नालन्दा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010
(2010 का अधिनियम संख्यांक 39)
[21 सितम्बर, 2010]
फिलीपीन्स में 15 जनवरी, 2007 को हुए दूसरे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में और तत्पश्चात् थाइलैंड
में 25 अक्तूबर, 2009 को हुए चौथे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में बौद्धिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक
और आध्यात्मिक अध्ययन के उत्थान के लिए बिहार राज्य में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के
रूप में नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना करने के लिए किए गए विनिश्चय
को कार्यान्वित करने तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक
विषयों के लिए
अधिनियम
फिलीपीन्स गणतंत्र के सेबू नगर में 15 जनवरी, 2007 को हुए दूसरे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में शिक्षा में उत्कृष्ट पूर्वी एशिया प्रादेशिक केन्द्रों का उपयोग करते हुए क्षेत्रीय शैक्षणिक सहयोग को बल प्रदान करने और क्षेत्रीय सद्भावना में अभिवृद्धि करने तथा एक-दूसरे की विरासत और इतिहास का सम्मान करने के लिए बिहार राज्य में अवस्थित नालन्दा विश्वविद्यालय के पुनरूज्जीवन के लिए सहमति हुई थी;
और हुआ हिन, थाईलैंड में 25 अक्तूबर, 2009 को हुए चौथे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना का समर्थन किया गया और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में प्रस्तावित नालंदा विश्वविद्यालय और उत्कृष्टता के विद्यमान केन्द्रों के बीच सामंजस्य तथा सहयोग को प्रोत्साहित किया गया था जिससे कि भाग लेने वाले देशों की विद्वता के समुदाय सशक्त हो सकें, जो समस्त मानव जाति को जोड़ता हो और जहां छात्र, विद्वान, अनुसंधानकर्ता और शिक्षाविद्, एक साथ आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में कार्य कर सकें;
और यह समीचीन समझा गया है कि बिहार राज्य में नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए पूर्वोक्त पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में किए गए विनिश्चयों को कार्यान्वित करने के लिए उपबंध किया जाए और उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में घोषित किया जाए;
भारत गणराज्य के इकसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम नालन्दा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
2. नालन्दा विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में घोषणा-नालन्दा विश्वविद्यालय नामक संस्था का उद्देश्य, उसे राष्ट्रीय महत्व की एक संस्था बनाना है । अतः यह घोषित किया जाता है कि नालन्दा विश्वविद्यालय नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की एक संस्था है ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न होः-
(क) विद्या परिषद्" से विश्वविद्यालय की विद्या परिषद् अभिप्रेत है;
(ख) शैक्षणिक कर्मचारिवृंद" से कर्मचारिवृंद के ऐसे प्रवर्ग अभिप्रेत हैं, जिन्हें परिनियमों द्वारा शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के रूप में अभिहित किया गया है;
(ग) केन्द्र" से विश्वविद्यालय द्वारा, भारत में किसी स्थान में या पूर्वी एशिया क्षेत्र में, ऐसे स्थान या क्षेत्र में केन्द्रों के कार्य के समन्वयन और पर्यवेक्षण के प्रयोजनों के लिए तथा ऐसे कृत्यों का पालन करने के लिए, जो शासी बोर्ड द्वारा ऐसे केन्द्र को प्रदत्त किए जाएं, स्थापित या अनुरक्षित केंद्र अभिप्रेत हैं;
(घ) पूर्वी एशिया क्षेत्र" से ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है, जिसमें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के सदस्य राज्यों के राज्यक्षेत्र समाविष्ट हैं;
(ङ) कर्मचारी" से विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कोई व्यक्ति अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत विश्वविद्यालय के शिक्षक और अन्य कर्मचारिवृंद भी हैं;
(च) संकाय" से विश्वविद्यालय का संकाय अभिप्रेत है;
(छ) वित्त अधिकारी" से धारा 17 के अधीन नियुक्त विश्वविद्यालय का वित्त अधिकारी अभिप्रेत है;
(ज) शासी बोर्ड" से धारा 7 के अधीन गठित विश्वविद्यालय का शासी बोर्ड अभिप्रेत है;
(झ) छात्र निवास" से विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराए गए, अनुरक्षित या मान्यताप्राप्त निवास की इकाई अभिप्रेत है, जो किसी भी नाम से ज्ञात है;
(ञ) सदस्य राज्यों" से पू्र्वी एशिया शिखर सम्मेलन के सदस्य राज्य अभिप्रेत हैं;
(ट) नालन्दा परामर्शदाता समूह" से भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की तारीख 28 जून, 2007 की संसूचना द्वारा, अन्य बातों के साथ, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भागीदारी के ढांचे और संरचना की, जो विश्वविद्यालय की स्थापना को शासित करेंगे, परीक्षा करने के लिए गठित व्यक्तियों का समूह अभिप्रेत है;
(ठ) अध्यादेश" से विश्वविद्यालय के अध्यादेश अभिप्रेत हैं;
(ड) विहित" से परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ढ) मान्यताप्राप्त संस्था" से विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जा रही या मान्यताप्राप्त या उससे सहयुक्त उच्चतर शिक्षा की संस्था अभिप्रेत है;
(ण) कुलसचिव" से धारा 16 के अधीन नियुक्त विश्वविद्यालय का कुलसचिव अभिप्रेत है;
(त) विनियमों" से विश्वविद्यालय के विनियम अभिप्रेत हैं;
(थ) विद्यापीठ" से विश्वविद्यालय के अध्ययन केंद्र अभिप्रेत हैं;
(द) परिनियम" से विश्वविद्यालय के परिनियम अभिप्रेत हैं;
(ध) शिक्षक" से विश्वविद्यालय के ऐसे आचार्य, सह-आचार्य, सहायक आचार्य और अनुसंधान कर्मचारिवृंद अभिप्रेत हैं, जो विश्वविद्यालय में शिक्षण देने या अनुसंधान का संचालन करने के लिए या विश्वविद्यालय के किसी पाठ्यक्रम में अध्ययनरत रहने के लिए छात्रों को मार्गदर्शन देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किए गए हैं या मान्यताप्राप्त हैं और जो परिनियमों द्वारा शिक्षक के रूप में अभिहित किए गए हैं;
(न) विश्वविद्यालय" से धारा 4 के अधीन स्थापित और निगमित नालंदा विश्वविद्यालय अभिप्रेत है ।
4. नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना और निगमन-(1) नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2007 (2007 का बिहार अधिनियम 18) के अधीन बिहार राज्य में स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय को इस अधिनियम के अधीन नालंदा विश्वविद्यालय" के नाम से एक निगमित निकाय के रूप में स्थापित किया जाएगा ।
(2) शासी बोर्ड और विद्या परिषद् का प्रथम कुलाध्यक्ष, प्रथम कुलाधिपति, प्रथम कुलपति, प्रथम सदस्य और सभी ऐसे व्यक्ति, जो इसके पश्चात् ऐसे अधिकारी या सदस्य हो सकेंगे, वे ऐसे पद या सदस्यता धारण करते रहने तक विश्वविद्यालय का गठन करेंगे ।
(3) विश्वविद्यालय का शाश्वत उत्तराधिकार होगा और उसकी सामान्य मुद्रा होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
(4) विश्वविद्यालय का मुख्यालय बिहार राज्य के नालंदा जिले में होगा ।
(5) विश्वविद्यालय, भारत में ऐसे अन्य स्थानों पर, जो वह ठीक समझे, केन्द्रों को स्थापित कर सकेगा या चला सकेगाः
परंतु विश्वविद्यालय शासी बोर्ड के अनुमोदन से भारत के बाहर अध्ययन केंद्रों की स्थापना कर सकेगा ।
5. विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रभाव-इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से ही, -
(क) किसी संविदा या अन्य लिखित में नालंदा विश्वविद्यालय के प्रति किसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह विश्वविद्यालय के प्रति निर्देश है;
(ख) नालंदा विश्वविद्यालय की सभी जंगम और स्थावर संपत्ति, विश्वविद्यालय में निहित होंगी;
(ग) नालंदा विश्वविद्यालय के सभी अधिकार और दायित्व, विश्वविद्यालय को अंतरित हो जाएंगे और विश्वविद्यालय के अधिकार और दायित्व होंगे;
(घ) इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व नालंदा विश्वविद्यालय द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति, विश्वविद्यालय में अपना पद या सेवा, उस अवधि तक, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य-निधि और अन्य मामलों के बारे में, उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों सहित, उसी प्रकार धारण करेगा, जैसा वह उसे तब धारण करता यदि यह अधिनियम अधिनियमित न किया गया होता और ऐसा तब तक करता रहेगा जब तक कि उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक ऐसी पदावधि, पारिश्रमिक और निबंधन और शर्तें, परिनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैंः
परंतु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो विश्वविद्यालय द्वारा उस कर्मचारी के साथ किए गए संविदा के निबंधनों के अनुसार, या यदि इस निमित्त, उसमें कोई उपबंध नहीं किया गया है तो विश्वविद्यालय द्वारा उसको स्थायी कर्मचारियों की दशा में, तीन मास के पारिश्रमिक और अन्य कर्मचारियों की दशा में, एक मास के पारिश्रमिक के समतुल्य प्रतिकर के संदाय पर उसका नियोजन समाप्त किया जा सकेगाः
परंतु यह और कि इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व नियोजित प्रत्येक व्यक्ति, धारा 33 के अधीन किसी संविदा के निष्पादन के लंबित रहने तक, इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों से संगत किसी संविदा के उपबंधों के अनुसार नियुक्त किया गया समझा जाएगाः
परंतु यह भी कि तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या किसी लिखत या अन्य दस्तावेज में, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष, कुलाधिपति या कुलपति के प्रति किसी भी रूप द्वारा किए गए किसी प्रतिनिर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस विश्वविद्यालय के क्रमशः कुलाध्यक्ष, कुलाधिपति या कुलपति के प्रतिनिर्देश है;
(ङ) नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2007 (2007 का बिहार अधिनियम सं 18) के उपबंधों के अधीन नियुक्त नालंदा विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष, कुलाध्यक्ष के नामनिर्देशिती के रूप में नियुक्त किया गया समझा जाएगा और ऐसा नामनिर्देशिती इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए इस अधिनियम के अधीन प्रथम कुलाध्यक्ष भी होगा;
(च) नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2007 (2007 का बिहार अधिनियम सं 18) के उपबंधों के अधीन नियुक्त नालंदा विश्वविद्यालय का कुलाधिपति इस अधिनियम की धारा 14 के अधीन कुलाधिपति के रूप में नियुक्त किया गया समझा जाएगा और इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा;
(छ) नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2007 (2007 का बिहार अधिनियम सं 18) के उपबंधों के अधीन नियुक्त नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति इस अधिनियम के अधीन प्रथम कुलपति के रूप में नियुक्त किया गया समझा जाएगा और इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा;
(ज) नालंदा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध या उसके द्वारा दिए गए विशेषाधिकार प्राप्त या उसके द्वारा चलाए गए सभी महाविद्यालय, संस्थाएं, संकाय और विभाग इस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध या उसके द्वारा दिए गए विशेषाधिकार प्राप्त या उसके द्वारा अनुरक्षित हो जाएंगे ।
6. अधिकारिता-विश्वविद्यालय की अधिकारिता का विस्तार संपूर्ण भारत पर और भारत के भीतर या बाहर स्थापित केन्द्रों पर होगा ।
7. शासी बोर्ड-(1) विश्वविद्यालय का एक शासी बोर्ड होगा, जो उसके सदस्यों के रूप में निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगा, अर्थात्ः-
(क) कुलाधिपति;
(ख) कुलपति;
(ग) उन सदस्य राज्यों में से, जो तीन वर्ष की अवधि के दौरान अधिकतम वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं, सदस्य राज्यों द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले पांच सदस्य;
(घ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला विदेश मंत्रालय में सचिव की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति का एक सदस्य;
(ङ) राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले, बिहार राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले दो सदस्य;
(च) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला, मानव संसाधन विकास मंत्रालय में अपर सचिव की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति का एक सदस्य;
(छ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले, विख्यात विद्वान या शिक्षाविद् व्यक्तियों में से तीन सदस्य ।
(2) उपधारा (1) के खंड (ग) से खंड (छ) में निर्दिष्ट शासी बोर्ड का प्रत्येक सदस्य तीन वर्ष की नियत अवधि के लिए पद धारण करेगा ।
(3) कुलाधिपति शासी बोर्ड का अध्यक्ष होगा ।
(4) उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट विदेश मंत्रालय का सचिव, शासी बोर्ड का सदस्य-सचिव होगा ।
(5) इस अधिनियम के उपबंधों, परिनियमों और उसके अधीन बनाए गए अध्यादेशों के अधीन रहते हुए, शासी बोर्ड अपनी बैठकों का संचालन करने के लिए (जिसके अंतर्गत गणपूर्ति भी है) अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित कर सकेगा ।
8. शासी बोर्ड की शक्तियां और कृत्य-(1) शासी बोर्ड, विश्वविद्यालयों की सभी नीतियों और निदेशों के लिए तथा उसके कार्यों के प्रबंध के लिए उत्तरदायी होगा ।
(2) शासी बोर्ड ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएंः
परंतु नालंदा परामर्शदाता समूह, शासी बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन एक वर्ष की अवधि या धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (ग) से खंड (छ) में निर्दिष्ट सदस्यों को नामनिर्दिष्ट किए जाने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, करेगा ।
9. विश्वविद्यालय के उद्देश्य-(1) विश्वविद्यालय के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे-
(क) प्राचीन विज्ञान (विशिष्टतया जो नालंदा में कई सदियों पहले प्रचलित था) दर्शनशास्त्र, भाषा विज्ञान, इतिहास के क्षेत्र में और जीवन की गुणवत्ता को सुधारने के लिए अत्यावश्यक उच्चतर शिक्षा के अन्य क्षेत्रों में सदस्य राज्यों की क्षमता निर्माण के संबंध में शिक्षा प्रदान करना और अनुसंधान को समर्थ बनाना;
(ख) पूर्वी एशिया के ऐसे भावी नेताओं को, जो अपने पूर्व इतिहास के संबंध में एक दूसरे के सापेक्ष महत्व के अपने ज्ञान को बढ़ा सकते हैं, एक साथ लाकर क्षेत्रीय शान्ति और दूरदर्शिता का संवर्धन करने और उस ज्ञान को वैश्विक रूप से बांटने में योगदान देना;
(ग) अध्यापन, अनुसंधान और पाठ्यक्रम के ऐसे शैक्षणिक मानकों और प्रत्यायन प्रतिमानों को, जो सभी सदस्य राज्यों को स्वीकार्य हों, सुमेलित करना;
(घ) सदस्य राज्यों के विद्वानों और हितबद्ध व्यक्तियों के बीच विशिष्ट भागीदारी सृजित करना;
(ङ) विश्व के किसी अन्य भाग से किन्हीं अन्य विचारों और परिपाटी को छोड़े बिना समसामयिक संदर्भ में बुद्ध के उपदेशों को समझना;
(च) एशियाई देशों के बीच विशिष्टतः पूर्वी एशिया के बीच व्यापार, विज्ञान, गणित, ज्योतिष, धर्म, दर्शनशास्त्र और एक दूसरे की सामयिक संस्कृति जैसे क्षेत्रों में मजबूत ऐतिहासिक सामान्यताओं से आबद्ध, बृहत्तर पारस्परिक क्रिया के लिए अनुसंधान को बढ़ावा देना;
(छ) छात्रों और विद्वानों में मेलमिलाप, समझ की भावना विकसित करना और इस प्रकार लोकतांत्रिक समाज के आदर्श नागरिक बनने के लिए उन्हें प्रशिक्षित करना;
(ज) अनेक शताब्दियों पूर्व नालंदा में प्रदान किए जाने वाले शिक्षण को ध्यान में रखकर सदस्य राज्यों की शिक्षण प्रणाली के सुधार में योगदान देना;
(झ) सदस्य राज्यों की विभिन्न कलाओं, शिल्पों और कौशलों में, उनकी गुणवत्ता को बढ़ाते हुए और जनता को उनकी उपलब्धता में सुधार करते हुए शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करना ।
(2) विश्वविद्यालय, अलाभकारी लोक निजी भागीदारी होगा जो प्रत्येक सदस्य राज्य और अन्य स्रोतों से सहायता लेगा, किंतु स्वशासी होगा और शासी बोर्ड के प्रति जवाबदार होगा ।
10. विश्वविद्यालय की शक्तियां-विश्वविद्यालय को निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्ः-
(i) शिक्षा प्रदान करने, उसका उन्नयन और संवर्धन करने के लिए और उद्देश्यों में यथा उपवर्णित ऐसी शिक्षा में प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए उपबंध करना और भारत, एशियाई देशों और अन्य देशों में, अन्य विशेषज्ञों, विद्वानों और हितबद्ध व्यक्तियों के निकटतम सहयोग से ऐसी शिक्षा के अनुसरण के लिए एक समर्थकारी और सहायक वातावरण सृजित करना;
(ii) विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने में अंतरराष्ट्रीय भागीदारों और मित्र देशों का एक संकाय स्थापित करना;
(iii) परामर्शी सेवाओं, सतत शिक्षा कार्यक्रमों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोगों और बौद्धिक संपत्ति अधिकारों के माध्यम से संसाधनों को उत्पन्न करना और बनाए रखना;
(iv) विद्या की ऐसी शाखाओं में, जो विश्वविद्यालय, समय-समय पर, अवधारित करे, शिक्षण प्रदान करना तथा अनुसंधान के लिए और ज्ञान की अभिवृद्धि और प्रसार के लिए व्यवस्था करना;
(v) अनुसंधान और शिक्षण के लिए ऐसे विशेष केन्द्र और विशेषित प्रयोगशालाएं और ऐसी अन्य इकाइयां स्थापित करना, जो उसके उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए आवश्यक हों;
(vi) डिग्री, डिप्लोमा, प्रमाणपत्रों या किसी अन्य प्रयोजन के लिए अध्ययन पाठ्यक्रमों की योजना बनाना और विहित करना;
(vii) परीक्षाएं आयोजित करना और ऐसे व्यक्तियों को, जिन्होंने परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अधिकथित रीति से पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन पूरा किया है या अनुसंधान किया है, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र अनुदत्त करना और डिग्रियां तथा विद्या संबंधी विशेष उपाधियां प्रदान करना;
(viii) परिनियमों द्वारा विहित रीति से मानद उपाधियां या अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां प्रदान करना;
(ix) विश्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित आचार्य, उपाचार्य और प्राध्यापक और अन्य अध्यापन और शैक्षणिक पद संस्थित करना और ऐसे पदों, आचार्य, उपाचार्य और प्राध्यापक और अन्य अध्यापन और शैक्षणिक पदों पर व्यक्तियों को नियुक्त करना;
(x) अभ्यागत आचार्यों, प्रतिष्ठित आचार्यों, परामर्शदाताओं, विद्वानों और ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त करना, जो विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने में योगदान दे सकें;
(xi) विश्वविद्यालय के आचार्यों, सह-आचार्यों या सहायक आचार्यों के रूप में या अन्यथा अध्यापकों के रूप में व्यक्तियों को मान्यता प्रदान करना;
(xii) ऐसे प्रशासनिक और अन्य पदों का सृजन करना, जो विश्वविद्यालय समय-समय पर आवश्यक समझे और उन पर नियुक्तियां करना;
(xiii) सभी प्रवर्गों के कर्मचारियों की सेवा की शर्तें, जिनके अंतर्गत उनकी आचार संहिता भी है, अधिकथित करना;
(xiv) भारत में या भारत के बाहर ऐसे केन्द्रों की स्थापना करना और उनका अनुरक्षण करना, जो समय-समय पर अवधारित किए जाएं;
(xv) अपनी अधिकारिता के भीतर स्थित संस्थाओं को विश्वविद्यालय संस्थाओं के रूप में अपने विशेषाधिकार देना और उन सभी या उनमें से किन्हीं विशेषाधिकारों को, ऐसी शर्तों के अनुसार, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, वापस लेना;
(xvi) किसी अन्य विश्वविद्यालय या प्राधिकारी या उच्चतर विद्या की संस्था या किसी अन्य लोक या निजी निकाय के साथ, जो विश्वविद्यालय के उन समान प्रयोजनों और उद्देश्यों की अभिवृद्धि का दृष्टिकोण रखते हैं, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विश्वविद्यालय द्वारा अवधारित या सहमत किए जाएं, सहयोग या सहयोजन करना या सहयुक्त होना;
(xvii) विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित या विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्रदान की गई संस्थाओं में प्रवेश के लिए स्तरमान अवधारित करना, जिसके अंतर्गत परीक्षा, मूल्यांकन या परीक्षण की कोई अन्य पद्धति भी है;
(xviii) ऐसी फीसों और अन्य प्रभारों के संदाय की, जो विहित किए जाएं, मांग करना और उन्हें प्राप्त करना;
(xix) विश्वविद्यालय द्वारा छात्र-निवासों की स्थापना करना और ऐसे छात्र-निवासों को, जो विश्वविद्यालय द्वारा नहीं चलाए जाते हैं और छात्रों के लिए अन्य वास सुविधाओं को मान्यता देना, उनका मार्गदर्शन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण करना और ऐसी किसी मान्यता को वापस लेना;
(xx) विश्वविद्यालय के छात्रों और कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सामान्य कल्याण की अभिवृद्धि के लिए प्रबंध करना;
(xxi) छात्रों और कर्मचारियों में अनुशासन विनियमित करना और लागू करना तथा इस संबंध में ऐसे अनुशासनिक उपाय करना, जो विश्वविद्यालय द्वारा आवश्यक समझे जाएं;
(xxii) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति और पुरस्कार संस्थित करना और प्रदान करना;
(xxiii) विश्वविद्यालय के प्रयोजनों या उद्देश्यों के लिए अध्यादेशों के अनुसार उपकृति, संदान और दान प्राप्त करना और किसी स्थावर या जंगम संपत्ति को, जिसके अंतर्गत न्यास और विन्यास संपत्ति भी है, अर्जित करना, धारित करना, उनका प्रबंध करना और व्ययन करना और ऐसी रीति से, जो वह ठीक समझे, निधियों का विनिधान करना;
(xxiv) शासी बोर्ड के अनुमोदन से उधार लेना;
(xxv) किसी संस्था को या तो संपूर्ण या भागतः या उसके सदस्यों या छात्रों को, किसी प्रयोजन के लिए, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो समय-समय पर विहित की जाएं, मान्यता देना और ऐसी मान्यता को वापस लेना;
(xxvi) अनुसंधान और सलाहकारी सेवाओं के लिए उपबंध करना और उस प्रयोजन के लिए अन्य संस्थाओं या निकायों के साथ ऐसे ठहराव करना, जो वह आवश्यक समझे;
(xxvii) ऐसे मुद्रण, प्रत्युत्पादन और प्रकाशन या अनुसंधान और अन्य कार्य के लिए उपबंध करना, जो विश्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित हो;
(xxviii) उसको प्रदान की गई ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य सभी कार्य करना, जो विश्वविद्यालय के सभी या किन्हीं उद्देश्यों की अभिवृद्धि के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।
11. विश्वविद्यालय का सभी व्यक्तियों के लिए खुला होना-विश्वविद्यालय सभी व्यक्तियों के लिए लिंग, जाति, पंथ, निःशक्तता, नस्लता या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि का विचार किए बिना खुला रहेगा ।
12. कुलाध्यक्ष-(1) भारत का राष्ट्रपति विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष होगाः
परंतु राष्ट्रपति, किसी व्यक्ति को, आदेश द्वारा, कुलाध्यक्ष नामनिर्दिष्ट कर सकेगा और इस प्रकार नामनिर्दिष्ट ऐसा व्यक्ति, पांच वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, पद धारण करेगा और इस प्रकार नामनिर्दिष्ट व्यक्ति कुलाध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करेगा ।
(2) कुलाध्यक्ष, विश्वविद्यालय के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उस पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए, समय-समय पर, एक या अधिक व्यक्तियों की नियुक्ति कर सकेगा और उस रिपोर्ट की प्राप्ति पर कुलाध्यक्ष, उस पर कुलपति के माध्यम से शासी बोर्ड के विचार अभिप्राप्त करने के पश्चात् ऐसी कार्रवाई कर सकेगा और ऐसे निदेश जारी कर सकेगा, जो वह रिपोर्ट में चर्चित विषयों में से किसी के बारे में आवश्यक समझे और विश्वविद्यालय ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(3) कुलाध्यक्ष को ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, जिन्हें वह निदेश दे, विश्वविद्यालय, उसके भवनों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं तथा उपस्करों का और विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जाने वाले या उसके विशेषाधिकार प्राप्त किसी संस्था या केन्द्र का और विश्वविद्यालय द्वारा संचालित की गई परीक्षा, दिए गए शिक्षण और अन्य कार्य का भी निरीक्षण कराने का और विश्वविद्यालय से संबंधित किसी मामले की बाबत जांच कराने का अधिकार होगा ।
(4) कुलाध्यक्ष, प्रत्येक मामले में विश्वविद्यालय को निरीक्षण या जांच कराने के अपने आशय की सूचना देगा और विश्वविद्यालय तीस दिन की अवधि या ऐसी अन्य अवधि के भीतर जो कुलाध्यक्ष अवधारित करे, प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए हकदार होगा, जिसे ऐसे निरीक्षण या जांच में उपस्थित होने और सुने जाने का अधिकार होगा ।
(5) कुलाध्यक्ष, ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणाम के संदर्भ में कुलपति को संबोधित कर सकेगा और कुलपति शासी बोर्ड को कुलाध्यक्ष के विचार ऐसी सलाह के साथ संसूचित करेगा, जो कुलाध्यक्ष उस पर की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में दें ।
(6) शासी बोर्ड, कुलपति के माध्यम से कुलाध्यक्ष को वह कार्रवाई, यदि कोई हो, संसूचित करेगा, जो वह ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणामस्वरूप करने की प्रस्थापना करता है या की गई है ।
(7) जहां शासी बोर्ड, कुलाध्यक्ष के समाधानप्रद रूप में कोई कार्रवाई उचित समय के भीतर नहीं करता है, वहां वह, शासी बोर्ड द्वारा दिए गए किसी स्पष्टीकरण या अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात् ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जो वह ठीक समझे और शासी बोर्ड ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(8) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कुलाध्यक्ष विश्वविद्यालय की किसी ऐसी कार्यवाही को, जो इस अधिनियम, परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों के अनुरूप नहीं हैं, लिखित आदेश द्वारा, निष्प्रभाव कर सकेगा ।
(9) कुलाध्यक्ष को ऐसी अन्य शक्तियां होंगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।
13. विश्वविद्यालय के अधिकारी-विश्वविद्यालय के निम्नलिखित अधिकारी होंगेः-
(1) कुलाधिपति;
(2) कुलपति;
(3) कुलसचिव;
(4) वित्त अधिकारी; और
(5) ऐसे अन्य अधिकारी, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के अधिकारी घोषित किए जाएं ।
14. कुलाधिपति-(1) कुलाधिपति की नियुक्ति, कुलाध्यक्ष द्वारा, ऐसी अवधि के लिए और ऐसी रीति से की जाएगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए ।
(2) कुलाधिपति, अपने पदाभिधान से, विश्वविद्यालय का प्रधान होगा और यदि वह उपस्थित है तो उपाधियां प्रदान करने के लिए आयोजित विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोहों और शासी बोर्ड के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा ।
15. कुलपति-(1) कुलपति की नियुक्ति कुलाध्यक्ष द्वारा ऐसी रीति से, ऐसी अवधि के लिए और ऐसी उपलब्धियों तथा सेवा की अन्य शर्तों पर की जाएगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।
(2) कुलपति, विश्वविद्यालय का प्रधान शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा और विश्वविद्यालय के कार्यकलापों पर पर्यवेक्षण और नियंत्रण रखेगा तथा विश्वविद्यालय के सभी प्राधिकारियों के विनिश्चयों को कार्यान्वित करेगा ।
(3) यदि कुलपति की यह राय है कि किसी मामले में तुरन्त कार्रवाई आवश्यक है तो वह विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग कर सकेगा और उसके द्वारा उस मामले में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट उस प्राधिकारी को देगाः
परन्तु यदि संबंधित प्राधिकारी की यह राय है कि ऐसी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी तो वह उस मामले को कुलाध्यक्ष को निर्देशित कर सकेगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगाः
परन्तु यह और कि विश्वविद्यालय की सेवा में के किसी व्यक्ति को, जो इस उपधारा के अधीन कुलपति द्वारा की गई किसी कार्रवाई से व्यथित है, उस तारीख से जिसको ऐसी कार्रवाई उसे संसूचित की जाती है, नब्बे दिन के भीतर उस कार्रवाई के विरुद्ध शासी बोर्ड को अभ्यावेदन करने का अधिकार होगा और तदुपरांत, शासी बोर्ड कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई को पुष्ट कर सकेगा, उपांतरित कर सकेगा या उसे उलट सकेगा ।
(4) यदि कुलपति की यह राय है कि किसी प्राधिकारी का कोई विनिश्चय इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों के उपबंधों द्वारा प्रदत्त प्राधिकारी की शक्तियों के बाहर है या किया गया कोई विनिश्चय विश्वविद्यालय के हित में नहीं है तो वह संबंधित प्राधिकारी से अपने विनिश्चय का, ऐसे विनिश्चय के साठ दिन के भीतर पुनर्विलोकन करने के लिए कह सकेगा और यदि वह प्राधिकारी उस विनिश्चय का पूर्णतः या भागतः पुनर्विलोकन करने से इंकार करता है या उसके द्वारा उक्त साठ दिन की अवधि के भीतर कोई विनिश्चय नहीं किया जाता है तो वह मामला कुलाध्यक्ष को निर्दिष्ट किया जाएगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगाः
परंतु संबंधित प्राधिकारी का विनिश्चय, इस उपधारा के अधीन, यथास्थिति, प्राधिकारी या कुलाध्यक्ष द्वारा ऐसे विनिश्चय के पुनर्विलोकन की अवधि के दौरान निलंबित रहेगा ।
(5) कुलपति ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएं ।
16. कुलसचिव-(1) कुलसचिव की नियुक्ति ऐसी रीति से और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।
(2) कुलसचिव को विश्वविद्यालय की ओर से करार करने और उन पर हस्ताक्षर करने और अभिलेखों को अधिप्रमाणित करने की शक्ति होगी ।
(3) कुलसचिव ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
17. वित्त अधिकारी-वित्त अधिकारी की नियुक्ति ऐसी रीति से और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
18. परीक्षा नियंत्रक-परीक्षा नियंत्रकों की नियुक्ति ऐसी रीति से और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
19. पुस्तकालयाध्यक्ष-पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति ऐसी रीति से और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
20. अन्य अधिकारी-विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति, उपलब्धियां, उनकी शक्तियां और कर्तव्य, परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे ।
21. शैक्षणिक कर्मचारिवृंद आदि के विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां-शैक्षणिक कर्मचारिवृंद और जहां लागू हो, वहां उनके आश्रितों या कुटुंब के सदस्य, ऐसे विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का उपभोग करेंगे, जो केन्द्रीय सरकार, विश्वविद्यालय के साथ करार करने के पश्चात्, संयुक्त राष्ट्र (विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां) अधिनियम, 1947 (1947 का 46) की धारा 3 के अधीन अधिसूचित करे ।
22. विश्वविद्यालय के प्राधिकारी-विश्वविद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकारी होंगेः-
(1) शासी बोर्ड;
(2) विद्या परिषद्;
(3) अध्ययन बोर्ड;
(4) वित्त समिति; और
(5) ऐसे अन्य प्राधिकारी, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकारी घोषित किए जाएं ।
23. विद्या परिषद्-(1) विद्या परिषद्, विश्वविद्यालय की प्रधान शैक्षणिक निकाय होगी और इस अधिनियम के उपबंधों, परिनियमों और अध्यादेशों के अधीन रहते हुए, विश्वविद्यालय के भीतर विद्या, शिक्षा, शिक्षण, मूल्यांकन और परीक्षा के मानकों को बनाए रखने का नियंत्रण और साधारण विनियमन करेगी और उसके लिए उत्तरदायी होगी तथा ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगी, जो उसको परिनियमों द्वारा प्रदत्त या अधिरोपित किए जाएं ।
(2) विद्या परिषद् का गठन और उसके सदस्यों की पदावधि परिनियमों द्वारा विहित की जाएगी ।
24. अध्ययन केन्द्र-(1) उतनी संख्या में अध्ययन केन्द्र होंगे, जो विश्वविद्यालय, समय-समय पर, अवधारित करे ।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, विश्वविद्यालय में निम्नलिखित विद्यापीठ होंगे, अर्थात्ः-
(i) बौद्ध अध्ययन, दर्शन और तुलनात्मक धर्म;
(ii) ऐतिहासिक अध्ययन;
(iii) अंतरराष्ट्रीय संबंध और शान्ति अध्ययन;
(iv) लोक नीति के संबंध में कारबार प्रबंध और विकास अध्ययन;
(v) भाषाएं और साहित्य;
(vi) पारिस्थितिकी और पर्यावरण अध्ययन;
(vii) कोई अन्य अध्ययन जो परिनियमों द्वारा विहित किया जाए ।
(3) प्रत्येक अध्ययन केन्द्र का एक बोर्ड होगा, जो ऐसे सदस्यों से, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं, मिलकर बनेगा ।
(4) अध्ययन केंद्र के बोर्डों की शक्तियां और कृत्य, परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे ।
25. वित्त समिति-वित्त समिति का गठन, उसकी शक्तियां और कृत्य, परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे ।
26. अन्य प्राधिकारी-ऐसे अन्य प्राधिकारियों का, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों के रूप में घोषित किए जाएं, गठन, उनकी शक्तियां और कृत्य, परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे ।
27. परिनियम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
(क) कुलाधिपति की नियुक्ति की रीति;
(ख) कुलपति की नियुक्ति की रीति, उसकी नियुक्ति की अवधि, उपलब्धियां और उसकी सेवा की अन्य शर्तें तथा वे शक्तियां और कृत्य जिनका उसके द्वारा प्रयोग और पालन किया जा सकेगा;
(ग) कुलसचिव, वित्त अधिकारी, परीक्षा नियंत्रक और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति, उनकी सेवा के निबंधन और शर्तें तथा वे शक्तियां और कृत्य जिनका ऐसे अधिकारियों द्वारा प्रयोग और पालन किया जा सकेगा;
(घ) विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकारी, ऐसे प्राधिकारियों के सदस्यों की पदावधि और ऐसी शक्तियां और कृत्य जिनका ऐसे प्राधिकारियों द्वारा प्रयोग और पालन किया जा सकेगा;
(ङ) विश्वविद्यालय के शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, उनकी उपलब्धियां और सेवा की अन्य शर्तेंः
परन्तु शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवा के निबंधनों और शर्तों में उनके लिए अलाभप्रद परिवर्तन नहीं किया जाएगा;
(च) पेंशन या भविष्य निधि का गठन और विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के फायदे के लिए बीमा स्कीम की स्थापना;
(छ) विश्वविद्यालयों के कर्मचारियों की सेवा में ज्येष्ठता को शासित करने वाले सिद्धांत;
(ज) माध्यस्थम् अधिकरण के कार्य का विनियमन करने के लिए प्रक्रिया;
(झ) विश्वविद्यालय के कर्मचारियों या छात्रों और विश्वविद्यालय के बीच विवादों के समझौते के लिए प्रक्रियाः
(ञ) विश्वविद्यालय में मानकों का समन्वयन और अवधारण;
(ट) अध्ययन केन्द्र, उसके बोर्ड के सदस्य और ऐसे बोर्ड की शक्ति और कृत्य;
(ठ) ऐसे अन्य सभी विषय, जो इस अधिनियम द्वारा उपबंधित किए जाने हैं या परिनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
28. परिनियम कैसे बनाए जाएंगे-(1) विश्वविद्यालय के कामकाज के लिए प्रथम परिनियम, इस अधिनियम के प्रारंभ के छह मास के भीतर कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से शासी बोर्ड द्वारा बनाए जाएंगे ।
(2) शासी बोर्ड, समय-समय पर, नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या उपधारा (1) में निर्दिष्ट परिनियमों का संशोधन या निरसन कर सकेगाः
परन्तु शासी बोर्ड, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी की प्रास्थिति, शक्तियों या गठन पर प्रभाव डालने वाला कोई परिनियम तब तक नहीं बनाएगा, उनका संशोधन या निरसन नहीं करेगा जब तक उस प्राधिकारी को प्रस्थापित परिवर्तनों पर अपनी राय लिखित रूप में अभिव्यक्त करने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो और इस प्रकार अभिव्यक्त किसी राय पर शासी बोर्ड द्वारा विचार न किया गया हो ।
(3) प्रत्येक नए परिनियम या परिनियमों में परिवर्धन या उसके किसी संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष की अनुमति अपेक्षित होगी, जो उस पर अनुमति दे सकेगा या अनुमति विधारित कर सकेगा या उसके द्वारा किए गए संप्रेक्षणों को, यदि कोई हों, ध्यान में रखते हुए उसे शासी बोर्ड को पुनः विचार के लिए वापस भेज सकेगा ।
(4) किसी नए परिनियम या विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला कोई परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा, जब तक कुलाध्यक्ष द्वारा उसकी अनुमति न दे दी गई हो ।
(5) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात के होते हुए भी, कुलाध्यक्ष उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में परिनियमों में उपबंध करने के लिए विश्वविद्यालय को निदेश दे सकेगा और यदि शासी बोर्ड किसी ऐसे निदेश को, उसकी प्राप्ति के साठ दिन के भीतर, कार्यान्वित करने में असमर्थ रहता है तो कुलाध्यक्ष शासी बोर्ड द्वारा ऐसे निदेशों का अनुपालन करने में उसकी असमर्थता के लिए संसूचित कारणों पर, यदि कोई हों, विचार करने के पश्चात् यथोचित रूप से परिनियमों को बना सकेगा या उन्हें संशोधित कर सकेगा ।
29. अध्यादेश-(1) इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
(क) छात्रों का प्रवेश, अध्ययन के पाठ्यक्रम और उनके लिए फीस, उपाधियों, डिप्लोमाओं, प्रमाणपत्रों और अन्य पाठ्यक्रमों से संबंधित अर्हताएं, अध्येतावृत्तियों, पुरस्कारों और इसी प्रकार अन्य को प्रदान करने के लिए शर्तें;
(ख) परीक्षाओं का संचालन, जिसके अंतर्गत परीक्षकों के निबंधन और शर्तें तथा नियुक्ति की रीति भी हैं;
(ग) ऐसा कोई अन्य विषय, जो इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।
(2) प्रथम अध्यादेश, शासी बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से, कुलपति द्वारा बनाए जाएंगे, और इस प्रकार बनाए गए अध्यादेश, परिनियमों द्वारा विहित रीति से, शासी बोर्ड द्वारा किसी भी समय संशोधित, निरसित या परिवर्धित किए जा सकेंगे ।
30. विनियम-विश्वविद्यालय के प्राधिकारी, स्वयं अपने और अपने द्वारा नियुक्त समितियों के, यदि कोई हों, जिनका इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उपबंध नहीं किया गया है, कार्य संचालन के लिए परिनियमों द्वारा विहित रीति से ऐसे विनियम बना सकेंगे, जो इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों से संगत हों ।
31. वार्षिक रिपोर्ट-(1) विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट, शासी बोर्ड के निदेशों के अधीन तैयार की जाएगी, जिसमें अन्य विषयों के साथ-साथ, विश्वविद्यालय द्वारा अपने उद्देश्यों को पूरा करने के संबंध में किए गए उपाय होंगे ।
(2) इस प्रकार तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट ऐसी तारीख को या उससे पूर्व, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, कुलाध्यक्ष को भेजी जाएगी ।
(3) इस प्रकार तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट की एक प्रति सदस्य राज्यों को भी भेजी जाएगी और विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाएगी ।
32. वार्षिक लेखे आदि-(1) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे और तुलन-पत्र, शासी बोर्ड के निदेशों के अधीन तैयार किए जाएंगे और प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार और पन्द्रह मास से अनधिक के अंतरालों पर, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा उनकी संपरीक्षा की जाएगी ।
(2) संपरीक्षा रिपोर्ट सहित लेखाओं की एक प्रति शासी बोर्ड के संप्रेक्षणों के साथ, यदि कोई हों, कुलाध्यक्ष को प्रस्तुत की जाएगी ।
(3) वार्षिक लेखाओं पर कुलाध्यक्ष द्वारा किए गए किन्हीं संप्रेक्षणों को शासी बोर्ड के ध्यान में लाया जाएगा और ऐसे संप्रेक्षणों पर शासी बोर्ड के विचार, यदि कोई हों, कुलाध्यक्ष को प्रस्तुत किए जाएंगे ।
(4) वार्षिक रिपोर्ट और वार्षिक लेखाओं की एक प्रति, कुलाध्यक्ष को यथा प्रस्तुत संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ केन्द्रीय सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी जो उसे, यथाशीघ्र, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
(5) संपरीक्षित वार्षिक लेखे, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखे जाने के पश्चात्, भारत के राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे ।
(6) संपरीक्षित वार्षिक लेखाओं की एक प्रति सदस्य राज्यों को भी प्रस्तुत की जाएगी ।
33. कर्मचारियों की सेवा की शर्तें-(1) विश्वविद्यालय का प्रत्येक कर्मचारी, लिखित संविदा के अधीन नियुक्त किया जाएगा, जो विश्वविद्यालय के पास रखी जाएगी और उसकी एक प्रति संबंधित कर्मचारी को दी जाएगी ।
(2) विश्वविद्यालय और किसी कर्मचारी के बीच संविदा से उत्पन्न होने वाला कोई विवाद, कर्मचारी के अनुरोध पर, माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा, जो शासी बोर्ड द्वारा नियुक्त एक सदस्य, संबद्ध कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य और कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक से मिलकर बनेगा ।
(3) अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और अधिकरण द्वारा विनिश्चित मामलों के संबंध में किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद नहीं होगा ।
(4) उपधारा (2) के अधीन कर्मचारी द्वारा किया गया प्रत्येक ऐसा अनुरोध माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996(1996 का 26) के अर्थ के भीतर इस धारा के निबंधनों पर माध्यस्थम् के लिए निवेदन समझा जाएगा ।
(5) अधिकरण के कार्य को विनियमित करने की प्रक्रिया परिनियमों द्वारा विहित की जाएगी ।
34. छात्रों के विरुद्ध अनुशासनिक मामलों में अपील और माध्यस्थम् की प्रक्रिया-(1) कोई छात्र या परीक्षार्थी, जिसका नाम विश्वविद्यालय की नामावली से, यथास्थिति, कुलपति, अनुशासन समिति या परीक्षा समिति के आदेशों या संकल्प द्वारा हटाया गया है और जिसे विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में बैठने से एक वर्ष से अधिक के लिए विवर्जित किया गया है, उसके द्वारा ऐसे आदेशों की या ऐसे संकल्प की प्रति की प्राप्ति की तारीख से दस दिन के भीतर, शासी बोर्ड को अपील कर सकेगा और शासी बोर्ड, यथास्थिति, कुलपति या समिति के विनिश्चय को पुष्ट, उपांतरित कर सकेगा या उलट सकेगा ।
(2) विश्वविद्यालय द्वारा किसी छात्र के विरुद्ध की गई किसी अनुशासनिक कार्रवाई से उत्पन्न होने वाला कोई विवाद, ऐसे छात्र के अनुरोध पर, माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देशित किया जाएगा और धारा 33 की उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंध, इस उपधारा के अधीन किए गए निर्देश को यथाशक्य लागू होंगे ।
35. अपील का अधिकार-विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे या उसके विशेषाधिकार प्राप्त अध्ययन केन्द्र या केन्द्र या संस्था के प्रत्येक कर्मचारी या छात्र को, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या प्राधिकारी अथवा किसी अध्ययन केन्द्र या केन्द्र या संस्था के प्राचार्य या प्रबंधतंत्र के विनिश्चय के विरुद्ध, ऐसे समय के भीतर, जो परिनियमों द्वारा विहित किया जाए, शासी बोर्ड को अपील करने का अधिकार होगा और तदुपरान्त शासी बोर्ड उस विनिश्चय को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट, उपांतरित कर सकेगा या उलट सकेगा ।
36. भविष्य-निधि और पेंशन निधि-विश्वविद्यालय अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी भविष्य-निधि या पेंशन निधि का गठन करेगा या ऐसी बीमा स्कीमों की व्यवस्था करेगा, जो वह ठीक समझे ।
37. प्राधिकारियों और निकायों के गठन के बारे में विवाद-यदि इस बारे में कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय के सदस्य के रूप में सम्यक् रूप से नामनिर्दिष्ट या नियुक्त किया गया है या उसका सदस्य होने का हकदार है तो वह मामला कुलाध्यक्ष को निर्दिष्ट किया जाएगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।
38. आकस्मिक रिक्तियों का भरा जाना-विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय के सदस्यों में (पदेन सदस्यों से भिन्न) सभी आकस्मिक रिक्तियां, यथाशीघ्र सुविधानुसार, ऐसे व्यक्ति या निकाय द्वारा भरी जाएंगी, जिसने उन सदस्यों को, जिसके स्थान रिक्त हुए हैं, नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित किया था और आकस्मिक रिक्ति में इस प्रकार नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित कोई व्यक्ति, उस शेष अवधि के लिए ऐसे प्राधिकरण या निकाय का सदस्य होगा, जिस तक वह व्यक्ति, जिसका स्थान वह भरता है, सदस्य रहता ।
39. प्राधिकारियों या निकायों की कार्यवाहियों का रिक्तियों के कारण अविधिमान्य न होना-विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि उसके सदस्यों में कोई रिक्ति या रिक्तियां विद्यमान हैं ।
40. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों के किसी उपबंध के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाहियां विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होंगी ।
41. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, भारत के राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत होंः
परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
42. परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेश या विनियम भारत के राजपत्र और विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाएगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेश या विनियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस परिनियम, अध्यादेश या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हों जाएं तो, तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह परिनियम, अध्यादेश या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु परिनियम, अध्यादेश या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
43. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम और परिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, -
(क) प्रथम कुलसचिव और प्रथम वित्त अधिकारी, शासी बोर्ड द्वारा नियुक्त किए जाएंगे और उक्त प्रत्येक अधिकारी तीन वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा;
(ख) प्रथम अध्ययन केन्द्र के बोर्ड में ग्यारह से अनधिक सदस्य होंगे, जो शासी बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और वे तीन वर्ष की अवधि तक पद धारण करेंगे;
(ग) प्रथम विद्या परिषद् में उन्नीस से अनधिक सदस्य होंगे, जो शासी बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और वे तीन वर्ष की अवधि तक, पद धारण करेंगेः
परन्तु यदि उपरोक्त पदों या प्राधिकारियों में कोई रिक्ति होती है तो उसे शासी बोर्ड द्वारा, यथास्थिति, नियुक्ति या नामनिर्देशन द्वारा भरा जाएगा और इस प्रकार नियुक्त या नामनिर्दिष्ट व्यक्ति तब तक पद धारण करेगा, जब तक वह अधिकारी या सदस्य, जिसके स्थान पर उसकी नियुक्ति या नामनिर्देशन किया गया है, पद धारण करता, यदि ऐसी रिक्ति नहीं हुई होती ।
44. नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम का निरसन-(1) नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2007 (2007 का बिहार अधिनियम 18) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, -
(क) नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2007 (2007 का बिहार अधिनियम 18) के अधीन की गई सभी नियुक्तियां, जारी किए गए आदेश, प्रदत्त की गई उपाधियां और अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां, प्रदान किए गए डिप्लोमा और प्रमाणपत्र, अनुदत्त विशेषाधिकार या की गई अन्य बातें इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन क्रमशः की गई, जारी किए गए, प्रदत्त की गई, प्रदान किए गए, अनुदत्त या की गई समझी जाएंगी और इस अधिनियम या परिनियम द्वारा यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय तब तक प्रवृत्त बने रहेंगे, जब तक कि वे इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन किए गए किसी आदेश द्वारा अधिक्रांत नहीं कर दिए जाते हैं;
(ख) शिक्षकों की नियुक्ति या प्रोन्नति के लिए चयन समितियों की ऐसी सभी कार्यवाहियां जो, इस अधिनियम के प्रारंभ से पहले हो चुकी थीं और ऐसी चयन समितियों की सिफारिशों के संबंध में, शासी निकाय की सभी कार्रवाइयां, जहां इस अधिनियम के प्रारंभ से पहले, उनके आधार पर नियुक्ति के कोई आदेश पारित नहीं किए गए थे, इस बात के होते हुए भी कि चयन के लिए प्रक्रिया का इस अधिनियम द्वारा उपांतरण किया जा चुका है, विधिमान्य समझी जाएंगी, किंतु ऐसे लंबित चयनों के संबंध में, आगे की कार्यवाही, इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार की जाएगी और उस प्रक्रम से जारी रहेगी, जहां पर वे ऐसे प्रारंभ के ठीक पहले थीं, सिवाय तब के, यदि संबद्ध प्राधिकारी, कुलाध्यक्ष के अनुमोदन से तत्प्रतिकूल विनिश्चय लें ।
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