स्वेच्छया वेतन अभ्यर्पण (करों से छूट) अधिनियम, 1961
(1961 का अधिनियम संख्यांक 46)
[6 दिसम्बर, 1961]
किसी व्यक्ति को संदेय वेतन या भत्तों के उस भाग
को, जिसे उसने लोकहित में स्वेच्छया
छोड़ दिया है, आय पर करों से
छूट देने का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बारहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम-अधिनियम का संक्षिप्त नाम स्वेच्छया वेतन अभ्यर्पण (करों से छूट) अधिनियम, 1961 है ।
2. सरकार के पक्ष में अभ्यर्पित वेतनों के बारे में आय पर करों से छूट-भारतीय आय-कर अधिनियम, 1922 (1922 का 11) में या आय पर कर लगाने से सम्बन्धित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी किसी व्यक्ति द्वारा कोई आय-कर या अधिकर-
(क) उस दशा में जिसमें उसका वेतन भारत की संचित निधि या किसी राज्य की संचित निधि में से दिया जाता है, 1961 के मार्च के इकतीसवें दिन के पश्चात् किसी अवधि के लिए उसे देय वेतन के उस भाग के बारे में संदेय नहीं होगा जिसे उसने एक लिखित घोषणा द्वारा स्वेच्छया लोकहित में छोड़ दिया है;
(ख) किसी अन्य दशा में 1961 के मार्च के इकतीसवें दिन के पश्चात् किसी अवधि के लिए उसे देय वेतन के उस भाग के बारे में संदेय नहीं होगा जिसका लोकहित में केन्द्रीय सरकार के पक्ष में अभ्यर्पण और उसको संदाय, उस सरकार द्वारा उस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार कर दिया गया है,
और वेतन का ऐसा भाग, आय पर कर लगाने से संबंधित किसी विधि के प्रयोजनों के लिए उसकी कुल आय में सम्मिलित नहीं किया जाएगा ।
3. धारा 2 के उपबंधों का भत्तों को लागू होना-धारा 2 के उपबन्ध, उसमें निर्दिष्ट प्रकार के किसी व्यक्ति को 1961 के मार्च के इकतीसवें दिन के पश्चात् किसी अवधि के लिए उसे देय किन्हीं भत्तों के बारे में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उसके वेतन के बारे में लागू होते हैं ।
4. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकती है ।
[(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि केलिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
5. निरसन-(1) स्वेच्छया वेतन अभ्यर्पण (करों से छूट) अधिनियम, 1950 (1950 का 61) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि उक्त अधिनियम के अधीन की गई कोई घोषणा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए की गई घोषणा समझी जाएगी ।
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