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विदेशीय विवाह अधिनियम, 1969 ( Foreign Marriage Act, 1969 )


 

विदेशीय विवाह अधिनियम, 1969

(1969 का अधिनियम संख्यांक 33)

[31 अगस्त, 1969]

भारत के नागरिकों के भारत से बाहर

विवाह सम्बन्धी उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के बीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम-यह अधिनियम विदेशीय विवाह अधिनियम, 1969 कहा जा सकेगा ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी" का वही अर्थ होगा जो विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) में है ;

(ख) विवाह अधिकारी के संबंध में जिला" से वह क्षेत्र अभिप्रेत है जिसके भीतर उसके पद के कर्तव्यों का निर्वहन किया जाना है ;

(ग)  विदेश" से भारत के बाहर का देश या स्थान अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसा पोत भी है जो तत्समय ऐसे देश या स्थान के राज्यक्षेत्रीय समुद्र में हो ;

(घ) विवाह अधिकारी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो धारा 3 के अधीन विवाह अधिकारी नियुक्त किया गया है ;

(ङ) विवाह अधिकारी के संबंध में शासकीय गृह" से निम्नलिखित अभिप्रेत है :-

(i) अधिकारी के निवास का शासकीय गृह ;

(ii) वह कार्यालय जिसमें अधिकारी का कार्य किया जाता है ;

(iii) कोई विहित स्थान ; तथा

(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।

3. विवाह अधिकारी-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अपने ऐसे राजनयिक या कौन्सलीय आफिसरों को, जिन्हें वह ठीक समझे, किसी विदेश के लिए विवाह अधिकारी नियुक्त कर सकेगी ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में राजनयिक आफिसर" से राजदूत, दूत, मंत्री, उच्चायुक्त, आयुक्त, कार्यदूत या अन्य राजनयिक प्रतिनिधि या किसी राजदूतावास, दूतावास या उच्च आयोग का परार्शद या सचिव अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

विदेशीय विवाहों का अनुष्ठापन

4. विदेशीय विवाहों के अनुष्ठापन से सम्बन्धित शर्तें-ऐसे पक्षकारों का विवाह, जिनमें कम से कम एक भारत का नागरिक हो, विदेश में विवाह अधिकारी द्वारा या उसके समक्ष इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित किया जा सकेगा, यदि उस विवाह के समय निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाती हैं, अर्थात् :-

(क) किसी पक्षकार का पति या पत्नी जीवित नहीं है ;

(ख) कोई पक्षकार जड़ या पागल नहीं है ;

(ग) विवाह के समय वर ने इक्कीस वर्ष की आयु और वधू ने अट्ठारह वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है ; तथा

(घ) पक्षकारों में प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी नहीं है :

                परन्तु जहां पक्षकारों में से कम से कम एक को शासित करने वाली स्वीय विधि या रूढ़ि उनका परस्पर विवाह अनुज्ञात करती हो वहां ऐसा विवाह, इस बात के होते हुए भी अनुष्ठापित किया जा सकेगा कि उनमें प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी है ।

5. आशयित विवाह की सूचना-जब किसी विवाह का इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापन आशयित हो, तब विवाह के पक्षकार प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्ररूप में उसकी लिखित सूचना उस जिले के विवाह अधिकारी को देंगे, जिसमें विवाह के पक्षकारों में से कम से कम एक ने ऐसी सूचना दिए जाने की तारीख के ठीक पहले तीस दिन से अन्यून की कालावधि पर्यन्त निवास किया हो, तथा ऐसी सूचना में यह कथन रहेगा कि पक्षकार ने इस प्रकार निवास किया है ।

6. विवाह सूचना पुस्तक-विवाह अधिकारी धारा 5 के अधीन दी गई सब सूचनाओं को अपने कार्यालय के अभिलेखों के साथ रखेगा और उस प्रयोजन के लिए विहित पुस्तक में, जो विवाह-सूचना पुस्तक" कही जाएगी, ऐसी प्रत्येक सूचना की एक शुद्ध प्रतिलिपि भी तत्काल दर्ज करेगा और ऐसी पुस्तक उसका निरीक्षण करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति द्वारा, बिना फीस के, निरीक्षण के लिए सभी उचित समयों पर उपलब्ध रहेगी ।

7. सूचना का प्रकाशन-जहां विवाह अधिकारी को धारा 5 के अधीन सूचना दी जाए वहां वह उसका प्रकाशन-

(क) अपने कार्यालय में किसी सहजदृश्य स्थान पर उसकी प्रतिलिपि लगा कर कराएगा, तथा

(ख) भारत में और उस देश में या उन देशों में, जहां पक्षकार मामूली तौर पर निवास करते हों, विहित रीति से कराएगा ।

8. विवाह के प्रति आक्षेप-(1) धारा 7 के अधीन सूचना के प्रकाशन की तारीख से तीस दिन की समाप्ति से पूर्व कोई व्यक्ति उस विवाह के प्रति इस आधार पर आक्षेप कर सकेगा कि वह विवाह धारा 4 में विनिर्दिष्ट किसी एक या अधिक शर्तों का उल्लंघन करेगा ।

                स्पष्टीकरण-जहां सूचना का धारा 7 के खंड (क) के अधीन प्रतिलिपि लगाकर प्रकाशन और उस धारा के खंड (ख) के अधीन विहित रीति से प्रकाशन विभिन्न तारीखों पर हो वहां इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए तीस दिन की कालावधि पश्चात्वर्ती तारीख से गिनी जाएगी ।

                (2) ऐसा प्रत्येक आक्षेप लिखित रूप में होगा; वह आक्षेप करने वाले उस व्यक्ति द्वारा या उसके निमित्त हस्ताक्षर करने के लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित होगा और उसमें आक्षेप का आधार कथित होगा ; तथा विवाह अधिकारी आक्षेप की प्रकृति को अपनी विवाह-सूचना पुस्तक में अभिलिखित करेगा ।

9. जहां कोई आक्षेप किया जाए वहां विवाह का अनुष्ठापन-यदि आशयित विवाह के प्रति कोई आक्षेप धारा 8 में विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर न किया जाए तो वह विवाह उस कालावधि के अवसान पर अनुष्ठापित किया जा सकेगा ।

10. आक्षेप की प्राप्ति पर प्रक्रिया-(1) यदि किसी आशयित विवाह के प्रति धारा 8 के अधीन आक्षेप किया जाता है तो विवाह अधिकारी वह विवाह तब तक अनुष्ठापित न करेगा जब तक वह ऐसी रीति से, जैसी वह ठीक समझे, आक्षेप के विषय में जांच न कर ले और उसका समाधान न हो जाए, कि वह आक्षेप ऐसा नहीं है कि विवाह अनुष्ठापित न किया जाए या जब तक उस व्यक्ति द्वारा, जिसने आक्षेप किया हो, वह आक्षेप वापस न ले लिया जाए ।

                (2) जहां किसी आक्षेप की बाबत विवाह अधिकारी के मन में कोई शंका ऐसी जांच करने के पश्चात् बनी रहे वहां वह अभिलेख को उस विषय की बाबत ऐसे कथन के साथ, जैसा वह ठीक समझे, केन्द्रीय सरकार को भेजेगा, तथा केन्द्रीय सरकार उस विषय में ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात् और ऐसी सलाह अभिप्राप्त करने के पश्चात्, जैसी वह ठीक समझे, उस पर अपना विनिश्चय लिखित रूप में विवाह अधिकारी को देगी, जो केन्द्रीय सरकार के विनिश्चय के अनुरूप कार्य करेगा ।

11. विवाह का स्थानीय विधियों के उल्लंघन में होना-(1) विवाह अधिकारी ऐसे कारणों से, जिन्हें लेखबद्ध किया जाएगा, इस अधिनियम के अधीन विवाह का अनुष्ठापन करने से इंकार कर सकेगा यदि आशयित विवाह, जिस विदेश में उसका अनुष्ठापन किया जाना है उस विदेश में प्रवृत्त किसी विधि द्वारा प्रतिषिद्ध हो ।

                (2) विवाह अधिकारी ऐसे कारणों से, जिन्हें लेखबद्ध किया जाएगा, इस अधिनियम के अधीन किसी विवाह का अनुष्ठापन करने से इस आधार पर इंकार कर सकेगा कि उसकी राय में ऐसे विवाह का अनुष्ठापन अन्तरराष्ट्रीय विधि या अन्तरराष्ट्रीय सौजन्य से असंगत होगा ।

                (3) जहां विवाह अधिकारी इस धारा के अधीन किसी विवाह का अनुष्ठापन करने से इंकार करता है वहां आशयित विवाह का कोई पक्षकार केन्द्रीय सरकार को विहित रीति से अपील, ऐसे इंकार की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर कर सकेगा तथा विवाह अधिकारी उस विनिश्चय के अनुरूप, जो ऐसी अपील पर केन्द्रीय सरकार दे, कार्य करेगा ।

12. पक्षकारों और साक्षियों द्वारा घोषणा-विवाह का अनुष्ठापन होने से पूर्व, पक्षकार और तीन साक्षी द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्ररूप में घोषणा पर हस्ताक्षर विवाह अधिकारी की उपस्थिति में करेंगे तथा इस घोषणा पर विवाह अधिकारी प्रतिहस्ताक्षर करेगा ।

13. अनुष्ठापन का स्थान और रूप-(1) इस अधिनियम के अधीन विवाह अधिकारी के द्वारा या उसके समक्ष विवाह कम से कम तीन साक्षियों की उपस्थिति में, विहित समय के भीतर, विवाह अधिकारी के शासकीय गृह में, जिसके द्वार खुले रहेंगे, अनुष्ठापित किया जाएगा ।

                (2) विवाह किसी भी रूप में, जिसे पक्षकार अपनाना पसन्द करे, अनुष्ठापित किया जा सकेगा :

                परन्तु जब तक प्रत्येक पक्षकार दूसरे पक्षकार से विवाह अधिकारी और तीन साक्षियों की उपस्थिति में तथा ऐसी भाषा में जिसे पक्षकार समझ सकें, यह घोषित न करे कि मैं (क) तुम (ख) को अपनी विधिपूर्ण पत्नी स्वीकार करता हूं (या अपना विधिपूर्ण पति स्वीकार करती हूं)" तब तक वह पूर्ण और पक्षकारों पर आबद्धकर न होगा :

                परन्तु यह और कि जहां पूर्वगामी परन्तुक में निर्दिष्ट घोषणा किसी ऐसी भाषा में की जाए जिसे विवाह अधिकारी या साक्षियों में से कोई समझ न सके वहां पक्षकारों में से कोई उस घोषणा का निर्वचन ऐसी भाषा में करेगा या कराएगा जिसे, यथास्थिति, विवाह अधिकारी या ऐसा साक्षी समझ ले ।

14. विवाह का प्रमाणपत्र-(1) जब भी कोई विवाह इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित किया जाए तब विवाह अधिकारी तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्ररूप में उसका प्रमाणपत्र उस प्रयोजन के लिए अपने द्वारा रखी गई पुस्तक में प्रविष्ट करेगा, जो विवाह-प्रमाणपत्र पुस्तक कही जाएगी और ऐसे प्रमाणपत्र पर विवाह के पक्षकार और तीनों साक्षी हस्ताक्षर करेंगे ।

                (2) विवाह-प्रमाणपत्र पुस्तक में विवाह अधिकारी द्वारा प्रमाणपत्र प्रविष्ट किए जाने पर वह प्रमाणपत्र इस तथ्य का निश्चायक साक्ष्य समझा जाएगा कि इस अधिनियम के अधीन विवाह अनुष्ठापित हो गया है तथा विवाह के पूर्व संबद्ध पक्षकार के निवास तथा साक्षियों के हस्ताक्षर के सम्बन्ध में सब प्ररूपिताओं का अनुपालन हो गया है ।

15. विदेशीय विवाहों की भारत में विधिमान्यता-इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, इस अधिनियम में उपबन्धित रीति से अनुष्ठापित विवाह, विधि की दृष्टि से ठीक और मान्य होगा ।

16. छह माह के भीतर विवाह का अनुष्ठापन होने पर नई सूचना का दिया जाना-जब भी किसी विवाह का अनुष्ठापन उस तारीख से, जब उसकी सूचना विवाह अधिकारी को धारा 5 के अधीन अपेक्षित रूप में दी गई हो, छह मास के भीतर, अथवा जहां धारा 10 के अधीन किसी मामले का अभिलेख केन्द्रीय सरकार को भेजा गया हो या धारा 11 के अधीन केन्द्रीय सरकार को अपील की गई हो वहां, यथास्थिति, ऐसे मामले या अपील में केन्द्रीय सरकार के विनिश्चय की तारीख से तीन मास के भीतर नहीं होता तब वह सूचना और उससे पैदा होने वाली सब अन्य कार्यवाहियां व्यपगत हुई समझी जाएंगी और जब तक इस अधिनियम में दी गई रीति से नई  सूचना नहीं दी जाती, कोई विवाह अधिकारी उस विवाह का अनुष्ठापन नहीं करेगा ।

अध्याय 3

अन्य विधियों के अधीन अनुष्ठापित विदेशीय विवाहों का रजिस्ट्रीकरण

17. विदेशीय विवाहों का रजिस्ट्रीकरण-(1) जहां-

(क) विवाह अधिकारी का यह समाधान हो जाए कि ऐसा विवाह किसी विदेश में उस देश की विधि के अनुसार पक्षकारों के बीच, जिनमें कम से कम एक भारत का नागरिक है, सम्यक् रूप से अनुष्ठापित हो गया है, तथा

(ख) विवाह का कोई पक्षकार विवाह अधिकारी को लिखित रूप में इत्तिला दे कि वह इस धारा के अधीन उस विवाह को रजिस्ट्रीकृत कराना चाहता या चाहती है,

वहां विवाह अधिकारी विहित फीस के लिए जाने पर, उस विवाह को रजिस्ट्रीकृत कर सकेगा ।

                (2) इस धारा के अधीन कोई विवाह रजिस्ट्रीकृत न किया जाएगा, जब तक कि वह धारा 4 में वर्णित शर्तों को रजिस्ट्रीकरण के समय पूरा नहीं करता है ।

                (3) विवाह अधिकारी किसी विवाह को, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत करने से इस आधार पर इंकार कर सकेगा कि उसकी राय में वह विवाह अन्तराष्ट्रीय विधि या अन्तरराष्ट्रीय सौजन्य से असंगत है ।

                (4) जहां विवाह अधिकारी किसी विवाह को इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत करने से इंकार करे वहां रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने वाला पक्षकार ऐसे इंकार की तारीख से तीस दिन के भीतर केन्द्रीय सरकार को विहित रीति से अपील कर सकेगा, और विवाह अधिकारी उस विनिश्चय के अनुरूप, जो ऐसी अपील पर केन्द्रीय सरकार दे, कार्य करेगा ।

                (5) इस धारा के अधीन विवाह का रजिस्ट्रीकरण विवाह अधिकारी द्वारा, उस विवाह के प्रमाणपत्र की विहित प्ररूप में और विहित रीति से विवाह-प्रमाणपत्र पुस्तक में प्रविष्टि करके, किया जाएगा, तथा ऐसे प्रमाणपत्र पर विवाह के पक्षकार और तीन साक्षी हस्ताक्षर करेंगे ।

                (6) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत विवाह रजिस्ट्रीकरण की तारीख से इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित समझा    जाएगा ।

 

 

 

अध्याय 4

विदेशीय विवाहों की बाबत विवाह-विषयक अनुतोष

18. विवाह-विषयक अनुतोषों का विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन होना-(1) इस धारा के अन्य उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) के अध्याय 4, 5, 6 और 7 के उपबन्ध इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित विवाहों और ऐसे पक्षकारों के बीच, जिनमें कम से कम एक भारत का नागरिक हो, विदेश में अनुष्ठापित अन्य विवाह के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित विवाहों के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।

                स्पष्टीकरण-विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) की धारा 24, इस उपधारा में निर्दिष्ट विवाहों को निम्नलिखित उपान्तरों के साथ लागू होगी, अर्थात् :-

(i) उसकी उपधारा (1) में उस अधिनियम की धारा 4 के खण्ड (क), (ख), (ग) और (घ) के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह क्रमशः इस अधिनियम की धारा 4 के खंड (क), (ख), (ग) और (घ) के प्रति निर्देश है ; तथा

(ii) पूर्वोक्त धारा 24 की कोई बात किसी ऐसे विवाह को लागू न होगी,-

(क) जो इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित न किया गया हो ; अथवा

(ख) जो धारा 17 के उपबन्धों के कारण इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित किया गया समझा जाए :

                परन्तु उपखण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट प्रकार के किसी विवाह के रजिस्ट्रीकरण को निष्प्रभावी घोषित किया जा सकेगा यदि वह रजिस्ट्रीकरण धारा 17 की उपधारा (2) के उल्लंघन में हो ।

                (2) विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) के अध्याय 5 या अध्याय 6 के अधीन, जैसे कि वे उपधारा (1) में निर्दिष्ट विवाहों के प्रति लागू किए गए हैं, अनुतोष के लिए प्रत्येक अर्जी, उस जिला न्यायालय के समक्ष पेश की जाएगी जिसकी मामूली सिविल अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर-

(क) अर्जी पेश करने के समय प्रत्यर्थी निवास कर रहा हो ; अथवा

(ख) पति और पत्नी ने अन्तिम बार एक साथ निवास किया हो ; अथवा

(ग) अर्जीदार अर्जी पेश करने के समय निवास कर रहा हो, परन्तु यह तब जब उस समय प्रत्यर्थी भारत के बाहर निवास कर रहा हो ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा में जिला न्यायालय" का वही अर्थ है जो विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) में है ।

                (3) इस धारा की कोई बात किसी न्यायालय को-

                                (क) विवाह के विघटन की कोई डिक्री देने के लिए वहां के सिवाय प्राधिकृत नहीं करेगी जहां-

(i) विवाह के पक्षकार अर्जी पेश किए जाने के समय भारत के अधिवासी हों ; अथवा

(ii) अर्जीदार पत्नी, अपने विवाह के ठीक पहले भारत की अधिवासिनी थी और अर्जी पेश करने के ठीक पहले तीन वर्ष से अन्यून कालावधि तक भारत में निवास करती रही हो ;

(ख) किसी शून्यकरणीय विवाह को बातिल करने वाली कोई डिक्री देने के लिए वहां के सिवाय प्राधिकृत नहीं करेगी, जहां-

                (i) विवाह के पक्षकार अर्जी पेश किए जाने के समय भारत के अधिवासी हों, अथवा

(ii) विवाह इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित किया गया था और अर्जीदार पत्नी अर्जी पेश करने के ठीक पहले तीन वर्ष की कालावधि तक भारत में मामूली तौर पर निवासी रही हो ;

(ग) किसी शून्य विवाह की बाबत विवाह के बातिलकरण की कोई डिक्री देने के लिए वहां के सिवाय, प्राधिकृत नहीं करेगी, जहां-

                (i) विवाह के पक्षकारों में से कोई भी अर्जी पेश किए जाने के समय भारत का अधिवासी हो ; अथवा

(ii) विवाह इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित किया गया था और अर्जीदार अर्जी पेश करने के समय भारत का निवासी हो ;

(घ) विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) के अध्याय 5 या अध्याय 6 के अधीन कोई अन्य अनुतोष अनुदत्त करने के लिए वहां के सिवाय प्राधिकृत नहीं करेगी जहां अर्जीदार अर्जी पेश करने के समय भारत में निवास कर      रहा हो ।

                (4) उपधारा (1) की कोई बात विदेश में के किसी विवाह के संबंध में, जो इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित न किया गया हो इस अधिनियम के अधीन कोई अनुतोष अनुदत्त करने के लिए किसी न्यायालय को प्राधिकृत नहीं करेगी । यदि ऐसे विवाह की बाबत अनुतोष का अनुदान [चाहे विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) में विनिर्दिष्ट किसी आधार पर या अन्यथाट किसी अन्य तत्समय प्रवृत विधि के अधीन उपबन्धित हो ।

अध्याय 5

शास्तियां

19. द्विविवाह के लिए दण्ड-(1) कोई व्यक्ति, जिसका विवाह इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित किया गया हो या अनुष्ठापित समझा जाए और जो अपने विवाह के बने रहने के दौरान भारत में कोई अन्य विवाह करे, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 494 और धारा 495 में उपबन्धित शास्तियों का भागी होगा तथा इस प्रकार किया गया विवाह शून्य होगा ।

                (2) उपधारा (1) के उपबन्ध भारत से बाहर और परे भारत के किसी नागरिक द्वारा किए गए ऐसे अपराध को भी लागू होते हैं ।

20. विवाह के लिए कुछ अन्य शर्तों के उल्लंघन के लिए दण्ड-भारत का कोई नागरिक, जो अपने विवाह का इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापन धारा 4 के खण्ड (ग) या खण्ड (घ) के विनिर्दिष्ट शर्त के उल्लंघन में कराएगा, -

(क) धारा 4 के खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट शर्त के उल्लंघन की दशा में, सादे कारावास से, जो पंद्रह दिन तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा, तथा

(ख) धारा 4 के खण्ड (घ) में विनिर्दिष्ट शर्त के उल्लंघन की दशा में, सादे कारावास से, जो एक मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

21. मिथ्या घोषणा के लिए दण्ड-यदि भारत का कोई नागरिक विवाह कराने के प्रयोजन से, -

(क) जहां इस अधिनियम द्वारा कोई घोषणा अपेक्षित हो वहां, साशय मिथ्या घोषणा करेगा; अथवा

(ख) जहां इस अधिनियम द्वारा कोई सूचना या प्रमाणपत्र अपेक्षित हो वहां मिथ्या सूचना या प्रमाणपत्र पर साशय हस्ताक्षर करेगा,

तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा ।

22. विवाह अधिकारी की सदोष कार्रवाई के लिए दण्ड-कोई विवाह अधिकारी, जो इस अधिनियम के अधीन विवाह इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में, जानते हुए और जानबूझकर अनुष्ठापित करेगा, सादे कारावास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

23. अन्य देशों की विधि के अधीन अनुष्ठापित विवाहों को मान्यता-यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाए कि विवाह का अनुष्ठापन करने के लिए किसी विदेश में तत्समय प्रवृत्त विधि में ऐसे उपबन्ध हैं, जो इस अधिनियम के उपबन्धों के समरूप हैं, तो वह शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकेगी कि ऐसे विदेश में प्रवृत्त विधि के अधीन अनुष्ठापित विवाह भारत के न्यायालयों द्वारा मान्य होंगे ।

24. स्थानीय विधि के अनुसार विदेश में अनुष्ठापित विवाहों की दस्तावेजों का प्रमाणन-(1) जहां-

(क) कोई विवाह केन्द्रीय सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किसी विदेश में उस देश की विधि के अनुसार ऐसे पक्षकारों के बीच, जिनमें कम से कम एक भारत का नागरिक हो, अनुष्ठापित किया   जाए; तथा

(ख) विवाह का कोई पक्षकार, जो ऐसा नागरिक हो, उस देश के, जिसमें विवाह अनुष्ठापित हुआ हो, विवाह अधिकारी के समक्ष, -

(i) उस विवाह की बाबत उस देश के विवाह रजिस्टर में की प्रविष्टि की प्रतिलिपि, जिसे उस देश के समुचित प्राधिकारी द्वारा उस प्रविष्टि की शुद्ध प्रतिलिपि होना प्रमाणित किया गया हो, पेश कर दे; तथा

(ii) यदि उस प्रविष्टि की प्रतिलिपि अंग्रेजी भाषा में न हो तो उस प्रतिलिपि का विहित भाषा में अनुवाद पेश कर दे; तथा

(ग) विवाह अधिकारी का यह समाधान हो जाए कि विवाह रजिस्टर में की प्रविष्टि की प्रतिलिपि शुद्ध प्रतिलिपि है और अनुवाद, यदि कोई हो, शुद्ध अनुवाद है,

वहां विवाह अधिकारी विहित फीस दिए जाने पर उस प्रतिलिपि पर प्रमाणित करेगा कि उसका समाधान हो गया है कि वह प्रतिलिपि विवाह रजिस्टर में की प्रविष्टि की शुद्ध प्रतिलिपि है और उस अनुवाद पर प्रमाणित करेगा कि उसका समाधान हो गया है कि अनुवाद उस प्रतिलिपि का शुद्ध अनुवाद है तथा उस प्रतिलिपि और अनुवाद को उक्त पक्षकार को दे देगा ।

                (2) विदेश में विवाह के संबंध में उपधारा (1) के अधीन दी गई दस्तावेज किसी भी कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में उसी प्रकार ग्राह्य होगी मानो वह उस देश के समुचित प्राधिकारी द्वारा सम्यक् रूप से दिया गया प्रमाणपत्र हो ।

25. प्रविष्टियों की प्रमाणित प्रतिलिपि का साक्ष्य होना-विवाह प्रमाणपत्र पुस्तक में विवाह की प्रविष्टि की प्रत्येक प्रमाणित प्रतिलिपि, जिसका विवाह अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित हो, मूल प्रति या उसका सबूत पेश किए बिना साक्ष्य में ली जाएगी ।

26. गलतियों का ठीक किया जाना-(1) कोई विवाह अधिकारी, जो विवाह-प्रमाणपत्र पुस्तक में की किसी प्रविष्टि के प्ररूप या सार में कोई गलती का पता चलाए, ऐसी गलती का पता चलने के पश्चात् एक महीने के भीतर उन विवाहित व्यक्तियों के समक्ष अथवा उनकी मृत्यु या उनके अनुपस्थित रहने की दशा में दो अन्य साक्षियों के समक्ष, गलती को, पार्श्व में प्रविष्टि करके तथा मूल प्रविष्टि में परिवर्तन किए बिना, ठीक कर सकेगा और उसमें ऐसे ठीक करने की तारीख जोड़ेगा ।

                (2) इस धारा के अधीन गलती ठीक करने की प्रत्येक प्रविष्टि उन साक्षियों द्वारा जिनके समक्ष वह की गई हो, अनुप्रमाणित   की जाएगी ।

27. अधिनियम-बाह्य विवाहों की विधिमान्यता का इस अधिनियम द्वारा प्रभावित होना-इस अधिनियम की कोई बात विदेश में इस अधिनियम के अनुसरण से अन्यथा अनुष्ठापित विवाह की विधिमान्यता पर किसी प्रकार से प्रभाव न डालेगी ।

28. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

                (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) विवाह अधिकारियों के कर्तव्य और शक्तियां और उनके जिले;

(ख) वह रीति जिससे विवाह अधिकारी इस अधिनियम के अधीन कोई जांच कर सकेगा;

(ग) वह रीति जिससे विवाहों की सूचनाएं, प्रकाशित की जाएंगी;

(घ) वे स्थान जहां और वह समय जब इस अधिनियम के अधीन विवाह अनुष्ठापित किए जा सकेंगे;

(ङ) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन रखी जाने के लिए अपेक्षित पुस्तकें रखी जाएंगी;

(च) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 17 की उपधारा (5) के अधीन विवाहों के प्रमाणपत्र प्रविष्ट किए जा सकेंगे;

(छ) वह फीस, जो इस अधिनियम के अधीन विवाह अधिकारी पर अधिरोपित किसी कर्तव्य के पालन के लिए उद्गृहीत की जा सकेगी;

(ज) वे प्राधिकारी जिनको, वह प्ररूप जिसमें और वे अन्तराल जिनके भीतर, विवाह-प्रमाणपत्र पुस्तक में की प्रविष्टियों की प्रतिलिपियां भेजी जाएंगी तथा जब विवाह-प्रमाणपत्र पुस्तक में गलतियां ठीक की जाएं तब वह रीति जिससे ऐसी शुद्धियों के प्रमाणपत्र प्राधिकारियों को भेजे जाएंगे;

(झ) इस अधिनियम के अधीन रखी जाने के लिए अपेक्षित पुस्तकों का निरीक्षण और उनमें की प्रविष्टियों की प्रमाणित प्रतिलिपियों का दिया जाना;

(ञ) वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अध्यधीन रहते हुए धारा 23 के अधीन किसी विवाह को मान्यता दी जा सकेगी;

(ट) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए या जिसका विहित किया जाना अपेक्षित हो ।

                 [(3) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

29. 1954 के अधिनियम सं० 43 का संशोधन-विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में, -

(क) धारा 1 की उपधारा (2) में, उक्त राज्यक्षेत्रों के बाहर" शब्दों के स्थान पर जम्मू-कश्मीर राज्य में" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

(ख) धारा 2 में, खण्ड (क) और (ग) का लोप कर दिया जाएगा;

(ग) धारा 3 की उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -

(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, इसके भारत के उन नागरिकों के संबंध में लागू होने में, जो उन राज्यक्षेत्रों के, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, अधिवासी हैं, तथा जम्मू-कश्मीर राज्य में है, केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अपने ऐसे अधिकारियों को, जिन्हें वह ठीक समझे, उस राज्य या उसके किसी भाग के लिए विवाह अधिकारी विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।”;

                                (घ) धारा 4 के खंड (ङ) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -

(ङ) जहां विवाह जम्मू-कश्मीर राज्य में अनुष्ठापित किया गया हो, वहां दोनों पक्षकार उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, अधिवसित भारत के नागरिक हों ।”;

(ङ) धारा 10 में, उन राज्यक्षेत्रों के बाहर, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, आशयित विवाह के बारे में कोई आक्षेप उक्त राज्यक्षेत्रों के बाहर" शब्दों स्थान पर जम्मू और कश्मीर राज्य में आशयित विवाह के बारे में कोई आक्षेप उस राज्य में" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

(च) धारा 50 की उपधारा (1) में, राजनयिक और कौन्सलीय आफिसरों और केन्द्रीय सरकार के अन्य अधिकारियों" शब्दों के स्थान पर केन्द्रीय सरकार के अधिकारियों" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।

30. निरसन- भारतीय विदेशीय विवाह अधिनियम, 1903 (1903 का 14) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है ।

प्रथम अनुसूची

(धारा 5 देखिए)

आशयित विवाह की सूचना का प्ररूप

सेवा में,

                                विवाह अधिकारी,

                                . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .  (स्थान)

                हम एतद्द्वारा आपको सूचना देते हैं कि इसकी तारीख से तीन मास के भीतर हम दोनों का परस्पर विवाह विदेशीय विवाह अधिनियम, 1969 के अधीन अनुष्ठापित होना आशयित है ।

 

नाम तथा पिता का नाम

स्थिति

उपजीविका

जन्म की तारीख

रहने का स्थान

यदि रहने का वर्तमान स्थान स्थायी न हो तो रहने का स्थायी स्थान

रहने के वर्तमान स्थान में निवास की अवधि

क      ख

अविवाहित

 

 

 

 

 

 

विधुर

 

 

 

 

 

 

विच्छिन्न-विवाह

 

 

 

 

 

ग      घ

अविवाहित

 

 

 

 

 

 

विधवा

 

 

 

 

 

 

विच्छिन्न-विवाह

 

 

 

 

 

आज 19 .....................के..........................मास के...................दिन हमने हस्ताक्षर किए ।

                                                                                                                                                                हस्ताक्षर क ख

                                                                                                                                                                हस्ताक्षर ग घ

द्वितीय अनुसूची

(धारा 12 देखिए)

वर द्वारा की जाने वाली घोषणा

मैं, क ख, एतद्द्वारा निम्नलिखित घोषणा करता हूं: -

1. मैं इस समय अविवाहित (या, यथास्थिति, विधुर या विच्छिन्न-विवाह) हूं ।

2. मैंने. . . . . . . . . . . .... वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है ।

3. मेरी. . . . . . . . . . . .... ग घ (वधू) से प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी नहीं है ।

4. मैं. . . . . . . . . . . . . . .का नागरिक हूं ।

5. मैं यह जानता हूं कि यदि इस घोषणा में कोई कथन मिथ्या हुआ तो मैं कारावास से और जुर्माने से भी     दण्डनीय होऊंगा ।                                                      

                                                                   हस्ताक्षर क ख (वर)

वधू द्वारा की जाने वाली घोषणा

मैं, ग घ, एतद्द्वारा निम्नलिखित घोषणा करती हूं: -

1. मैं इस समय अविवाहिता (या, यथास्थिति, विधवा या विच्छिन्न-विवाह) हूं ।

2. मैंने. . . . . . . . . . . .... वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है ।

3. मेरी. . . . . . . . . . . .... क ख (वर) से प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी नहीं है ।

4. मैं. . . . . . . . . . . . . . .की नागरिक हूं ।

5. मैं यह जानती हूं कि यदि इस घोषणा में कोई कथन मिथ्या हुता तो मैं कारावास से और जुर्माने से भी     दण्डनीय होऊंगी ।

हस्ताक्षर ग घ (वधू)

                उपरिनामित और द्वारा हमारी उपस्थिति में हस्ताक्षर किए गए । जहां तक हम जानते हैं इस विवाह में कोई विधिपूर्ण बाधा नहीं है ।

                हस्ताक्षर:                                    

                हस्ताक्षर:                      तीन साक्षी

                हस्ताक्षर:       

                                                                                                                                                 (प्रतिहस्ताक्षरित) ङ च

                                                                     विवाह अधिकारी

                तारीख 19. . . . . . . . . . . .. के. . . . . . . . . . . .. मास का. . . . . . . . . . . .दिन ।

 

 

तृतीय अनुसूची

(धारा 14 देखिए)

विवाह के प्रमाणपत्र का प्ररूप

                मैं, ङ च, एतद्द्वारा प्रमाणित करता हूं कि 19. . . . . . . . .... के. . . . . . . . . . . .. मास का. . . . . . . . . . . .दिन क ख. . . . . . .... और ग घ. . . . . . . . . . . ।मेरे समक्ष हाजिर हुए और विदेशीय विवाह अधिनियम, 1969 की धारा ह्व. . . . . . . . . . द्वारा अपेक्षित घोषणा सम्यक् रूप से की गई, तथा उनमें परस्पर विवाह उस अधिनियम के अधीन मेरी उपस्थिति में और उन तीन साक्षियों की उपस्थिति में, जिन्होंने इसके नीचे हस्ताक्षर किए हैं, अनुष्ठापित किया गया ।

हस्ताक्षर: ङ० च०

विवाह अधिकारी

हस्ताक्षर: क० ख० (वर)

हस्ताक्षर: ग० घ० (वधू)

हस्ताक्षर: छ० ज०

हस्ताक्षर: झ० ञ०                                               तीन साक्षी

हस्ताक्षर: ट० ठ०

तारीख 19. . . . . . . . . . . .के. . . . . . . . . . . .मास का. . . . . . . . . . . .दिन ।

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