सेना अधिनियम, 1950
(1950 का अधिनियम संख्यांक 46)
[20 मई, 1950]
नियमित सेना के शासन से सम्बन्धित विधि का समेकन
और संशोधन करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम सेना अधिनियम, 1950 कहा जा सकेगा ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे ।
2. इस अधिनियम के अध्यधीन व्यक्ति-(1) निम्नलिखित व्यक्ति, अर्थात् :-
(क) नियमित सेना के आफिसर, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर और वारण्ट आफिसर,
(ख) इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित किए गए व्यक्ति, (ग) भारतीय रिजर्व बल के व्यक्ति,
(घ) भारतीय अनूपूरक रिजर्व बल के व्यक्ति, जब वे सेवा के लिए आहूत किए गए हों या जब वे वार्षिक परीक्षण में लगे हुए हों,
(ङ) प्रादेशिक सेना के आफिसर, जब वे ऐसे आफिसरों की हैसियत में कर्तव्य कर रहें हो और उक्त सेना में अभ्यावेशित व्यक्ति जब वे आहूत किए गए हों या निकायकृत हों या किन्हीं नियमित बलों से संलग्न हों, ऐसे अनुकूलनों और उपान्तरों के अध्यधीन जो ऐसे व्यक्तियों पर इस अधिनियम को प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948 (1948 का 56) की धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन लागू करने में किए जाएं,
(च) भारत में के सेना-आफिसर-रिजर्व में आयोग धारण करने वाले व्यक्ति, जब उन्हें किसी ऐसे कर्तव्य या ऐसी सेवा के लिए आदेश मिला हो जिसका उन पर दायित्व ऐसे रिजर्व बलों के सदस्य होने के नाते है,
(छ) भारतीय नियमित आफिसर-रिजर्व में नियुक्त आफिसर, जब उन्हें किसी ऐसे कर्तव्य या ऐसी सेवा के लिए आदेश मिला हो जिसका उन पर दायित्व ऐसे रिजर्व बलों के सदस्य होने के नाते है,
। । । ।
(झ) सैनिक विधि के अध्यधीन अन्यथा न आने वाले व्यक्ति जो सक्रिया सेवा पर, कैम्प में, प्रगमन पर या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किसी सीमान्त चौकी पर, नियमित सेना के किसी प्रभाग द्वारा नियोजित हों, या उसकी सेवा में हों, या उसके अनुचारी हों, या उसके साथ चलते हों,
वे जहां कहीं भी हों इस अधिनियम के अध्यधीन होंगे ।
(2) हर व्यक्ति जो उपधारा (1) के खण्ड (क) से [(छ)] तक के अधीन इस अधिनियम के अध्यधीन है तब तक जब तक वह सेवा से सम्यक् रूप से निवृत्त, उन्मोचित, निर्मुक्त, पदच्युत न कर दिया जाए या हटा न दिया जाए या सकलंक पदच्युत न कर दिया जाए, अध्यधीन बना रहेगा ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(i) “सक्रिया सेवा" से जब कि वह उस व्यक्ति के सम्बन्ध में प्रयुक्त है, जो इस अधिनियम के अध्यधीन है वह समय अभिप्रेत है जिसके दैरान वह व्यक्ति-
(क) ऐसे बल से संलग्न है या उसका भाग है जो शत्रु के विरुद्ध संक्रियाओं में लगा है, अथवा
(ख) ऐसे देश स्थान में जो शत्रु द्वारा पूर्णतः या भागतः दखल में है, सैनिक संक्रियाओं में लगा है या उसकी ओर प्रगमन पथ पर है, अथवा
(ग) ऐसे बल से संलग्न है या उसका भाग है जो किसी विदेश पर सैनिक दखल रखता है ;
(ii) “सिविल अपराध" से ऐसे अपराध अभिप्रेत हैं जो दंड न्यायालय द्वारा विचारणीय हैं ;
(iii) “सिविल कारागार" से ऐसी जेल या स्थान अभिप्रेत है जो किसी अपराधिक कैदी के निरोध के लिए कारागार अधिनियम, 1894 (1894 का 9) के अधीन या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन प्रयुक्त किया जाता है ;
[(iv) “थल सेनाध्यक्ष" से नियमित सेना का समादेशन करने वाला आफिसर अभिप्रेत है ;]
(v) “कमान आफिसर" से, जब वह इस अधिनियम के किसी उपबन्ध में नियमित सेना के किसी पृथक् प्रभाग या उसके किसी विभाग के प्रति निर्देश से प्रयुक्त है वह आफिसर अभिप्रेत है जिसका नियमित सेना के विनियमों के अधीन, या ऐसे किन्हीं विनियमों के अभाव में, सेवा की रूढ़ि के अनुसार यह कर्तव्य है कि वह, उस उपबन्ध में निर्दिष्ट वर्णन के विषयों के बारे में कमान आफिसर के कृत्यों का निर्वहन, यथास्थिति, नियमित सेना के उस प्रभाग या उस विभाग के सम्बन्ध में करे ;
(vi) “कोर" से इस अधिनियम के अध्यधीन व्यक्तियों का कोई ऐसा पृथक् निकाय अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के सभी उपबंधों के या उनमें से किसी के प्रयोजनों के लिए कोर के रूप में विहित है ;
(vii) “सेना न्यायालय" से इस अधिनियम के अधीन अधिविष्ट सेना न्यायालय अभिप्रेत है ;
(viii) “दंड न्यायालय" से *** भारत के किसी भाग में का मामूली दण्ड न्याय का न्यायालय अभिप्रेत है ;
(ix) “विभाग" के अन्तर्गत विभाग का कोई खण्ड या शाखा आती है ;
(x) शत्रु के अंतर्गत ऐसे सब सशस्त्र सैन्य विद्रोही, सायुध बागी, सायुध बल्वाकारी, जलदस्यू और ऐसा कोई उद्धतायुध व्यक्ति आता है जिसके विरुद्ध कार्य करना किसी ऐसे व्यक्ति का कर्तव्य है जो सैनिक विधि के अध्यधीन है ;
(xi) “बल" से नियमित सेना, नौसेना, वायु सेना या उनमें से किसी एक या अधिक का कोई भाग अभिप्रेत है ;
(xii) “कनिष्ठ आयुक्त आफिसर" से नियमित सेना या भारतीय रिजर्व बल में कनिष्ठ आयुक्त आफिसर के रूप में आयुक्त, राजपत्रित या वेतन पाने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है और भारतीय अनुपूरक रिजर्व बल या प्रादेशिक सेना में कनिष्ठ आयोग धारण करने वाला व्यक्ति, *** जो इस अधिनियम के तत्समय अध्यधीन हो, इसके अन्तर्गत आता है ;
(xiii) “सैनिक अभिरक्षा" से सेवा की प्रथाओं के अनुसार किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या परिरोध अभिप्रेत है और नौसैनिक या वायु सेना अभिरक्षा इसके अन्तर्गत आती है ;
(xiv) “सैनिक इनाम" के अन्तर्गत दीर्घकालीन सेवा या सदाचरण के लिए कोई उपदान या वार्षिकी, सुसेवा वेतन या पेन्शन और कोई अन्य सैनिक धनीय इनाम आता है ;
(xv) “अनायुक्त आफिसर" से नियमित सेना या भारतीय रिजर्व बल में अनायुक्त रैंक या कार्यकारी अनायुक्त रैंक धारण करने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है और भारतीय अनुपूरक रिजर्व बल या प्रादेशिक सेना का कोई अनायुक्त आफिसर या कार्यकारी अनायुक्त आफिसर *** जो इस अधिनियम के तत्समय अध्यधीन हों, इसके अन्तर्गत आता है ;
(xvi) “अधिसूचना" से शासकीय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;
(xvii) “अपराध" से इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई कार्य या लोप अभिप्रेत है और इसमें इसके पूर्व यथापरिभाषित सिविल अपराध इसके अन्तर्गत आता है ;
(xviii) “आफिसर" से नियमित सेना में आफिसर के रूप में आयुक्त, राजपत्रित या वेतन पाने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है और-
(क) भारतीय रिजर्व बल का आफिसर ;
(ख) नियमित सेना के रैंक के किसी आफिसर के समान रैंक के पदाभिधान से, प्रादेशिक सेना में राष्ट्रपति द्वारा अनुदत्त आयोग धारण करने वाला ऐसा आफिसर जो इस अधिनियम के तत्समय अध्यधीन हो ;
(ग) भारतीय आफिसर रिजर्व सेना का कोई आफिसर जो इस अधिनियम के तत्समय अध्यधीन हो ;
(घ) भारतीय नियमित आफिसर रिजर्व का कोई भी आफिसर जो इस अधिनियम के तत्समय अध्यधीन हो ;
। । । ।
(च) उस व्यक्ति के सम्बन्ध में जो इस अधिनियम के अध्यधीन है जब वह ऐसी परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा हो जो विहित की जाएं, नौ सेना या वायु सेना का कोई आफिसर इसके अन्तर्गत आता है ;
किन्तु कनिष्ठ आयुक्त आफिसर, वारन्ट आफिसर, पैटी आफिसर या अनायुक्त आफिसर इसके अन्तर्गत नहीं आते हैं ;
(न्त्न्) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(न्न्) प्रोवो-मार्शल" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो धारा 107 के अधीन इस रूप में नियुक्त है और उसके उप-पदीयों या सहायकों में से कोई या कोई अन्य व्यक्ति जो उसके अधीन या उसकी ओर से प्राधिकारी का वैध रूप से प्रयोग कर रहा है, इसके अन्तर्गत आता है ;
(न्न्त्) नियमित सेना" से अभिप्रेत है ऐसे आफिसर कनिष्ठ आयुक्त आफिसर, वारण्ट आफिसर, अनायुक्त आफिसर और अन्य अभ्यावेशित व्यक्ति जो अपने आयोग, वारण्ट, अभ्यावेशन के निबन्धनों के अनुसार या अन्यथा संसार के किसी भी भाग में निरन्तर किसी अवधि के लिए संघ की सैनिक सेवा करने के दायित्वाधीन हैं और रिजर्व बल और प्रादेशिक सेना के व्यक्ति जब वे स्थायी सेवा के लिए आहूत किए गए हों, इसके अन्तर्गत आते हैं ;
(न्न्त्त्) विनियम" के अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन बनाया गया विनियम आता है ;
(न्न्त्त्त्) वरिष्ठ आफिसर" के अन्तर्गत, जब कि वह उस व्यक्ति के सम्बन्ध में प्रयुक्त हो जो इस अधिनियम के अध्यधीन है कोई कनिष्ठ आयुक्त आफिसर, वारण्ट आफिसर और अनायुक्त आफिसर तथा जहां तक उसके आदेशों के अधीन रखे गए व्यक्तियों का सम्बन्ध है, आफिसर, वारण्ट आफिसर, पैटी आफिसर और नौसेना या वायु सेना का अनायुक्त आफिसर आता है ;
(न्न्त्ध्) वारण्ट आफिसर" से नियमित सेना के या भारतीय रिजर्व बल के वारण्ट आफिसर के रूप में नियुक्त, राजपत्रित या वेतन पाने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है और भारतीय अनुपूरक रिजर्व बल का या प्रादेशिक सेना *** का वारण्ट आफिसर जो इस अधिनियम के तत्समय अध्यधीन हो, इसके अन्तर्गत आता है ;
(न्न्ध्) इस अधिनियम में प्रयुक्त किए गए किन्तु परिभाषित न किए गए और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में परिभाषित किए गए [(भारत" शब्द के सिवाय) सब शब्दोंट और पदों के वे ही अर्थ समझे जाएंगे जो संहिता में हैं ।
अध्याय 2
कतिपय मामलों में अधिनियम के लागू होने के लिए विशेष उपबन्ध
4. केन्द्रीय सरकार के अधीन के कतिपय बलों पर अधिनियम का लागू होना-(1) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के सभी उपबंधों को या उनमें से किसी को उपान्तरों के सहित या बिना, किसी ऐसे बल को, जो भारत में उस सरकार *** के प्राधिकार के अधीन समुत्थापित किया और बना रखा गया है लागू कर सकेगी और उक्त बल को तत्समय लागू किसी अन्य अधिनियमिति का प्रवर्तन निलम्बित कर सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के ऐसे लागू किए गए उपबन्ध उक्त बल के व्यक्तियों के बारे में वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे इस अधिनियम के अध्यधीन के उन व्यक्तियों के बारे में प्रभावी होते हैं, जो नियमित सेना में वही या उसके समतुल्य रैंक धारण करते हैं जो पूर्वोक्त व्यक्ति उक्त बल में तत्समय धारण करते हों ।
(3) इस अधिनियम के ऐसे लागू किए गए उपबन्ध, उन व्यक्तियों के बारे में भी, जो उक्त बल द्वारा नियोजित हों या उसकी सेवा में हों, या उसके अनुचारी हों, या उसके किसी प्रभाग के साथ में हों, वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे उन व्यक्तियों के बारे में प्रभावी होते हैं जो [धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (झ) केट के अधीन इस अधिनियम के अध्यधीन हैं ।
(4) जब तक इस अधिनियम के कोई भी उपबन्ध उक्त बल को लागू रहें तब तक केन्द्रीय सरकार यह निदेश अधिसूचना द्वारा दे सकेगी कि उन उपबन्धों के प्रवर्तन से आनुषंगिक किसी अधिकारिता, शक्तियों या कर्तव्यों का उक्त बल के बारे में प्रयोग या पालन किसी प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा ।
5. [भाग ख राज्यों के बलों को अधिनियम का लागू होना ।]-विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा निरसित ।
6. कतिपय दशाओं में रैंक की बाबत विशेष उपबन्ध-(1) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि कोई व्यक्ति या किसी वर्ग के व्यक्ति, जो धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (झ) के अधीन इस अधिनियम के अध्यधीन हैं, आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारण्ट आफिसरों या अनायुक्त आफिसरों के रूप में ऐसे अध्यधीन होंगे और वह किसी भी आफिसर को प्राधिकृत कर सकेगी कि वह वैसा ही निदेश दे और ऐसे निदेश को रद्द करे ।
(2) आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारंट आफिसरों और अनायुक्त आफिसरों से भिन्न वे सब व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अध्यधीन हैं, उस दशा में अनायुक्त आफिसरों के रैंक से निम्नतर रैंक के समझे जाएंगे जिस दशा में वे ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिनके संबंध में उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना या निदेश प्रवृत्त है ।
7. उन व्यक्तियों का कमान आफिसर जो धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (झ) के अधीन सैनिक विधि के अध्यधीन है-(1) हर व्यक्ति, जो [धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (झ)] के अधीन इस अधिनियम के अध्यधीन हैं, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उस कोर, विभाग या टुकड़ी के यदि कोई हो, जिससे वह संलग्न है, कमान आफिसर के अधीन और उस दशा में, जिससे वह ऐसे संलग्न नहीं है, उस बल का जिसमें वह व्यक्ति तत्समय सेवा कर रहे हों, समादेशन करने वाले आफिसर द्वारा उसके कमान आफिसर के रूप में नामित तत्समय आफिसर या किसी अन्य विहित आफिसर के समादेश के अधीन या यदि ऐसा कोई आफिसर नामित या विहित न हो तो बल का समादेशन करने वाले उक्त आफिसर के समादेश के अधीन समझा जाएगा ।
(2) किसी बल का समादेशन करने वाला आफिसर धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (झ) के अधीन इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति से निम्नतर रैंक के आफिसर के समादेश के अधीन नहीं रखेगा यदि उस स्थान में जहां ऐसा व्यक्ति है उच्चतर रैंक का कोई आफिसर विद्यमान है जिसके समादेश के अधीन वह रखा जा सकता है ।
8. कतिपय दशाओं में शक्तियों का प्रयोग करने वाले आफिसर-(1) जब कभी इस अधिनियम के अध्यधीन के व्यक्ति ऐसे सैनिक संगठन का, जो इस धारा में विशिष्ट रूप से नामित नहीं है और केन्द्रीय सरकार की राय में ब्रिगेड से कम नहीं है, समादेशन करने वाले आफिसर के अधीन सेवा कर रहे हों तब वह सरकार ऐसा आफिसर विहित कर सकेगी जिसके द्वारा ऐसे व्यक्तियों के सम्बन्ध में उन शक्तियों का प्रयोग किया जाएगा जिनका इस अधिनियम के अधीन प्रयोग सेनाओं, सैन्य कोर, डिवीजनों और ब्रिगेडों का समादेशन करने वाले आफिसरों द्वारा किया जा सकता है ।
(2) केन्द्रीय सरकार, ऐसी शक्तियां या तो आत्यन्तिकतः, या ऐसे निर्बन्धनों, आरक्षणों, अपवादों और शर्तों के अधीन जैसे या जैसी वह ठीक समझे, प्रदत्त कर सकेगी ।
9. व्यक्तियों का सक्रिय सेवा में होना घोषित करने की शक्ति-धारा 3 के खंड (त्) में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकेगी कि कोई व्यक्ति या किसी वर्ग के व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अध्यधीन हैं, किसी ऐसे क्षेत्र के संबंध में, जिसमें कि वे सेवा कर रहे हों या इस अधिनियम के किसी उपबंध के या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के सम्बन्ध में इस अधिनियम के अर्थ में सक्रिय सेवा में समझे जाएंगे ।
अध्याय 3
आयोग, नियुक्ति और अभ्यावेशन
10. आयोग और नियुक्ति-राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को, जिसे वह ठीक समझे, नियमित सेना के आफिसर के रूप में या कनिष्ठ आयुक्त आफिसर के रूप में आयोग अनुदत्त कर सकेगा या किसी व्यक्ति को नियमित सेना के वारण्ट आफिसर के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।
11. अभ्यावेशन के लिए अन्य देशीयों की अपात्रता-कोई भी व्यक्ति जो भारत का नागरिक नहीं है, केन्द्रीय सरकार की लिखित रूप में संज्ञापित सम्मति से अभ्यावेशित किए जाने के सिवाय नियमित सेना में अभ्यावेशित नहीं किया जाएगा :
परन्तु इस धारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात नियमित सेना में नेपाल की प्रजाजन के अभ्यावेशन को वर्जित नहीं करेगी ।
12. अभ्यावेशन या नियोजन के लिए नारियों की अपात्रता-कोई भी नारी, नियमित सेना के भागरूप या उसके किसी प्रभाग से संलग्न ऐसे कोर, विभाग, शाखा या अन्य निकाय में, जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अभ्यावेशित या नियुक्त होने को पात्र होने के सिवाय नियमित सेना में अभ्यावेशित या नियुक्त होने की पात्र नहीं होगी :
परन्तु इस धारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात ऐसी किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबन्धों पर प्रभाव नहीं डालेगी, जो नियमित सेना की या उसकी सेवा शाखा की सहायक किसी सेवा को जिसमें नारियां अभ्यावेशन या नियुक्त होने की पात्र हों, समुत्थापित करने और बना रखने के लिए उपबन्ध करती है ।
13. अभ्यावेशन आफिसर के समक्ष प्रक्रिया-विहित अभ्यावेशन आफिसर के समक्ष उस व्यक्ति के उपसंजात होने पर जो अभ्यावेशित होने का इच्छुक है, अभ्यावेशन आफिसर उस सेवा की ये शर्तें जिन पर उसे अभ्यावेशित किया जाना है, उसे पढ़कर सुनाएगा और उसे समझाएगा या अपनी उपस्थिति में पढ़वाकर सुनवाएगा और उसे समझवाएगा, तथा अभ्यावेशन के विहित प्ररूप में उपवर्णित प्रश्न उससे पूछेगा और उसे इस बात से सावधान करने के पश्चात् कि यदि वह ऐसे किसी प्रश्न का मिथ्या उत्तर देगा तो वह इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय होगा, ऐसे हर एक प्रश्न का उसका उत्तर अभिलिखित करेगा या अभिलिखित कराएगा ।
14. अभ्यावेशन का ढंग-यदि धारा 13 के उपबंधों का अनुपालन करने के पश्चात् अभ्यावेशन आफिसर का समाधान हो जाता है कि अभ्यावेशन का इच्छुक व्यक्ति अपने से पूछे गए प्रश्नों को पूर्णतया समझता है और सेवा की शर्तों के बारे में अपनी सम्मति देता है, और यदि ऐसे आफिसर को कोई अड़चन जान नहीं पड़ती तो वह अभ्यावेशन पत्र पर हस्ताक्षर करेगा और उस व्यक्ति से भी हस्ताक्षर कराएगा और तदुपरि यह समझा जाएगा कि वह व्यक्ति अभ्यावेशित हो गया है ।
15. अभ्यावेशन की विधिमान्यता-हर व्यक्ति की बाबत, जो तीन मास की कालावधि पर्यन्त इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित किए गए व्यक्ति के रूप में वेतन लेता रहा है और जिसका नाम तत्पर्यन्त किसी कोर या विभाग के रोल पर रहा है, यह समझा जाएगा कि वह सम्यक् रूप से अभ्यावेशित हो गया है और वह अपने अभ्यावेशन में किसी अनियमितता या अवैधता के आधार पर या किसी भी अन्य आधार पर चाहे वह कुछ भी क्यों न हो अपने उन्मोचन का दावा करने का हकदार नहीं होगा, और पूर्वोक्त रूप में जो व्यक्ति ऐसा वेतन लेता रहा है और जिसका नाम रोल पर रहा है, यदि वह अपने अभ्यावेशन से तीन मास के अवसान के पूर्व अपने उन्मोचन का दावा करता है तो जब तक उसके दावे के अनुसरण में उसे उन्मोचित नहीं कर दिया जाता, कोई भी ऐसी अनियमितता या अवैधता या अन्य आधार न तो इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित किए गए व्यक्ति के रूप में उसकी स्थिति पर प्रभाव डालेगा और न उसके उन्मोचन से पूर्व की गई किसी कार्यवाही, कार्य या बात को अविधिमान्य करेगा ।
16. व्यक्ति जिन्हें शपथ दिलायी जाएगी-निम्नलिखित व्यक्तियों को शपथ दिलायी जाएगी, अर्थात् :-
(क) योधकों के रूप में अभ्यावेशित सब व्यक्ति,
(ख) अनायुक्त या कार्यकारी अनायुक्त रैंक धारण करने के लिए चुने गए सब व्यक्ति,
(ग) इस अधिनियम के अध्यधीन के सभी ऐसे अन्य व्यक्ति जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।
17. शपथ दिलाने का ढंग-(1) जब कि उस व्यक्ति के बारे में जिसे शपथ दिलायी जानी है, यह रिपोर्ट है कि वह कर्तव्य के योग्य है या जब कि ऐसा व्यक्ति परिवीक्षा की विहित कालावधि पूरी कर चुका है, तब उसके कोर या उसके ऐसे प्रभाग के समक्ष या उसके विभाग के ऐसे सदस्यों के समक्ष, जो उपस्थित हों, उसके कमान आफिसर द्वारा या किसी अन्य विहित व्यक्ति द्वारा विहित रूप में शपथ दिलाई जाएगी या उससे प्रतिज्ञान कराया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन विहित शपथ या प्रतिज्ञान के प्ररूप में यह प्रतिज्ञा अंतर्विष्ट होगी कि वह व्यक्ति जिसे शपथ दिलायी जानी है, विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सत्यनिष्ठा रखेगा कि वह नियमित सेना में सेवा करेगा तथा भूमि, समुद्र या वायु मार्ग से जहां कहीं जाने का उसे आदेश दिया जाएगा, और कि वह अपने उपरिस्थापित किसी आफिसर के सब समादेशों का अपने जीवन की जोखिम उठाकर भी पालन करेगा ।
(3) यह तथ्य कि अभ्यावेशित व्यक्ति ने वह शपथ ले ली है या प्रतिज्ञान कर लिया है, जो इस धारा द्वारा निर्दिष्ट है, उसके अभ्यावेशन पत्र में प्रविष्ट किया जाएगा और शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान कराने वाले आफिसर के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणीकृत किया जाएगा ।
अध्याय 4
सेवा की शर्तें
18. अधिनियम के अधीन सेवा की अवधि-हर व्यक्ति जो इस अधिनियम के अध्यधीन है वह राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यन्त पद धारण करेगा ।
19. केन्द्रीय सरकार द्वारा सेवा का पर्यवसान-इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों और विनियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि केन्द्रीय सरकार किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अध्यधीन है पदच्युत कर सकेगी या सेवा से हटा सकेगी ।
20. थल सेनाध्यक्ष द्वारा या अन्य आफिसरों द्वारा पदच्युत किया जाना, हटाया जाना या अवज्ञता किया जाना-(1) [थल सेनाध्यक्षट इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी भी व्यक्ति को जो आफिसर से भिन्न है सेवा से पदच्युत कर सकेगा, या हटा सकेगा ।
(2) 1[थल सेनाध्यक्षट किसी वारण्ट आफिसर या किसी अनायुक्त आफिसर को निम्नतर श्रेणी या रैंक या सामान्य सैनिकों में अवनत कर सकेगा ।
(3) किसी भी ब्रिगेड या समतुल्य समादेशक से अन्यून शक्ति रखने वाला आफिसर या कोई विहित आफिसर, अपने समादेश के अधीन सेवा करने वाले किसी ऐसे व्यक्ति को जो आफिसर या कनिष्ठ आयुक्त आफिसर से भिन्न हो पदच्युत कर सकेगा या हटा सकेगा ।
(4) ऐसा आफिसर जैसा उपधारा (3) में वर्णित है, अपने समादेश के अधीन किसी वारण्ट आफिसर या अनायुक्त आफिसर को निम्नतर श्रेणी या रैंक में या सामान्य सैनिक श्रेणी में अवनत कर सकेगा ।
(5) किन्तु इस धारा के अधीन सामान्य सैनिकों में अवनत किए गए वारण्ट आफिसर से सामान्य सैनिक श्रेणी में सिपाही के रूप में सेवा करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी ।
(6) किसी कार्यकारी अनायुक्त आफिसर का कमान आफिसर उसे अनायुक्त आफिसर के रूप में अपनी स्थायी श्रेणी में या यदि सामान्य सैनिकों के ऊपर उसकी कोई स्थायी श्रेणी न हो तो सामान्य सैनिक श्रेणी में प्रवर्तित होने का आदेश दे सकेगा ।
(7) इस धारा के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट उक्त उपबन्धों के और तद्धीन बनाए गए नियमों और विनियमों के अध्यधीन होगा ।
21. जो व्यक्ति इस अधिनियम के अध्यधीन है उन्हें लागू होने में कतिपय मूल अधिकारों को उपान्तरित करने की शक्ति-नियमित सेना या उसकी किसी शाखा से सम्बन्धित किसी भी तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अध्यधीन के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के उस अधिकार को जो उसका-
(क) किसी व्यवसाय संघ या श्रमिक संघ के अथवा व्यवसाय या श्रमिक संघों के किसी वर्ग के, अथवा किसी सोसाइटी, संस्था या संगम के अथवा सोसाइटियों, संस्थाओं या संगमों के किसी वर्ग के, सदस्य होने या उससे किसी भी रूप में सहयुक्त होने का है ;
(ख) व्यक्तियों के किसी निकाय द्वारा किन्हीं राजनैतिक या अन्य प्रयोजनों के लिए संगठित किसी सभा में हाजिर होने या उसे संबोधित करने अथवा संगठित किसी प्रदर्शन में भाग लेने का है ;
(ग) प्रेस से कोई सम्पर्क करने या कोई पुस्तक, पत्र या अन्य दस्तावेज प्रकाशित करने या प्रकाशित कराने का है,
इतने विस्तार तक, तथा ऐसी रीति से, जो आवश्यक हो, निर्बन्धित करने वाले नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
22. निवृत्ति, निर्मुक्ति या उन्मोचन-किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अध्यधीन है, ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, सेवा से निवृत्त, निर्मुक्त या उन्मोचित किया जा सकेगा ।
23. सेवा के पर्यवसान पर प्रमाणपत्र-प्रत्येक कनिष्ठ आयुक्त आफिसर, वारण्ट आफिसर या अभ्यावेशित व्यक्ति को जो सेवा से पदच्युत, उन्मोचित, निवृत्त या निर्मुक्त किया जाता है या हटाया जाता है, उसके कमान आफिसर द्वारा उस भाषा में जो ऐसे व्यक्ति की मातृभाषा है और अंग्रेजी भाषा में भी, एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा जिसमें निम्नलिखित उपवर्णि होंगे-
(क) उसकी सेवा का पर्यवसान करने वाला प्राधिकारी ;
(ख) ऐसे पर्यवसान का कारण ; तथा
(ग) नियमित सेना में उसकी सेवा की पूर्ण कालावधि ।
24. भारत से बाहर होने की स्थिति में उन्मोचन या पदच्युति-(1) इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित किया गया कोई भी व्यक्ति, जो अपने अभ्यावेशन की शर्तों के अधीन उन्मोचित किए जाने का हकदार है या जिसका उन्मोचन सक्षम प्राधिकारी द्वारा आदिष्ट किया गया है और जो उन्मोचित किए जाने के लिए ऐसे हकदार या आदिष्ट होने के समय भारत के बाहर सेवा कर रहा है, और भारत भेजे जाने की प्रार्थना करता है, उन्मोचित किए जाने के पहले सुविधानुसार पूर्ण शीघ्रता से भारत भेज दिया जाएगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित किया गया कोई भी व्यक्ति, जो सेवा से पदच्युत किया जाता है और जो ऐसे पदच्युत किए जाने के समय भारत के बाहर सेवा कर रहा है, सुविधानुसार पूर्ण शीघ्रता से भारत भेज दिया जाएगा ।
(3) जहां कि कोई ऐसा व्यक्ति, जो उपधारा (2) में वर्णित है, किसी अन्य दण्ड के साथ-साथ पदच्युति से दण्डादिष्ट किया जाता है वहां ऐसा अन्य दण्ड अथवा निर्वासन या कारावास के दण्डादेश की दशा में, ऐसे दण्डादेश का कोई प्रभाग उसे भारत भेजे जाने से पहले भुगतवाया जा सकेगा ।
(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए उन्मोचन" शब्द के अन्तर्गत निर्मुक्ति आएगी और पदच्युति" शब्द के अन्तर्गत हटाया जाना आएगा ।
अध्याय 5
सेवा के विशेषाधिकार
25. वेतन में से केवल प्राधिकृत कटौतियां की जाएंगी-इस अधिनियम के अध्यधीन के हर व्यक्ति का वेतन जो किसी तत्समय प्रवृत्त विनियम के अधीन उसे उस रूप में शोध्य है, इस या किसी अन्य अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत कटौतियों से भिन्न कोई कटौती किए बिना दिया जाएगा ।
26. आफ़िसरों से भिन्न व्यथित व्यक्तियों को प्राप्त उपचार-(1) आफिसर से भिन्न इस अधिनिय के अध्यधीनम का कोई भी व्यक्ति, जो यह समझता है कि किसी वरिष्ठ या अन्य आफिसर द्वारा उसके साथ अन्याय किया गया है, उस दशा में, जिसमें कि वह किसी ट्रुप या कम्पनी से संलग्न नहीं है उस आफिसर से, जिसके समादेश या आदेश के अधीन वह सेवा कर रहा है, परिवाद कर सकेगा और उस दशा में जिसमें किसी ट्रुप या कम्पनी से संलग्न है उसका समादेशन करने वाले आफिसर से परिवाद कर सकेगा ।
(2) जब कि वह आफिसर, जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया है, ऐसा आफिसर है जिससे कोई परिवाद उपधारा (1) के अधीन किया जाना चाहिए, तब व्यथित व्यक्ति उस आफिसर के अगले वरिष्ठ आफिसर से परिवाद कर सकेगा ।
(3) हर आफिसर, जिसे ऐसा कोई परिवाद प्राप्त हो परिवादी को पूरा प्रतितोष देने के लिए यावत् संभव पूर्ण अन्वेषण करेगा या जब आवश्यक हो परिवाद वरिष्ठ प्राधिकारी को निर्देशित कर देगा ।
(4) ऐसा हर परिवाद ऐसी रीति से किया जाएगा जो उचित प्राधिकारी द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट की जाए ।
(5) [थल सेनाध्यक्षट द्वारा उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी विनिश्चय को केन्द्रीय सरकार पुनरीक्षित कर सकेगी, किन्तु उसके अध्यधीन रहते हुए 1[थल सेनाध्यक्षट का विनिश्चय अंतिम होगा ।
27. व्यथित आफिसरों को प्राप्त उपचार-कोई आफिसर जो यह समझता है कि उसके कमान आफिसर या किसी वरिष्ठ आफिसर द्वारा उसके साथ अन्याय किया गया है और जिसको अपने कमान आफिसर से सम्यक् आवेदन करने पर ऐसा प्रतितोष प्राप्त नहीं होता जिसका वह स्वयं को हकदार समझता है, वह केन्द्रीय सरकार से ऐसी रीति से परिवाद कर सकेगा जो उचित प्राधिकारी द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट की जाए ।
28. कुर्की से उन्मुक्ति-ऐसे किसी भी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अध्यधीन है, न तो आयुधों, कपड़ों, उपस्कर, साजसामान या आवश्यक वस्तुओं का और न उसके कर्तव्य के निर्वहन में उसके द्वारा प्रयुक्त किसी जीव जन्तु का अभिग्रहण और न ऐसे किसी व्यक्ति के वेतन और भत्तों की या उनके किसी भाग की कुर्की, किसी सिविल या राजस्व न्यायालय या किसी राजस्व आफिसर के ऐसे निदेश द्वारा किसी ऐसी डिक्री या आदेश की तुष्टि में की जाएगी जो उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय हो ।
29. ऋण के लिए गिरफ्तारी से उन्मुक्ति-(1) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति ऋण के लिए तब तक, जब तक वह बल का अंग रहता है किसी सिविल या राजस्व न्यायालय या राजस्व आफिसर के द्वारा या प्राधिकार से निकाली गई किसी आदेशिका के अधीन गिरफ्तार किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।
(2) ऐसे किसी न्यायालय का न्यायाधीश या उक्त आफिसर ऐसे व्यक्ति की इस धारा के उपबन्धों के प्रतिकूल गिरफ्तारी के किसी ऐसे परिवाद की, जो उस व्यक्ति या उसके वरिष्ठ आफिसर द्वारा किया जाए, छानबीन कर सकेगा और उस व्यक्ति को स्वहस्ताक्षरित अधिपत्र द्वारा उन्मोचित कर सकेगा और परिवादी को युक्तियुक्त खर्च अधिनिर्णीत कर सकेगा और परिवादी उस खर्च को उसी रीति से वसूल कर सकेगा जिससे वह आदेशिका अभिप्राप्त करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध, डिक्री द्वारा उस अधिनिर्णीत खर्च वसूल करता ।
(3) ऐसे खर्च की वसूली के लिए परिवादी द्वारा कोई भी न्यायालय फीस देय न होगी ।
30. सेना-न्यायालयों में हाजिर होने वाले व्यक्तियों की गिरफ्तारी से उन्मुक्ति-(1) किसी भी सेना-न्यायालय का पीठासीन आफिसर या सदस्य, कोई भी जज-एडवोकेट, सेना न्यायालय के समक्ष की किसी कार्यवाही का कोई भी पक्षकार, या उनका कोई भी विधि व्यवसायी या अभिकर्ता, और किसी सेना-न्यायालय में हाजिर होने के समन के आज्ञानुवर्तन में कार्य करने वाला कोई भी साक्षी सेना-न्यायालय को जाने, उसमें हाजिर रहने या वहां से लौटने के दौरान सिविल या राजस्व आदेशिका के अधीन गिरफ्तार किए जाने के दायित्व के अधीन न होगा ।
(2) यदि ऐसा कोई व्यक्ति ऐसी किसी आदेशिका के अधीन गिरफ्तार किया जाता है तो वह सेना-न्यायालय के आदेश से उन्मोचित किया जा सकेगा ।
31. रिजर्विस्टों के विशेषाधिकार-हर व्यक्ति जो भारतीय रिजर्व-बल का अंग है, तब जब कि वह प्रशिक्षण या सेवा के लिए आहूत किया गया हो या उसमें लगा हो या उससे लौट रहा हो, उन सब विशेषाधिकारों का हकदार होगा जो इस अधिनियम के अध्यधीन के व्यक्ति को धाराओं 28 और 29 द्वारा दिए गए हैं ।
32. सेना के कार्मिकों के मुकदमों के बारे में पूर्विकता-(1) इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के द्वारा या की ओर से उचित सैनिक प्राधिकारी का एक यह प्रमाणपत्र किसी न्यायालय के समक्ष उपस्थित किए जाने पर कि उस न्यायालय में वाद या अन्य कार्यवाही चलाने या उसमें प्रतिरक्षा करने के प्रयोजन के लिए अनुपस्थिति छुट्टी उसे अनुदत्त की गई है या उसके द्वारा आवेदित है, न्यायालय उस व्यक्ति के आवेदन पर, यावत् सम्भव यह इन्तजाम करेगा कि उस वाद या अन्य कार्यवाही की सुनवाई या अंतिम निपटारा ऐसी अनुदत्त या आवेदित छुट्टी की कालावधि के भीतर हो जाए ।
(2) उचित सैनिक प्राधिकारी के प्रमाणपत्र में छुट्टी का या आशयित छुट्टी का प्रथम और अन्तिम दिन कथित होगा और उस मामले का वर्णन दिया गया होगा जिसके लिए छुट्टी अनुदत्त या आवेदित की गई है ।
(3) ऐसे किसी प्रमाणपत्र के उपस्थापन की बाबत या उसके मामले की सुनवाई को पूर्विकता दिए जाने के लिए ऐसे किसी व्यक्ति के द्वारा या की ओर से किसी आवेदन की बाबत कोई भी फीस न्यायालय को देय न होगी ।
(4) जहां कि न्यायालय यह इन्तजाम करने में असमर्थ होता है कि वाद या अन्य कार्यवाही की सुनवाई और अन्तिम निपटारा यथापूर्वोक्त छुट्टी या आशयित छुट्टी की कालावधि के भीतर हो जाएं वहां वह ऐसा न कर सकने के अपने कारणों को अभिलिखित कर देगा और उसकी एक प्रतिलिपि ऐसे व्यक्ति को उसके आवेदन पर, प्रतिलिपि के आवेदन के या स्वयं प्रतिलिपि के लिए उसके द्वारा कोई भी संदाय किए गए बिना, दिला देगा ।
(5) यदि किसी मामले में यह प्रश्न उठे कि ऐसा प्रमाणपत्र अनुदत्त करने के लिए, जैसा पूर्वोक्त है, अर्हित उचित सैनिक प्राधिकारी कौन है तो वह प्रश्न न्यायालय द्वारा तत्काल ऐसे आफिसर को जो ब्रिगेड कमान्डर से अन्यून शक्ति धारण करने वाला है या समतुल्य समादेशक है निर्देशित किया जाएगा जिसका विनिश्चय अंतिम होगा ।
33. अन्य विधियों के अधीन के अधिकारों और विशेषाधिकारों की व्यावृत्ति-इस अध्याय की पूर्ववर्ती धाराओं में विनिर्दिष्ट अधिकार और विशेषाधिकार उन अन्य अधिकारों और विशेषाधिकारों के अतिरिक्त होंगे जो इस अधिनियम के अध्यधीन के व्यक्तियों को, या साधारणतया नियमित सेना, नौसेना और वायु सेना के सदस्यों को किसी तत्समय प्रवृत्त अन्य विधि द्वारा प्रदत्त हों, न कि उनके अल्पीकरण में ।
अध्याय 6
अपराध
34. शत्रु से संबंधित अपराध, जो मृत्यु से दण्डनीय है-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई भी व्यक्ति जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई भी अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) किसी गैरिजन, दुर्ग, पदस्थान, स्थान या गारद को, जो उसके भारसाधन में सुपुर्द किया गया है या जिसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य है लज्जास्पद रूप से परित्यक्त या समर्पित करेगा या उक्त कार्यों में से कोई कार्य करने के लिए किसी कमान आफिसर या अन्य व्यक्ति को विवश या उत्प्रेरित करने के लिए किन्हीं साधनों का उपयोग करेगा, अथवा
(ख) सेना, नौसेना या वायु सेना विधि के अध्यधीन के किसी भी व्यक्ति को शत्रु के विरुद्ध कार्य करने से प्रविरत रहने के लिए विवश या उपत्प्रेरित करने के लिए या ऐसे व्यक्ति को शत्रु के विरुद्ध कार्य करने से निरुत्साहित करने के लिए किन्हीं साधनों का साशय उपयोग करेगा, अथवा
(ग) शत्रु की उपस्थिति में अपने आयुधों, गोलाबारूद्ध, औजारों या उपस्कर को लज्जास्पद रूप से संत्यक्त करेगा या ऐसी रीति से कदाचार करेगा जिससे कायरता दर्शित हो, अथवा
(घ) विश्वासघातपूर्वक, शत्रु से या किसी ऐसे व्यक्ति से जो संघ के विरुद्ध उद्यतायुध है वार्ताचार करेगा या उसे आसूचना देगा, अथवा
(ङ) धन, आयुध, गोलाबारूद, सामान या प्रदाय से शत्रु की प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः सहायता करेगा, अथवा
(च) विश्वासघातपूर्वक या कायरता से शत्रु को अवहार ध्वज भेजेगा, अथवा
(छ) युद्ध-काल में या किन्हीं सैनिक संक्रियाओं के दौरान कार्रवाई, कैम्प, गैरिजन या क्वार्टरों में मिथ्या एलार्म साश्य कारित करेगा या ऐसी रिपोर्ट जो एलार्म या नैराश्य पैदा करने के लिए प्रकल्पित हो, फैलाएगा, अथवा
(ज) संघर्ष के समय नियमित रूप से अवमुक्त हुए बिना या बिना छुट्टी अपने कमान आफिसर को या अपने पदस्थान से गारद, पिकेट, पैट्रोल, या दल को छोड़ेगा, अथवा
(झ) युद्ध कैदी बनाए जाने पर स्वेच्छा से शत्रु पक्ष में सेवा करेगा या शत्रु की सहायता करेगा, अथवा
(त्र) ऐसे शत्रु को, जो कैदी नहीं है, जानते हुए संश्रय देगा या उसका संरक्षण करेगा, अथवा
(ट) युद्ध या एलार्म के समय सन्तरी होते हुए अपने पदस्थान पर सो जाएगा या नशे में होगा, अथवा
(ठ) जानते हुए कोई ऐसा कार्य करेगा जो भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायु सैना बलों की या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों की या ऐसे बलों के किसी भाग की सफलता को संकट में डालने के लिए प्रकल्पित हो,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर मृत्यु दण्ड या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
35. शत्रु से संबंधित अपराध जो मृत्यु से दण्डनीय नहीं हैं-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) सम्यक् पूर्वावधानी के अभाव से या आदेशों की अवज्ञा या कर्तव्य की जानबूझकर उपेक्षा के कारण कैदी बना लिया जाएगा या कैदी बना लिए जाने पर, तब जब वह अपनी सेवा पर वापस आ जाने में समर्थ है ऐसा करने में असफल रहेगा, अथवा
(ख) सम्यक् प्राधिकार के बिना शत्रु के साथ वार्ताचार करेगा या उसकी आसूचना देगा या ऐसे किसी वार्ताचार या आसूचना का ज्ञान प्राप्त होने पर उसे तुरन्त अपने कमान आफिसर या अन्य वरिष्ठ आफिसर से प्रकट करने का जानबूझकर लोप करेगा, अथवा
(ग) सम्यक् प्राधिकार के बिना शत्रु को अवहार ध्वज भेजेगा,
सेना न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
36. अन्य समयों की अपेक्षा सक्रिय सेवा के समय अधिक कठोरता से दण्डनीय अपराध-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई भी व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) किसी संरक्षण गारद का अतिक्रमण करेगा या किसी सन्तरी का अतिक्रमण करेगा या उस पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा, अथवा
(ख) लूट-पाट की तलाश में किसी गृह या अन्य स्थान में अनधिकृत प्रवेश करेगा, अथवा
(ग) सन्तरी होते हुए अपने पदस्थान पर सो जाएगा या नशे में होगा, अथवा
(घ) अपने वरिष्ठ आफिसर के आदेशों के बिना गारद, पिकेट, पैट्रोल या पदस्थान छोड़ेगा, अथवा
(ङ) कैम्प, गैरिजन या क्वार्टरों में मिथ्या एलार्म साशय या उपेक्षा से कारित करेगा, फैलाएगा या ऐसी रिपोर्ट जो अनावश्यक एलार्म या नैराश्य पैदा करने के लिए प्रकल्पित हो, फैलाएगा, अथवा
(च) पैरोल, संकेत-शब्द या प्रतिसंकेत किसी ऐसे व्यक्ति को जो उसे जानने का हकदार नहीं है, बताएगा या जो पैरोल, संकेत-शब्द या प्रतिसंकेत उसे बताया गया है उससे भिन्न पैरोल, संकेत-शब्द या प्रतिसंकेत जानते हुए देगा,
सेना न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर-
उस दशा में, जिसमें कि ऐसा कोई अपराध वह तब करेगा, जब वह सक्रिय सेवा पर है कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, तथा
उस दशा में जिसमें ऐसा कोई अपराध वह तब करेगा जब तक वह सक्रिय सेवा पर नहीं है कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
37. विद्रोह-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायु सेना बलों में या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों में विद्रोह आरम्भ करेगा, उद्दीप्त करेगा, कारित करेगा या कारित करने के लिए किन्हीं अन्य व्यक्तियों के साथ षड्यंत्र करेगा, अथवा
(ख) ऐसे किसी विद्रोह में सम्मिलित होगा, अथवा
(ग) ऐसे किसी विद्रोह में उपस्थित होते हुए उसे दबाने के लिए अपने अधिकतम प्रयास नहीं करेगा, अथवा
(घ) यह जानते हुए या इस बात के विश्वास का कारण रखते हुए कि ऐसा कोई विद्रोह या ऐसा विद्रोह करने का आशय या ऐसा कोई षड्यंत्र अस्तित्व में है, उसकी इत्तिला अपने कमान आफिसर या अन्य वरिष्ठ आफिसर को अविलम्ब नहीं देगा, अथवा
(ङ) भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायु सेना बलों में के किसी व्यक्ति को उस के कर्तव्य से या संघ के प्रति उसकी राजनिष्ठा से विचलित करने का प्रयास करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर मृत्यु या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
38. अभित्यजन और अभित्यजन में सहायता करना-(1) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो सेवा का अभित्यजन करेगा या करने का प्रयत्न करेगा वह सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर-
उस दशा में जिसमें कि ऐसा अपराध वह सक्रिय सेवा पर करेगा या तब करेगा, जब वह सक्रिय सेवा पर जाने के आदेश के अधीन है मृत्यु या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, तथा
उस दशा में जिसमें कि ऐसा अपराध वह किन्हीं परिस्थितियों में करेगा कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दण्ड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
(2) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो जानते हुए ऐसे किसी अभित्यजन को संश्रय देगा, वह सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित हो, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
(3) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के किसी अभित्यजन या अभित्यजन के प्रयत्न के संज्ञान रखते हुए तत्काल अपने स्वयं के या किसी अन्य वरिष्ठ आफिसर को सूचना देगा या ऐसे व्यक्ति को पकड़वाने के लिए अपनी शक्ति में कोई कार्रवाई नहीं करेगा, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
39. छुट्टी बिना अनुपस्थिति-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) छुट्टी बिना अपने को अनुपस्थित रखेगा, अथवा
(ख) अपने को अनुदत्त छुट्टी के उपरान्त पर्याप्त हेतुक के बिना अनुपस्थित रहेगा, अथवा
(ग) अनुपस्थिति छुट्टी पर होते हुए और उचित प्राधिकारी से यह इत्तिला मिलने पर कि कोई कोर या कोर के प्रभाग को या किसी विभाग को, जिसका वह अंग है, सक्रिय सेवा पर जाने के लिए आदिष्ट हो गई है, काम पर अविलम्ब वापस आने में पर्याप्त हेतुक के बिना असफल रहेगा, अथवा
(घ) परेड में या अभ्यास या कर्तव्य के लिए नियुक्त स्थान पर नियत समय पर उपसंजात होने में पर्याप्त हेतुक के बिना असफल रहेगा, अथवा
(ङ) उस दौरान जब वह परेड में या प्रगमन पथ पर है, पर्याप्त हेतुक के बिना या अपने वरिष्ट आफिसर से इजाजत लिए बिना परेड या प्रगमन पथ छोड़ेगा, अथवा
(च) जब वह कैम्प में या गैरिजन में अन्यत्र है, तब किसी साधारण, स्थानीय या अन्य आदेश द्वारा नियत किन्हीं परिसीमाओं के परे या प्रतिषिद्ध किसी स्थान में, पास या अपने वरिष्ठ आफिसर की लिखित इजाजत के बिना पाया जाएगा, अथवा
(छ) जब कि उसे किसी स्कूल में हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से आदेश दिया गया है तब अपने वरिष्ठ आफिसर की इजाजत के बिना या सम्यक् हेतुक के बिना अपने को उससे अनुपस्थित रखेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
40. वरिष्ठ आफिसर पर आघात करना या उसे धमकी देना-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) अपने वरिष्ठ आफिसर पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा, अथवा
(ख) ऐसे आफिसर के प्रति धमकी भरी भाषा का प्रयोग करेगा, अथवा
(ग) ऐसे आफिसर के प्रति अनधीनता द्योतक भाषा का प्रयोग करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध पर-
उस दशा में, जिसमें ऐसे आफिसर उस समय अपना पद्-निष्पादन कर रहा है या उस दशा में, जिसमें कि अपराध सक्रिय सेवा पर किया जाता है कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, या
अन्य दशाओं में कारावास, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दण्ड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा :
परन्तु खंड (ग) में विनिर्दिष्ट अपराध की दशा में कारावास पांच वर्ष से अधिक का नहीं होगा ।
41. वरिष्ठ आफिसर के प्रति अवज्ञा-(1) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा अपने पद्-निष्पादन में स्वयं दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की, चाहे मौखिक रूप से या लिखकर या संकेत द्वारा या अन्यथा दिया गया हो, ऐसी रीति से अवज्ञा करेगा, जिससे प्राधिकारी को जानबूझकर किया गया तिरस्कार दर्शित हो, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारवास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
(2) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा करेगा, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर-
उस दशा में, जिसमें ऐसा अपराध वह तब करेगा जब वह सक्रिय सेवा पर है, कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड जो अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, तथा
उस दशा में जिसमें कि ऐसा अपराध वह तब करता है, जब वह सक्रिय सेवा पर नहीं है, कारावास, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
42. अनधीनता और बाधा-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) किसी झगड़े, दंगे या उपद्रव से संपृक्त होते हुए, किसी ऐसे आफिसर की, भले ही वह निम्नतर रैंक का हो, जो उसकी गिरफ्तारी का आदेश देता है, आज्ञापालन से इन्कार करेगा या ऐसे आफिसर पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा, अथवा
(ख) किसी ऐसे व्यक्ति पर अपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा जिसकी अभिरक्षा में उसे विधिपूर्वक रखा गया है चाहे वह व्यक्ति इस अधिनियम के अध्यधीन हो या न हो और चाहे उसका वरिष्ठ आफिसर हो या न हो, अथवा
(ग) ऐसे अनुरक्षक का प्रतिरोध करेगा जिसका कर्तव्य उसे पकड़ना या अपने भारसाधन में लेना है, अथवा
(घ) बैरकों, कैम्प या क्वार्टरों में अनधिकृत रूप से निकलेगा, अथवा
(ङ) किसी साधारण, स्थानीय या अन्य आदेश के पालन की उपेक्षा करेगा, अथवा
(च) प्रोवो-मार्शल के या उसकी ओर से विधिपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के समक्ष अड़चन डालेगा या प्रोवो-मार्शल या उसकी ओर से विधिपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति-निष्पादन में उसकी सहायता की अपेक्षा की जाने पर उससे इन्कार करेगा, अथवा
(छ) किसी ऐसे व्यक्ति पर जो बल के लिए रसद या प्रदाय ला रहा हो अपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि उन अपराधों की दशा में जो खंड (घ) और (ङ) में विनिर्दिष्ट हैं, दो वर्ष तक की, और उन अपराधों की दशा में, जो अन्य खंडों में विनिर्दिष्ट हैं, दस वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
43. कपटपूर्ण अभ्यावेशन-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) उस कोर या विभाग से, जिसका वह अंग है, नियमित उन्मोचन अभिप्राप्त किए बिना या उन शर्तों को जो उसे अभ्यावेशित या प्रविष्ट होने के लिए समर्थ करती हैं अन्यथा पूरी किए बिना उसी या किसी अन्य कोर या विभाग में भारत के नौसेनिक या वायु सैनिक बल के किसी भाग में या प्रादेशिक सेना में अभ्यावेशित या प्रविष्ट होगा, अथवा
(ख) बल के किसी भाग में किसी व्यक्ति के अभ्यावेशन से, तब सम्पृक्त होगा जब वह यह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है कि ऐसा व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में है कि अभ्यावेशित होने से वह इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध करता है,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
44. अभ्यावेशन किए जाने के समय मिथ्या उत्तर-कोई भी व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन अध्यधीन हो गया है और जिसके बारे में यह पता चलता है कि अभ्यावेशन के समय उसने विहित प्ररूप में उपवर्णित किसी ऐसे प्रश्न का, जो उससे उस अभ्यावेशन आफिसर द्वारा किया गया था जिसके समक्ष वह अभ्यावेशन के प्रयोजन के लिए उपसंजात हुआ था, जानबूझकर मिथ्या उत्तर दिया था, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
45. अशोभनीय आचरण-कोई भी आफिसर, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर या वारण्ट आफिसर, जो ऐसी रीति से व्यवहार करेगा, जो उसके पद और उससे प्रत्याशित शील की दृष्टि से अशोभनीय है, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, यदि वह आफिसर है सकलंक पदच्युत किए जाने के दंड के दायित्व से, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा और यदि वह कनिष्ठ आयुक्त आफिसर या वारण्ट आफिसर है, पदच्युत किए जाने के दायित्व के या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
46. कलंकास्पद आचरण के कतिपय प्रकार-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) क्रूर, अशिष्ट या अप्राकृतिक प्रकार के किसी कलंकास्पद आचरण का दोषी होगा, अथवा
(ख) कर्तव्य से बचने के लिए रोगी बन जाएगा या अपने में रोग या अंगशैथिल्य का ढ़ोंग करेगा या अपने में उसे उत्पन्न करेगा या निरोग होने में साशय विलम्ब करेगा या अपने रोग या अंगशैथिल्य को गुरुतर बनाएगा, अथवा
(ग) अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को सेवा के अयोग्य बनाने के आशय से अपने आपको या उस व्यक्ति को स्वेच्छा उपहति कारित करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
47. अधीनस्थ के साथ बुरा बर्ताव करना-कोई आफिसर, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर, वारण्ट आफिसर या अनायुक्त आफिसर जो किसी ऐसे व्यक्ति पर, जो रैंक या पद में उसके नीचे का है, आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या उसके साथ अन्यथा बुरा बर्ताव करेगा, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
48. मत्तता-(1) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो मत्तता की हालत में पाया जाता है चाहे, वह कर्तव्य पर हो या न हो, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, यदि वह आफिसर है, सकलंक पदच्युत किए जाने के दण्ड या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा और यदि वह आफिसर नहीं है तो उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए कारावास, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
(2) जहां कि मत्तता में होने का अपराध आफिसर से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा तब किया जाता है जब वह सक्रिय सेवा पर नहीं है या कर्तव्य पर नहीं है, वहां अधिनिर्णीत कारावास की कालावधि छह मास से अधिक की नहीं होगी ।
49. अभिरक्षा में से किसी व्यक्ति को निकल भागने देना-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) उस दौरान, जब वह किसी गारद, पिकेट, पैट्रोल या चौकी का समादेशक है, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसके भारसाधन में सुपुर्द किया गया है, उचित प्राधिकार के बिना, चाहे जानबूझकर, चाहे युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना, निर्मुक्त करेगा या किसी कैदी या ऐसे सुपुर्द किए गए व्यक्ति को लेने से इंकार करेगा, अथवा
(ख) ऐसे व्यक्ति को, जो उसके भारसाधक में सुपुर्द किया गया है या जिसे रखना या जिस पर पहरा रखना उसका कर्तव्य है जानबूझकर या युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना निकल भागने देगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जिसमें उसने जानबूझकर कार्य किया है कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, और उस दशा में जिसमें उसने जानबूझकर कार्य नहीं किया है कारावास, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
50. गिरफ्तारी या परिरोध के सम्बन्ध में अनियमित्तता-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) किसी गिरफ्तार या परिरुद्ध व्यक्ति को विचारण के लिए लाए बिना अनावश्यक रूप से निरुद्ध रखेगा या उसका मामला अन्वेषण के लिए उचित प्राधिकारी के समक्ष लाने में अफसल रहेगा, अथवा
(ख) किसी व्यक्ति को सैनिक अभिरक्षा के लिए सुपुर्द करके, ऐसी सुपुर्दगी के समय या यथासाध्य शीघ्र और किसी भी दशा में तत्पश्चात् अड़तालीस घन्टों के अन्दर उस आफिसर या अन्य व्यक्ति को जिसकी अक्षिरक्षा में गिरफ्तार किया गया व्यक्ति सुपुर्द किया गया हो, उस अपराध का जिसका कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति पर आरोप है लिखित और स्वहस्ताक्षरित वृत्तान्त परिदत्त करने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
51. अभिरक्षा से निकल भागना-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा में होते हुए निकल भागेगा या निकल भागने का प्रत्यन करेगा, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या, ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
52. सम्पत्ति के बारे में अपराध-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्-
(क) सरकार की या किसी सैनिक, नौसैनिक या वायु सेना मैस, बैंड या संस्था की या सैनिक, नौसैनिक या वायु सैनिक विधि के अध्यधीन के किसी व्यक्ति की किसी सम्पत्ति की चोरी करेगा, अथवा
(ख) ऐसी किसी सम्पत्ति का बोईमानी से दुर्विनियोग करेगा या उसको अपने उपयोग के लिए संपरिवर्तित कर लेगा, अथवा
(ग) ऐसी किसी सम्पत्ति के बारे में आपराधिक न्यास-भंग करेगा, अथवा
(घ) ऐसी किसी सम्पत्ति को, जिसके बारे में खंड (क), (ख) और (ग) के अधीन अपराधों में से कोई अपराध किया गया है, यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए कि ऐसा अपराध हुआ है, बेईमानी से प्राप्त करेगा या रखे रखेगा,
(ङ) सरकार की किसी सम्पत्ति को, जो उसे न्यस्त की हुई हो, जानबूझकर नष्ट करेगा या उसकी क्षति करेगा, अथवा,
(च) कपट-वंचन करने के एक व्यक्ति को सदोष अभिलाभ या किसी अन्य व्यक्ति को सदोष हानि पहुंचाने के आशय से कोई अन्य बात करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
53. उद्दापन और भ्रष्टाचार-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् ; -
(क) उद्दापन करेगा, अथवा
(ख) उचित प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति से धन, रसद या सेवा का आहरण के अधीन होगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
54. उपस्कर को गायब कर देना-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किन्हीं आयुधों, गोलाबारुद्ध, उपस्कर, उपकरणों, औजारों, कपड़ों या किसी अन्य वस्तु को, जो सरकार की सम्पत्ति होते हुए उसे अपने उपयोग के लिए दी हुई हो या उसे न्यस्त की हुई हो, गायब कर देगा या गायब करवा देने में सम्पृक्त होगा, अथवा
(ख) खंड (क) में वर्णित किसी वस्तु को उपेक्षा से गंवा देगा, अथवा
(ग) अपने को अनुदत्त किसी पदक या अलंकरण को बेचेगा, गिरवी रखेगा, नष्ट करेगा या विरूपित करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि खंड (क) में विनिर्दिष्ट अपराधों की दशा में दस वर्ष तक की और अन्य खंडों में विनिर्दिष्ट अपराधों की दशा में पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
55. सम्पत्ति को क्षति-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 54 के खंड (क) में वर्णित कोई सम्पत्ति या किसी सैनिक, नौसैनिक या वायु सेना बल के मैस, बैंड या संस्था की या सैनिक, नौसैनिक या वायु सेना के विधि के अध्यधीन के या नियमित सेना में सेवा करने वाले या उससे संलग्न व्यक्ति की कोई सम्पत्ति नष्ट करेगा या उसे क्षति करेगा, अथवा
(ख) कोई ऐसा कार्य करेगा जिसके कारण अग्नि से सरकार की किसी सम्पत्ति को नुकसान होता है या उसका नाश होता है, अथवा
(ग) अपने को न्यस्त किए हुए किसी जीवजन्तु को मार देगा, क्षति करेगा, गायब कर देगा, या उससे बुरा बर्ताव करेगा या उसे गंवा देगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में, जिसमें उसने जानबूझकर ऐसा कार्य किया है कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, और उस दशा में जिसमें उसने युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना ऐसा कार्य किया है, कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
56. मिथ्या अभियोग-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई मिथ्या अभियोग, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाएगा कि यह अभियोग मिथ्या है ; अथवा
(ख) धारा 26 या धारा 27 के अधीन कोई परिवाद करने में कोई ऐसा कथन, जो इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के शील पर आक्षेप करता है, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि वह कथन मिथ्या है अथवा किन्हीं तात्त्विक तथ्यों को जानते हुए और जानबूझकर दबा लेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
57. शासकीय दस्तावेजों का मिथ्याकरण तथा मिथ्या घोषणा-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी ऐसी रिपोर्ट, विवरणी, सूची, प्रमाणपत्र, पुस्तक या अन्य दस्तावेज में जो उसके द्वारा बनाई या हस्ताक्षरित की गई है या जिसकी विषय-वस्तु की यथार्थता का अभिनिश्चय करना उसका कर्तव्य है, कोई मिथ्या या कपटपूर्ण कथन जानते हुए करेगा या किए जाने में संसर्गी होगा, अथवा
(ख) कपट-वंचन करने के आशय से किसी ऐसी दस्तावेज में जो खंड (क) में वर्णित वर्णन की है कोई लोप जानते हुए करेगा या लोप के किए जाने में संसर्गी होगा, अथवा
(ग) जानते हुए और किसी व्यक्ति को क्षति करने के आशय से या जानते हुए और कपट-वंचन करने के आशय से किसी ऐसी दस्तावेज को, जिससे परिरक्षित रखना या पेश करना उसका कर्तव्य है दबा लेगा, विरूपित करेगा, परिवर्तित करेगा या गायब कर देगा, अथवा
(घ) जहां कि किसी बात के बारे में घोषणा करना उसका पदीय कर्तव्य है वहां जानते हुए मिथ्या घोषणा करेगा, अथवा
(ङ) अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई पेंशन, भत्ता या अन्य फायदा या विशेषाधिकार ऐसे कथन से, जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का उसे या तो ज्ञान है या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, अथवा किसी पुस्तक या अभिलेख में कोई मिथ्या प्रविष्टि करके या उसमें की मिथ्या प्रविष्टि का उपयोग करके, अथवा मिथ्या कथन अन्तर्विष्ट करने वाली कोई दस्तावेज बनाकर, अथवा कोई सही प्रविष्टि करने का या सत्य कथन अन्तर्विष्ट रखने वाली दस्तावेज बनाने का लोप करके, अभिप्राप्त करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
58. रिक्त स्थान छोड़ कर हस्ताक्षर करना और रिपोर्ट देने में असफल रहना-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) वेतन, आयुध, गोलाबारूद, उपस्कर, कपड़े, प्रदाय या सामान से या सरकार की किसी सम्पत्ति से सम्बद्ध ऐसी किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते समय किसी तात्विक भाग को जिसके लिए उसका हस्ताक्षर प्रमाणक है, कपटपूर्वक रिक्त छोड़ देगा, अथवा
(ख) ऐसी रिपोर्ट या विवरणी देने या भेजने से, जिसका देना या भेजना उसका कर्तव्य है इन्कार करेगा या वैसा करने का लोप आपराधिक उपेक्षा से करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
59. सेना-न्यायालयों से सम्बद्ध अपराध-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी सेना-न्यायालय के समक्ष साक्षी के तौर पर हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से समनित या आदिष्ट होने पर हाजिर होने में जानबूझकर या युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना व्यतिक्रम करेगा, अथवा
(ख) उस शपथ या प्रतिज्ञान को, जिसके लिए या किए जाने की अपेक्षा सेना-न्यायालय द्वारा वैध रूप से की गई हो, या करने से इन्कार करेगा, अथवा
(ग) अपनी शक्ति या नियंत्रण में की किसी दस्तावेज को, उसके द्वारा पेश या परिदत्त किए जाने की अपेक्षा सेना-न्यायालय द्वारा वैध रूप से की गई हो, पेश या परिदत्त करने से इन्कार करेगा, अथवा
(घ) जब कि वह साक्षी है तब किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने से इन्कार करेगा जिसका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा आबद्ध है, अथवा
(ङ) अपमानकारी या धमकी भरी भाषा का प्रयोग करके, या सेना-न्यायालय की कार्यवाहियों में कोई विघ्न या विक्षोभ कारित करने के द्वारा सेना-न्यायालय के अवमान का दोषी होगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
60. मिथ्या साक्ष्य-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो किसी सेना-न्यायालय या अन्य ऐसे अधिकरण के समक्ष जो शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान कराने के लिए इस अधिनियम के अधीन सक्षम है, सम्यक् रूप से शपथ लेकर या प्रतिज्ञान करके कोई ऐसा कथन करेगा, जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का उसे या तो ज्ञान या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
61. वेतन का विधिविरुद्ध रोक रखना-कोई आफिसर, कानिष्ठ आयुक्त आफिसर, वारण्ट आफिसर या अनायुक्त आफिसर, जो इस अधिनियम के अध्यधीन, किसी व्यक्ति का वेतन प्राप्त करके, उसके शोध्य होने पर उसे विधिविरुद्धतया रोक रखेगा या देने से इन्कार करेगा सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
62. वायुयान और उड़ान के सम्बन्ध के अपराध-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी वायुयान या वायुयान सामग्री को, जो सरकार की है जानबूझकर युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना नुकसान करेगा, नष्ट करेगा या खो देगा, अथवा
(ख) किसी ऐसे कार्य या उपेक्षा का दोषी होगा जिससे ऐसा नुकसान, नाश या खो जाना कारित होना सम्भाव्य है, अथवा
(ग) किसी वायुयान या वायुयान सामग्री का, जो सरकार की है, विधिपूर्ण प्राधिकार के बिना व्ययन करेगा, अथवा
(घ) उड़ान में या किसी वायुयान का उपयोग करने में या किसी वायुयान या वायुयान सामग्री के सम्बन्ध में किसी ऐसे कार्य या उपेक्षा का दोषी होगा जिससे किसी व्यक्ति को जीवन हानि या शारीरिक क्षति कारित होती है या उसका कारित होना संभाव्य है, अथवा
(ङ) युद्ध-स्थिति के दौरान सरकार के किसी वायुयान का, या किसी तटस्थ राज्य के प्राधिकार से या के अधीन परिबद्धकरण या किसी तटस्थ राज्य में नाश जानबूझकर और उचित कारण के बिना या उपेक्षापूर्वक कारित करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जिसमें कि उसने जानबूझकर कार्य किया है, कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने, और किसी अन्य दशा में कारावास, जिसकी पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
63. अच्छी व्यवस्था और अनुशासन का अतिक्रमण-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो किसी ऐसे कार्य या लोप का दोषी है जो, यद्यपि इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट नहीं है तथापि अच्छी व्यवस्था और सैनिक अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
64. प्रकीर्ण अपराध-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई भी अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी चौकी पर या प्रगमन पर समादेशन करते हुए यह परिवाद प्राप्त होने पर कि उसके समादेश के अधीन के किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति को पीटा है या उसके साथ अन्यथा बुरा बर्ताव किया है या उसे सताया है या किसी मेले या बाजार में विघ्न डाला है या कोई बल्वा या अत्याचार किया है, क्षतिग्रस्त व्यक्ति की सम्यक् हानि पूर्ति कराने या मामले की रिपोर्ट उचित प्राधिकारी से करने में असफल रहेगा ; अथवा
(ख) पूजा के किसी स्थान को अपवित्र करके या अन्यथा किसी व्यक्ति के धर्म का साशय अपमान करेगा या उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा ; अथवा
(ग) आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध के किए जाने की दशा में कोई कार्य करेगा ; अथवा
(घ) वारण्ट आफिसर के रैंक से नीचे का होते हुए, जब वह कर्तव्य पर न हो, तब कैम्प या छावनियों में या के आसपास या किसी नगर या बाजार में या के आसपास या किसी नगर या बाजार को जाते हुए या उससे वापस आते हुए, कोई राइफल, तलवार या अन्य आक्रामक शस्त्र ले जाते हुए उचित प्राधिकार के बिना देखा जाएगा ; अथवा
(ङ) किसी व्यक्ति के अभ्यावेशन या सेवा में के किसी व्यक्ति के लिए अनुपस्थिति छुट्टी, प्रोन्नति या कोई अन्य फायदा या अनुग्रह उपाप्त कराने के लिए हेतु, या इनाम के रूप में कोई परितोषण अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत होगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा ; अथवा
(च) उस देश के, जिसमें वह सेवा कर रहा है, किसी वासी या निवासी की सम्पत्ति या उसके शरीर के विरुद्ध कोई अपराध करेगा,
सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
65. प्रयत्न-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो 34 से 64 तक की धाराओं में (जिनके अन्तर्गत ये धाराएं आती हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में अपराध करने की दशा में कोई कार्य करेगा, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में, जिसमें कि ऐसा प्रयत्न दण्डित करने के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है-
तब जब कि किए जाने के लिए प्रयत्नित अपराध मृत्यु से दंडनीय है, कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है भोगने के दायित्व के अधीन होगा, तथा
तब जब कि किए जाने के लिए प्रयत्नित अपराध कारावास से दंडनीय है, कारावास, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
66. किए गए अपराधों का दुष्प्रेरण-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो 34 से 64 की धाराओं में (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं आती हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर उस दशा में, जिसमें कि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया है और इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध ऐसे दुष्प्रेरण को दण्डित करने के लिए नहीं किया गया है उस अपराध के लिए उपबन्धित दण्ड या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
67. मृत्यु से दण्डनीय उन अपराधों का दुष्प्रेरण जो किए न गए हों-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो उन अपराधों में किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा जो धारा 34, 37 और धारा 38 की उपधारा (1) के अधीन मृत्यु से दण्डनीय है, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर उस दशा में, जिसमें कि वह अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है और इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध ऐसे दुष्प्रेरण को दण्डित करने के लिए नहीं किया गया है कारावास, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
68. कारावास से दण्डनीय उन अपराधों का दुष्प्रेरण जो किए न गए हों-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो उन अपराधों में से किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा जो 34 से 64 तक की धाराओं में (जिनके अन्तर्गत यह दोनों धाराएं आती हैं) विनिर्दिष्ट और कारावास से दण्डनीय हैं, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में, जिसमें कि वह अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है और इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध ऐसे दुष्प्रेरण को दण्डित करने के लिए नहीं किया गया है, कारावास, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
69. सिविल अपराध-धारा 70 के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो भारत में या भारत से परे किसी स्थान में सिविल अपराध करेगा इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध का दोषी समझा जाएगा और यदि वह अपराध इस धारा के अधीन उस पर आरोपित" किया जाए तो वह सेना-न्यायालय द्वारा विचारण किए जाने के दायित्व के अधीन होगा और दोषसिद्धि पर निम्नलिखित रूप से दण्डनीय होगा, अर्थात् :-
(क) यदि अपराध ऐसा है जो भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन मृत्यु से या निर्वासन से दण्डनीय है तो वह कोड़े लगाने के दण्ड से भिन्न कोई दण्ड, जो उस अपराध के लिए पूर्वोक्त विधि द्वारा समनुदिष्ट है या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, और
(ख) अन्य किसी दशा में वह कोड़े लगाने के दण्ड से भिन्न कोई दण्ड, जो भारत में प्रवृत्त विधि द्वारा उस अपराध के लिए समनुदिष्ट है या कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दंड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा ।
70. सिविल अपराध जो सेना-न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं हैं-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो सैनिक, नौसैनिक या वायु सेना विधि के अध्यधीन नहीं है, हत्या का या ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध का या ऐसे व्यक्ति से बलात्संग करने का अपराध करेगा इस अधिनियम के विरुद्ध किसी अपराध का दोषी तब के सिवाय न समझा जाएगा और सेना-न्यायालय द्वारा उसका विचारण तब के सिवाय नहीं किया जाएगा जब कि वह उक्त अपराधों में से कोई अपराध-
(क) सक्रिय सेवा पर रहते समय करता है, अथवा
(ख) भारत के बाहर किसी स्थान पर करता है, अथवा
(ग) ऐसी सीमांत चौकी पर करता है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की गई हो ।
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अध्याय 7
दण्ड
71. सेना-न्यायालयों द्वारा अधिनिर्णेय दण्ड-इस अधिनियम के अध्यधीन के व्यक्तियों द्वारा, जो सेना-न्यायालयों द्वारा सिद्धदोष ठहराए गए हैं, किए गए अपरोधों के बारे में दण्ड निम्नलिखित मापमान के अनुसार दिए जा सकेंगे, अर्थात् :-
(क) मृत्यु ;
(ख) आजीवन या सात वर्ष से अन्यून की किसी कालावधि के लिए निर्वासन ;
(ग) चौदह वर्ष से अनधिक की किसी कालावधि के लिए, कठिन या सादा कारावास,
(घ) आफिसरों की दशा में सकलंक पदच्युत किया जाना ;
(ङ) सेना से पदच्युति ;
(च) वारण्ट आफिसरों की दशा में, सामान्य सैनिकों में या निम्नतर रैंक या श्रेणी में या उनके रैंक की सूची में के किसी निम्नतर स्थान पर अवनत कर देना, और अनायुक्त आफिसरों की दशा में सामान्य सैनिकों में या किसी निम्नतर रैंक या श्रेणी में अवनत कर देना ;
परन्तु सामान्य सैनिकों में अवनत किए गए वारण्ट आफिसर से सामान्य सैनिकों में सिपाही के रूप में सेवा करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी;
(छ) आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारण्ट आफिसरों और अनायुक्त आफिसरों की दशा में, रैंक में की ज्येष्ठता का समपहरण, तथा उनमें से किसी ऐसे की दशा में जिसकी प्रोन्नति सेवाकाल की लम्बाई पर निर्भर है उसके सेवाकाल का इसलिए पूर्णतः या भागतः समपहरण कि वह प्रोन्नति के प्रयोजन के लिए न गिनी जाए :
(ज) सेवाकाल का इसलिए समपहरण कि वह वेतन वृद्धि, पेंशन या किसी अन्य विहित प्रयोजन के लिए न गिना जाए ;
(झ) आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारण्ट आफिसरों और अनायुक्त आफिसरों, की दशा में तीव्र-धिग्दण्ड या धिग्दण्ड ;
(ञ) सक्रिय सेवा के दौरान किए गए किसी अपराध के लिए तीन मास से अनधिक की कालावधि के लिए वेतन और भत्तों का समहपरण ;
(ट) सकलंक पदच्युत किए जाने से या सेवा से पदच्युति से दण्डित व्यक्ति की दशा में वेतन और भत्तों के उन सब बकायों और अन्य लोक धन का समपहरण, जो ऐसे सकलंक पदच्युत किए जाने के या ऐसी पदच्युति के समय उसको शोध्य हों ;
(ठ) वेतन और भत्तों का तब तक के लिए रोक दिया जाना जब तक उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति न हो जाए जो उस अपराध के कारण हुआ है जिसका वह सिद्धदोष ठहराया गया है ।
72. सेना-न्यायालय द्वारा अधिनिर्णेय आनुकल्पिक दण्ड-इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि सेना-न्यायालय इस अधिनियम के अध्यधीन के उस व्यक्ति को, धाराओं 34 से 68 तक में, जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी आती हैं, विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी का सिद्धदोष ठहराने पर, या तो वह विशिष्ट दण्ड जिससे उक्त धाराओं में वह अपराध दण्डनीय कथित है, या उसके बदले में धारा 71 में दिए गए मापमान में के दण्डों में से कोई निम्नतर दण्ड अपराध की प्रकृति और मात्रा को ध्यान में रखते हुए, अधिनिर्णीत कर सकेगा ।
73. दण्डों का संयोजन-सेना-न्यायालय का दण्डादेश, किसी एक अन्य दण्ड के अतिरिक्त या बिना, धारा 71 के खण्ड (घ) या खण्ड (ङ) में विनिर्दिष्ट दण्ड, और उस धारा के खण्ड (च) से (ठ) तक में विनिर्दिष्ट दण्डों में से कोई एक या अधिक दण्ड अधिनिर्णीत कर सकेगा ।
74. आफिसरों का सकलंक पदच्युत किया जाना-किसी आफिसर को धारा 71 के खण्ड (क) से (ग) तक में विनिर्दिष्ट दण्डों में से कोई दण्ड अधिनिर्णीत किए जाने के पहले सकलंक पदच्युत किए जाने का दण्डादेश दिया जाएगा ।
75. [फील्ड दण्डट-1992 के अधिनियम सं० 37 की धारा 2 द्वारा निरसित ।]
76. [दण्डों के मापमान में फील्ड दण्ड की स्थिति ।]-1992 के अधिनियम सं० 37 की धारा 2 द्वारा निरसित ।]
77. वारण्ट आफिसर या अनायुक्त आफिसर की दशा में कतिपय दण्डों का परिणाम-ऐसा वारण्ट आफिसर या अनायुक्त आफिसर जिसे सेना-न्यायालय द्वारा निर्वासन, कारावास, *** या सेवा से पदच्युति का दण्डादेश दिया गया है, सामान्य सैनिकों में अवनत कर दिया गया समझा जाएगा ।
78. सक्रिय सेवा पर दोषसिद्ध किए गए व्यक्ति का सामान्य सैनिकों में प्रतिधारण-जब कि किसी अभ्यावेशित व्यक्ति को उस समय के दौरान जब कि वह सक्रिय सेवा पर है, सेना-न्यायालय द्वारा पदच्युति का या पदच्युति सहित या रहित निर्वासन या कारावास का दण्डादेश दिया गया हो, तब विहित आफिसर निदेश दे सकेगा कि ऐसे व्यक्ति को सामान्य सैनिकों में सेवा करने के लिए प्रतिधृत रखा जाए और ऐसी सेवा उसकी निर्वासन या कारावास की, यदि कोई हो, अवधि के भाग के रूप में गिनी जाएगी ।
79. सेना-न्यायालय द्वारा दण्डित किए जाने से अन्यथा दण्डित किया जाना-इस अधिनियम के अध्यधीन के व्यक्तियों द्वारा किए गए अपराधों के बारे में दण्ड, सेना-न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना और धाराओं 80, 83, 84 और 85 में कथित रीति से भी दिए जा सकेंगे ।
80. आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों और वारण्ट आफिसरों से भिन्न व्यक्तियों का दण्डित किया जाना-धारा 81 के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि कमान आफिसर या ऐसा अन्य आफिसर, जिसे [थल सेनाध्यक्षट ने केन्द्रीय सरकार की सम्मति से, विनिर्दिष्ट किया हो, इस अधिनियम के अध्यधीन व्यक्ति के विरुद्ध जो आफिसर, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर या वारण्ट आफिसर के रूप से अन्यथा जिस पर इस अधिनियम के किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति को निम्नलिखित दण्डों में से एक या अधिक दण्ड विहित विस्तार तक अधिनिर्णीत कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) सैनिक अभिरक्षा के अट्ठाईस दिन तक का कारावास ;
(ख) अट्ठाईस दिन तक का निरोध ;
(ग) अट्ठाईस दिन तक का लाइन्स में परिरोध ;
(घ) अतिरिक्त पहरा या ड्यूटी ;
(ङ) नियुक्तिसम पद से या कोर वेतन से या कर्मिक वेतन से वंचित करना और अनायुक्त आफिसरों की दशा में कार्यकारी रैंक से वंचित करना या वेतन की निम्नतर श्रेणी में अवनत भी करना ;
(च) सुसेवा वेतन और सदाचरण वेतन का समपहरण ;
(छ) तीव्र-धिग्दण्ड या धिग्दण्ड ;
(ज) किसी एक मास में चौदह दिन के वेतन तक का जुर्माना ;
(झ) धारा 91 के खण्ड (छ) के अधीन शास्तिक कटौतियां :
। । । ।
81. धारा 80 के अधीन दण्डों की परिसीमा- । । । ।
(2) उक्त धारा के खण्ड (क), (ख), (ग) और (घ) में विनिर्दिष्ट दण्डों में से दो या अधिक के अधिनिर्णयन की दशा में खण्ड (ग) या खण्ड (घ) में विनिर्दिष्ट दण्ड खण्ड (क) या खण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट दण्ड के खत्म होने पर ही प्रभावशील होगा ।
(3) जब कि किसी व्यक्ति को उक्त खण्डों (क), (ख) और (ग) में विनिर्दिष्ट दण्डों में से दो या अधिक दण्ड संयुक्ततः अधिनिर्णीत किए गए हों या तब अधिनिर्णीत किए गए हों जब वह उक्त दण्डों में से एक या अधिक पहले से ही भोग रहा हो, तब उन दण्डों का सम्पूर्ण विस्तार कुल मिलाकर वयालीस दिन से अधिक नहीं होगा ।
(4) धारा 80 के खण्डों [(क), (ख) और (ग)] में विनिर्दिष्ट दण्ड किसी ऐसे व्यक्ति को अधिनिर्णीत नहीं किए जाएंगे जो अनायुक्त आफिसर के रैंक का है या जो उस अपराध को करते समय जिसके लिए उसे दण्डित किया जाता है, ऐसे रैंक का था ।
(5) उक्त धारा के खण्ड (छ) में विनिर्दिष्ट दण्ड अनायुक्त आफिसर के रैंक से नीचे के किसी व्यक्ति को अधिनिर्णीत नहीं किया जाएगा ।
82. धारा 80 में विनिर्दिष्ट दण्डों के अतिरिक्त दण्ड- [थल सेनाध्यक्षट केन्द्रीय सरकार की सम्मति से ऐसे अन्य दण्ड, जो धारा 80 में विनिर्दिष्ट दण्डों में से किसी के अतिरिक्त या बिना उक्त धारा के अधीन अधिनिर्णित किए जा सकेंगे और वह विस्तार, जिस तक ऐसे अन्य दण्ड अधिनिर्णीत किए जा सकेंगे, विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
83. बिग्रेड कमाण्डरों और अन्यों द्वारा आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों और वारण्ट आफिसरों का दण्डित किया जाना-ऐसा आफिसर, जो बिग्रेड कमाण्डर या समतुल्य कमाण्डर से कम शक्ति नहीं रखता या ऐसा अन्य आफिसर, जिसे 1[थल सेनाध्यक्षट केन्द्रीय सरकार की सम्मति से विनिर्दिष्ट करे, फील्ड आफिसर के रैंक से नीचे के ऐसे आफिसर, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर या वारण्ट आफिसर के विरुद्ध, जिस पर इस अधिनियम के अधीन अपराध का आरोप हो, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और निम्नलिखित दण्डों में से एक या अधिक दण्ड अधिनिर्णीत कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) तीव्र-धिग्दण्ड या धिग्दण्ड,
(ख) वेतन और भत्तों का तब तक के लिए रोक दिया जाना जब तक उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति न हो जाए जो उस अपराध के कारण हुआ है जिसका वह सिद्धदोष ठहराया गया है ।
84. एरिया कमाण्डरों और अन्यों द्वारा आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों और वारण्ट आफिसरों का दण्डित किया जाना-ऐसा आफिसर, जो एरिया कमाण्डर या समतुल्य कमाण्डर से कम शक्ति नहीं रखता या ऐसा आफिसर, जो जनरल सेना-न्यायालय संयोजित करने के लिए सशक्त हो या ऐसा अन्य आफिसर, जिसे 1[थल सेनाध्यक्षट केन्द्रीय सरकार की सम्मति से विनिर्दिष्ट करे लेफ्टीनेन्ट कर्नल, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर या वारण्ट आफिसर के रैंक से नीचे के किसी ऐसे आफिसर के विरुद्ध जिस पर इस अधिनियम के अधीन अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और निम्नलिखित दण्डों में से एक या अधिक दण्ड अधिनिर्णीत कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) ज्येष्ठता का समपहरण, या उनमें से किसी ऐसे की दशा में जिसकी प्रोन्नति सेवाकाल की लम्बाई पर निर्भर है बारह मास से अनधिक की कालावधि के सेवाकाल का इसलिए समपहरण कि वह प्रोन्नति के प्रयोजन के लिए न गिना जाए, किन्तु यह बात दण्ड अधिनिर्णीत किए जाने के पूर्व अभियुक्त के यह निर्वाचन करने के अधिकार के अध्यधीन होगी कि उसका विचारण सेना-न्यायालय द्वारा किया जाए,
(ख) तीव्र-धिग्दण्ड या धिग्दण्ड,
(ग) वेतन और भत्तों का तब तक के लिए रोक दिया जाना जब तक उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति न हो जाए जो उस अपराध के कारण हुआ है जिसका वह सिद्धदोष ठहराया गया है ।
85. कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों का दण्डित किया जाना-कमान आफिसर या अन्य ऐसा आफिसर जिसे 1[थल सेनाध्यक्षट ने केन्द्रीय सरकार की सम्मति से विनिर्दिष्ट किया हो, ऐसे कनिष्ठ आयुक्त आफिसर के विरुद्ध जिस पर इस अधिनियम के अधीन अपराध का आरोप है, कार्यवाही विहित रीति से कर सकेगा [और निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड अधिनिर्णीत कर सकेगा, अर्थात् :-
(त्) तीव्र-धिग्दंड या धिग्दंड ;
(त्त्) वेतन और भत्तों को तब के लिए रोक देना जब तक उस साबित हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति न हो जाए, जो उस अपराध के कारण हुआ है जिसका वह सिद्धोदोष ठहराया गया है :
परन्तु खंड (त्) में विनिर्दिष्ट दंड उस दशा में अधिनिर्णीत नहीं किया जाएगा यदि कमान आफिसर या ऐसा अन्य आफिसर कर्नल के रैंक से नीचे का है ।]
86. कार्यवाहियों का पारेषण-हर ऐसे मामले में जिसमें दण्ड धाराओं 83, 84 और 85 में से किसी के अधीन अधिनिर्णीत किया गया है, कार्यवाही की प्रमाणित शुद्ध प्रतियां दण्ड अधिनिर्णीत करने वाले आफिसर द्वारा धारा 88 में यथापरिभाषित वरिष्ठ सैनिक अधिकारी को विहित रीति से भेजी जाएंगी ।
87. कार्यवाही का पुनर्विलोकन-यदि धाराओं 83, 84 और 85 में से किसी के अधीन अधिनिर्णीत कोई दण्ड, धारा 88 में यथापरिभाषित वरिष्ठ सैनिक प्राधिकारी को अवैध, अन्यापूर्ण या अत्यधिक प्रतीत होता है तो वह प्राधिकारी दण्ड को रद्द कर सकेगा, उसमें फेरफार कर सकेगा या उसका परिहार कर सकेगा और ऐसा अन्य निदेश दे सकेगा जो उस मामले की परिस्थितियों में समुचित हो ।
88. वरिष्ठ सैनिक प्राधिकारी-धाराओं 86 और 87 के प्रयोजन के लिए, वरिष्ठ सैनिक प्राधिकारी" से अभिप्रेत है-
(क) कमान आफिसर द्वारा अधिनिर्णीत दण्डों की दशा में कोई ऐसा आफिसर जो ऐसे कमान आफिसर से समादेश में वरिष्ठ हो,
(ख) किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा अधिनिर्णीत दण्डों की दशा में, केन्द्रीय सरकार, 1[थल सेनाध्यक्षट अथवा 1[थल सेनाध्यक्षट द्वारा विनिर्दिष्ट अन्य आफिसर ।
89. सामूहिक जुर्माने-(1) जब कभी कोई शास्त्र या शास्त्र का भाग, जो किसी अर्ध स्कवाड्रन, बैटरी, कम्पनी, या अन्य ऐसी ही यूनिट के उपस्कर का भाग है, खो जाता है या चोरी हो जाता है, तब उस सेना, कोर, डिवीजन या स्वतंत्र बिग्रेड का जिसकी वह यूनिट है, समादेश करने वाला आफिसर जांच अधिकरण की रिपोर्ट अभिप्राप्त करने के पश्चात् ऐसी यूनिट के कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारण्ट आफिसरों, अनायुक्त आफिसरों और ऐसे यूनिटों के जवानों पर या उनमें से उतनों पर, जितने उसके निर्णय में ऐसे खो जाने या चोरी के लिए उत्तरदायी ठहराए जाने चाहिए सामूहिक जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा ।
(2) ऐसा जुर्माना, उन व्यक्तियों के, जिन पर वह पड़ता है, वेतन पर प्रतिशतता के रूप में निर्धारित किया जाएगा ।
अध्याय 8
शास्तिक कटौतियां
90. आफ़िसरों के वेतन और भत्तों में से कटौतियां-किसी भी आफिसर के वेतन और भत्तों में से निम्नलिखित शास्तिक कटौतियां की जा सकेंगी, अर्थात् :-
(क) उस हर दिन के लिए, जिस दिन वह छुट्टी के बिना अनुपस्थित रहता है आफिसर को शोध्य सभी वेतन और भत्ते तब के सिवाय जब कि उसके कमान आफिसर को समाधानप्रद स्पष्टीकरण दे दिया गया है और केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित कर दिया गया है,
(ख) ऐसे हर दिन के सभी वेतन और भत्ते जब वह किसी ऐसे अपराध के आरोप पर अभिरक्षाधीन या कर्तव्य से विलम्बित रहा है जिस अपराध के लिए वह तत्पश्चात् किसी दण्ड न्यायालय या सेना न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो धारा 83 या धारा 84 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है दोषसिद्ध किया जाता है,
(ग) इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के उस वेतन की जो उसने विधिविरुद्ध रूप से प्रतिधृत कर रखा है या जिसे देने से उसने विधिविरुद्ध रूप से इन्कार कर दिया है, प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित कोई राशि,
(घ) किसी अपराध के किए जाने से हुए किन्हीं व्ययों, हानि, नुकसान या नाश के लिए ऐसे प्रतिकर की, जो उस सेना-न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा वह ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठरराया जाता है, या किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो धारा 83 या धारा 84 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है अवधारित किया जाए, प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित कोई राशि,
(ङ) वे सब वेतन और भत्ते जिनके समपहरण या रोक दिए जाने का आदेश किसी सेना-न्यायालय [द्वाराट दिया गया हो,
(च) किसी दण्ड न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे सेना-न्यायालय द्वारा जो धारा 69 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग कर रहा है अधिनिर्णीत जुर्माने के संदाय के लिए अपेक्षित कोई राशि,
(छ) लोक-सम्पत्ति या रेजिमेन्ट-सम्पत्ति की किसी ऐसी हानि, नुकसान या नाश की जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार को सम्यक् अन्वेषण के पश्चात् यह प्रतीत होता है कि वह उस आफिसर के सदोष कार्य से या उपेक्षा से घटित हुआ है, प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित कोई राशि,
(ज) केन्द्रीय-सरकार के आदेश से समपहृत सब वेतन और भत्ते, यदि [थल सेनाध्यक्षट द्वारा उस निमित्त गठित जांच अधिकरण का यह निष्कर्ष हो कि वह आफिसर शत्रु से जा मिला था या जब वह शत्रु के हाथ में था तब उसने शत्रु की ओर से या शत्रु के आदेशों के अधीन सेवा की थी या उसने किसी रीति में शत्रु की सहायता की थी या सम्यक् पूर्वावधानी न बरत कर या आदेशों की अवज्ञा या कर्तव्य की जानबूझकर उपेक्षा करने द्वारा उसने स्वयं को शत्रु द्वारा कैदी बना लिया जाने दिया था या शत्रु द्वारा कैदी बना लिए जाने पर तब जब उसके लिए अपनी सेवा पर वापस आ जाना सम्भव था, वह ऐसा करने में असफल रहा था,
(झ) केन्द्रीय सरकार [या किसी विहित आफिसरट के आदेश द्वारा उसकी पत्नी या उसकी धर्मज या अर्धमज सन्तान के भरण-पोषण के लिए दिए जाने के लिए या उक्त सरकार द्वारा उक्त पत्नी या सन्तान को दी गई सहायता के खर्चे के निमित्त दिए जाने के लिए अपेक्षित कोई राशि ।
91. आफ़िसरों से भिन्न व्यक्तियों के वेतन और भत्तों में से कटौतियां-धारा 94 के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि आफिसर से भिन्न इस अधिनियम के अध्यधीन किसी भी व्यक्ति के वेतन और भत्तों में से निम्नलिखित शास्तिक कटौतियां की जा सकेंगी, अर्थात् :-
(क) अभित्यन पर या छुट्टी बिना या युद्ध कैदी होने के कारण अनुपस्थिति के हर दिन के लिए और किसी भी दंड न्यायालय, सेना-न्यायालय या किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो धारा 80 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है अधिनिर्णीत निर्वासन या कारावास के *** हर दिन के लिए सब वेतन और भत्ते,
(ख) हर ऐसे दिन के सब वेतन और भत्ते जब कि वह किसी ऐसे अपराध के आरोप पर जिसके लिए वह तत्पश्चात् किसी दंड-न्यायालय द्वारा या सेना-न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराया जाता है या छुट्टी बिना ऐसी अनुपस्थिति के आरोप पर जिसके लिए तत्पश्चात् उसे किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो धारा 80 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है कारावास 1*** अधिनिर्णीत किया जाता है, अभिरक्षा में रहा है,
(ग) हर ऐसे दिन के सब वेतन और भत्ते जब वह ऐसी रुग्णता के कारण अस्पताल में रहा है जिसकी बाबत उसकी परिचर्या करने वाले चिकित्सा आफिसर द्वारा यह प्रमाण दिया गया है कि वह उसके द्वारा किए गए इस अधिनियम के अधीन के किसी अपराध से कारित हुई है,
(घ) हर ऐसे दिन के लिए, जब वह ऐसी रुग्णता के कारण अस्पताल में रहा है जिसकी बाबत उसकी परिचर्या करने वाले चिकित्सा आफिसर द्वारा यह प्रमाणपत्र दिया गया है कि वह उसके अपने अवचार या प्रज्ञाहीनता से कारित हुई है, उतनी राशि जितनी केन्द्रीय सरकार के या ऐसे आफिसर के, जो उस सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए,
(ङ) वे सब वेतन और सब भत्ते जिनके समपहरण या रोक दिए जाने का आदेश किसी सेवा-न्यायालय या किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो धाराओं 80, 83, 84 और 85 में से किसी के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है, दिया गया है,
(च) शत्रु से उसका उद्धार किए जाने के और सेवा से उसकी ऐसी पदच्युति के, जो शत्रु द्वारा उसके कैदी बनाए जाने के समय के या शत्रु के हाथ में उसके रहने के दौरान के उसके आचरण के परिणामस्वरूप हुई है बीच के हर दिन के सब वेतन और भत्ते,
(छ) केन्द्रीय सरकार को या किसी निर्माण या सम्पत्ति को उसके द्वारा कारित व्ययों, हानि, नुकसान या नाश के लिए ऐसे प्रतिकर की जो उसके कमान आफिसर द्वारा अधिनिर्णीत की जाए, प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित कोई राशि,
(ज) किसी दण्ड-न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे सेना-न्यायालय द्वारा या जो धारा 69 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग कर रहा है सेना-न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो धारा 80 और 89 में से किसी के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है अधिनिर्णीत जुर्माने के संदाय के लिए अपेक्षित कोई राशि,
(झ) केन्द्रीय सरकार के या किसी विहित आफिसर के आदेश द्वारा उसकी पत्नी या उसकी धर्मज या अधर्मज सन्तान के भरण-पोषण के लिए दिए जाने के लिए या उक्त सरकार द्वारा उक्त पत्नी या सन्तान को दी गई सहायता के खर्चे के निमित्त दिए जाने के लिए अपेक्षित कोई राशि ।
92. अनुपस्थिति या अभिरक्षा के समय की संगणना-धारा 91 के खण्ड (क) और (ख) के प्रयोजनों के लिए-
(क) किसी भी व्यक्ति को एक दिन के लिए अनुपस्थित या अभिरक्षा में तब तक नहीं माना जाएगा जब तक कि अनुपस्थिति या अक्षिरक्षा, चाहे पूर्णतः एक दिन में या भागतः एक दिन में और भागतः किसी अन्य दिन में, लगातार छह या अधिक घंटों तक न रही हो,
(ख) एक दिन से कम की अनुपस्थिति या अभिरक्षा को एक दिन की अनुपस्थिति या अभिरक्षा गिना जा सकेगा यदि ऐसी अनुपस्थिति या अभिरक्षा ने उस अनुपस्थित व्यक्ति को किसी ऐसे सैनिक कर्तव्य की पूर्ति करने से निवारित किया है जो उस कारण किसी अन्य व्यक्ति पर डाला गया है,
(ग) लगातार बारह या अधिक घंटों की अनुपस्थिति या अभिरक्षा को उस हर एक पूरे दिन की अनुपस्थिति या अभिरक्षा गिना जा सकेगा जिसके किसी प्रभाग के दौरान वह व्यक्ति अनुपस्थित था या अभिरक्षा में रहा था,
(घ) अनुपस्थिति या कारावास की कालावधि को जो मध्य रात्रि के पूर्व प्रारम्भ और पश्चात् समाप्त हो एक दिन गिना जा सकेगा ।
93. विचारण के दौरान वेतन और भत्ते-इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो किसी अपराध के आरोप पर अभिरक्षा में है या कर्तव्य से निलम्बित है विहित आफिसर निदेश दे सकेगा कि, धारा 90 और 91 के खण्ड (ख) के उपबन्धों को क्रियान्िवत करने के लिए, ऐसे व्यक्ति के पूरे वेतन और भत्ते या उनका कोई भाग उस आरोप के जो उसके विरुद्ध है, विचारण का परिणाम लम्बित रहने तक विधारित रखे जाएं ।
94. कतिपय कटौतियों की परिसीमा-किसी व्यक्ति के वेतन और भत्तों में से धारा 91 के खण्डों (ङ) और (छ) से (झ) तक के अधीन की गई कुल कटौतियां तब के सिवाय जब कि वह पदच्युति से दण्डादिष्ट किया गया हो, किसी एक मास में उसके उस मास के वेतन और भत्तों के आधे से अधिक नहीं होगी ।
95. किसी व्यक्ति को शोध्य लोक-धन में से कटौती-किसी व्यक्ति के वेतन और भत्तों में से काटी जाने के लिए इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई राशि, उसे वसूल करने के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना पेंशन से भिन्न किसी ऐसे लोक-धन में से काटी जा सकेगी जो उसे शोध्य है ।
96. युद्ध कैदी के आचरण की जांच के दौरान उसके वेतन और भत्ते-जहां कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के उस समय के आचरण की जांच, जब कि वह शत्रु द्वारा कैदी बनाया जा रहा था या जबकि वह शत्रु के हाथों में था, इस अधिनियम या किसी अन्य विधि के अधीन की जानी है वहां [थल सेनाध्यक्षट या उसके द्वारा प्राधिकृत कोई आफिसर आदेश दे सकेगा कि ऐसे व्यक्ति के पूरे वेतन और भत्ते या उनका कोई भाग उस जांच का परिणाम लम्बित रहने तक विधारित रखे जाएं ।
97. कटौतियों का परिहार-वेतन और भत्तों में से इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत किसी कटौती का परिहार ऐसी रीति से और इतने विस्तार तक तथा ऐसे प्राधिकारी द्वारा किया जा सकेगा जो समय-समय पर विहित किया जाए ।
98. परिहारित कटौतियों में से युद्ध कैदी के आश्रितों के लिए उपबन्ध-इस अधिनियम के अध्यधीन के उन सब व्यक्तियों की दशा में, जो ऐसे युद्ध कैदी हैं जिनके वेतन और भत्ते धारा 90 के खण्ड (ज) या धारा 91 खण्ड (क) के अधीन समपहृत किए गए हैं किन्तु जिनकी बाबत धारा 97 के अधीन कोई परिहार किया गया है, यह विधिपूर्ण होगा कि विहित प्राधिकारियों द्वारा ऐसे व्यक्तियों के किन्हीं आश्रितों के लिए उचित उपबन्ध ऐसे वेतन और भत्तों से किया जाए और उस दशा में वह परिहार ऐसे वेतन और भत्तों में से ऐसा करने के पश्चात् जो कुछ बाकी बचे उतने को ही लागू समझा जाएगा ।
99. युद्ध कैदी के वेतन और भत्तों में से उसके आश्रितों के लिए उपबन्ध-यह विधिपूर्ण होगा कि इस अधिनियम के अध्यधीन का जो कोई व्यक्ति युद्ध कैदी है या लापता है, उसके किन्हीं आश्रितों के लिए उचित उपबन्ध विहित प्राधिकारियों द्वारा उसके वेतन और भत्तों में से किया जाए ।
100. वह कालावधि जिसके दौरान कोई व्यक्ति युद्ध कैदी समझा जाता है-किसी व्यक्ति की बाबत धाराओं 98 और 99 के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि जब तक उसके आचरण की ऐसी जांच जैसी धारा 96 में निर्दिष्ट है, समाप्त नहीं हो जाती तब तक और यदि वह ऐसे आचरण के परिणामस्वरूप सकलंक पदच्युत किया जाता है या सेवा से पदच्युत किया जाता है तो ऐसे सकलंक पच्युत किया जाने की या पदच्युत किए जाने की तारीख तक युद्ध कैदी बना रहा है ।
अध्याय 9
गिरफ्तारी तथा विचारण के पूर्व की कार्यवाहियां
101. अपराधियों की अभिरक्षा-(1) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जिस पर किसी अपराध का आरोप है, सैनिक अभिरक्षा में लिया जा सकेगा ।
(2) ऐसे किसी व्यक्ति को सैनिक अभिरक्षा में लिए जाने का आदेश किसी भी वरिष्ठ आफिसर द्वारा दिया जा सकेगा ।
(3) कोई आफिसर यह आदेश दे सकेगा कि किसी भी आफिसर को, भले ही वह उच्चतर रैंक का हो, जो झगड़ा, दंगा या उपद्रव करने में लगा हो, सैनिक अभिरक्षा में लिया जाए ।
102. निरोध के सम्बन्ध में कमान आफ़िसर का कर्तव्य-(1) हर कमान आफिसर का यह कर्तव्य होगा कि वह इस बात की सतर्कता बरते कि जो व्यक्ति उसके समादेश के अधीन है, उस पर किसी अपराध का आरोप लगाए जाने पर वह व्यक्ति उस आरोप का अन्वेषण किए गए बिना उस समय के पश्चात्, जब उस व्यक्ति की अभिरक्षा में सुपुर्द किए जाने की रिपोर्ट ऐसे आफिसर को की गई है, तब के सिवाय जब कि अड़तालीस घंटे के अन्दर ऐसे अन्वेषण का किया जाना लोक सेवा की दृष्टि से उसे असाध्य प्रतीत होता हो, अड़तालीस घंटे से अधिक के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध न किया जाए ।
(2) हर ऐसे व्यक्ति के मामले की, जो अड़तालीस घंटों से अधिक की कालावधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध किया हुआ है और ऐसे निरुद्ध किए जाने के कारण की रिपोर्ट कमान आफिसर द्वारा उस जनरल या अन्य आफिसर को की जाएगी जिससे उस व्यक्ति का जिस पर आरोप है विचारण करने के लिए जनरल या डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय संयोजित करने का आवेदन किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अड़तालीस घंटों की कालावधि की गणना करने में रविवार और अन्य लोकावकाश दिन अपवर्जित किए जाएंगे ।
(4) इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार वह रीति और वह कालावधि उपबन्धित करने वाले नियम बना सकेगी जिसमें और जिसके लिए कि वह कोई भी व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अध्यधीन है, उसके द्वारा किए गए किसी अपराध के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा किए जाने वाले विचारण के लम्बित रहने तक सैनिक अभिरक्षा में लिया और निरुद्ध किया जा सकेगा ।
103. सुपुर्दगी और सेना-न्यायालय के समवेत होने के आदेश के बीच का अन्तराल-हर ऐसे मामले में जिसमें ऐसा कोई व्यक्ति जो धारा 101 में वर्णित है और सक्रिय सेवा पर नहीं है, उसके विचारण के लिए सेना-न्यायालय के समवेत होने का आदेश हुए बिना, ऐसी अभिरक्षा में आठ दिन से दीर्घतर कालावधि के लिए रहे तो उसके कमान आफिसर द्वारा विलम्ब का कारण देने वाली एक विशेष रिपोर्ट, विहित रीति में की जाएगी और ऐसी ही रिपोर्ट हर आठ दिन के अन्तरालों पर तब तक भेजी जाएगी जब तक सेना-न्यायालय समवेत न हो जाए या उस व्यक्ति को अभिरक्षा से निर्मुक्त न कर दिया जाए ।
104. सिविल प्राधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी-जब कभी इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है, किसी मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर की अधिकारिता के अन्दर है तब ऐसा मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर उस व्यक्ति के पकड़े जाने और सैनिक अभिरक्षा में दिए जाने में सहायता उसके कमान आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित उस भाव के लिखित आवेदन की प्राप्ति पर करेगा ।
105. अभित्याजकों को पकड़ना-(1) जब कभी इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति अभित्यजन करे तब उस कोर, विभाग या टुकड़ी की, जिसका वह अंग है, कमान आफिसर अभित्यजन की लिखित इत्तिला ऐसे सिविल प्राधिकारियों को देगा जो उसकी राय में अभित्याजक को पकड़ने में सहायता देने में समर्थ हों, और तदुपरि वे प्राधिकारी उक्त अभित्याजक को पकड़ने के लिए उसी रीति से कार्यवाही करेंगे मानो वह ऐसा व्यक्ति है जिसे पकड़ने के लिए किसी मजिस्ट्रेट द्वारा वारण्ट निकाला गया है और अभित्याजक के पकड़ लिए जाने पर उसे सैनिक अभिरक्षा में दे देंगे ।
(2) कोई भी पुलिस आफिसर किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके बारे में युक्तियुक्त रूप से यह विश्वास है कि वह इस अधिनियम के अध्यधीन का है और अभित्याजक है या प्राधिकार के बिना यात्रा कर रहा है, बिना वारण्ट गिफ्तार कर सकेगा और विधि के अनुसार बरते जाने के लिए उसे अविलम्ब निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष लाएगा ।
106. छुट्टी बिना अनुपस्थित रहने की जांच-(1) जबकि इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति सम्यक् प्राधिकार के बिना तीस दिन की कालावधि पर्यन्त अपने कर्तव्य से अनुपस्थित रहा है तब तक जांच अधिकरण यथासाध्य शीघ्र समवेत किया जाएगा और वह अधिकरण उस व्यक्ति की अनुपस्थिति के बारे में और उसकी देखरेख के लिए न्यस्त की हुई सरकारी सम्पत्ति में या किन्हीं आयुधों, गोलाबारूद, उपस्कर, उपकरणों, कपड़ों या आवश्यक वस्तुओं में हुई कमी (यदि कोई हो) के बारे में जांच विहित रीति से दिलाई गई शपथ या कराए गए प्रतिज्ञान पर करेगा, और यदि उसका इस तथ्य की बाबत समाधान हो जाए कि अनुपस्थिति सम्यक् प्राधिकार या अन्य पर्याप्त हेतुक के बिना हुई है तो अधिकरण उस उपस्थिति और उसकी कालावधि की तथा उक्त कमी की (यदि कोई हो) घोषणा करेगा तथा उस कोर या विभाग का, जिसका वह व्यक्ति अंग है, कमान आफिसर उस घोषणा के अभिलेख को उस कोर या विभाग की सेना-न्यायालय पुस्तिका में प्रविष्ट करेगा ।
(2) यदि वह व्यक्ति जो अनुपस्थित घोषित किया गया है तत्पश्चात् न तो अभ्यर्पण करता है और न पकड़ा जाता है तो वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अभित्याजक समझा जाएगा ।
107. प्रोवो मार्शल-(1) प्रोवो मार्शल [थल सेनाध्यक्षट द्वारा या किसी विहित आफिसर द्वारा नियुक्त किए जा सकेंगे ।
(2) प्रोवो मार्शल के कर्तव्य हैं किसी अपराध के लिए परिरुद्ध व्यक्तियों को अपने भारसाधन में लेना और उन व्यक्तियों में जो नियमित सेना में सेवा करते हैं या उससे संलग्न हैं, सुव्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना तथा उनका उनके द्वारा भंग किया जाना निवारित करना ।
(3) कोई प्रोवो मार्शल इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी ऐसे व्यक्ति को, जो कोई अपराध करता है या जिस पर किसी अपराध का आरोप है, विचारण के लिए किसी भी समय गिरफ्तार और निरुद्ध कर सकेगा तथा किसी सेना-न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो धारा 80 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है, अधिनिर्णीत दंडादेश के अनुसरण में दिए जाने वाले दंड को कार्यान्वित भी कर सकेगा किन्तु अपने स्वयं के प्राधिकार से वह कोई दंड नहीं देगा :
परन्तु कोई आफिसर किसी अन्य आफिसर के आदेश पर गिरफ्तार या निरुद्ध किए जाने से अन्यथा ऐसे गिरफ्तार या निरुद्ध नहीं किया जाएगा ।
(4) उपधारा (2) और (3) के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि प्रोवो मार्शल के अंतर्गत तत्समय नौसेना या वायुसेना शासन से संबंधित विधि के अधीन नियुक्त प्रोवो मार्शल और ऐसा व्यक्ति जो उससे या उसकी ओर से प्राधिकार का वैध रूप से प्रयोग कर रहा है, आता है ।
अध्याय 10
सेना-न्यायालय
108. सेना न्यायालयों के प्रकार-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सेना-न्यायालय चार प्रकार के होंगे, अर्थात् :-
(क) जनरल सेना-न्यायालय ;
(ख) डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय ;
(ग) सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय ; तथा
(घ) सम्मरी सेना-न्यायालय ।
109. जनरल सेना-न्यायालय संयोजित करने की शक्ति-जनरल सेना-न्यायालय केन्द्रीय सरकार द्वारा या [थल सेनाध्यक्षट द्वारा या 1[थल सेनाध्यक्षट के अधिपत्र से इन निमित्त सशक्त किए गए किसी आफिसर द्वारा संयोजित किया जा सकेगा ।
110. डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय संयोजित करने की शक्ति-डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय जनरल सेना-न्यायालय संयोजित करने की शक्ति रखने वाले आफिसर द्वारा या ऐसे किसी आफिसर के अधिपत्र से इस निमित्त सशक्त किए गए आफिसर द्वारा संयोजित किया जा सकेगा ।
111. धाराओं 109 और 110 के अधीन निकाले गए अधिपत्रों की अन्तर्वस्तुएं-धारा 109 या धारा 110 के अधीन निकाले गऐ अधिपत्र में ऐसे निर्बन्धन, आरक्षण या शर्तें अन्तर्विष्ट हो सकेंगी जैसे उसे निकालने वाला आफिसर ठीक समझे ।
112. सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय संयोजित करने की शक्ति-निम्नलिखित प्राधिकारियों को सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय संयोजित करने की शक्ति होगी, अर्थात् :-
(क) केन्द्रीय सरकार के या 1[थल सेनाध्यक्षट के आदेश द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया आफिसर ;
(ख) सक्रिय सेवा पर, फील्ड में बलों का समादेशन करने वाला आफिसर या उसके द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया कोई आफिसर ;
(ग) सक्रिय सेवा पर की नियमित सेवा के किसी वियोजित प्रभाग का समादेशन करने वाला आफिसर उस समय जब उसकी राय में सेवा के अनुशासन और की अभ्यावश्यकताओं का सम्यक् रूप से ध्यान रखते हुए यह साध्य न हो कि अपराध का विचारण किसी जनरल सेना-न्यायालय द्वारा किया जाए ।
113. जनरल सेना-न्यायालय की संरचना-जनरल सेना-न्यायालय कम से कम पांच ऐसे आफिसरों से मिलकर बनेगा जिनमें से हर एक कम से कम तीन पूरे वर्ष तक आयोग धारण कर चुका है और जिनमें से कम से कम चार कैप्टन के रैंक से नीचे के रैंक के न हों ।
114. डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय की संरचना-डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय कम से कम तीन ऐसे आफिसरों से मिलकर बनेगा जिनमें से हर एक कम से कम दो पूरे वर्ष तक आयोग धारण कर चुका है ।
115. सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय की संरचना-सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय कम से कम तीन आफिसरों से मिलकर बनेगा ।
116. सम्मरी सेना-न्यायालय-(1) सम्मरी सेना-न्यायालय नियमित सेना के किसी कोर, विभाग या टुकड़ी के कमान आफिसर द्वारा अधिविष्ट किया जा सकेगा और वह न्यायालय अकेले उससे ही गठित होगा ।
(2) कार्यवाहियों में दो अन्य ऐसे व्यक्ति आरम्भ से अंत तक हाजिर रहेंगे जो आफिसर या कनिष्ठ आयुक्त आफिसर या दोनों में से एक-एक होंगे और जिन्हें उस रूप में न तो शपथ दिलाई जाएगी और न प्रतिज्ञान कराया जाएगा ।
117. सेना-न्यायालयों का विघटन-(1) यदि विचारण के प्रारम्भ के पश्चात् किसी सेना-न्यायालय में उन आफिसरों की संख्या जिनसे मिलकर वह बना है, उस न्यूनतम संख्या से, जो इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित है, कम हो जाती है तो वह विघटित कर दिया जाएगा ।
(2) यदि निष्कर्ष के पहले जज-एडवोकेट की या अभियुक्त की रुग्णता के कारण विचारण चलाते रहना असम्भव हो जाए तो सेना-न्यायालय विघटित कर दिया जाएगा ।
(3) वह आफिसर, जिसने सेना-न्यायालय संयोजित किया है, ऐसे सेना-न्यायालय को विघटित कर सकेगा यदि उसे यह प्रतीत हो कि सैन्य अभ्यावश्यकताओं या अनुशासिक आवश्यकताओं ने उक्त सेना-न्यायालय का चालू रहना असंभव या असमीचीन कर दिया है ।
(4) जहां कि सेना-न्यायालय इस धारा के अधीन विघटित किया जाए वहां अभियुक्त का विचारण फिर से किया जा सकेगा ।
118. जनरल और सम्मरी जनरल सेना-न्यायालयों की शक्तियां-जनरल या सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय को इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति का, ऐसे अपराध के लिए, जो उसमें दंडनीय है, विचारण करने और तद्द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश पारित करने की शक्ति होगी ।
119. डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालयों की शक्तियां-डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय को आफिसर या कनिष्ठ आयुक्त आफिसर से भिन्न इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के, ऐसे अपराध के लिए, जो उसमें दंडनीय किया गया है, विचारण करने की तथा इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई ऐसा दंडादेश पारित करने की जो मृत्यु, निर्वासन या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के दंडादेश से भिन्न है, शक्ति होगी :
परन्तु डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय किसी वारण्ट आफिसर को कारावास का दंडादेश नहीं देगा ।
120. सम्मरी सेना-न्यायालयों की शक्तियां-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए सम्मरी सेना-न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी भी अपराध का विचारण कर सकेगा ।
(2) जब कि तुरन्त कार्यवाही के लिए गम्भीर कारण नहीं है और अभिकथित अपराधी के विचारण के लिए निर्देश, अनुशासन का उपाय किए बिना उस आफिसर को किया जा सकता है जो डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय या सक्रिय सेवा की दशा में सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय संयोजित करने के लिए सशक्त है तब सम्मरी सेना-न्यायालय अधिविष्ट करने वाला आफिसर, धाराओं 34, 37 और 69 में से किसी के अधीन दंडनीय किसी भी अपराध का या न्यायालय अधिविष्ट करने वाले आफिसर के विरुद्ध किसी अपराध का विचारण ऐसे निर्देश के बिना नहीं करेगा ।
(3) आफिसर, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर या वारण्ट आफिसर से भिन्न इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति का जो उस न्यायालय के रूप में कार्य करने वाले न्यायालय को अधिविष्ट करने वाले आफिसर के समादेश के अधीन है, विचारण सम्मरी सेना-न्यायालय कर सकेगा ।
(4) सम्मरी सेना-न्यायालय मृत्यु या निर्वासन के या उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट परिसीमा से अधिक अवधि के कारावास के दंडादेश से भिन्न कोई भी ऐसा दंडादेश पारित कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन पारित किया जा सकता है ।
(5) उपधारा (4) में निर्दिष्ट परिसीमा, उस दशा में, जिसमें सम्मरी सेना-न्यायालय को अधिविष्ट करने वाला आफिसर लेफ्टीनेंट-कर्नल के रैंक का और उससे ऊपर का है एक वर्ष की, और उस दशा में, जिसमें ऐसा आफिसर उस रैंक से नीचे का है तीन मास की होगी ।
121. द्वितीय विचारण के प्रतिषेध-जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, किसी सेना-न्यायालय द्वारा या किसी दंड-न्यायालय द्वारा किसी अपराध से दोषयुक्त या उसके लिए दोषसिद्ध किया गया है या उसके बारे में धाराएं 80, 83, 84 और 85 में से किसी के अधीन कार्यवाही कर दी गई है तब वह उसके अपराध के लिए किसी सेना-न्यायालय द्वारा पुनः विचारण किए जाने या उक्त धाराओं के अधीन कार्यवाही की जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।
122. विचारण के लिए परिसीमाकाल-(1) उपधारा (2) द्वारा यथा उपबंधित के सिवाय इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति का, किसी अपराध के लिए सेना-न्यायालय द्वारा कोई भी विचारण [तीन वर्ष की कालावधि के अवसान के पश्चात् प्रारंभ नहीं किया जाएगा, और ऐसी कालावधि,-
(क) अपराध की तारीख को प्रारंभ होगी ; या
(ख) जहां अपराध के किए जाने की जानकारी, अपराध से व्यथित व्यक्ति को या कार्रवाई प्रारंभ करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को नहीं थी, वहां उस प्रथम दिन को प्रारंभ होगी जिस दिन ऐसे अपराध की जानकारी ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी को होती है, इनमें से जो भी पहले हो ; या
(ग) जहां यह ज्ञात नहीं है कि अपराध किसने किया है, वहां उस प्रथम दिन को प्रारंभ होगी जिस दिन अपराधी का पता अपराध से व्यथित व्यक्ति को या कार्रवाई प्रारंभ करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को चलता है, इनमें से जो भी पहले हो ।]
(2) उपधारा (1) के उपबन्ध, अभित्यजन या कपटपूर्ण अभ्यावेदन के अपराध या धारा 37 में वर्णित अपराधों में से किसी के लिए विचारण को लागू नहीं होंगे ।
(3) समय की जो कालावधि उपधारा (1) में वर्णित है उसकी गणना करने में, वह समय अपवर्जित कर दिया जाएगा, जो ऐसे व्यक्ति ने अपराध किए जाने के पश्चात् युद्ध कैदी के रूप में या शत्रु के क्षेत्र में या गिरफ्तारी से बचने में बिताया है ।
(4) यदि प्रश्न गत व्यक्ति जो आफिसर नहीं है अपराध के किए जाने के पश्चात् नियमित सेना के किसी प्रभाग में अनुकरणीय रीति से सेवा निरन्तर कम से कम तीन वर्ष के लिए कर चुका है तो सक्रिय सेवा पर के अभित्यजन से भिन्न अभित्यजन के अपराध का या कपटपूर्ण अभ्यावेशन के अपराध का कोई भी विचारण प्रारम्भ नहीं किया जाएगा ।
123. उस अपराधी का दायित्व जो इस अधिनियम के अधीन नहीं रह जाता है-(1) जहां कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा उस समय किया गया था जब कि वह इस अधिनियम के अध्यधीन था और वह ऐसे अध्यधीन नहीं रह गया है वहां उसे सैनिक अभिरक्षा में ले लिया और रखा जा सकेगा तथा ऐसे अपराध के लिए ऐसे विचारित और दंडित किया जा सकेगा मानो वह ऐसे अध्यधीन बना रहा हो ।
(2) ऐसा कोई भी व्यक्ति किसी अपराध के लिए विचारित नहीं किया जाएगा जब तक कि उसके विचारण का प्रारम्भ उसके इस अधिनियम के अध्यधीन न रह जाने के पश्चात् [तीन वर्ष की कालावधि के अंदर न हो जाए ; और ऐसी कालावधि की संगणना करने में, वह समय, जिसके दैरान ऐसा व्यक्ति फरार होकर या अपने को छिपाकर गिरफ्तारी से बचता है या जहां किसी अपराध की बाबत कार्यवाही का संस्थित किया जाना किसी व्यादेश या आदेश द्वारा रोक दिया गया है, वहां व्यादेश या आदेश के बने रहने की कालावधि, वह दिन, जिस दिन वह जारी किया गया था या दिया गया था और वह दिन, जिस दिन उसे वापस लिया गया था, अपवर्जित किया जाएगा :ट
परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात अभित्यजन या कपटपूर्ण अभ्यावेदन के अपराध के लिए या धारा 37 में वर्णित अपराधों में से किसी के लिए किसी व्यक्ति के विचारण को लागू नहीं होगी और न ऐसे किसी अपराध का विचारण करने की दण्ड-न्यायालय की अधिकारिता पर प्रभाव डालेगी जो ऐसे न्यायालय द्वारा तथा सेना-न्यायालय द्वारा भी विचारणीय है ।
(3) जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को किसी सेना-न्यायालय द्वारा निर्वासन या कारावास का दंडादेश दिया जाता है तब यह अधिनियम उसके दंडादेश की अवधि के दौरान उसको लागू होगा यद्यपि वह नियमित सेना से पदच्यूत सकलंन पदच्युत कर दिया जाता है या अन्यथा इस अधिनियम के अध्यधीन नहीं रह गया है तथा ऐसे रखा, हटाया, कारावासित और दण्डित किया जा सकेगा मानो वह इस अधिनियम के अध्यधीन बना रहा है ।
(4) जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को, किसी सेना-न्यायालय द्वारा मृत्यु का दण्डादेश दिया जाता है, तब यह अधिनियम उसको तब तक लागू होगा जब तक कि वह दण्डादेश कार्यान्वित नहीं कर दिया जाता ।
124. विचारण का स्थान-इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के विरुद्ध कोई अपराध करेगा ऐसे अपराध के लिए किसी भी स्थान में विचारित और दण्डित किया जा सकेगा ।
125. दण्ड-न्यायालय और सेना-न्यायालय में से किसी एक का चुनाव-जब कि दण्ड-न्यायालय और सेना-न्यायालय में से हर एक किसी अपराध के सम्बन्ध में अधिकारिता रखता है तब यह विनिश्चित करना कि कार्यवाही किस न्यायालय के समक्ष संस्थित की जाए उस सेना, सेना-कोर, डिवीजन या स्वतन्त्र ब्रिगेड का, जिसमें अभियुक्त व्यक्ति सेवा कर रहा है, समादेशन करने वाले आफिसर के या ऐसे अन्य आफिसर के, जो विहित किया जाए, विवेकाधीन होगा और यदि वह आफिसर विनिश्चित करता है कि वे सेना-न्यायालय के समक्ष संस्थित की जाएं तो यह निदेश देना कि अभियुक्त व्यक्ति को सैनिक अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाए उसके विवेकाधीन होगा ।
126. दण्ड-न्यायालय की यह अपेक्षित करने की शक्ति कि अपराधी परिदत्त किया जाए-(1) जब कि अधिकारिता रखने वाले दण्ड-न्यायालय की यह राय है कि किसी अभिकथित अपराध के बारे में कार्यवाहियां उसी के समक्ष संस्थित की जानी चाहिएं तब वह लिखित सूचना द्वारा धारा 125 में निर्दिष्ट आफिसर से अपेक्षा कर सकेगा कि वह स्वविकल्प में या तो अपराधी को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध कार्यवाही की जाने के लिए निकटतम मजिस्ट्रेट को परिदत्त कर दे या तब तक के लिए कार्यवाहियों को मुल्तवी कर दे जब तक केन्द्रीय सरकार को निर्देश लम्बित रहे ।
(2) ऐसे हर मामले में उक्त आफिसर या तो उस अध्यपेक्षा के अनुपालन में अपराधी को परिदत्त कर देगा या इस प्रश्न को कि कार्यवाहियां किसी न्यायालय के समक्ष संस्थित की जानी हैं केन्द्रीय सरकार के अवधारण के लिए तत्क्षण निर्देशित करेगा जिसका कि ऐसे निर्देश पर आदेश अन्तिम होगा ।
127. [दण्ड न्यायालय और सेना न्यायालय द्वारा क्रमवर्ती विचारण ।]-1992 के अधिनियम सं० 37 की धारा 11 द्वारा निरसित ।
अध्याय 11
सेना-न्यायालयों की प्रक्रिया
128. पीठासीन आफिसर-हर जनरल, डिस्ट्रिक्ट या सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय में ज्येष्ठ सदस्य पीठासीन आफिसर होगा ।
129. जज-एडवोकेट-एक जज-एडवोकेट, जो या तो जज-एडवोकेट जनरल के विभाग का कोई आफिसर होगा या यदि ऐसा कोई आफिसर उपलब्ध न हो तो जज-एडवोकेट जनरल द्वारा या उसके उपपदीयों में से किसी के द्वारा अनुमोदित कोई आफिसर होगा, हर एक जनरल सेना-न्यायालय में हाजिर रहेगा तथा हर एक डिस्ट्रिक्ट या सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय में हाजिर रह सकेगा ।
130. आक्षेप-(1) जनरल, डिस्ट्रिक्ट या सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय द्वारा सभी विचारणों में, जैसे ही न्यायालय समवेत हो वैसे ही, पीठासीन आफिसर और सदस्यों के नाम अभियुक्त को पढ़कर सुनाए जाएंगे, जिससे तब यह पूछा जाएगा कि क्या वह न्यायालयासीन किसी आफिसर द्वारा अपना विचारण किए जाने पर आक्षेप करता है ।
(2) यदि अभियुक्त ऐसे किसी आफिसर के बारे में आक्षेप करता है तो उसका आक्षेप और उस पर उस आफिसर का जिसके बारे में आक्षेप किया गया हो उत्तर भी सुना और अभिलिखित किया जाएगा और न्यायालय के बाकी आफिसर आक्षेप पर उस आफिसर की अनुपस्थिति में विनिश्चय करेंगे जिसके बारे में आक्षेप किया गया है ।
(3) यदि आक्षेप मतदान करने के हकदार आफिसरों के आधे या अधिक मतों से मंजूर किया जाए तो आक्षेप मंजूर किया जाएगा और वह सदस्य जिसके बारे में आक्षेप किया गया है निवृत्त हो जाएगा, और उस रिक्ति को विहित रीति से किसी अन्य आफिसर से अभियुक्त के आक्षेप करने के उसी अधिकार के अध्यधीन रहते हुए भरा जा सकेगा ।
(4) जब कि कोई आक्षेप नहीं किया गया है या जब कि आक्षेप किया गया है और नामंजूर कर दिया गया है या ऐसे हर आफिसर का स्थान जिसके बारे में सफलतापूर्वक आक्षेप किया गया है किसी अन्य ऐसे आफिसर से भर दिया गया है जिसके बारे में कोई आक्षेप नहीं किया गया है या मंजूर नहीं किया गया है तब न्यायालय विचारण करने के लिए अग्रसर होगा ।
131. सदस्य, जज-एडवोकेट और साक्षी को शपथ दिलाना-(1) इसके पूर्व कि विचारण प्रारंभ हो, हर सेना-न्यायालय के हर सदस्य को और जज-एडवोकेट को विहित रीति से शपथ दिलाई जाएगी या उससे प्रतिज्ञा कराया जाएगा ।
(2) सेना-न्यायालय के समक्ष साक्ष्य देने वाले हर व्यक्ति की परीक्षा, विहित प्ररूप में सम्यक् रूप से उसे शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान कराने के पश्चात् की जाएगी ।
(3) उपधारा (2) के उपबन्ध वहां लागू नहीं होंगे, जहां कि साक्षी बारह वर्ष से कम आयु का बालक है और सेना-न्यायालय की यह राय है कि यद्यपि साक्षी सत्य बोलने के कर्तव्य को समझता है, किन्तु शपथ या प्रतिज्ञान की प्रकृति को नहीं समझता ।
132. सदस्यों द्वारा मतदान-(1) उपधाराओं (2) और (3) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि सेना-न्यायालय का हर विनिश्चय स्पष्ट बहुमत से पारित किया जाएगा, तथा जहां कि या तो निष्कर्ष पर या दण्डादेश पर मतसाम्य हो, वहां विनिश्चय अभियुक्त के पक्ष में होगा ।
(2) जनरल सेना-न्यायालय द्वारा मृत्यु दण्डादेश उस न्यायालय के सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई की सहमति के बिना पारित नहीं किया जाएगा ।
(3) सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय द्वारा मृत्यु दंडादेश सब सदस्यों की सहमति के बिना पारित नहीं किया जाएगा ।
(4) आक्षेप या निष्कर्ष या दंडादेश के मामलों से भिन्न मामलों में, पीठासीन आफिसर को निर्णायक मत प्राप्त होगा ।
133. साक्ष्य के बारे में साधारण नियम-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, सेना-न्यायालय के समक्ष की सब कार्यवाहियों को लागू होगा ।
134. न्यायिक अवेक्षा-सेना-न्यायालय किसी ऐसी बात की न्यायिक अवेक्षा कर सकेगा जो सदस्यों के साधारण सैनिक ज्ञान में होती है ।
135. साक्षियों को समन करना-(1) संयोजक आफिसर, सेना-न्यायालय [या जांच न्यायालयट का पीठासीन आफिसर, जज-एडवोकेट या अभियुक्त व्यक्ति का कमान आफिसर, स्वहस्ताक्षरित समन द्वारा किसी व्यक्ति की, या तो साक्ष्य देने के लिए या कोई दस्तावेज या अन्य वस्तु पेश करने के लिए उस समय या स्थान पर जो समन में वर्णित किया जाए, हाजिरी अपेक्षित कर सकेगा ।
(2) उस साक्षी की दशा में, जो सैनिक प्राधिकार के अध्यधीन है समन उसके कमान आफिसर को भेजा जाएगा और वह आफिसर उसकी उस पर तद्नुसार तामील करेगा ।
(3) किसी अन्य साक्षी की दशा में, समन उस मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा, जिसकी अधिकारिता के अन्दर वह हो या निवास करता हो, और वह मजिस्ट्रेट समन को ऐसे कार्यान्वित करेगा मानो साक्षी उस मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आने के लिए अपेक्षित हो ।
(4) जब कि कोई साक्षी अपने कब्जे में या शक्ति में की किसी विशिष्ट दस्तावेज या अन्य वस्तु को पेश करने के लिए अपेक्षित हो, तब समन में युक्तियुक्त प्रमितता के साथ उसका वर्णन किया जाएगा ।
136. पेश किए जाने से छूट प्राप्त दस्तावेजें-(1) धारा 135 की कोई भी बात भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और 124 के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली अथवा डाक या तार प्राधिकारियों की अभिरक्षा में के किसी पत्र, पोस्टकार्ड, तार या अन्य दस्तावेज को लागू होने वाली नहीं समझा जाएगी ।
(2) यदि ऐसी अभिरक्षा में की कोई दस्तावेज किसी जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट, उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय की राय में किसी सेना-न्यायालय के प्रयोजन के लिए वांछित है, तो वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसे दस्तावेज ऐसे व्यक्ति को परिदत्त करें जिसे वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय निर्दिष्ट करे ।
(3) यदि ऐसी कोई दस्तावेज किसी अन्य मजिस्ट्रेट की या किसी पुलिस आयुक्त या जिला पुलिस अधीक्षक की राय में, ऐसे किसी प्रयोजन के लिए वांछित है, तो वह, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसी दस्तावेज की तलाश कराएं और ऐसे किसी जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय के आदेश तक उसे रोक रखें ।
137. साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन-(1) जब कभी सेना-न्यायालय द्वारा किए जा रहे विचारण के अनुक्रम में, न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि साक्षी की परीक्षा की जाए और ऐसे साक्षी की हाजिरी इतने विलम्ब, व्यय या असुविधा के बिना, जितना मामले की परिस्थितियों में अनुचित होगा, नहीं कराई जा सकती है, तब ऐसा न्यायालय जज-एडवोकेट जनरल को इस वास्ते संबोधित कर सकेगा कि उस साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए कमीशन निकाला जाए ।
(2) यदि जज-एडवोकेट जनरल तब यदि आवश्यक समझे, तो वह साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए किसी ऐसे जिला मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के नाम, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर वह साक्षी निवास करता है, कमीशन निकाल सकेगा ।
(3) वह मजिस्ट्रेट या आफिसर जिसके नाम कमीशन निकाला गया है या यदि वह जिला मजिस्ट्रेट है, तो वह या ऐसा प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जो उसने इस निमित्त नियुक्त किया है, उस स्थान को जाएगा जहां साक्षी है, या साक्षी को अपने समक्ष आने के लिए समन करेगा और उसी रीति से उसका साक्ष्य लिखेगा, और इस प्रयोजन के लिए उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के या [जम्मू-कश्मीर राज्यट में प्रवृत्त तत्समान विधि के अधीन वारंट मामलों के विचारणों के लिए है ।
(4) जबकि साक्षी किसी जनजाति क्षेत्र में या भारत के बाहर किसी स्थान में निवास करता है, तब कमीशन उस रीति में निकाला जा सकेगा जो 1[दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 22ट या 2[जम्मू-कश्मीर राज्यट में प्रवृत्त किसी तत्समान विधि में विनिर्दिष्ट है ।
(5) इस और निकट आगामी धारा में, जज-एडवोकेट जनरल के अन्तर्गत डिप्टी एडवोकेट जनरल आता है ।
138. साक्षी की कमीशन पर परीक्षा-(1) किसी भी ऐसे मामले में, जिसमें धारा 137 के अधीन कमीशन निकाला जाता है, अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति क्रमशः कोई ऐसे लिखित परिप्रश्न भेज सकेंगे जिन्हें न्यायालय विवाद्यक से सुसंगत समझे और ऐसे कमीशन का निष्पादन करने वाला मजिस्ट्रेट या आफिसर साक्षी की परीक्षा ऐसे परिप्रश्नों पर करेगा ।
(2) अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति ऐसे मजिस्ट्रेट या आफिसर के समक्ष काउन्सेल की मार्फत या उस दशा के सिवाय, जब कि अभियुक्त व्यक्ति अभिरक्षा में है, स्वयं उपसंजात हो सकेंगे और उक्त साक्षी की, यथास्थिति, परीक्षा, प्रतिपरीक्षा और पुनः परीक्षा कर सकेंगे ।
(3) धारा 137 के अधीन निकाले गए कमीशन के सम्यक् रूप से निष्पादित किए जाने के पश्चात्, वह उस साक्षी के अभिसाक्ष्य के सहित, जिसकी उसके अधीन पीरक्षा की गई हैं, जज-एडवोकेट जनरल को लौटा दिया जाएगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन लौटाए गए कमीशन और अभिसाक्ष्य की प्राप्ति पर जज एडवोकेट जनरल उसे उस न्यायालय को, जिसकी प्रेरणा पर वह कमीशन निकाला गया था, या यदि वह न्यायालय विघटित कर दिया गया है तो अभियुक्त व्यक्ति के विचारण के लिए संयोजित किसी अन्य न्यायालय को अग्रेषित कर देगा, और वह कमीशन, तत्सम्बन्धी विवरणी और अभिसाक्ष्य अभियोजक और अभियुक्त द्वारा निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे, और सब न्यायसंगत अपवादों के अध्यधीन रहते हुए, या तो अभियोजक द्वारा या अभ्ियुक्त द्वारा मामले में साक्ष्य में पढ़े जा सकेंगे और न्यायालय की कार्यवाही का भाग होंगे ।
(5) हर मामले में, जिसमें धारा 137 के अधीन कमीशन निकाला गया हो, विचारण ऐसे विनिर्दिष्ट समय के लिए, जो कमीशन के निष्पादन और लौटाए जाने के लिए युक्तियुक्त रूप से पर्याप्त है, स्थगित किया जा सकेगा ।
139. ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि जिसका आरोप न लगाया गया हो-(1) वह व्यक्ति, जिस पर अभित्यजन का आरोप सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है, अभित्यजन करने का प्रयत्न करने या छुट्टी बिना अनुपस्थित होने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।
(2) वह व्यक्ति, जिस पर अभित्यजन करने का प्रयत्न करने का आरोप सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है, छुट्टी बिना अनुपस्थिति होने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।
(3) वह व्यक्ति, जिस पर यह आरोप कि उसने आपराधिक बल का प्रयोग किया है, सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है, हमले का दोषी ठहराया जा सकेगा ।
(4) वह व्यक्ति, जिस पर धमकी भरी भाषा का प्रयोग करने का आरोप सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है, अनधीनता द्योतक भाषा का प्रयोग करने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।
(5) वह व्यक्ति, जिस पर धारा 52 के खण्ड (क), (ख), (ग) और (घ) में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी एक का आरोप सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है, इन अपराधों में से किसी ऐसे अन्य अपराध का दोषी ठहराया जा सकेगा, जिसका उस पर आरोप लगाया जा सकता था ।
(6) वह व्यक्ति, जिस पर धारा 69 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का आरोप सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है किसी ऐसे अन्य अपराध का दोषी ठहराया जा सकेगा, जिसका दोषी वह तब ठहराया जा सकता था, जब 1[दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के उपबंध लागू होते ।
(7) वह व्यक्ति, जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है, अपराध के ऐसी परिस्थितियों में किए जाने का, जिनमें अधिक कठोर दण्ड अन्तर्वलित है, सबूत न होने पर उसी अपराध के ऐसी परिस्थितियों में, जिनमें कम कठोर दण्ड अन्तर्वलित है, किए जाने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।
(8) वह व्यक्ति, जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप सेना-न्यायालय के समक्ष लगाया गया है, उस अपराध के प्रयत्न का या दुष्प्रेरण का दोषी ठहराया जा सकेगा, यद्यपि, प्रयत्न या दुष्प्रेरण का आरोप पृथक्तः न लगाया गया हो ।
140. हस्ताक्षरों के बारे में उपधारणा-इस अधिनियम के अधीन की किसी भी कार्यवाही में कोई भी ऐसा आवेदन, प्रमाण-पत्र, वारण्ट, उत्तर या अन्य दस्तावेज, जिसका सरकार की सेवा में के किसी आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, पेश किए जाने पर, यह बात, जब तक तत्प्रतिकूल साबित न कर दी जाए, उपधारित की जाएगी कि वह उस व्यक्ति द्वारा और उस हैसियत में सम्यक् रूप में हस्ताक्षरित की गई है जिसके द्वारा और जिस हैसियत में उसका हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है ।
141. अभ्यावेशन पत्र-(1) कोई अभ्यावेशन पत्र, जो किसी अभ्यावेशन आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, इस अधिनियम के अधीन की कार्यवारियों में इस बात का साक्ष्य होगा कि अभ्यावेशित व्यक्ति ने प्रश्नों के वे उत्तर दिए थे, जिनका उसके द्वारा दिया जाना उसमें व्यपदिष्ट है ।
(2) ऐसे व्यक्ति का अभ्यावेशन उसके मूल अभ्यावेशन पत्र या उसकी ऐसी प्रतिलिपि, जो अभ्यावेशन पत्र को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होनी तात्पर्यित है, पेश करके साबित किया जा सकेगा ।
142. कतिपय दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-(1) नियमित सेना के किसी प्रभाग में किसी व्यक्ति की सेवा में होने के या उक्त प्रभाग से किसी व्यक्ति के सकलंक पदच्युत किए जाने, पदच्युति या उन्मोचन के सम्बन्ध में या किसी व्यक्ति की, इस परिस्थिति के बारे में कि उसने, बल के किसी प्रभाग में सेवा नहीं की है, या वह उसका अंग नहीं था, कोई पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज उस दशा में जिसमें कि उसका केन्द्रीय सरकार या [थल सेनाध्यक्षट द्वारा या की ओर से या किसी विहित आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, उन तथ्यों का साक्ष्य होगी, जो ऐसे पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज में कथित हैं ।
(2) किसी सेना, नौ सेना या वायु सेना सूची या राजपत्र, जिसका प्राधिकार से प्रकाशित होना तात्पर्यित है, उसमें उल्लिखित आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों या वारण्ट आफिसरों, की प्रास्थिति और रैंक या उनके द्वारा धारित किसी नियुक्ति का तथा सेवाओं की उस कोर, बटालियन या अंग या शाखा का, जिसके वे अंग हैं, साक्ष्य होगा ।
(3) जहां कि इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अनुसरण में या अन्यथा सैनिक कर्तव्य के अनुसरण में कोई अभिलेख किसी रेजीमेंट पुस्तक में किया गया है, और कमान आफिसर द्वारा या उस आफिसर द्वारा, जिसका कर्तव्य ऐसा अभिलेख अभिलिखित करना है, हस्ताक्षरित हुआ तात्पर्यित है, वहां ऐसा अभिलेख उन तथ्यों का, जो उसमें कथित हैं, साक्ष्य होगा ।
(4) किसी रेजीमेन्ट पुस्तक में के किसी अभिलेख की प्रतिलिपि, जो ऐसी पुस्तक को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होनी तात्पर्यित है, ऐसे अभिलेख का साक्ष्य होगी ।
(5) जहां कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति का विचारण, अभित्यजन के या छुट्टी बिना अनुपस्थिति के आरोप पर हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी आफिसर या इस अधिनियम के अध्यधीन के अन्य व्यक्ति की या नियमित सेना के किसी प्रभाग की अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है, या वह ऐसे आफिसर या व्यक्ति द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र जिसका यथास्थिति, ऐसे आफिसर द्वारा, या नियमित सेना के उस भाग के कमान आफिसर द्वारा, या उस कोर, विभाग या टुकड़ी के, जिसका कि ऐसा व्यक्ति अंग है, कमान आफिसर द्वारा, हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान तथा वह बात कि उसका पहनावा कैसा था, कथित है, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।
(6) जहां कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति का विचारण, अभित्यजन के या छुट्टी बिना अनुपस्थिति के आरोप पर हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी ऐसे पुलिस आफिसर को जो किसी पुलिस थाने के भारसाधक आफिसर की पंक्ति से नीचे का नहीं है, अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है या वह ऐसे आफिसर द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र जिसका ऐसे पुलिस आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान तथा यह बात कि उसका पहनावा कैसा था, कथित है, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।
(7) कोई दस्तावेज, जिसका सरकार के रासायनिक परीक्षक या सहायक रासायनिक परीक्षक [या सरकारी वैज्ञानिक, विशेषज्ञों, अर्थात् मुख्य विस्फोटक निरीक्षक, अंगुली छाप कार्यालय निदेशक, हाफकिन संस्थान, मुम्बई के निदेशक, केंद्रीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला या राजकीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक और सरकार के सीरम विज्ञानी में से किसीट द्वारा, हस्ताक्षरित ऐसी रिपोर्ट होना तात्पर्यित है जो ऐसे किसी पदार्थ या चीज के बारे में है जो परीक्षा या विश्लेषण और रिपोर्ट के लिए उसे सम्यक् रूप से भेजी गई थी, इस अधिनियम के अधीन की किसी भी कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त की जा सकेगी ।
143. अभियुक्त द्वारा सरकारी आफिसर को निर्देश-(1) यदि अभित्यजन के या छुट्टी बिना अनुपस्थिति के उपरान्त या सेवा के लिए बुलाए जाने पर वापस न आने के लिए किए जा रहे किसी विचारण में विचारित व्यक्ति अपनी अप्राधिकृत अनुपस्थिति के लिए किसी पर्याप्त या युक्तियुक्त प्रतिहेतु का कथन अपनी प्रतिरक्षा में करता है और उसके समर्थन में सरकार की सेवा में के किसी आफिसर के प्रति निर्देश करता है या यदि ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिरक्षा में के उक्त कथन के किसी ऐसे आफिसर द्वारा साबित या नासाबित किए जाने की सम्भावना है तो न्यायालय ऐसे आफिसर को लिखेगा और कार्यवाहियों को तब तक के लिए स्थगित कर देगा जब तक उसका उत्तर प्राप्त न हो जाए ।
(2) ऐसे निर्देशित आफिसर का लिखित उत्तर, यदि वह उसके द्वारा हस्ताक्षरित हो, साक्ष्य में लिया जाएगा, और उसका वैसा ही प्रभाव होगा मानो वह न्यायालय के समक्ष शपथ पर दिया गया हो ।
(3) यदि ऐसे उत्तर की प्राप्ति के पूर्व न्यायालय का विघटन हो जाता है या यदि न्यायालय इस धारा के उपबंधों का अनुवर्तन करने का लोप करता है तो संयोजक आफिसर कार्यवाहियों को स्वविवेकानुसार बातिल कर सकेगा और नए विचारण का आदेश दे सकेगा ।
144. पूर्व दोषसिद्धियों और साधारण शील का साक्ष्य-(1) जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को सेना-न्यायालय ने किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया हो तब वह सेना-न्यायालय ऐसे व्यक्ति की किसी सेना-न्यायालय या किसी दण्ड-न्यायालय द्वारा की गई पूर्व दोषसिद्धियों की या धाराओं 80, 83, 84 या 85 में से किसी के अधीन किए गए किसी पूर्वदण्ड अधिनिर्णय की जांच कर सकेगा और साक्ष्य प्राप्त और अभिलिखित कर सकेगा तथा इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्ति के साधारण शील की और ऐसी बातों की जो विहित की जाएं, जांच कर सकेगा और उन्हें अभिलिखित कर सकेगा ।
(2) इस धारा के अधीन प्राप्त किया गया साक्ष्य या तो मौखिक या सेना-न्यायालय पुस्तकों में की या अन्य शासकीय अभिलेखों में की प्रविष्टियों या उनमें से प्रमाणित उद्धरणों के रूप में हो सकेगा और विचारित व्यक्ति को विचारण के पूर्व यह सूचना देना आवश्यक नहीं होगा कि उसकी पूर्व दोषसिद्धियों या शील के बारे में साक्ष्य प्राप्त किया जाएगा ।
(3) यदि सम्मरी सेना-न्यायालय में विचारण करने वाला आफिसर ठीक समझे तो वह अपराधी के विरुद्ध की किन्हीं पूर्व दोषसिद्धियों को, या उसके साधारण शील को और ऐसी अन्य बातों को जो विहित की जाएं, इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन साबित किए जाने की अपेक्षा करने के बदले में उन्हें अपने ज्ञान के रूप में अभिलिखित कर सकेगा ।
145. अभियुक्त का पागलपन-(1) जब कभी सेना-न्यायालय द्वारा विचारण के अनुक्रम में न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति जिस पर आरोप है कि चित्त-विकृत के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है या कि उसने अभिकथित कार्य तो किया था किन्तु वह चित्त-विकृत के कारण उस कार्य की विकृत्ति को जानने में या यह जानने में कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, असमर्थ था, तब न्यायालय तदनुसार निष्कर्ष अभिलिखित करेगा ।
(2) न्यायालय का पीठासीन आफिसर, या सम्मरी सेना-न्यायालय की दशा में, विचारण करने वाला आफिसर तत्काल मामले की रिपोर्ट, यथास्थिति, पुष्टिकर्ता आफिसर को या उस प्राधिकारी को करेगा जो उसके निष्कर्ष पर धारा 162 के अधीन कार्यवाही करने के लिए सशक्त हो ।
(3) पुष्टिकर्ता आफिसर, जिसको मामले की रिपोर्ट उपधारा (2) के अधीन की जाती है, यदि निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करता है तो वह अभियुक्त व्यक्ति का उस अपराध के लिए जिसका उस पर आरोप लगाया गया था, विचारण उसी या किसी अन्य सेना-न्यायालय द्वारा कराने के लिए कार्यवाही कर सकेगा ।
(4) वह प्राधिकारी, जिसको सम्मरी सेना-न्यायालय के निष्कर्ष की रिपोर्ट उपधारा (2) के अधीन की जाती है, और पुष्टिकर्ता आफिसर, जो किसी मामले में, जिसकी रिपोर्ट उसको ऐसे उपधारा (2) के अधीन की गई है निष्कर्ष की पुष्टि करता है, अभियुक्त व्यक्ति को विहित रीति से अभिरक्षा में रखने जाने का आदेश देगा तथा मामले की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार के आदेशों के लिए करेगा ।
(5) उपधारा (4) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार अभियुक्त व्यक्ति को किसी पागलखाने में या सुरक्षित अभिरक्षा के अन्य उपयुक्त स्थान में निरुद्ध किए जाने का आदेश दे सकेगी ।
146. पागल अभियुक्त का आगे चल कर विचारण के लिए उपयुक्त हो जाना-जहां कि कोई अभियुक्त व्यक्ति, चित्त-विकृति के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने पर असमर्थ पाया जाने पर, धारा 145 के अधीन अभिरक्षा या निरोध में है, वहां वह आफिसर, जो उस सेना, सेना-कोर, डिवीजन या ब्रिगेड का समादेशन करता है जिसके समादेशन क्षेत्र के अन्दर अभियुक्त अभिरक्षा में है या निरुद्ध है या इस निमित्त विहित कोई अन्य आफिसर-
(क) यदि ऐसा व्यक्ति धारा 145 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सीय आफिसर की इस रिपोर्ट पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है, अथवा
(ख) यदि ऐसा व्यक्ति धारा 145 की उपधारा (5) के अधीन किसी जेल में निरुद्ध है तो कारागारों के महानिरीक्षक के इस प्रमाण-पत्र पर और यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा के अधीन किसी पागलखाने में निरुद्ध है तो उस पागलखाने के परिदर्शकों में से किन्हीं दो या अधिक के इस प्रमाण-पत्र पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है,
उस व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए जिसका आरोप उस पर मूलतः लगाया गया था, उसी या किसी अन्य सेना न्यायालय द्वारा या यदि वह अपराध सिविल अपराध है तो किसी दंड न्यायालय द्वारा कराने के लिए कार्यवाही कर सकेगा ।
147. धारा 146 के अधीन के आदेशों का केन्द्रीय सरकार को पारेषण-ऐसे हर आदेश की एक प्रतिलिपि जो अभियुक्त के विचारण के लिए किसी आफिसर द्वारा धारा 146 के अधीन किया गया है तत्काल केन्द्रीय सरकार को भेज दी जाएगी ।
148. पागल अभियुक्त की निर्मुक्ति-जहां कि कोई व्यक्ति धारा 145 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (5) के अधीन निरोध में है वहां-
(क) यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सीय आफिसर की ऐसी रिपोर्ट पर, अथवा
(ख) यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (5) के अधीन निरुद्ध है तो धारा 146 के खण्ड (ख) में वर्णित प्राधिकारियों में से किसी के ऐसे प्रमाण-पत्र पर, कि उस आफिसर या प्राधिकारी के विचार में उस व्यक्ति की निर्मुक्ति उसके स्वयं अपने आप को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने के संकट के बिना की जा सकती है,
तो केन्द्रीय सरकार यह आदेश दे सकेगी कि ऐसे व्यक्ति को निर्मुक्त कर दिया जाए या अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाए या यदि उसे पहले ही किसी ऐसे लोक पागलखाने में नहीं भेज दिया गया है तो उसे लोक पागलखाने में भेज दिया जाए ।
149. पागल अभियुक्त का उसके नातेदारों को परिदान-जहां कि ऐसे व्यक्ति का, जो धारा 145 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (5) के अधीन निरोध में है, कोई नातेदार या मित्र वांछा करे कि उसकी देख-रेख और अभिरक्षा में रखे जाने के लिए परिदत्त कर दिया जाए, तब केन्द्रीय सरकार, ऐसे नातेदार या मित्र के आवेदन पर और उस सरकार को समाधानप्रद ऐसी प्रतिभूति उसके द्वारा दिए जाने पर कि परिदत्त व्यक्ति की समुचित देख-रेख की जाएगी और वह अपने आप को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने से निवारित रखा जाएगा तथा परिदत्त व्यक्ति को ऐसे आफिसर के समक्ष और ऐसे समयों पर और स्थान पर जो केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, निरीक्षण के लिए पेश किया जाएगा, ऐसे व्यक्ति को ऐसे नातेदार या मित्र को परिदत्त किए जाने का आदेश दे सकेगी ।
150. विचारण के लम्बित रहने तक सम्पत्ति की अभिरक्षा और व्ययन के लिए आदेश-जब कि कोई सम्पत्ति, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, या जो कोई अपराध करने के लिए उपयोग में लाई गई प्रतीत होती है, किसी सेना-न्यायालय के समक्ष विचारण के दौरान पेश की जाएं, तब न्यायालय विचारण की समाप्ति होने तक के लिए ऐसी सम्पत्ति की उचित अभिरक्षा के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जैसा वह ठीक समझे और यदि सम्पत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है तो ऐसा साक्ष्य जैसा वह आवश्यक समझे अभिलिखित करने के पश्चात् उसे बेच देने या अन्यथा व्ययनित करने का आदेश दे सकेगा ।
151. जिस सम्पत्ति के बारे में अपराध किया गया है उसके व्ययन के लिए आदेश-(1) किसी सेना-न्यायालय के समक्ष विचारण की समाप्ति के पश्चात् वह सेना-न्यायालय या उस सेना-न्यायालय के निष्कर्ष या दण्डादेश को जो पुष्ट करे वह आफिसर, या ऐसे आफिसर से वरिष्ठ कोई प्राधिकारी या ऐसे सेना-न्यायालय की दशा में, जिसके निष्कर्ष या दण्डादेश की पुष्टि अपेक्षित नहीं है उस सेना, सेना-कोर, डिवीजन या ब्रिगेड का, जिसमें विचारण किया गया था, समादेशन करने वाला आफिसर उस सम्पत्ति या दस्तावेज के, जो उस न्यायालय के समक्ष पेश की गई है या उसकी अभिरक्षा में है या जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो कोई अपराध करने के लिए उपयोग में लाई गई है नाश द्वारा, समपहरण द्वारा, किसी ऐसे व्यक्ति को परिदान द्वारा जो उसके कब्जे का हकदार होने का दावा करता है अन्यथा व्ययनित करने का ऐसा आदेश कर सकेगा जैसे वह ठीक समझे ।
(2) जहां कि उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश ऐसी सम्पत्ति के बारे में किया गया हो, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, वहां वह आदेश करने वाले प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित उस आदेश की प्रतिलिपि चाहे विचारण भारत के अन्दर हुआ हो या न हुआ हो, ऐसे मजिस्ट्रेट को भेजी का सकेगी, जिसकी अधिकारिता में वह सम्पत्ति तत्समय स्थित हो और तदुपरि वह
मजिस्ट्रेट उस आदेश को ऐसे कार्यान्वित कराएगा मानो वह [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के या [जम्मू-कश्मीर राज्यट में प्रवृत्त तत्समान किसी विधि के अधीन उसके द्वारा पारित आदेश हो ।
(3) इस धारा में सम्पत्ति" शब्द के अन्तर्गत उस सम्पत्ति की दशा जिसके बारे में अपराध किया गया प्रतीत होता है, न केवल वही सम्पत्ति आती है जो मूलतः किसी व्यक्ति के कब्जे में या नियंत्रण में रही है वरन्, वह सम्पत्ति भी आती है जिसमें या जिसके बदले में उसका संपरिवर्तन या विनिमय किया गया है और वह सब कुछ आता है जो ऐसे संपरिवर्तन या विनिमय द्वारा अव्यवहित अन्यथा अर्जित किया गया है ।
152. इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों के सम्बन्ध में सेना-न्यायालय की शक्तियां-इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किया गया सेना-न्यायालय द्वारा विचारण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धाराओं 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और सेना-न्यायालय [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धाराओं 345 और 346ट के अर्थ में न्यायालय समझा जाएगा ।
अध्याय 12
पुष्टि और पुनरीक्षण
153. निष्कर्ष और दण्डादेश का तब तक जब तक पुष्टि न कर दी जाए विधिमान्य न होना-किसी जनरल, डिस्ट्रिक्ट या सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय का कोई भी निष्कर्ष या दण्डादेश वहां तक के सिवाय जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार पुष्ट न कर दिया गया हो, विधिमान्य नहीं होगा ।
154. जनरल सेना-न्यायालय का निष्कर्ष और दण्डादेश पुष्ट करने की शक्ति-जनरल सेना-न्यायालयों के निष्कर्ष और दण्डादेश केन्द्रीय सरकार द्वारा या किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो केन्द्रीय सरकार के अधिपत्र द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया हो, पुष्ट किए जा सकेंगे ।
155. डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय का निष्कर्ष और दण्डादेश पुष्ट करने की शक्ति-डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालयों के निष्कर्ष और दण्डादेश जनरल सेना-न्यायालय को संयोजित करने की शक्ति रखने वाले आफिसर द्वारा या किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो ऐसे आफिसर के अधिपत्र द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया हो, पुष्ट किए जा सकेंगे ।
156. पुष्टिकर्ता प्राधिकारियों की शक्तियों की परिसीमा-धारा 154 या धारा 155 के अधीन निकाले गए अधिपत्र में ऐसे निर्बन्धन, आरक्षण या शर्तें अन्तर्विष्ट हो सकेंगी जो उसे निकालने वाला प्राधिकारी ठीक समझे ।
157. सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय का निष्कर्ष और दण्डादेश पुष्ट करने की शक्ति-सम्मरी जनरल सेना-न्यायालयों के निष्कर्ष और दण्डादेश संयोजक आफिसर द्वारा, या यदि वह ऐसा निदेश दे तो उससे वरिष्ठ किसी प्राधिकारी द्वारा पुष्ट किए जा सकेंगे ।
158. दण्डादेश में कमी करने, उनका परिहार करने, या उनका लघुकरण करने की पुष्टिकर्ता प्राधिकारी की शक्ति-(1) ऐसे निर्बन्धनों, आरक्षणों या शर्तों के जो धारा 154 या धारा 155 के अधीन निकाले गए किसी अधिपत्र में अन्तर्विष्ट हों, और उपधारा (2) के उपबन्ध के अध्यधीन रहते हुए, पुष्टिकर्ता प्राधिकारी किसी सेना-न्यायालय के दण्डादेश की पुष्टि करते समय उस दण्ड में, जो तद्द्वारा अधिनिर्णीत किया गया है, कमी कर सकेगा या उसका परिहार कर सकेगा या उस दण्ड को धारा 17 में अधिकथित मापमान में के निम्नतर दण्ड या दण्डों में लघुकृत कर सकेगा ।
(2) निर्वासन का दण्डादेश न्यायालय द्वारा अधिनिर्णीत निर्वासन की अवधि से अधिक अवधि के कारावास के दण्डादेश में लघुकृत नहीं किया जाएगा ।
159. पोत के फलक पर के निष्कर्षों और दण्डादेशों का पुष्ट किया जाना-जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को, किसी सेना-न्यायालय द्वारा उस समय विचारित और दण्डादिष्ट किया गया है जब कि वह पोत के फलक पर है तब निष्कर्ष और दण्डादेश, वहां तक जहां तक कि पोत पर उसे पुष्ट या निष्पादित न किया गया हो, ऐसी रीति में पुष्ट और निष्पादित किया जा सकेगा मानो ऐसे व्यक्ति का विचारण उसके उतरने के पत्तन पर किया गया हो ।
160. निष्कर्ष या दण्डादेश का पुनरीक्षण-(1) सेना-न्यायालय का निष्कर्ष या दण्डादेश जिसकी पुष्टि अपेक्षित है, पुष्टिकर्ता आफिसर के आदेश से एक बार पुनरीक्षित किया जा सकेगा और ऐसे पुनरीक्षण पर न्यायालय, यदि वह पुष्टिकर्ता आफिसर द्वारा ऐसा करने के लिए निदेशित किया गया है तो अतिरिक्त साक्ष्य ले सकेगा ।
(2) पुनरीक्षण पर, न्यायालय उन्हीं आफिसरों से जो उस समय उपस्थित थे जब कि मूल विनिश्चय पारित किया गया था, मिलकर गठित होगा जब तक कि उन आफिसरों में से कोई अपरिवर्जनीयतः अनुपस्थित न हो ।
(3) ऐसी अपरिवर्जनीय अनुपस्थिति की दशा में, उसका हेतुक कार्यवाही में सम्यक् रूप से प्रमाणित किया जाएगा और न्यायालय पुनरीक्षण करने के लिए अग्रसर होगा, परन्तु यह तब जबकि यदि वह जनरल सेना-न्यायालय है, तो पांच आफिसरों से या यदि वह सम्मरी, जनरल या डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय है, तो तीन आफिसरों से मिलकर उस समय भी गठित हो ।
161. सम्मरी सेना-न्यायालय का निष्कर्ष और दण्डादेश-(1) उपधारा (2) में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, सम्मरी सेना-न्यायालय के निष्कर्ष और दण्डादेश की पुष्टि अपेक्षित नहीं होगी, पर उसे तत्काल कार्यान्वित किया जा सकेगा ।
(2) यदि विचारण करने वाला आफिसर पांच वर्ष से कम की सेवा वाला है, तो वह, सक्रिय सेवा पर के सिवाय, किसी दण्डादेश को तब तक क्रियान्वित नहीं करेगा, जब तक कि उस पर कम से कम ब्रिगेड का समादेशन करने वाले आफिसर का अनुमोदन प्राप्त न हो गया हो ।
162. सम्मरी सेना-न्यायालय की कार्यवाहियों का पारेषण-हर सम्मरी सेना-न्यायालय की कार्यवाहियां उस डिवीजन या ब्रिगेड के, जिसमें विचारण किया गया था, समादेशन करने वाले आफिसर को या विहित आफिसर को अविलम्ब भेजी जाएंगी, और ऐसा आफिसर या [थल सेनाध्यक्षट अथवा 1[थल सेनाध्यक्षट द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया आफिसर, मामले के गुणागुण पर आधारित कारणों पर, न कि केवल प्राविधिक आधारों पर, कार्यवाहियों को अपास्त कर सकेगा या उस दण्डादेश को किसी अन्य ऐसे दण्डादेश तक घटा सकेगा, जो कि वह न्यायालय पारित कर सकता था ।
163. कतिपय मामलों में निष्कर्ष या दण्डादेश का परिवर्तित किया जाना-(1) जहां कि किसी सेना-न्यायालय द्वारा दोषी होने का ऐसा निष्कर्ष जिसकी पुष्टि हो चुकी है या जिसकी पुष्टि होनी अपेक्षित नहीं है, किसी कारण से अविधिमान्य पाया जाता है या साक्ष्य से उसका समर्थन नहीं होता है, वहां वह प्राधिकारी, जिसे, यदि निष्कर्ष विधिमान्य होता, दण्डादेश द्वारा अधिनिर्णीत दण्ड को लघुकृत करने की शक्ति धारा 179 के अधीन होती, नया निष्कर्ष प्रतिस्थापित कर सकेगा और ऐसे निष्कर्ष में विनिर्दिष्ट या अन्तर्वलित अपराध के लिए दण्डादेश पारित कर सकेगा :
परन्तु ऐसा कोई प्रतिस्थापन तब के सिवाय, जब कि सेना-न्यायालय द्वारा उस आरोप पर ऐसा निष्कर्ष विधिमान्यतया दिया जा सकता था, और तब के सिवाय, जब कि यह प्रतीत हो कि उक्त अपराध साबित करने वाले तथ्यों के बारे में सेना-न्यायालय का समाधान आवश्यक हो गया होगा, नहीं किया जाएगा ।
(2) जहां कि सेना-न्यायालय द्वारा पारित दण्डादेश, जिसकी पुष्टि हो चुकी है या जिसकी पुष्टि होनी अपेक्षित नहीं है, किन्तु जो उपधारा (1) के अधीन प्रतिस्थापित नए निष्कर्ष के अनुसरण में पारित दण्डादेश नहीं है, किसी कारण से अविधिमान्य पाया जाता है, वहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी विधिमान्य दण्डादेश पारित कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन पारित दण्डादेश द्वारा अधिनिर्णीत दण्ड, दण्डों के मापमान में उस दण्ड से उच्चतर नहीं होगा और न उस दण्ड से अधिक होगा, जो उस दण्डादेश द्वारा अधिनिर्णीत किया गया है, जिसके लिए इस धारा के अधीन नया दण्डादेश प्रतिस्थापित किया गया है ।
(4) इस धारा के अधीन प्रतिस्थापित कोई निष्कर्ष या पारित कोई दण्डादेश इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों के प्रयोजनों के लिए ऐसे प्रभावी होगा, मानो वह किसी सेना-न्यायालय का, यथास्थिति, निष्कर्ष या दण्डादेश हो ।
164. सेना-न्यायालय के आदेश, निष्कर्ष या दण्डादेश के विरुद्ध उपचार-(1) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो किसी सेना-न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश से अपने को व्यथित समझता है, उस आफिसर या प्राधिकारी को, जो उस सेना-न्यायालय के किसी निष्कर्ष या दण्डादेश की पुष्टि करने के लिए सशक्त है, अर्जी दे सकेगा, और पुष्टिकर्ता प्राधिकारी, पारित आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में या जिस कार्यवाही से वह आदेश संबद्ध है, उसकी नियमितता के बारे में अपना समाधान करने के लिए कार्यवाही कर सकेगा, जैसी आवश्यक समझी जाए ।
(2) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो सेना-न्यायालय के ऐसे निष्कर्ष या दण्डादेश से, जिसकी पुष्टि की जा चुकी है, अपने को व्यथित समझता है, केन्द्रीय सरकार 1[थल सेनाध्यक्षट या समादेश में उस आफिसर से, जिसने उस निष्कर्ष या दण्डादेश की पुष्टि की है, वरिष्ठ किसी विहित आफिसर को अर्जी दे सकेगा, और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार, 1[थल सेनाध्यक्षट या अन्य आफिसर उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा, जैसा वह ठीक समझे ।
165. कार्यवाहियों का बातिल किया जाना-केन्द्रीय सरकार, 1[थल सेनाध्यक्षट या कोई विहित आफिसर किसी सेना-न्यायालय की कार्यवाहियों को इस आधार पर बातिल कर सकेगा कि वे अवैध या अन्यायपूर्ण हैं ।
अध्याय 13
दण्डादेशों का निष्पादन
166. मृत्यु दण्डादेश का रूप-सेना-न्यायालय मृत्यु का दण्डादेश अधिनिर्णीत करने में स्वविवेकानुसार निदेश देगा कि अपराधी की मृत्यु ऐसे घटित की जाए कि जब तक वह मर न जाए, तब तक उसे गर्दन में फांसी लगाकर लटकाए रखा जाए या उसे गोली से मार दिया जाए ।
167. निर्वासन या कारावास के दण्डादेश का प्रारम्भ-जब कभी कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन किसी सेना-न्यायालय द्वारा निर्वासन या कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है, तब उस दण्डादेश की अवधि, चाहे पुनरीक्षित किया गया हो या नहीं, उस दिन प्रारम्भ हुई मानी जाएगी, जिस दिन की मूल कार्यवाही पीठासीन आफिसर द्वारा या सम्मरी सेना-न्यायालय की दशा में, न्यायालय द्वारा हस्ताक्षरित की गई थी ।
168. निर्वासन के दण्डादेश का निष्पादन-जब कभी निर्वासन का कोई दण्डादेश इस अधिनियम के अधीन पारित किया जाता है या जब कभी मृत्यु का दण्डादेश निर्वासन में लघुकृत किया जाता है, तब दण्डादिष्ट व्यक्ति का कमान आफिसर, या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, उस सिविल कारागार के भारसाधक आफिसर को, जिसमें ऐसे व्यक्ति को परिरुद्ध किया जाना है, विहित प्ररूप में अधिपत्र भेजेगा और अधिपत्र के साथ उसे उस कारागार को भेजे जाने का प्रबंध करेगा ।
169. कारावास के दण्डादेश का निष्पादन-(1) जब कभी कारावास का कोई दण्डादेश सेना-न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन पारित किया जाता है या जब कभी मृत्यु या निर्वासन का कोई दण्डादेश कारावास में लघुकृत किया जाता है, तब पुष्टिकर्ता आफिसर या सम्मरी सेना-न्यायालय की दशा में, न्यायालय अधिविष्ट करने वाला आफिसर या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, उपधारा (3) और (4) में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसे छोड़कर, यह निदेश देगा कि या तो दण्डादेश सैनिक कारागार में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा अथवा सिविल कारागार में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा ।
(2) जब कि कोई निदेश उपधारा (1) के अधीन दिया गया है, तब दण्डादिष्ट व्यक्ति का कमान आफिसर, या ऐसा अन्य आफिसर जो, विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को, जिसमें ऐसे व्यक्ति को परिरुद्ध किया जाना है, विहित प्ररूप में अधिपत्र भेजेगा और अधिपत्र के साथ उसे उस कारागार को भेजे जाने का प्रबन्ध करेगा ।
(3) तीन मास से अनधिक की कालावधि के कारावास के और सेना-न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन पारित दण्डादेश की दशा में, उपधारा (1) के अधीन समुचित आफिसर निदेश दे सकेगा कि दण्डादेश किसी सिविल या सैनिक कारागार के बजाय सैनिक अभिरक्षा में परिरोध करके कार्यान्वित किया जाए ।
(4) सक्रिय सेवा पर की दशा में, कारावास का दण्डादेश ऐसे स्थान में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जा सकेगा, जिसे फील्ड में बलों का समादेशन करने वाला आफिसर समय-समय पर नियुक्त करे ।
[169क. आफिसर या व्यक्ति द्वारा भोगी गई अभिरक्षा की कालावधि का कारावास के प्रति मुजरा किया जाना-जब इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति या आफिसर, सेना-न्यायालय द्वारा किसी अवधि के कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है, जो जुर्माने के संदाय में व्यतिक्रम के लिए कारावास नहीं है, तो उसी मामले के अन्वेषण, जांच या विचारण के दौरान, और ऐसे दण्डादेश की तारीख के पहले, उसके द्वारा सिविल या सैनिक अभिरक्षा में बिताई गई कालावधि का उस पर अधिरोपित कारावास की अवधि के प्रति मुजरा किया जाएगा और ऐसे दण्डादेश पर उस व्यक्ति या आफिसर का कारावास भुगतने का दायित्व उस पर अधिरोपित कारावास की अवधि के शेष भाग तक, यदि कोई हो, निर्बन्धित होगा ।]
170. अपराधी की अस्थायी अभिरक्षा-जहां कि यह निदेश दिया गया है कि निर्वासन या कारावास का दण्डादेश सिविल कारागार में भोगा जाए, वहां अपराधी उस समय तक, जब तक कि उसे किसी सिविल कारागार में भेजना संभव न हो जाए, किसी सैनिक कारागार में या सैनिक अभिरक्षा में या किसी अन्य उचित स्थान में, रखा जा सकेगा ।
171. विशेष दशाओं में कारावास के दण्डादेश का निष्पादन-जब कभी किसी सेना, सेना-कोर, डिवीजन या स्वतंत्र ब्रिगेड का समादेशन करने वाले आफिसर की राय में, कारावास का कोई दण्डादेश या कारावास के दण्डादेश का कोई प्रभाग धारा 169 के उपबन्धों के अनुसार किसी सैनिक कारागार में या सैनिक अभिरक्षा में विशेष कारणों से सुविधापूर्वक कार्यान्वित नहीं किया जा सकता, तब वह, आफिसर निदेश दे सकेगा कि वह दण्डादेश या उस दण्डादेश का वह प्रभाग किसी सिविल कारागार या अन्य उचित स्थान में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जाए ।
172. कैदी का स्थान-स्थान को प्रवहण-जो व्यक्ति निर्वासन या कारावास के दण्डादेश के अधीन है वह एक स्थान से दूसरे स्थान को अपने प्रवहण के दौरान या उस दशा में जिसमें वह पोत या वायुयान के फलक पर या अन्यथा, ऐसे अवरोध के अध्यधीन किया जा सकेगा, जो उसके सुरक्षित रूप से ले जाए जाने और अपसारण के लिए आवश्यक हो ।
173. कतिपय आदेशों का कारागार आफिसरों को संसूचित किया जाना-जब कभी किसी दण्डादेश, आदेश या अधिपत्र को, जिसके अधीन कोई व्यक्ति सिविल या सैनिक कारागार में परिरुद्ध है, अपास्त करने या उसमें फेरफार करने का कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन सम्यक्तः किया जाता है, तब ऐसे आदेश के अनुसार एक अधिपत्र, उस आदेश को करने वाले आफिसर या उसके स्टाफ आफिसर या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जो विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को भेजा जाएगा, जिसमें वह व्यक्ति परिरुद्ध है ।
174. जुर्माने के दण्डादेश का निष्पादन-जब कि जुर्माने का दण्डादेश किसी सेना-न्यायालय द्वारा धारा 69 के अधीन अधिरोपित किया जाए तब चाहे विचारण भारत में हुआ हो या नहीं हो, ऐसे दण्डादेश की पुष्टिकर्ता आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित एक प्रति भारत में के किसी मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी और वह मजिस्ट्रेट तदुपरि उस जुर्माने को, [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के या [जम्मू-कश्मीर राज्यट में प्रवृत्त किसी तत्समान विधि के उपबंधों के, जो जुर्मानों के उद्ग्रहण के लिए है, अनुसार ऐसे वसूल कराएगा, मानो वह उस मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित जुर्माने का दण्डादेश हो ।
175. सैनिक कारागारों की स्थापना और विनियमन-केन्द्रीय सरकार अपने नियंत्रणाधीन के किसी निर्माण या निर्माण के भाग या किसी स्थान को उन व्यक्तियों के परिरोध के लिए, जिन्हें इस अधिनियम के अधीन कारावास से दण्डादिष्ट किया गया हो, सैनिक कारागार के रूप में पृथक् रख सकेगी ।
176. आदेश या अधिपत्र में अप्ररूपिता या गलती-जब कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन निर्वासन या कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है और वह उस दण्डादेश को किसी ऐसे स्थान या रीति में भोग रहा है, जिसमें कि वह इस अधिनियम के अनुसरण में किसी विधिपूर्ण आदेश या अधिपत्र के अधीन परिरुद्ध किया जा सकता है, तब ऐसे व्यक्ति का परिरोध केवल इस कारण अवैध न समझा जाएगा कि उस आदेश, अधिपत्र या अन्य दस्तावेज या उस प्राधिकार में या के संबंध में जिसके द्वारा या जिसके अनुसरण में वह व्यक्ति ऐसे स्थान में लाया गया था या परिरुद्ध है, कोई अप्ररूपिता या गलती है, और ऐसे किसी आदेश, अधिपत्र या दस्तावेज को तद्नुसार संशोधित किया जा सकेगा ।
177. कारागारों और कैदियों के बारे में नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित बातों के लिए उपबंध करने वाले नियम बना सकेगी-
(क) सैनिक कारागारों का शासन, प्रबन्ध और विनियमन;
(ख) उनके निरीक्षकों, परिदर्शकों, गर्वनरों और आफिसरों की नियुक्ति, हटाया जाना और शक्तियां;
(ग) उनमें परिरोध भोग रहे कैदियों का श्रम और व्यक्तियों को समर्थ बनाने के लिए विशेष उद्योग और अच्छे आचरण द्वारा वे अपने दण्डादेश के प्रभाग का परिहार उपार्जित कर सकें;
(घ) ऐसे कैदियों की सुरक्षित अभिरक्षा और उनमें अनुशासन बनाए रखना और उन्हें उनके द्वारा किए गए अपराधों के लिए दण्ड का शारीरिक सजा द्वारा, अवरोध द्वारा या अन्यथा दिया जाना;
(ङ) कारागार अधिनियम, 1894 (1894 का 9) के उन उपबंधों में से किन्हीं को सैनिक कारागारों पर लागू करना, जो कारागारों के आफिसरों के कर्तव्यों और उन व्यक्तियों को, जो कैदी नहीं हैं, दण्ड देने से सम्बद्ध है;
(च) किसी कारागार में उचित समयों पर और उचित निर्बन्धनों के अध्यधीन उन व्यक्तियों का प्रवेश, जिनके साथ बातचीत करने की कैदी वांछा करें, और विचारणाधीन कैदियों द्वारा अपने विधि सलाहकारों से श्रवणगोचर दूरी के अन्दर यावत्सम्भव किसी पर व्यक्ति की उपस्थिति के बिना, परामर्श ।
178. नियम बनाने की शक्ति पर शारीरिक दण्ड के बारे में निर्बन्धन-धारा 177 के अधीन बनाए गए नियम न तो किसी अपराध के लिए शारीरिक दण्ड का दिया जाना प्राधिकृत करेंगे और न कारावास को उससे अधिक कठोर बनाएंगे जितना वह सिविल कारागारों के संबंध में तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन हो ।
अध्याय 14
क्षमा, परिहार और निलम्बन
179. क्षमा और परिहार-जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति सेना-न्यायालय द्वारा किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, तब केन्द्रीय सरकार या [थल सेनाध्यक्षट अथवा ऐसे दण्डादेश की दशा में, जिसे वह पुष्ट कर सकता था या जिसकी पुष्टि अपेक्षित नहीं थी, उस सेना, सेना-कोर, डिवीजन या स्वतंत्र ब्रिगेड का, जिसमें वह व्यक्ति दोषसिद्धि के समय सेवा करता था, समादेशन करने वाला आफिसर या विहित आफिसर-
(क) या तो उन शर्तों के सहित या बिना जिन्हें दण्डादिष्ट व्यक्ति प्रतिगृहीत करता है, उस व्यक्ति को क्षमा कर सकेगा या अधिनिर्णीत सम्पूर्ण दण्ड या उसके किसी भाग का परिहार कर सकेगा, अथवा
(ख) अधिनिर्णीत दण्ड में कमी कर सकेगा, अथवा
(ग) ऐसे दण्ड को इस अधिनियम में वर्णित किसी कम दण्ड या दण्डों में लघुकृत कर सकेगा :
परन्तु निर्वासन का दण्डादेश न्यायालय द्वारा अधिनिर्णीत निर्वासन की अवधि से अधिक की अवधि के कारावास के दण्डादेश में लघुकृत नहीं किया जाएगा, अथवा
(घ) या तो उन शर्तों के सहित या बिना, जिन्हें दण्डादिष्ट व्यक्ति प्रतिगृहीत करता है, उस व्यक्ति को पैरोल पर निर्मुक्त कर सकेगा ।
180. सशर्त क्षमा, पैरोल पर निर्मुक्त या परिहार को रद्द करना-(1) यदि कोई शर्त, जिस पर किसी व्यक्ति को क्षमा प्रदान किया गया है या पैरोल पर निर्मुक्त किया गया है या जिस पर किसी दण्ड का परिहार किया गया है, उस प्राधिकारी की राय में जिसने क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार अनुदत्त किया था पूरी नहीं की गई है तो वह प्राधिकारी उस क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार को रद्द कर सकेगा और तदुपरि न्यायालय का दण्डादेश ऐसे क्रियान्वित किया जाएगा मानो ऐसी क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार अनुदत्त नहीं किया गया था ।
(2) वह व्यक्ति, जिसके निर्वासन या कारावास का दण्डादेश उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन क्रियान्वित किया जाता है, अपने दण्डादेश का केवल अनवसित प्रभाव ही भोगेगा ।
181. वारण्ट आफिसर या अनायुक्त आफिसर की अवनति-जब कि धारा 77 के उपबन्धों के अधीन कोई वारण्ट आफिसर या अनायुक्त आफिसर सामान्य सैनिकों में अवनत किया गया समझा जाए, तब ऐसी अवनति धारा 179 के प्रयोजन के लिए सेना-न्यायालय के दण्डादेश द्वारा अधिनिर्णीत दण्ड मानी जाएगी ।
182. निर्वासन या कारावास के दण्डादेश का निलम्बन-(1) जहां कि इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, किसी सेना-न्यायालय द्वारा निर्वासन या कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार [थल सेनाध्यक्षट अथवा जनरल या सम्मरी जनरल सेना-न्यायालय संयोजित करने के लिए सशक्त कोई आफिसर दण्डादेश को निलम्बित कर सकेगा, चाहे अपराधी को कारागार के या सैनिक अभिरक्षा के सुपुर्द पहले ही कर दिया गया हो या न कर दिया गया हो ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर, ऐसे दण्डादिष्ट अपराधी की दशा में, निदेश दे सकेगा कि जब तक ऐसे प्राधिकारी या आफिसर के आदेश अभिप्राप्त न कर लिए जाएं, तब तक अपराधी को कारागार के या सैनिक अभिरक्षा के सुपुर्द नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधाराओं (1) और (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे दण्डादेश की दशा में किया जा सकेगा, जिसकी पुष्टि की जा चुकी है या जो घटा दिया गया है या लघुकृत कर दिया गया है ।
183. निलम्बन के लम्बित रहने तक आदेश-(1) जहां कि धारा 182 में निर्दिष्ट दण्डादेश, सम्मरी सेना-न्यायालय से भिन्न सेना-न्यायालय द्वारा अधिरोपित किया जाता है, वहां पुष्टिकर्ता आफिसर दण्डादेश की पुष्टि करते समय निदेश दे सकेगा कि अपराधी को कारागार के या सैनिक अभिरक्षा के सुपुर्द तब तक न किया जाए जब तक कि धारा 182 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर के आदेश अभिप्राप्त न कर लिए जाएं ।
(2) जहां कि कारावास का दण्डादेश किसी सम्मरी सेना-न्यायालय द्वारा अधिरोपित किया जाता है, वहां विचारण करने वाला आफिसर या दण्डादेश की धारा 161 की उपधारा (2) के अधीन अनुमोदित करने के लिए प्राधिकृत आफिसर उपधारा (1) में निर्दिष्ट निदेश दे सकेगा ।
184. निलम्बन पर निर्मुक्ति-जहां कि कोई दण्डादेश धारा 182 के अधीन निलम्बित किया जाता है, वहां अपराधी को अभिरक्षा से तत्काल निर्मुक्त कर दिया जाएगा ।
185. निलम्बन की कालावधि की संगणना-वह कालावधि, जिसके दौरान दण्डादेश निलम्बनाधीन है, उस दण्डादेश की अवधि का भाग मानी जाएगी ।
186. निलम्बन के पश्चात् आदेश-धारा 182 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर किसी भी समय, जिस दौरान दण्डादेश निलम्बित है, आदेश दे सकेगा कि-
(क) अपराधी उस दण्डादेश के अनवसित प्रभाग को भोगने के लिए सुपुर्द किया जाए, अथवा
(ख) दण्डादेश का परिहार किया जाए ।
187. निलम्बन के पश्चात् मामले पर पुनर्विचार-(1) जहां कि कोई दण्डादेश निलम्बित किया गया है, वहां धारा 182 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा या धारा 182 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी ऐसे जनरल या अन्य आफिसर द्वारा, जो फील्ड आफिसर के रैंक से अनिम्न रैंक का है, मामले पर पुनिर्वचार किसी भी समय किया जा सकेगा और चार मास से अनधिक अन्तरालों पर किया जाएगा ।
(2) जहां कि ऐसे प्राधिकृत आफिसर द्वारा किसी ऐसे पुनर्विचार पर उसे यह प्रतीत होता है कि अपराधी का आचरण दोषसिद्ध के पश्चात् ऐसा रहा है कि दण्डादेश का परिहार करना न्यायोचित होगा, वहां वह मामले को धारा 182 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर को निर्देशित करेगा ।
188. निलम्बन के पश्चात् नया दण्डादेश-जहां कि किसी अपराधी को उस समय के दौरान जब कि उसका दण्डादेश इस अधिनियम के अधीन निलम्बित है, किसी अन्य अपराध के लिए दण्डादिष्ट किया जाता है, वहां-
(क) यदि अतिरिक्त दण्डादेश भी इस अधिनियम के अधीन निलम्बित किया जाता है, तो वे दोनों दण्डादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे,
(ख) यदि अतिरिक्त दण्डादेश तीन मास या अधिक की कालावधि के लिए है और इस अधिनियम के अधीन निलम्बित नहीं किया जाता हे, तो अपराधी पूर्ववर्ती दण्डादेश के अनवसित प्रभाग के लिए भी कारागार या सैनिक अभिरक्षा के सुपुर्द किया जाएगा, किन्तु दोनों दण्डादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे, तथा
(ग) यदि अतिरिक्त दण्डादेश तीन मास से कम की कालावधि के लिए है और इस अधिनियम के अधीन निलम्बित नहीं किया जाता है, तो अपराधी केवल उसी दण्डादेश पर ऐसे सुपुर्द किया जाएगा और पूर्ववर्ती दण्डादेश, किसी ऐसे आदेश के अध्यधीन रहते हुए, जो धारा 186 या धारा 187 के अधीन पारित किया जाए, निलम्बित बना रहेगा ।
189. निलम्बन की शक्ति की परिधि-धाराओं 182 और 186 द्वारा प्रदत्त शक्तियां, कमी करने, परिहार और लघुकरण की शक्ति के अतिरिक्त, न कि उनके अल्पीकरण में होंगी ।
190. निलम्बन और परिहार का पदच्युति पर प्रभाव-(1) जहां कि किसी अन्य दण्डादेश के अतिरिक्त पदच्युति का दण्ड किसी सेना-न्यायालय द्वारा अधिनिर्णीत किया गया है और ऐसा अन्य दण्डादेश धारा 182 के अधीन निलम्बित किया गया है, वहां तब ऐसी पदच्युति तब तक प्रभावशील नहीं होगी, जब तक कि धारा 182 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा वैसा आदिष्ट न किया जाए ।
(2) यदि धारा 186 के अधीन ऐसे अन्य दण्डादेश का परिहार किया जाता है, तो पदच्युति के दण्ड का भी परिहार कर दिया जाएगा ।
अध्याय 15
नियम
191. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, तद्धीन बनाए गए नियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे-
(क) इस अधिनियम के अध्यधीन के व्यक्तियों का सेवा से हटाया जाना, निवृत्त किया जाना, निर्मुक्त किया जाना या उन्मोचित किया जाना,
(ख) धारा 89 के अधीन अधिरोपित किए जाने वाले जुर्मानों की रकम और उनका आपतन,
। । । ।
(घ) जांच अधिकरणों का समवेत होना और उनकी प्रक्रिया, ऐसे अधिकरणों द्वारा साक्ष्य के संक्षेपों का अभिलेखन और शपथ का दिलाया जाना या प्रतिज्ञान का कराया जाना,
(ङ) सेना-न्यायालयों का संयोजन और गठन और सेना-न्यायालयों द्वारा किए जाने वाले विचारणों में अभियोजकों की नियुक्ति,
(च) सेना-न्यायालयों का स्थगन, विघटन और बैठक,
(छ) सेना-न्यायालयों द्वारा विचारणों में अनुपालनीय प्रक्रिया और उनमें विधि-व्यवसायियों की उपसंजाति,
(ज) सेना-न्यायालयों के निष्कर्षों और दण्डादेशों की पुष्टि, पुनरीक्षण और बातिलीकरण और उनके विरुद्ध अर्जियां,
(झ) सेना-न्यायालयों के दण्डादेशों का क्रियान्वित किया जाना,
(ञ) सेना-न्यायालयों, निर्वासन और कारावास के संबंध में इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किए जाने वाले आदेशों के प्ररूप,
(ट) यह विनिश्चित करने के लिए प्राधिकारियों का गठन कि धारा 99 के अधीन आश्रितों के लिए उपबन्ध किन व्यक्तियों के लिए, किन रकमों तक और किस रीति से किया जाना चाहिए और ऐसे विनिश्चयों का सम्यक् क्रियान्वयन,
(ठ) नियमित सेना, नौसेना और वायु सेना के आफिसरों, कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों, वारण्ट आफिसरों, पैटी आफिसरों और अनायुक्त आफिसरों का, जब वे एक साथ कार्य कर रहे हों, अपेक्षित रैंक,
(ड) कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना इस अधिनियम द्वारा निर्दिष्ट हो ।
192. विनियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार धारा 191 में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों से भिन्न इस अधिनियम के सब प्रयोजनों या उनमें से किन्हीं के लिए विनियम बना सकेगी ।
193. नियमों और विनियमों का राजपत्र में प्रकाशन-इस अधिनियम के अधीन बनाए गए सभी नियम और विनियम शासकीय राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और ऐसे प्रकाशन पर ऐसे प्रभावशील होंगे मानो वे इस अधिनियम में अधिनियमित हों ।
[193क. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहींबनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
194. [निरसन ।]-निरसन तथा संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
195. [ब्रिटिश आफिसर" की परिभाषा ।]-1992 के अधिनियम सं० 37 की धारा 19 द्वारा निरसित ।
196. [ब्रिटिश आफिसर की शक्तियां ।]-1992 के अधिनियम सं० 37 की धारा 19 द्वारा निरसित ।
[अनुसूची ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।

