छोटे सिक्के (अपराध) अधिनियम,1971
(1971 का अधिनियम संख्यांक 52)
[11 दिसम्बर 1971]
छोटे सिक्कों को पिघलाना या नष्ट करना और छोटे सिक्के
पिघलाने या नष्ट करने के प्रयोजनार्थ उन्हें जमा करना
रोकने के लिए और उससे संबंधित या उसके
आनुषंगिक विषयों के लिए उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
यतः देश में छोटे सिक्कों की बहुत कमी अनुभव की गई है और जनसाधारण के हित में यह आवश्यक है कि इस कमी को दूर करने के लिए कदम उठाए जाएं;
अतः भारत गणराज्य के बाईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. सक्षिप्त नाम और अवधि-(1) यह अधिनियम छोटे सिक्के (अपराध) अधिनियम, 1971 कहा जा सकेगा ।
(2) यह तीन वर्ष की कालावधि पर्यन्त प्रवृत्त रहेगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) टकसाल" से भारत सरकार की टकसाल अभिप्रेत है;
(ख) छोटा सिक्का" से एक रुपए से कम मूल्य का ऐसा सिक्का अभिप्रेत है जो भारतीय सिक्का-निर्माण अधिनियम, 1906 (1906 का 3) के अधीन वैध निविदा है ।
3. छोटे सिक्कों को पिघलाने या नष्ट करने का प्रतिषेध-(1) कोई व्यक्ति-
(क) कोई छोटा सिक्का न पिघलाएगा और न नष्ट करेगा,
(ख) अपने कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में-
(i) कोई पिघला हुआ सिक्का नहीं रखेगा, चाहे वह पिघली हुई अवस्था में हो या ठोस अवस्था में,
(ii) कोई छोटा सिक्का नष्ट या विकृत अवस्था में नहीं रखेगा,
(iii) छोटे सिक्के अपनी उचित आवश्यकताओं से सारतः अधिक मात्रा में ऐसी परिस्थितियों में न रखेगा जिनसे यह उपदर्शित हो कि वह उन छोटे सिक्कों को पिघलाने या नष्ट करने के प्रयोजनार्थ उन्हें कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में रखे हुए है ।
स्पष्टीकरण-किसी व्यक्ति की छोटे सिक्कों की उचित आवश्यकताओं के अवधारण के प्रयोजनार्थ निम्नलिखित बातों का सम्यक् ध्यान रखा जाएगा: -
(i) उसकी छोटे सिक्कों की कुल दैनिक आवश्यकताएं;
(ii) उसके कारबार, उपजीविका या वृत्ति की प्रकृति;
(iii) उसका छोटे सिक्कों के अर्जन का ढंग; तथा
(iv) वह रीति जिससे, और वह स्थान जहां, ऐसे छोटे सिक्के उसके द्वारा कब्जे में रखे गए अथवा धारित या नियंत्रित हैं ।
(2) जो कोई ऐसी धातु को कब्जे में रखते पाया जाए जिसमें धातुमिश्रण उसी अनुपात में हो जिस अनुपात में उसका प्रयोग किसी छोटे सिक्के के विनिर्माण में किया गया है, उसके बारे में, जब तक तत्प्रतिकूल साबित न किया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि उसने उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन किया है ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) की कोई बात टकसाल को लागू नहीं होगी ।
4. धारा 3 के उल्लंघन के लिए शास्ति-जो कोई धारा 3 की उपधारा (1) के किसी उपबंध का उल्लंघन उचित प्रतिहेतु के बिना (जिस प्रतिहेतु को साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होगा) करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम या पांच वर्ष से अधिक नहीं होगी, दण्डनीय होगा ।
5. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध कंपनी द्वारा किया गया हो वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह साबित कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने अपराध किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया हो तथा यह साबित हो कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है या उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म, सोसाइटी या व्यष्टियों का अन्य संगम भी
है; तथा
(ख) निदेशक" से-
(i) फर्म के सम्बन्ध में उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है;
(ii) किसी सोसाइटी या व्यष्टियों के अन्य संगम के संबंध में ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे सोसाइटी या अन्य संगम के नियमों के अधीन, यथास्थिति, उस सोसाइटी या अन्य संगम के कार्यकलाप का प्रबंध सौंपा गया है ।
6. अपराधों का संज्ञेय, जमानतीय और अशमनीय होना-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध संज्ञेय और जमानतीय होंगे, किन्तु शमनीय नहीं होंगे ।
7. अपराधों का विचारण संक्षिप्ततः किया जा सकेगा-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 260 में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के विरुद्ध अपराधों का विचारण प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षिप्ततः किया जा सकेगा ।
8. समपहरण-जिस छोटे सिक्के या धातु के संबंध में इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध किया गया हो वह सरकार को समपहृत हो जाएगा ।
9. 1958 के अधिनियम सं० 20 के उपबन्धों का इस अधिनियम के अधीन अपराधों को लागू न होना-अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की कोई बात इस अधिनियम के विरुद्ध किसी अपराध को लागू नहीं होगी ।
10. निरसन-छोटे सिक्के (अपराध) अध्यादेश, 1971 (1971 का 15) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है ।
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