राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान अधिनियम, 1998
(1998 का अधिनियम संख्यांक 13)
[26 जून, 1998]
राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान
के नाम से ज्ञात संस्था को राष्ट्रीय महत्व
की संस्था घोषित करने के लिए और
उसके निगमन तथा उनसे संबंधित
विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के उनचासवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान अधिनियम, 1998 है ।
(2) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकती हैं ।
2. राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाना-राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, सेक्टर-67, एस० ए० एस० नगर, (मोहाली) जिला रोपड़, पंजाब नामक संस्था के उद्देश्य ऐसे हैं, कि वे उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था बनाते हैं, अतः यह घोषित किया जाता है कि राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान की स्थापना की तारीख अभिप्रेत है;
(ख) बोर्ड" से धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन गठित संस्थान का शासक-बोर्ड अभिप्रेत है;
(ग) अध्यक्ष" से धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन नामनिर्देशित संस्थान का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(घ) संकायाध्यक्ष" से धारा 17 के अपील नियुक्त संस्थान का संकायाध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ङ) निदेशक" से धारा 16 के अपील नियुक्त संस्थान का निदेशक अभिप्रेत है;
(च) निधि" से धारा 21 के अपील रखी जाने वाली संस्थान निधि अभिप्रेत है;
[(छ) संस्थान" से धारा 4 की उपधारा (1) या उपधारा (2क) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान अभिप्रेत है;]
(ज) सिनेट" से धारा 13 में निर्दिष्ट संस्थान की सिनेट अभिप्रेत है;
(झ) सोसाइटी" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान सोसाइटी, सेक्टर-67, एस० ए० एस नगर (मोहाली), जिला रोपड़, पंजाब अभिप्रेत है;
(ञ) परिनियम" और अध्यादेश" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए संस्थान के परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।
अध्याय 2
संस्थान
4. संस्थान की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, राष्ट्रीय औषध-शिक्षा और अनुसंधान संस्थान के पूर्वोक्त नाम का एक निगमिति निकाय गठित किया जाएगा ।
(2) संस्थान का शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी, और उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
[(2क) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, देश के विभिन्न भागों में ऐसे ही संस्थान स्थापित कर सकेगी ।]
(3) संस्थान शासक बोर्ड से मिलकर बनेगा, जिसमें निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात् :-
(क) अध्यक्ष, जो विख्यात शिक्षाविद्, वैज्ञानिक या प्रौद्योगिकीविद् या वृत्तिक होगा, जिसे कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा ;
(ख) संस्थान का निदेशक, पदेन;
(ग) भारत सरकार के संबद्ध मंत्रालय या विभाग में औषध उद्योग प्रभाग का भारसाधक संयुक्त सचिव, पदेन;
[(घ) उस राज्य की, जिसमें संस्थान स्थित है, सरकार का तकनीकी शिक्षा सचिव, पदेन;]
(ङ) भारत सरकार के औषध उद्योग से संबंधित मंत्रालय या विभाग का वित्तीय सलाहकार, पदेन;
(च) भारत का ओषधि महानियंत्रक, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, पदेन;
(छ) सदस्य सचिव, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, पदेन;
(ज) वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद् की राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में से किसी एक का निदेशक, जो वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के महानिदेशक द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा;
(झ) अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली या स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़ में से किसी का निदेशक, जिसे भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा चक्रानुक्रम से नामनिर्देशित किया जाएगा;
(ञ) अध्यक्ष, भारतीय औषधि विनिर्माता संगम, पदेन;
1[(ञक) भारतीय औषध परिषद् का एक प्रतिनिधि;]
(ट) अध्यक्ष, भारतीय औषध उत्पादक संगठन, पदेन;
(ठ) तीन प्रख्यात औषध विशेषज्ञ, जिनमें से एक शिक्षाविद्, एक अनुसंधान वैज्ञानिक और एक जैव प्रौद्योगिकीविद् होगा, जो केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे;
(ड) तीन विख्यात सार्वजनिक व्यक्ति या सामाजिक कार्यकर्ता जिनमें से एक या तो अनुसूचित जातियों में से या अनुसूचित जनजातियों में से कुलाध्यक्ष द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा तैयार किए गए पैनल में से नामनिर्देशित किया जाएगा;
(ढ) दो औषधि निर्माण उद्योगपति, जिन्हें कुलाध्यक्ष केंद्रीय सरकार द्वारा तैयार किए गए पैनल में से नामनिर्देशित करेगा;
(ण) तीन संसद् सदस्य, जिनमें से दो लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा लोक सभा से और एक राज्य सभा के सभापति द्वारा राज्य सभा से नामनिर्देशित किया जाएगा ।
(4) अध्यक्ष और पदेन शासकों से भिन्न शासकों की पदावधि तीन वर्ष होगी और वे ऐसे भत्तों के हकदार होंगे, जो केंद्रीय सरकार द्वारा अवधारित किए जाएं :
[परन्तु उपधारा (3) के खंड (ण) के अधीन नामनिर्दिष्ट किसी सदस्य की पदावधि यथाशीघ्र समाप्त हो जाएगी जैसे ही वह मंत्री या राज्य मंत्री या उपमंत्री या लोक सभा का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष या राज्य सभा का उपसभापति बन जाता है या उस सदन का, जिससे उसे नामनिर्दिष्ट किया गया था, सदस्य नहीं रह जाता है ।]
(5) आकस्मिक रिक्ति भरने के लिए नामनिर्देशित शासक की पदावधि उस शासक की शेष पदावधि तक बनी रहेगी जिसके स्थान पर वह नामनिर्देशित किया गया है ।
(6) बोर्ड का अधिवेशन वर्ष में कम से कम तीन बार ऐसे स्थान और समय पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार की बाबत प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो बोर्ड द्वारा अवधारित किए जाएं ।
[4क. संस्थान के केन्द्र-कोई संस्थान, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अपनी अधिकारिता के भीतर विभिन्न स्थानों पर एक या अधिक केन्द्र स्थापित कर सकेगा ।]
5. संपत्तियों का निहित होना-नियत दिन से ही इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए सभी संपत्तियां जो इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व सोसाइटी में निहित थी, ऐसे प्रारंभ से ही संस्थान में निहित हो जाएंगी ।
6. संस्थान के निगमन का प्रभाव-नियत दिन से ही,-
(क) किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में सोसाइटी के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह संस्थान के प्रति निर्देश है;
(ख) सोसाइटी के सभी अधिकार और दायित्व संस्थान को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार और दायित्व होंगे; और
(ग) नियत दिन के ठीक पहले सोसाइटी द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा संस्थान में उसी सेवावृत्ति के अनुसार, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं शर्तों और निबंधनों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य-निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसे कि वह उस दशा में धारण करता जिसमें यह अधिनियम पारित नहीं किया जाता और तब तक इसी प्रकार धारण करेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी सेवावृत्ति, पारिश्रमिक और निबंधन और शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक्तः परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :
परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसका नियोजन संस्थान द्वारा कर्मचारी से की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार समाप्त किया जा सकता है या यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया गया है तो स्थायी कर्मचारी की दशा में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारी की दशा में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर देकर संस्थान द्वारा समाप्त किया जा सकता है ।
7. संस्थान के कृत्य-संस्थान के निम्नलिखित कृत्य होंगे-
(i) औषध-शिक्षा और अनुसंधान में क्वालिटी और विशिष्टता को विकसित करना और उनका संवर्धन करना;
(ii) औषध-शिक्षा में मास्टर डिग्री, डाक्टरेट और पोस्ट डाक्टरेट पाठ्यक्रमों तथा अनुसंधान पर ध्यान देना;
(iii) परीक्षाएं आयोजित करना और डिग्रियां प्रदान करना;
(iv) मानद पुरस्कार या अन्य विशिष्टियां प्रदान करना;
(v) ऐसी शैक्षिक या अन्य संस्थाओं के साथ, जिनके उद्देश्य पूर्णतः या भागतः संस्थान के उद्देश्यों के समरूप हैं, संकाय के सदस्यों और विद्वानों का आदान-प्रदान करके और साधारणतया ऐसी रीति से, जो उनके समान उद्देश्य के लिए सहायक हों, सहयोग करना;
(vi) अध्यापकों, औषध-प्रौद्योगिकीविदों, सामुदायिक और अस्पताल भेषजज्ञों तथा अन्य वृत्तिकों के लिए पाठ्यक्रम संचालित करना;
(vii) औषध और संबंधित विज्ञानों तथा प्रौद्योगिकी के संबंध में विश्व साहित्य का संग्रह करना और उसे बनाए रखना जिससे कि देश के भीतर और विकासशील विश्व में, अन्य संस्थाओं के लिए अपनी ही किस्म का एक सूचना केन्द्र विकसित किया जा सके;
(viii) संस्थान में और बाहर के अनुसंधानकर्ताओं के उपयोग के लिए औषध यंत्रीकरण और विश्लेषण के एक केन्द्रीय संकाय का सृजन करना;
(ix) औषध-शिक्षण की कला या विज्ञान में प्रयोग करने तथा नव परिवर्तन लाने के लिए और अध्यापकों तथा अन्य कर्मकारों को प्रशिक्षित करने के लिए एक केन्द्र रखना;
(x) औषध-क्षेत्रों में, राष्ट्रीय, शैक्षिक, वृत्तिक और औद्योगिक वचन-बद्धताओं पर केन्द्रीभूत करते हुए, नव ज्ञान और विद्यमान जानकारी के पारेषण के सृजन के लिए एक विश्व स्तरीय केन्द्र को विकसित करना;
(xi) औषध-जनशक्ति के अनुसंधान और प्रशिक्षण को कार्यान्वित करने में बहु विषयी अभिगम का विकास करना जिससे कि वृत्ति, अकादमी और औषध-उद्योग के व्यापक हित को बेहतर ढंग से लाभ पहुंचाया जा सके और ऐसे औषध-संवर्धन को विकसित किया जा सके जो औषध शिक्षा और अनुसंधान की परिवर्तनशील विश्वव्यायी प्रवृत्तियों और पैटर्नों के अनुरूप हो;
(xii) औषध-शिक्षा के चुने हुए क्षेत्रों में समय-समय पर राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठियां, सेमिनार और सम्मेलन आयोजित करना;
(xiii) विकासशील देशों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करने वाले पाठ्यक्रमों की व्यवस्था करना;
(xiv) संस्थान तथा उद्योग के बीच वैज्ञानिक और अन्य तकनीकी कर्मचारिवृन्द के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करके और संस्थान द्वारा प्रायोजित तथा विधिक अनुसंधान और परामर्शी परियोजनाओं को हाथ में लेकर अकादमी और उद्योग के पारस्परिक प्रभाव के लिए एक केन्द्र के रूप में कार्य करना; और
(xv) ग्रामीण जनता द्वारा, देश में सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, औषधियों के वितरण और प्रयोग संबंधी अध्ययनों पर सम्यक् ध्यान देना ।
8. बोर्ड की शक्तियां-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, बोर्ड संस्थान के कार्यकलाप के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगा और संस्थान की उन सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा जिनका इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अन्यथा उपबंध नहीं किया गया है और उसे सिनेट के कार्यों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड,-
(क) संस्थान के प्रशासन और कार्यकरण से संबंधित नीति विषयक प्रश्नों का विनिश्चय करेगा;
(ख) फीसों और अन्य प्रभारों को नियत करेगा, उनकी मांग करेगा और उन्हें प्राप्त करेगा;
(ग) संस्थान के छात्रों के निवास का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करेगा और उनके अनुशासन का विनियमन और उनके स्वास्थ्य, सामान्य कल्याण और संस्कृति तथा सामूहिक जीवन के संवर्धन की व्यवस्था करेगा;
(घ) अध्यापन और अन्य पदों की स्थापना करेगा और उन पर (निदेशक के पद को छोड़कर) नियुक्तियां करेगा;
(ङ) परिनियम और अध्यादेश बनाएगा और उनमें परिवर्तन, उपान्तरण करेगा या उन्हें विखण्डित करेगा;
(च) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति, पुरस्कार और पदक संस्थित और प्रदान करेगा;
(छ) संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट, वार्षिक लेखाओं और आगामी वित्तीय वर्ष के बजट प्राक्कलनों उनकी विकास योजनाओं के विवरण सहित, विचार करेगा और ऐसे संकल्प पारित करेगा, जो वह ठीक समझे;
(ज) ऐसी सभी बातें करेगा जो पूर्वोक्त सभी या किन्हीं कृत्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।
(3) बोर्ड को उतनी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी जितनी वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।
(4) धारा 4 की उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना किसी स्थावर संपत्ति का किसी भी रीति से व्ययन नहीं करेगा ।
9. संस्थान का सभी मूलवंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुला होना-(1) संस्थान सभी स्त्रियों और पुरुषों के लिए खुला होगा चाहे वे किसी भी मूलवंश, पंथ, जाति या वर्ग के हों, और सदस्यों, छात्रों, शिक्षकों या कर्मकारों को प्रवेश देने या नियुक्त करने में या किसी भी अन्य बात के संबंध में धार्मिक विश्वास या मान्यता का कोई मानदंड या शर्त अधिरोपित नहीं की जाएगी ।
(2) कोई संस्थान किसी संपत्ति की कोई वसीयत, संदान या अंतरण, स्वीकार नहीं करेगा जिसमें, बोर्ड की राय में, इस धारा के भाव और उद्देश्य के विरुद्ध कोई शर्त या बाध्यता अन्तर्ग्रस्त है ।
10. संस्थान में शिक्षण-संस्थान में सभी शिक्षण कार्य संस्थान द्वारा या उसके नाम से इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार किया जाएगा ।
11. कुलाध्यक्ष-(1) भारत का राष्ट्रपति संस्थान का कुलाध्यक्ष होगा ।
(2) कुलाध्यक्ष संस्थान के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उसके कार्यकलापों की जांच करने के लिए और उन पर रिपोर्ट ऐसी रीति से देने के लिए जैसी कुलाध्यक्ष निर्दिष्ट करे, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा ।
(3) ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, कुलाध्यक्ष ऐसी कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जो वह रिपोर्ट में वर्णित किन्हीं विषयों की बाबत आवश्यक समझे और संस्थान ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
12. संस्थान के प्राधिकरण-संस्थान के अन्य प्राधिकरण निम्नलिखित होंगे, अर्थात्ः-
(क) सिनेट; और
(ख) ऐसे अन्य प्राधिकरण, जिन्हें परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकरण घोषित किए जाएं ।
13. सिनेट-संस्थान की सिनेट में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे अर्थात्ः-
(क) निदेशक, पदेन, जो सिनेट का अध्यक्ष होगा;
(ख) संकायाध्यक्ष, पदेन;
(ग) संस्थान के पांच आचार्य जो अध्यक्ष द्वारा निदेशक के परामर्श से, चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे;
(घ) ऐसे तीन व्यक्ति, जो संस्थान के कर्मचारी न हों, और जिन्हें निदेशक के परामर्श से अध्यक्ष द्वारा विज्ञान, इंजीनियरी और मानविकी के क्षेत्रों में से प्रत्येक क्षेत्र के लिए ख्यातिप्राप्त शिक्षाविदों में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा और उनमें से एक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का होगा;
(ङ) कर्मचारिवृन्द के ऐसे अन्य सदस्य जो परिनियमों में अधिकथित किए जाएं ।
14. सिनेट के कृत्य-इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए किसी संस्थान की सिनेट किसी संस्थान में शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा के स्तरों का नियंत्रण और साधारण विनियमन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगी तथा वह ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी जो परिनियमों द्वारा उसे प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।
15. अध्यक्ष के कृत्य, शक्तियां और कर्तव्य-(1) अध्यक्ष सामान्यतः बोर्ड के अधिवेशनों की और संस्थान के दीक्षांत समारोहों की अध्यक्षता करेगा ।
(2) अध्यक्ष का कर्तव्य होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि बोर्ड द्वारा किए गए विनिश्चयों का क्रियान्वयन हो रहा है ।
(3) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौपें जाएं ।
16. निदेशक-(1) संस्थान का निदेशक, बोर्ड द्वारा कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से नियुक्त किया जाएगा ।
(2) निदेशक, संस्थान का मुख्य शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा और वह संस्थान के उचित प्रशासन के लिए और शैक्षणिक स्तर तथा उसमें प्रशिक्षण प्रदान करने तथा अनुशासन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा ।
(3) निदेशक, बोर्ड को वार्षिक रिपोर्ट और लेखे प्रस्तुत करेगा ।
(4) निदेशक ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उसे समनुदेशित किए जाएं ।
17. संकायाध्यक्ष-(1) संस्थान के संकायाध्यक्ष की नियुक्ति ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाएं और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा अथवा निदेशक द्वारा उसे सौपे जाएं ।
(2) संकायाध्यक्ष, निदेशक को रिपोर्ट करेगा ।
18. कुल-सचिव-(1) संस्थान के कुल-सचिव की नियुक्ति ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाए और वह संस्थान के अभिलेखों, सामान्य मुद्रा, संस्थान की निधियों तथा संस्थान की ऐसी अन्य संपत्ति का जो बोर्ड उसके प्रभार में सौंपे, अभिरक्षक होगा ।
(2) कुल-सचिव, बोर्ड, सिनेट और ऐसी समितियों के, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, सचिव के रूप में कार्य करेगा ।
(3) कुल-सचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।
(4) कुल-सचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा अथवा निदेशक द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
19. अन्य प्राधिकरणों और अधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य-इसमें इससे पहले वर्णित प्राधिकरणों और अधिकारियों से भिन्न प्राधिकरणों और अधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य परिनियमों द्वारा अवधारित किए जाएंगे ।
20. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-संस्थान को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोजन के पश्चात् संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि का और ऐसी रीति से, जो वह उचित समझे, संदाय करेगी ।
21. संस्थान की निधि-(1) संस्थान एक निधि रखेगा जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे, -
(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए सभी धन;
(ख) सभी फीस तथा अन्य प्रभार;
(ग) अनुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत अथवा अंतरणों के रूप में संस्थान द्वारा प्राप्त सभी धन; और
(घ) किसी अन्य रीति या स्रोत से संस्थान को प्राप्त सभी धन ।
(2) निधि में जमा किए गए सभी धन, ऐसे बैंकों में जमा या ऐसी रीति से विनिहित किए जाएंगे, जिसे संस्थान केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से विनिश्चित करे ।
(3) निधि का उपयोग संस्थान के व्ययों की, जिनके अंतर्गत इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग में और कृत्यों के निर्वहन में किए गए व्यय भी हैं, पूर्ति के लिए किया जाएगा ।
22. विन्यास निधि की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, धारा 21 में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को-
(क) विन्यास निधि और विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए किसी अन्य निधि की स्थापना करने का;
(ख) अपनी निधि में से कोई धन विन्यास निधि या किसी अन्य निधि में अंतरण करने का,
निदेश दे सकेगी ।
23. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलन-पत्र भी है, ऐसे प्ररूप में जो विनिर्दिष्ट किया जाए ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से जारी करे ।
(2) संस्थान के लेखाओं की लेखापरीक्षा भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक करेगा और उस संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा उपगत कोई भी व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक तथा संस्थान के लेखाओं की लेखापरीक्षा करने के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के उस लेखापरीक्षा के संबंध में वही अधिकार, विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियां, लेखाओं, संबद्ध वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्रों के पेश किए जाने की मांग करने तथा संस्थान के कार्यालयों का निरीक्षण करने का भी अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित संस्थान के लेखे, उनकी लेखापरीक्षा रिपोर्ट सहित, प्रति वर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
24. पेंशन और भविष्य निधि-(1) संस्थान अपने कर्मचारियों के, जिसके अंतर्गत निदेशक भी है, फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी पेंशन, बीमा और भविष्य निधियां स्थापित करेगा, जो वह ठीक समझे ।
(2) जहां कोई ऐसी भविष्य निधि इस प्रकार स्थापित की गई है वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्यनिधि हो ।
25. नियुक्तियां-संस्थान के कर्मचारिवृंद की सभी नियुक्तियां निदेशक की नियुक्ति को छोड़कर परिनियमों द्वारा अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार निम्नलिखित द्वारा की जाएंगी-
(क) यदि नियुक्ति सहायक आचार्य या उससे ऊपर के पद पर शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के बारे में की जाती है या यदि नियुक्ति गैर-शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के बारे में किसी काडर में की जाती है जिसका अधिकतम वेतनमान सहायक आचार्य के वेतनमान के समान या उससे उच्चतर है, तो बोर्ड द्वारा; और
(ख) किसी अन्य मामले में, निदेशक द्वारा ।
26. परिनियम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किए जा सकेंगे, अर्थात-
(क) शिक्षण विभागों का बनाया जाना;
(ख) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र सहायतावृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;
(ग) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृन्द का वर्गीकरण, नियुक्ति की पद्धति और सेवा के निबंधनों और शर्तों का अवधारण;
(घ) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और ऐसे अन्य प्रवर्ग के व्यक्तियों के लिए पदों का आरक्षण जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर अवधारित किए जाएं;
(ङ) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृन्द के फायदे के लिए पेंशन, बीमा और भविष्य निधियों की स्थापना;
(च) संस्थान के प्राधिकरणों का गठन, शक्तियां और कर्तव्य;
(छ) हालों और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;
(ज) बोर्ड के सदस्यों में रिक्तियों को भरने की रीति;
(झ) बोर्ड के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन;
(ञ) सिनेट के अधिवेशन, ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति और उनके काम-काज के संचालन में अनुपालन की जाने वाली प्रक्रिया;
(ट) कोई अन्य बात जो इस अधिनियम के अधीन परिनियमों द्वारा विहित की जानी है या की जा सकती है ।
27. परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) संस्थान का प्रथम परिनियम बोर्ड द्वारा कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से बनाया जाएगा और उसकी एक प्रति, यथाशक्य शीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
(2) बोर्ड, समय-समय पर, नया या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या इस धारा में इसके पश्चात् उपबंधित रीति में परिनियम को संशोधित या निरसित कर सकेगा ।
(3) नए परिनियम के लिए या परिनियमों से परिवर्धन या परिनियम के किसी संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष का पूर्व अनुमोदन अपेक्षित होगा । कुलाध्यक्ष उसके लिए सहमति दे सकेगा या सहमति रोक सकेगा या उसे बोर्ड को विचार के लिए भेज सकेगा ।
(4) नए परिनियम या विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष उसके लिए सहमति नहीं दे देता है ।
28. अध्यादेश-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संस्थान के अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
(क) संस्थान में छात्रों का प्रवेश;
(ख) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य प्रवर्ग के व्यक्तियों के लिए आरक्षण;
(ग) संस्थान की सभी उपाधियों के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;
(घ) वे शर्तें जिनके अधीन छात्रों की उपाधि पाठ्यक्रमों में और संस्थान की परीक्षाओं में प्रवेश दिया जाएगा और वे उपाधियों के लिए पात्र होंगे;
(ङ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायतावृत्तियां, पदक और पुरस्कार प्रदान किए जाने की शर्तें;
(च) परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग और उनके कर्तव्य;
(छ) परीक्षाओं का संचालन;
(ज) संस्थान के विद्यार्थियों में अनुशासन बनाए रखना;
(झ) संस्थान में अध्ययन पाठ्यक्रमों के लिए और संस्थान में उपाधियों की परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें;
(ञ) संस्थान के विद्यार्थियों के निवास की शर्तें और हालों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीसों और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण किया जाना; और
(ट) कोई अन्य बात जो, इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन अध्यादेशों द्वारा उपबंधित की जाती है या की जा सकती है ।
29. अध्यादेश किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे ।
(2) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश ऐसी तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निर्दिष्ट करे परन्तु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश, बोर्ड को यथाशक्य शीघ्र, प्रस्तुत किया जाएगा और बोर्ड द्वारा अपने आगामी अधिवेशन में उन पर विचार किया जाएगा ।
(3) बोर्ड को ऐसे किसी अध्यादेश को संकल्प द्वारा उपांतरित या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसे संकल्प की तारीख से, ऐसा अध्यादेश, यथास्थिति, तद्नुसार उपांतरित या रद्द हो जाएगा ।
30. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) संस्थान और उसके किन्हीं कर्मचारियों के बीच किसी संविदा से उद्भूत होने वाला विवाद संपृक्त कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान के अनुरोध पर ऐसे माध्यस्थम्, अधिकरण को निर्देशित किया जाएगा जिसमें संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य और कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य तथा कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक होगा ।
(2) माध्यस्थम् अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और उस पर किसी न्यायालय में आक्षेप नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देश किए जाने के लिए अपेक्षित किसी मामले की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।
(4) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(5) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।
अध्याय 3
प्रकीर्ण
31. रिक्तियों के कारण कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन गठित संस्थान या बोर्ड अथवा सिनेट या किसी अन्य निकाय का कोई कार्य निम्नलिखित कारणों से अविधिमान्य नहीं होगा,-
(क) उसमें कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि; या
(ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि; या
(ग) उसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।
32. संस्थान द्वारा उपाधियों, आदि का दिया जाना-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को इस अधिनियम के अधीन उपाधियां और अन्य शैक्षिक विशिष्टियां तथा खिताब देने की शक्ति होगी ।
33. प्रायोजित स्कीमें-जब कभी संस्थान किसी सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या संस्थान द्वारा निष्पादित की जाने वाली किसी स्कीम के प्रायोजक किसी अन्य अभिकरण से निधि प्राप्त करता है तब इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) संस्थान द्वारा प्राप्त रकम संस्थान की निधि से पृथक् रखी जाएगी और स्कीम के प्रयोजन के लिए ही उपयोग की जाएगी;
(ख) उस स्कीम को निष्पादित करने के लिए अपेक्षित कर्मचारिवृन्द प्रायोजित करने वाले संगठन द्वारा अनुबंधित निबंधनों और शर्तों के अनुसार भर्ती किया जाएगा :
परन्तु खंड (क) के अधीन उपयोग में न लिया गया शेष धन इस अधिनियम की धारा 22 के अधीन सृजित विन्यास निधि को अंतरित कर दिया जाएगा ।
34. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसा उपबंध कर सकेगी या ऐसा निदेश दे सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, और कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो :
परन्तु कोई ऐसा आदेश नियत दिन से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
35. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले सोसाइटी के शासक बोर्ड के रूप में कार्य करने वाला शासक बोर्ड उसी रूप में तब तक कार्य करता रहेगा जब तक इस अधिनियम के अधीन संस्थान के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन किसी नए बोर्ड के गठन पर बोर्ड के ऐसे सदस्य, जो ऐसे गठन के पहले पद धारण कर रहे हों, पद धारण नहीं करेंगे;
(ख) जब तक इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम और अध्यादेश नहीं बनाए जाते हैं, तब तक अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, सेक्टर 67, साहिबजादा अजित सिंह नगर (मोहाली) जिला रोपड़, पंजाब के परिनियम और अध्यादेश, उस संस्थान को वहां तक लागू होते रहेंगे, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं ।
36. परिनियमों और अध्यादेशों का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम या अध्यादेश राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम या अध्यादेश, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस परिनियम या अध्यादेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह परिनियम या अध्यादेश नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु परिनियम या अध्यादेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस परिनियम या अध्यादेश के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(3) परिनियम या अध्यादेश बनाने की शक्ति के अंतर्गत उक्त परिनियमों या अध्यादेशों अथवा उनमें से किसी को उस तारीख से जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्व की नहीं होगी, भूतलक्षी रूप से प्रभावी करने की शक्ति भी होगी किन्तु किसी ऐसे परिनियम या अध्यादेश को इस रूप में भूतलक्षी रूप से प्रभावी नहीं किया जाएगा जिससे ऐसे किसी व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो जिसे ऐसा परिनियम या अध्यादेश लागू होता हो ।
37. निरसन और व्यावृत्ति-(1) राष्ट्रीय औषध शिक्षा और अनुसंधान संस्थान अध्यादेश, 1998 (1998 का अध्यादेश 9) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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