विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956
(1956 का अधिनियम संख्यांक 3)
[3 मार्च, 1956]
विश्वविद्यालयों में एकसूत्रता लाने और स्तरमानों का निर्धारण करने के
लिए और उस प्रयोजनार्थ एक विश्वविद्यालय अनुदान
आयोग की स्थापना के लिए उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “आयोग" से धारा 4 के अधीन स्थापित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अभिप्रेत है ;
(ख) “कार्यपालक प्राधिकारी" से किसी विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय का वह मुख्य कार्यपालक प्राधिकारी अभिप्रेत है (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) जिसमें विश्वविद्यालय का सामान्य प्रशासन निहित है ;
(ग) “निधि" से धारा 16 के अधीन गठित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की निधि अभिप्रेत है ;
(घ) “सदस्य" से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष [और उपाध्यक्ष भी] हैं ;
(ङ) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(च) “विश्वविद्यालय" से किसी केन्द्रीय अधिनियम, प्रान्तीय अधिनियम या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित या निगमित विश्वविद्यालय अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत कोई ऐसी संस्था भी है जो, संबद्ध विश्वविद्यालय के परामर्श से, इस अधिनियम के अधीन इस निमित्त बनाए गए विनियमों के अनुसार आयोग से मान्यता प्राप्त है ।
3. अधिनियम का विश्वविद्यालयों से भिन्न उच्च अध्ययन की संस्थाओं को लागू होना-केन्द्रीय सरकार, आयोग की सलाह पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि विश्वविद्यालय से भिन्न उच्च अध्ययन की कोई संस्था, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विश्वविद्यालय समझी जाएगी, और ऐसी घोषणा किए जाने पर, इस अधिनियम के सभी उपबन्ध ऐसी संस्था को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह धारा 2 के खण्ड (च) के अर्थ में विश्वविद्यालय है ।
अध्याय 2
आयोग की स्थापना
4. आयोग की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से जो कन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नाम से एक आयोग स्थापित किया जाएगा ।
(2) उक्त आयोग शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
[5. आयोग की संरचना-(1) आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा,-
(i) एक अध्यक्ष ;
(ii) एक उपाध्यक्ष ; और
(iii) दस अन्य सदस्य,
जो कन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जांएगे ।
(2) अध्यक्ष उन व्यक्तियों में से चुना जाएगा जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधिकारी नहीं हैं ।
(3) उपधारा (1) के खंड (iii) में निर्दिष्ट अन्य सदस्यों में से,-
(क) दो सदस्य केन्द्रीय सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए उस सरकार के अधिकारियों में से चुने जाएंगे ;
(ख) कम से कम चार सदस्य उन व्यक्तियों में से चुने जाएंगे जो इस प्रकार चुने जाने के समय विश्वविद्यालयों के शिक्षक हैं ; और
(ग) शेष सदस्य उन व्यक्तियों में से चुने जाएंगे-
(i) जिन्हें कृषि, वाणिज्य, वन-विज्ञान या उद्योग का ज्ञान या अनुभव हो ;
(ii) जो इंजीनियरी, विधि, चिकित्सा या अन्य विद्वत्वृत्ति के व्यक्ति हों ; या
(iii) जो विश्वविद्यालयों के कुलपति हों या, विश्वविद्यालयों के शिक्षक न होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार की राय में जो ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद् हों या जिन्होंने उच्च शैक्षणिक विशिष्टताएं प्राप्त की हों :
परन्तु इस खंड के अधीन चुने हुए व्यक्तियों में से कम से कम आधे उन व्यक्तियों में से होंगे जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधिकारी नहीं हैं ।
(4) उपाध्यक्ष, अध्यक्ष की उन शक्तियों का प्रयोग करेगा तथा उसके उन कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो विहित किए जाएं ।
(5) इस धारा के अधीन प्रत्येक नियुक्ति उस तारीख से प्रभावी होगी जिसको वह केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित की जाए ।]
6. सदस्यों की सेवा की शर्तें और निबन्धन- [(1) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (संशोधन) अधिनियम, 1985 के प्रारम्भ के पश्चात् अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियुक्त व्यक्ति, जब तक वह इस अधिनियम के अधीन बनाए जाने वाले नियमों के अधीन उस रूप में बने रहने के लिए पहले ही निरर्हित नहीं हो जाता है,-
(क) अध्यक्ष की दशा में, पांच वर्ष की अवधि तक, या पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा ;
(ख) उपाध्यक्ष की दशा में, तीन वर्ष की अवधि तक, या पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा ;
(ग) किसी अन्य सदस्य की दशा में, तीन वर्ष की अवधि तक अपना पद धारण करेगा :
परन्तु-
(i) कोई व्यक्ति, जिसने अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में पद धारण किया है, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में पुनःनियुक्ति का पात्र होगा ; और
(ii) कोई व्यक्ति, जिसने किसी अन्य सदस्य के रूप में पद धारण किया है, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में पुनःनियुक्ति का पात्र होगा :
परन्तु यह और कि कोई व्यक्ति, जिसने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य की (जिसके अन्तर्गत धारा 5 की उपाधारा (3) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट सदस्य नहीं है) हैसियत में दो अवधियों तक पद धारण किया है, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में किसी पुनःनियुक्ति का पात्र नहीं होगा ।]
(2) कोई भी सदस्य केन्द्रीय सरकार को सम्बोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है, किन्तु वह तब तक पद पर बना रहेगा जब तक केन्द्रीय सरकार उसका त्यागपत्र स्वीकार नहीं कर लेती है ।
[(3) यदि अध्यक्ष के पद में, उसकी मृत्यु हो जाने के, पद त्याग कर देने के अथवा बीमारी या अन्य असमर्थता की वजह से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो जाने के कारण आकस्मिक रिक्ति हो जाती है तो उस रूप में तत्समय पद धारण करने वाला उपाध्यक्ष, धारा 5 की उपधारा धारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा और यदि इसके पूर्व कोई अन्य व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में नियुक्त नहीं कर दिया जाता है तो वह अध्यक्ष का पद उस व्यक्ति की, जिसके स्थान पर उसे इस प्रकार कार्य करना है, पदावधि के शेष भाग के लिए धारण करेगा :
परन्तु जहां कोई उपाध्यक्ष उस समय पद धारण नहीं कर रहा है जब अध्यक्ष के पद में रिक्ति होती है वहां केन्द्रीय सरकार, धारा 5 की उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, किसी अन्य सदस्य को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त करेगी और इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति अध्यक्ष का पद छह मास से अधिक अवधि के लिए धारण नहीं करेगा ।
(4) यदि उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के पद में, उसकी मृत्यु हो जाने के, पद त्याग कर देने के अथवा बीमारी या अन्य असमर्थता की वजह से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो जाने के कारण आकस्मिक रिक्ति हो जाती है तो वह रिक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा नई नियुक्ति करके भरी जाएगी और इस प्रकार नियुक्त सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा ।
(5) अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद पूर्णकालिक और वैतनिक होगा और, इसके अधीन रहते हुए, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा की शर्तें और निबन्धन वे होंगे जो विहित किए जाएं ।]
7. आयोग की बैंठकें-आयोग ऐसे समयों और स्थानों पर बैठक करेगा और अपनी बैठकों में कार्य संचालन के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगा जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
8. सदस्यों में रिक्तियों के या गठन में त्रुटि के कारण आयोग के कार्यों या कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-आयोग का कोई कार्य या कार्यवाही आयोग में किसी रिक्ति के या उसके गठन में किसी त्रुटि के कारण ही अविधिमान्य नहीं समझी जाएगी ।
9. विशिष्ट प्रयोजनों के लिए आयोग के साथ व्यक्तियों का अस्थायी रूप से सहयुक्त किया जाना-(1) आयोग, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, किसी व्यक्ति को जिसकी सहायता या सलाह इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए वह चाहता है, अपने साथ सहयुक्त कर सकता है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए आयोग द्वारा अपने साथ सहयुक्त व्यक्ति को उस प्रयोजन से सुसंगत चर्चा में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे आयोग की किसी बैठक में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा ।
10. आयोग के कर्मचारिवृन्द-ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, आयोग एक सचिव और ऐसे अन्य कर्मचारी नियुक्त कर सकता है जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्ष पालन के लिए आवश्यक समझे और कर्मचारियों की सेवा की शर्तें और निबन्धन वे होंगे जो आयोग द्वारा अवधारित किए जाएं ।
11. आयोग के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणित किया जाना-आयोग के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष के या आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य सदस्यों के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे और आयोग द्वारा जारी की गई अन्य सभी लिखतें सचिव के या आयोग द्वारा इस निमित्त वैसी ही रीति से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।
अध्याय 3
आयोग की शक्तियां और कृत्य
12. आयोग के कृत्य-आयोग का सामान्य कर्तव्य, संबद्ध विश्वविद्यालयों या अन्य निकायों के परामर्श से, ऐसी सभी कार्यवाहियां करना होगा जो विश्वविद्यालय शिक्षा की अभिवृद्धि और उसमें एकसूत्रता लाने के लिए और विश्वविद्यालयों में अध्यापन, परीक्षा और अनुसंधान के स्तरमानों का निर्धारण करने और उन्हें बनाए रखने के लिए वह ठीक समझे, और इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन के प्रयोजन के लिए, आयोग,-
(क) विश्वविद्यालयों की वित्तीय आवश्यकताओं की जांच कर सकता है ;
(ख) किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित या निगमित विश्वविद्यालयों को आयोग की निधि में से ऐसे विश्वविद्यालयों के चलाने और उनके विकास के लिए या किसी अन्य साधारण या विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए अनुदान आबंटित और संवितरित कर सकता है ;
(ग) अन्य विश्वविद्यालयों को आयोग की निधि में से ऐसे अनुदान आबंटित और संवितरित कर सकता है जो वह [ऐसे विश्वविद्यालयों के विकास के लिए अथवा ऐसे विश्वविद्यालयों के किन्हीं विनिर्दिष्ट क्रियाकलापों के चलाने या उनके विकास के लिए या दोनों के लिएट अथवा किसी अन्य साधारण या विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए आवश्यक या समुचित समझे :
परन्तु ऐसे किसी विश्वविद्यालय को कोई अनुदान देते समय, आयोग संबद्ध विश्वविद्यालय के विकास पर, उसकी वित्तीय आवश्यकताओं पर, उसके द्वारा प्राप्त स्तरमान पर और उन राष्ट्रीय उद्देश्यों पर जिनकी वह पूर्ति कर सकता है, सम्यक् रूप से विचार करेगा ;
[(गग) आयोग धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा की गई घोषणा के अनुसरण में विश्वविद्यालय समझी जाने वाली संस्थाओं को निधि में से ऐसे अनुदान आबंटित और वितरित कर सकता है जो वह निम्नलिखित प्रयोजनों में से किसी एक या अधिक के लिए आवश्यक समझे, अर्थात् :-
(i) विशेष दशाओं में चलाने के लिए ;
(ii) विकास के लिए ;
(iii) किसी अन्य साधारण या विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए ;]
[(गगग) विश्वविद्यालयों के किसी समूह के लिए या साधारणतया विश्वविद्यालयों के लिए सामान्य सुविधाओं, सेवाओं और कार्यक्रमों की व्यवस्था करने के लिए, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार, संस्थाओं की स्थापना कर सकता है और आयोग की निधि में से ऐसे अनुदान आबंटित और संवितरित करके, जो आयोग आवश्यक समझे, ऐसी संस्थाओं को चला सकता है या उनके चलाए जाने की व्यवस्था कर सकता है ;]
(घ) किसी विश्वविद्यालय को, विश्वविद्यालय शिक्षा के सुधार के लिए आवश्यक उपायों की सिफारिश कर सकता है और ऐसी सिफारिशों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए की जाने वाली कार्रवाई पर विश्वविद्यालय को सलाह दे सकता है ;
(ङ) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार को, यथास्थिति, भारत की संचित निधि या राज्य की संचित निधि में से किसी साधारण या विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए विश्वविद्यालयों को किन्हीं अनुदानों के आबंटन पर सलाह दे सकता है ;
(च) किसी प्राधिकारी को, यदि सलाह मांगी जाए तो, किसी नए विश्वविद्यालय की स्थापना पर या किसी विश्वविद्यालय के क्रियाकलापों के विस्तार से सम्बन्धित प्रस्थापनाओं पर ऐसी सलाह दे सकता है ;
(छ) केन्द्रीय सरकार को या किसी राज्य सरकार को या विश्वविद्यालय को किसी ऐसे प्रश्न पर सलाह दे सकता है जो, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या विश्वविद्यालय द्वारा आयोग को निर्देशित किया जाए ;
(ज) भारत में और अन्य देशों में विश्वविद्यालय शिक्षा से सम्बन्धित ऐसे सभी मामलों पर ऐसी जानकारी एकत्र कर सकता है जो वह ठीक समझे और उसे किसी विश्वविद्यालय को उपलब्ध करा सकता है ;
(झ) किसी विश्वविद्यालय से अपेक्षा कर सकता है कि वह उसे विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति या उस विश्वविद्यालय में प्रारम्भ की जाने वाली विद्या की विभिन्न शाखाओं में अध्ययन से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी, ऐसी विद्या की शाखाओं में से प्रत्येक की बाबत उस विश्वविद्यालय में अध्यापन और परीक्षा के स्तरमानों से सम्बन्धित सभी नियमों और विनियमों सहित दे ;
(ञ) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन कर सकता है जो विहित किए जाएं या जो आयोग द्वारा भारत में उच्च शिक्षा के उद्देश्य की अभिवृद्धि के लिए आवश्यक समझे जाएं या जो उक्त कृत्यों के निर्वहन के अनुषंगी हों या उसमें साधक हों ।
[12क. फीसों का विनियमन और कुछ दशाओं में संदान का प्रतिषेध-(1) इस धारा में,-
(क) उसके व्याकरणिक रूपभेदों सहित, सहबद्ध करना" के अन्तर्गत, किसी महाविद्यालय के सम्बन्ध में, किसी विश्वविद्यालय के साथ ऐसे महाविद्यालय के सहयोजन द्वारा ऐसे महाविद्यालय को मान्यता देना और ऐसे महाविद्यालय को विश्वद्यालयजन्य विशेषाधिकार देना है;
(ख) महाविद्यालय" से कोई ऐसी संस्था, चाहे वह उस नाम से या किसी अन्य नाम से ज्ञात हो, अभिप्रेत है जो किसी विश्वविद्यालय से कोई अर्हता प्राप्त करने के लिए किसी पाठ्यक्रम की व्यवस्था करती है और जिसे ऐसे पाठ्यक्रम की व्यवस्था करने के लिए, ऐसे विश्वविद्यालय के नियमों और विनियमों के अनुसार, सक्षम माना गया है और जो ऐसे पाठ्यक्रम का अध्ययन करने वाले छात्रों को ऐसी अर्हता के लिए जाने के दिए परीक्षा में बिठाती है ;
(ग) किसी पाठ्यक्रम के संबंध में, “अध्ययन करना" के अन्तर्गत पाठ्यक्रम के एक भाग या प्रक्रम से पाठ्यक्रम के किसी अन्य भाग या प्रक्रम के लिए प्रोन्नति है ;
(घ) “अर्हता" से किसी विश्वविद्यालय द्वारा दी गई उपाधि या कोई अन्य अर्हता अभिप्रेत है ;
(ङ) “विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ;
(च) “विनिर्दिष्ट पाठ्यक्रम" से ऐसा पाठ्यक्रम अभिप्रेत है जिसकी बाबत उपधारा (2) में वर्णित प्रकृति के विनियम बनाए गए हैं ;
(छ) “छात्र" के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति है जो छात्र के रूप में प्रवेश लेना चाहता है ;
(ज) “विश्वविद्यालय" से ऐसा विश्वविद्यालय या संस्था अभिप्रेत है जो धारा 22 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट है ।
(2) धारा 12 के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि-
(क) किसी विश्वविद्यालय से कोई अर्हता प्राप्त करने के लिए किसी पाठ्यक्रम की प्रकृति को ;
(ख) उस प्रकार के क्रियाकलापों को, जिन्हें ऐसी अर्हता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के ऐसी अर्हता के आधार पर लागाए जाने की संभावना है ;
(ग) ऐसे न्यूनतम स्तरमानों को, जिन्हें ऐसी अर्हता रखने वाला व्यक्ति ऐसे क्रियाकलापों से संबंधित अपने काम में बनाए रखने में समर्थ हो और जहां तक हो सके, यह सुनिश्चित करने की पारिणामिक आवश्यकता को कि कोई अभ्यर्थी आर्थिक शक्ति के कारण ऐसे पाठ्यक्रम में प्रवेश प्राप्त न कर ले और ऐसा कर के किसी अधिन प्रतिभाशाली अभ्यर्थी को ऐसे पाठ्यक्रम में प्रवेश प्राप्त करने से निवारित न कर दे ; और
(घ) अन्य सभी सुसंगत बातों को,
ध्यान में रखते हुए, आयोग का यह समाधान हो जाता है कि लोक हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह संबंधित विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालयों से परामर्श करने के पश्चात्, विनियमों द्वारा, वे विषय जिनकी बाबत फीसें भारित की जा सकती हैं और फीसों का वह मापमान विनिर्दिष्ट कर सकेगा जिसके अनुसार उन विषयों की बाबत ऐसी तारीख से ही जो विनियमों में इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए, ऐसे पाठ्यक्रम की व्यवस्था करने वाले किसी महाविद्यालय द्वारा किसी छात्र से, या उसके ऐसे पाठ्यक्रम में प्रवेश या उसके संबंध में; उसके अनुसार अध्ययन करने के संबंध में फीसें भारित की जाएंगी :
परन्तु भिन्न-भन्न विश्वविद्यालयों या भिन्न-भन्न प्रवर्ग के महाविद्यालय या भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के संबंध में भिन्न-भिन्न विषय और फीसों के भिन्न-भिन्न मापमान इस प्रकार विनिर्दिष्ट किए जा सकेंगे ।
(3) जहां किसी पाठ्यक्रम के संबंध में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रकृति के विनियम बनाए गए हैं वहां ऐसे पाठ्यक्रम की व्यवस्था करने वाला कोई भी महाविद्यालय, किसी छात्र से या उसके संबंध में, उसके ऐसे पाठ्यक्रम में प्रवेश या उसके अनुसार अध्ययन करने के संबंध में,-
(क) ऐसे विनियमों में विनिर्दिष्ट विषय से भिन्न किसी विषय की बाबत फीस उद्गृहीत या भारित नहीं करेगा ;
(ख) ऐसे विनियमों में विनिर्दिष्ट फीसों के मापमान से अधिक कोई फीस उद्गृहीत या भारित नहीं करेगा ; या
(ग) (फीस से भिन्न) कोई संदाय अथवा कोई संदान या दान (नकद या वस्तु रूप में) प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः स्वीकार नहीं करेगा ।
(4) यदि किसी विनिर्दिष्ट पाठ्यक्रम की व्यवस्था करने वाले किसी महाविद्यालय के संबंध में, विनियमों द्वारा उपबंधित रीति से जांच करने के पश्चात् और ऐसे महाविद्यालय को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिए जाने के पश्चात्, आयोग का यह समाधान हो जाता है कि ऐसे महाविद्यालय ने उपधारा (3) के उपबंधों का उल्लंघन किया है तो आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जिससे ऐसे महाविद्यालय को, किन्हीं ऐसे छात्रों को, जो उस समय उस महाविद्यालय में ऐसे पाठ्यक्रम कर रहे हैं, संबंधित अर्हता के दिए जाने के लिए किसी विश्वविद्यालय की परीक्षा में बिठाने से प्रतिषिद्ध किया जाए ।
(5) आयोग उपधारा (4) के अधीन अपने द्वारा किए गए आदेश की एक प्रति संबंधित विश्वविद्यालय को भेजेगा और ऐसे विश्वविद्यालय द्वारा ऐसे आदेश की प्रति की प्राप्ति की तारीख से ही, ऐसे महाविद्यालय का ऐसे विश्वविद्यालय से सहबद्ध किया जाना, जहां तक कि ऐसे आदेश से विनिर्दिष्ट पाठ्यक्रम का संबंध है, समाप्त हो जाएगा, और ऐसी सहबद्धता की समाप्ति की तारीख से ही और उसके पश्चात् तीन वर्ष की अवधि तक ऐसे महाविद्यालय को, उस विश्वविद्यालय या किसी अन्य विश्वविद्यालय द्वारा ऐसे ही या समरूप पाठ्यक्रम के संबंध में सहबद्ध नहीं किया जाएगा ।
(6) उपधारा (5) के अधीन किसी महाविद्यालय से सहबद्धता की समाप्ति पर, आयोग संबंधित छात्रों के हितों की रक्षा करने के लिए ऐसे सभी कदम उठाएगा जो वह उपयुक्त समझे ।
(7) इस धारा के उपबंध और इस धारा के प्रयोजनों के लिए बनाए गए विनियम, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।]
[ [12ख.] ऐसे विश्वविद्यालय को अनुदान दिए जाने के बारे में प्रतिषेध जिसे आयोग ने ऐसा अनुदान प्राप्त करने के लिए उपयुक्त घोषित नहीं किया-केन्द्रीय सरकार, आयोग या केन्द्रीय सरकार से निधि प्राप्त करने वाले किसी अन्य संगठन द्वारा कोई अनुदान ऐसे विश्वविद्यालय को, जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (संशोधन) अधिनियम, 1972 (1972 का 33) के प्रारम्भ के पश्चात् स्थापित किया जाता है, तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि आयोग ने, उन विषयों के बारे में अपना समाधान करने के पश्चात् जो विहित किए जाएं, उस विश्वविद्यालय को ऐसा अनुदान प्राप्त करने के लिए उपयुक्त घोषित न कर दिया हो ।]
13. निरीक्षण-(1) आयोग, किसी विश्वविद्यालय की वित्तीय आवश्यकताओं को या उसके अध्यापन, परीक्षा और अनुसंधान के स्तरमानों को अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए उस विश्वविद्यालय से परामर्श के पश्चात्, उसके किसी विभाग या विभागों का ऐसी रीति से जो विहित की जाए और ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा जो वह निर्दिष्ट करे, निरीक्षण करा सकता है ।
(2) आयोग विश्वविद्यालय को वह तारीख संसूचित करेगा जिसको उपधारा (1) के अधीन कोई निरीक्षण किया जाना है और विश्वविद्यालय, निरीक्षण से ऐसी रीति से सहयुक्त किए जाने का हकदार होगा जो विहित की जाए ।
(3) आयोग, विश्वविद्यालय को ऐसे किसी निरीक्षण के परिणामों के बारे में अपने विचार संसूचित करेगा, और विश्वविद्यालय की राय जानने के पश्चात्, विश्वविद्यालय को ऐसे निरीक्षण के परिणामस्वरूप की जाने वाली कार्रवाई के लिए सिफारिश करेगा ।
(4) इस धारा के अधीन किसी विश्वविद्यालय को दी जाने वाली सभी संसूचनाएं उस विश्वविद्यालय के कार्यपालक प्राधिकारी को भेजी जाएंगी और उस विश्वविद्यालय का कार्यपालक प्राधिकारी आयोग को उस कार्रवाई की, यदि कोई हो, रिपोर्ट देगा जिसकी उपधारा (3) में यथानिर्दिष्ट किसी सिफारिश को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए की जाने की प्रस्थापना है ।
14. आयोग की सिफारिशों का अनुपालन करने में विश्वविद्यालयों के असफल रहने के परिणाम-यदि कोई विश्वविद्यालय [धारा 12क की उपधारा (5) में निर्दिष्ट किसी महाविद्यालय को, उस उपधारा के उपबंधों के उल्लंघन में, किसी पाठ्यक्रम की बाबत सहबद्धता प्रदान करेगा अथवा] धारा 12 या धारा 13 के अधीन आयोग द्वारा की गई किसी सिफारिश का उचित समय के अन्दर अनुपालन करने में असफल रहेगा [अथवा धारा 24 की उपधारा (2) के खण्ड (च) या खण्ड (छ) के अधीन बनाए गए किसी नियम के या धारा 26 के खण्ड (ङ) या खण्ड (च) या खण्ड (छ) के अधीन बनाए गए किसी विनियम के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा] तो आयोग, विश्वविद्यालय द्वारा [ऐसी असफलता या उल्लंघन के लिए] दर्शित किए गए हेतुक पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात् आयोग की निधि में से किए जाने के लिए प्रस्थापित अनुदान को उस विश्वविद्यालय को देने से विधारित कर सकेगा ।
15. आयोग को संदाय-केन्द्रीय सरकार, इस निमित्त संसद् द्वारा विधि द्वारा सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात्, आयोग को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशियों का संदाय कर सकती है जो इस अधिनियम के अधीन आयोग के कृत्यों के पालन के लिए आवश्यक समझी जाएं ।
16. आयोग की निधि-(1) आयोग की अपनी निधि होगी ; तथा वे सभी धनराशियां जो समय-समय पर उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा संदत्त की जाएं और आयोग की सभी प्राप्तियां (जिनके अन्तर्गत ऐसी धनराशि भी है जिसे कोई राज्य सरकार या कोई अन्य प्राधिकारी या व्यक्ति आयोग को दे) निधि में जमा की जाएंगी और आयोग द्वारा सभी संदाय उसमें से किए जाएंगे ।
(2) निधि के सभी धन ऐसे बैंकों में जमा किए जाएंगे या ऐसी रीति में विनिहित किए जाएंगे जो, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन रहते हुए, आयोग द्वारा विनिश्चित की जाए ।
(3) आयोग इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन के लिए ऐसी धनराशियां व्यय कर सकता है जो वह ठीक समझे, और ऐसी धनराशियां आयोग की निधि में से संदेय व्यय समझी जाएंगी ।
17. बजट-आयोग प्रत्येक वर्ष ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित करते हुए एक बजट तैयार करेगा और उसके प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी ।
18. वार्षिक रिपोर्ट-आयोग हर वर्ष एक बार ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाए, पूर्ववर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का सही और पू्र्ण वृत्तान्त देते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा ; और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी और वह सरकार उसे संसद् के दोनों के समक्ष रखवाएगी ।
19. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) आयोग अपने लेखाओं के सम्बन्ध में ऐसी लेखा बहियां और अन्य बहियां ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से रखवाएगा जो, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित की जाएं ।
(2) आयोग, अपने वार्षिक लेखे बन्द करने के पश्चात् याथाशीघ्र, ऐसे प्ररूप में एक लेखा-विवरण तैयार करेगा, और उसे ऐसी तारीख तक नियन्त्रक-महालेखापरीक्षक को भेजेगा जो केन्द्रीय सरकार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से, अवधारित करे ।
(3) आयोग के लेखाओं की लेखा परीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे समयों पर और ऐसी रीति से की जाएगी जो वह ठीक समझे ।
(4) आयोग के वार्षिक लेखे उन पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट सहित केन्द्रीय सरकार को भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी और लेखापरीक्षा रिपोर्ट की एक प्रति आयोग को उस लेखापरीक्षा रिपोर्ट से उत्पन्न होने वाले विषयों पर उपयुक्त कार्रवाई के लिए भी भेजेगी ।
अध्याय 4
प्रकीर्ण
20. केन्द्रीय सरकार द्वारा निदेश-(1) आयोग इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में राष्ट्रीय उद्देश्यों से सम्बन्धित नीति सम्बन्धी प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से मार्गदर्शन प्राप्त करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे दिए जाएं ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार और आयोग के बीच यह विवाद उठता है कि कोई प्रश्न राष्ट्रीय उद्देश्यों से सम्बन्धित नीति का है या नहीं तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
21. विवरणियां और सूचना-आयोग, केन्द्रीय सरकार को अपनी सम्पत्ति या क्रियाकलापों के बारे में ऐसी विवरणियां या अन्य सूचनाएं देगा जिनकी केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, अपेक्षा करे ।
22. उपाधियां प्रदान करने का अधिकार-(1) उपाधियां प्रदान करने या देने के अधिकार का प्रयोग किसी केन्द्रीय अधिनियम, प्रान्तीय अधिनियम या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित या निगमित किसी विश्वविद्यालय द्वारा या धारा 3 के अधीन विश्वविद्यालय समझी जाने वाली किसी संस्था द्वारा या संसद् के किसी अधिनियम द्वारा उपाधियां प्रदान करने या देने के लिए विशेषतः सशक्त किसी संस्था द्वारा ही किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, कोई व्यक्ति या प्राधिकारी कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा या नहीं देगा अथवा उसे प्रदान करने या देने के हकदार के रूप में अपना व्यपदेशन नहीं करेगा ।
(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए उपाधि" से कोई ऐसी उपाधि अभिप्रेत है जो, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, आयोग द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए ।
23. कुछ दशाओं में विश्वविद्यालय" शब्द के प्रयोग का प्रतिषेध-केन्द्रीय अधिनियम, प्रांतीय अधिनियम या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित या निगमित किसी विश्वविद्यालय से भिन्न कोई संस्था, चाहे वह निगमित निकाय हो या नहीं अपने नाम के साथ किसी भी रीति से “विश्वविद्यालय" शब्द सहयुक्त करने की हकदार नहीं होगी :
परन्तु इस धारा की कोई बात इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की अवधि के लिए ऐसी किसी संस्था को लागू नहीं होगी जिसके नाम के साथ विश्वविद्यालय" शब्द, ऐसे प्रारम्भ के ठीक पहले, सहयुक्त था ।
24. शास्तियां-जो कोई धारा 22 या धारा 23 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा, वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और यदि उल्लंघन करने वाला व्यक्ति कोई संगम है या व्यष्टियों का अन्य निकाय है तो, ऐसे संगम या अन्य निकाय का प्रत्येक ऐसा सदस्य जो जानते हुए या जानबूझकर ऐसे उल्लंघन को प्राधिकृत करेगा या अनुज्ञात करेगा, जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
25. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकती है ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकते हैं, अर्थात् :-
(क) धारा 6 के अधीन आने वाले सदस्यों की सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया ;
(ख) आयोग के सदस्य के रूप में बने रहने के लिए निरर्हताएं ;
(ग) आयोग के सदस्यों की सेवा की शर्तें और निबन्धन ;
(घ) आयोग द्वारा नियुक्त कर्मचारियों की सेवा की शर्तें और निबन्धन ;
(ङ) वे अतिरिक्त कृत्य जिनका धारा 12 के खण्ड (ञ) के अधीन आयोग द्वारा पालन किया जा सकता है ;
(च) वे विवरणियां और सूचनाएं जो विश्वविद्यालय द्वारा अपनी वित्तीय स्थिति की बाबत या उनमें बनाए रखे जाने वाले अध्यापन और परीक्षा के स्तरमानों की बाबत दी जानी हैं ;
(छ) विश्वविद्यालय का निरीक्षण ;
(ज) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे आयोग द्वारा बजट और रिपोर्टें तैयार की जानी हैं;
(झ) वह रीति जिससे आयोग के लेखे रखे जाने हैं ;
(ञ) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे आयोग द्वारा केन्द्रीय सरकार को विवरणियां और अन्य सूचनाएं दी जानी हैं ;
(ट) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
[(3) इस धारा द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत नियमों को या उनमें से किसी को ऐसी तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से पूर्वतर तारीख नहीं है, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति होगी किन्तु किसी नियम को इस प्रकार कोई भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा कि उससे किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसको ऐसा नियम लागू होता है, हितों पर प्रतिकूल प्रतिकूल पड़े ।]
26. विनियम बनाने की शक्ति-(1) आयोग, निम्नलिखित बातों के लिए, इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों से संगत [विनियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकता है], अर्थात् :-
(क) आयोग की बैठकों को और बैठकों में कार्य संचालन की प्रक्रिया को विनिमित करना ;
(ख) उस रीति को जिससे और उन प्रयोजनों को जिनके लिए धारा 9 के अधीन आयोग के साथ व्यक्ति सहयुक्त किए जा सकते हैं, विनियमित करना ;
(ग) आयोग द्वारा नियुक्त कर्मचारियों की सेवा की शर्तें और निबन्धन विनिर्दिष्ट करना ;
(घ) उन संस्थाओं या संस्थाओं के वर्गों को विनिर्दिष्ट करना जिनको धारा 2 के खण्ड (च) के अधीन आयोग द्वारा मान्यता दी जा सकती है ;
(ङ) उन अर्हताओं को परिनिश्चित करना जो विश्वविद्यालय के अध्यापन कर्मचारिवृन्द में नियुक्त किए जाने वाले किसी व्यक्ति से, विद्या की उस शाखा को ध्यान में रखते हुए जिसमें उस व्यक्ति द्वारा शिक्षण दिया जाना प्रत्याशित है, सामान्यतया अपेक्षित है ;
(च) किसी विश्वविद्यालय द्वारा किसी उपाधि के दिए जाने के लिए शिक्षण के न्यूनतम स्तरमानों को परिनिश्चित करना ;
(छ) विश्वविद्यालय में स्तरमानों के बनाए रखने को और काम या सुविधाओं की एकसूत्रता को विनियमित करना ;
[(ज) धारा 12 के खण्ड (गगग) में निर्दिष्ट संस्थाओं की स्थापना को और ऐसी संस्थाओं से संबंधित अन्य विषयों को विनियमित करना ;
(झ) वे विषय विनिर्दिष्ट करना, जिनकी बाबत फीसें भारित की जा सकती हैं और फीसों के ऐसे मापमान विनिर्दिष्ट करना, जिनके अनुसार किसी महाविद्यालय द्वारा धारा 12क की उपधारा (2) के अधीन फीसें भारित की जा सकती हैं ;
(ञ) वह रीति विनिर्दिष्ट करना जिससे धारा 12क की उपधारा (4) के अधीन जांच कराई जा सकती है ।]
(2) उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (ख) या खण्ड (ग) या खण्ड (घ) 3[या खंड (ज) या खंड (झ) या खंड (ञ)ट के अधीन कोई विनियम केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के बिना नहीं बनाया जाएगा ।
3[(3) इस धारा [उपधारा (1) के खण्ड (झ) और खण्ड (ञ) को छोड़करट प्रदत्त विनियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत विनियमों को या उनमें से किसी को ऐसी तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से पूर्वतर तारीख नहीं है, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति होगी किन्तु किसी विनियम को इस प्रकार भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा कि उससे किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसको ऐसा विनियम लागू होता है, हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।]
[27. प्रत्यायोजन की शक्ति-(1) आयोग, इस अधिनियम के [अधीन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बनाए गए विनियमों द्वारा,] अपने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अपने अधिकारियों में से किसी अधिकारी को, आयोग द्वारा या उसमें किए जाने वाले काम के साधारण अधीक्षण और निदेशन की अपनी शक्ति, जिसके अन्तर्गत आयोग के कार्यालय को चलाने और आन्तरिक प्रशासन के सम्बन्ध में उपगत व्यय के बारे में शक्तियां भी हैं, प्रत्यायोजित कर सकता है ।
(2) उस धारा के अधीन कोई विनियम केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के बिना नहीं बनाया जाएगा ।]
[28. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
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