विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् अधिनियम, 2001
(2001 का अधिनियम संख्यांक 29)
[3 सितम्बर, 2001]
विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् को
राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने और
उसके निगमन तथा उससे संबंधित
विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विश्व मामलों से संबंधित परिषद् अधिनियम, 2001 है ।
(2) इस अधिनियम में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, यह 1 सितम्बर, 2000 से प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाना-विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् के, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है, उद्देश्य ऐसे हैं कि वे इस संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था बना देते हैं, अतः, यह घोषित किया जाता है कि विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) नियत दिन" से इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख अभिप्रेत है;
(ख) सभापति" से शासी निकाय का सभापति अभिप्रेत है;
(ग) परिषद्" से धारा 4 के अधीन निगमित विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् अभिप्रेत है;
(घ) महानिदेशक" से परिषद् का महानिदेशक अभिप्रेत है;
(ङ) विद्यमान परिषद्" से विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद्, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है, अभिप्रेत है और जो नियत दिन से ठीक पूर्व उस रूप में कार्य कर रही थी;
(च) निधि" से धारा 18 में निर्दिष्ट परिषद् की निधि अभिप्रेत है;
(छ) शासी निकाय" से परिषद् का शासी निकाय अभिप्रेत है;
(ज) सदस्य" से परिषद् का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उसका अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी है;
(झ) अध्यक्ष" से परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ज्ञ) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;
(ट) नियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम अभिप्रेत हैं;
(ठ) उपाध्यक्ष" से परिषद् का उपाध्यक्ष अभिप्रेत है ।
4. परिषद् का निगमन-(1) विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् को, इसके द्वारा विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् के नाम से निगमित निकाय के रूप में गठित किया जाता है और ऐसा निगमित निकाय होने के कारण उसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी तथा इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उसे स्थावर और जंगम, दोनों प्रकार की, सम्पत्तियों का अर्जन, धारण और व्ययन करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उस नाम से वह वाद ला सकेगी या उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा ।
(2) परिषद् का मुख्यालय दिल्ली में होगा और परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, भारत में अन्य स्थानों पर शाखाएं स्थापित कर सकेगी ।
5. विद्यमान परिषद् की आस्तियों और दायित्वों का इस परिषद् को अंतरण-(1) नियत दिन से ही,-
(क) उस दिन से ठीक पूर्व विद्यमान परिषद् में निहित सभी संपत्तियां और अन्य आस्तियां इस परिषद् में निहित हो जाएंगी;
(ख) विद्यमान परिषद् के प्रयोजनों के लिए या उनके संबंध में विद्यमान परिषद् द्वारा उस दिन से ठीक पूर्व उपगत सभी ऋण, बाध्यताएं और दायित्व, की गई सभी संविदाएं और उसके साथ किए जाने के लिए वचनबद्ध सभी मामले और बातें इस परिषद् के द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत की गई या किए जाने के लिए वचनबद्ध समझी जाएंगी;
(ग) उस दिन से ठीक पूर्व, विद्यमान परिषद् को देय सभी धनराशियां इस परिषद् को देय समझी जाएंगी;
(घ) उस दिन से ठीक पूर्व, विद्यमान परिषद् द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित किए गए या संस्थित किए जा सकने वाले सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां इस परिषद् द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेंगी या संस्थित की जा सकेंगी; और
(ङ) उस दिन से ठीक पूर्व, विद्यमान परिषद् में किसी पद को धारण करने वाला प्रत्येक कर्मचारी उस दिन को परिषद् में पेंशन, उपदान और अन्य विषयों से संबंधित उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ अपना पद या सेवा धारण करेगा जो यदि इस प्रकार निहित न हुआ होता तो उसे अनुज्ञेय होते; और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक परिषद् में उसका नियोजन सम्यक्तः समाप्त न कर दिया जाए या परिषद् द्वारा उसके पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तों में सम्यक्तः परिवर्तन नहीं कर दिया जाए ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, परिषद् द्वारा इस धारा के अधीन किसी कर्मचारी का अपनी नियमित सेवा में आमेलन उस कर्मचारी को उस अधिनियम या किसी अन्य विधि के अधीन प्रतिकर के लिए हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
6. संपत्ति या आस्तियों को अंतरित करने की बाध्यता-(1) धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट संपत्तियों और अन्य आस्तियों के भागरूप संपत्ति का कब्जा, अभिरक्षा या नियंत्रण रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति ऐसी संपत्ति महानिदेशक को तुरन्त परिदत्त करेगा ।
(2) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व विद्यमान परिषद् की संपत्ति और अन्य आस्तियों का भारसाधक कोई व्यक्ति, उस दिन से दस दिन के भीतर, सभी संपत्तियों और आस्तियों (जिसके अंतर्गत बही-ऋणों और विनिधानों तथा माल-असबाब की विशिष्टियां भी हैं) तथा विद्यमान परिषद् या उसकी ओर से किसी व्यक्ति द्वारा किए गए सभी करारों की एक पूर्ण सूची महानिदेशक को देगा ।
7. परिषद् की संरचना-(1) 1 सितंबर, 2000 से ही और उपधारा (2) के अधीन तारीख के नियत किए जाने तक परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्ः-
(क) भारत का उपराष्ट्रपति, जो अध्यक्ष होगा, पदेन;
(ख) भारत का प्रधानमंत्री;
(ग) लोक सभा का अध्यक्ष;
(घ) राज्य सभा में सदन का नेता;
(ङ) लोक सभा में विपक्ष का नेता;
(च) राज्य सभा में विपक्ष का नेता;
(2) ऐसी तारीख से ही, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत की जाए । । । परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्ः-
(क) भारत का उपराष्ट्रपति, जो अध्यक्ष होगा, पदेन;
(ख) [जो प्रथमतः उपधारा (1) के अधीन गठित परिषद् द्वारा और तत्पश्चात् इस उपधारा के अधीन गठित परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले तीन उपाध्यक्ष];
(ग) 2[एक महानिदेशक, पदेन; सदस्य-सचिव];
(घ) लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले लोक सभा के पांच सदस्य और राज्य सभा के सभापति द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले राज्य सभा के तीन सदस्य;
(ङ) 2[प्रथमतः उपधारा (1) के अधीन गठित परिषद् द्वारा और तत्पश्चात् इस उपधारा के अधीन गठित परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले] सात सदस्य जो कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय मामले, अंतरराष्ट्रीय विधि, बहुपक्षीय अथवा संयुक्त राष्ट्र मामले, सुरक्षा और निरस्त्रीकरण के क्षेत्रों में प्रख्यात हों;
(च) [प्रथमतः उपधारा (1) के अधीन गठित परिषद् द्वारा और तत्पश्चात् इस उपधारा के अधीन गठित परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले] सात सदस्य जो इतिहास, अर्थशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञान के क्षेत्रों में विशेषज्ञों में से विश्वविद्यालयों या उच्च शिक्षा की अनुसंधान संस्थाओं के प्रतिनिधि हों (जिनमें से कम से कम दो कुलपति होंगे);
(छ) परिषद् के शासी निकाय द्वारा 1[नामनिर्देशित] सात सदस्य जो या तो मीडिया के क्षेत्र में विख्यात व्यक्ति हों या ऐसे संगठनों के, जैसे इण्डिया इन्टरनेशनल सेन्टर, सेन्टर फॉर पालिसी रिसर्च, इंडियन कौंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च, रक्षा अनुसंधान और विश्लेषण संस्थान और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, 1[व्यक्ति हों] तथा जो परिषद् के कार्य और उद्देश्यों में रुचि रखते हों;
(ज) परिषद् के शासी निकाय द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले पांच सदस्य जो कारबार या वाणिज्य मंडल, भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंडल परिसंघ, भारतीय उद्योग परिसंघ, भारतीय वाणिज्य और उद्योग सहयुक्त मंडल, भारतीय निर्यात संगठन परिसंघ [से हों];
(झ) । । । विदेश मंत्रालय के तीन सदस्य, पदेन [विदेश सचिव, वित्तीय सलाहकार, और संकायाध्यक्ष (विदेश सेवा संस्थान)];
(ञ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले पांच सदस्य, पदेन जो क्रमशः शिक्षा, संस्कृति, शहरी विकास, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा रक्षा से संबंधित केन्द्रीय सरकार के संबंधित मंत्रालयों का प्रतिनधित्व करेंगे ।
(3) यह घोषित किया जाता है कि परिषद् के सदस्य का पद, उसके धारक को संसद् के किसी सदन के सदस्य के रूप में चुने जाने या बने रहने से निरर्हित नहीं करेगा ।
(4) कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट या चयन किए जाने के लिए निरर्हित होगा यदि वह-
(क) ऐसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या
(ख) अनुन्मोचित दिवालिया है; या
(ग) विकृतचित है और उसे सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया है ।
8. सदस्यों की पदावधि और रिक्तियां-(1) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, किसी सदस्य की पदावधि उसके नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की होगी ।
(2) आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट सदस्य की पदावधि उस सदस्य की शेष अवधि तक जारी रहेगी जिसके स्थान पर उसे नामनिर्दिष्ट किया गया हो ।
(3) कोई सदस्य, जब तक कि केन्द्रीय सरकार अन्यथा निदेश न दे, पद पर तब तक बना रहेगा जब तक कि उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता है ।
(4) केन्द्रीय सरकार किसी सदस्य को उस दशा में हटाएगी यदि वह-
(क) धारा 7 की उपधारा (4) में वर्णित किसी निरर्हता के अधीन हो जाए; या
(ख) कार्य करने से इंकार कर दे या कार्य करने में असमर्थ हो जाए; या
(ग) परिषद् से अनुपस्थिति की छुट्टी लिए बिना परिषद् के निरन्तर तीन अधिवेशनों में अनुपस्थित रहे; या
(घ) केन्द्रीय सरकार की राय में, उसने अपनी स्थिति का इतना दुरुपयोग किया है कि पद पर उसका बना रहना लोकहित के लिए हानिकर बन जाता है:
परन्तु किसी सदस्य को इस खंड के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उस मामले में उसे सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
(5) कोई सदस्य, जब तक वह धारा 7 की उपधारा (4) के अधीन निरर्हित नहीं हो जाए, पुनः नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा ।
(6) कोई सदस्य केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्तलेख द्वारा पद से त्यागपत्र दे सकेगा किन्तु वह अपने पद पर तब तक बना रहेगा जब तक कि उसका त्यागपत्र सरकार द्वारा स्वीकार न कर लिया जाए ।
(7) सदस्यों में रिक्तियों को भरने की रीति वह होगी जो नियमों द्वारा विहित की जाए ।
9. अध्यक्ष की शक्तियां और कृत्य-अध्यक्ष ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा जो इस अधिनियम में अधिकथित हैं या जो नियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
10. उपाध्यक्षों की शक्तियां और कृत्य-उपाध्यक्ष, अध्यक्ष की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेंगे जो नियमों द्वारा विहित किए जाएं या जो अध्यक्ष द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
11. सदस्यों के भत्ते-सदस्य परिषद् से ऐसे भत्ते, यदि कोई हों प्राप्त करेंगे जो नियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
12. परिषद् के अधिवेशन-परिषद् अपना पहला अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर करेगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियत किया जाए और पहले अधिवेशन में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी जो उस सरकार द्वारा अधिकथित किए जाए; और तत्पश्चात्, परिषद् ऐसे समयों और स्थानों पर अधिवेशन करेगी और अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
13. परिषद् के उद्देश्य-परिषद् के उद्देश्य निम्नलिखित होंगे-
(क) भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों के अध्ययन का संप्रवर्तन करना; जिससे अंतरराष्ट्रीय मामलों पर सुविज्ञ राय रखने वाले एक निकाय का विकास किया जा सके;
(ख) अध्ययन, अनुसंधान, चर्चा, व्याख्यानों, भारत के भीतर और बाहर ऐसे ही कार्यकलाप में लगे हुए अन्य संगठनों से विचारों और जानकारी के आदान-प्रदान द्वारा अन्य देशों के साथ भारत के संबंधों का संप्रवर्तन करना;
(ग) विश्व मामलों के संबंध में जानकारी और ज्ञान सूचना प्रसार केन्द्र के रूप में सेवा करना;
(घ) खंड (क) और खंड (ख) के अंतर्गत आने वाले विषयों पर पुस्तकों, नियतकालिक पत्रिकाओं, जर्नलों, पुनर्विलोकनों, पेपरों, पम्फलेटों और अन्य साहित्य को प्रकाशित करना;
(ङ) इस धारा में वर्णित उद्देश्यों का संप्रवर्तन करने वाले संगठनों से संपर्क स्थापित करना;
(च) अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भारतीय नीति की चर्चा और अध्ययन करने के लिए सम्मेलन और संगोष्ठियों की व्यवस्था करना; और
(छ) विचारों के संप्रवर्तन और ऊपर वर्णित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए वैसे ही अन्य कार्यकलाप करना ।
14. परिषद् का शासी निकाय और अन्य समितियां-(1) परिषद् का एक शासी निकाय होगा जो परिषद् द्वारा गठित किया जाएगा ।
(2) शासी निकाय परिषद् की कार्यकारी समिति होगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगी जो परिषद्, इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा, उसे प्रदत्त करे या उस पर अधिरोपित करे ।
(3) ऐसी तारीख से ही, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत की जाए, भारत का उपराष्ट्रपति, पदेन शासी निकाय का सभापति होगा और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
(4) शासी निकाय द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और शासी निकाय का सदस्यों की पदावधि और उनमें रिक्तियों को भरने की रीति वह होगी, जो विनियमों द्वारा विहित की जाए ।
(5) ऐसे नियंत्रण और निर्बंधनों के, जो नियमों द्वारा विहित किए जाएं, अधीन रहते हुए, परिषद् उतनी स्थायी समितियां और उतनी तदर्थ समितियां गठित कर सकेगी, जो वह परिषद् की किसी शक्ति का प्रयोग करने या किसी कृत्य का निर्वहन करने या किसी ऐसे विषय, जिसे परिषद्, उन्हें निर्देशित करे, की जांच करने या उस पर रिपोर्ट या सलाह देने के लिए ठीक समझे ।
(6) शासी निकाय या स्थायी समिति या तदर्थ समिति का सभापति और सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
15. परिषद् के कर्मचारिवृन्द- [(1) परिषद् का एक महानिदेशक होगा जो धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन परिषद् गठित किए जाने के पूर्व, उस धारा की उपधारा (1) के अधीन गठित परिषद् द्वारा और तत्पश्चात् धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन गठित किसी परिषद् की अवधि के दौरान उस परिषद् द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
(1क) उपधारा (1) के अधीन महानिदेशक की प्रत्येक नियुक्ति भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा सिफारिश किए गए कम से कम दो नामों के पैनल में से की जाएगी ।
(1ख) महानिदेशक परिषद् का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा ।
(1ग) महानिदेशक कम से कम भारत सरकार के अपर सचिव की पंक्ति के समतुल्य होगा और उसकी पदावधि तीन वर्ष से अधिक की नहीं होगी ।
(2) महानिदेशक परिषद्, उसके शासी निकाय और उसके अन्य निकायों तथा समितियों के पदेन सदस्य-सचिव के रूप में कार्य करेगा ।]
(3) महानिदेशक, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं या जो उसे परिषद् या परिषद् के अध्यक्ष या शासी निकाय या सभापति द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(4) विदेश मंत्रालय का वित्तीय सलाहकार, परिषद् का वित्तीय सलाहकार होगा ।
(5) ऐसे नियमों के, जो इस निमित्त बनाए जाएं, अधीन रहते हुए परिषद् उतने अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगी, जितने उसकी शक्तियों का प्रयोग करने और उसके कृत्यों का दक्षतापूर्ण निर्वहन करने के लिए आवश्यक हों और ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के पदाभिधानों और श्रेणियों का अवधारण कर सकेगी ।
(6) ऐसे नियमों के, जो इस निमित्त बनाए जाएं, अधीन रहते हुए, परिषद् का महानिदेशक और अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी ऐसे वेतन और भत्तों के हकदार होंगे और छुट्टी, पेंशन, उपदान, भविष्य निधि और अन्य विषयों की बाबत सेवा की ऐसी शर्तों से शासित होंगे, जो इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा विहित की जाएं ।
16. परिषद् के कृत्य-परिषद् धारा 13 में विनिर्दिष्ट परिषद् के उद्देश्यों को दक्षतापूर्ण रूप में प्राप्त करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों के संप्रर्वतन, आयोजन और क्रियान्वयन के लिए विभिन्न योजनाएं चलाएगी और ऐसे अन्य कृत्यों का भी पालन करेगी जो केन्द्रीय सरकार, नियमों द्वारा, विहित करे ।
17. परिषद् को संदाय-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त बनाई गई विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में परिषद् को ऐसी धनराशियों का संदाय कर सकेगी जो, इस अधिनियम के अधीन परिषद् की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का दक्षतापूर्ण निर्वहन करने के लिए आवश्यक समझी जाएं ।
18. परिषद् की निधि-(1) परिषद् एक निधि रखेगी जिसमें निम्नलिखित जमा किया जाएगा-
(क) केन्द्रीय सरकार से प्राप्त सभी धन;
(ख) परिषद् द्वारा अनुदानों, दानों, संदानों, उपकृतियों, वसीयतों या अंतरणों के रूप में प्राप्त सभी धन; और
(ग) परिषद् द्वारा किसी अन्य रीति से या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त सभी धन ।
(2) निधि में जमा सभी धन ऐसे बैंकों में निक्षिप्त किया जाएगा या ऐसी रीति से विनिहित किया जाएगा जो परिषद्, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन रहते हुए, विनिश्चित करे ।
(3) निधि का उपयोजन परिषद् के प्रशासनिक और अन्य व्ययों को पूरा करने के लिए किया जाएगा, जिनमें धारा 16 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का निर्वहन करने में या उसमें निर्दिष्ट किसी कार्यकलाप के संबंध में अथवा उससे संबंधित हो सकने वाली किसी बात के संबंध में उपगत व्यय सम्मिलित हैं ।
19. परिषद् का बजट-परिषद् प्रत्येक वर्ष ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो नियमों द्वारा विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष के संबंध में एक बजट तैयार करेगी जिसमें परिषद् की प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दिखाएं जाएंगे और केन्द्रीय सरकार को उसकी उतनी संख्या में प्रतियां भेजेगी, जितनी नियमों द्वारा विहित की जाएं ।
20. लेखा और संपरीक्षा-(1) परिषद् उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगी और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसमें तुलन-पत्र भी सम्मिलित है, ऐसे प्ररूप में, जो केन्द्रीय सरकार नियमों द्वारा विहित करे और ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार जो उस सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से जारी किए जाएं, तैयार करेगा ।
(2) परिषद् के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और उसके द्वारा ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय परिषद् द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और परिषद् के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में या उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति को ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं, और उसे, विशिष्टतया, बहियों, लेखाओं, संबंधित वाउचरों और अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्रों को पेश किए जाने की मांग करने और परिषद् के किसी भी कार्यालय या कार्यालयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित परिषद् के लेखे उन पर उसकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ, प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को भेजे जाएंगे तथा वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
21. वार्षिक रिपोर्ट-परिषद्, प्रतिवर्ष, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो नियमों द्वारा विहित किया जाए, एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी जिसमें पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों का सही और पूरा विवरण दिया जाएगा और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी और वह सरकार उसे संसद् के प्रत्येक के समक्ष रखवाएगी ।
22. परिषद् के आदेशों और लिखतों का अधिप्रमाणन-परिषद् के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे और परिषद् द्वारा जारी की गई सभी अन्य लिखतें महानिदेशक या परिषद् द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत परिषद् के किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।
23. रिक्ति, आदि से परिषद् आदि की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-परिषद्, शासी निकाय या इस अधिनियम के अधीन किसी स्थायी अथवा तदर्थ समिति का कोई भी कार्य या कार्यवाही केवल निम्नलिखित के कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-
(क) परिषद् में कोई रिक्ति या उसके गठन में त्रुटि है; या
(ख) परिषद् के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या
(ग) परिषद् की कार्यवाही में कोई ऐसी अनियमितता है, जिससे मामले के गुणागुण प्रभावित नहीं होते हैं ।
[23क. अस्थायी उपबंध-शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि धारा 7 की उपधारा (2) के निबंधनों के अनुसार परिषद् का गठन होने तक, उस धारा की उपधारा (1) में निर्दिष्ट परिषद्, इस अधिनियम के किसी उपबंध में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए परिषद् समझी जाएगी:
परंतु इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के किसी उपबंध के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई या प्रारंभ की गई कोई कार्यवाही, धारा 7 की उपधारा (2) के निबंधनों के अनुसार परिषद् के अस्तित्व में न होने के कारण किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी के समक्ष प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।]
24. रिपोर्टें, विवरणियां और जानकारी-परिषद् केन्द्रीय सरकार को ऐसी रिपोर्टें, विवरणियां और अन्य जानकारी देगी जिनकी वह सरकार, समय-समय पर, अपेक्षा करे ।
25. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
(क) धारा 8 की उपधारा (7) के अधीन सदस्यों में रिक्तियों को भरने की रीति;
(ख) अध्यक्ष और उपाध्यक्ष द्वारा, यथास्थिति, धारा 9 और 10 के अधीन प्रयोग की जाने वाली शक्तियां और निर्वहन किए जाने वाले कृत्य;
(ग) धारा 11 के अधीन सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;
(घ) धारा 14 की उपधारा (5) के अधीन स्थायी और तदर्थ समितियों के गठन के संबंध में नियंत्रण और निर्बन्धन;
(ङ) धारा 15 की उपधारा (5) के अधीन उन अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या जो परिषद् द्वारा नियुक्त किए जा सकेंगे और ऐसी नियुक्ति की रीति;
(च) धारा 15 की उपधारा (6) के अधीन परिषद् के महानिदेशक और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते;
(छ) धारा 16 के अधीन ऐसे अन्य कृत्य जिनका पालन परिषद् द्वारा किया जाएगा;
(ज) धारा 19 के अधीन वह प्ररूप, जिसमें और वह समय जब परिषद् द्वारा बजट तैयार किया जाएगा और केन्द्रीय सराकर को भेजी जाने वाली प्रतियों की संख्या;
(झ) वह प्ररूप, जिसमें लेखाओं का वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलन-पत्र भी है, धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन परिषद् द्वारा तैयार किया जाएगा;
(ञ) वह प्ररूप जिसमें और वह समय जब परिषद् के क्रियाकलापों की वार्षिक रिपोर्ट धारा 21 के अधीन केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत की जाएगी;
(ट) कोई अन्य विषय जो नियमों द्वारा विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए ।
26. विनियम बनाने की शक्ति-(1) परिषद्, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों से संगत विनियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
(क) धारा 12 के अधीन, परिषद् के पहले अधिवेशन से भिन्न अधिवेशनों को बुलाना और कराना, वह समय और स्थान जहां ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे और ऐसे अधिवेशनों में कारबार का संव्यवहार;
(ख) धारा 14 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन शासी निकाय और सभापति द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्ितयां और निर्वहन किए जाने वाले कृत्य;
(ग) धारा 14 की उपधारा (4) के अधीन शासी निकाय द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग करने और अपने कृत्यों का निर्वहन करने में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और शासी निकाय के सदस्यों की पदावधि और उनमें हुई रिक्तियों को भरने की रीति;
(घ) धारा 14 की उपधारा (6) के अधीन शासी निकाय, स्थायी और तदर्थ समितियों के सभापति और सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;
(ङ) धारा 15 की उपधारा (3) के अधीन महानिदेशक द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां और निर्वहन किए जाने वाले कृत्य;
(च) धारा 15 की उपधारा (6) के अधीन परिषद् के महानिदेशक और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों के सेवा की शर्तें;
(छ) कोई अन्य विषय जो विनियमों द्वारा विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन पहले विनियम शासी निकाय द्वारा बनाए जाएंगे और इस प्रकार बनाए गए कोई विनियम, परिषद् द्वारा, उपधारा (1) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, परिवर्तित या विखण्डित किए जा सकेंगे ।
27. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह, यथास्थिति, केवल परिवर्तित रूप में प्रभावी होगा या निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस नियम या विनियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
28. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:
परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नही किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
[28क. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् (संशोधन) अधिनियम, 2003 के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, आदेश द्वारा उक्त कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए ऐसी कोई बात कर सकेगी जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो:
परंतु ऐसा कोई आदेश विश्व मामलों से संबंधित भारतीय परिषद् (संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रांरभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।]
29. निरसन और व्यावृत्ति-(1) भारतीय विश्व कार्यकलाप परिषद् (दूसरा) अध्यादेश, 2001 (2001 का अध्यादेश 3) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) उक्त अध्यादेश के निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन समझी जाएगी ।
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