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प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 ( Administrative Tribunals Act, 1985 )


 

प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985

(1985 का अधिनियम संख्यांक 13)

[27 फरवरी, 1985]

संघ या किसी राज्य के अथवा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के

नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अथवा [संविधान के

अनुच्छेद 323के अनुसरण में सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन

किसी निगम या सोसाइटी] के कार्यकलापों से सम्बन्धित लोक सेवाओं

और पदों के लिए भर्ती तथा उन पर नियुक्त व्यक्तियों की सेवा

की शर्तों के सम्बन्ध में विवादों और परिवादों के प्रशासनिक

अधिकरणों द्वारा न्यायनिर्णयन या विचारण का तथा

उससे सम्बन्धित या उसके आनुषंगिक

विषयों का उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 है ।

                (2) इसका विस्तार, -

                                (क) जहां तक इसका सम्बन्ध केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण से है वहां तक, सम्पूर्ण भारत पर है;

                (ख) जहां तक इसका सम्बन्ध राज्यों के लिए प्रशासनिक अधिकरणों से है वहां तक, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) इस अधिनियम के उपबन्ध, जहां तक उनका सम्बन्ध केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण से है वहां तक, ऐसी तारीख को   प्रवृत्त होंगे, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

(4) इस अधिनियम के उपबन्ध, जहां तक उनका सम्बन्ध किसी राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण से है वहां तक, किसी राज्य में ऐसी तारीख को प्रवृत्त होंगे, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. कुछ व्यक्तियों को अधिनियम का लागू होना-इस अधिनियम के उपबन्ध निम्नलिखित को लागू नहीं होंगे, अर्थात्-

                (क) नौसेना, सेना या वायु सेना अथवा संघ के किन्हीं अन्य सशस्त्र बलों का कोई सदस्य;

                 ।                                             ।                                              ।                                              ।                             

                (ग) उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय [या उसके अधीनस्थ न्यायालयों] का कोई अधिकारी या सेवक;

                (घ) संसद् के किसी सदन के सचिवीय कर्मचारिवृन्द में अथवा किसी राज्य विधान-मण्डल या उसके किसी सदन के अथवा किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की दशा में जिसमें विधान-मण्डल है, उस विधान-मण्डल के सचिवीय कर्मचारिवृन्द में नियुक्त कोई व्यक्ति ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

 [(क) प्रशासनिक सदस्य" से अभिप्रेत है अधिकरण का वह सदस्य जो खंड (झ) के अर्थ में न्यायिक सदस्य नहीं है ;]

 

 [(कक)] किसी राज्य के सम्बन्ध में, प्रशासनिक अधिकरण" से अभिप्रेत है, यथास्थिति, उस राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण या उस राज्य और किसी अन्य राज्य या राज्यों के लिए संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण ; 

(ख) आवेदन" से धारा 19 के अधीन किया गया आवेदन अभिप्रेत है ;

(ग) किसी अधिकरण के सम्बन्ध में, नियत दिन" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जिससे धारा 4 के अधीन, अधिसूचना द्वारा, उसकी स्थापना की जाती है ;

(घ) समुचित सरकार" से अभिप्रेत है,-

                                (i) केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण या किसी संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण के सम्बन्ध में, केन्द्रीय सरकार ;

                                (ii) किसी राज्य प्रशासनिक अधिकरण के सम्बन्ध में, राज्य सरकार ;

(ङ) न्यायपीठ" से किसी अधिकरण का न्यायपीठ अभिप्रेत है ;

(च) केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रशासनिक अधिकरण अभिप्रेत है ;

(छ) अध्यक्ष" से किसी अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;

(ज) संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण" से दो या अधिक राज्यों के लिए धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन स्थापित कोई प्रशासनिक अधिकरण अभिप्रेत है ;

 [(झ) न्यायिक सदस्य" से इस अधिनियम के अधीन उस रूप में नियुक्त अधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत ऐसा  [अध्यक्ष] है जिसके पास धारा 6 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट कोई अर्हता है ;

(झक) सदस्य" से अधिकरण का कोई सदस्य अभिप्रेत है (चाहे वह न्यायिक हो या प्रशासनिक) और इसके अंतर्गत  । । । है ;]

(ञ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(ट) पद" से भारत के भीतर या बाहर कोई पद अभिप्रेत है ;

(ठ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(ड) राष्ट्रपति" से भारत का राष्ट्रपति अभिप्रेत है ;

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                             

(ण) नियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाया गया नियम अभिप्रेत है ; 

(त) सेवा" से भारत के भीतर या बाहर सेवा अभिप्रेत है ;

(थ) किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में, सेवा सम्बन्धी विषय" से अभिप्रेत है, यथास्थिति, संघ या किसी राज्य के अथवा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अथवा सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन किसी निगम  [या सोसाइटी] के कार्यकलापों से सम्बन्धित उसकी सेवा की शर्तों के सम्बन्ध में ऐसे सभी विषय जो निम्नलिखित के बारे में हैं,-

                (i) पारिश्रमिक (जिसके अन्तर्गत भत्ते हैं), पेंशन और अन्य सेवा-निवृत्ति फायदे ; 

                (ii) सेवाधृत्ति, जिसके अन्तर्गत पुष्टि, ज्येष्ठता, प्रोन्नति, प्रतिवर्तन, समय पूर्व सेवा-निवृत्ति और अधिवार्षिकी है ;

(iii) किसी प्रकार की छुट्टी ;

(iv) अनुशासनिक विषय ; या

(v) किसी प्रकार का कोई अन्य विषय ;

(द) किसी विषय के सम्बन्ध में, शिकायतों को दूर करने के बारे में सेवा सम्बन्धी नियम" से अभिप्रेत हैं ऐसे नियम, विनियम, आदेश अथवा अन्य लिखत या ठहराव जो ऐसे विषयों से सम्बन्धित किन्हीं शिकायतों के, इस अधिनियम के अधीन दूर किए जाने से अन्यथा, दूर किए जाने के बारे में तत्समय प्रवृत्त हैं ;

 [(दद) सोसाइटी" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन या किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई सोसाइटी अभिप्रेत है ;]

(ध) उच्चतम न्यायालय" से भारत का उच्चतम न्यायालय अभिप्रेत है ;

(न) अधिकरण" से केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण या राज्य प्रशासनिक अधिकरण या संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण अभिप्रेत है ;

 [(प) उपाध्यक्ष" से ऐसा सदस्य अभिप्रेत है जिसे समुचित सरकार द्वारा ऐसे प्रत्येक स्थान पर जहां अधिकरण की न्यायपीठें स्थापित की गई हैं, प्रशासनिक कृत्यों का पालन करने के लिए प्राधिकृत किया गया है ।]

स्पष्टीकरण-किसी ऐसे अधिकरण की दशा में जिसमें दो या अधिक उपाध्यक्ष हैं, इस अधिनियम में उपाध्यक्ष के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसे प्रत्येक उपाध्यक्ष के प्रति निर्देश है ।

अध्याय 2

अधिकरणों और उनके न्यायपीठों की स्थापना

4. प्रशासनिक अधिकरणों की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए अधिसूचना द्वारा, एक प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना करेगी जिसका नाम केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण होगा ।

                (2) केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार से इस निमित्त कोई अनुरोध प्राप्त होने पर, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उस राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए अधिसूचना द्वारा,  उस राज्य के लिए एक प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना कर सकेगी । जिसका नाम---------(राज्य का नाम) प्रशासनिक अधिकरण होगा ।

                (3) दो या अधिक राज्य, उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी और इस बात के होते हुए भी ऐसे किन्हीं या सभी राज्यों में उस उपधारा के अधीन अधिकरण स्थापित किए गए हैं, यह करार कर सकेंगे कि एक ही प्रशासनिक अधिकरण, उस करार में भाग लेने वाले प्रत्येक राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण होगा और यदि उस करार का केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन कर दिया जाता है और वह भारत के राजपत्र में और ऐसे प्रत्येक राज्य के राजपत्र में प्रकाशित कर दिया जाता है तो केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उन राज्यों के लिए प्रशासनिक अधिकरणों को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए अधिसूचना द्वारा, एक संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना कर सकेगी ।

                (4) उपधारा (3) के अधीन किसी करार में संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण के नाम के, उस रीति के, जिससे भाग लेने वाले राज्य संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण के  [अध्यक्ष और अन्य सदस्यों] के चयन में सहयुक्त किए जा सकेंगे, ऐसे स्थानों के, जिन पर अधिकरण की न्यायपीठ या न्यायपीठें अधिविष्ठ होंगी और संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण के संबंध में व्यय के भाग लेने वाले राज्यों के बीच प्रभाजन के बारे में उपबन्ध होंगे और उसमें ऐसे अन्य अनुपूरक, आनुषंगिक और पारिणामिक उपबन्ध भी हो सकेंगे जो इस अधिनियम से असंगत नहीं हैं और जो करार को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या समीचीन समझे जाएं ।

                 [(5) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों या धारा 5 की उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केंद्रीय सरकार-

(क) किसी राज्य सरकार की सहमति से, उपधारा (2) के अधीन उस राज्य के लिए स्थापित राज्य प्रशासनिक अधिकरण के न्यायपीठ या न्यायपीठों के सभी या किन्हीं सदस्यों को, अधिसूचना द्वारा, उस राज्य के संबंध में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के न्यायपीठ या न्यायपीठों के सदस्यों के रूप में अभिहित कर सकेगी और वे इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेंगे ; 

(ख) किसी राज्य सरकार से इस निमित्त कोई अनुरोध प्राप्त होने पर, उस राज्य में कार्य कर रहे केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के न्यायपीठ या न्यायपीठों के सभी या किन्हीं सदस्यों को, अधिसूचना द्वारा, उस राज्य के लिए राज्य प्रशासनिक अधिकरण के न्यायपीठ या न्यायपीठों के सदस्यों के रूप में अभिहित कर सकेगी और वे उस राज्य के लिए इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रशासनिक अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेंगे, 

और ऐसे अभिहित किए जाने पर, यथास्थिति, राज्य प्रशासनिक अधिकरण या न्यायपीठ या न्यायपीठें अथवा केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के न्यायपीठ या न्यायपीठें, सभी बातों में संविधान के अनुच्छेद 323क और इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन स्थापित केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण या उस राज्य के लिए राज्य प्रशासनिक अधिकरण समझे जांएगे ।

(6) उपधारा (5) के अधीन प्रत्येक अधिसूचना में संबंधित राज्य और केंदीय सरकार के बीच केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और राज्य प्रशासनिक अधिकरण के सम्मिलित सदस्यों के संबंध में व्यय के प्रभाजन के लिए भी उपबंध किया जाएगा और ऐसे अन्य आनुषंगिक और परिणामिक उपबंध किए जाएंगे, जो इस अधिनियम से असंगत नहीं हैं और जो आवश्यक या समीचीन समझे जाएं ।]

5. अधिकरणों और उनके न्यायपीठों की संरचना-(1) प्रत्येक अधिकरण [एक अध्यक्ष और उतने न्यायिक तथा प्रशासनिक सदस्यों से] मिलकर बनेगा जितने समुचित सरकार ठीक समझे और इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसके न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ।

 [(2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई न्यायपीठ एक न्यायिक सदस्य और एक प्रशासनिक सदस्य से मिलकर बनेगा ।]

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

(4) उपधारा (1) 3। । । में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष,-

2[(क) ऐसे न्यायपीठ के, जिसमें वह नियुक्त किया जाता है, न्यायिक सदस्य या प्रशासनिक सदस्य के कृत्यों का निर्वहन करने के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायपीठ के, यथास्थिति, न्यायिक सदस्य या प्रशासनिक सदस्य के कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा;]

                (ख) 1[किसी सदस्य का]] एक न्यायपीठ से दूसरी न्यायपीठ को अंतरण कर सकेगा ;

                2[(ग) एक न्यायपीठ में नियुक्त 1[न्यायिक सदस्य] या प्रशासनिक सदस्य को दूसरे न्यायपीठ के, 1[यथास्थिति, न्यायिक सदस्य या प्रशासनिक सदस्य] के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगा ; और]

                (घ) यह सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि किसी मामले या मामलों का, अन्तर्ग्रस्त प्रश्नों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, उसकी राय में या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए निमयों के अधीन, 2[दो से अधिक] सदस्यों से गठित किसी न्यायपीठ द्वारा विनिश्चय किया जाना अपेक्षित है, ऐसे साधारण या विशेष आदेश जारी कर सकेगा जो वह   ठीक समझे :

 [परंतु इस खंड के अनुसरण में गठित प्रत्येक न्यायपीठ में कम से कम एक न्यायिक सदस्य और एक प्रशासनिक सदस्य होगा ।]

3।                            ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(6) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष के लिए या अध्यक्ष द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के लिए यह सक्षम होगा कि वह एकल सदस्य से बने किसी 2[न्यायपीठ] के रूप में कार्य करे और ऐसे वर्गों के मामलों से सम्बन्धित ऐसे वर्गों के मामले या ऐसे विषयों की बाबत जिन्हें अध्यक्ष, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करे :

परन्तु यदि ऐसे किसी मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर, अध्यक्ष या ऐसे सदस्य को यह प्रतीत होता है कि ऐसा मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है कि उसकी सुनवाई 2[दो सदस्यों से] मिलकर बने किसी न्यायपीठ द्वारा की जानी चाहिए तो ऐसा मामला या विषय, यथास्थिति, अध्यक्ष द्वारा अन्तरित किया जा सकेगा या ऐसे न्यायपीठ को, जो अध्यक्ष ठीक समझे, अन्तरित किए जाने के लिए उसको निर्देशित किया जा सकेगा ।

2[(7) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण के न्यायपीठ साधारणतया नई दिल्ली (जिसका नाम प्रधान न्यायपीठ होगा), इलाहाबाद, कलकत्ता, मद्रास, नई मुंबई और ऐसे अन्य स्थानों पर अधिविष्ठ होंगे जिन्हें केन्द्रीय सराकर, अधिसूचना द्वारा, निर्दिष्ट करे ।

(8) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे स्थान, जिन पर किसी राज्य प्रशासनिक अधिकरण का प्रधान न्यायपीठ और अन्य न्यायपीठ साधारणतया अधिविष्ट होंगे, वे होंगे, जिन्हें राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।]

 [6. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति, अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह किसी उच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश है या रहा है :

परन्तु इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब ऐसा व्यक्ति उपाध्यक्ष का पद कम से कम दो वर्ष की अवधि तक धारण कर चुका है ।

(2) कोई व्यक्ति, -

(क) प्रशासनिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह कम से कम दो वर्ष तक भारत सरकार के सचिव का पद या केंद्रीय या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम दो वर्ष तक ऐसा कोई अन्य पद जिसका वेतनमान भारत सरकार के सचिव के वेतनमान से कम नहीं है, अथवा कम से कम पांच वर्ष तक भारत सरकार के अपर सचिव का पद या केंद्रीय या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम पांच वर्ष की अवधि तक ऐसा कोई अन्य पद जिसका वेतनमान  भारत सरकार के अपर सचिव के वेतनमान से कम नहीं है, धारण कर चुका है :

परंतु अखिल भारतीय सेवाओं के ऐसे अधिकारियों के बारे में, जो किसी निम्नतर पद पर केंद्रीय सरकार की प्रतिनियुक्ति पर थे या हैं, यह समझा जाएगा कि वे, यथास्थिति, सचिव या अपर सचिव का पद उस तारीख से धारण किए हैं जिसको ऐसे अधिकारियों को, यथास्थिति, सचिव या अपर सचिव के स्तर की प्रोफार्मा प्रोन्नति अथवा वास्तविक प्रोन्नति, इनमें से जो भी पूवर्तर हो, की गई थी और ऐसी तारीख के पश्चात् केंद्रीय सरकार की प्रतिनियुक्ति पर बिताई गई अवधि, इस खंड के प्रयोजनों के लिए अर्हक सेवा के लिए गणना में ली जाएगी ; 

(ख) न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या होने के लिए अर्हित है अथवा उसने कम से कम दो वर्ष तक विधि कार्य विभाग या विधायी विभाग में भारत सरकार के सचिव का जिसके अंतर्गत भारतीय विधि आयोग का सदस्य-सचिव भी है पद धारण किया है अथवा कम से कम पांच वर्ष की अवधि तक विधि कार्य विभाग और विधायी विभाग में भारत सरकार के अपर सचिव का पद धारण किया है ।

(3) केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य, राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्, नियुक्त किए जाएंगे ।

(4) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी राज्य सरकार के लिए प्रशासनिक अधिकरण का अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य, राष्ट्रपति द्वारा, संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात्, नियुक्त किए जाएंगे ।

(5) किसी संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण का अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य, उपधारा (3) के उपबंधों और भाग लेने वाली राज्य सरकारों के बीच किए गए करार के, जो मूल अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन प्रकाशित किया गया हो,  निबंधनों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति द्वारा, संबंधित राज्यों के राज्यपालों से परामर्श करने के पश्चात्, नियुक्त किया जाएगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, केंद्रीय या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई पद धारण करने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने केंद्रीय या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई ऐसा अन्य पद (जिसके अंतर्गत इस अधिनियम के अधीन कोई पद है) धारण किया है जिसका वेतनमान वही है या उससे उच्चतर है, जो प्रथम वर्णित पद का है ।]

7. कुछ परिस्थितियों में उपाध्यक्ष का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में, [सदस्यों में से ऐसा कोई एक सदस्य,] जिसे समुचित सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार नियुक्त नया अध्यक्ष अपना पद ग्रहण करता है ।

(2) जब अध्यक्ष अनुपस्थिति, बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब, यथास्थिति, उपाध्यक्ष या उपाध्यक्षों में से ऐसा कोई एक उपाध्यक्ष, जिसे समुचित सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है ।

 [8. पदावधि-(1) अध्यक्ष, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि तक उस हैसियत में पद धारण करेगा:

परंतु कोई अध्यक्ष, अड़सठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् उस हैसियत में पद धारण नहीं करेगा ।

(2) सदस्य, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की ऐसी अवधि तक, जो पांच वर्ष की एक और अवधि तक बढ़ाई जा सकेगी, उस हैसियत में पद धारण करेगा:

परंतु कोई सदस्य, पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् उस हैसियत में पद धारण नहीं करेगा ।

(3) अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा की शर्तें वही होंगी जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को लागू होती हैं ।]

9. त्यागपत्र और हटाया जाना-(1) अध्यक्ष । । । या अन्य सदस्य, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:

परन्तु अध्यक्ष, 1। । । या अन्य सदस्य जब तक कि उसे राष्ट्रपति द्वारा उससे पहले पद त्याग करने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाती है, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास का अवसान होने तक या उसके पदोत्तरवर्ती के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा अपना पद ग्रहण कर लेने तक या उसकी पदावधि का अवसान होने तक, इनमें से जो भी पूर्वतम हो, अपना पदधारण   करता रहेगा ।

(2) अध्यक्ष 1। । । या कोई अन्य सदस्य अपने पद से, साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर, उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा ऐसी जांच किए जाने के पश्चात् जिसमें ऐसे अध्यक्ष, 1। । । या अन्य सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दे दी गई है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तिक्त अवसर दे दिया गया है, राष्ट्रपति द्वारा किए गए आदेश से ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (2) में निर्दिष्ट अध्यक्ष, 1। । । या अन्य सदस्य के कदाचार या असमर्थता का अन्वेषण करने के लिए प्रक्रिया, नियमों द्वारा, विनियमित कर सकेगी ।

10. अध्यक्ष, और अन्य सदस्यों के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें-अध्यक्ष, 2। । । और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अन्तर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवा-निवृत्ति फायदे हैं) ऐसी होंगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं:

परन्तु अध्यक्ष, 2। । । या अन्य सदस्य के वेतन और भत्तों में और सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा:

 [परंतु यह और कि जहां कोई सेवारत सरकारी अधिकारी सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाता है वहां उसके बारे में यह समझा जाएगा कि वह, उस तारीख को, जिसको वह सदस्य का कार्य-भार ग्रहण करता है, उस सेवा से, जिसमें वह था, सेवानिवृत्त हो गया है किंतु उसके विकल्प पर, सदस्य के रूप में उसकी पश्चात्वर्ती सेवा की, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति फायदों के लिए उस सेवा में, जिसमें वह था, सेवानिवृत्ति के पश्चात् पुनःनियोजन के रूप में गणना की जाएगी ।]

 [10क. उपाध्यक्ष की सेवा के व्यावृत्ति निबंधन और शर्तें-प्रशासनिक अधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रारंभ से पूर्व नियुक्त अधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य अधिनियम के उपबंधों और उनके अधीन बनाए गए नियमों द्वारा ऐसे शासित होते रहेंगे मानो प्रशासनिक अधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2006 प्रवृत्त नहीं हुआ हो:

परन्तु, तथापि, प्रशासनिक अधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रवृत्त होने से पूर्व नियुक्त ऐसे अध्यक्ष और सदस्यों पर, उनकी पदावधि पूरी होने या, यथास्थिति, पैंसठ वर्ष या बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, यदि प्रशासनिक अधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा यथासंशोधित धारा 8 के निबंधनों के अनुसार पात्र हैं, इस शर्त के अधीन रहते हुए कि अध्यक्ष की कुल पदावधि, पांच वर्ष से अधिक और सदस्यों की कुल पदावधि दस वर्ष से अधिक नहीं होगी, ऐसी नियुक्तियों के लिए अधिकथित चयन प्रक्रिया के अनुसार नई नियुक्ति के लिए विचार किया जा सकेगा ।]

11. अध्यक्ष आदि द्वारा ऐसे अध्यक्ष आदि रहने पर पद धारण करने के संबंध में उपबंध-पद पर न रह जाने पर-

(क) केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण का अध्यक्ष भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी भी और नियोजन का पात्र नहीं होगा;

(ख) किसी राज्य प्रशासनिक अधिकरण या किसी संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण का अध्यक्ष, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण के अध्यक्ष या 5। । । किसी अन्य सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य प्रशासनिक अधिकरण या संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा;

 ।                                             ।                                              ।                                              ।  

(ङ) किसी अधिकरण का (अध्यक्ष 5। । । से भिन्न) कोई सदस्य, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे अधिकरण के अध्यक्ष 5। । । के रूप में अथवा किसी अन्य अधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा; 

(च) अध्यक्ष, । । । या अन्य सदस्य ऐसे अधिकरण के समक्ष, जिसका वह अध्यक्ष, । । । या अन्य सदस्य था, उपस्थित नहीं होगा, कार्य नहीं करेगा या अभिवचन नहीं करेगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन नियोजन के अन्तर्गत भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन अथवा सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन किसी निगम [या सोसाइटी] के अधीन नियोजन है ।

 [12. अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां-(1) अध्यक्ष, न्यायपीठों पर ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो समुचित सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन उसमें निहित की जाएं ।

(2) समुचित सरकार, एक या अधिक सदस्यों को, यथास्थिति, उपाध्यक्ष या उनके उपाध्यक्षों के रूप में पदाभिहित कर सकेगी और इस प्रकार पदाभिहित सदस्य अध्यक्ष की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेंगे, जो अध्यक्ष द्वारा साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा उसे प्रत्यायोजत किए जाएं ।]

13. अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) समुचित सरकार ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी जो किसी अधिकरण को उसके कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता करने के लिए अपेक्षित हो और अधिकरण के लिए ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की व्यवस्था करेगी जो वह ठीक समझे ।

 [(1क) अधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारी, अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।]

(2) किसी अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो समुचित सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं ।

अध्याय 3

अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार

14. केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-(1) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण, नियत दिन से ही, ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा जो उस तारीख से ठीक पहले (। । । उच्चतम न्यायालय के सिवाय) सभी न्यायालयों द्वारा निम्नलिखित के सम्बन्ध में प्रयोक्तव्य हैं, अर्थात्: -

(क) किसी अखिल भारतीय सेवा में या संघ की किसी सिविल सेवा में या संघ के अधीन किसी सिविल पद या रक्षा से संबंधित या रक्षा सेवाओं में के किसी पद पर, जो दोनों दशाओं में किसी सिविलियन द्वारा भरा गया कोई पद है, भर्ती और भर्ती से संबंधित विषय; 

(ख) सेवा संबंधी ऐसे सभी विषय, जो-

                                                (i) किसी अखिल भारतीय सेवा के किसी सदस्य से;

(ii) किसी ऐसे व्यक्ति से, [जो किसी अखिल भारतीय सेवा का सदस्य या खण्ड (ग) में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति नहीं है] जो संघ की किसी सिविल सेवा में या संघ के अधीन किसी सिविल पद पर नियुक्त किया जाता है; या

(iii) किसी ऐसे सिविलियन से, [जो किसी अखिल भारतीय सेवा का सदस्य या खण्ड (ग) में निर्दिष्ट व्यक्ति नहीं है] जो रक्षा सेवाओं में के या रक्षा से संबंधित किसी पद पर नियुक्त किया जाता है,

सम्बद्ध है और जो संघ के अथवा किसी राज्य के अथवा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अथवा सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन किसी निगम [या सोसाइटी] के कार्यकलापों से संबंधित ऐसे सदस्य, व्यक्ति या सिविलियन की सेवा के संबंध में हैं;

(ग) सेवा संबंधी ऐसे सभी विषय, जो संघ के कार्यकलापों से संबंधित सेवा के संबंध में किसी ऐसे व्यक्ति से सम्बद्ध हैं जो खण्ड (ख) के उपखंड (ii) या उपखण्ड (iii) में निर्दिष्ट किसी सेवा में या पद पर नियुक्त किया जाता है और जो ऐसा व्यक्ति है जिसकी सेवाएं ऐसी नियुक्ति के लिए किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या किसी निगम 5[या सोसाइटी] या अन्य निकाय द्वारा केन्द्रीय सरकार को सौंप दी गई हैं ।

 [स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस उपधारा में, संघ" के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत, संघ राज्यक्षेत्र के प्रति निर्देश भी हैं ।]

                (2) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, उपधारा (3) के उपबंध, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारियों को और सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन निगमों [या सोसाइटियों] को, जो किसी राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन कोई स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 2[या सोसाइटी] नहीं है, ऐसी तारीख से लागू कर सकेगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए:

                परन्तु यदि केन्द्रीय सराकर इस अधिनियम में परिकल्पित स्कीम के संक्रमण को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए ऐसा करना समीचीन समझती है तो स्थानीय या अन्य प्राधिकारियों या निगमों 2[या सोसाइटियों] के भिन्न-भिन्न वर्गों के या किसी वर्ग के अधीन भिन्न-भिन्न प्रवर्गों के संबंध में इस उपधारा के अधीन भिन्न-भिन्न तारीखें इस प्रकार विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी ।

                (3) इस अधिनियम में जैसा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित है उसके सिवाय, केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण ऐसी तारीख से ही जिससे इस उपधारा के उपबन्ध किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 2[या सोसाइटी] को लागू होते हैं, ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का भी प्रयोग करेगा जो उस तारीख से ठीक पहले (। । । उच्चतम न्यायालय के सिवाय) सभी न्यायालयों द्वारा निम्नलिखित के सम्बन्ध में प्रयोक्तव्य हैं, अर्थात्: -

(क) ऐसे स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 2[या सोसाइटी] के कार्यकलापों से सम्बन्धित किसी सेवा या पद पर भर्ती और भर्ती से संबंधित विषय; और

(ख) सेवा सम्बन्धी ऐसे सभी विषय, जो [उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट व्यक्ति से भिन्न] ऐसे किसी व्यक्ति के संबंध में हैं जो ऐसे स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 2[या सोसाइटी] के कार्यकलापों से सम्बन्धित किसी सेवा में या पद पर नियुक्त किया जाता है और जो ऐसे कार्यकलापों से सम्बन्धित ऐसे व्यक्ति की सेवा के संबंध में हैं ।

15. राज्य प्रशासनिक अधिकरणों की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-(1) इस अधिनियम में जैसा अभिव्यक्त रूप से उपबंधित है उसके सिवाय, किसी राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण नियत तारीख से ही ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा जो उस तारीख से ठीक पहले (। । । उच्चतम न्यायालय के सिवाय) सभी न्यायालयों द्वारा निम्नलिखित के संबंध में प्रयोक्तव्य हैं, अर्थात्: -

                                (क) राज्य की किसी सिविल सेवा में या राज्य के अधीन किसी सिविल पद पर भर्ती और भर्ती से संबंधित विषय;

                (ख) सेवा संबंधी ऐसे सभी विषय, जो किसी ऐसे व्यक्ति से, [जो इस उपधारा के खण्ड (ग) में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति या धारा 14 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट कोई सदस्य, व्यक्ति या सिविलियन नहीं हैं] जो राज्य की किसी सिविल सेवा में या राज्य के अधीन किसी सिविल पद पर नियुक्त किया जाता है, सम्बद्ध हैं और जो राज्य के अथवा राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अथवा उस राज्य के स्वामित्व या नियंत्रण में के किसी निगम [या सोसाइटी] के कार्यकलापों से संबंधित ऐसे व्यक्ति की सेवा के संबंध में हैं ;

(ग) सेवा संबंधी ऐसे सभी विषय, जो राज्य के कार्यकलापों से संबंधित सेवा के संबंध में किसी ऐसे व्यक्ति से सम्बद्ध हैं जो खण्ड (ख) में निर्दिष्ट किसी सेवा में या पद पर नियुक्त किया जाता है और जो ऐसा व्यक्ति है जिसकी सेवाएं ऐसी नियुक्ति के लिए किसी ऐसे स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 5[या सोसाइटी] या अन्य निकाय द्वारा, जो राज्य सरकार के नियंत्रण या स्वामित्व में है, राज्य सरकार को सौंप दी गई हैं ।

                (2) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, उपधारा (3) के उपबंध राज्य सरकार के नियंत्रण या स्वामित्व में के किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारियों या निगमों 5[या सोसाइटियों] को ऐसी तारीख से लागू कर सकेगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए:

                परन्तु यदि राज्य सरकार इस अधिनियम में परिकल्पित स्कीम के संक्रमण को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए ऐसा करना समीचीन समझती है तो स्थानीय या अन्य प्राधिकारियों या निगमों 5[या सोसाइटियों] के भिन्न-भिन्न वर्गों के या किसी वर्ग के अधीन भिन्न-भिन्न प्रवर्गों के संबंध में इस उपधारा के अधीन भिन्न-भिन्न तारीखें इस प्रकार विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी ।

                (3) इस अधिनियम में जैसा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित है उसके सिवाय, किसी राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण ऐसी तारीख से ही जिससे इस उपधारा के उपबंध किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 5[या सोसाइटी] को लागू होते हैं, ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का भी प्रयोग करेगा जो उस तारीख से ठीक पहले (4। । । उच्चतम न्यायालय के सिवाय) सभी न्यायालयों द्वारा निम्नलिखित के सम्बन्ध में प्रयोक्तव्य हैं, अर्थात्: -

(क) ऐसे स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 1[या सोसाइटी] के कार्यकलापों से सम्बन्धित किसी सेवा में या पद पर भर्ती और भर्ती से सम्बन्धित विषय; और

(ख) सेवा सम्बन्धी ऐसे सभी विषय, जो [इस धारा की उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट व्यक्ति या धारा 14   की उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट सदस्य, व्यक्ति या सिविलियन से भिन्न] किसी ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में हैं जो ऐसे स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम [या सोसाइटी] के कार्यकलापों से सम्बन्धित किसी सेवा में या पद पर नियुक्त किया जाता है और जो ऐसे कार्यकलापों से सम्बन्धित ऐसे व्यक्ति की सेवा के सम्बन्ध में हैं ।

                (4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है किसी राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का विस्तार किसी ऐसे विषय पर नहीं होगा या वह उसके सम्बन्ध में प्रयोक्तव्य नहीं होगा जिस पर केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार का विस्तार है या जिसके संबंध में वह प्रयोक्तव्य है ।

16. संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा जो ऐसे राज्यों के लिए प्रशासनिक अधिकरणों द्वारा प्रयोक्तव्य हैं ।

17. अवमान के लिए दंड देने की शक्ति-किसी अधिकरण को अपने अवमान की बाबत वही अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार होगा और वह उनका प्रयोग करेगा जो किसी उच्च न्यायालय को हैं और वह जिनका प्रयोग करता है और इस प्रयोजन के लिए, न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 (1971 का 70) के उपबंध निम्नलिखित उपान्तरणों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे, अर्थात्: -

(क) उनमें किसी उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत ऐसे अधिकरण के प्रति निर्देश भी है;

(ख) उक्त अधिनियम की धारा 15 में महाधिवक्ता के प्रति निर्देश का, -

(i) केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण के संबंध में, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह महान्यायवादी या महासालिसिटर या अपर महासालिसिटर के प्रति निर्देश है; और

(ii) किसी राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकरण अथवा दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण के संबंध में, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य के, या उन राज्यों में से, जिनके लिए ऐसा अधिकरण स्थापित किया गया है, किसी राज्य के महाधिवक्ता के प्रति निर्देश है ।

18. अधिकरणों और उनके न्यायपीठों के बीच कारबार का वितरण-(1) जहां किसी अधिकरण के [किन्हीं न्यायपीठों का]] गठन किया जाता है वहां समुचित सरकार, समय-समय पर, अधिसूचना द्वारा, अधिकरण के कारबार का वितरण, । । । न्यायपीठ या अतिरिक्त न्यायपीठों के बीच करने के बारे में उपबन्ध कर सकेगी और प्रत्येक न्यायपीठ द्वारा निपटाए जाने वाले मामले विनिर्दिष्ट   कर सकेगी । 

                (2) यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई विषय किसी अधिकरण के किसी न्यायपीठ को आबंटित कारबार के कार्यक्षेत्र के भीतर आता है या नहीं तो उस पर अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा ।

                स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि विषय" शब्द के अन्तर्गत धारा 19 के अधीन आवेदन है ।

अध्याय 4

प्रक्रिया

19. अधिकरणों को आवेदन-(1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई व्यक्ति, जो किसी अधिकरण की अधिकारिता के भीतर किसी मामले से संबंधित किसी आदेश से व्यथित है, अपनी शिकायत को दूर कराने के लिए अधिकरण को आवेदन कर सकेगा ।

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, आदेश" से ऐसा आदेश अभिप्रेत है जो-

(क) सरकार द्वारा अथवा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा अथवा सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में के किसी निगम [या सोसाइटी] द्वारा किया जाता है; या

(ख) सरकार के अथवा खंड (क) में निर्दिष्ट किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम [या सोसाइटी] के किसी अधिकारी, समिति या अन्य निकाय या अभिकरण द्वारा किया जाता है ।

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा और उसके साथ दस्तावेजें या अन्य साक्ष्य [और ऐसा आवेदन फाइल करने के संबंध में ऐसी फीस (यदि कोई हो, जो एक सौ रुपए से अधिक नहीं होगी) और, यथास्थित, आदेशिकाओं की तामील या निष्पादन के लिए ऐसी अन्य फीस होगी,] जो कन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए ।

                 1[(3) उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर, यदि अधिकरण का, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि आवेदन उसके द्वारा न्यायनिर्णयन या विचारण के लिए ठीक मामला है तो वह आवेदन ग्रहण कर सकेगा, किन्तु यदि अधिकरण का इस प्रकार समाधान नहीं होता है तो वह आवेदन को, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करने के पश्चात्, संक्षेपतः नामंजूर कर सकेगा ।]

                (4) जहां कोई आवेदन उपधारा (3) के अधीन किसी अधिकरण द्वारा ग्रहण कर लिया गया है वहां ऐसे आवेदन की विषयवस्तु से संबंधित शिकायतों को दूर कराने के बारे में सुसंगत सेवा नियमों के अधीन ऐसी प्रत्येक कार्यवाही का, जो आवेदन के ऐसे ग्रहण किए जाने के पूर्व लम्बित है, उपशमन हो जाएगा और जैसा अधिकरण निदिष्ट करे उसके सिवाय, ऐसे विषय के सम्बन्ध में इसके पश्चात् कोई अपील या अभ्यावेदन ऐसे नियमों के अधीन ग्रहण नहीं किया जाएगा ।

20. अन्य उपचारों के निःशेष हो जाने पर ही आवेदनों का ग्रहण किया जाना-(1) कोई अधिकरण सामान्यतया कोई आवेदन तब तक ग्रहण नहीं करेगा जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि आवेदक ने ऐसी शिकायतों को दूर कराने के बारे में सुसंगत सेवा नियमों के अधीन उसे उपलब्ध सभी उपचारों का उपयोग कर लिया है ।

                (2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के बारे में, -

(क) यदि ऐसी शिकायत के संबंध में ऐसे व्यक्ति द्वारा की गई अपील या किए गए अभ्यावेदन को नामंजूर करते हुए, कोई अन्तिम आदेश ऐसी सरकार या ऐसे अन्य प्राधिकारी या अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया है जो ऐसे नियमों के अधीन ऐसा आदेश पारित करने के लिए सक्षम है तो; या

(ख) जहां कोई अन्तिम आदेश, ऐसी सरकार या ऐसे अन्य प्राधिकारी या अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया है जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की गई अपील या किए गए अभ्यावेदन की बाबत ऐसा आदेश पारित करने के लिए सक्षम है वहां यदि ऐसी तारीख से, जिसको ऐसी अपील की गई थी या ऐसा अभ्यावेदन किया गया था, छह मास की अवधि समाप्त हो गई है तो,

यह समझा जाएगा कि उसने शिकायत दूर कराने के बारे में सुसंगत सेवा नियमों के अधीन उसे उपलब्ध सभी उपचारों का उपयोग कर लिया है ।

                (3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए, यदि राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या किसी अन्य कृत्यकारी को कोई अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के लिए कोई उपचार किसी आवेदक को उपलब्ध है तो वह उपचार उपलब्ध उपचारों में का उपचार तब तक नहीं समझा जाएगा जब तक आवेदक ऐसा अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का चयन नहीं करता है ।

21. परिसीमा-(1) अधिकरण-

(क) उस दशा में जिसमें ऐसा अन्तिम आदेश, जो धारा 20 की उपधारा (2) के खण्ड (क) में उल्लिखित है, शिकायत के सम्बन्ध में किया गया है, कोई आवेदन तभी ग्रहण करेगा जब ऐसा आवेदन उस तारीख से जिसको ऐसा अन्ितम आदेश किया गया है, एक वर्ष के भीतर किया जाता है, 

(ख) उस दशा में जिसमें ऐसी कोई अपील या अभ्यावेदन जो धारा 20 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) में उल्लिखित है किया गया है और उसके पश्चात् ऐसा अंतिम आदेश किए बिना छह मास की अवधि समाप्त हो गई है, उक्त छह मास की अवधि की समाप्ति की तारीख से एक वर्ष के भीतर कोई आवेदन ग्रहण नहीं करेगा ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी कि-

(क) वह शिकायत जिसकी बाबत कोई आवेदन किया जाता है किसी ऐसे आदेश के कारण उत्पन्न हुई है जो उस तारीख से, जिसको अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का इस अधिनियम के अधीन प्रयोग उस विषय की बाबत, जिससे ऐसा आदेश सम्बन्धित है, किया जा सकता है, ठीक पहले की तीन वर्ष की अवधि के दौरान किसी समय किया गया था; और

(ख) ऐसी शिकायत को दूर कराने के लिए कोई कार्यवाही उक्त तारीख से पूर्व किसी उच्च न्यायालय के समक्ष प्रारम्भ नहीं की गई थी,

वहां आवेदन अधिकरण द्वारा तभी ग्रहण किया जाएगा जब वह, उपधारा (1) के, यथास्थिति, खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट अवधि के भीतर या उक्त तारीख से छह मास की अवधि के भीतर, इनमें से जो भी अवधि बाद में समाप्त होती हो, किया जाता है ।

                (3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हए भी, कोई आवेदन, यथास्थिति, उपधारा (1) के खण्ड (क) या   खंड (ख) में विनिर्दिष्ट अवधि, या उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट छह मास की अवधि के पश्चात् तभी ग्रहण किया जा सकेगा जब आवेदक अधिकरण का यह समाधान कर देता है कि ऐसी अवधि के भीतर आवेदन न करने के लिए उसके पास पर्याप्त हेतुक था ।

22. अधिकरणों की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा, किन्तु वह नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करेगा और इस अधिनियम के और केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अधिकरण को अपनी प्रक्रिया का विनिमयन करने की शक्ति होगी जिसके अन्तर्गत अपनी जांच का स्थान और समय नियत करना और यह विनिश्चय करना है कि क्या सार्वजनिक या असावर्जनिक रूप से बैठक की जाए ।

                (2) अधिकरण अपने को किए गए प्रत्येक आवेदन का विनिश्चय यथासम्भव शीघ्रता से करेगा और सामान्यतया प्रत्येक आवेदन का विनिश्चय दस्तावेजों और लिखित अभ्यावेदन का परिशीलन करके और [ऐसे मौखिक तर्क को, जो प्रस्तुत किया जाए,] सुनवाई करने के पश्चात् किया जाएगा ।

                (3) अधिकरण का, 1[इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने केट प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित विषयों की बाबत वहीं शक्तियों होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -

                                (क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

                                (ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

                                (ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

                (घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से कोई लोक अभिलेख या दस्तावेज अथवा ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अपेक्षा करना;

                (ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

                (च) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

                (छ) किसी अभ्यावेदन को त्रुटि के कारण खारिज करना या उसका एक-पक्षीय रूप से विनिश्चय करना;

                (ज) किसी अभ्यावेदन को खारिज करने के किसी आदेश को या अपने द्वारा एक-पक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को त्रुटि के कारण अपास्त करना; और

                (झ) कोई अन्य विषय जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए ।

23. विधि-व्यवसायी की सहायता लेने का आवेदक का और प्रस्तुतीकरण अधिकारियों की नियुक्ति करने का सरकार आदि   का अधिकार-(1) इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण को आवेदन करने वाला कोई व्यक्ति अधिकरण के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या वह अपनी पसंद के किसी विधि-व्यवसायी की सहायता ले सकेगा ।

(2) केन्द्रीय सरकार या कोई राज्य सरकार या कोई स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम [या सोसाइटी] जिसे धारा 14   की उपधारा (3) या धारा 15 की उपधारा (3) के उपबन्ध लागू होते हैं, [एक या अधिक विधि व्यवसायियों को या अपने किसी अधिकारी को प्रस्तुतीकरण अधिकारियों के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी और उसके द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत प्रत्येक व्यक्ति किसी आवेदन की बाबत उसका पक्ष-कथन, अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकेगा ।]

24. अन्तरिम आदेश करने के बारे में शर्तें-इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबन्धों में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी आवेदन पर या उससे सम्बन्धित किसी कार्यवाही में (व्यादेश के रूप में या रोक के रूप में या किसी अन्य रीति से) कोई अन्तरिम आदेश तभी किया जाएगा जब-

(क) ऐसे पक्षकार को, जिसके विरुद्ध ऐसा आवेदन किया जाता है या, किए जाने की प्रस्थापना है ऐसे आवेदन की और ऐसे अन्तरिम आदेश के लिए अभिवाक् के समर्थन में दस्तावेजों की प्रतिलिपियां दे दी जाती हैं; और

                (ख) ऐसे पक्षकार को मामले में सुनवाई का अवसर दे दिया जाता है:

                परन्तु यदि अधिकरण का, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि आवेदक को पहुंचाई गई किसी ऐसी हानि के, जिसकी धन के रूप में पर्याप्त रूप से पूर्ति नहीं की जा सकती है, निवारण के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह खंड (क) और खंड (ख) की अपेक्षाओं से अभिमुक्ति दे सकेगा और आपवादिक उपाय के रूप में अन्तरिम आदेश कर सकेगा ; किन्तु ऐसा अन्तरिम आदेश, यदि पहले ही रद्द नहीं कर दिया जाता है तो, ऐसी तारीख से, जिसको वह किया गया था, चौदह दिन की अवधि की समाप्ति पर प्रभावहीन हो जाएगा जब तक कि उक्त अपेक्षाओं का उक्त अवधि की समाप्ति से पहले अनुपालन नहीं कर दिया गया है और अधिकरण ने अन्तरिम आदेश के प्रवर्तन को चालू नहीं रखा है ।

 [25. एक न्यायपीठ से दूसरी न्यायपीठ को मामले अंतरित करने की अध्यक्ष की शक्ति-किसी भी पक्षकार के आवेदन पर और पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात् तथा पक्षकारों में से ऐसे पक्षकारों की जिनकी वह सुनवाई करना चाहता है, सुनवाई करने के पश्चात् या ऐसी सूचना दिए बिना स्वप्ररेणा से, अध्यक्ष एक न्यायपीठ के समक्ष लम्बित किसी मामले को निपटाए जाने के लिए किसी अन्य न्यायपीठ को अंतरित कर सकेगा ।

26. बहुमत द्वारा विनिश्चय-यदि न्यायपीठ के सदस्यों में किसी प्रश्न पर मतभेद है तो उस प्रश्न का विनिश्चय, यदि कोई बहुमत है तो, बहुमत के अनुसार किया जाएगा, किन्तु यदि सदस्यों के मत बराबर हैं तो वे ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का कथन करेंगे जिनके बारे में उनमें मतभेद है और उन्हें अध्यक्ष को निर्देशित करेंगे जो ऐसे प्रश्न या प्रश्नों की स्वयं सुनवाई करेगा या उस मामले को ऐसे प्रश्न या प्रश्नों पर सुनवाई के लिए अधिकरण के अन्य सदस्यों में से एक या अधिक को निर्देशित करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय अधिकरण के उन सदस्यों के, जिन्होंने उस मामले की सुनवाई की है जिनके अन्तर्गत वे सदस्य हैं जिन्होंने सर्वप्रथम उस मामले की सुनवाई की थी, बहुमत के अनुसार किया जाएगा ।]

27. अधिकरण के आदेशों का निष्पादन-इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों और नियमों के अधीन रहते हुए,  [अधिकरण का वह आदेश, जिसमें किसी आवेदन या अपील को अन्तिम रूप से निपटाया गया है, अन्तिम होगा और किसी न्यायालय में, (जिसके अन्तर्गत उच्च न्यायालय हैं प्रश्नगत नहीं किया जाएगा और ऐसे आदेश का,] उसी रीति से निष्पादन किया जाएगा जिससे उस शिकायत की बाबत, जिससे आवेदन का सम्बन्ध है, धारा 20 की उपधारा (2) के खंड (क) में निर्दिष्ट प्रकृति के किसी अन्तिम आदेश का (चाहे वह आदेश वस्तुतः किया गया है या नहीं) निष्पादन किया जाता ।

अध्याय 5

प्रकीर्ण

28. संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन उच्चतम न्यायालय के सिवाय न्यायालयों की अधिकारिता का अपवर्जन-ऐसी तारीख से ही, जिससे किसी सेवा या पद पर भर्ती और भर्ती से संबंधित विषयों या किसी सेवा के सदस्यों या किसी सेवा या पद पर नियुक्त व्यक्तियों के सम्बन्ध में, कोई अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण द्वारा [प्रयोक्तव्य हो जाता है, -

(क) उच्चतम न्यायालय; या

(ख) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य तत्स्थानी विधि के अधीन गठित किसी औद्योगिक अधिकरण, श्रम न्यायालय या अन्य प्राधिकारी,

के सिवाय किसी न्यायालय कोट ऐसी भर्ती या ऐसी भर्ती से सम्बन्धित विषयों या ऐसे सेवा सम्बन्धी विषयों के सम्बन्ध में कोई अधिकारिता, शक्ति और प्राधिकार नहीं होगा या वह उसका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ।

29. लम्बित मामलों का अंतरण-(1) इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण की स्थापना की तारीख से ठीक पहले किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लम्बित प्रत्येक वाद या अन्य कार्यवाही जो ऐसा वाद या कार्यवाही है जिसमें वह वाद हेतुक, जिस पर वह आधारित है, ऐसा है कि वह, यदि ऐसी स्थापना के पश्चात् उद्भूत होता तो, ऐसे अधिकरण की अधिकारिता के भीतर होता, उस तारीख को ऐसे अधिकरण को अन्तरित हो जाएगी:

                परन्तु इस उपधारा की कोई बात उच्च न्यायालय । । । के समक्ष पूर्वोक्त रूप में लम्बित किसी अपील को लागू नहीं होगी ।

                (2) किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम [या सोसाइटी] के संबंध में उस तारीख से जिससे किसी अधिकरण को ऐसी अधिकारिता प्रदत्त की जाती है, ठीक पहले किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लम्बित प्रत्येक वाद या अन्य कार्यवाही, जो ऐसा वाद या कार्यवाही है जिसमें वह वाद हेतुक, जिस पर वह आधारित है, ऐसा है कि वह, यदि उक्त तारीख के पश्चात् उद्भूत होता तो, ऐसे अधिकरण की अधिकारिता के भीतर होता, उस तारीख को ऐसे अधिकरण को अन्तरित हो जाएगा:

परन्तु इस उपधारा की कोई बात उच्च न्यायालय 4। । । के समक्ष पूर्वोक्त रूप में लम्बित किसी अपील को लागू नहीं होगी ।

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम [या सोसाइटी] के संबंध में, उस तारीख से जिससे किसी अधिकरण को ऐसी अधिकारिता प्रदत्त की जाती है" पद से वह तारीख अभिप्रेत है जिससे, यथास्थिति, धारा 14 की उपधारा (3) या धारा 15 की उपधारा (3) के उपबंध ऐसे स्थानीय या अन्य प्राधिकारी या निगम 1[या सोसाइटी] को लागू किए जाते हैं ।

                (3) जहां किसी संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना की तारीख से ठीक पहले किसी ऐसे एक या अधिक राज्यों में, जिनके लिए वह स्थापित किया जाता है, कोई राज्य अधिकरण है या हैं वहां उक्त तारीख से ठीक पहले ऐसे राज्य अधिकरण या राज्य अधिकरणों के समक्ष लम्बित सभी मामले और उनके अभिलेख, उस तारीख को ऐसे संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण को अन्तरित हो जाएंगे ।

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, राज्य अधिकरण" से धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन स्थापित कोई अधिकरण अभिप्रेत है ।

                (4) जहां कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी से किसी अधिकरण को अन्तरित हो जाती है वहां-

(क) ऐसा न्यायालय या अन्य प्राधिकारी, ऐसे अन्तरण के पश्चात् यथाशीघ्र, ऐसे वाद, अपील या अन्य कार्यवाही के अभिलेख अधिकरण को भेजेगा; और

(ख) ऐसा अधिकरण, ऐसे अभिलेखों की प्राप्ति पर, यथास्थिति, ऐसे वाद, अपील या अन्य कार्यवाही में, जहां तक हो सके, उसी रीति से जिससे धारा 19 के अधीन किसी आवेदन की दशा में कोई कार्यवाही की जाती है, और उस प्रक्रम से जिस पर वह ऐसे अन्तरण से पहले थी या किसी पूर्वतर प्रक्रम से या नए सिरे से, जो अधिकरण ठीक समझे, आगे कार्यवाही कर सकेगा ।

                (5) जहां कोई मामला उपधारा (3) के अधीन किसी संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण को अन्तरित कर दिया जाता है वहां संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण, ऐसे मामले में उस प्रक्रम से, जिस पर वह इस प्रकार अन्तरण से पहले था, आगे कार्यवाही कर सकेगा ।

                 [(6) प्रत्येक ऐसा मामला, जो प्रशासनिक अधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 1987 के प्रारंभ के ठीक पूर्व किसी अधिकरण के समक्ष लंबित है और जो ऐसा मामला है जिसमें वह वाद हेतुक, जिस पर वह आधारित है, ऐसा है कि वह, यदि ऐसे प्रारंभ के पश्चात् उद्भूत होता तो किसी न्यायालय की अधिकारिता के भीतर होता, ऐसे प्रारंभ पर, उसके अभिलेखों सहित, ऐसे न्यायालय को अंतरित हो जाएगा ।

(7) जहां कोई मामला, उपधारा (6) के अधीन किसी न्यायालय को अंतरित हो जाता है वहां न्यायालय ऐसे मामले में उस प्रक्रम से, जिस पर वह इस प्रकार अंतरित किए जाने के पूर्व था, आगे कार्यवाही कर सकेगा ।]

 [29क. कुछ अपीलों को फाइल करने के संबंध में उपबंध-जहां कोई डिक्री या आदेश, किसी अधिकरण की स्थापना के पूर्व (उच्च न्यायालय से भिन्न) किसी न्यायालय द्वारा किसी ऐसे वाद या कार्यवाही में की गई है या पारित किया गया है जो ऐसा वाद या कार्यवाही है जिसका वाद हेतुक, जिस पर वह आधारित है, ऐसा है कि यदि वह ऐसी स्थापना के पश्चात् उद्भूत हुआ होता तो ऐसे अधिकरण की अधिकारिता के भीतर होता और ऐसी डिक्री या आदेश के विरुद्ध कोई अपील ऐसी स्थापना के पूर्व नहीं की गई है और तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसी अपील करने के लिए समय, ऐसी स्थापना के पूर्व समाप्त नहीं हुआ है वहां ऐसी अपील,-

(क) केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण को उस तारीख से, जिसको प्रशासनिक अधिकरण (संशोधन) विधेयक, 1986 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, नब्बे दिन के भीतर अथवा ऐसी डिक्री या आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से नब्बे दिन के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो; या

(ख) किसी अन्य अधिकरण को, उसकी स्थापना से नब्बे दिन के भीतर अथवा ऐसी डिक्री या आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से नब्बे दिन के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो,

होगी ।]

30. अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों का न्यायिक कार्यवाहियां होना-किसी अधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाहियां   भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193, धारा 219 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी ।

31. अधिकरण के सदस्यों और कर्मचारिवृन्द का लोक सेवक होना- [अध्यक्ष और अन्य सदस्य] तथा वे अधिकारी और अन्य कर्मचारी जिनका धारा 13 के अधीन अधिकरण के लिए उपबन्ध किया गया है, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक होंगे ।

32. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय या राज्य सरकार के या केन्द्रीय या संयुक्त या राज्य प्रशासनिक अधिकरण के अध्यक्ष, । । । या अन्य सदस्य के, या ऐसे अध्यक्ष, 1। । । या अन्य सदस्य द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के, विरुद्ध नहीं होगी ।

33. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में तदसंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।

34. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा   जाएगा ।

35. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 36 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) ऐसा मामला या ऐसे मामले जिनका विनिश्चय धारा 5 की उपधारा (4) के खंड (घ) के अधीन [दो से अधिक सदस्यों] से गठित न्यायपीठ द्वारा किया जाएगा;

(ख) [अध्यक्ष और अन्य सदस्यों] के कदाचार या उनकी असमर्थता के अन्वेषण के लिए धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन प्रक्रिया;

(ग) 3[अध्यक्ष और अन्य सदस्यों] को संदेय वेतन और भत्ते, और उनके अन्य निबंधन और शर्तें;

(घ) वह प्ररूप जिसमें धारा 19 के अधीन कोई आवेदन किया जा सकेगा, ऐसी दस्तावेजें और अन्य साक्ष्य जो ऐसे आवेदन के साथ होंगे और 2[ऐसा आवेदन फाइल करने की बाबत अथवा आदेशिका की तामील या निष्पादन के लिए संदेय फीस];

(ङ) वे नियम जिनके अधीन रहते हुए, किसी अधिकरण को धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन अपनी प्रक्रिया का विनियमन करने की शक्ति होगी और ऐसे अतिरिक्त विषय जिनकी बाबत कोई अधिकरण उक्त धारा की उपधारा (3) के खंड (i) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा; और

(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए या जिसकी बाबत नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार से अपेक्षा है ।

36. नियम बनाने की समुचित सरकार की शक्ति-समुचित सरकार, निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों का उपबंध करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी, अर्थात्: -

(क) ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां जिनका प्रयोग अधिकरण का अध्यक्ष धारा 12 के अधीन अधिकरण के   । । । न्यायपीठों के संबंध में कर सकेगा; 

(ख) धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की शर्तें; और

(ग) कोई अन्य विषय, जो धारा 35 में विनिर्दिष्ट विषय नहीं है, जिसकी बाबत नियम बनाने की समुचित सरकार से अपेक्षा है ।

 [36क. भूतलक्षी रूप से नियम बनाने की शक्ति-धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (ग) या धारा 36 के खंड (ख) के अधीन नियम बनाने की शक्ति के अंतर्गत ऐसे नियमों को या उनमें से किसी नियम को भूतलक्षी रूप से किसी ऐसी तारीख से बनाने की शक्ति भी है, जो उससे पूर्वतर तारीख नहीं हो जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, किंतु किसी ऐसे नियम को ऐसा कोई भूतलक्षी प्रभाव इस प्रकार नहीं दिया जाएगा जिससे किसी ऐसे व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े जिसको ऐसा नियम लागू हो सकेगा ।]

37. नियमों का सदनों के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(2) इस अधिनियम के अधीन किसी राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा 

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