जूट विनिर्मिति उपकर अधिनियम, 1983
(1983 का अधिनियम संख्यांक 28)
[7 सितम्बर, 1983]
जूट विनिर्मितियों के उत्पादन के विकास के लिए उपाय करने के
प्रयोजन के लिए जूट विनिर्मितियों पर उपकर के रूप में
उत्पाद-शुल्क का उद्ग्रहण और संग्रहण करने और
उनसे सम्बन्धित विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जूट विनिर्मिति उपकर अधिनियम, 1983 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) जूट विनिर्मिति" से अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई ऐसी वस्तु अभिप्रेत है जिसमें कुल फाइबर अन्तर्वस्तु के भार के पचास प्रतिशत से अधिक जूट है (जिसके अन्तर्गत किसी भी किस्म का भीमलीपट्टम जूट या मेस्ता फाइबर भी है) और जिसके उत्पादन में शक्ति की सहायता से मामूली तौर पर कोई प्रक्रिया की जाती है ।
स्पष्टीकरण-शक्ति" से विद्युत ऊर्जा या अन्य ऐसे रूप की ऊर्जा अभिप्रेत है जो मशीन द्वारा पारेषित की जाती है और जिसका उत्पादन मानव या जीवजन्तु द्वारा नहीं किया जाता है ;
(ख) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ग) जूट विनिर्मिति के सम्बन्ध में उत्पादक" से ऐसी जूट विनिर्मिति का उत्पादक अभिप्रेत है ।
3. भारत में उत्पादित जूट विनिर्मितियों पर उपकर का उद्ग्रहण और संग्रहण-(1) अनुसूची के स्तम्भ 2 में विनिर्दिष्ट और भारत में उत्पादित जूट विनिर्मिति की प्रत्येक वस्तु पर [राष्ट्रीय जूट बोर्ड अधिनियम, 2008ट के प्रयोजनों के लिए उपकर के रूप में ऐसी दर से, जो उसके स्तंभ 3 की तत्स्थानी प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट दर से अधिक नहीं है, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, उत्पाद-शुल्क उद्गृहीत और संगृहीत किया जाएगा :
परन्तु जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी दर विनिर्दिष्ट नहीं की जाती है तब तक उत्पाद-शुल्क अनुसूची के स्तंभ 4 की तत्स्थानी प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट दर से उद्गृहीत और संगृहीत किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन उद्गृहीत उत्पाद-शुल्क उस उत्पाद-शुल्क के अतिरिक्त होगा जो केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क । । । अधिनियम, 1944 (1944 का 1) या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन जूट विनिर्मिति पर उद्ग्रहणीय है ।
(3) उपधारा (1) के अधीन उद्गृहीत उत्पाद-शुल्क जूट विनिर्मिति के उत्पादक द्वारा संदेय होगा ।
(4) केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क 2। । । अधिनियम, 1944 (1944 का 1) और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध, जिनके अन्तर्गत शुल्क के प्रतिदायों और छूटों के सम्बन्धित उपबन्ध भी हैं, जहां तक हो सके, इस अधिनियम के अधीन जूट विनिर्मितियों पर उत्पाद-शुल्क के उद्ग्रहण और संग्रहण के सम्बन्ध में लागू होंगे ।
4. शुल्कों के आगमों का भारत की संचित निधि में जमा किया जाना-धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन उद्गृहीत उत्पाद-शुल्क के आगम पहले भारत की संचित निधि में जमा किए जाएंगे और केन्द्रीय सरकार यदि संसद् विधि द्वारा इस निमित्त किए गए विनियोग द्वारा ऐसा उपबन्ध करती है तो 1[ऐसे आगमों में से (ऐसे संग्रहण खर्च को काटकर, जो ऐसे आगमों के चार प्रतिशत से अधिक नहीं होगा) समय-समय पर, ऐसी धनराशियां, जो वह उचित समझे, राष्ट्रीय जूट बोर्ड को राष्ट्रीय जूट बोर्ड अधिनियम, 2008 के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए संदत्त कर सकेगी] ।
5. जानकारी मांगने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, किसी जूट विनिर्मिति के उत्पादक से अपेक्षा कर सकेगी कि वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ऐसे आंकड़े और कोई अन्य जानकारी ऐसे प्ररूप में और ऐसी अवधि के भीतर, जो विहित की जाए, दे ।
6. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम उस प्ररूप के लिए, जिसमें और उस अवधि के लिए, जिसके भीतर धारा 5 के अधीन आंकड़े और कोई अन्य जानकारी दी जा सकेगी, उपबन्ध कर सकेंगे ।
(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
[अनुसूची
[धारा 2(क) और धारा 3(1) देखिए]
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क्र० सं० |
जूट विनिर्मिति की वस्तुएं |
वह अधिकतम दर जिस पर उत्पाद-शुल्क संगृहीत किया जा सकेगा |
वास्तविक दर जिस पर केन्द्रीय सरकार द्वारा, भिन्न दर विनिर्दिष्ट किए जाने तक, उत्पाद-शुल्क संगृहीत किया जाएगा |
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1 |
2 |
3 |
4 |
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1. |
कार्पेट बैंकिग |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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2. |
हैशन |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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3. |
बोरे |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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4. |
सूत और सुतली |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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5. |
डी.डब्ल्यू. तिरपाल |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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6. |
सजावटी फैब्रिक |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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7. |
सूती थैले |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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8. |
मृदा रक्षक |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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9. |
जापानी चावल के थैले |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार |
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10. |
जूट विनिर्मिति की कोई अन्य वस्तु |
दो प्रतिशत मूल्यानुसार |
एक प्रतिशत मूल्यानुसार] |
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