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संसद्‌ के अधिनियम निःशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार, संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 ( Persons with Disabilities (Equal opportunities, Protection of Rights and Full Participation) Act, 1995 (Repealed) )


 

संसद्‌ के अधिनियम

निःशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार, संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995

(1996 का अधिनियम संख्यांक 1)

[1 जनवरी, 1996]

एशियाई और प्रशांत क्षेत्र में निःशक्त व्यक्तियों

की पूर्ण भागीदारी और समानता

संबंधी उद्‌्‌घोषणा को प्रभावी

बनाने के लिए

अधिनियम

एशियाई और प्रशांत क्षेत्र संबंधी आर्थिक और सामाजिक आयोग द्वारा निःशक्त व्यक्तियों की एशियाई और प्रशांत क्षेत्र दशाब्दी 1993-2002 को आरंभ करने के लिए 1 दिसंबर से 5 दिसंबर, 1992 को पेइचिंग में बुलाए गए अधिवेशन में एशियाई और प्रशांत क्षेत्र में निःशक्त व्यक्तियों की पूर्ण भागीदारी और समानता संबंधी उद्‌्‌घोषणा को अंगीकार किया गया ;

और भारत उक्त उद्‌्‌घोषणा का एक हस्ताक्षरकर्ता है ;

और पूर्वोक्त उद्‌्‌घोषणा को कार्यान्वित करना अविश्यक समझा जाता है ;

भारत गणराज्य के छियालीसवें वर्ष में संसद्‌ द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ - (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम निःशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 है ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं - इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,

(क) समुचित सरकार" से अभिप्रेत है,

(i) केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा पूर्णतः या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित किसी स्थापन या छावनी अधिनियम, 1924 (1924 का 2) के अधीन गठित किसी छावनी बोर्ड के संबंध में, केन्द्रीय सरकार ;

(ii) किसी राज्य सरकार या उस सरकार द्वारा पूर्णतः या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित किसी स्थापन, या छावनी बोर्ड से भिन्न किसी स्थानीय प्राधिकारी के संबंध में, राज्य सरकार ;  

(iii) केन्द्रीय समन्वय समिति और केन्द्रीय कार्यपालिका समिति की बाबत, केन्द्रीय सरकार ; और

(iv) राज्य समन्वय समिति और राज्य कार्यपालिका समिति की बाबत, राज्य सरकार ;

(ख) अंधता" उस अवस्था को निर्दिष्ट करती है जहां कोई व्यक्ति निम्नलिखित अवस्था में से किसी से ग्रसित है, अर्थात्‌  

(i) दृष्टि का पूर्ण अभाव ; या

(ii) सुधारक लेंसों के साथ बेहतर नेत्र में दृष्टि की तीक्ष्णता जो 6/60 या 20/200 (स्नेलन) से अधिक न हों, ; या 

(iii) दृष्टि क्षेत्र की सीमा जो 20 डिग्री कोण वाली या उससे बदतर है ;

(ग) केन्द्रीय समन्वय समिति"  से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय समन्वय समिति अभिप्रेत है ;

(घ) केन्द्रीय कार्यपालिका समिति" से धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय कार्यपालिका समिति अभिप्रेत है ;

 (ङ) प्रमस्तिष्क घात" से किसी व्यक्ति की अविकासशील अवस्थाओं का समूह अभिप्रेत है, जो विकास की प्रसवपूर्व, प्रसवकालीन या बाल अवधि में होने वाला दिमागी आघात या क्षति से पारिणामिक अप्रसामान्य प्रेरक नियंत्रण स्थिति द्वारा अभिलक्षित होता है ;

(च) मुख्य आयुक्त" से धारा 57 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त मुख्य आयुक्त अभिप्रेत है ; 

(छ) आयुक्त" से धारा 60 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त आयुक्त अभिप्रेत है ;

(ज) समक्ष प्राधिकारी" से धारा 50 के अधीन नियुक्त प्राधिकारी अभिप्रेत है ; 

(झ) निःशक्तता" से अभिप्रेत है,

(i) अन्धता ;

(ii) कम दृष्टि ;

(iii) कुष्ठ रोग मुक्त ;

(iv) श्रवण शक्ति का ह्रास ;

(v) चलन निःशक्तता ;

(vi) मानसिक संदता ;

(vii) मानसिक रूग्णता ;

(ञ) नियोजक" से अभिप्रेत है,

(i) किसी सरकार के संबंध में, इस निमित्त विभागाध्यक्ष द्वारा अधिसूचित प्राधिकारी या जहां ऐसा कोई प्राधिकारी अधिसूचित नहीं किया गया है वहां विभागाध्यक्ष ; और

(ii) किसी स्थापन के संबंध में, उस स्थापन का मुख्य कार्यपालक अधिकारी ;

(ट) स्थापन" से केन्द्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित कोई निगम अथवा सरकार अथवा किसी स्थानीय प्राधिकारी अथवा कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में परिभाषित किसी सरकारी कंपनी के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन या सहायता प्राप्त कोई प्राधिकारी या निकाय अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत किसी सरकार के विभाग हैं ;

(ठ) श्रवण शक्ति का ह्रास" से अभिप्रेत है, संवाद संबंधी रेंज की अविृत्ति में बेहतर कर्ण में साठ डेसीबेल या अधिक की हानि ;  

(ड) निःशक्त व्यक्तियों के लिए संस्था" से निःशक्त व्यक्तियों के प्रवेश, देखरेख, संरक्षण, शिक्षा, प्रशिक्षण, पुनर्वास या किसी अन्य सेवा के लिए कोई संस्था अभिप्रेत है ;

(ढ) कुष्ठ रोग मुक्त व्यक्ति", से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो कुष्ठ रोग से रोग मुक्त हो गया है किन्तु,

(i) हाथों या पैरों में संवेदना की कमी और नेत्र और पलक में संवेदना की कमी और आंशिक घात से ग्रस्त है किन्तु प्रकट  विरूपता से ग्रस्त नहीं है ;

(ii) प्रकट विरूपता और आंशिक घात से ग्रस्त है, किन्तु उसके हाथों और पैरों में पर्याप्त गतिशीलता है, जिससे वह सामान्य आर्थिक क्रियाकलाप कर सकता है ;

(iii) अत्यन्त शारीरिक विरूपता और अधिक वृद्धावस्था से ग्रस्त है जो उसे कोई भी लाभपूर्ण उपजीविका चलाने से रोकती है ;

और कुष्ठ रोग मुक्त" पद का अर्थ तद्‌्‌नुसार लगाया जाएगा ;

(ण) चलन निःशक्तता" से हडि्‌डयों, जोड़ों या मांसपेशियों की कोई ऐसी निःशक्तता अभिप्रेत है, जिससे अंगों की गति में पर्याप्त निबंधन या किसी प्रकार का प्रमस्तिष्क घात हो ;

(त) चिकित्सा प्राधिकारी" से कोई ऐसा अस्पताल या संस्था अभिप्रेत है जो समुचित सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विनिर्दिष्ट की जाए ;

(थ) मानसिक रूग्ण्ता" से मानसिक मंदता से भिन्न कोई मानसिक विकास अभिप्रेत है ;

(द) मानसिक मंदता" से अभिप्रेत है, किसी व्यक्ति के चित्त की अवरूद्ध या अपूर्ण विकास की अवस्था जो विशेष रूप से वृद्धि की अवसामान्यता द्वारा अभिलक्षित होती है ;

(ध) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(न) निःशक्त व्यक्ति" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किसी निःशक्तता के कम से कम चालीस प्रतिशत से ग्रस्त है ;

(प) कम दृष्टि वाला व्यक्ति" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जिसकी उपचार या मानक अपवर्तनीय संशोधन के पश्चात्‌ भी दृष्टि क्षमता का ह्रास हो गया है किन्तु जो समुचित सहायक युक्ति से किसी कार्य की योजना या निष्पादन के लिए दृष्टि का उपयोग करता है या उपभोग करने में संभाव्य रूप से समर्थ है ;

(फ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(ब) पुनर्वास" ऐसी प्रक्रिया के प्रति निर्देश करता है जिसका उद्देश्य निःशक्त व्यक्तियों को, उनका सर्वोत्तम शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, मानसिक या सामाजिक कृत्यकारी स्तर प्राप्त करने में और उसे बनाए रखने में समर्थ बनाना है ;

(भ) विशेष रोजगार कार्यालय" से कोई ऐसा कार्यालय या स्थान अभिप्रेत है जो सरकार द्वारा रजिस्टर रख कर या अन्यथा निम्नलिखित की बाबत जानकारी का संग्रहण करने और देने के लिए स्थापित और अनुरक्षित किया गया है, अर्थात्‌

(i) ऐसे व्यक्ति, जो निःशक्तता से ग्रस्त व्यक्तियों में से कर्मचारियों को काम में लगाना चाहते हैं ;

(ii) ऐसे निःशक्त व्यक्ति, जो नियोजन चाहते हैं ; और

(iii) ऐसे रिक्त स्थान, जिनके लिए नियोजन चाहने वाले निःशक्त व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सकती है ;

(म) राज्य समन्वय समिति" से धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन गठित राज्य समन्वय समिति अभिप्रेत है ;

(य) राज्य कार्यपालिका समिति" से धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन गठित राज्य कार्यपालिका समिति अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

केन्द्रीय समन्वय समिति

3. केन्द्रीय समन्वय समिति - (1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, केन्द्रीय समन्वय समिति नामक एक निकाय का गठन करेगी जो इस अधिनियम के अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और उसे सौंपे गए कृत्यों का पालन करेगी ।

(2) केन्द्रीय समन्वय समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्‌: -

(क) केन्द्रीय सरकार के कल्याण विभाग का भारसाधक मंत्री,                                  पदेन, अध्यक्ष;

(ख) केन्द्रीय सरकार के कल्याण विभाग का भारसाधक राज्यमंत्री,                        पदेन, उपाध्यक्ष ;

(ग) भारत सरकार के कल्याण शिक्षा, महिला और बाल विकास, व्यय, कार्मिक, प्रशिक्षण और लोक शिकायत, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, औद्योगिक विकास, शहरी कार्य और नियोजन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, विधिकार्य, लोक उद्यम विभागों के भारसाधक सचिव,                                पदेन, सदस्य ;

(घ) मुख्य आयुक्त,                           पदेन, सदस्य ;

(ङ) अध्यक्ष, रेल बोर्ड,                        पदेन, सदस्य ;

(च) महानिदेशक, क्षम, रोजगार और प्रशिक्षण,            पदेन, सदस्य ;

(छ) निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्‌्‌,                         पदेन, सदस्य ;

(ज) संसद्‌ के तीन सदस्य, जिनमें से दो सदस्य लोक सभा द्वारा और एक सदस्य राज्य सभा द्वारा निर्वाचित किया जाएगा,                                       सदस्य ;

(झ) तीन व्यक्तियों को केन्द्रीय सरकार द्वारा, ऐसे हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए, जिनको उक्त सरकार की राय में प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए, नामनिर्देशित किया जाएगा,                                               सदस्य ;

(ञ) निम्नलिखित के निदेशक

(i) राष्ट्रीय दृष्टि विकलांग संस्थान, देहरादून ;

(ii) राष्ट्रीय मानसिक विकलांग संस्थान, सिकन्दराबाद ;

(iii) राष्ट्रीय आस्थ विकलांग संस्थान,  कलकत्ता ;

(iv) अली यावर जंग राष्ट्रीय श्रवण विकलांग संस्थान, मुंबई,                                  पदेन, सदस्य ;

(ट) चार सदस्य, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चक्रानुक्रम से ऐसी रीति से नामनिर्देशित किए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए 

परंतु इस खंड के अधीन कोई, नियुक्ति, यथास्थिति, राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र की सिफारिश पर ही की जाएगी, अन्यथा नहीं ;

(ठ) ऐसे गैर-सरकारी संगठनों या संगमों का, जो निःशक्तता से संबंधित है, प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले पांच व्यक्ति, जो यथासाध्य, निःशक्त व्यक्ति होंगे, जिनमें से एक निःशक्तता के प्रत्येक क्षेत्र से होगा,                                              सदस्य 

परंतु इस खंड के अधीन व्यक्तियों का नामनिर्देशन करते समय केन्द्रीय सरकार, कम से कम एक महिला का और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के एक व्यक्ति का नामनिर्देशन करेगी ;

(ड) भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय का संयुक्त सचिव, जो विकलांगों के कल्याण से संबंधित है, पदेन, सदस्य-सचिव ।

(3) केन्द्रीय समन्वय समिति के सदस्य का पद धारण करने से उसका धारक संसद्‌ के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए या सदस्य होने के लिए निरर्हित नहीं होगा ।

4. सदस्यों की पदावधि - (1) इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय; धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (झ) या खंड (ठ) के अधीन नामनिर्देशित केन्द्रीय समन्वय समिति का कोई सदस्य अपने नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा

परन्तु ऐसा कोई सदस्य अपनी पदावधि की समाप्ति के होते हुए भी, तब तक पद पर बना रहेगा जब तक उसका उत्तरवर्ती अपने पद पर नहीं आ जाता है ।

(2) किसी पदेन सदस्य की पदावधि उसी समय समाप्त हो जाएगी जब वह उस पद पर नहीं रह जाता है जिसके अधिार पर उसको उस प्रकार नामनिर्देशित किया गया था ।

(3) केन्द्रीय सरकार, धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (झ) या खंड (ठ) के अधीन नामनिर्देशित किसी सदस्य को यदि वह उचित समझती है तो, उसकी पदावधि की समाप्ति से पूर्व उसे उसके विरुद्ध कारण दर्शित करने का उचित अवसर देने के पश्चात्‌, हटा सकेगी ।

(4) धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (झ) या खंड (ठ) के अधीन नामनिर्देशित कोई सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा किसी भी समय अपना पद त्याग सकेगा और तब उक्त सदस्य का स्थान रिक्त हो जाएगा ।

(5) केन्द्रीय समन्वय समिति में आकस्मिक रिक्ति नए नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और उस रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्देशन व्यक्ति, उस शेष भाग के लिए ही पद धारण करेगा जिसके लिए वह सदस्य, जिसके स्थान पर वह इस प्रकार नामनिर्देशित किया गया है, पद धारण करता ।

(6) धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (झ) और खंड (ठ) के अधीन नामनिर्देशित कोई सदस्य, पुनः नामनिर्देशन का पात्र होगा ।

(7) धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (झ) और खंड (ठ) के अधीन नामनिर्देशित सदस्य, ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे जो केन्द्रीय सरकार विहित करे । 

5. निरर्हताएं - (1) कोई ऐसा व्यक्ति, केन्द्रीय समन्वय समिति का सदस्य नहीं होगा,

(क) जो दिवालिया है या किसी समय दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है या जिसने अपने ऋणों का संदाय निलंबित कर दिया है या अपने लेनदारों के साथ समझौता कर लिया है ; या

(ख) जो विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है ; या

(ग) जो ऐसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है या ठहराया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्ग्रस्त है ; या

(घ) जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है या किसी समय सिद्धदोष ठहराया गया है ; या

(ङ) जिसने केन्द्रीय सरकार की राय में सदस्य के रूप में अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है कि उसका केन्द्रीय समन्वय समिति में बने रहना जनसाधारण के हितों के प्रतिकूल है ।

(2) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा हटाए जाने का कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक संबंधित सदस्य को उसके विरुद्ध कारण दर्शित करने का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता है ।

(3) धारा 4 की उपधारा (1) या उपधारा (6) में किसी बात के होते हुए भी, कोई सदस्य, जो इस धारा के अधीन हटाया गया है, सदस्य के रूप में पुनः नामनिर्देशन का पात्र नहीं होगा ।

6. सदस्यों द्वारा स्थानों का रिक्त किया जाना - यदि केन्द्रीय समन्वय समिति का कोई सदस्य धारा 5 में विनिर्दिष्ट निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त हो जाता है तो उसका स्थान रिक्त हो जाएगा ।

7. केन्द्रीय समन्वय समिति के अधिवेशन - केन्द्रीय समन्वय समिति का अधिवेशन प्रत्येक छह मास में कम से कम एक बार होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो केन्द्रीय सरकार विहित करे ।

8. केन्द्रीय समन्वय समिति के कृत्य - (1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय समन्वय समिति का कृत्य निःशक्तता के विषयों के संबंध में राष्ट्रीय केन्द्र बिन्दु के रूप में कार्य करना और निःशक्त व्यक्तियों के सामने आने वाली समस्याओं का समाधान करने के लिए व्यापक नीति के निरंतर विकसित किए जाने को सुकर बनाना होगा ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय समन्वय समिति, निम्नलिखित कृत्यों में से सभी या किन्हीं का अनुपालन कर सकेगी, अर्थात्‌ -

(क) सरकार के ऐसे सभी विभागों और अन्य सरकारी तथा गैर- सरकारी संगठनों के, जो निःशक्त व्यक्तियों से संबंधित है, क्रियाकलापों का पुनर्विलोकन और समन्वय करना ;

(ख) निःशक्त व्यक्तियों के सामने आने वाली समस्याओं का हल ढूंढने के लिए राष्ट्रीय नीति विकसित करना ;

(ग) निःशक्तता की बाबत नीतियां, कार्यक्रम, विधान और परियोजनाएं तैयार करने के बारे में केन्द्रीय सरकार को, सलाह देना ;

(घ) निःशक्त व्यक्तियों के मामलों पर संबंधित प्राधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ इस दृष्टि से चर्चा करना कि राष्ट्रीय योजनाओं और अन्य कार्यक्रमों में तथा अंतरराष्ट्रीय अभिकरणों द्वारा विकसित की गई नीतियों में निःशक्त व्यक्तियों के लिए स्कीमें और परियोजनाओं का उपबंध किया जाएगा ;

(ङ) दाता अभिकरणों के साथ परामर्श करके उनकी निधि जुटाने की नीतियों का, निःशक्त व्यक्तियों पर उनके प्रभाव के परिप्रेक्ष्य में, पुनर्विलोकन करना ;

(च) सार्वजनिक स्थानों, कार्य स्थलों, जन-सुविधा स्थलों, विद्यालयों और अन्य संस्थाओं में बाधा-रहित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए ऐसे अन्य उपाय करना ;

(छ) निःशक्त व्यक्तियों की समानता और उनकी पूर्ण भागीदारी की उपलब्धि के लिए बनाई गई नीतियों और कार्यक्रमों के प्रभाव को मानीटर करना तथा उनका मूल्यांकन करना ;

(ज) ऐसे अन्य कृत्य करना जो केन्द्रीय सरकार विहित करे ।

9. केन्द्रीय कार्यपालिका समिति - (1) केन्द्रीय सरकार, केन्द्रीय कार्यपालिका समिति नामक एक समिति का गठन करेगी, जो इस अधिनियम के अधीन उसे सौंपे गए कृत्यों का पालन करेगी ।

(2) केन्द्रीय कार्यपालिका समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्‌ :-

(क) भारत सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय का सचिव,                                                     पदेन, अध्यक्ष ;

(ख) मुख्य आयुक्त,                          पदेन, सदस्य ;

(ग) स्वास्थ्य सेवाओं का महानिदेशक,           पदेन, सदस्य ;

(घ) रोजगार और प्रशिक्षण महानिदेशक,        पदेन, सदस्य ;

(ङ) ग्रामीण विकास, शिक्षा, कल्याण, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन तथा शहरी कार्य और रोजगार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मंत्रालयों या विभागों का प्रतिनिधित्व करने के लिए छह व्यक्ति, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे के न हों,                                           पदेन, सदस्य ;

(च) केन्द्रीय सरकार के कल्याण मंत्रालय में वित्त सलाहकार,                                                  पदेन, सदस्य ;

(छ) सलाहकार (टैरिफ) रेल बोर्ड,       पदेन, सदस्य ;

(ज) चार सदस्य, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चक्रानुक्रम द्वारा ऐसी रीति से नामनिर्देशित किए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए ;

(झ) एक व्यक्ति, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, ऐसे हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जिनका केन्द्रीय सरकार की राय में प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए, नामनिर्देशित किया जाएगा, सदस्य ;

(ञ) ऐसे गैर सरकारी संगठनों या संगमों का, जो निःशक्तता से संबंधित हैं, प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले पांच व्यक्ति जो, यथासाध्य, निःशक्त व्यक्ति होंगे, जिनमें निःशक्तता के प्रत्येक क्षेत्र से एक होगा,                                                 सदस्य

परन्तु इस खंड के अधीन व्यक्तियों का नामनिर्देशन करते समय केन्द्रीय सरकार, कम से कम एक महिला का और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के एक व्यक्ति का नामनिर्देशन करेगी ;

(ट) कल्याण मंत्रालय में भारत सरकार का संयुक्त सचिव जो विकलांगों के कल्याण से संबंधित है,  पदेन, सदस्य-सचिव ।

(3) उपधारा (2) के खंड (झ) और खंड (ञ) के अधीन नामनिर्देशित सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(4) उपधारा (2) के खंड (झ) या खंड (ञ) के अधीन नामनिर्देशित कोई सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा किसी भी समय, अपना पद त्याग सकेगा और तब उक्त सदस्य का स्थान रिक्त हो जाएगा ।

10. केन्द्रीय कार्यपालिका समिति के कृत्य - (1) केन्द्रीय कार्यपालिका समिति, केन्द्रीय समन्वय समिति की कार्यकारी निकाय होगी और केन्द्रीय समन्वय समिति के विनिश्चयों को कार्यान्वित करने के लिए उत्तरदायी होगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले, बिना, केन्द्रीय कार्यपालिका समिति ऐसे अन्य कृत्यों का भी पालन करेगी, जो केन्द्रीय समन्वय समिति द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाए ।

11. केन्द्रीय कार्यपालिका समिति के अधिवेशन - केन्द्रीय कार्यपालिका समिति का अधिवेशन तीन मास में कम से कम एक बार होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो केन्द्रीय सरकार विहित करे ।

12. विशिष्ट प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय कार्यपालिका समिति के साथ व्यक्तियों का अस्थायी सहयोजन - (1) केन्द्रीय कार्यपालिका समिति, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति को जिसकी सहायता या सलाह की वह, इस अधिनियम के अधीन अपने किसी कृत्य का पालन करने में प्राप्त करने की वांछा करे, अपने साथ सहयुक्त कर सकेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए केन्द्रीय कार्यपालिका समिति के साथ सहयुक्त किसी व्यक्ति को, उस प्रयोजन से सुसंगत केन्द्रीय कार्यपालिका समिति के विचार-विमर्श में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे उक्त समिति के अधिवेशन में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा ।

(3) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए उक्त समिति के साथ सहयुक्त किसी व्यक्ति को, उसके अधिवेशनों में उपस्थिति होने के लिए और उक्त समिति का कोई अन्य कार्य करने के लिए, ऐसी फीस और भत्तों का संदाय किया जाएगा, जो केन्द्रीय सरकार विहित करे ।

अध्याय 3

राज्य समन्वय समिति

13. राज्य समन्वय समिति - (1) प्रत्येक राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, राज्य समन्वय समिति नामक एक निकाय का गठन करेगी जो इस अधिनियम के अधीन उसको प्रदत्त व्यक्तियों का प्रयोग और सौंपे गए कृत्यों का पालन करेगी ।

(2) राज्य समन्वय समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्‌ :-

(क) राज्य सरकार के समाज कल्याण विभाग का भारसाधक मंत्री,                                        पदेन, अध्यक्ष ;

(ख) समाज कल्याण विभाग का भारसाधक राज्य मंत्री, यदि कोई हो,                                   पदेन, उपाध्यक्ष ;

(ग) राज्य सरकार के कल्याण, शिक्षा, महिला और बाल विकास, व्यय, कार्मिक प्रशिक्षण और लोक शिकायत, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, औद्योगिक विकास, शहरी कार्य और रोजगार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, लोक उद्यम, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, विभागों के भारसाधक सचिव,          पदेन, सदस्य ;

(घ) किसी अन्य विभाग का सचिव, जिसे राज्य सरकार अविश्यक समझे,                                           पदेन, सदस्य ;

(ङ) अध्यक्ष, लोक उद्यम ब्यूरो (चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो),                             पदेन, सदस्य ;

(च) ऐसे गैर सरकारी संगठनों या संगमों का, जो निःशक्तता से संबंधित है, प्रतिनिधित्व करने के लिए राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले पांच व्यक्ति, जो यथासाध्य, निःशक्त व्यक्ति होंगे, जिनमें निःशक्तता के प्रत्येक क्षेत्र से एक होगा,                      सदस्य

परंतु इस खंड के अधीन व्यक्तियों का नामनिर्देशन करते समय राज्य सरकार, कम से कम एक महिला का और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के एक व्यक्ति का नामनिर्देशन करेगी ;

(छ) राज्य विधान-मंडल के तीन सदस्य, जिनमें से दो विधान सभा द्वारा और एक विधान परिषद्‌ द्वारा, यदि कोई हों, निर्वाचित किए जाएंगे ;

(ज) तीन व्यक्ति उस राज्य सरकार द्वारा कृषि, उद्योग या व्यापार अथवा किसी ऐसे अन्य हित का प्रतिनिधित्व करने के लिए जिनका राज्य सरकार की राय में प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए, नामनिर्देशित किए जाएंगे ;        पदेन, सदस्य ;

(झ) आयुक्त,                                     पदेन, सदस्य ;

(ञ) विकलांग व्यक्तियों के कल्याण के संबंध में, कार्रवाई करने वाला राज्य सरकार का सचिव,        पदेन, सदस्य-सचिव ।

(3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, किसी संघ राज्यक्षेत्र के लिए कोई भी राज्य समन्वय समिति गठित नहीं की जाएगी और किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में केन्द्रीय समन्वय समिति उस संघ राज्यक्षेत्र के लिए राज्य समन्वय समिति की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का पालन करेगी :

परंतु किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में केन्द्रीय समन्वय समिति, इस उपधारा के अधीन अपनी शक्तियों और कृत्यों में से सभी को या किन्हीं को, ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय को, जिसे केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट करे, प्रत्यायोजित कर सकेगी ।

14. सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें - (1) इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (च) या खंड (ज) के अधीन नामनिर्देशित राज्य समन्वय समिति का कोई सदस्य, अपने नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा

परंतु ऐसा कोई सदस्य, अपनी पदावधि के समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा, जब तक उसका पदोत्तरवर्ती अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है ।

(2) पदेन सदस्य की पदावधि उस समय समाप्त हो जाएगी जब वह उस पद को धारण करना समाप्त कर देगा, जिसके अधिार पर उसका उस प्रकार नामनिर्देशन किया गया था ।

(3) राज्य सरकार, यदि वह ठीक समझती है तो धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (च) या खंड (ज) के अधीन नामनिर्देशित किसी सदस्य को उसकी पदावधि की समाप्ति के पूर्व, उसे उसके विरुद्ध कारण दर्शित करने का उचित अवसर देने के पश्चात्‌ हटा सकेगी ।

(4) धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (च) या खंड (ज) के अधीन नामनिर्देशित कोई सदस्य, राज्य सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा किसी भी समय, अपना पद त्याग सकेगा और तब उक्त सदस्य का स्थान रिक्त हो जाएगा ।

(5) राज्य समन्वय समिति में कोई आकस्मिक रिक्ति, नए नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्देशन व्यक्ति, उस शेष अवधि के लिए ही पद धारण करेगा जिसके लिए वह सदस्य जिसके स्थान पर वह इस प्रकार नामनिर्देशित किया गया है, पद धारण करता ।

(6) धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (च) और खंड (ज) के अधीन नामनिर्देशित कोई सदस्य पुनः नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा ।

7. धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (च) और खंड (ज) के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्य, ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

15. निरर्हताएं - (1) कोई ऐसा व्यक्ति, राज्य समन्वय समिति का सदस्य नहीं होगा,-

(क) जो दिवालिया है या किसी समय दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है या जिसने अपने ऋणों का संदाय निलंबित कर दिया है या अपने लेनदारों के साथ समझौता कर लिया है ; या 

(ख) जो विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है ; या

(ग) जो ऐसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है या ठहराया गया है जिसमें राज्य सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्ग्रस्त है ; या

(घ) जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है या किसी समय सिद्धदोष ठहराया गया है ; या

(ङ) जिसने राज्य सरकार की राय में सदस्य के रूप में अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है कि उसका राज्य समन्वयन समिति में बने रहना जनसाधारण के हितों के प्रतिकूल है ।

(2) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा हटाए जाने का आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक संबंधित सदस्य को उसके विरुद्ध कारण दर्शित करने का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता है ।

(3) धारा 14 की उपधारा (1) या उपधारा (6) में किसी बात के होते हुए भी, कोई सदस्य, जो इस धारा के अधीन हटाया गया है, सदस्य के रूप में पुनः नामनिर्देशन का पात्र नहीं होगा ।

16. स्थानों का रिक्त होना -यदि राज्य समन्वय समिति का कोई सदस्य धारा 15 में विनिर्दिष्ट निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त हो जाता है तो उसका स्थान रिक्त हो जाएगा ।

17. राज्य समन्वय समिति के अधिवेशन - राज्य समन्वय समिति का अधिवेशन प्रत्येक छह मास में कम से कम एक बार होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो विहित किए जाएं ।

18. राज्य समन्वय समिति के कृत्य - (1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य समन्वय समिति का कृत्य निःशक्तता के विषयों के संबंध में राज्य के केन्द्र बिन्दु के रूप में कार्य करना और निःशक्त व्यक्तियों के सामने आने वाली समस्याओं का समाधान करने के लिए व्यापक नीति के निरंतर विकसित किए जाने को सुकर बनाना होगा ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी कृत्यों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, राज्य समन्वय समिति, राज्य के भीतर निम्नलिखित कृत्यों में से सभी या किन्हीं का अनुपालन कर सकेगी, अर्थात्‌

(क) सरकार के ऐसे सभी विभागों और अन्य सरकारी तथा गैर सरकारी संगठनों के, जो निःशक्त व्यक्तियों से संबंधित हैं, क्रियाकलापों का पुनर्विलोकन और समन्वय करना;  

(ख) निःशक्त व्यक्तियों के सामने आने वाली समस्याओं का हल ढूंढने के लिए राज्य की नीति का विकास करना;

(ग) निःशक्तता की बाबत नीतियां, कार्यक्रम, विधान और परियोजनाएं तैयार करने के बारे में राज्य सरकार को सलाह देना;

(घ) दाता अभिकरणों के साथ परामर्श करके उनकी निधि जुटाने की नीतियों का, निःशक्त व्यक्तियों पर उनके प्रभाव के परिप्रेक्ष्य में, पुनर्विलोकन करना;

(ङ) सार्वजनिक स्थानों, कार्य स्थलों, जन सुविधा स्थलों, विद्यालयों और अन्य संस्थाओं में बाधा-रहित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए ऐसे अन्य उपाय करना;

(च) निःशक्त व्यक्तियों की समानता और उनकी पूर्ण भागीदारी की उपलब्धि के लिए बनाई गई नीतियों और कार्यक्रमों के प्रभाव को मानीटर करना तथा उनका मूल्यांकन करना;

(छ) ऐसे अन्य कृत्य करना जो राज्य सरकार विहित करे ।

19. राज्य कार्यपालिका समिति - (1) राज्य सरकार, राज्य कार्यपालिका समिति नामक एक समिति का गठन करेगी, जो इस अधिनियम के अधीन उसे सौंपे गए कृत्यों का पालन करेगी ।

(2) राज्य कार्यपालिका समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्‌: -

(क) सचिव, समाज कल्याण विभाग,              पदेन, अध्यक्ष ;

(ख) आयुक्त,                      पदेन, सदस्य ;

(ग) स्वास्थ्य, वित्त, ग्रामीण विकास, शिक्षा, कल्याण, कार्मिक, लोक शिकायत, शहरी कार्य, श्रम और रोजगार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभागों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नौ व्यक्ति, जो राज्य सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे के न हों,                                                   पदेन, सदस्य ;

(घ) एक व्यक्ति, जो राज्य सरकार द्वारा, ऐसे हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए, जिनका राज्य सरकार की राय में प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए, नामनिर्देशित किया जाएगा,         सदस्य ;                                

(ङ) ऐसे गैर सरकारी संगठनों या संगमों का, जो निःशक्तता से संबंधित हैं, प्रतिनिधित्व करने के लिए राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले पांच व्यक्ति, जो यथासाध्य, निःशक्त व्यक्ति होंगे, जिनमें निःशक्तता के प्रत्येक क्षेत्र से एक होगा ;                           सदस्य 

परन्तु इस खंड के अधीन व्यक्तियों का नामनिर्देशन करते समय राज्य सरकार, कम से कम एक महिला का और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के एक व्यक्ति का नामनिर्देशन करेगी ;

(च) संयुक्त सचिव, जो कल्याण विभाग के निःशक्तता प्रभाग के संबंध में कार्यवाही कर रहा हो ;      पदेन, सदस्य-सचिव ।

(3) उपधारा (2) के खंड (घ) और खंड (ङ) के अधीन नामनिर्देशित सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(4) खंड (घ) या खंड (ग) के अधीन नामनिर्देशित कोई सदस्य, राज्य सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा किसी भी समय, अपना पद त्याग सकेगा और तब उक्त सदस्य का स्थान रिक्त हो जाएगा ।

20. राज्य कार्यपालिका समिति के कृत्य - (1) राज्य कार्यपालिका समिति, राज्य समन्वय समिति की कार्यकारी निकाय होगी और राज्य समन्वय समिति के विनिश्चयों को कार्यान्वित करने के लिए उत्तरदायी होगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, राज्य कार्यपालिका समिति ऐसे अन्य कृत्यों का भी पालन करेगी जो राज्य समन्वय समिति द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।

21. राज्य कार्यपालिका समिति के अधिवेशन - राज्य कार्यपालिका समिति का अधिवेशन तीन मास में कम से कम एक बार होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो राज्य सरकार विहित करे ।

22. विशिष्ट प्रयोजनों के लिए राज्य कार्यपालिका समिति के साथ व्यक्तियों का अस्थायी सहयोजन - (1) राज्य कार्यपालिका समिति, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी सहायता या सलाह की वह, इस अधिनियम के अधीन अपने किसी कृत्य का पालन करने में प्राप्त करने की वांछा करे, अपने साथ सहयुक्त कर सकेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए राज्य कार्यपालिका समिति के साथ सहयुक्त किसी व्यक्ति को, उस प्रयोजन से सुसंगत राज्य कार्यपालिका समिति के विचार-विमर्श में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे उक्त समिति के अधिवेशन में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा ।

(3) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए उक्त समिति के साथ सहयुक्त किसी व्यक्ति को, उसके अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए और उक्त समिति का कोई अन्य कार्य करने के लिए, ऐसी फीस और भत्तों का संदाय किया जाएगा, जो राज्य सरकार विहित करे ।

23. निदेश देने की शक्ति - इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के अनुपालन में,

(क) केन्द्रीय समन्वय समिति, ऐसे लिखित निदेशों द्वारा आबद्ध होगी जो केन्द्रीय सरकार, उसे दे; और

(ख) राज्य समन्वय समिति, ऐसे लिखित निदेशों द्वारा आबद्ध होगी, जो केन्द्रीय समन्वय समिति या राज्य सरकार, उसे दे:

परंतु जहां राज्य सरकार द्वारा दिया गया कोई निदेश, केन्द्रीय समन्वय समिति द्वारा दिए गए किसी निदेश से असंगत है वहां वह विषय केन्द्रीय सरकार को उसके विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा ।

24. रिक्तियों के कारण कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना - केन्द्रीय समन्वय समिति, केन्द्रीय कार्यपालिका समिति, राज्य समन्वय समिति या राज्य कार्यपालिका समिति का कोई कार्य या कार्यवाही, केवल इस अधिार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि ऐसी समितियों में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।

अध्याय 4

निःशक्ता का निर्धारण और शीघ्र पता चलाया जाना

25. समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक्तता की अविृत्ति के निवारण के लिए कतिपय उपायों का किया जाना - अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, निःशक्तता की अविृत्ति के निवारण की दृष्टि से, -

(क) निःशक्तता की अविृत्ति के कारण से संबंधित सर्वेक्षण, अन्वेषण और अनुसंधान करेंगे या करवाएंगे;

(ख) निःशक्तता का निवारण करने की विभिन्न पद्धतियों का संवर्धन करेंगे; 

(ग) जोखिम वाले मामलों" को पहचानने के प्रयोजन के लिए वर्ष में कम से कम एक बार सभी बालकों की जांच करेंगे;

(घ) प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में कर्मचारिवृन्द को प्रशिक्षण देने की सुविधाओं की व्यवस्था करेंगे; 

(ङ) साधारण स्वच्छता, स्वास्थ्य और सफाई के प्रति जागरूकता अभियानों को प्रायोजित करेंगे या करवाएंगे और जानकारी प्रसारित करेंगे या करवाएंगे;

(च) माता और संतान की प्रसव-पूर्व, प्रसवकालीन और प्रसव पश्चात्‌्‌ देखरेख के लिए उपाय करेंगे;

(छ) विद्यालय पूर्व, विद्यालयों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, ग्राम-स्तर के कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से जनता को शिक्षित करेंगे;

(ज) निःशक्तता के कारणों और अपनाए जाने वाले निवारक उपायों पर, टेलीविजन, रेडियो और अन्य जन संपर्क साधनों के माध्यम से जन साधारण के मध्य जागरूकता पैदा करेंगे ।

अध्याय 5

शिक्षा

26. समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक्त बालकों के लिए निःशुल्क शिक्षा आदि की व्यवस्था का किया जाना - समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी,

(क) यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रत्येक निःशक्त बालक को अठारह वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, उचित वातावरण में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त हो सके ;

(ख) निःशक्त विद्यार्थियों का सामान्य विद्यालयों में एकीकरण के संवर्धन का प्रयास करेंगे;

(ग) उनके लिए जिन्हें विशेष शिक्षा की अविश्यकता है, सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में विशेष विद्यालयों की स्थापना में ऐसी रीति से अभिवृद्धि करेंगे कि जिससे देश के किसी भी भाग में रह रहे, निःशक्त बालकों की ऐसी विद्यालयों तक पहुंच हो;

(घ) निःशक्त बालकों के लिए विशेष विद्यालयों को व्यावसायिक प्रशिक्षण सुविधाओं से सज्जित करने का प्रयास करेंगे ।

27. समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा अनौपचारिक शिक्षा, आदि के लिए स्कीमों और कार्यक्रमों का बनाया जाना - समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अधिसूचना द्वारा, निम्नलिखित के लिए स्कीमें बनाएंगे, अर्थात्‌: -

(क) ऐसे निःशक्त बालकों की बाबत, जिन्होंने पांचवीं कक्षा तक शिक्षा पूरी कर ली है, किन्तु पूर्णकालिक अधिार पर अपना अध्ययन चालू नहीं रख सके हैं, अंशकालिक कक्षाओं का संचालन करना; 

(ख) सोलह वर्ष और उससे ऊपर की आयु समूह के बालकों के लिए क्रियात्मक साक्षरता की व्यवस्था के लिए विशेष अंशकालिक कक्षाओं का संचालन करना;

(ग) ग्रामीण क्षेत्रों में उपलभ्य जनशक्ति का उपयोग करके उन्हें समुचित अभिविन्यास शिक्षा देने के पश्चात्‌ अनौपचारिक शिक्षा प्रदान करना;

(घ) खुले विद्यालयों या खुले विश्वविद्यालयों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करना;

(ङ) अयोग्य क्रियात्मक इलैक्ट्रानिक या अन्य संचार साधनों के माध्यम से कक्षा और परिचर्चाओं का संचालन करना;

(च) प्रत्येक निःशक्त बालक के लिए उसकी शिक्षा के लिए अविश्यक विशेष पुस्तकों और उपस्करों की निःशुल्क व्यवस्था करना ।

28. नई सहायक युक्तियों, शिक्षण सहाय यंत्रों, आदि का डिजाइन और उनका विकास करने के लिए अनुसंधान - समुचित सरकारें, ऐसी नई सहायक युक्तियों शिक्षा सहाय यंत्रों और विशेष शिक्षण सामग्री या ऐसी अन्य वस्तुओं को, जो किसी निःशक्त बालक को शिक्षा में समान अवसर प्रदान करने के लिए अविश्यक हों, डिजाइन और उनका विकास करने के लिए अनुसंधान करेंगी या सरकारी और गैर सरकारी अभिकरणों द्वारा अनुसंधान कराएगी ।

29. समुचित सरकारों द्वारा निःशक्त बालकों के विद्यालयों के लिए प्रशिक्षित जनशक्ति विकसित करने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं का स्थापित किया जाना - समुचित सरकारें पर्याप्त संख्या में, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाएं स्थापित करेंगी और निःशक्तता में विशेषज्ञता वाले शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विकास करने के लिए, राष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य स्वैच्छिक संगठनों को सहायता प्रदान करेंगी जिससे कि निःशक्त बालकों के विशेष विद्यालयों और एकीकृत विद्यालयों के लिए अपेक्षित प्रशिक्षित जनशक्ति उपलब्ध हो सके ।

30. समुचित सरकारों द्वारा परिवहन सुविधाओं, पुस्तकों के प्रदाय आदि के लिए व्यापक शिक्षा स्कीम का तैयार किया जाना - पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, समुचित सरकारें अधिसूचना द्वारा, एक व्यापक शिक्षा स्कीम तैयार करेंगी, जिसमें निम्नलिखित के लिए उपबंध होगा, अर्थात्‌: -

(क) निःशक्त बालकों के लिए परिवहन सुविधाएं या उनके माता-पिता या अभिभावकों को वैकल्पिक वित्तीय प्रोत्साहन, जिससे कि उनके निःशक्त बालक विद्यालयों में जा सकें;

(ख) व्यावसायिक और वृत्तिक प्रशिक्षण देने वाले विद्यालयों, महाविद्यालयों या अन्य संस्थानों से वास्तु-विद्या-संबंधी बाधाओं को हटाना;

(ग) विद्यालय जाने वाले निःशक्त बालकों के लिए पुस्तकों, वर्दियों और अन्य सामग्री का प्रदाय करना;

(घ) निःशक्त विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देना;

(ङ) निःशक्त बालकों के पुनर्वास की बाबत उनके माता-पिता की शिकायतों को दूर करने के लिए समुचित मंच स्थापित करना;

(च) दृष्टिहीन विद्यार्थियों और कम दृष्टि वाले विद्यार्थियों के फायदे के लिए पूर्णतया गणित संबंधी प्रश्नों को हटाने के लिए परीक्षा पद्धति में उपयुक्त परिवर्तन करना;

(छ) निःशक्त बालकों के फायदे के लिए पाठ्‌्‌यक्रम की पुनःसंरचना करना;

(ज) श्रवण शक्ति के ह्रास वाले विद्यार्थियों के फायदे के लिए उनके पाठ्‌्‌यक्रम के भाग के रूप में केवल एक भाषा को लेने हेतु उन्हें सुकर बनाने के लिए पाठ्‌्‌यक्रम की पुनःसंरचना करना ।

31. शिक्षा संस्थाओं द्वारा दृष्टि से विकलांग विद्यार्थियों के लिए लेखकों की व्यवस्था का किया जाना - सभी शिक्षा संस्थाएं, नेत्रहीन विद्यार्थियों या कम दृष्टि वाले विद्यार्थियों के लिए लेखकों की व्यवस्था करेंगी या करवाएंगी ।

अध्याय 6

नियोजन

32. उन पदों का पता लगाया जाना जो निःशक्त व्यक्तियों के लिए आरक्षित किए जा सकेंगे-समुचित सरकारें

(क) स्थापनों में, ऐसे पदों का पता लगाएंगी, जो निःशक्त व्यक्तियों के लिए आरक्षित किए जा सकते हैं;

(ख) तीन वर्ष से अनधिक नियतकालिक अन्तरालों पर पता लगाए गए पदों की सूची का पुनर्विलोकन करेंगी और प्रौद्योगिकी संबंधी विकासों को ध्यान में रखते हुए सूची को अद्यतन करेंगी ।

33. पदों का आरक्षण -प्रत्येक समुचित सरकार, प्रत्येक स्थापन में निःशक्त व्यक्तियों या व्यक्तियों के वर्ग के लिए उतनी प्रतिशत रिक्तियां नियत करेंगी जो तीन प्रतिशत से कम न हों, जिसमें से प्रत्येक निःशक्तता के लिए पता लगाए गए पदों में से एक प्रतिशत निम्नलिखित से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए आरक्षित होगा, अर्थात्‌: -

(i) अंधता या कम दृष्टि;

(ii) श्रवण शक्ति का ह्रास; और

(iii) चलन निःशक्तता या प्रमस्तिष्क घात 

परन्तु समुचित सरकार, किसी विभाग या स्थापन में किए जा रहे कार्य की किस्म को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचना द्वारा, ऐसी शर्तों के अधीन, यदि कोई हों, जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, किसी स्थापन को इस धारा के उपबंधों से छूट दे सकेगी ।

34. विशेष रोजगार कार्यालय-(1) समुचित सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह अपेक्षा कर सकेगी कि ऐसी तारीख से जो अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, प्रत्येक स्थापन का नियोजक, निःशक्त व्यक्तियों के लिए नियत ऐसी रिक्तियों के संबंध में जो उस स्थापन में हुई हैं या होने वाली हैं, ऐसे विशेष रोजगार कार्यालय को जो विहित किया जाए, ऐसी जानकारी या विवरणी भेजेगा जो विहित की जाएं और तब स्थापन ऐसी अध्यपेक्षा का पालन करेगा ।

(2) वह प्ररूप जिसमें और समय के वे अन्तराल जिनके लिए सूचना या विवरणी भेजी जाएगी और वे विशिष्टियां जो उनमें होंगी, ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।

35. किसी स्थापन के कब्जे में के अभिलेख या दस्तावेज की जांच करने की शक्ति - विशेष रोजगार कार्यालय द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत व्यक्ति की किसी स्थापन के कब्जे में के किसी सुसंगत अभिलेख या दस्तावेज तक पहुंच होगी और वह किसी उचित समय पर और उन परिसरों में प्रवेश कर सकेगा, जहां उसे विश्वास है कि ऐसा अभिलेख या दस्तावेज होना चाहिए और उनका निरीक्षण कर सकेगा अथवा सुसंगत अभिलेख या दस्तावेजों की प्रतियां प्राप्त कर सकेगा या कोई जानकारी प्राप्त करने के लिए अविश्यक कोई प्रश्न पूछ सकेगा ।

36. भरी गई रिक्तियों का अग्रनीत किया जाना - जहां किसी भर्ती वर्ष में धारा 33 के अधीन किसी रिक्ति को किसी उपयुक्त निःशक्त व्यक्ति की अनुपलब्धता के कारण या किन्हीं अन्य पर्याप्त कारण से भरा नहीं जा सकता है, वहां ऐसी रिक्ति अगले भर्ती वर्ष में अग्रनीत की जाएगी और यदि अगले भर्ती वर्ष में भी उपयुक्त निःशक्त व्यक्ति उपलब्ध नहीं हैं, तो इसे पहले तीनों प्रवर्गों के बीच परस्पर परिवर्तन द्वारा भरा जा सकेगा और केवल तभी जब उस वर्ष में पद के लिए कोई निःशक्त व्यक्ति उपलब्ध नहीं है, नियोजक, निःशक्त व्यक्ति से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति करके रिक्ति को भरेगा :

परन्तु यदि किसी स्थापन में रिक्तियों की प्रकृति ऐसी है कि किसी निश्चित प्रवर्ग के व्यक्ति को नियोजित नहीं किया जा सकता है, तो रिक्तियां समुचित सरकार के पूर्वानुमोदन से तीनों प्रवर्गों के बीच परस्पर परिवर्तित की जा सकेंगी ।

37. नियोजकों द्वारा अभिलेखों का रखा जाना - (1) प्रत्येक नियोजक, अपने स्थापन में नियोजित निःशक्त व्यक्तियों के संबंध में ऐसा अभिलेख ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से रखेगा जो समुचित सरकार द्वारा विहित की जाए ।

(2) उपधारा (1) के अधीन रखे गए अभिलेख, सभी उचित समयों पर, ऐसे व्यक्तियों द्वारा जो समुचित सरकार द्वारा, साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किए जाएं, निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे ।

38. निःशक्त व्यक्तियों का नियोजन सुनिश्चित करने के लिए स्कीम - समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अधिसूचना द्वारा, निःशक्त व्यक्तियों का नियोजन सुनिश्चित करने के लिए स्कीमें तैयार करेंगे और ऐसी स्कीमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्‌: -

(क) निःशक्त व्यक्तियों का प्रशिक्षण और उनका कल्याण;

(ख) उच्चतर आयु सीमा का शिथिलीकरण;

(ग) नियोजन का विनियमन;

(घ) स्वास्थ्य और सुरक्षा के उपाय तथा ऐसे स्थानों पर जहां निःशक्त व्यक्ति नियोजित किए जाते हैं, विकलांगता इतर वातावरण का सृजन;

(ङ) ऐसी रीति जिससे तथा ऐसे व्यक्ति जिनके द्वारा स्कीमों के प्रचालन की बाबत चुकाई जाएगी; और

(च) स्कीम के प्रशासन के लिए उत्तरदायी प्राधिकारी का गठन ।

39. सभी शिक्षा संस्थाओं द्वारा निःशक्त व्यक्तियों के लिए स्थानों का आरक्षित किया जाना - सभी सरकारी शिक्षा संस्थाएं और अन्य शैक्षिक संस्थाएं, जो सरकार से सहायता प्राप्त कर रही हैं, निःशक्त व्यक्तियों के लिए कम से कम तीन प्रतिशत स्थान आरक्षित करेंगी ।

40. गरीबी उन्मूलन स्कीमों में रिक्तियों का आरक्षित किया जाना - समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए सभी गरीबी उन्मूलन स्कीमों में कम से कम तीन प्रतिशत आरक्षण करेंगे ।

41. यह सुनिश्चित करने के लिए नियोजकों को प्रोत्साहन कि श्रमिक दल में पांच प्रतिशत निःशक्त व्यक्ति हों - समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास को सीमाओं के भीतर सार्वजनिक और प्राइवेट सेक्टर, दोनों में, नियोजकों को प्रोत्साहन देने का उपबन्ध करेंगे जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके श्रमिक दल में कम से कम पांच प्रतिशत व्यक्ति निःशक्त हों ।

अध्याय 7

सकारात्मक कार्रवाई

42. निःशक्त व्यक्तियों को हाथ यंत्र और साधक - समुचित सरकारें, निःशक्त व्यक्तियों को, सहाय यंत्र और साधित्र उपलब्ध कराने के लिए स्कीमें, अधिसूचना द्वारा, बनाएंगी ।

43. कतिपय प्रयोजनों के लिए भूमि के अधिमानी आबंटन के लिए स्कीमें - समुचित सरकारें और स्थानीय अधिकारी, अधिसूचना द्वारा, निःशक्त व्यक्तियों को रियायती दरों पर भूमि का निम्नलिखित के लिए अधिमानी आबंटन करने की स्कीमें बनाएंगे, अर्थात्‌: -

(क) गृह;

(ख) कारबार की स्थापना;

(ग) विशेष आमोद-प्रमोद केन्द्रों की स्थापना;

(घ) विशेष विद्यालयों की स्थापना;

(ङ) अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना;

(च) निःशक्त उद्यमकर्ताओं द्वारा कारखानों की स्थापना ।

अध्याय 8

विभेद का किया जाना

44. परिवहन में विभेद का किया जाना - परिवहन सेक्टर के स्थापन, अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास सीमाओं के भीतर, निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए निम्नलिखित विशेष उपाय करेंगे, अर्थात्‌: -

(क) रेल के डिब्बों, बसों, जलयानों और वायुयानों को इस प्रकार अनुकूल बनाना जिससे कि ऐसे व्यक्ति उनमें सहज रूप से पहुंच सकें; 

(ख) रेल के डिब्बों, जलयानों, वायुयानों और प्रतीक्षागृहों में शौचालयों को इस प्रकार अनुकूल बनाना जिससे कि व्हील चेयर का प्रयोग करने वाले व्यक्ति उनका प्रयोग सुगमता से कर सकें ।

45. सड़क पर विभेद का किया जाना- समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर निम्नलिखित का उपबंध करेंगे, अर्थात्‌: -

(क) दृष्टिक असुविधाग्रस्त व्यक्तियों के फायदे के लिए, सार्वजनिक सड़कों पर लाल बत्तियों पर श्रवण संकेतों का प्रतिष्ठापन;

(ख) व्हील चेयर का उपयोग करने वाले व्यक्तियों की सहज पहुंच के लिए किनारे काटना और पटरियों में ढलानें बनाना;

(ग) दृष्टिहीन या कम दृष्टि वाले व्यक्तियों के लिए जैबरा क्रासिंग की सतह को उत्कीर्ण करना;

(घ) दृष्टिहीन या कम दृष्टि वाले व्यक्तियों के लिए रेलवे प्लेटफार्म के किनारों को उत्कीर्ण करना;

(ङ) निःशक्तता के समुचित प्रतीकों को विकसित करना; 

(च) समुचित स्थानों पर चेतावनी संकेतों को लगाना ।

46. निर्मित परिवेक्ष में विभेद का किया जाना - समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, निम्नलिखित का उपबंध करेंगे, अर्थात्‌: -

(क) सार्वजनिक भवनों में ढलवां रास्तों का उपबंध करना;

(ख) शौचालयों को, व्हील चेयर का उपयोग करने वाले व्यक्तियों के अनुकूल बनाना;

(ग) उत्थापकों और लिफ्टों में बेल प्रतीकों और श्रवण संकेतों का उपबंध करना;

(घ) अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और अन्य चिकित्सीय देखभाल और पुनर्वास संस्थाओं में ढलवां रास्तों का उपबंध करना ।

47. सरकारी नियोजन में विभेद का किया जाना - (1) कोई स्थापन, ऐसे कर्मचारी को, जो सेवा के दौरान निःशक्त हो जाता है, सेवोन्मुक्त या पंक्तिच्युत नहीं करेगा:

परन्तु यदि कोई कर्मचारी निःशक्त हो जाने के पश्चात्‌ उस पद के लिए जिसको वह धारण करता है, उपयुक्त नहीं रह जाता है तो उसे, उसी वेतनमान और सेवा संबंधी फायदों वाले किसी अन्य पद पर स्थानांतरित किया जा सकेगा

परन्तु यह और कि यदि किसी कर्मचारी को किसी पद पर समायोजित करना संभव नहीं है तो उसे समुचित पद उपलब्ध होने तक या उसके द्वारा अधिवर्षिता की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, किसी अधिसंख्य पद पर रखा जा सकेगा ।

(2) किसी व्यक्ति को, केवल उसकी निःशक्तता के अधिार पर प्रोन्नति से वंचित नहीं किया जाएगा 

परन्तु यह कि समुचित सरकार, किसी स्थापन में किए जा रहे कार्य के प्रकार को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जो ऐसी अधिसूचना में विहित की जाए, किसी स्थापन को इस धारा के उपबंधों से छूट दे सकेगी ।

अध्याय 9

अनुसंधान और जनशक्ति विकास

48. अनुसंधान - समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अन्य बातों के साथ-साथ, निम्नलिखित क्षेत्र में अनुसंधान को संवर्धित और प्रायोजित करेंगे, अर्थात्‌: -

(क) निःशक्तता निवारण;

(ख) पुनर्वास, जिसके अंतर्गत समुदाय अधिारित पुनर्वास है;

(ग) सहायक युक्तियों का विकास, जिसमें उनके मनोवैज्ञानिक सामाजिक पहलू सम्मिलित हैं;

(घ) कार्य के बारे में पता लगाना;

(ङ) कार्यालयों और कारखानों में स्थलों पर उपांतरण ।

49. विश्वविद्यालयों को अनुसंधान कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन-समुचित सरकारें, ऐसे विश्वविद्यालयों, उच्चतर विद्या की अन्य संस्थाओं, वृत्तिक निकायों और गैर सरकारी अनुसंधान इकाइयों या संस्थाओं को, विशेष शिक्षा, पुनर्वास और जनशक्ति विकास में अनुसंधान करने के लिए, वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएंगी ।

 

अध्याय 10

निःशक्त व्यक्तियों के लिए संस्थाओं को मान्यता

50. सक्षम प्राधिकारी - राज्य सरकार, किसी प्राधिकारी को, जिसे वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सक्षम प्राधिकारी होने के लिए ठीक समझे, नियुक्त करेगी ।

51. किसी व्यक्ति द्वारा निःशक्त व्यक्तियों के लिए, किसी संस्था की स्थापना या उसका अनुरक्षण रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अनुसार ही किया जाना, अन्यथा नहीं - इस अधिनियम के अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई भी व्यक्ति, निःशक्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था की स्थापना या उसका अनुरक्षण इस निमित्त सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अधीन और उसके अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं:

परन्तु यह कि ऐसा व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व निःशक्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था का अनुरक्षण कर रहा है, ऐसे प्रारंभ से छह मास की अवधि के लिए ऐसी संस्था का अनुरक्षण चालू रख सकेगा और यदि उसने उक्त छह मास की अवधि के भीतर ऐसे प्रमाणपत्र के लिए अविेदन किया है तो ऐसे अविेदन के निपटाए जाने तक संस्था का अनुरक्षण चालू रख सकेगा ।

52. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र - (1) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए प्रत्येक अविेदन, सक्षम प्राधिकारी को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से किया जाएगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अविेदन की प्राप्ति पर, सक्षम प्राधिकारी, ऐसी जांच करेगा जो वह ठीक समझे और जहां उसका यह समाधान हो जाता है कि अविेदक ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन किया है वहां वह अविेदक को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देगा और जहां सक्षम प्राधिकारी का इस प्रकार समाधान नहीं होता है वहां वह, आदेश द्वारा, ऐसा प्रमाणपत्र देने से, जिसके लिए अविेदन किया जाता है, इनकार करेगा:

परन्तु प्रमाणपत्र देने से इनकार करने का कोई आदेश करने के पूर्व, सक्षम प्राधिकारी, अविेदक को सुनवाई का उचित अवसर देगा और प्रमाणपत्र देने से इंकार करने का प्रत्येक आदेश, अविेदक को ऐसी रीति से, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, संसूचित किया जाएगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक वह संस्था, जिसके बारे में अविेदन किया गया है, ऐसी सुविधाएं देने तथा ऐसे स्तरमान बनाए रखने की स्थिति में है जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(4) इस धारा के अधीन दिया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, -

(क) जब तक धारा 53 के अधीन प्रतिसंदत्त नहीं किया जाता है, उस अवधि के लिए प्रवृत्त बना रहेगा जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए;

(ख) वैसी ही अवधि के लिए समय-समय पर नवीकृत किया जा सकेगा; और

(ग) ऐसे प्ररूप में होगा और ऐसी शर्तों के अधीन होगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(5) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, के नवीकरण के लिए अविेदन, विधिमान्यता की अवधि के कम से कम साठ दिन पूर्व किया जाएगा ।

(6) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, संस्था द्वारा किसी सहजदृश्य स्थान पर प्रदर्शित किया जाएगा ।

53. प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण - (1) यदि सक्षम प्राधिकारी के पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त हेतुक है कि धारा 52 की उपधारा (2) के अधीन दिए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के धारक ने, -

(क) प्रमाणपत्र जारी करने या नवीकरण के किसी अविेदन के संबंध में ऐसा कथन किया है जो तात्विक विशिष्टियों में गलत या मिथ्या है; या

(ख) नियमों या किन्हीं ऐसी शर्तों का भंग किया है या भंग करवाया है, जिनके अधीन प्रमाणपत्र दिया गया था,

तो वह ऐसी जांच करने के पश्चात्‌, जो वह ठीक समझे, आदेश द्वारा, प्रमाणपत्र को प्रतिसंहृत कर सकेगा:

परन्तु ऐसा कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक प्रमाणपत्र के धारक को हेतुक दर्शित करने का ऐसा अवसर नहीं दे दिया जाता है कि प्रमाणपत्र क्यों न प्रतिसंहृत किया जाए ।

(2) जहां किसी संस्था की बाबत, प्रमाणपत्र उपधारा (1) के अधीन प्रतिसंहृत किया गया है वहां ऐसी संस्था, ऐसे प्रतिसंहरण की तारीख से कृत्य करना बंद कर देगी:

परन्तु जहां कोई अपील, प्रतिसंहरण के आदेश के विरुद्ध धारा 54 के अधीन की जाती है वहां ऐसी संस्था, -

(क) जहां कोई अपील नहीं की गई है वहां, ऐसी अपील फाइल किए जाने के लिए विहित की गई अवधि की समाप्ति पर तुरन्त, या

(ख) जहां ऐसी अपील की गई है किन्तु प्रतिसंहरण के आदेश को मान्य ठहराया गया है वहां, अपील के आदेश की तारीख से,

कृत्य करना बन्द कर देगी ।

(3) किसी संस्था की बाबत किसी प्रमाणपत्र के प्रतिसंहरण पर, सक्षम प्राधिकारी, यह निदेश दे सकेगा कि कोई निःशक्त व्यक्ति, जो ऐसे प्रतिसंहरण की तारीख को ऐसी संस्था का वासी है, -

(क) यथास्थिति, उसके माता-पिता, पति या पत्नी या विधिक संरक्षण की अभिरक्षा में दे दिया जाएगा, या

(ख) सक्षम प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी अन्य संस्था को अंतरित कर दिया जाएगा ।

(4) प्रत्येक संस्था, जो ऐसा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारण करती है जो इस धारा के अधीन प्रतिसंहृत किया जाता है, ऐसे प्रतिसंहरण के तुरन्त पश्चात्‌ ऐसा प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी को अभ्यर्पित करेगी ।

54. अपील - (1) सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाणपत्र देने से इंकार करने से या प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण किए जाने से व्यथित व्यक्ति, ऐसी अवधि के भीतर जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, ऐसे इंकार या प्रतिसंहरण के विरुद्ध उस सरकार को अपील कर सकेगा ।

(2) ऐसी अपील पर राज्य सरकार का आदेश अंतिम होगा ।

55. केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा स्थापित अनुरक्षित संस्थाओं को अधिनियम का लागू होना - इस अध्याय की कोई बात, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित निःशक्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था को लागू नहीं होगी ।

अध्याय 11

गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्तियों के लिए संस्था

56. गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्तियों के लिए संस्थाएं - (1) समुचित सरकार, ऐसे स्थानों पर जो वह ठीक समझे, गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्तियों के लिए संस्थाओं की स्थापना और उनका अनुरक्षण कर सकेगी ।

(2) जहां समुचित सरकार की यह राय है कि उपधारा (1) के अधीन स्थापित किसी संस्था से भिन्न कोई संस्था, गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए ठीक है वहां सरकार, ऐसी संस्था को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्तियों के लिए संस्था के रूप में मान्यता दे सकेगी:

परन्तु इस धारा के अधीन किसी संस्था को तब तक मान्यता नहीं दी जाएगी जब तक ऐसी संस्था ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन न किया हो ।

(3) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रत्येक संस्था, ऐसी रीति से अनुरक्षित की जाएगी और ऐसी शर्तों को पूरा करेगी जो समुचित सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अस्सी प्रतिशत या अधिक की एक या अधिक निःशक्तताओं से ग्रस्त है ।

अध्याय 12

निःशक्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त और आयुक्त

57. निःशक्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त की नियुक्ति - (1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निःशक्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त, नियुक्त कर सकेगी ।

(2) कोई व्यक्ति, मुख्य आयुक्त के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब उसके पास पुनर्वास से संबंधित विषयों की बाबत विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो ।

(3) मुख्य आयुक्त को संदेय वेतन और भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे हैं) ऐसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) केन्द्रीय सरकार, मुख्य आयुक्त को उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी और मुख्य आयुक्त को ऐसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जो वह ठीक समझे ।

(5) मुख्य आयुक्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारी और कर्मचारी अपने कृत्यों का निर्वहन मुख्य आयुक्त के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।

(6) मुख्य आयुक्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

58. मुख्य आयुक्त के कृत्य - मुख्य आयुक्त, -

(क) आयुक्तों के कार्य का समन्वय करेगा;

(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा संवितरित निधियों के उपयोग को मानीटर करेगा;

(ग) निःशक्त व्यक्तियों के अधिकारों और उनको उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाएगा ।

(घ) अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में केन्द्रीय सरकार को ऐसे अंतरालों पर, जो वह सरकार विहित करे, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।

59. निःशक्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने के संबंध में परिवादों की मुख्य आयुक्त द्वारा जांच किया जाना - धारा 58 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, मुख्य आयुक्त, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के अविेदन पर या अन्यथा, -

(क) निःशक्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने,

(ख) समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक्त व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए बनाई गई विधियों, नियमों, उपविधियों, विनियमों, जारी किए गए कार्यपालक आदेशों, मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों के कार्यान्वित न किए जाने,

से संबंधित मामलों के संबंध में परिवादों की जांच कर सकेगा और मामले को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठा सकेगा । 

60. निःशक्त व्यक्तियों के लिए आयुक्त की नियुक्ति - (1) प्रत्येक राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, निःशक्त व्यक्तियों के लिए आयुक्त, नियुक्त कर सकेगी ।

(2) कोई व्यक्ति, आयुक्त के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब उसके पास पुनर्वास से संबंधित विषयों की बाबत विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो ।

(3) आयुक्त को संदेय वेतन और भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निर्बंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे हैं) ऐसी होंगी जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) राज्य सरकार, आयुक्त को उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी और आयुक्त को ऐसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जो वह ठीक समझे ।

(5) आयुक्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारी और कर्मचारी अपने कृत्यों का निर्वहन आयुक्त के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।

(6) आयुक्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

61. आयुक्त की शक्तियां - आयुक्त, राज्य के भीतर, -

(क) निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए कार्यक्रमों और स्कीमों के संबंध में राज्य सरकार के विभागों से समन्वय करेगा;

(ख) राज्य सरकार द्वारा संवितरित निधियों के उपयोग को मानीटर करेगा;

(ग) निःशक्त व्यक्तियों के अधिकारों और उनको उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाएगा ।

(घ) अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में राज्य सरकार को ऐसे अंतरालों पर, जो वह सरकार विहित करे, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और उसकी एक प्रति मुख्य आयुक्त को अग्रेषित करेगा ।

62. निःशक्त व्यक्ति के अधिकारों से वंचित किए जाने, से संबंधित मामले के संबंध में, परिवादों की आयुक्त द्वारा जांच किया जाना - धारा 61 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, आयुक्त, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के अविेदन पर, या अन्यथा, -

(क) निःशक्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने,

(ख) समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक्त व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए बनाई गई विधियों, नियमों, उपविधियों, विनियमों, जारी किए गए कार्यपालक आदेशों, मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों के कार्यान्वित न किए जाने,

से संबंधित मामलों के संबंध में परिवादों की जांच कर सकेगा और मामले को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठा सकेगा ।

63. प्राधिकारियों और अधिकारियों को सिविल न्यायालय की कतिपय शक्तियों का होना - (1) मुख्य आयुक्त और आयुक्तों को, इस अधिनियम के अधीन उनके कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय, किसी न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्‌: -   

(क) साक्षियों को समन करना और हाजिर कराना;

(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना;

(घ) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; और

(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।

(2) मुख्य आयुक्त और आयुक्तों के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही होगी और मुख्य आयुक्त, आयुक्त, सक्षम प्राधिकारी, को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

64. वार्षिक रिपोर्ट का मुख्य आयुक्त द्वारा तैयार किया जाना - (1) मुख्य आयुक्त, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का पूर्ण विवरण देते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और उसकी एक प्रति केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित करेगा ।

(2) केन्द्रीय सरकार, वार्षिक रिपोर्ट को, संसद्‌ के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी जिसके साथ उसमें की गई सिफारिशों पर, जहां तक कि वे केन्द्रीय सरकार से संबंधित हैं, की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई और ऐसी किसी सिफारिश या उसके भाग की अस्वीकृति के कारणों को, कोई हो, स्पष्ट करने वाली सिफारिशें होंगी ।

65. वार्षिक रिपोर्टों का आयुक्तों द्वारा तैयार किया जाना - (1) आयुक्त, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का पूर्ण विवरण देते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और उसकी एक प्रति राज्य सरकार को अग्रेषित करेगा ।

(2) राज्य सरकार, वार्षिक रिपोर्ट को, राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाएगी जिसके साथ उसमें की गई सिफारिशों पर, जहां तक कि वे राज्य सरकार से संबंधित हैं, की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई और ऐसी किसी सिफारिश या उसके भाग की, यदि कोई हों, स्वीकार न किए जाने के कारणों को स्पष्ट करने वाली सिफारिशें होंगी ।

अध्याय 13

सामाजिक सुरक्षा

66. समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा पुनर्वास कार्य किया जाना - (1) समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर सभी निःशक्त व्यक्तियों का पुनर्वास करेंगे या कराएंगे ।

(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, गैर सरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे ।

(3) समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, पुनर्वास नीतियां बनाते समय निःशक्त व्यक्तियों के लिए कार्य कर रहे गैर सरकारी संगठनों से परामर्श करेंगे ।

67. निःशक्त कर्मचारियों के लिए बीमा स्कीम - (1) समुचित सरकार, अपने निःशक्त कर्मचारियों के फायदे के लिए एक बीमा स्कीम, अधिसूचना द्वारा, बनाएगी ।

(2) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी समुचित सरकार, कोई बीमा स्कीम बनाने के बदले, अपने निःशक्त कर्मचारियों के लिए एक आनुकल्पिक सुरक्षा स्कीम बना सकेगी ।

68. बेरोजगारी भत्ता - समुचित सरकारें, अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, ऐसे निःशक्त व्यक्तियों के लिए, जो विशेष रोजगार कार्यालय में दो वर्ष से अधिक समय से रजिस्ट्रीकृत हैं और जिन्हें किसी लाभप्रद उपजीविका में नहीं लगाया जा सका है, बेरोजगार भत्ता के संदाय के लिए एक स्कीम, अधिसूचना द्वारा, बनाएंगी ।

अध्याय 14

प्रकीर्ण

69. निःशक्त व्यक्तियों के लिए आशयित किसी फायदे का कपटपूर्वक उपभोग करने के लिए दंड - जो कोई, निःशक्त व्यक्तियों के लिए आशयित किसी फायदे का कपटपूर्वक उपभोग करेगा या उपभोग करने का प्रयत्न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो बीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडनीय होगा ।

70. मुख्य आयुक्त, आयुक्तों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवृन्द का लोक सेवक होना - मुख्य आयुक्त, आयुक्तों तथा उनको उपलब्ध कराए गए अन्य अधिकारियों और कर्मचारिवृन्द को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

71. सद्‌्‌भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण - इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या आदेशों के अनुसरण में सद्‌्‌भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों या स्थानीय प्राधिकारियों या सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

72. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होना कि उसके अल्पीकरण में - इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के या निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए अधिनियमित या जारी किए गए किन्हीं नियमों, आदेश या इसके अधीन जारी किए गए किन्हीं अनुदेशों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।

73. नियम बनाने की समुचित सरकार की शक्ति - (1) समुचित सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्‌: -

 (क) वह रीति जिससे, किसी राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र की धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (ट) के अधीन चुना जाएगा;

(ख) वे भत्ते जो सदस्य धारा 4 की उपधारा (7) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ग) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका केन्द्रीय समन्वयन समिति धारा 7 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में पालन करेगी;

(घ) ऐसे अन्य कृत्य, जिन्हें केन्द्रीय समन्वयन समिति धारा 8 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन कर सकेगी;

(ङ) वह रीति जिससे, किसी राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र को धारा 9 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन चुना जाएगा;

(च) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(छ) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका केन्द्रीय कार्यपालिका समिति धारा 11 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में पालन करेगी;

(ज) वह रीति और वे प्रयोजन, जिनके लिए किसी व्यक्ति को धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन सहयुक्त किया जा सकेगा;

(झ) वे फीस और भत्ते, जिन्हें केन्द्रीय कार्यपालिका समिति से सहयुक्त कोई व्यक्ति धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेगा;

(ञ) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 14 की उपधारा (7) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ट) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका राज्य समन्वयन समिति धारा 17 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में पालन करेगी;

(ठ) ऐसे अन्य कृत्य जिन्हें राज्य समन्वयन समिति धारा 18 की उपधारा (2) के खंड (छ) के अधीन कर सकेगी;

(ड) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ढ) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका राज्य कार्यपालिका समिति धारा 21 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में पालन करेगी;

(ण) वह रीति और वे प्रयोजन, जिनके लिए किसी व्यक्ति को धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन सहयुक्त किया जा सकेगा;

(त) वे फीस और भत्ते, जिन्हें राज्य कार्यपालिका समिति से सहयुक्त कोई व्यक्ति धारा 22 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त कर सकेगा;

(थ) वह जानकारी या विवरणी, जो प्रत्येक स्थापन में के नियोजक को देनी होगी और वह विशेष रोजगार कार्यालय जिसको ऐसी जानकारी या विवरणी धारा 34 की उपधारा (1) के अधीन दी जाएगी;

(द) वह प्ररूप जिसमें, और वह रीति जिससे, अभिलेख किसी नियोजक द्वारा धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन रखा जाएगा;

(ध) वह प्ररूप जिसमें, और वह रीति जिससे, धारा 52 की उपधारा (1) के अधीन अविेदन किया जाएगा;

(न) वह रीति जिससे, इंकार करने का आदेश, धारा 52 की उपधारा (2) के अधीन संसूचित किया जाएगा;

(प) ऐसी सुविधाएं या स्तरमान, जो धारा 52 की उपधारा (3) के अधीन दी जानी या बनाए रखी जानी अपेक्षित हैं;

(फ) वह अवधि, जिसके लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारा 52 की उपधारा (4) के खंड (क) के अधीन विधिमान्य होगा;

(ब) वह प्ररूप, जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, धारा 52 की उपधारा (4) के खंड (ग) के अधीन किया जाएगा;

(भ) वह अवधि, जिसके भीतर कोई अपील धारा 54 की उपधारा (1) के अधीन की जाएगी;

(म) वह रीति जिससे, गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्तियों के लिए कोई संस्था धारा 56 की उपधारा (3) के अधीन अनुरक्षित की जाएगी और वे शर्तें जिन्हें पूरा किया जाएगा;

(य) धारा 57 की उपधारा (3) के अधीन मुख्य आयुक्त के वेतन, भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(यक) धारा 57 की उपधारा (6) के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

(यख) वे अंतराल, जिन पर मुख्य आयुक्त धारा 58 के खंड (घ) के अधीन केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट देगा;

(यग) धारा 60 की उपधारा (3) के अधीन आयुक्त के वेतन, भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(यघ) धारा 60 की उपधारा (6) के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

(यङ) वे अंतराल जिनके भीतर आयुक्त धारा 61 के खंड (घ) के अधीन राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा;

(यच) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय जब वार्षिक रिपोर्ट धारा 64 की उपधारा (1) के अधीन तैयार की जाएगी;

(यछ) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय जब वार्षिक रिपोर्ट धारा 65 की उपधारा (1) के अधीन तैयार की जाएगी;

(यज) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।

(3) केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 33 के परन्तुक, धारा 47 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन बनाई गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके द्वारा धारा 27, धारा 30, धारा 38 की उपधारा (1), धारा 42, धारा 43, धारा 67 और धारा 68 के अधीन बनाई गई प्रत्येक स्कीम और उसके द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र, संसद्‌, के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम, अधिसूचना या स्कीम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात्‌ वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम अधिसूचना या स्कीम, नहीं बनाई जानी चाहिए तो तत्पश्चात्‌ वह निष्प्रभाव हो जाएगी । किन्तु नियम, अधिसूचना या स्कीम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(4) राज्य सरकार द्वारा धारा 33 के परन्तुक, धारा 47 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन बनाई गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके द्वारा धारा 27, धारा 30, धारा 38 की उपधारा (1), धारा 42, धारा 43, धारा 67, धारा 68 के अधीन बनाई गई प्रत्येक स्कीम और उसके द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्‌, यथाशीघ्र, जहां विधानमंडल दो सदनों से मिलकर बनता है वहां प्रत्येक सदन के समक्ष, या जहां ऐसा विधानमंडल एक सदन से मिलकर बनता है वहां उस सदन के समक्ष, रखा जाएगा ।

74. 1987 के अधिनियम 39 का संशोधन - विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के खंड (घ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्‌:

(च) निःशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार, संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 2 के खंड (न) में परिभाषित निःशक्त व्यक्ति है "।

 

अध्याय 10

निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्थाओं को मान्यता

50. सक्षम प्राधिकारी – राज्य सरकार, किसी प्राधिकारी को, जिसे वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सक्षम प्राधिकारी होने के लिए ठीक समझे, नियुक़्त करेगी ।

51. किसी व्यक्ति द्वारा निःशक़्त व्यक्तियों के लिए, किसी संस्था की स्थापना या उसका अनुरक्षण रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अनुसार ही किया जाना, अन्यथा नहीं – इस अधिनियम के अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई भी व्यक्ति, निःशक़्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था की स्थापना या उसका अनुरक्षण इस निमित्त सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अधीन और उसके अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं:

परन्तु यह कि एसा व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व निःशक़्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था का अनुरक्षण कर रहा है, एसे प्रारंभ से छह मास की अवधि के लिए एसी संस्था का अनुरक्षण चालू रख सकेगा और यदि उसने उक़्त छह मास की अवधि के भीतर एसे प्रमाणपत्र के लिए अविेदन किया है तो एसे अविेदन के निपटाए जाने तक संस्था का अनुरक्षण चालू रख सकेगा ।

52. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र – (1) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए प्रत्येक अविेदन, सक्षम प्राधिकारी को एसे प्ररूप में और एसी रीति से किया जाएगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अविेदन की प्रााप्ति पर, सक्षम प्राधिकारी, एसी जांच करेगा जो वह ठीक समझे और जहां उसका यह समाधान हो जाता है कि अविेदक ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन किया है वहां वह अविेदक को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देगा और जहां सक्षम प्राधिकारी का इस प्रकार समाधान नहीं होता है वहां वह, आदेश द्वारा, एसा प्रमाणपत्र देने से, जिसके लिए अविेदन किया जाता है, इनकार करेगा:

परन्तु प्रमाणपत्र देने से इनकार करने का कोई आदेश करने के पूर्व, सक्षम प्राधिकारी, अविेदक को सुनवाई का उचित अवसर देगा और प्रमाणपत्र देने से इंकार करने का प्रत्येक आदेश, अविेदक को एसी रीति से, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, संसूचित किया जाएगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक वह संस्था, जिसके बारे में अविेदन किया गया है, एसी सुविधाएं देने तथा एसे स्तरमान बनाए रखने की ास्थिति में है जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(4) इस धारा के अधीन दिया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, –

(क) जब तक धारा 53 के अधीन प्रतिसंदत्त नहीं किया जाता है, उस अवधि के लिए प्रवॄत्त बना रहेगा जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ;

(ख) वैसी ही अवधि के लिए समय-समय पर नवीकॄत किया जा सकेगा; और

(ग) एसे प्ररूप में होगा और एसी शर्तों के अधीन होगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(5) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, के नवीकरण के लिए अविेदन, विधिमान्यता की अवधि के कम से कम साठ दिन पूर्व किया जाएगा ।

(6) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, संस्था द्वारा किसी सहजदृश्य स्थान पर प्रदर्शित किया जाएगा ।

53. प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण – (1) यदि सक्षम प्राधिकारी के पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त हेतुक है कि धारा 52 की उपधारा (2) के अधीन दिए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के धारक ने, –

(क) प्रमाणपत्र जारी करने या नवीकरण के किसी अविेदन के संबंध में एसा कथन किया है जो ताात्विक विशिाष्टियों में गलत या मिथ्या है; या

(ख) नियमों या किन्हाीं एसी शर्तों का भंग किया है या भंग करवाया है, जिनके अधीन प्रमाणपत्र दिया गया था,

तो वह एसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, आदेश द्वारा, प्रमाणपत्र को प्रतिसंहृत कर सकेगा:

परन्तु एसा कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक प्रमाणपत्र के धारक को हेतुक दर्शित करने का एसा अवसर नहीं दे दिया जाता है कि प्रमाणपत्र क्यों न प्रतिसंहृत किया जाए ।

(2) जहां किसी संस्था की बाबत, प्रमाणपत्र उपधारा (1) के अधीन प्रतिसंहृत किया गया है वहां एसी संस्था, एसे प्रतिसंहरण की तारीख से कॄत्य करना बंद कर देगी:

परन्तु जहां कोई अपील, प्रतिसंहरण के आदेश के विरुद्ध धारा 54 के अधीन की जाती है वहां एसी संस्था, –

(क) जहां कोई अपील नहीं की गई है वहां, एसी अपील फाइल किए जाने के लिए विहित की गई अवधि की समााप्ति पर तुरन्त, या

(ख) जहां एसी अपील की गई है किन्तु प्रतिसंहरण के आदेश को मान्य ठहराया गया है वहां, अपील के आदेश की तारीख से,

कॄत्य करना बन्द कर देगी ।

(3) किसी संस्था की बाबत किसी प्रमाणपत्र के प्रतिसंहरण पर, सक्षम प्राधिकारी, यह निदेश दे सकेगा कि कोई निःशक़्त व्यक्ति, जो एसे प्रतिसंहरण की तारीख को एसी संस्था का वासी है, –

(क) यथाास्थिति, उसके माता-पिता, पति या पत्नी या विधिक संरक्षण की अभिरक्षा में दे दिया जाएगा, या

(ख) सक्षम प्राधिकारी द्वारा विनिार्दिष्ट किसी अन्य संस्था को अंतरित कर दिया जाएगा ।

(4) प्रत्येक संस्था, जो एसा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारण करती है जो इस धारा के अधीन प्रतिसंहृत किया जाता है, एसे प्रतिसंहरण के तुरन्त पश्चात् एसा प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी को अभ्यर्पित करेगी ।

54. अपील – (1) सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाणपत्र देने से इंकार करने से या प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण किए जाने से व्यथित व्यक्ति, एसी अवधि के भीतर जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, एसे इंकार या प्रतिसंहरण के विरुद्ध उस सरकार को अपील कर सकेगा ।

(2) एसी अपील पर राज्य सरकार का आदेश अंतिम होगा ।

55. केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा स्थापित अनुरक्षित संस्थाओं को अधिनियम का लागू होना – इस अध्याय की कोई बात, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित निःशक़्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था को लागू नहीं होगी ।

अध्याय 11

गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्था

56. गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्थाएं – (1) समुचित सरकार, एसे स्थानों पर जो वह ठीक समझे, गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्थाओं की स्थापना और उनका अनुरक्षण कर सकेगी ।

(2) जहां समुचित सरकार की यह राय है कि उपधारा (1) के अधीन स्थापित किसी संस्था से भिन्न कोई संस्था, गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए ठीक है वहां सरकार, एसी संस्था को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्था के रूप में मान्यता दे सकेगी:

परन्तु इस धारा के अधीन किसी संस्था को तब तक मान्यता नहीं दी जाएगी जब तक एसी संस्था ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन न किया हो ।

(3) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रत्येक संस्था, एसी रीति से अनुरक्षित की जाएगी और एसी शर्तों को पूरा करेगी जो समुचित सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्ति” से एसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अस्सी प्रतिशत या अधिक की एक या अधिक निःशक़्तताओं से ग्रस्त है ।

अध्याय 12

निःशक़्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक़्त और आयुक़्त

57. निःशक़्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक़्त की नियुक्ति – (1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निःशक़्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक़्त, नियुक़्त कर सकेगी ।

(2) कोई व्यक्ति, मुख्य आयुक़्त के रूप में नियुक्ति के लिए तभी आर्हित होगा जब उसके पास पुनर्वास से संबंधित विषयों की बाबत विशेष ज्ञान या व्यव्यहारिक अनुभव हो ।

(3) मुख्य आयुक़्त को संदेय वेतन और भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवॄत्ति फायदे हैं) एसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) केन्द्रीय सरकार, मुख्य आयुक़्त को उसके कॄत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी और मुख्य आयुक़्त को एसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जो वह ठीक समझे ।

(5) मुख्य आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारी और कर्मचारी अपने कॄत्यों का निर्वहन मुख्य आयुक़्त के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।

(6) मुख्य आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें एसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

58. मुख्य आयुक़्त के कॄत्य – मुख्य आयुक़्त, –

(क) आयुक़्तों के कार्य का समन्वय करेगा;

(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा संवितरित निधियों के उपयोग को मानीटर करेगा;

(ग) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों और उनको उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाएगा ।

(घ) अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में केन्द्रीय सरकार को एसे अंतरालों पर, जो वह सरकार विहित करे, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।

59. निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने के संबंध में परिवादों की मुख्य आयुक़्त द्वारा जांच किया जाना – धारा 58 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, मुख्य आयुक़्त, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के अविेदन पर या अन्यथा, –

(क) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने,

(ख) समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक़्त व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए बनाई गई विधियों, नियमों, उपविधियों, विनियमों, जारी किए गए कार्यफालक आदेशों, मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों के कार्याान्वित न किए जाने,

से संबंधित मामलों के संबंध में परिवादों की जांच कर सकेगा और मामले को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठा सकेगा । 

60. निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आयुक़्त की नियुक्ति – (1) प्रत्येक राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आयुक़्त, नियुक़्त कर सकेगी ।

(2) कोई व्यक्ति, आयुक़्त के रूप में नियुक्ति के लिए तभी आर्हित होगा जब उसके पास पुनर्वास से संबंधित विषयों की बाबत विशेष ज्ञान या व्यव्यहारिक अनुभव हो ।

(3) आयुक़्त को संदेय वेतन और भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निर्बंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवॄत्ति फायदे हैं) एसी होंगी जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) राज्य सरकार, आयुक़्त को उसके कॄत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी और आयुक़्त को एसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जो वह ठीक समझे ।

(5) आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारी और कर्मचारी अपने कॄत्यों का निर्वहन आयुक़्त के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।

(6) आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

61. आयुक़्त की शक्तियां – आयुक़्त, राज्य के भीतर, –

(क) निःशक़्त व्यक्तियों के फायदे के लिए कार्यक्रमों और स्कीमों के संबंध में राज्य सरकार के विभागों से समन्वय करेगा;

(ख) राज्य सरकार द्वारा संवितरित निधियों के उपयोग को मानीटर करेगा;

(ग) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों और उनको उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाएगा ।

(घ) अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में राज्य सरकार को एसे अंतरालों पर, जो वह सरकार विहित करे, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और उसकी एक प्रति मुख्य आयुक़्त को अग्रेषित करेगा ।

62. निःशक़्त व्यक्ति के अधिकारों से वंचित किए जाने, से संबंधित मामले के संबंध में, परिवादों की आयुक़्त द्वारा जांच किया जाना – धारा 61 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, आयुक़्त, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के अविेदन पर, या अन्यथा, –

(क) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने,

(ख) समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक़्त व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए बनाई गई विधियों, नियमों, उपविधियों, विनियमों, जारी किए गए कार्यफालक आदेशों, मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों के कार्याान्वित न किए जाने,

से संबंधित मामलों के संबंध में परिवादों की जांच कर सकेगा और मामले को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठा सकेगा ।

63. प्राधिकारियों और अधिकारियों को सिविल न्यायालय की कतिफय शक्तियों का होना – (1) मुख्य आयुक़्त और आयुक़्तों को, इस अधिनियम के अधीन उनके कॄत्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय, किसी न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: –   

(क) साक्षियों को समन करना और हाजिर कराना;

(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना;

(घ) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; और

(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।

(2) मुख्य आयुक़्त और आयुक़्तों के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही होगी और मुख्य आयुक़्त, आयुक़्त, सक्षम प्राधिकारी, को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

64. वाार्षिक रिपोर्ट का मुख्य आयुक़्त द्वारा तैयार किया जाना – (1) मुख्य आयुक़्त, एसे प्ररूप में और एसे समय पर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का पूर्ण विवरण देते हुए एक वाार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और उसकी एक प्रति केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित करेगा ।

(2) केन्द्रीय सरकार, वाार्षिक रिपोर्ट को, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी जिसके साथ उसमें की गई सिफारिशों पर, जहां तक कि वे केन्द्रीय सरकार से संबंधित हैं, की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई और एसी किसी सिफारिश या उसके भाग की अस्वीकॄति के कारणों को, कोई हो, शपष्ट करने वाली सिफारिशें होंगी ।

65. वाार्षिक रिपोर्टों का आयुक़्तों द्वारा तैयार किया जाना – (1) आयुक़्त, एसे प्ररूप में और एसे समय पर, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का पूर्ण विवरण देते हुए एक वाार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और उसकी एक प्रति राज्य सरकार को अग्रेषित करेगा ।

(2) राज्य सरकार, वाार्षिक रिपोर्ट को, राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाएगी जिसके साथ उसमें की गई सिफारिशों पर, जहां तक कि वे राज्य सरकार से संबंधित हैं, की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई और एसी किसी सिफारिश या उसके भाग की, यदि कोई हों, स्वीकार न किए जाने के कारणों को शपष्ट करने वाली सिफारिशें होंगी ।

अध्याय 13

सामाजिक सुरक्षा

66. समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा पुनर्वास कार्य किया जाना – (1) समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अपनी आार्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर सभी निःशक़्त व्यक्तियों का पुनर्वास करेंगे या कराएंगे ।

(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, गैर सरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे ।

(3) समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, पुनर्वास नीतियां बनाते समय निःशक़्त व्यक्तियों के लिए कार्य कर रहे गैर सरकारी संगठनों से परामर्श करेंगे ।

67. निःशक़्त कर्मचारियों के लिए बीमा स्कीम – (1) समुचित सरकार, अपने निःशक़्त कर्मचारियों के फायदे के लिए एक बीमा स्कीम, अधिसूचना द्वारा, बनाएगी ।

(2) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी समुचित सरकार, कोई बीमा स्कीम बनाने के बदले, अपने निःशक़्त कर्मचारियों के लिए एक आनुकाल्फिक सुरक्षा स्कीम बना सकेगी ।

68. बेरोजगारी भत्ता – समुचित सरकारें, अपनी आार्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, एसे निःशक़्त व्यक्तियों के लिए, जो विशेष रोजगार कार्यालय में दो वर्ष से अधिक समय से रजिस्ट्रीकॄत हैं और जिन्हें किसी लाभप्रद उपजीविका में नहीं लगाया जा सका है, बेरोजगार भत्ता के संदाय के लिए एक स्कीम, अधिसूचना द्वारा, बनाएंगी ।

अध्याय 14

प्रकीर्ण

69. निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आशयित किसी फायदे का कपटपूर्वक उपभोग करने के लिए दंड – जो कोई, निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आशयित किसी फायदे का कपटपूर्वक उपभोग करेगा या उपभोग करने का प्रयत्न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो बीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडनीय होगा ।

70. मुख्य आयुक़्त, आयुक़्तों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवॄन्द का लोक सेवक होना – मुख्य आयुक़्त, आयुक़्तों तथा उनको उपलब्ध कराए गए अन्य अधिकारियों और कर्मचारिवॄन्द को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

71. सद््भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण – इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किन्हाीं नियमों या आदेशों के अनुसरण में सद््भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों या स्थानीय प्राधिकारियों या सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

72. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक़्त होना कि उसके अल्पीकरण में – इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध तत्समय प्रवॄत्त किसी अन्य विधि के या निःशक़्त व्यक्तियों के फायदे के लिए अधिनियमित या जारी किए गए किन्हाीं नियमों, आदेश या इसके अधीन जारी किए गए किन्हाीं अनुदेशों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।

73. नियम बनाने की समुचित सरकार की शाकिक़्त – (1) समुचित सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्याान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की एयाफकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, एसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हाीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: –

 (क) वह रीति जिससे, किसी राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र की धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (ट) के अधीन चुना जाएगा;

(ख) वे भत्ते जो सदस्य धारा 4 की उपधारा (7) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ग) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका केन्द्रीय समन्वयन समिति धारा 7 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(घ) एसे अन्य कॄत्य, जिन्हें केन्द्रीय समन्वयन समिति धारा 8 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन कर सकेगी;

(ङ) वह रीति जिससे, किसी राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र को धारा 9 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन चुना जाएगा;

(च) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(छ) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका केन्द्रीय कार्यपालिका समिति धारा 11 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(ज) वह रीति और वे प्रयोजन, जिनके लिए किसी व्यक्ति को धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन सहयुकक़्त किया जा सकेगा;

(झ) वे फीस और भत्ते, जिन्हें केन्द्रीय कार्यपालिका समिति से सहयुक़्त कोई व्यक्ति धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेगा;

(ञ) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 14 की उपधारा (7) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ट) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका राज्य समन्वयन समिति धारा 17 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(ठ) एसे अन्य कॄत्य जिन्हें राज्य समन्वयन समिति धारा 18 की उपधारा (2) के खंड (छ) के अधीन कर सकेगी;

(ड) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ढ) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका राज्य कार्यपालिका समिति धारा 21 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(ण) वह रीति और वे प्रयोजन, जिनके लिए किसी व्यक्ति को धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन सहयुकक़्त किया जा सकेगा;

(त) वे फीस और भत्ते, जिन्हें राज्य कार्यपालिका समिति से सहयुक़्त कोई व्यक्ति धारा 22 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त कर सकेगा;

(थ) वह जानकारी या विवरणी, जो प्रत्येक स्थापन में के नियोजक को देनी होगी और वह विशेष रोजगार कार्यालय जिसको एसी जानकारी या विवरणी धारा 34 की उपधारा (1) के अधीन दी जाएगी;

(द) वह प्ररूप जिसमें, और वह रीति जिससे, अभिलेख किसी नियोजक द्वारा धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन रखा जाएगा;

(ध) वह प्ररूप जिसमें, और वह रीति जिससे, धारा 52 की उपधारा (1) के अधीन अविेदन किया जाएगा;

(न) वह रीति जिससे, इंकार करने का आदेश, धारा 52 की उपधारा (2) के अधीन संसूचित किया जाएगा;

(फ) एसी सुविधाएं या स्तरमान, जो धारा 52 की उपधारा (3) के अधीन दी जानी या बनाए रखी जानी अपेक्षित हैं;

(फ) वह अवधि, जिसके लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारा 52 की उपधारा (4) के खंड (क) के अधीन विधिमान्य होगा;

(ब) वह प्ररूप, जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, धारा 52 की उपधारा (4) के खंड (ग) के अधीन किया जाएगा;

(भ) वह अवधि, जिसके भीतर कोई अपील धारा 54 की उपधारा (1) के अधीन की जाएगी;

(म) वह रीति जिससे, गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए कोई संस्था धारा 56 की उपधारा (3) के अधीन अनुरक्षित की जाएगी और वे शर्तें जिन्हें पूरा किया जाएगा;

(य) धारा 57 की उपधारा (3) के अधीन मुख्य आयुक़्त के वेतन, भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(यक) धारा 57 की उपधारा (6) के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

(यख) वे अंतराल, जिन पर मुख्य आयुक़्त धारा 58 के खंड (घ) के अधीन केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट देगा;

(यग) धारा 60 की उपधारा (3) के अधीन आयुक़्त के वेतन, भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(यघ) धारा 60 की उपधारा (6) के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

(यङ) वे अंतराल जिनके भीतर आयुक़्त धारा 61 के खंड (घ) के अधीन राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा;

(यच) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय जब वाार्षिक रिपोर्ट धारा 64 की उपधारा (1) के अधीन तैयार की जाएगी;

(यछ) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय जब वाार्षिक रिपोर्ट धारा 65 की उपधारा (1) के अधीन तैयार की जाएगी;

(यज) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।

(3) केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 33 के परन्तुक, धारा 47 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन बनाई गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके द्वारा धारा 27, धारा 30, धारा 38 की उपधारा (1), धारा 42, धारा 43, धारा 67 और धारा 68 के अधीन बनाई गई प्रत्येक स्कीम और उसके द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद्, के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में फूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोकक़्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम, अधिसूचना या स्कीम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह एसे परिवार्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक़्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम अधिसूचना या स्कीम, नहीं बनाई जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी । किन्तु नियम, अधिसूचना या स्कीम के एसे परिवार्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन फहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं फ½ेगा ।

(4) राज्य सरकार द्वारा धारा 33 के परन्तुक, धारा 47 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन बनाई गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके द्वारा धारा 27, धारा 30, धारा 38 की उपधारा (1), धारा 42, धारा 43, धारा 67, धारा 68 के अधीन बनाई गई प्रत्येक स्कीम और उसके द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, जहां विधानमंडल दो सदनों से मिलकर बनता है वहां प्रत्येक सदन के समक्ष, या जहां एसा विधानमंडल एक सदन से मिलकर बनता है वहां उस सदन के समक्ष, रखा जाएगा ।

74. 1987 के अधिनियम 39 का संशोधन – विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के खंड (घ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्: ‒

“(च) निःशक़्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार, संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 2 के खंड (न) में परिभाषित निःशक़्त व्यक्ति है ”।

 

अध्याय 10

निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्थाओं को मान्यता

50. सक्षम प्राधिकारी – राज्य सरकार, किसी प्राधिकारी को, जिसे वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सक्षम प्राधिकारी होने के लिए ठीक समझे, नियुक़्त करेगी ।

51. किसी व्यक्ति द्वारा निःशक़्त व्यक्तियों के लिए, किसी संस्था की स्थापना या उसका अनुरक्षण रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अनुसार ही किया जाना, अन्यथा नहीं – इस अधिनियम के अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई भी व्यक्ति, निःशक़्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था की स्थापना या उसका अनुरक्षण इस निमित्त सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अधीन और उसके अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं:

परन्तु यह कि एसा व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व निःशक़्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था का अनुरक्षण कर रहा है, एसे प्रारंभ से छह मास की अवधि के लिए एसी संस्था का अनुरक्षण चालू रख सकेगा और यदि उसने उक़्त छह मास की अवधि के भीतर एसे प्रमाणपत्र के लिए अविेदन किया है तो एसे अविेदन के निपटाए जाने तक संस्था का अनुरक्षण चालू रख सकेगा ।

52. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र – (1) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए प्रत्येक अविेदन, सक्षम प्राधिकारी को एसे प्ररूप में और एसी रीति से किया जाएगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अविेदन की प्रााप्ति पर, सक्षम प्राधिकारी, एसी जांच करेगा जो वह ठीक समझे और जहां उसका यह समाधान हो जाता है कि अविेदक ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन किया है वहां वह अविेदक को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देगा और जहां सक्षम प्राधिकारी का इस प्रकार समाधान नहीं होता है वहां वह, आदेश द्वारा, एसा प्रमाणपत्र देने से, जिसके लिए अविेदन किया जाता है, इनकार करेगा:

परन्तु प्रमाणपत्र देने से इनकार करने का कोई आदेश करने के पूर्व, सक्षम प्राधिकारी, अविेदक को सुनवाई का उचित अवसर देगा और प्रमाणपत्र देने से इंकार करने का प्रत्येक आदेश, अविेदक को एसी रीति से, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, संसूचित किया जाएगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक वह संस्था, जिसके बारे में अविेदन किया गया है, एसी सुविधाएं देने तथा एसे स्तरमान बनाए रखने की ास्थिति में है जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(4) इस धारा के अधीन दिया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, –

(क) जब तक धारा 53 के अधीन प्रतिसंदत्त नहीं किया जाता है, उस अवधि के लिए प्रवॄत्त बना रहेगा जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए;

(ख) वैसी ही अवधि के लिए समय-समय पर नवीकॄत किया जा सकेगा; और

(ग) एसे प्ररूप में होगा और एसी शर्तों के अधीन होगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(5) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, के नवीकरण के लिए अविेदन, विधिमान्यता की अवधि के कम से कम साठ दिन पूर्व किया जाएगा ।

(6) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, संस्था द्वारा किसी सहजदृश्य स्थान पर प्रदर्शित किया जाएगा ।

53. प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण – (1) यदि सक्षम प्राधिकारी के पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त हेतुक है कि धारा 52 की उपधारा (2) के अधीन दिए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के धारक ने, –

(क) प्रमाणपत्र जारी करने या नवीकरण के किसी अविेदन के संबंध में एसा कथन किया है जो ताात्विक विशिाष्टियों में गलत या मिथ्या है; या

(ख) नियमों या किन्हाीं एसी शर्तों का भंग किया है या भंग करवाया है, जिनके अधीन प्रमाणपत्र दिया गया था,

तो वह एसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, आदेश द्वारा, प्रमाणपत्र को प्रतिसंहृत कर सकेगा:

परन्तु एसा कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक प्रमाणपत्र के धारक को हेतुक दर्शित करने का एसा अवसर नहीं दे दिया जाता है कि प्रमाणपत्र क्यों न प्रतिसंहृत किया जाए ।

(2) जहां किसी संस्था की बाबत, प्रमाणपत्र उपधारा (1) के अधीन प्रतिसंहृत किया गया है वहां एसी संस्था, एसे प्रतिसंहरण की तारीख से कॄत्य करना बंद कर देगी:

परन्तु जहां कोई अपील, प्रतिसंहरण के आदेश के विरुद्ध धारा 54 के अधीन की जाती है वहां एसी संस्था, –

(क) जहां कोई अपील नहीं की गई है वहां, एसी अपील फाइल किए जाने के लिए विहित की गई अवधि की समााप्ति पर तुरन्त, या

(ख) जहां एसी अपील की गई है किन्तु प्रतिसंहरण के आदेश को मान्य ठहराया गया है वहां, अपील के आदेश की तारीख से,

कॄत्य करना बन्द कर देगी ।

(3) किसी संस्था की बाबत किसी प्रमाणपत्र के प्रतिसंहरण पर, सक्षम प्राधिकारी, यह निदेश दे सकेगा कि कोई निःशक़्त व्यक्ति, जो एसे प्रतिसंहरण की तारीख को एसी संस्था का वासी है, –

(क) यथाास्थिति, उसके माता-पिता, पति या पत्नी या विधिक संरक्षण की अभिरक्षा में दे दिया जाएगा, या

(ख) सक्षम प्राधिकारी द्वारा विनिार्दिष्ट किसी अन्य संस्था को अंतरित कर दिया जाएगा ।

(4) प्रत्येक संस्था, जो एसा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारण करती है जो इस धारा के अधीन प्रतिसंहृत किया जाता है, एसे प्रतिसंहरण के तुरन्त पश्चात् एसा प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी को अभ्यर्पित करेगी ।

54. अपील – (1) सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाणपत्र देने से इंकार करने से या प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण किए जाने से व्यथित व्यक्ति, एसी अवधि के भीतर जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, एसे इंकार या प्रतिसंहरण के विरुद्ध उस सरकार को अपील कर सकेगा ।

(2) एसी अपील पर राज्य सरकार का आदेश अंतिम होगा ।

55. केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा स्थापित अनुरक्षित संस्थाओं को अधिनियम का लागू होना – इस अध्याय की कोई बात, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित निःशक़्त व्यक्तियों के लिए किसी संस्था को लागू नहीं होगी ।

अध्याय 11

गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्था

56. गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्थाएं – (1) समुचित सरकार, एसे स्थानों पर जो वह ठीक समझे, गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्थाओं की स्थापना और उनका अनुरक्षण कर सकेगी ।

(2) जहां समुचित सरकार की यह राय है कि उपधारा (1) के अधीन स्थापित किसी संस्था से भिन्न कोई संस्था, गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए ठीक है वहां सरकार, एसी संस्था को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए संस्था के रूप में मान्यता दे सकेगी:

परन्तु इस धारा के अधीन किसी संस्था को तब तक मान्यता नहीं दी जाएगी जब तक एसी संस्था ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन न किया हो ।

(3) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रत्येक संस्था, एसी रीति से अनुरक्षित की जाएगी और एसी शर्तों को पूरा करेगी जो समुचित सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्ति” से एसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अस्सी प्रतिशत या अधिक की एक या अधिक निःशक़्तताओं से ग्रस्त है ।

अध्याय 12

निःशक़्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक़्त और आयुक़्त

57. निःशक़्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक़्त की नियुक्ति – (1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निःशक़्त व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक़्त, नियुक़्त कर सकेगी ।

(2) कोई व्यक्ति, मुख्य आयुक़्त के रूप में नियुक्ति के लिए तभी आर्हित होगा जब उसके पास पुनर्वास से संबंधित विषयों की बाबत विशेष ज्ञान या व्यव्यहारिक अनुभव हो ।

(3) मुख्य आयुक़्त को संदेय वेतन और भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवॄत्ति फायदे हैं) एसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) केन्द्रीय सरकार, मुख्य आयुक़्त को उसके कॄत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी और मुख्य आयुक़्त को एसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जो वह ठीक समझे ।

(5) मुख्य आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारी और कर्मचारी अपने कॄत्यों का निर्वहन मुख्य आयुक़्त के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।

(6) मुख्य आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें एसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

58. मुख्य आयुक़्त के कॄत्य – मुख्य आयुक़्त, –

(क) आयुक़्तों के कार्य का समन्वय करेगा;

(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा संवितरित निधियों के उपयोग को मानीटर करेगा;

(ग) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों और उनको उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाएगा ।

(घ) अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में केन्द्रीय सरकार को एसे अंतरालों पर, जो वह सरकार विहित करे, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।

59. निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने के संबंध में परिवादों की मुख्य आयुक़्त द्वारा जांच किया जाना – धारा 58 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, मुख्य आयुक़्त, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के अविेदन पर या अन्यथा, –

(क) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने,

(ख) समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक़्त व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए बनाई गई विधियों, नियमों, उपविधियों, विनियमों, जारी किए गए कार्यफालक आदेशों, मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों के कार्याान्वित न किए जाने,

से संबंधित मामलों के संबंध में परिवादों की जांच कर सकेगा और मामले को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठा सकेगा । 

60. निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आयुक़्त की नियुक्ति – (1) प्रत्येक राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आयुक़्त, नियुक़्त कर सकेगी ।

(2) कोई व्यक्ति, आयुक़्त के रूप में नियुक्ति के लिए तभी आर्हित होगा जब उसके पास पुनर्वास से संबंधित विषयों की बाबत विशेष ज्ञान या व्यव्यहारिक अनुभव हो ।

(3) आयुक़्त को संदेय वेतन और भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निर्बंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवॄत्ति फायदे हैं) एसी होंगी जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

(4) राज्य सरकार, आयुक़्त को उसके कॄत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी और आयुक़्त को एसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जो वह ठीक समझे ।

(5) आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारी और कर्मचारी अपने कॄत्यों का निर्वहन आयुक़्त के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।

(6) आयुक़्त को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

61. आयुक़्त की शक्तियां – आयुक़्त, राज्य के भीतर, –

(क) निःशक़्त व्यक्तियों के फायदे के लिए कार्यक्रमों और स्कीमों के संबंध में राज्य सरकार के विभागों से समन्वय करेगा;

(ख) राज्य सरकार द्वारा संवितरित निधियों के उपयोग को मानीटर करेगा;

(ग) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों और उनको उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाएगा ।

(घ) अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में राज्य सरकार को एसे अंतरालों पर, जो वह सरकार विहित करे, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और उसकी एक प्रति मुख्य आयुक़्त को अग्रेषित करेगा ।

62. निःशक़्त व्यक्ति के अधिकारों से वंचित किए जाने, से संबंधित मामले के संबंध में, परिवादों की आयुक़्त द्वारा जांच किया जाना – धारा 61 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, आयुक़्त, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के अविेदन पर, या अन्यथा, –

(क) निःशक़्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किए जाने,

(ख) समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा निःशक़्त व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए बनाई गई विधियों, नियमों, उपविधियों, विनियमों, जारी किए गए कार्यफालक आदेशों, मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों के कार्याान्वित न किए जाने,

से संबंधित मामलों के संबंध में परिवादों की जांच कर सकेगा और मामले को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठा सकेगा ।

63. प्राधिकारियों और अधिकारियों को सिविल न्यायालय की कतिफय शक्तियों का होना – (1) मुख्य आयुक़्त और आयुक़्तों को, इस अधिनियम के अधीन उनके कॄत्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय, किसी न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: –   

(क) साक्षियों को समन करना और हाजिर कराना;

(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना;

(घ) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; और

(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।

(2) मुख्य आयुक़्त और आयुक़्तों के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही होगी और मुख्य आयुक़्त, आयुक़्त, सक्षम प्राधिकारी, को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

64. वाार्षिक रिपोर्ट का मुख्य आयुक़्त द्वारा तैयार किया जाना – (1) मुख्य आयुक़्त, एसे प्ररूप में और एसे समय पर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का पूर्ण विवरण देते हुए एक वाार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और उसकी एक प्रति केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित करेगा ।

(2) केन्द्रीय सरकार, वाार्षिक रिपोर्ट को, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी जिसके साथ उसमें की गई सिफारिशों पर, जहां तक कि वे केन्द्रीय सरकार से संबंधित हैं, की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई और एसी किसी सिफारिश या उसके भाग की अस्वीकॄति के कारणों को, कोई हो, शपष्ट करने वाली सिफारिशें होंगी ।

65. वाार्षिक रिपोर्टों का आयुक़्तों द्वारा तैयार किया जाना – (1) आयुक़्त, एसे प्ररूप में और एसे समय पर, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का पूर्ण विवरण देते हुए एक वाार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और उसकी एक प्रति राज्य सरकार को अग्रेषित करेगा ।

(2) राज्य सरकार, वाार्षिक रिपोर्ट को, राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाएगी जिसके साथ उसमें की गई सिफारिशों पर, जहां तक कि वे राज्य सरकार से संबंधित हैं, की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई और एसी किसी सिफारिश या उसके भाग की, यदि कोई हों, स्वीकार न किए जाने के कारणों को शपष्ट करने वाली सिफारिशें होंगी ।

अध्याय 13

सामाजिक सुरक्षा

66. समुचित सरकारों और स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा पुनर्वास कार्य किया जाना – (1) समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, अपनी आार्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर सभी निःशक़्त व्यक्तियों का पुनर्वास करेंगे या कराएंगे ।

(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, गैर सरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे ।

(3) समुचित सरकारें और स्थानीय प्राधिकारी, पुनर्वास नीतियां बनाते समय निःशक़्त व्यक्तियों के लिए कार्य कर रहे गैर सरकारी संगठनों से परामर्श करेंगे ।

67. निःशक़्त कर्मचारियों के लिए बीमा स्कीम – (1) समुचित सरकार, अपने निःशक़्त कर्मचारियों के फायदे के लिए एक बीमा स्कीम, अधिसूचना द्वारा, बनाएगी ।

(2) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी समुचित सरकार, कोई बीमा स्कीम बनाने के बदले, अपने निःशक़्त कर्मचारियों के लिए एक आनुकाल्फिक सुरक्षा स्कीम बना सकेगी ।

68. बेरोजगारी भत्ता – समुचित सरकारें, अपनी आार्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, एसे निःशक़्त व्यक्तियों के लिए, जो विशेष रोजगार कार्यालय में दो वर्ष से अधिक समय से रजिस्ट्रीकॄत हैं और जिन्हें किसी लाभप्रद उपजीविका में नहीं लगाया जा सका है, बेरोजगार भत्ता के संदाय के लिए एक स्कीम, अधिसूचना द्वारा, बनाएंगी ।

अध्याय 14

प्रकीर्ण

69. निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आशयित किसी फायदे का कपटपूर्वक उपभोग करने के लिए दंड – जो कोई, निःशक़्त व्यक्तियों के लिए आशयित किसी फायदे का कपटपूर्वक उपभोग करेगा या उपभोग करने का प्रयत्न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो बीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडनीय होगा ।

70. मुख्य आयुक़्त, आयुक़्तों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवॄन्द का लोक सेवक होना – मुख्य आयुक़्त, आयुक़्तों तथा उनको उपलब्ध कराए गए अन्य अधिकारियों और कर्मचारिवॄन्द को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

71. सद््भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण – इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किन्हाीं नियमों या आदेशों के अनुसरण में सद््भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों या स्थानीय प्राधिकारियों या सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

72. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होना कि उसके अल्पीकरण में – इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध तत्समय प्रवॄत्त किसी अन्य विधि के या निःशक़्त व्यक्तियों के फायदे के लिए अधिनियमित या जारी किए गए किन्हाीं नियमों, आदेश या इसके अधीन जारी किए गए किन्हाीं अनुदेशों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।

73. नियम बनाने की समुचित सरकार की शाकिक़्त – (1) समुचित सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्याान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की एयाफकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, एसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हाीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: –

 (क) वह रीति जिससे, किसी राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र की धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (ट) के अधीन चुना जाएगा;

(ख) वे भत्ते जो सदस्य धारा 4 की उपधारा (7) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ग) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका केन्द्रीय समन्वयन समिति धारा 7 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(घ) एसे अन्य कॄत्य, जिन्हें केन्द्रीय समन्वयन समिति धारा 8 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन कर सकेगी;

(ङ) वह रीति जिससे, किसी राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र को धारा 9 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन चुना जाएगा;

(च) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(छ) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका केन्द्रीय कार्यपालिका समिति धारा 11 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(ज) वह रीति और वे प्रयोजन, जिनके लिए किसी व्यक्ति को धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन सहयुकक़्त किया जा सकेगा;

(झ) वे फीस और भत्ते, जिन्हें केन्द्रीय कार्यपालिका समिति से सहयुक़्त कोई व्यक्ति धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेगा;

(ञ) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 14 की उपधारा (7) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ट) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका राज्य समन्वयन समिति धारा 17 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(ठ) एसे अन्य कॄत्य जिन्हें राज्य समन्वयन समिति धारा 18 की उपधारा (2) के खंड (छ) के अधीन कर सकेगी;

(ड) वे भत्ते, जो सदस्य धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त करेंगे;

(ढ) प्रक्रिया के वे नियम, जिनका राज्य कार्यपालिका समिति धारा 21 के अधीन अपने अधिवेशनों में कारबार के संएयवहार के संबंध में फालन करेगी;

(ण) वह रीति और वे प्रयोजन, जिनके लिए किसी व्यक्ति को धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन सहयुक़्त किया जा सकेगा;

(त) वे फीस और भत्ते, जिन्हें राज्य कार्यपालिका समिति से सहयुकक़्त कोई व्यक्ति धारा 22 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त कर सकेगा;

(थ) वह जानकारी या विवरणी, जो प्रत्येक स्थाफन में के नियोजक को देनी होगी और वह विशेष रोजगार कार्यालय जिसको एसी जानकारी या विवरणी धारा 34 की उपधारा (1) के अधीन दी जाएगी;

(द) वह प्ररूप जिसमें, और वह रीति जिससे, अभिलेख किसी नियोजक द्वारा धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन रखा जाएगा;

(ध) वह प्ररूप जिसमें, और वह रीति जिससे, धारा 52 की उपधारा (1) के अधीन अविेदन किया जाएगा;

(न) वह रीति जिससे, इंकार करने का आदेश, धारा 52 की उपधारा (2) के अधीन संसूचित किया जाएगा;

(फ) एसी सुविधाएं या स्तरमान, जो धारा 52 की उपधारा (3) के अधीन दी जानी या बनाए रखी जानी अपेक्षित हैं;

(फ) वह अवधि, जिसके लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारा 52 की उपधारा (4) के खंड (क) के अधीन विधिमान्य होगा;

(ब) वह प्ररूप, जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, धारा 52 की उपधारा (4) के खंड (ग) के अधीन किया जाएगा;

(भ) वह अवधि, जिसके भीतर कोई अपील धारा 54 की उपधारा (1) के अधीन की जाएगी;

(म) वह रीति जिससे, गंभीर रूप से निःशक़्त व्यक्तियों के लिए कोई संस्था धारा 56 की उपधारा (3) के अधीन अनुरक्षित की जाएगी और वे शर्तें जिन्हें पूरा किया जाएगा;

(य) धारा 57 की उपधारा (3) के अधीन मुख्य आयुक़्त के वेतन, भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(यक) धारा 57 की उपधारा (6) के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

(यख) वे अंतराल, जिन पर मुख्य आयुक़्त धारा 58 के खंड (घ) के अधीन केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट देगा;

(यग) धारा 60 की उपधारा (3) के अधीन आयुक़्त के वेतन, भत्ते तथा उसकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(यघ) धारा 60 की उपधारा (6) के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

(यङ) वे अंतराल जिनके भीतर आयुक़्त धारा 61 के खंड (घ) के अधीन राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा;

(यच) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय जब वाार्षिक रिपोर्ट धारा 64 की उपधारा (1) के अधीन तैयार की जाएगी;

(यछ) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय जब वाार्षिक रिपोर्ट धारा 65 की उपधारा (1) के अधीन तैयार की जाएगी;

(यज) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।

(3) केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 33 के परन्तुक, धारा 47 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन बनाई गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके द्वारा धारा 27, धारा 30, धारा 38 की उपधारा (1), धारा 42, धारा 43, धारा 67 और धारा 68 के अधीन बनाई गई प्रत्येक स्कीम और उसके द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद्, के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में फूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोकक़्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम, अधिसूचना या स्कीम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह एसे परिवार्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक़्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम अधिसूचना या स्कीम, नहीं बनाई जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी । किन्तु नियम, अधिसूचना या स्कीम के एसे परिवार्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन फहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं फ½ेगा ।

(4) राज्य सरकार द्वारा धारा 33 के परन्तुक, धारा 47 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन बनाई गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके द्वारा धारा 27, धारा 30, धारा 38 की उपधारा (1), धारा 42, धारा 43, धारा 67, धारा 68 के अधीन बनाई गई प्रत्येक स्कीम और उसके द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, जहां विधानमंडल दो सदनों से मिलकर बनता है वहां प्रत्येक सदन के समक्ष, या जहां एसा विधानमंडल एक सदन से मिलकर बनता है वहां उस सदन के समक्ष, रखा जाएगा ।

74. 1987 के अधिनियम 39 का संशोधन – विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के खंड (घ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्: ‒

“(च) निःशक़्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार, संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 2 के खंड (न) में परिभाषित निःशक़्त व्यक्ति है ” ।

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