उपराष्ट्रपति पेंशन अधिनियम, 1997
(1997 का अधिनियम संख्यांक 30)
[28 मई, 1997]
सेवानिवृत्त होने वाले उपराष्ट्रपतियों को पेंशन
और अन्य प्रसुविधाओं के संदाय का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के अड़तालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उपराष्ट्रपति पेंशन अधिनियम, 1997 है ।
2. सेवानिवृत्त होने वाले उपराष्ट्रपतियों को पेंशन-(1) प्रत्येक उस व्यक्ति को, जो अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने या अपना पद त्याग कर देने के कारण उपराष्ट्रपति के रूप में पद पर नहीं रह जाता है, उसके शेष जीवनकाल में [उपराष्ट्रपति के वेतन के पचास प्रतिशत की दर से] प्रतिमास पेंशन दी जाएगी :
परन्तु ऐसा व्यक्ति उस अवधि के दौरान, जब वह प्रधानमंत्री का पद, किसी मंत्री का पद या कोई अन्य पद धारण करता है या संसद् सदस्य हो जाता है और ऐसा वेतन और भत्ते प्राप्त करता है, जो भारत की संचित निधि या किसी राज्य की संचित निधि में से चुकाए जाते हैं, कोई पेंशन प्राप्त करने का हकदार नहीं होगा ।
[(1क) किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसकी,-
(क) उपराष्ट्रपति का पद धारण करने के दौरान ; या
(ख) उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने या अपने पद का त्याग कर देने के कारण पद पर न रह जाने के पश्चात्,
मृत्यु हो जाती है, पत्नी या पति को, उसके शेष जीवनकाल में उस पेंशन के, जो निवृत्त होने वाले उपराष्ट्रपति को अनुज्ञेय है, पचास प्रतिशत की दर से कुटुंब पेंशन संदत्त की जाएगी ।]
(2) ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाएं प्रत्येक ऐसा व्यक्ति अपने शेष जीवनकाल में,-
[(क) किराए के संदाय के बिना ऐसे सुसज्जित निवास का उपयोग करने का (जिसके अन्तर्गत उसका रखरखाव भी है), जैसा केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अवधारित करे ;]
(ख) अपने निवास पर वैसी ही टेलीफोन सुविधा का उपयोग करने का, जैसी संसद्-सदस्य, संसद् सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 (1954 का 30) के उपबंधों के अधीन हकदार है ;
1[(ग) सचिवीय कर्मचारिवृंद का, जिसमें एक निजी सचिव, एक अपर निजी सचिव, एक वैयक्तिक सहायक तथा दो चपरासी होंगे और कार्यालय व्यय जो साठ हजार रुपए प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होंगे ;]
(घ) चिकित्सीय परिचर्या और उपचार की बाबत स्वयं के लिए वैसी ही प्रसुविधाओं का और उन्हीं शर्तों पर, जिन पर सेवानिवृत्त राष्ट्रपति, राष्ट्रपति उपलब्धियां और पेंशन अधिनियम, 1951 (1951 का 30) के उपबंधों के अधीन हकदार है;
(ङ) चिकित्सीय परिचर्या और उपचार की बाबत अपने पति/अपनी पत्नी और अवयस्क बालकों के लिए उन्हीं प्रसुविधाओं का और उन्हीं शर्तों पर जिन पर सेवानिवृत्त राष्ट्रपति की पत्नी/उनके पति, राष्ट्रपति, उपलब्धियां और पेंशन अधिनियम, 1951 (1951 का 30) के उपबन्धों के अधीन हकदार है ; और
3[(च) भारत में कहीं भी, अपने पति/अपनी पत्नी या किसी साथी अथवा नातेदार के साथ वायुयान, रेल या स्टीमर द्वारा उच्चतम श्रेणी में यात्रा करने का, हकदार होगा ।]
[(3) जहां कोई ऐसा व्यक्ति उपराष्ट्रपति के पद के लिए पुनः निर्वाचित किया जाता है, वहां वह या उसका पति/उसकी पत्नी उस अवधि के लिए, जिसके दौरान ऐसा व्यक्ति ऐसा पद पुनः धारण करता है, इस धारा के अधीन किसी प्रसुविधा के लिए पात्र नहीं होगा ।
(4) जहां कोई ऐसा व्यक्ति, जो उपराष्ट्रपति है, भारत के राष्ट्रपति के पद के लिए निर्वाचित हो जाता है, वहां वह या उसका पति/उसकी पत्नी इस धारा के अधीन किसी प्रसुविधा के लिए पात्र नहीं होगा ।]
3. मृत उपराष्ट्रपति के कुटुम्ब को चिकित्सीय प्रसुविधाएं-ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति की, जो उपराष्ट्रपति का पद धारण किए हुए हैं, मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी या पति अपने शेष जीनवकाल में मुफ्त चिकित्सीय परिचर्या और उपचार का हकदार होगा ।
[3क. उपराष्ट्रपति की पत्नी या पति को निःशुल्क वास-सुविधा-ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसकी,-
(क) उपराष्ट्रपति का पद धारण करने के दौरान ; या
(ख) उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने या अपने पद का त्याग कर देने के कारण पद पर न रह जाने के पश्चात्,
मृत्यु हो जाती है, पत्नी या पति, अपने शेष जीवनकाल में अनुज्ञप्ति फीस का संदाय किए बिना [असुसज्जित निवास का (जिसके अंतर्गत उसका रखरखाव भी है)] उपयोग करने का हकदार होगा ।]
4. पेंशन का भारत की संचित निधि पर भारित होना-इस अधिनियम के अधीन संदेय कोई राशि भारत की संचित निधि पर भारित होगी ।
5. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
[6. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि उपराष्ट्रपति पेंशन (संशोधन) अधिनियम, 2008 द्वारा यथा संशोधित इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, ऐसी कठिनाई को दूर करने के प्रयोजनों के लिए कोई बात कर सकेगी जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो:
परंतु ऐसा कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रवृत्त होने की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।]
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