दिल्ली विक्रय-कर (संशोधन और विधिमान्यकरण) अधिनियम, 1976
(1976 का अधिनियम संख्यांक 91)
[2 सितम्बर, 1976]
विक्रय-कर से संबंधित विधि का, जैसी वह गत कालावधि के दौरान
दिल्ली राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त थी, भूतलक्षी रूप से संशोधन करने
और उस कालावधि के दौरान कतिपय माल के क्रय या
विक्रय पर करों को विधिमान्य
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सत्ताईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली विक्रय-कर (संशोधन और विधिमान्यकरण) अधिनियम, 1976 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) दिल्ली" से अभिप्रेत है,-
(i) संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारम्भ के पूर्व की किसी अवधि के सम्बन्ध में, भाग ग दिल्ली राज्य;
(ii) ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् की किसी अवधि के सम्बन्ध में, दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र;
(ख) मूल अधिनियम" से बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941 (1941 का बंगाल ऐक्ट 6) अभिप्रेत है जैसा वह समय-समय पर दिल्ली को लागू रहा है;
(ग) विक्रय-कर विस्तारण अधिसूचनाएं" से भारत सरकार के गृह-मंत्रालय की निम्नलिखित अधिसूचनाएं अभिप्रेत हैं :-
(i) अधिसूचना संख्यांक का०नि०आ० 615, तारीख 28 अप्रैल, 1951;
(ii) अधिसूचना संख्यांक का० नि०आ० 1204, तारीख 6 अगस्त, 1951; और
(iii) अधिसूचना संख्यांक का०नि०आ० 1564, तारीख 4 अक्तूबर, 1951 ।
3. विधिमान्यकरण-(1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए विक्रय-कर विस्तारण अधिसूचनाओं में से प्रत्येक के बारे में यह समझा जाएगा कि वह सभी प्रयोजनों के लिए (जिनके अन्तर्गत मूल अधिनियम के अधीन करों का उद्ग्रहण, निर्धारण और संग्रहण और दिल्ली विक्रय-कर अधिनियम, 1975 (1975 का 43) की धारा 73 के प्रयोजन भी हैं) संसद् द्वारा अधिनियमित विधि थी और विधि है, जो उस तारीख को, प्रभावी हुई, जिसको ऐसी अधिसूचना भारत के राजपत्र में प्रकाशित की गई थी और तद्नुसार मूल अधिनियम के अधीन या उक्त धारा 73 के अधीन इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व की गई या की जाने के लिए तात्पर्यित किसी बात अथवा की गई या की जाने के लिए तात्पर्यित किसी कार्रवाई के बारे में यह समझा जाएगा कि वह उतनी ही विधिमान्य और प्रभावी थी और सदैव से प्रभावी थी मानो यह धारा उस समय प्रवृत्त थी जब ऐसी बात या ऐसी कार्रवाई की गई थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी मूल अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (2) के उपबन्ध, सभी प्रयोजनों के लिए (जिनके अन्तर्गत उस अधिनियम के अधीन कर का उद्ग्रहण, निर्धारण और संग्रहण और दिल्ली विक्रय-कर अधिनियम, 1975(1975 का 43) की धारा 73 के प्रयोजन भी हैं), प्रभावी होंगे और यह समझा जाएगा कि वे सदैव प्रभावी थे मानो उक्त उपधारा (2) द्वारा (जिसे इसमें इसके पश्चात् नामित उपधारा कहा गया है) केन्द्रीय सरकार को ये शक्तियां प्रदान की गई थीं कि वह नामित उपधारा में उल्लिखित अनुसूची में (जिसे इसमें इसके पश्चात् नामित अनुसूची कहा गया है), परिवर्धन या उसमें से लोप या उसमें अन्यथा संशोधन राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, और ऐसा करने के अपने आशय की कोई पूर्व सूचना दिए बिना, कर सकती है ।
(3) किसी न्यायालय या किसी अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी, प्रत्येक अधिसूचना, जो नामित अनुसूची में परिवर्धन या उसमें से लोप या उसमें अन्यथा संशोधन करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नामित उपधारा के अधीन जारी की गई या जारी की जाने के लिए तात्पर्यित है वैसी ही विधिमान्य और प्रभावी होगी और सदैव से वैसी ही विधिमान्य और प्रभावी मानी जाएगी मानो यह धारा उस समय प्रवृत्त थी जब ऐसी अधिसूचना जारी की गई थी और तद्नुसार-
(क) ऐसे अधिसूचना में विनिर्दिष्ट नामिम अनुसूची के किसी संशोधन के कारण (चाहे वह लोप के रूप में हो या अन्यथा) मूल अधिनियम के अधीन उद्गृहीत, निर्धारित या संगृहीत किया गया अथवा उद्ग्रहीत, निर्धारित या संगृहीत किए जाने के लिए तात्पर्यित किसी कर के बारे में यह समझा जाएगा कि वह विधि के अनुसार विधिमान्य रूप से उद्गृहीत, निर्धारित या संगृहीत किया गया था;
(ख) कोई वाद या अन्य कार्यवाही किसी न्यायालय में या किसी प्राधिकरण के समक्ष ऐसे कर के प्रतिदाय के लिए, जिसका संग्रहण किया जा चुका है, नहीं की जाएगी या चालू नहीं रखी जाएगी और उक्त कर के प्रतिदाय का निदेश देने वाली किसी डिक्री या आदेश का प्रवर्तन किसी न्यायालय द्वारा या अन्य प्राधिकरण द्वारा नहीं किया जाएगा;
(ग) उन सभी रकमों की, जो खंड (क) में निर्दिष्ट किसी संशोधन के कारण मूल अधिनियम के अधीन कर के रूप में संगृहीत की जाती किन्तु संगृहीत नहीं की गई हैं, वसूलियां दिल्ली विक्रय-कर अधिनियम, 1975 (1975 का 43) की धारा 73 की उपधारा (1) के परन्तुक के अनुसार की जाएंगी ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि किसी व्यक्तिय की ओर से किया गया कोई कार्य या लोप उस अपराध के रूप में दण्डनीय नहीं होगा जो यदि यह धारा प्रवृत्त नहीं हुई होती तो इस प्रकार दण्डनीय नहीं होता ।
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