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सती (निवारण) अधिनियम, 1987 ( Commission of Sati (Prevention) Act, 1987 )


 

                               

सती (निवारण) अधिनियम, 1987

(1988 का अधिनियम संख्यांक 3)

[3 जनवरी, 1988]

सती कर्म के और उसके गौरवान्वयन के अधिक प्रभावी निवारण

के लिए और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों

का उपबंध करने के लिए

अधिनियम

सती या विधवाओं या स्त्रियों का जीवित दहन या गाड़ा जाना मानव प्रकृति की भावनाओं के विपरीत है और यह भारत के किसी भी धर्म में कहीं भी अनिवार्य कर्तव्य के रूप में आदिष्ट नहीं है;

और सती कर्म के और उसके गौरवान्वयन के निवारण के लिए अधिक प्रभावी उपाय करना आवश्यक है;

भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद्‌ द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:

भाग 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सती (निवारण) अधिनियम, 1987 है ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह किसी राज्य में उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा, नियत करे और भिन्न-भिन्न राज्यों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।

2. परिभाषाएं - (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,

(क) संहिता" से दंड प्रव्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) अभिप्रेत है;

(ख) सती कर्म के संबंध में, गौरवान्वयन" के अंतर्गत चाहे सती कर्म इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किया गया हो या उसके पश्चात्‌्‌, अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित है

(i) सती कर्म के संबंध में कोई अनुष्ठान करना या कोई जुलूस निकालना ; या

(ii) सती प्रथा का किसी भी रीति से समर्थन करना, न्यायोचित ठहराना या प्रचार करना; या

(iii) उस स्त्री का, जिसने सती कर्म किया है, गुणगान करने के लिए किसी समारोह का आयोजन करना; या

(iv) उस स्त्री के, जिसने सती कर्म किया है, सम्मान को कायम रखने या स्मृति को बनाए रखने की दृष्टि से किसी न्यास का सृजन करना या निधि का संग्रह करना, या कोई मंदिर या अन्य संरचना सन्निर्मित करना या उसमें किसी भी रूप में उपासना करना या कोई अनुष्ठान करना;

(ग) सती कर्म" से अभिप्रेत है,

(i) किसी विधवा का उसके मृत पति या किसी अन्य नातेदार के शरीर के साथ या पति या ऐसे नातेदार से संबंधित किसी वस्तु, पदार्थ या चीज के साथ जीवित दहन या गाड़ देने का कार्य; अथवा

(ii) किसी स्त्री का उसके किसी भी नातेदार के शरीर के साथ जीवित दहन या गाड़ देने का कार्य, भले ही यह दावा किया जाए कि ऐसा दहन या गाड़ देना विधवा या स्त्री की ओर से स्वेच्छा से किया गया है या अन्यथा;

(घ) विशेष न्यायालय" से धारा 9 के अधीन गठित विशेष न्यायालय अभिप्रेत है;

(ङ) मंदिर" के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति की, जिसके संबंध में सती कर्म किया गया है, स्मृति बनाए रखने के लिए सन्निर्मित या बनाया गया और किसी भी रूप में उपासना करने के लिए या ऐसे सती कर्म के संबंध में कोई अन्य अनुष्ठान करने के लिए उपयोग किया जाने वाला या उपयोग किए जाने के लिए आशयित कोई भवन या कोई संरचना है चाहे उस पर छत है या नहीं ।

(2) उन शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) या संहिता में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो भारतीय दंड संहिता में हैं ।

भाग 2

सती कर्म से संबंधित अपराधों के लिए दंड

3. सती कर्म करने का प्रयत्न-भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में किसी बात के होते हुए भी, जो कोई सती कर्म करने का प्रयत्न करेगा और सती कर्म करने का कोई कार्य करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा:

परंतु इस धारा के अधीन किसी अपराध का विचारण करने वाला विशेष न्यायालय किसी व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराने से पूर्व, अपराध किए जाने की परिस्थितियों, किए गए कार्य, अपराध से आरोपित व्यक्ति की कार्य करने के समय मानसिक दशा और अन्य सभी सुसंगत बातों पर विचार करेगा ।

4. सती कर्म करने का दुष्प्रेरण -(1) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में किसी बात के होते हुए भी, यदि कोई स्त्री सती कर्म करती है, तो जो कोई सती कर्म करने का, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः दुष्प्रेरण करेगा, वह मृत्यु से, या आजीवन कारावास से, दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा ।

(2) यदि कोई स्त्री सती कर्म करने का प्रयत्न करती है, तो जो कोई ऐसे प्रयत्न का प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः दुष्प्रेरण करेगा, वह आजीवन कारावास से दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा ।

स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित कार्यों में से किसी कार्य या तत्समान कार्यों को भी दुष्प्रेरण समझा जाएगा, अर्थात्‌:

(क) किसी विधवा या स्त्री को उसके मृत पति या किसी अन्य नातेदार के शरीर के साथ या पति या ऐसे नातेदार से संबंधित किसी वस्तु, पदार्थ या चीज के साथ, स्वयं का जीवित दहन कर लेने या गड़ जाने के लिए उत्प्रेरित करना, चाहे वह ठीक मानसिक दशा में है या मत्तता या संज्ञा शून्यता की हालत में है या ऐसा कोई अन्य कारण है जो उसकी स्वतंत्र इच्छा के प्रयोग में बाधा डाल रहा है;

(ख) किसी विधवा या स्त्री को यह विश्वास दिलाना कि सती कर्म के परिणामस्वरूप उसे या उसके मृत पति या नातेदार को कुछ आध्यात्मिक लाभ होगा या कुटुम्ब का पूर्ण कल्याण होगा;

(ग) किसी विधवा या स्त्री को, सती कर्म करने के उसके संकल्प में दृढ़ बने रहने के लिए प्रोत्साहित करना और इस प्रकार उसे सती कर्म करने के लिए उकसाना;

(घ) सती कर्म से संबंधित किसी जुलूस में भाग लेना या विधवा या स्त्री को उसके मृत पति या नातेदार के शरीर के साथ शवदाह या शमशान भूमि तक ले जाकर सती कर्म करने के उसके विनिश्चय में सहायता करना;

(ङ) उस स्थान पर, जहां सती कर्म किया जा रहा है, सती कर्म करने के कार्य में या उससे संबंधित किसी अनुष्ठान में सव्रिय सहभागी के रूप में उपस्थित रहना;

(च) विधवा या स्त्री को, जीवित दहन या गाड़े जाने से अपने को बचाने से रोकना या उसमें बाधा पहुंचाना;

(छ) सती कर्म के निवारण के लिए पुलिस के कोई कदम उठाने के उसके कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा पहुंचाना या हस्तक्षेप करना ।

5. सती कर्म के गौरवान्वयन के लिए दंड - जो कोई सती कर्म के गौरवान्वयन के लिए कोई कार्य करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो तीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

भाग 3

सती कर्म से संबंधित अपराधों के निवारण के लिए कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट की शक्तियां

6. कुछ कार्यों का प्रतिषेध करने की शक्ति- (1) जहां कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट की यह राय है कि सती कर्म किया जा रहा है या उसके किए जाने का दुष्प्रेरण किया जा रहा है या सती कर्म किया जाने वाला है वहां वह, आदेश द्वारा, ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों में, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, किसी व्यक्ति द्वारा सती कर्म से संबंधित किसी कार्य के किए जाने का प्रतिषेध कर सकेगा ।

(2) कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट, आदेश द्वारा, उस आदेश में विनिर्दिष्ट किसी क्षेत्र या क्षेत्रों में किसी व्यक्ति द्वारा सती कर्म के किसी रीति से गौरवान्वयन को प्रतिषिद्ध कर सकेगा ।

(3) जो कोई उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश का उल्लंघन करेगा, वह, यदि ऐसा उल्लंघन इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन दंडनीय नहीं है तो कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो तीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

7. कुछ मंदिरों या अन्य संरचनाओं को हटाने की शक्ति - (1) यदि राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी मंदिर या अन्य संरचना में, जो बीस वर्ष से अन्यून समय से विद्यमान है, किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसके संबंध में सती कर्म किया गया है, सम्मान को कायम रखने या उसकी स्मृति को बनाए रखने की दृष्टि से किसी रूप में उपासना या कोई अनुष्ठान किया जाता है तो वह, आदेश द्वारा, ऐसे मंदिर या संरचना को हटाने का निदेश दे सकेगी ।

(2) यदि कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट से भिन्न किसी मंदिर या अन्य संरचना में, ऐसे व्यक्ति के, जिसके संबंध में सती कर्म किया गया है, सम्मान को कायम रखने या उसकी स्मृति को बनाए रखने की दृष्टि से किसी रूप में उपासना या कोई अन्य अनुष्ठान किया जाता है तो वह, आदेश द्वारा, ऐसे मंदिर या संरचना को हटाने का निदेश दे सकेगा ।

(3) जहां उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, वहां, यथास्थिति, राज्य सरकार या कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट, मंदिर या अन्य संरचना को किसी ऐसे पुलिस अधिकारी के, जो उपनिरीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो, माध्यम से, व्यतिव्रमी के खर्चे पर, हटवाएगा ।

8. कुछ संपत्तियां अभिग्रहण करने की शक्ति - (1) जहां कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण है कि सती कर्म के गौरवान्वयन के प्रयोजन के लिए कोई निधि या संपत्ति संगृहीत या आजत की गई है या जो ऐसी परिस्थितियों में पाई जाती है जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के किए जाने का संदेह उत्पन्न करती है, वहां वह ऐसी निधि या संपत्ति का अभिग्रहण कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन कार्य करने वाला प्रत्येक कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट, किसी ऐसे अपराध का, जिसके संबंध में ऐसी निधि या संपत्ति संगृहीत या आजत की गई थी, विचारण करने के लिए गठित विशेष न्यायालय को, यदि कोई है, ऐसे अभिग्रहण की रिपोर्ट देगा और उसके व्ययन के बारे में ऐसे विशेष न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा करेगा ।   

भाग 4

विशेष न्यायालय

9. इस अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण - (1) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन सभी अपराध, इस धारा के अधीन गठित किसी विशेष न्यायालय द्वारा ही विचारणीय होंगे ।

(2) राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन अपराधों के विचारण के लिए राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक विशेष न्यायालय गठित करेगी और प्रत्येक विशेष न्यायालय संपूर्ण राज्य या उसके ऐसे भाग की बाबत, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, अधिकारिता का प्रयोग करेगा ।

(3) विशेष न्यायालय में ऐसा न्यायाधीश पीठासीन होगा जो राज्य सरकार द्वारा, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से, नियुक्त किया जाएगा ।

(4) कोई व्यक्ति किसी विशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक आहत नहीं होगा जब तक वह ऐसी नियुक्ति में ठीक पूर्व, किसी राज्य में सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश नहीं हो ।

10. विशेष लोक अभियोजक - (1) प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए राज्य सरकार किसी व्यक्ति को विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त करेगी ।

(2) कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किए जाने का तभी पात्र होगा जब उसने सात वर्ष से अन्यून अवधि तक आधवक्ता के रूप में व्यवसाय किया है, या राज्य के अधीन सात वर्ष से अन्यून अवधि तक ऐसा कोई पद धारण किया है, जिसमें विधि के विशेष ज्ञान की अपेक्षा है ।

(3) इस धारा के अधीन विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति को संहिता की धारा 2 के खंड (प) के अर्थ में लोक अभियोजक समझा जाएगा और तद्‌नुसार संहिता के उपबंध प्रभावी होंगे ।

11. विशेष न्यायालयों की प्रव्रिया और शक्तियां - (1) विशेष न्यायालय ऐसे तथ्यों के परिवाद के प्राप्त होने पर जिनसे ऐसा अपराध गठित होता है या ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर, अभियुक्त को विचारण के लिए अपने को सुपुर्द किए जाने के बिना, किसी अपराध का संज्ञान कर सकेगा ।

(2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, विशेष न्यायालय को किसी अपराध के विचारण के प्रयोजन के लिए, सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और ऐसे अपराधों का विचारण यावत्‌्‌शक्य, सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए संहिता में विहित प्रव्रिया के अनुसार वैसे ही करेगा मानो वह सेशन न्यायालय हो ।

12. विशेष न्यायालयों की अन्य अपराधों की बाबत शक्ति - (1) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करते समय, विशेष न्यायालय ऐसे किसी अन्य अपराध का भी विचारण कर सकेगा जिसके लिए अभियुक्त पर उसी विचारण में संहिता के अधीन आरोप लगाया जाए यदि अपराध ऐसे अन्य अपराध से संबंधित है ।

(2) यदि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के किसी विचारण के दौरान यह पाया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति ने इस अधिनियम के अधीन या किसी अन्य विधि के अधीन कोई अन्य अपराध किया है, तो विशेष न्यायालय, ऐसे व्यक्ति को ऐसे अन्य अपराध के लिए भी सिद्धदोष ठहरा सकेगा और उसके दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा या ऐसी अन्य विधि द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश पारित कर सकेगा ।

(3) प्रत्येक जांच या विचारण में, कार्यवाही यथासंभव शीघ्रता के साथ की जाएगी और विशिष्टतया वहां जहां साक्षियों की परीक्षा प्रारंभ हो गई है, वह दिन प्रति दिन तब तक चलती रहेगी जब तक हाजिर सभी साक्षियों की परीक्षा नहीं हो जाती है, और यदि कोई विशेष न्यायालय उसका पश्चात्‌्‌वर्ती तारीख से आगे के लिए स्थगित किया जाना आवश्यक समझता है तो वह ऐसा करने के लिए अपने कारण लेखबद्ध करेगा ।

13. निधि या संपत्ति का समपहरण - जहां किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है, वहां ऐसे अपराध का विचारण करने वाला विशेष न्यायालय, यदि वह ऐसा करना आवश्यक समझे तो, यह घोषणा कर सकेगा कि धारा 8 के अधीन अभिगृहीत कोई निधि या संपत्ति राज्य को समपहृत हो जाएगी ।

14. अपील - (1) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, विशेष न्यायालय के किसी निर्णय, दंडादेश या आदेश से, जो अंतर्वर्ती आदेश नहीं है, तथ्य और विधि, दोनों पर उच्च न्यायालय को साधिकार अपील होगी ।

(2) इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील उस निर्णय, दंडादेश या आदेश की तारीख से, जिससे अपील की गई है, तीस दिन के भीतर की जाएगी: 

परंतु उच्च न्यायालय, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी के पास तीस दिन की अवधि के भीतर अपील न करने के लिए पर्याप्त कारण था तो, तीस दिन की उक्त अवधि के अवसान के पश्चात्‌ कोई अपील ग्रहण कर सकेगा ।

भाग 5

प्रकीर्ण

15. इस अधिनियम के अधीन की गई कार्रवाई का संरक्षण - इस अधिनियम या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अनुसरण में, सद्‌्‌भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही राज्य सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

16. सबूत का भार - जहां किसी व्यक्ति को धारा 4 के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजित किया गया है वहां यह साबित करने का भार कि उसने उक्त धारा के अधीन अपराध नहीं किया है, उस पर होगा ।

17. कुछ व्यक्तियों की इस अधिनियम के अधीन अपराध किए जाने के बारे में रिपोर्ट करने की बाध्यता - (1) सरकार के सभी अधिकारियों से, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के उपबंधों के निष्पादन में पुलिस की सहायता करने के लिए अपेक्षा की जाती है और उन्हें सशक्त किया जाता है ।

(2) सभी ग्राम अधिकारी और ऐसे अन्य अधिकारी, जिन्हें कलक्टर या जिला मजिस्ट्रेट किसी क्षेत्र के संबंध में विनिर्दिष्ट करे और ऐसे क्षेत्र के सभी निवासी, यदि उन्हें यह विश्वास करने का कारण है, या यह ज्ञान है कि उस क्षेत्र में सती कर्म किया जाने वाला है या सती कर्म किया गया है तो, ऐसे तथ्य की रिपोर्ट निकटतम पुलिस थाने में तुरंत करेंगे ।

(3) जो कोई उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा ।

18. धारा 4 के अधीन किसी अपराध के सिद्धदोष व्यक्ति का कुछ संपत्ति विरासत में पाने से निरर्हित होना - सती कर्म करने के संबंध में धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध को सिद्धदोष व्यक्ति, ऐसे व्यक्ति की, जिसके संबंध में सती कर्म किया गया है, संपत्ति या ऐसे अन्य व्यक्ति की संपत्ति, जिसका वह ऐसे व्यक्ति की, जिसके संबंध में सती कर्म किया गया है, मृत्यु पर विरासत में पाने का हकदार होता, विरासत में पाने से निरर्हित हो जाएगा ।

19. 1951 के अधिनियम 43 का संशोधन - लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में,

(क) धारा 8 की उपधारा (2) में, परन्तुक के पश्चात्‌ निम्नलिखित परंतुक अंतः स्थापित किया जाएगा, अर्थात्‌:

 परन्तु यह और कि सती (निवारण) अधिनियम, 1987 के किन्हीं उपबंधों के उल्लंघन के लिए किसी विशेष न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराया गया व्यक्ति ऐसी दोषसिद्धि की तारीख से निरर्हित होगा और अपने छोड़े जाने से पांच वर्ष की आतरिक्त अवधि के लिए निरर्हित बना रहेगा ।"  

(ख) धारा 123 में, खंड (3क) के पश्चात्‌ निम्नलिखित खंड अंतः स्थापित किया जाएगा, अर्थात्‌्‌: 

(3ख) किसी अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता या अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सहमति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, उस अभ्यर्थी के निर्वाचन की संभाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए या किसी अभ्यर्थी के निर्वाचन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए सती प्रथा या उसके कर्म का प्रचार या उसका गौरवान्वयन ।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए सती कर्म” और सती कर्म के संबंध में गौरवान्वयन" के व्रमशः वही अर्थ होंगे जो सती (निवारण) अधिनियम, 1987 में हैं ।।

20. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना - इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश का उपबंध, इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति में या इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में, उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।

21. नियम बनाने की शक्ति - (1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र, संसद्‌ के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा  यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुव्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुव्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात्‌ वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात्‌ वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

22. विद्यमान विधियों का निरसन - (1) किसी राज्य में इस अधिनियम के प्रारंभ होने के ठीक पूर्व उस राज्य में प्रवृत्त सभी विधियां, जो सती कर्म के निवारण या गौरवान्वयन का उपबंध करती हैं, ऐसे प्रारंभ पर, निरसित हो जाएंगी ।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन निरसित किसी विधि के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी और, विशिष्टतया इस प्रकार निरसित किसी विधि के उपबंधों के अधीन किसी विशेष न्यायालय द्वारा संज्ञान किए गए और उस राज्य में इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व उसके समक्ष लंबित किसी मामले पर कार्रवाई ऐसे प्रारम्भ के पश्चात्‌ उस विशेष न्यायालय द्वारा वैसे ही जारी रहेगी, मानो वह विशेष न्यायालय इस अधिनियम की धारा 9 के अधीन गठित किया गया हो । 

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