब्जे में कोई यान या पशु है, जानबूझकर या उपेक्षापूर्वक, किसी राजमार्ग को कोई नुकसान कारित नहीं करेगा या ऐसे यान या पशु को कारित नहीं करने देगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के उल्लंघन में, किसी राजमार्ग को कोई नुकसान हुआ है, वहां राजमार्ग प्रशासन, ऐसे नुकसान की मरम्मत अपने खर्च पर करवाएगा और ऐसा व्यय तथा उसका पंद्रह प्रतिशत अतिरिक्त प्रभार के रूप में, उस व्यक्ति से, जिसने उपधारा (1) का इस प्रकार उल्लंघन किया है, उसके विरुद्ध की जा सकने वाली किसी अन्य कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, धारा 27 में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार इस प्रकार वसूल किया जाएगा मानो ऐसा व्यय और अतिरिक्त प्रभार, उक्त धारा के अधीन वसूलनीय खर्च और अतिरिक्त प्रभार हों ।
37. यानों या पशुओं को खतरनाक स्थिति में छोड़ने का प्रतिषेध-(1) कोई भी व्यक्ति, जिसके प्रभार या कब्जे में कोई यान या पशु है, ऐसे यान या पशु को राजमार्ग पर खड़े होने या चलने के लिए तब तक अनुज्ञात नहीं करेगा जब तक कि वह ऐसे सुरक्षा नियंत्रण के अधीन न हो, जो विहित किया जाए ।
(2) जहां उपधारा (1) के उल्लंघन में राजमार्ग पर कोई बाधा कारित की जाती है, वहां ऐसी बाधा कारित करने वाले यान या पशु को, राजमार्ग प्रशासन द्वारा, राजमार्ग से ऐसी बाधा को हटाने के लिए, अनुकर्षण द्वारा ले जाया जाएगा और इस प्रकार अनुकर्षित यान या पशु, राजमार्ग प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में ले लिया जाएगा और उसके स्वामी को विहित रीति से ऐसे हटाने पर उपगत व्ययों का जो विहित किए जाएं, संदाय करने पर सौंप दिया जाएगा ।
(3) उस दशा में, जहां उपधारा (2) के अधीन कब्जे में लिए गए यान या पशु के संबंध में व्ययों का संदाय उक्त उपधारा के अधीन विहित रीति से नहीं किया गया है वहां राजमार्ग प्रशासन, ऐसे यान या पशु का नीलामी द्वारा विक्रय करेगा और नीलामी के आगम केंद्रीय सरकार की संपत्ति होंगे ।
(4) ऐसा व्यक्ति, जिसके अप्राधिकृत अधिभोग में कोई राजमार्ग भूमि है, राजमार्ग प्रशासन द्वारा धारा 26 में अप्राधिकृत अधिभोग को हटाने के लिए विहित रीति से संक्षेपतः बेदखल कर दिया जाएगा और वह राजमार्ग प्रशासन द्वारा अधिरोपित जुर्माने का दायी होगा जो उसके अप्राधिकृत अधिभोग की भूमि के पांच सौ रुपए प्रति वर्ग मीटर से कम नहीं होगा किंतु जिसका ऐसी भूमि की कीमत तक विस्तार किया जा सकेगा ।
अध्याय 6
राजमार्ग भूमि पर लोक उपयोगिताओं, नालों आदि के सन्निर्माण का विनियमन
38. राजमार्ग भूमि पर सन्निर्माण-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, राजमार्ग प्रशासन या उस प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति से भिन्न कोई व्यक्ति, राजमार्ग प्रशासन से इस प्रयोजन के लिए पूर्व लिखित अनुज्ञा के सिवाय, राजमार्ग भूमि पर या किसी राजमार्ग के आर-पार या उसके नीचे या उसके ऊपर, किसी प्रकार के कोई खंभे, स्तंभ, विज्ञापन टावर, ट्रांसफार्मर, केबल तार, पाईप, नाला, मल नाली, नहर, रेल लाइन, ट्रॉमवे, टेलीफोन बॉक्स, रिपीटर स्टेशन, गली, पथ या मार्ग को सन्निर्मित, संस्थापित, स्थानान्तरित नहीं करेगा, उसकी मरम्मत नहीं करेगा, उसे परिवर्तित नहीं करेगा या नहीं ले जाएगा ।
(2) ऐसा व्यक्ति, जिसका उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा अभिप्राप्त करने का आशय है, राजमार्ग प्रशासन को विहित प्ररूप में आवेदन करेगा जिसमें राजमार्ग के अधिभोग का प्रयोजन और अवधि, अधिभोग किए जाने वाले राजमार्ग की अवस्थिति और उसका भाग, कार्य निष्पादन की पद्धति, सन्निर्माण की अवधि और राजमार्ग के ऐसे भाग के प्रत्यावर्तन की पद्धति अंतर्विष्ट होगी ।
(3) राजमार्ग प्रशासन उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन पर विचार करेगा और यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस राजमार्ग से, जिसके संबंध में आवेदन में अनुज्ञा मांगी गई है, भिन्न कोई अनुकल्प नहीं है जहां लोक उपयोगिता अवस्थित करने के लिए भूमि मिल सके तो वह आवेदन में मांगी गई अनुज्ञा लिखित रूप में दे सकेगा:
परंतु ऐसी अनुज्ञा देते समय राजमार्ग प्रशासन, -
(i) राजमार्ग को नुकसान से; और
(ii) राजमार्ग पर के यातायात को बाधा से, संरक्षित करने के लिए ऐसी शर्तें अधिरोपित कर सकेगा जो वह ठीक समझे और अनुज्ञा के अधीन प्रस्थापित कार्य या सन्निर्माण के लिए अधिभोगाधीन या उसमें उपयोजित राजमार्ग के भागरूप किसी भूमि के संबंध में जिस व्यक्ति को ऐसी अनुज्ञा दी गई है, उस पर विहित की जाने वाली फीस और अन्य प्रभार भी अधिरोपित कर सकेगा तथा अनुज्ञा के अधीन किसी संरचना, वस्तु या उपस्कर को लगाने या स्थानांतरित करने में राजमार्ग को हुए किसी नुकसान की मरम्मत के लिए राजमार्ग प्रशासन द्वारा उपगत व्यय, यदि कोई हो, भी ऐसे व्यक्ति पर अधिरोपित करेगा ।
(4) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उल्लंघन में, कोई सन्निर्माण करता है या कोई अन्य कार्य करता है तो राजमार्ग प्रशासन, स्वयं अपने खर्च पर ऐसे सन्निर्माण या अन्य कार्य को राजमार्ग से हटवाएगा और राजमार्ग को उस दशा में प्रत्यावर्तित करेगा जिसमें वह उपधारा (3) के अधीन ऐसे सन्निर्माण या अन्य कार्य के लिए अनुज्ञा दी जाने से ठीक पूर्व था और ऐसा व्यय और उसका पंद्रह प्रतिशत अतिरिक्त प्रभारों के रूप में तथा राजमार्ग प्रशासन द्वारा अधिरोपित जुर्माना, ऐसे सन्निर्माण या अन्य कार्य द्वारा कारित नुकसान की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, जो ऐसे सन्निर्माण या अन्य कार्य के लिए प्रयुक्त भूमि के पांच सौ रुपए प्रति वर्ग मीटर से कम नहीं होगा, किंतु ऐसी भूमि की कीमत से अधिक नहीं होगा, ऐसे व्यक्ति से धारा 27 में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार इस प्रकार वसूल किया जाएगा मानो ऐसा व्यय, अतिरिक्त प्रभार और जुर्माना, उस धारा के अधीन वसूलनीय व्यय, अतिरिक्त प्रभार और जुर्माना हो ।
अध्याय 7
अपराध और शास्ति
39. अपराध और शास्ति-(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन किसी राजमार्ग भूमि के अप्राधिकृत अधिभोग से बेदखल किया गया है, इस अधिनियम के अधीन ऐसे अधिभोग के लिए अनुज्ञा के बिना किसी राजमार्ग भूमि को पुनः अधिभोग में लेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो इस प्रकार अधिभोग में ली गई राजमार्ग भूमि के एक हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर से अन्यून नहीं होगा, किंतु जो ऐसी राजमार्ग भूमि की कीमत के दो गुने से अधिक नहीं होगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराने वाला कोई न्यायालय, उस व्यक्ति को ऐसी अधिभोगाधीन राजमार्ग भूमि से संक्षेपतः बेदखल करने के लिए आदेश करेगा और वह, अपने विरुद्ध की जा सकने वाली किसी अन्य कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसी बेदखली के लिए दायी होगा ।
(3) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय होगा
अध्याय 8
प्रकीर्ण
40. अपीलार्थी का विधि व्यवसायी की सहायता लेने का अधिकार-इस अधिनियम के अधीन अधिकरण में अपील करने वाला व्यक्ति, अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष कथन प्रस्तुत करने के लिए या तो स्वयं हाजिर हो सकेगा या अपनी पसंद के विधि व्यवसायी की सहायता ले सकेगा ।
41. आदेशों का अंतिम होना-इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा किया गया प्रत्येक आदेश या की गई कोई कार्रवाई अथवा अधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपील पर पारित प्रत्येक आदेश या किया गया विनिश्चय अंतिम होगा और किसी मूल वाद, आवेदन या निष्पादन कार्यवाही में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा तथा इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन राजमार्ग प्रशासन या अधिकरण को प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई के संबंध में किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई व्यादेश अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।
42. ग्राम पदाधिकारियों का कर्तव्य-जहां कहीं किसी ग्राम प्रधान, ग्राम लेखपाल, ग्राम चौकीदार या अन्य ग्राम पदाधिकारी को, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, राजमार्ग भूमि के अप्राधिकृत अधिभोग, नुकसान या नष्ट किए जाने के किसी अपराध के संबंध में जानकारी मिलती है तो वह तुरंत निकटतम पुलिस थाने या निकटतम राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी को ऐसे अपराध के किए जाने के बारे में सूचित करेगा और वह उक्त अपराध के अभियोजन में, राजमार्ग प्रशासन और उसके अधिकारियों की सहायता करने के लिए भी कर्तव्याबद्ध होगा ।
43. जांच किया जाना-राजमार्ग प्रशासन या ऐसे प्रशासन द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी, यदि वह इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए कोई जांच करना चाहता है, तो, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, एक संक्षिप्त जांच करेगा ।
44. अधिकरणों के पीठासीन अधिकारियों और कर्मचारियों, आदि का लोक सेवक होना-अधिकरण के पीठासीन अधिकारी और अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों, राजमार्ग प्रशासन को गठित करने वाले अधिकारी या अधिकारियों तथा इस अधिनियम के अधीन ऐसे प्रशासन द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी को, जब वे इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या कार्य करने के लिए तात्पर्यित हों, भारतीय दंड संहिता (1860 का 5) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।
45. स-ावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन स-ावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केंद्रीय सरकार या अधिकरण के पीठासीन अधिकारी या केन्द्रीय सरकार के किसी अन्य अधिकारी या अधिकरण के किसी अधिकारी या कर्मचारी या राजमार्ग प्रशासन गठित करने वाले अधिकारी या अधिकारियों या इस अधिनियम के अधीन ऐसे प्रशासन द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
46. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरादायी था, और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परंतु इस उपधारा की कोई बात, किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनाकुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और
(ख) किसी फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
47. सूचना आदि की तामील के लिए प्रक्रिया-इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, इस अधिनियम के अधीन जारी की गई प्रत्येक सूचना या तैयार किया गया प्रत्येक बिल, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, तामील किया जाएगा या प्रस्तुत किया जाएगा ।
48. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
49. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और कठिनाइयों को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
50. नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा पूर्व प्रकाशन के पश्चात् नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन शक्तियों के प्रयोग और कृत्यों के निर्वहन की रीति;
(ख) धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों को संदेय वेतन, भत्ते और उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;
(ग) धारा 10 के अधीन अधिकरण के पीठासीन अधिकारी को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;
(घ) धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के कदाचार या अक्षमता के अन्वेषण की प्रक्रिया;
(ङ) धारा 13 के अधीन अधिकरण के पीठासीन अधिकारी की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां;
(च) वे अतिरिक्त विषय, जिनके संबंध में अधिकरण, धारा 16 की उपधारा (3) के खंड (ज) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा;
(छ) राजमार्ग प्रशासन के ऐसे अभिलेखों को रखने की रीति, जिनमें भूमि दर्शित की गई हो और धारा 23 की उपधारा (2) के अधीन ऐसे अभिलेखों की शुद्धि के लिए दावा साबित करने की रीति;
(ज) वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए, वह किराया और अन्य प्रभार, जिनके संदाय पर और वह प्ररूप जिसमें धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञा मंजूर करने के लिए अनुज्ञा-पत्र जारी किया जा सकेगा;
(झ) धारा 25 के अधीन राजमार्ग भूमि का पट्टा या अनुज्ञप्ति मंजूर करने के लिए शर्तें, किराए और अन्य प्रभारों का संदाय;
(ञ) धारा 26 की उपधारा (2) के अधीन सूचना का प्ररूप;
(ट) धारा 26 की उपधारा (8) के अधीन कोई सन्निर्माण करने के लिए, जिसके अंतर्गत किसी सन्निर्माण का परिवर्तन भी है, साध्य लागत;
(ठ) वे अतिरिक्त विषय, जिनके संबंध में राजमार्ग प्रशासन या इस निमित्त ऐसे प्रशासन द्वारा प्राधिकृत कोई अधिकारी, धारा 26 की उपधारा (9) के खंड (घ) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा;
(ड) धारा 27 की उपधारा (2) के अधीन बिल का प्ररूप;
(ढ) धारा 29 की उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन का प्ररूप, उसके साथ दी जाने वाली फीस तथा उसके लिए निबंधन और शर्तें;
(ण) धारा 29 की उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञप्ति का प्ररूप, उसकी अवधि और ऐसी अनुज्ञप्ति के नवीकरण की रीति;
(त) लदे भार की सीमा और वे उपबंध, जिनके अधीन रहते हुए धारा 32 के अधीन यानों को चलाने को प्रतिषिद्ध या निर्बंधित किया जा सकेगा;
(थ) धारा 35 के अधीन लगाए या निर्मित किए जाने वाले यातायात चिह्न;
(द) धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन किसी यान या पशु को किसी राजमार्ग पर खड़े होने या चलने के लिए अनुज्ञात करने के लिए सुरक्षा और नियंत्रण;
(ध) धारा 37 की उपधारा (2) के अधीन यान या पशु को उसके स्वामी को सौंपने और ऐसे यान या पशु को हटाने में उपगत व्ययों के संदाय की रीति;
(न) धारा 38 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन का प्ररूप;
(प) वह फीस और अन्य प्रभार, जो धारा 38 की उपधारा (3) के अधीन अधिरोपित किए जाएंगे;
(फ) धारा 43 के अधीन संक्षिप्त जांच की रीति;
(ब) धारा 47 के अधीन सूचना या बिल की तामील या प्रस्तुत करने की रीति; और
(भ) कोई अन्य विषय, जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम या जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व, दोनों सदन उस नियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात्, वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा/होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा/जाएगी । किंतु नियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभावी नहीं पड़ेगा ।
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