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राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान अधिनियम, 2012 ( Rajiv Gandhi National Institute of Youth Development Act, 2012 )


 

राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान अधिनियम, 2012

(2012 का अधिनियम संख्यांक 35)

[30 अगस्त, 2012]

राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान के नाम से ज्ञात

संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने और

उसके निगमन तथा उससे सम्बन्धित या

उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                              भारत गणराज्य के तिरसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान अधिनियम, 2012 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।

2. राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान को राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में घोषित किया जाना-राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान के नाम से ज्ञात संस्था के उद्देश्य ऐसे हैं, जो उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था बनाते हैं, अतः यह घोषित किया जाता है कि राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) विद्या परिषद्" से संस्थान की विद्या परिषद् अभिप्रेत है;

(ख) नियत दिन" से इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के लिए धारा 1 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख अभिप्रेत है;

(ग) अध्यक्ष" से धारा 12 की उपधारा (2) के खंड (क) में निर्दिष्ट कार्य परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(घ) निदेशक" से धारा 21 के खंड (क) में निर्दिष्ट संस्थान का निदेशक अभिप्रेत है;

(ङ) कार्य परिषद्" से धारा 12 के अधीन स्थापित संस्थान की कार्य परिषद् अभिप्रेत है;

(च) विद्यमान संस्थान" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के उपबन्धों के अधीन स्थापित और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 3 के अधीन समझे गए विश्वविद्यालय के रूप में घोषित राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान, श्री पेरुमबुदुर, जो इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व विद्यमान है, अभिप्रेत है;

(छ) निधि" से धारा 26 के अधीन रखी जाने वाली संस्थान की निधि अभिप्रेत है;

(ज) संस्थान" से धारा 4 के अधीन निगमित राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान अभिप्रेत है;

(झ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ञ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ट) कुलसचिव" से धारा 23 में निर्दिष्ट संस्थान का कुलसचिव अभिप्रेत है;

(ठ) परिनियमों" और अध्यादेशों" से इस अधिनियम के अधीन संस्थान के परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।

 

अध्याय 2

राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान

4. संस्थान का निगमन-(1) राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान एक निगमित निकाय होगा, जिसका शाश्वत् उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।

(2) कार्य परिषद् और विद्या परिषद् के पहले अध्यक्ष, पहले निदेशक और पहले सदस्यों तथा ऐसे सभी व्यक्तियों से, जो इसके पश्चात् ऐसे अधिकारी या सदस्य बने, उनके द्वारा ऐसा पद या सदस्यता धारण करते रहने तक, संस्थान का गठन होगा ।

(3) संस्थान का मुख्यालय तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम् जिले में होगा ।

(4) संस्थान भारत में ऐसे अन्य स्थानों पर जो वह ठीक समझे, केन्द्रों को स्थापित कर सकेगा और चला सकेगा ।

5. संस्थान की स्थापना का प्रभाव-नियत दिन से ही और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, -

(क) किसी संविदा या अन्य लिखत में विद्यमान संस्थान के प्रति किसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह संस्थान के प्रतिनिर्देश है;

(ख) विद्यमान संस्थान की सभी जंगम और स्थावर संपत्ति या वस्तुएं संस्थान में निहित होंगी;

(ग) विद्यमान संस्थान के सभी अधिकार और दायित्व संस्थान को अंतरित हो जाएंगे और संस्थान के अधिकार और दायित्व होंगे;

(घ) नियत दिन से ठीक पूर्व विद्यमान संस्थान द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति संस्थान में अपना पद या सेवा, उसी अवधि तक, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य मामलों के सम्बन्ध में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों सहित उसी प्रकार धारण करेगा जैसा वह तब धारण करता यदि यह अधिनियम पारित न हुआ होता और ऐसा तब तक धारण करता रहेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक ऐसी सेवाधृति, पारिश्रमिक और निबंधन और शर्तें, परिनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :

परंतु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसका नियोजन संस्थान द्वारा उस कर्मचारी के साथ की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार, या यदि इस निमित्त, उसमें कोई उपबंध नहीं किया गया है तो संस्थान द्वारा उसके स्थायी कर्मचारियों की दशा में, तीन मास के पारिश्रमिक और अन्य कर्मचारियों की दशा में, एक मास के पारिश्रमिक के समतुल्य प्रतिकर के संदाय पर उनका नियोजन समाप्त किया जा सकेगा । 

6. संस्थान के उद्देश्य-संस्थान के उद्देश्य निम्नलिखित होंगे: -

(क) (i) नीति बनाने के लिए कार्योन्मुख अनुसंधान संबंधी तथ्यों का उपबंध करके;

(ii) विस्तार और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से नीति का कार्यान्वयन करके;

(iii) निर्धारण और प्रभावकारी अध्ययन का संवर्धन करके और शिक्षण, प्रशिक्षण और अन्य शैक्षिक कार्यक्रमों का संचालन करके; भविष्य के लिए युवाओं को तैयार करने और सशक्त बनाने के लिए युवा विकास के प्रति एकीकृत दृष्टिकोण विकसित और सिद्ध करना;

(ख) युवाओं से संबधित सभी मुद्दों और विषयों पर समग्र और वैज्ञानिक रूप से विश्लेषण किए गए डाटा उपलब्ध कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार समुन्नत राष्ट्रीय युवा संसाधन केन्द्र की स्थापना करना, जिसमें पर्याप्त पुस्तकालय सुविधा, प्रलेखीकरण और प्रकाशन की सुविधा हों;

(ग) विस्तार और अतिप्रसार कार्यक्रमों के माध्यम से अनुसंधान और विकास उपलब्ध कराना और ज्ञान का प्रसारण करना;

(घ) पणधारियों, जिनके अंतर्गत युवा निकाय, संगठन और युवाओं से संबंधित अभिकरण भी हैं, की क्षमता के निर्माण के लिए नोडल अभिकरण के रूप में कार्य करना;

(ङ) युवाओं को समावेशी विकास और राष्ट्रीय निर्माण में भाग लेने के लिए सशक्त करना;

(च) युवा क्षेत्र में उच्च अध्ययन के एक संस्थान के रूप में विकसित करना और ऐसी व्यावसायिक उत्कृष्टता का विकास करना जो तत्प्रयोजनार्थ अपेक्षित हो;

(छ) स्नातकोत्तर स्तर पर नियोजनोन्मुख और अंतर-शिक्षण पाठ्यक्रमों के माध्यम से युवा विकास के क्षेत्र में उच्चतर शिक्षा उपलब्ध कराना ।

7. संस्थान के कृत्य-(1) धारा 6 में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, संस्थान, -

(क) युवा कार्यक्रमों और समकालीन और भावी महत्व के मुद्दों पर नीति अनुसंधान, मूल्यांकन और प्रभाव विश्लेषण करके एक चिंतन प्रणाली" विकसित करेगा;

(ख) युवाओं से संबंधित आंकड़ों के सम्बन्ध में ज्ञान के भंडार के रूप में कार्य करेगा;

(ग) युवा प्रशिक्षण और विस्तार के लिए प्रलेखीकरण, सूचना और प्रकाशन सेवाएं विकसित करेगा;

(घ) युवा सम्बन्धी नीति की विरचना और युवा कार्यक्रम के संवर्धन के लिए तकनीकी सलाह और परामर्श देगा;

(ङ) सरकारी और स्वैच्िछक दोनों सेक्टर में युवा संगठनों की वृत्तिक क्षमता का निर्माण करेगा;

(च) समुचित प्रशिक्षण और अभिविन्यास कार्यक्रमों का डिजाइन तैयार करेगा, उन्हें विकसित और संचालित   करेगा;

(छ) युवा सम्बन्धी मुद्दों पर सेमिनार, कार्यशालाएं और सम्मेलन आयोजित करेगा;

(ज) शैक्षणिक और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए केंद्र स्थापित करेगा;

(झ) युवा प्रशिक्षण और युवा विकास से संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों, केंद्रों, संस्थाओं और ऐसे ही अन्य अभिकरणों के साथ सहयोग करेगा;

(ञ) अध्ययन और अनुसंधान कार्यक्रम स्थापित करेगा और ऐसी अध्ययन शाखाओं में जो संस्थान उचित समझे शिक्षण उपलब्ध करवाएगा;

(ट) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो संस्थान अवधारित करे, विभिन्न शैक्षिक स्तरों पर डिग्री, डिप्लोमा, प्रमाणपत्र या अन्य शैक्षणिक विशिष्टियां या खिताब देगा;

(ठ) सम्मानिक उपाधियां या अन्य विशिष्ट उपाधियां प्रदान करेगा और अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, पुरस्कार और पदक प्रदान करेगा;

(ड) अपने पाठ्यक्रमों, कार्यक्रमों और अन्य विषयों के लिए फीस तथा अन्य प्रभार अवधारित करेगा, मांग करेगा और प्राप्त करेगा;

(ढ) भारत सरकार और अन्य विकासात्मक अभिकरणों द्वारा प्रायोजित युवाओं से संबंधित परियोजनाएं और अध्ययन संचालित करेगा और उनका समन्वय करेगा;

(ण) संस्थान के नियमों और विनियमों के अनुसार, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, शैक्षणिक, तकनीकी, प्रशासनिक, प्रबंधकीय और अन्य पदों को सृजित करेगा और उन पर नियुक्तियां करेगा;

(त) संस्थान के क्रियाकलापों के संचालन को विनियमित करेगा;

(थ) संस्थान के सभी प्रवर्गों के कर्मचारियों और छात्रों के अनुशासन का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करेगा;

(द) जंगम या स्थावर संपत्ति क्रय करेगा, भाड़े पर लेगा, पट्टे पर लेगा, आदान-प्रदान करेगा या अन्यथा अर्जित करेगा और किसी भवन या भवनों का सन्निर्माण, परिवर्तन और रखरखाव करेगा, जो आवश्यक हैं;

(ध) महत्वाकांक्षी युवा वृत्तिकों को, युवा विकास के क्षेत्र में कैरियर आरम्भ करने हेतु समर्थ बनाने के लिए पहुंच प्रदान करने के लिए मुक्त विश्वविद्यालयों के सहयोग से सुदूर शिक्षण या शिक्षण केन्द्र स्थपित करेगा;

(न) छात्रों के लिए आवास और छात्रावास हॉल स्थापित करेगा, उनका अनुरक्षण और प्रबंध करेगा;

(प) शिक्षकों और कर्मचारियों के अन्य प्रवर्गों के लिए आचार संहिता सहित सेवा शर्तें अधिकथित करेगा;

(फ) संस्थान के छात्रों के अनुशासन का पर्यवेक्षण, नियंत्रण और विनियमन तथा उनके स्वास्थ्य और सामान्य कल्याण के संवर्धन का प्रबंध करेगा;

(ब) विख्यात अंतरराष्ट्रीय युवा विकास संस्थानों के साथ आदान-प्रदान कार्यक्रमों का समन्वय करेगा;

(भ) ऐसे अन्य सभी कार्यकलापों का जिम्मा लेगा, सहायता करेगा और उनका संवर्धन करेगा जो उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सहायक या आनुषंगिक हैं ।

(2) संस्थान सरकार से दान, अनुदान, संदान या उपकृतियां और, यथास्िथति, वसीयतकर्ताओं, दाताओं या अंतरितियों से जंगम या स्थावर संपत्तियों को वसीयत, संदान और अन्तरण द्वारा प्राप्त कर सकेगा ।

(3) संस्थान, युवा कार्यक्षेत्र की परिधि का विस्तार करने के लिए और ज्ञान के विकास और सहभागी शिक्षण को सुकर बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संस्थानों और विश्वविद्यालयों के साथ करार कर सकेगा ।

8. संस्थान का सभी मूलवंशों, पंथों, लिंगों और वर्गों के लिए खुला होना-(1) संस्थान सभी स्ित्रयों और पुरुषों के लिए खुला होगा चाहे वे किसी भी मूलवंश, पंथ, जाति या वर्ग, शारीरिक योग्यता के हों और छात्रों को प्रवेश देने, शिक्षकों या कर्मचारियों को नियुक्त करने में या किसी भी अन्य बात के संबंध में धार्मिक विश्वास या मान्यता से संबंधित कोई मानदंड या शर्त अधिरोपित नहीं की जाएगी ।

(2) संस्थान द्वारा किसी संपत्ति की वसीयत, संदान या अंतरण को स्वीकार नहीं किया जाएगा जिसमें कार्य परिषद् की राय में इस धारा के भाव और उद्देश्य के प्रतिकूल शर्तें या बाध्यताएं अंतर्वलित हों ।

9. संस्थान में शिक्षा-संस्थान में सभी शिक्षण और अन्य शैक्षणिक क्रियाकलाप, संस्थान द्वारा या उसके नाम से इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार, किए जाएंगे ।

10. कुलाध्यक्ष-(1) भारत का राष्ट्रपति संस्थान का कुलाध्यक्ष होगा:

परंतु, राष्ट्रपति, किसी व्यक्ति को आदेश द्वारा कुलाध्यक्ष नामनिर्दिष्ट कर सकेगा और इस प्रकार नामनिर्दिष्ट ऐसा व्यक्ति, पांच वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, पद धारण करेगा और ऐसा नामनिर्दिष्ट व्यक्ति कुलाध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करेगा ।

(2) कुलाध्यक्ष, समय-समय पर, संस्थान के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने और उसके कार्यकलापों की जांच करने के लिए और उन पर ऐसी रीति से रिपोर्ट देने के लिए जैसा कुलाध्यक्ष निदेश दे, एक या अधिक व्यक्तियों की नियुक्ति कर सकेगा ।

(3) किसी ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, कुलाध्यक्ष ऐसी कार्रवाई कर सकेगा और ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जो वह रिपोर्ट में वर्णित किन्हीं विषयों के संबंध में आवश्यक समझे और संस्थान, युक्तियुक्त समय के भीतर ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए बाध्य होगा ।

अध्याय 3

संस्थान के प्राधिकारी

11. संस्थान के प्राधिकारी-संस्थान, निम्नलिखित प्राधिकारियों से मिलकर बनेगा, अर्थात्ः-

(क) कार्य परिषद् ;

(ख) विद्या परिषद् ; और

(ग) ऐसे अन्य प्राधिकारी जिन्हें परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकारी घोषित किया जाए ।

12. कार्य परिषद् की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से जो केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए कार्य परिषद् नामक एक केंद्रीय निकाय स्थापित किया जाएगा ।

(2) कार्य परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-

(क) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित शैक्षणिक ख्याति का एक विख्यात व्यक्ति-अध्यक्ष ;

(ख) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित युवा विकास के क्षेत्र का एक विख्यात व्यक्ति-उपाध्यक्ष ;

(ग) युवा कार्य और खेल मंत्रालय के युवा कार्य विभाग का सचिव-पदेन सदस्य;

(घ) युवा कार्य और खेल मंत्रालय के युवा कार्य विभाग का संयुक्त सचिव-पदेन सदस्य;

(ङ) राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान का निदेशक-पदेन सदस्य; 

(च) राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान का प्राचार्य चक्रानुक्रम से-सदस्य;

(छ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित एक विख्यात खेल व्यक्तित्व वाला व्यक्ति-सदस्य ;

(ज) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किसी शैक्षणिक संस्था का एक प्रधान-सदस्य;

(झ) केन्द्रीय सरकार द्वारा भारतीय वाणिज्य और उद्योग चेम्बर परिसंघ और भारतीय उद्योग परिसंघ से केन्द्रीय   सरकार द्वारा नामनिर्देशित उद्योग जगत का एक प्रतिनिधि-सदस्य ;

(ञ) राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान का कुलसचिव-सदस्य-सचिव ।

(3) उपधारा (2) के अधीन कार्य परिषद् के सदस्यों को नामनिर्देशित करते समय स्त्रियों, देश के भिन्न-भिन्न प्रदेशों, समुदाय के कमजोर वर्गों और भिन्न-भिन्न सुयोग्य व्यक्तियों को सम्यक् प्रतिनिधित्व दिया जाएगा ।

13. कार्य परिषद् के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियां और उन्हें संदेय भत्ते-(1) कार्य परिषद् के प्रत्येक सदस्य की पदावधि उसके नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि होगी :    

परंतु किसी पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को धारण किए रहता है जिसके आधार पर वह सदस्य है ।

(2) किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट किसी भी सदस्य की पदावधि उस सदस्य की पदावधि के शेष भाग तक होगी जिसके स्थान पर उसे नामनिर्दिष्ट किया गया है ।

(3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, कोई पदावरोही सदस्य, केंद्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निदेश न दिए जाने की दशा में तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक कोई अन्य व्यक्ति उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता है या एक वर्ष की अवधि समाप्त नहीं हो जाती है, इनमें से जो पूर्वतर हो । 

(4) पदेन सदस्यों से भिन्न कार्य परिषद् के सदस्यों को यात्रा और अन्य ऐसे भत्ते संदत्त किए जाएंगे जो विहित किए जाएं ।

14. कार्य परिषद् के अधिवेशन-(1) अध्यक्ष, सामान्यतया कार्य परिषद् के अधिवेशनों की और संस्थान के दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करेगा:

परंतु उसकी अनुपस्थिति में कार्य परिषद् का उपाध्यक्ष, कार्य परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा । 

(2) अध्यक्ष का यह कर्तव्य होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि कार्य परिषद् द्वारा किए गए विनिश्चयों का क्रियान्वयन हो रहा है ।

(3) अध्यक्ष, ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम द्वारा उसे सौंपे गए हैं ।

(4) कार्य परिषद् का अधिवेशन वर्ष में कम-से-कम चार बार होगा और उसके अधिवेशनों (जिनके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों की गणपूर्ति भी है) में ऐसी प्रक्रिया अपनाई जाएगी, जो विहित की जाए ।

15. कार्य परिषद् की शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए कार्य परिषद् संस्थान के कार्यकलापों के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगी और वह संस्थान की ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगी जिनका इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अन्यथा उपबंध नहीं किया गया है और उसे विद्या परिषद् तथा वित्त समिति के कार्यों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी । 

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कार्य परिषद् -

(क) संस्थान के प्रशासन और कार्यक्रम से संबंधित नीति के प्रश्नों का विनिश्चय करेगी;

(ख) पाठ्यक्रमों की अवधि और संस्थान द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों और अन्य उपाधियों की नामपद्धति से संबंधित नीति अधिकथित करेगी;

(ग) पाठ्यक्रम संस्थित करेगी और संस्थान द्वारा प्रारम्भ किए गए पाठ्यक्रमों की बाबत प्रवीणता और अन्य विद्या सम्बन्धी विशिष्ट उपाधियों के मानक अधिकथित करेगी;

(घ) केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से संस्थान के अध्यापन और अनुसंधान संकाय तथा अन्य कर्मचारियों का काडर ढांचा, अर्हता, भर्ती का ढंग और सेवा की शर्तों से संबंधित नीति अधिकथित करेगी;

(ङ) संस्थान का संसाधन जुटाने और उनके उपयोग के लिए नीतियां अधिकथित करने के लिए मार्गदर्शन करेगी;

(च) संस्थान का संपत्ति की प्रतिभूति से या उसके बिना संस्थान के प्रयोजनों के लिए ऋण लेने के प्रस्तावों पर विचार करेगी और उनको अनुमोदित करेगी;

(छ) परिनियम बनाएगी और उनका परिवर्तन, उपांतरण और विखंडन करेगी;

(ज) अगले वित्तीय वर्ष के लिए संस्थान की विकास योजना के विवरण के साथ उसकी वार्षिक रिपोर्ट, वार्षिक लेखा-जोखा और बजट प्राक्कलन पर विचार करेगी और ऐसे संकल्प पारित करेगी, जो वह ठीक समझे; और 

(झ) ऐसी सभी बातें करेगी जो खंड (क) से खंड (ज) के अधीन विनिर्दिष्ट रूप से नहीं आती हैं और जो इस धारा के अधीन सभी या किन्हीं शक्तियों की प्राप्ति के लिए आवश्यक, आनुंषगिक या सहायक हों ।

(3) कार्य परिषद् को ऐसी समितियों को नियुक्त करने की शक्ति होगी जो वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।

(4) कार्य परिषद्, इस प्रभाव के विनिर्दिष्ट संकल्प द्वारा, ऐसी कार्रवाई के पुनर्विलोकन के अधिकार को आरक्षित रखने के अधीन जो ऐसी प्रत्यायोजित प्राधिकारी के अधीन की जा सकेंगी, संस्थान के अध्यक्ष, निदेशक, किसी अधिकारी या किसी प्राधिकारी को अपनी किन्हीं शक्तियों या कर्तव्यों को प्रत्यायोजित कर सकेगी ।

16. विद्या परिषद्-(1) विद्या परिषद्, संस्थान का प्रधान शैक्षणिक निकाय होगी और इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए संस्थान की शैक्षणिक नीतियों का समन्वय करेगी और उस पर साधारण पर्यवेक्षण रखेगी ।

(2) विद्या परिषद् निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्ः-

(क) निदेशक-अध्यक्ष पदेन;

(ख) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित राष्ट्रीय महत्व के शैक्षणिक संस्थान का एक प्रमुख;

(ग) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित किसी भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान या भारतीय प्रबंध संस्थान का एक निदेशक;

(घ) भारत के योजना आयोग में युवा मामलों का प्रभारी सदस्य-पदेन;

(ङ) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित युवा कार्यक्षेत्र में भारत में कार्य कर रहे किसी अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन से एक व्यक्ति;

(च) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित गैर-सरकारी औद्यागिक सेक्टर से दो प्रतिनिधि;

(छ) चक्रानुक्रम आधार पर संस्थान से एक प्राचार्य;

(ज) निदेशक, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी, पदेन;

(झ) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित युवा और कुमार विकास के क्षेत्र में कार्य कर रहे गैर-सरकारी संगठनों से दो व्यक्ति जिनमें से एक व्यक्ति पूर्वोत्तर क्षेत्र से होगा;

(ञ) संस्थान के दो छात्र, जिनमें से एक स्त्री होगी;

(ट) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित समाज विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, कृषि विज्ञान, कौशल विकास, प्रबंध और विधि के क्षेत्रों से तीन विख्यात शिक्षाविद्;

(ठ) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित अंतरराष्ट्रीय विकास संगठन से एक स्त्री प्रतिनिधि;

(ड) संघ के युवा कार्य और खेल मंत्रालय में संस्थान के कार्यों से संबंधित भारत सरकार के संयुक्त सचिव से अन्यून पंक्ति का कोई अधिकारी, पदेन । 

(3) विद्या परिषद् के सदस्यों की पदावधि और उनकी शक्तियां वे होंगी जो परिनियमों द्वारा उपबन्धित की जाएं ।

(4) विद्या परिषद् के सदस्यों को नामनिर्दिष्ट करते समय देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों, समाज के कमजोर वर्गों और भिन्न रूप में समर्थ व्यक्तियों में से स्ित्रयों को (कम से कम चार स्ित्रयों को सम्मिलित करते हुए) सम्यक् प्रतिनिधित्व दिया जाएगा ।

17. विद्या परिषद् के कृत्य-इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विद्या परिषद् संस्थान में शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा के स्तरमानों पर नियंत्रण और उनका साधारण विनियमन करेगी और अध्यादेशों के बनाए जाने तथा उनको बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगी और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करेगी जो परिनियमों द्वारा उसे प्रदत्त या अधिरोपित किए जाएं । 

18. वित्त समिति-(1) संस्थान की वित्त समिति होगी जो संस्थान का मुख्य वित्तीय निकाय होगी ।

(2) वित्त समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्ः-

(क) निदेशक-वित्त समिति का पीठासीन अधिकारी;

(ख) संघ के युवा कार्य और खेल मंत्रालय में संयुक्त सचिव तथा वित्तीय सलाहकार;

(ग) संस्थान का कुलसचिव;

(घ) अध्यक्ष द्वारा चक्रानुक्रम आधार पर नामनिर्देशित संस्थान का एक आचार्य;

(ङ) अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित कार्य परिषद् का एक सदस्य;

(च) संस्थान के कार्यों से संबंधित युवा कार्य और खेल मंत्रालय का संयुक्त सचिव;

(छ) संस्थान का वित्त अधिकारी-सदस्य-सचिव ।

(3) वित्त समिति के सदस्यों की पदावधि और उनकी शक्तियां वे होंगी जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं ।

(4) वित्त समिति के सदस्यों का नामनिर्देशन करते समय स्ित्रयों, देश के विभिन्न क्षेत्रों, समुदाय के कमजोर वर्गों और भिन्न रूप से समर्थ व्यक्तियों में से सम्यक् प्रतिनिधित्व दिया जाएगा ।

19. वित्त समिति के कृत्य-वित्त समिति निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगी, अर्थात्ः-

(क) संस्थान के लेखा और बजट प्राक्कलन की संवीक्षा करना और कार्य परिषद् को सिफारिश करना;

(ख) क्रय के मुख्य कार्यों के नए लेखा व्यय की प्रस्तावों की संवीक्षा करना;

(ग) पुनर्विनियोग विवरणों और संपरीक्षा टिप्पणों की संवीक्षा करना और उस पर कार्य परिषद् को सिफारिश करना;

(घ) समय-समय पर संस्थान के वित्त का पुनर्विलोकन करना और जब कभी आवश्यक हो समवर्ती संपरीक्षा संचालित करना; और

(ङ) संस्थान के क्रियाकलापों को प्रभावित करने वाले किन्हीं वित्तीय प्रश्नों पर सलाह देना और कार्य परिषद् को सिफारिशें करना ।

20. अन्य प्राधिकारी-अन्य प्राधिकारियों का, जो परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकारियों के रूप में घोषित किए जाएं, गठन, उनकी शक्तियां और कृत्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।

अध्याय 4

संस्थान के अधिकारी

21. संस्थान के अधिकारी-संस्थान निम्नलिखित अधिकारियों से मिलकर बनेगा, अर्थात्: -

(क) निदेशक;

(ख) कुलसचिव; और

(ग) ऐसे अन्य अधिकारी, जो परिनियमों द्वारा संस्थान के अधिकारी के रूप में घोषित किए जाएं ।

22. निदेशक-(1) संस्थान का निदेशक, तीन वर्ष की अवधि के लिए कुलाध्यक्ष द्वारा, उपधारा (2) और उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट रीति से और ऐसे निबंधनों और सेवा शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं:

परंतु प्रथम निदेशक केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो वह ठीक समझे नियत दिन से छह मास से अनधिक की अवधि के लिए नियुक्त किया जाएगा ।

(2) कुलाध्यक्ष द्वारा, निदेशक की नियुक्ति, उस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित तलाशी समिति द्वारा की गई सिफारिश के अनुसार उत्कृष्ट शैक्षणिक अर्हता वाले तीन व्यक्तियों के पैनल से की जाएगी ।

(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट तलाशी समिति तीन सदस्यों से मिलकर बनेगी, जिसमें से प्रत्येक सदस्य का नामनिर्देशन कार्य परिषद्, केन्द्रीय सरकार और कुलाध्यक्ष द्वारा किया जाएगा ।

(4) निदेशक, संस्थान का प्रधान शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा और संस्थान के उचित प्रशासन और शैक्षणिक कार्य के लिए तथा शिक्षा प्रदान करने और उसमें अनुशासन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा ।

(5) निदेशक, संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट और संपरीक्षित लेखे, कार्य परिषद् को और केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा तथा केन्द्रीय सरकार तत्पश्चात् उसे संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

(6) निदेशक ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा सौंपे जाएं ।

23. कुलसचिव-(1) संस्थान का कुलसचिव ऐसी रीति से और ऐसे निबंधनों तथा शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं और वह संस्थान के अभिलेख, उसकी सामान्य मुद्रा, निधि और ऐसी अन्य संपत्ति का अभिरक्षक होगा जो कार्य परिषद् उसके भारसाधन में सौंपे ।

(2) कुलसचिव, कार्य परिषद्, विद्या परिषद् और ऐसी समितियों के, जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं, सदस्य-सचिव के रूप में कार्य करेगा ।   

(3) कुलसचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।

(4) कुलसचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम, परिनियमों या निदेशक द्वारा सौंपे जाएं ।

24. अन्य अधिकारी-संस्थान के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति, परिलब्धियां, शक्तियां और कर्तव्य वे होंगे जो परिनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।

अध्याय 5

वित्त, लेखा और संपरीक्षा

25. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात् संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि का और ऐसी रीति से जो वह ठीक समझे इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए उपयोग किए जाने हेतु संदाय करेगी ।

26. संस्थान की निधि-(1) संस्थान एक निधि रखेगा जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे -

(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दी गई सभी धनराशियां;

(ख) संस्थान द्वारा उद्गृहीत और संगृहीत सभी फीसें तथा अन्य प्रभार;

(ग) अनुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत अथवा अंतरणों के रूप में संस्थान द्वारा प्राप्त सभी धन; और 

(घ) किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से संस्थान को प्राप्त सभी धन ।

(2) निधि में जमा की गई सभी धनराशियां ऐसे बैंकों में जमा की जाएंगी या ऐसी रीति से उनका विनिधान किया जाएगा जैसा कार्य परिषद् द्वारा विनिश्िचत किया जाए ।

(3) निधि का उपयोग संस्थान के व्ययों की, जिनके अंतर्गत इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग में और कृत्यों के निर्वहन में उपगत व्यय भी हैं, पूर्ति के लिए किया जाएगा ।

27. विन्यास या अन्य निधि-संस्थान, धारा 26 में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, -

(क) लोक लेखा में अनुरक्षित की जाने वाली एक सौ करोड़ रुपए की रकम की एक विन्यास निधि और विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए किसी अन्य निधि का गठन कर सकेगा; और

(ख) अपनी निधि में से कोई धन विन्यास निधि या किसी अन्य निधि में अंतरण कर सकेगा ।

28. लेखा और संपरीक्षा-(1) संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलनपत्र भी है, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विहित करे ।

(2) संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा उपगत कोई व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षा को संदेय होगा ।

(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के और संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के, ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियां, लेखा संबंधी वाउचर तथा अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्र पेश किए जाने की मांग करने और संस्थान के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित संस्थान के लेखे, उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और केन्द्रीय सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

29. पेंशन और भविष्य निधि-(1) संस्थान अपने कर्मचारियों के, जिनके अंतर्गत निदेशक भी है, फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं, ऐसी पेंशन, बीमा और भविष्य निधि स्थापित करेगा जो वह ठीक समझे ।

(2) जहां कोई ऐसी भविष्य निधि इस प्रकार स्थापित की गई है वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि हो ।

30. संस्थान के कर्मचारिवृंद की नियुक्ति-संस्थान के कर्मचारिवृंद की सभी नियुक्तियां, निदेशक की नियुक्ति को छोड़कर, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और परिनियमों द्वारा अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार निम्नलिखित द्वारा की जाएंगी, -  

(क) यदि नियुक्ति सहायक आचार्य या उससे ऊपर के पद पर शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के बारे में की जाती है या यदि नियुक्ति गैर-शैक्षणिक कर्मचारिवृंद में किसी काडर में की जाती है जिसका अधिकतम वेतनमान सहायक आचार्य के वेतनमान के समान या उससे उच्चतर है तो कार्य परिषद् द्वारा; और

(ख) किसी अन्य दशा में निदेशक द्वारा ।

31. परिनियम बनाने की शक्ति-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए परिनियम, निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) शिक्षण विभागों और अन्य शैक्षणिक इकाइयों का बनाया जाना;

(ख) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;

(ग) संस्थान के अधिकारियों के, जिनके अंतर्गत अध्यक्ष, निदेशक, कुलसचिव और अन्य अधिकारी भी हैं जो परिनियमों द्वारा संस्थान के अधिकारी के रूप में घोषित किए जाएं, पदों का वर्गीकरण, पदावधि, नियुक्ति की पद्धति, शक्तियां और कर्तव्य तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(घ) धारा 11 के खंड (ग) में निर्दिष्ट संस्थान के प्राधिकारियों का गठन, शक्तियां और कर्तव्य;

(ङ) संस्थान के प्राधिकारियों या अधिकारियों में निहित शक्तियों का प्रत्यायोजन;

(च) आचार संहिता, अवचार के लिए उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई जिसके अंतर्गत अवचार के कारण कर्मचारियों को सेवा से हटाया जाना भी है और संस्थान के अधिकारी या प्राधिकारी की कार्रवाई के विरुद्ध अपील की प्रक्रिया;

(छ) सम्मानिक डिग्रियां प्रदान करना;

(ज) हालों, निवासों और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;

(झ) कार्य परिषद् के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन;

(ञ) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के अधीन परिनियमों द्वारा उपबंधित किया जाना है या किया जाए ।

32. परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) संस्थान के प्रथम परिनियम कुलाध्यक्ष के अनुमोदन से केन्द्रीय सरकार द्वारा विरचित किए जाएंगे और उनकी एक प्रति बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कार्य परिषद् समय-समय पर नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगी या इस धारा में इसके पश्चात् उपबंधित रीति से परिनियमों को संशोधित या निरसित कर सकेगी ।

(3) नए परिनियम के लिए या परिनियमों में परिवर्धन या परिनियम के किसी संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष का पूर्व अनुमोदन अपेक्षित होगा जो उसके लिए सहमति दे सकेगा या सहमति रोक सकेगा या उसे विचार के लिए कार्य परिषद् को भेज   सकेगा ।

(4) नए परिनियम या विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष उसके लिए सहमति नहीं दे देता है ।

33. अध्यादेश बनाने की शक्ति-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संस्थान के अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किए जा सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) संस्थान में छात्रों का प्रवेश;

(ख) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य प्रवर्ग के व्यक्तियों के लिए संस्थान के विभिन्न पाठ्यक्रमों या कार्यक्रमों में प्रवेश का आरक्षण;

(ग) संस्थान द्वारा दी जाने वाली सभी डिग्रियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;

(घ) वे शर्तें जिनके अधीन छात्रों को डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम में और संस्थान की परीक्षा में प्रवेश दिया जाएगा और उनको प्रदान किए जाने के लिए पात्रता की शर्तें;

(ङ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायता वृत्तियां, पदक और पुरस्कार प्रदान किए जाने की शर्तें;

(च) परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग तथा उनके कर्तव्य;

(छ) परीक्षाओं का संचालन;

(ज) संस्थान के छात्रों में अनुशासन बनाए रखना;

(झ) संस्थान में अध्ययन पाठ्यक्रमों के लिए और संस्थान की डिग्रियों की परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें;

(ञ) संस्थान के छात्रों के निवास की शर्तें और हालों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीसों और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण किया जाना; और

(ट) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन अध्यादेशों द्वारा उपबंधित किया जाना है या किया जाए

34. अध्यादेश किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, अध्यादेश विद्या परिषद् द्वारा बनाए जाएंगे ।

(2) विद्या परिषद् द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश ऐसी तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निर्दिष्ट करे परंतु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश कार्य परिषद् को यथाशक्यशीघ्र प्रस्तुत किया जाएगा और कार्य परिषद् द्वारा अपने आगामी अधिवेशन में उस पर विचार किया जाएगा ।

(3) कार्य परिषद् को ऐसे किसी अध्यादेश को संकल्प द्वारा उपांतरित या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसे संकल्प की तारीख से ऐसा अध्यादेश, यथास्िथति, तदनुसार उपांतरित या रद्द हो जाएगा ।

35. संस्थान के प्राधिकारियों द्वारा कारबार का संचालन-संस्थान के प्राधिकारी अपने स्वयं के और उनके द्वारा नियुक्त ऐसी समितियों के, यदि कोई हों, जिनके लिए इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उपबंध नहीं किया गया है, कारबार का संचालन करने के लिए इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के संगत, प्रक्रिया के अपने स्वयं के नियम बना सकेंगे ।

36. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) संस्थान और उसके किन्हीं कर्मचारियों के बीच किसी संविदा से उद्भूत किसी विवाद को संबद्ध कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान की प्रेरणा पर ऐसे माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा, जो संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य, कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य और कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त अधिनिर्णायक से मिलकर बनेगा ।

(2) अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

(3) उपधारा (1) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देश किए जाने के लिए अपेक्षित किसी मामले की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं की जाएगी ।

(4) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।

(5) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

37. रिक्तियों के कारण कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य होगा-इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन गठित संस्थान या कार्य परिषद् या विद्या परिषद् या किसी अन्य निकाय का कोई कार्य निम्नलिखित कारणों से अविधिमान्य नहीं होगा, -   

(क) उसमें कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या

(ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या

(ग) उसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।

38. संस्थाओं द्वारा डिग्रियों आदि का दिया जाना-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को इस अधिनियम के अधीन डिग्रियां और अन्य शैक्षिक विशिष्टियां तथा उपाधियां देने की शक्ति होगी:

परंतु संस्थान द्वारा दी जाने वाली किसी डिग्री की नाम पद्धति को, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अधिसूचित किया जाएगा ।

39. प्रायोजित स्कीमें-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी जब कभी संस्थान किसी सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या किसी अन्य अभिकरण से जिसमें ऐसा उद्योग भी सम्िमलित है जो संस्थान पर निष्पादित या प्रदान की जाने वाली किसी अनुसंधान स्कीम, परामर्शी समनुदेशन, अध्यापन कार्यक्रम या आसीन आचार्य पद या छात्रवृत्ति प्रायोजित करता हो, निधियां प्राप्त करता है तब, -  

(क) संस्थान द्वारा प्राप्त रकम संस्थान की निधि से पृथक् रखी जाएगी और उसका केवल स्कीम के प्रयोजन के लिए ही उपयोग किया जाएगा: परंतु इस खंड के अधीन अनुपयोजित शेष किसी धन को, धारा 27 के अधीन गठित विन्यास निधि में अंतरित कर दिया जाएगा; और

(ख) उस स्कीम को निष्पादित करने के लिए अपेक्षित कर्मचारिवंदृ को प्रायोजित करने वाले संगठन द्वारा केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से अनुबंधित निबंधन और शर्तों के अनुसार भर्ती किया जाएगा:

परंतु साधारण वित्तीय नियम, 2005 में अधिकथित सिद्धांतों का पालन केन्द्रीय सरकार द्वारा वित्तपोषित प्रायोजित स्कीमों के अनुमोदन के लिए किया जाएगा ।

40. विद्या परिषद् और वित्त समिति की बैठक-विद्या परिषद् और वित्त समिति ऐसे समय पर अपना अधिवेशन करेगी और अपने अधिवेशनों में (ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति सहित) ऐसी प्रक्रिया अपनाएगी जो परिनियमों द्वारा उपंबधित की जाए ।

41. केन्द्रीय सरकार की संस्थान को निदेश देने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रभावी प्रशासन के लिए संस्थान को ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह आवश्यक समझे और संस्थान ऐसे निदेशों का पालन करेगा ।

(2) इस अधिनियम के अधीन संस्थान द्वारा अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कृत्यों के निर्वहन के संबंध में संस्थान और केन्द्रीय सरकार के बीच विवाद की दशा में उस विवाद पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

42. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-संस्थान के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध ऐसी किसी बात के लिए जो इस अधिनियम, परिनियम या अध्यादेशों के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई है या की जाने के लिए आशयित है, कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।

43. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टता और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों की बाबत उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -    

(क) धारा 28 की उपधारा (1) के अधीन ऐसा प्ररूप और रीति जिसमें संस्थान की लेखा बहियां रखी जाएंगी;

(ख) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए या उसका विहित किया जाना अपेक्षित है ।

44. परिनियमों, अध्यादेशों और अधिसूचनाओं का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम और बनाया गया प्रत्येक परिनियम और प्रत्येक अध्यादेश या जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी ।

(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, प्रत्येक परिनियम और प्रत्येक अध्यादेश या जारी की गई अधिसूचना, बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा या रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम, परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम, परिनियम, अध्यादेश नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना नहीं जारी की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा या हो जाएगी किन्तु नियम, परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस नियम, परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(3) परिनियम या अध्यादेश बनाने या अधिसूचनाएं जारी करने की शक्ति के अंतर्गत उक्त परिनियमों, अध्यादेशों, अधिसूचनाओं को या उनमें से किसी को उस तारीख से जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्व की नहीं होगी, भूतलक्षी रूप से प्रभावी करने की भी शक्ति होगी किन्तु किसी ऐसे परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना को इस रूप में भूतलक्षी रूप से प्रभावी नहीं किया जाएगा जिससे ऐसे किसी व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो जिसे ऐसा परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना लागू होती हो ।

45. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाइ उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी या ऐसे निदेश दे सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत होंःपरंतु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् इस धारा के अधीन नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

46. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, -    

(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले विद्यमान संस्थान का सलाहकार बोर्ड और कार्य परिषद् उसी रूप में तब तक कार्य करती रहेगी जब तक इस अधिनियम के अधीन संस्थान के लिए कार्य परिषद् का गठन नहीं कर दिया जाता है किन्तु इस अधिनियम के अधीन नई कार्य परिषद् के गठन पर ऐसे गठन के पहले पद धारण करने वाले सलाहकार बोर्ड और कार्य परिषद् के सदस्य पद धारण करने से प्रविरत हो जांएगे; और

(ख) जब तक इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम और अध्यादेश नहीं बनाए जाते हैं तब तक इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त विद्यमान संस्थान के परिनियम और अध्यादेश, या अधिसूचना, संस्थान को वहां तक लागू होते रहेंगे जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं ।

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