प्रकाशस्तम्भ अधिनियम, 1927
(1927 का अधिनियम संख्यांक 17)1
[21 सितम्बर, 1927]
2[भारत] 3॥। में सरकार द्वारा प्रकाशस्तम्भों की व्यवस्था, अनुरक्षण और नियंत्रण से
संबंधित विधि का समेकन और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
2[भारत] 3॥। में सरकार द्वारा प्रकाशस्तम्भों की व्यवस्था, अनुरक्षण और नियंत्रण से संबंधित विधि का समेकन और संशोधन करना समीचीन है; अतः इसके द्वारा निम्नलिखित रूप से यह अधिनियम किया जाता हैः-
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम 4॥। प्रकाशस्तम्भ अधिनियम, 1927 है ।
(2) इसका विस्तार 5॥। सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख6 को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो, -
7। । । । । ।
(ख) “जिला" से इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए धारा 3 के अधीन जिला के रूप में परिनिश्चित क्षेत्र अभिप्रेत है;
(ग) “साधारण प्रकाशस्तम्भ" से कोई ऐसा प्रकाशस्तम्भ अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए साधारण प्रकाशस्तम्भ के रूप में घोषित करे;
(घ) “प्रकाशस्तम्भ" के अन्तर्गत कोई ऐसा प्रकाश-जलयान, कोहरा-संकेतक, बोया, बीकन या कोई चिह्न, संकेत या साधित्र हैं, जो पोत के मार्गदर्शन के लिए प्रदर्शित या प्रयुक्त हों;
(ङ) “स्थानीय प्रकाशस्तम्भ" से कोई ऐसा प्रकाशस्तम्भ अभिप्रेत है, जो साधारण प्रकाशस्तम्भ नहीं है;
(च) “स्थानीय प्रकाशस्तंभ प्राधिकरण" से अभिप्रेत है ऐसी राज्य सरकार, ऐसा स्थानीय प्राधिकरण या ऐसा अन्य व्यक्ति जिसके अधीक्षण और प्रबन्ध में स्थानीय प्रकाशस्तंभ है;
(छ) “स्वामी" के अन्तर्गत कोई आंशिक-स्वामी, चार्टर करने वाला या सकब्जा बंधकदार और कोई ऐसा अभिकर्ता है, जिसे पोत परेषित किया गया है;
- अधिनियम गोवा, दमण और दीव पर 1962 के विनियम सं० 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा संशोधित रूप में लागू किया गया । अधिनियम का विस्तार, 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा (1-10-1967 से) सम्पूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर किया गया । 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और पहली अनुसूची द्वारा (1-10-1963 से) यह अधिनियम पांडिचेरी पर प्रवृत्त हुआ ।
- भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम और अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948 द्वारा ब्रिटिश भारत के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा के प्रान्त शब्दों का लोप किया गया ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 2 द्वारा (15-4-1976 से) भारतीय शब्द का लोप किया गया ।
- 1953 के अधिनियम सं० 18 की धारा 2 द्वारा भाग ख राज्यों के सिवाय शब्दों का लोप किया गया ।
- 1 अप्रैल, 1929, देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी) 1929, भाग 1; पृ० 96 ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 4 द्वारा (15-4-1976 से) खण्ड (क) का लोप किया गया ।
(ज) “पत्तन" से भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 (1908 का 15) में परिभाषित कोई ऐसा पत्तन अभिप्रेत है जिस पर उस अधिनियम का विस्तार है 1॥।;
2[(जज) “उचित अधिकारी" से इस अधिनियम के अधीन पालन किए जाने वाले किन्हीं कृत्यों के संबंध में ऐसा सीमाशुल्क अधिकारी अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 (1963 का 54) के अधीन गठित केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क और सीमाशुल्क बोर्ड द्वारा वे कृत्य सौंपे गए हैं और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति भी है जिसको केन्द्रीय सरकार ने इस अधिनियम के अधीन उचित अधिकारी के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त किया है;]
3[(जजक) पोत" के अन्तर्गत चलत जलयान है;]
(झ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और जो अन्यथा परिभाषित नहीं हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके 4[वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44)] में है ।
3. अधिकारियों की नियुक्ति-केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, -
(क) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए जिलों के रूप में क्षेत्र परिनिश्चित कर सकेगी;
5[(ख) किसी व्यक्ति को प्रत्येक जिले में प्रकाशस्तम्भ और प्रकाशपोत निदेशक के रूप में नियुक्त कर सकेगी;
(ग) किन्हीं व्यक्तियों को प्रकाशस्तम्भ और प्रकाशपोत उप महानिदेशक के रूप में नियुक्त कर सकेगी; और
(घ) किसी व्यक्ति को प्रकाशस्तम्भ और प्रकाशपोत महानिदेशक के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।]
4. सलाहकार समितियां-(1) केन्द्रीय सरकार एक केन्द्रीय सलाहकार समिति नियुक्त करेगी औरः-
(क) प्रकाशस्तंभों की रचना या अवस्थिति या उससे संबंधित किसी संकर्म के बारे में;
(ख) प्रकाशस्तंभों में वृद्धि या उनमें परिवर्तन करने या उनके हटाए जाने के बारे में;
(ग) किसी प्रकाशस्तंभ के स्वरूप या उसके उपयोग के ढंग में फेरफार करने के बारे में;
(घ) प्रकाशस्तंभों से संबंधित किन्हीं प्रस्थापनाओं के खर्च के बारे में; या
(ङ) इस अधिनियम के अधीन किन्हीं नियमों के बनाने या उनमें परिवर्तन करने या शुल्क की दरों में परिवर्तन करने के बारे में, उससे परामश करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार, यदि उचित समझे तो, किसी जिले के लिए उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी विषय के बारे में, जहां तक उससे उस जिले के हितों पर प्रभाव पड़ता है, सलाह देने के लिए एक सलाहकार समिति नियुक्त कर सकेगी ।
(3) सलाहकार समिति ऐसे व्यक्तियों से मिलकर बनेगी, जो इस अधिनियम से प्रभावित होने वाले हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं या जो उस विषयवस्तु के विशेषज्ञ हैं ।
6[(4) सलहाकार समिति का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इसी कारण अविधिमान्य नहीं की जाएगी कि-
(क) सलाहकार समिति में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है;
(ख) सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 4 द्वारा (15-4-1976 से) और शब्द का लोप किया गया ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 4 द्वारा (15-4-1976 से) अंतःस्थापित ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 2 द्वारा (1-2-1986 से) अंतःस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 4 द्वारा (15-4-1976 से) भारतीय वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1923ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 3 द्वारा (1-2-1986 से) प्रतिस्थापित ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 4 द्वारा (1-2-1986 से) अंतःस्थापित ।
(ग) सलाहकार समिति की प्रक्रिया में, मामले के गुणागुण को प्रभावित न करने वाली कोई अनियमितता है ।]
साधारण प्रकाशस्तम्भ
5. साधारण प्रकाशस्तंभों का केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रबन्ध और प्रबंध का प्रत्यायोजन-(1) सभी साधारण प्रकाशस्तंभों का अधीक्षण और प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार में निहित है ।
(2) केन्द्रीय सरकार किसी स्थानीय प्रकाशस्तंभ प्राधिकारी से यह अपेक्षा कर सकेगी कि वह उन स्थानीय सीमाओं के भीतर, जिनमें वह अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है, स्थित या उनसे संलग्न किसी साधारण प्रकाशस्तंभ के अधीक्षण और प्रबन्ध का भार अपने ऊपर ले और अधीक्षण और प्रबन्ध संबंधी व्यय को पूरा करने के लिए ऐसे प्राधिकारी को ऐसी राशि देगी जो केन्द्रीय सरकार अवधारित करे ।
स्थानीय प्रकाशस्तम्भ
6. स्थानीय प्रकाशस्तंभों का निरीक्षण करने की शक्ति- 1[प्रकाशस्तम्भ और प्रकाशपोत महानिदेशक] किसी भी समय और 3[प्रकाशस्तम्भ और प्रकाशपोत निदेशक या उप महानिदेशक] यदि केन्द्रीय सरकार के साधारण या किसी विशेष लिखित आदेश द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत है, तो किसी स्थानीय प्रकाशस्तंभ में प्रवेश कर सकेगा और निरीक्षण कर सकेगा और उसके बारे में या उसके प्रबन्ध की बाबत ऐसी जांच कर सकेगा, जैसी वह ठीक समझे ।
(2) किसी प्रकाशस्तंभ का भारसाधक या उसके प्रबंध से संबंधित प्रत्येक व्यक्ति, उपधारा (1) द्वारा या उसके अधीन प्राधिकृत किसी अधिकारी को प्रकाशस्तंभ के निरीक्षण के लिए ऐसी सभी जानकारी देने के लिए आबद्ध होगा जैसी उक्त अधिकारी अपेक्षा करे ।
(3) प्रत्येक स्थानीय प्रकाशस्तंभ प्राधिकारी, केन्द्रीय सरकार को अपने अधीक्षण और प्रबन्ध के अधीन प्रकाशस्तंभों की बाबत या उनमें से किसी की बाबत ऐसी सभी विवरणियां और अन्य जानकारी देगा, जैसी केन्द्रीय सरकार अपेक्षा करे ।
7. केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थानीय प्रकाशस्तम्भों का नियंत्रण-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का, धारा 6 के अधीन निरीक्षण के पश्चात् या ऐसी अन्य जांच के पश्चात् जैसी वह ठीक समझे, समाधान हो जाता है कि इस उपधारा के अधीन पोतपरिवहन के हितों में पोतपरिवहन की सुरक्षा के लिए या अन्यथा कोई निर्देश आवश्यक या समीचीन है, तो वह किसी स्थानीय प्रकाशस्तंभ प्राधिकरण को-
(क) अपने अधीक्षण और प्रबन्ध के अधीन किसी प्रकाशस्तम्भ को हटाने या बन्द करने या संचालित करने से या बन्द करने से विरत रहने या किसी ऐसे प्रकाशस्तम्भ के स्वरूप या उपयोग के ढंग में परिवर्तन करने से विरत रहने, अथवा
(ख) ऐसी स्थानीय सीमाओं के भीतर, जिनमें वह स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है, किसी प्रकाशस्तम्भ की रचना करने, उसका स्थान निश्चित करने या बनाए रखने या स्थान निश्चित करने या बनाए रखने से विरत रहने के लिए निदेश दे सकेगी ।
(2) स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण किसी प्रकाशस्तम्भ का परिनिर्माण तब तक न तो करेगा, न तो उसे रखेगा, न तो उसे हटाएगा, न तो उसे बन्द करेगा या न तो किसी प्रकाशस्तम्भ के स्वरूप या उपयोग के ढंग में कोई परिवर्तन करेगा, जब तक उसने केन्द्रीय सरकार को ऐसा करने के अपने आशय की कम से कम एक मास की लिखित सूचना न दे दी होः
परन्तु आपात की दशा में, स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण ऐसी कार्यवाही कर सकेगा, जैसी वह आवश्यक समझे, और केन्द्रीय सरकार को उसकी तुरन्त सूचना देगा और जहां तक सम्भव हो उस प्रकाशस्तम्भ की ओर या उसके आसपास आने वाले सभी पोतों को उसकी सूचना देगा ।
(3) यदि कोई स्थानीय प्रकाशस्तंभ प्राधिकरण-
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 5 द्वारा (1-2-1986 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(क) उपधारा (1) के अधीन दिए गए किसी निदेश के अनुपालन में असफल रहता है, या
(ख) प्रकाशस्तम्भों के अधीक्षण या प्रबन्ध से सम्बन्धित उस समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उसको प्रदत्त किसी ऐसी शक्ति का प्रयोग करने या अधिरोपित कर्तव्य का पालन करने में असफल रहता है या किसी अनुचित, अदक्ष या अयोग्य रीति से उस शक्ति का प्रयोग करता है या उस कर्तव्य का पालन करता है, या
(ग) किसी ऐसे कर्तव्य के पालन के लिए पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था करने में असफल रहता है,
तो केन्द्रीय सरकार, लिखित आदेश द्वारा, स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकारी से, ऐसी अवधि के भीतर, जैसी केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट करे, यथास्थिति, निदेश के अनुपालन करने, या, केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में उस शक्ति का उचित प्रयोग या कर्तव्य पालन की व्यवस्था करने, या केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में कर्तव्य पालन के लिए वित्तीय व्यवस्था करने की अपेक्षा कर सकेगी ।
(4) यदि स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश का विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर या ऐसे समय के भीतर, जो केन्द्रीय सरकार अनुज्ञात करे, अनुपालन करने में असमर्थ रहता है, तो केन्द्रीय सरकार, यथास्थिति, उस शक्ति का प्रयोग कर सकेगी या उस कर्तव्य का पालन कर सकेगी या अपेक्षित वित्तीय व्यवस्था कर सकेगी और स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार को ऐसा करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा उपगत किसी व्यय का प्रतिसंदाय करने के लिए दायी होगा ।
8. केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थानीय प्रकाशस्तम्भों का प्रबन्ध-केन्द्रीय सरकार, किसी स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण के अनुरोध पर किसी स्थानीय प्रकाशस्तम्भ का अधीक्षण और प्रबन्ध उसकी ओर से ले सकेगी और स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार को अधीक्षण और प्रबन्ध के व्यय को पूरा करने के लिए ऐसी राशि देगा जो निश्चित की जाए ।
1[8क. प्रकाश को प्रतिषिद्ध करने और भवनों, संरचनाओं और वृक्षों की ऊंचाई को विनियमित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी प्रकाश स्तम्भ के अबाध कार्यकरण के लिए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि-
(i) प्रकाशस्तम्भ से एक किलोमीटर से अनधिक ऐसे अर्धव्यास के भीतर जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, किसी भूमि पर कोई प्रकाश, साधारण प्रकाशस्तम्भ की दशा में केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के बिना और स्थानीय प्रकाशस्तम्भ की दशा में स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण की पूर्व अनुज्ञा के बिना स्थापित नहीं किया जाएगा, और
(ii) प्रकाशस्तम्भ से एक किलोमीटर से अनधिक ऐसे अर्धव्यास के भीतर जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, किसी भूमि पर ऐसा कोई भवन, या संरचना जो उस ऊंचाई से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, ऊंची हो सन्निर्मित या परिनिर्मित नहीं की जाएगी या ऐसा कोई वृक्ष, जिसकी वृद्धि उस ऊंचाई से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, ऊंची होने की संभावना हो या सामान्यतया ऊंची होती है, रोपित नहीं किया जाएगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट अनुज्ञा के बिना या उसके प्रतिकूल कोई प्रकाश स्थापित किया गया है वहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण, ऐसी किसी अन्य कार्रवाई के अतिरिक्त जो इस अधिनियम के अधीन की जाए, यह निदेश देते हुए आदेश दे सकेगा कि ऐसे प्रकाश का स्वामी या प्रकाश पर नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति ऐसे प्रकाश को ऐसी अवधि के भीतर हटाएगा जो ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए ।
(3) जहां उपधारा (1) के खंड (ii) में अंतर्विष्ट निदेशों के उल्लंघन में कोई भवन या संरचना सन्निर्मित या परिनिर्मित की गई है या कोई वृक्ष रोपित किया गया है, वहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या स्थानीय प्रकाशस्तंभ प्राधिकरण, ऐसी किसी अन्य कार्रवाई के अतिरिक्त, जो इस अधिनियम के अधीन की जाए, यह निदेश देते हुए आदेश कर सकेगा कि ऐसे भवन या संरचना या वृक्ष का स्वामी अथवा उस पर नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति, यथास्थिति, ऐसे भवन, संरचना या वृक्ष की ऊंचाई को ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट सीमा तक, ऐसी अवधि के भीतर कम करेगा, जो ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 6 द्वारा (1-2-1986 से) अंतःस्थापित ।
(4) उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन ऐसा कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक स्वामी या ऐसे व्यक्ति को, सूचना के माध्यम से, यह हेतुक दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया है कि ऐसा आदेश क्यों नहीं दिया जाए ।
(5) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (2) के अधीन निकाले गए आदेश में अंतर्विष्ट निदेश के अनुसरण में प्रकाश को हटाने में या उपधारा (3) के अधीन निकाले गए आदेश में अंतर्विष्ट किसी निदेश के अनुसरण में भवन, संरचना या वृक्ष की उंचाई, ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, कम करने में असफल रहता है तब ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त बनाए, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या स्थानीय प्रकाशस्तम्भ प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई प्राधिकारी ऐसे प्रकाश को हटाने के लिए अथवा ऐसे भवन, संरचना या वृक्ष की ऊंचाई को कम करने के लिए सक्षम होगा और ऐसे हटाए जाने या कम किए जाने के व्यय ऐसे व्यक्ति से भू-राजस्व के रूप में वसूलीय होंगे ।
(6) उपधारा (2) और उपधारा (3) में निर्दिष्ट आदेशों तथा उपधारा (4) में निर्दिष्ट सूचना की तामील, यथास्थिति, प्रकाश, भवन, संरचना या वृक्ष के स्वामी पर या उस पर नियंत्रण रखने वाले व्यक्ति पर-
(i) ऐसे स्वामी या व्यक्ति को परिदत्त या निविदत्त करके, अथवा
(ii) यदि वह इस प्रकार परिदत्त या निविदत्त नहीं की जा सकती है तो, ऐसे स्वामी या व्यक्ति के किसी अधिकारी को या ऐसे स्वामी या व्यक्ति के कुटुंब के किसी वयस्क पुरुष सदस्य को परिदत्त या निविदत्त करके या उसकी एक प्रति ऐसे परिसर के सहजदृश्य भाग में, जिसमें ऐसे स्वामी या व्यक्ति का अंतिम बार निवास या कारबार या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करना ज्ञात है, लगा कर, अथवा इन साधनों द्वारा तामील करने में असफल होने पर;
(iii) डाक द्वारा,
की जाएगी ।
(7) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन निकाली गई किसी अधिसूचना में अंतर्विष्ट किसी निदेश का अनुपालन करने में जानबूझकर असफल रहेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडनीय होगा ।
(8) केंद्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना, राजपत्र में प्रकाशित किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना नहीं निकाली जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी । किंतु अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
प्रकाश-शुल्क
9. प्रकाश-शुल्कों का उद्ग्रहण और संग्रहण- 1[भारत] को या से या 1[भारत] में एक पत्तन से दूसरे पत्तन को जाने वाले पोतों के फायदे के लिए प्रकाशस्तम्भों की व्यवस्था करने या उन्हें बनाए रखने या प्रकाशस्तम्भों की व्यवस्था करने या उन्हें बनाए रखने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए 1[भारत] में किसी पत्तन पर आने वाले या किसी पत्तन से प्रस्थान करने वाले प्रत्येक पोत के सम्बन्ध में प्रकाश-शुल्क उद्ग्रहण या संग्रहण कराएगी ।
10. उद्ग्रहणीय प्रकाश-शुल्कों की दरें- 2[(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी दरें विहित कर सकेगी, जो वह धारा 9 में वर्णित प्रयोजनों के लिए उपबंध करने के लिए आवश्यक समझे, जिन पर प्रकाश-शुल्क संदेय होंगे
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा प्रान्तों शब्द के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 7 द्वारा (1-2-1986 से) उपधारा (1) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
और पोतों या चलत जलयानों के विभिन्न वर्गों के लिए अथवा एक ही वर्ग के पोतों या चलत जलयानों के लिए, जब वे भिन्न-भिन्न प्रयोजनों के लिए या भिन्न-भिन्न परिस्थिति में उपयोग में हों, भिन्न-भिन्न दरें विहित कर सकेगी ।]
(2) किसी पोत के संबंध में संदेय प्रकाश-शुल्क, पोत के स्वामी या मास्टर द्वारा 1[भारत] में किसी पत्तन पर, पोत के आने पर और किसी पत्तन से पोत के प्रस्थान पर संदाय किया जाएगाः
परन्तु यदि इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार किसी पोत के बारे में प्रकाश-शुल्क संदत्त किए गए हैं, तो उस पोत के संबंध में उस तारीख से, जिस पर इस प्रकार संदत्त शुल्क संदेय हुए थे, तीस दिन की अवधि के लिए कोई भी अतिरिक्त शुल्क संदेय नहीं होगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन प्रकाश-शुल्क अधिरोपित करने, उसे समाप्त करने या उसमें परिवर्तन करने का कोई आदेश, राजपत्र में उस आदेश के अधिसूचित हो जाने की तारीख से तीस दिन की समाप्ति तक प्रभावी नहीं होगा ।
1[(4) केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना, राजपत्र में प्रकाशित किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना नहीं निकाली जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभावी हो जाएगी । किंतु अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
11. प्रकाश-शुल्कों के लिए रसीदें- 2[उचित अधिकारी] को प्रकाश-शुल्क संदाय किया जाएगा, और वह संदाय करने वाले व्यक्ति को, जिसमें निम्नलिखित विनिर्दिष्ट होगा, लिखित रसीद देगाः-
(क) वह पत्तन, जिस पर शुल्क का संदाय किया गया है;
(ख) संदाय की रकम;
(ग) वह तारीख जिसको शुल्क संदेय हुआ; और
(घ) उस पोत का नाम, टन भार और अन्य उचित वर्णन, जिसके बारे में संदाय किया गया है ।]
12. टन भार अभिनिश्चित करना- 3[(1) प्रकाश-शुल्क के उद्ग्रहण के प्रयोजन के लिए, किसी पोत या चलत जलयान का टन भार, पोत के टन भार पर, जिसके अंतर्गत किसी स्थान का टन भार है जो स्थोरा ले जाने के लिए उस स्थान का उपयोग किए जाने के कारण वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) के अधीन पोत के टन भार में जोड़ा गया है, संदेय शुल्क के लिए उक्त अधिनियम के अधीन प्रगणित किया जाएगा ।]
(2) प्रकाश-शुल्क उद्ग्रहण करने के प्रयोजन के लिए किसी पोत के टन भार को अभिनिश्चित करने के लिए,
2[उचित अधिकारी] ः-
4[(क) यदि कोई पोत भारत में उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन या भारत से भिन्न किसी ऐसे देश की विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत है, जिसके पोतों को केन्द्रीय सरकार ने किसी ऐसे आदेश के अधीन, जो वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) की धारा 461 की उपधारा (1) द्वारा निरसित किसी अधिनियमिति के अधीन किया गया था और जो उस धारा की उपधारा (3) के खण्ड (क) के अधीन या उक्त अधिनियम की धारा 74 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन प्रवृत्त रहा है, उतने टन भार के होने की मान्यता प्रदान की है या उतना टन भार स्वीकार कर लिया है जितना टन भार उनके रजिस्ट्री प्रमाणपत्रों या अन्य राष्ट्रीय कागजपत्रों में दर्शित है (ऐसे पोत को इस धारा में इसके पश्चात् रजिस्ट्रीकृत पोत कहा गया है) तो उस पोत के स्वामी
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 7 द्वारा (1-2-1986 से) अंतःस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 3 द्वारा (15-4-1976 से) सीमाशुल्क कलक्टर के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 8 द्वारा (1-2-1986 से) उपधारा (1) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 6 द्वारा (15-4-1976 से) खंड (क) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
या मास्टर या अन्य व्यक्ति से, जिसके कब्जे में पोत का भार दर्शित करने वाला रजिस्टर या अन्य कागजपत्र है, निरीक्षण के लिए पेश करने की अपेक्षा कर सकेगा और यदि यथास्थिति, ऐसा स्वामी, मास्टर या अन्य व्यक्ति, रजिस्टर या कागजपत्रों को पेश निरीक्षण के लिए पेश करने से इंकार करता है या पेश करने में उपेक्षा करता है या उचित अधिकारी का उस पोत के टन भार के बारे में अन्यथा समाधान करने से इंकार करता है या समाधान करने में उपेक्षा करता है तो वह पोत का माप कराएगा और उसका टन भार अभिनिश्चित कराएगा; अथवा]
(ख) यदि वह पोत रजिस्ट्रीकृत पोत नहीं है और उसका स्वामी या मास्टर 2[उचित अधिकारी] का रजिस्ट्रीकृत पोतों के माप का विनियमन करने के लिए उस समय प्रवृत्त विधि द्वारा विहित माप की पद्धति के अनुसार उसका सही टन भार के बारे में समाधान करने में असफल रहता है तो, पोत का माप कराएगा और ऐसी पद्धति के अनुसार उसके टन भार को अभिनिश्चित कराएगा ।
(3) यदि कोई व्यक्ति, जब उससे इस धारा के अधीन ऐसा करने के लिए अपेक्षा की जाए तो किसी पोत के सही टन भार के बारे में कोई रजिस्टर या अन्य कागजपत्र प्रस्तुत करने या उसके बारे में 2[उचित अधिकारी] का अन्यथा समाधान करने से इंकार करेगा या उसकी उपेक्षा करेगा तो, वह पोत के माप और टन भार को अभिनिश्चित करने में हुए व्यय को संदाय करने के लिए दायी होगा और यदि वह पोत रजिस्ट्रीकृत पोत है, तो उसके अतिरिक्त प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट द्वारा या उस पत्तन में, जहां पोत ठहरा हुआ है, या किसी अन्य पत्तन में, जिसकी ओर पोत अग्रसर हो रहा है, अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा दोषसिद्धि पर, जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
13. प्रकाश-शुल्क, व्यय और खर्चे की वसूली-(1) यदि किसी पोत का स्वामी या मास्टर 1 [उचित अधिकारी] को उस पोत के बारे में, इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी प्रकाश-शुल्क या व्यय की रकम, मांग पर संदाय करने से इंकार करेगा या उसकी उपेक्षा करेगा, तो 1[उचित अधिकारी] पोत और उसके टेकल, पोत सज्जा और फर्नीचर का अभिग्रहण कर सकेगा और उसे तब तक रोक रखेगा जब तक अभिग्रहण और निरोध के खर्चे सहित, शुल्क या व्यय का संदाय न कर दिया जाए ।
(2) यदि ऐसे शुल्क, व्यय या खर्चे का कोई भाग अभिग्रहण की तारीख से अगले पांच दिन की समाप्ति के पश्चात् असंदत्त रह जाता है, तो, 1[उचित अधिकारी] उस अभिगृहीत पोत या अन्य वस्तु का विक्रय कराएगा और विक्रय के आगमों से असंदत्त शुल्क, व्यय या खर्चों की, क्रय के खर्च के साथ, तुष्टि कर सकेगा और, यदि कोई अधिशेष हो तो, उसे उस व्यक्ति को देगा, जिसके द्वारा वे संदेय थे ।
14. पत्तन निकासी का इंकार करना-ऐसा अधिकारी, जिसका कर्तव्य किसी पोत की पत्तन निकासी मंजूर करना है, किसी पत्तन की निकासी तब तक मंजूर नहीं करेगा, जब तक इस अधिनियम के अधीन उस पोत के बारे में संदेय सभी प्रकाश-शुल्क, व्यय या खर्चे की राशि और उसके अधीन अधिरोपित किसी जुर्माने की राशि संदत्त नहीं कर दी जाती है या जब तक उसके संदाय के लिए उसे समाधानप्रद रूप में नहीं दे दी जाती है ।
15. संदाय के लिए दायित्व के बारे में विवादों का अवधारण-यदि इस अधिनियम के अधीन किसी पोत के संबंध में प्रकाश-शुल्क, व्यय या खर्च संदेय है या नहीं या ऐसे शुल्क, व्यय या खर्चे की रकम के बारे में कोई विवाद उत्पन्न होता है तो वह विवाद, विवाद के पक्षकारों में से किसी एक द्वारा इस निमित्त किए गए आवेदन पर, प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट द्वारा जहां विवाद उत्पन्न हुआ है उस स्थान पर अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा सुना जाएगा और अवधारित किया जाएगा और ऐसे मजिस्ट्रेट का विनिश्चय अंतिम होगा ।
16. किसी एक पत्तन पर संदेय प्रकाश-शुल्क का अन्य पत्तन पर वसूल किया जाना-(1) यदि किसी ऐसे पोत का मास्टर, जिसके बारे में कोई प्रकाश-शुल्क, किसी पत्तन पर संदेय है, तो उस पोत को उस पत्तन से प्रकाश-शुल्क संदाय किए बिना ले जाता है, तो उस पत्तन का 1[उचित अधिकारी] 2[भारत] में किसी अन्य पत्तन के 1[उचित अधिकारी] से, जहां वह पोत चला जाए या जिसमें वह हो, लिखित रूप में, असंदत्त शुल्क को वसूल करने की अपेक्षा कर सकेगा ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 3 द्वारा (15-4-1976 से) सीमाशुल्क कलक्टर के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा प्रांतों शब्द के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(2) ऐसा 1[उचित अधिकारी], जिसको ऐसी अध्यपेक्षा निर्दिष्ट है, ऐसी राशि उद्ग्रहण करने के लिए अग्रसर होगा मानो वह, इस अधिनियम के अधीन ऐसे पत्तन पर संदेय थी, जहां वह 1[उचित अधिकारी] है, और ऐसे पत्तन के जहां प्रकाश-शुल्क प्रथमतः संदेय हुआ था, 1[उचित अधिकारी] द्वारा संदेय रकम का विवरण देने वाला प्रमाणपत्र, धारा 13 या धारा 15 के अधीन किसी कार्यवाही में इस बात का पर्याप्त सबूत होगा कि ऐसी राशि संदेय है ।
17. प्रकाश-शुल्क के संदाय का अपवंचन करने के लिए शास्ति-(1) यदि किसी पोत का स्वामी या मास्टर, इस अधिनियम के अधीन किसी पोत के बारे में संदेय किसी प्रकाश-शुल्क, व्यय या खर्चे के संदाय का अपवंचन करेगा या अपवंचन करने का प्रयत्न करेगा, तो वह प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट या उस पत्तन पर, जिस पर वह जलयान चला जाए या जिसमें वह पाया जाए, अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा दोषसिद्धि पर, जुर्माने से, जो संदेय रकम की राशि के पांच गुना तक हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(2) यदि उपधारा (1) के अधीन अभियोजन में, किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष किसी कार्यवाही में कोई ऐसा प्रमाणपत्र, जो धारा 16 की उपधारा (2) में वर्णित है, और जिसमें इस बात का कथन है कि स्वामी या मास्टर ने ऐसे संदाय का अपवंचन किया है, तो वह ऐसे अपवंचन का पर्याप्त सबूत होगा, जब तक कि स्वामी या मास्टर, मजिस्ट्रेट के समाधानप्रद रूप में यह स्पष्ट नहीं कर देता है कि जलयान का प्रस्थान उस राशि के संदाय के बिना मौसम के प्रभाव के कारण किया गया था या तो ऐसे प्रस्थान के लिए उसके पास विधिपूर्ण उचित आधार है ।
18. प्रकाश-शुल्क के संदाय से छूट-इस अधिनियम के अधीन निम्नलिखित पोतों को, प्रकाश-शुल्क के संदाय से छूट होगी, अर्थात्ः-
(क) सरकार 1॥। या विदेशी शासक या राज्य के किसी पोत को, जो ढुलाई-भाड़ा या यात्री भाड़े के लिए स्थोरा या यात्रियों का वहन नहीं करता है; और
(ख) पचास टन से कम टनभार वाले किसी पोत को,
और केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किन्हीं अन्य पोतों या पोतों के वर्ग को या विनिर्दिष्ट जलयात्रा करने वाले पोतों को ऐसे संदाय से या तो पूर्णतः या केवल उस परिमाण तक, जैसा कि अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हो, छूट दे सकेगी ।
19. आधिक्य संदायों का वापस किया जाना-जहां किसी पोत के सम्बन्ध में इस अधिनियम के अधीन संदेय रकम से अधिक प्रकाश-शुल्क संदाय किया गया है, वहां ऐसे अतिरिक्त संदाय की वापसी का कोई भी दावा तब तक ग्राह्य नहीं होगा जब तक ऐसा दावा प्रत्येक संदाय की तारीख से छह मास के भीतर न किया गया हो ।
2[19क. फीस-पोतों को उनके बेतार दिशा-अन्वेषी यंत्रों के अंशांकन में सहायता करने और जलयानों को अन्य सेवाएं प्रदान करने के लिए ऐसी दरों पर फीस प्रभारित की जा सकेगी जो केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट करे ।]
लेखा
20. लेखा, आदि-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन प्रकाश-शुल्कों, व्ययों खर्चों, और जुर्मानों के रूप में प्राप्त और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपगत सभी व्ययों की राशियों का पृथक् लेखा रखवाएगी और प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् जितना शीघ्र हो सके ऐसा लेखा केन्द्रीय सलाहकार समिति के समक्ष प्रस्तुत कराएगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार, आगामी वर्ष के दौरान, इस अधिनियम के अधीन प्राक्कलित प्राप्तियों और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्राक्कलित व्यय का विवरण प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पूर्व केन्द्रीय सलाहकार समिति के समक्ष प्रस्तुत करवाएगी ।
3। । । ।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा या सरकार शब्द छोड़ दिए गए ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 7 द्वारा (15-4-1976 से) अन्तःस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 8 द्वारा (15-4-1976 से) शक्तियों का प्रत्यायोजन शीर्षक का लोप किया गया ।
20क. [पोत परिवहन महानिदेशक को शक्तियों का प्रत्यायोजन ।]-भारतीय प्रकाशस्तम्भ (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 37) की धारा 8 द्वारा (15-4-1976 से) निरसित ।
नियम
21. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए उससे सुसंगत 1[नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी] ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगेः-
2[(क) प्रकाश स्तम्भों और प्रकाश पोतों के महानिदेशकों और प्रकाशस्तम्भों तथा प्रकाश पोतों के निदेशकों तथा उप निदेशकों की शक्तियां और कर्तव्य;]
(ख) इस अधिनियम के अधीन गठित सलाहकार समितियों के कारबार की प्रक्रिया और संचालन;
3[(खख) धारा 8क की उपधारा (5) के अधीन वह रीति, जिससे प्रकाश हटाया जा सकेगा और भवन, संरचना या वृक्ष की ऊंचाई कम की जा सकेगी;
(ग) सलाहकार समितियों के सदस्यों को संदेय यात्रा और जीवन-निर्वाह भत्ते की दर; 4॥।
5[(गग) पोतों को उनके बेतार दिशा-अन्वेषी यंत्रों के अंशांकन में सहायता करने और जलयानों को अन्य सेवाएं प्रदान करने के लिए फीस की दरें;]
(घ) वह अवधि, जिसकी बाबत और वह प्ररूप जिसमें, धारा 20 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट पृथक् लेखा रखा जाएगा और वे प्ररूप जिनमें उस धारा की उपधारा (2) में क्रमशः निर्दिष्ट लेखे और विवरण केन्द्रीय सलाहकार समिति को प्रस्तुत किए जाएंगे ।
7[(3) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूलन प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
निरसन
22. [निरसन ।]-निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) की धारा 2 तथा अनुसूची द्वारा निरसित ।
अनुसूची- [निरसित अधिनियमितियां ।]-निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) की धारा 2 तथा अनुसूची द्वारा निरसित ।
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- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 9 द्वारा (15-4-1976 से) नियम बना सकेगी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 9 द्वारा (1-2-1986 से) खंड (क) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1985 के अधिनियम सं० 66 की धारा 9 द्वारा (1-2-1986 से) अंतःस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 9 द्वारा (15-4-1976 से) और शब्द का लोप किया गया ।
- 1976 के अधिनियम सं० 37 की धारा 9 द्वारा (15-4-1976 से) अंतःस्थापित ।

