औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946
(1946 का अधिनियम संख्यांक 20)
[23 अप्रैल, 1946]
औद्योगिक स्थापनों में नियोजकों से उनके अधीन के नियोजन
की शर्तों को प्ररूपतः परिभाषित
करने की अपेक्षा करने के लिए
अधिनियम
यह समीचीन है कि औद्योगिक स्थापनों में नियोजकों से उनके अधीन के नियोजन की शर्तों को पर्याप्त प्रमिति के साथ परिभाषित करने की और उनके द्वारा नियोजित कर्मकारों को उक्त शर्तों का ज्ञान कराने की अपेक्षा की जाए ;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियम किया जाता है :
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और लागू होना-यह अधिनियम औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार *** सम्पूर्ण भारत पर है ।
[(3) यह हर ऐसे औद्योगिक स्थापन को लागू है जिसमें एक सौ या उससे अधिक कर्मकार नियोजित हैं या पूर्ववर्ती बारह मासों में किसी भी दिन नियोजित थे :
परन्तु समुचित सरकार, ऐसा करने के अपने आशय की कम से कम दो मास की सूचना देने के पश्चात्, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबन्धों को किसी ऐसे औद्योगिक स्थापन को, जिसमें एक सौ से कम उतने व्यक्ति नियोजित हों, जितने अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हों, लागू कर सकेगी ।]
। । । । ।
[(4) इस अधिनियम की कोई भी बात-
(i) किसी ऐसे उद्योग को, जिसे बाम्बे इंडस्ट्रीयल रिलेशन्स ऐक्ट, 1946 (1947 का मुम्बई अधिनियम 11) के अध्याय 7 के उपबंध लागू हैं ; अथवा
(ii) किसी ऐसे औद्योगिक स्थापन को, जिसे मध्य प्रदेश इंडस्ट्रीयल एम्प्लायमेंट (स्टेंडिंग आर्डर्स) ऐक्ट, 1961 (1961 का मध्य प्रदेश अधिनियम 26) के उपबंध लागू हैं, लागू नहीं होगी :
परन्तु मध्य प्रदेश इंडस्ट्रीयल एम्प्लायमेंट (स्टेंडिंग आर्डर्स) ऐक्ट, 1961 (1961 का मध्य प्रदेश अधिनियम 26) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के उपबंध केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन के सभी औद्योगिक स्थापनों को लागू होंगे ।]
2. निर्वचन-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,-
[(क) “अपील प्राधिकारी" से ऐसा प्राधिकारी अभिप्रेत है जिसे समुचित सरकार ने इस अधिनियम के अधीन अपील प्राधिकारी के कृत्यों का प्रयोग ऐसे क्षेत्र में करने के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हो, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त किया हो :
परन्तु ऐसी अपील के संबंध में, जो औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) संशोधन अधिनियम, 1963 (1963 का 39) के प्रारम्भ से अव्यवहित पूर्व किसी औद्योगिक न्यायालय या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लम्बित हो, वह न्यायालय या प्राधिकारी ही अपील प्राधिकारी समझा जाएगा ;]
(ख) “समुचित सरकार" से केन्द्रीय सरकार के या [रेल प्रशासन] के अधीन के या किसी महापत्तन, खान या तेल-क्षेत्र में के औद्योगिक स्थापनों के बारे में केन्द्रीय सरकार, और अन्य सभी दशाओं में राज्य सरकार अभिप्रेत है :
[परन्तु जहां यह प्रश्न उठता है कि कोई औद्योगिक स्थापन केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन है या नहीं, वहां वह सरकार नियोजक या कर्मकार या किसी व्यवसाय संघ या कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य निकाय द्वारा किए गए निर्देश पर या स्वप्रेरणा से और पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उस प्रश्न का विनिश्चय कर सकेगी और ऐसा विनिश्चय अन्तिम और पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ;]
[(ग) “प्रमाणकर्ता आफिसर" से श्रम आयुक्त या प्रादेशिक श्रम आयुक्त अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा अन्य आफिसर आता है जिसे समुचित सरकार ने इस अधिनियम के अधीन प्रमाणकर्ता आफिसर के सभी कृत्यों का या उनमें से किन्हीं का भी पालन करने के लिए शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त किया हो ;]
(घ) “नियोजक" से उस औद्योगिक स्थापन का स्वामी अभिप्रेत है जिसे यह अधिनिमय तत्समय लागू हो और इसके अन्तर्गत निम्नलिखित आते हैं
(i) किसी कारखाने में, कारखाने के प्रबंधक के रूप में [कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 7 की उपधारा (1) के खण्ड (च)ट के अधीन नामित कोई व्यक्ति ;
(ii) भारत में की किसी सरकार के किसी विभाग के नियंत्रणाधीन किसी औद्योगिक स्थापन में, वह प्राधिकारी, जो इस निमित्त ऐसी सरकार द्वारा नियुक्त किया गया हो या जहां कि इस प्रकार कोई प्राधिकारी नियुक्त न किया गया हो वहां उस विभाग का अध्यक्ष ;
(iii) किसी अन्य औद्योगिक स्थापन में उस औद्योगिक स्थापन के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए स्वामी के प्रति उत्तरदायी कोई व्यक्ति ;
(ङ) “औद्योगिक स्थापन" से अभिप्रेत है-
(i) मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 (1936 का 4) की धारा 2 के खण्ड (ii) में यथापरिभाषित औद्योगिक स्थापन, अथवा
[(ii) कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 2 के खण्ड (ङ) में यथापरिभाषित कारखाना, अथवा]
(iii) भारतीय रेल अधिनियम, 1890 (1890 का 9) की धारा 2 के खण्ड (4) में यथा परिभाषित रेल, अथवा
(iv) किसी ऐसे व्यक्ति का स्थापन, जो किसी औद्योगिक स्थापन के स्वामी के साथ की गई संविदा की पूर्ति करने के प्रयोजन के लिए कर्मकार नियोजित करता है ;
(च) “विहित" से समुचित सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(छ) “स्थायी आदेशों" से अनुसूची में उपवर्णित विषयों के संबंध में नियम अभिप्रेत है ;
(ज) “व्यवसाय संघ" से भारतीय व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन तत्समय रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ अभिप्रेत है ;
[(झ) “मजदूरी" और “कर्मकार" का वही अर्थ है जो उनका क्रमशः औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 2 के खण्ड (दद) तथा खण्ड (घ) में है ।]
3. स्थायी आदेशों के प्रारूप का निवेदित किया जाना-(1) नियोजक उन स्थायी आदेशों के, जिन्हें अपने औद्योगिक स्थापन को अंगीकृत करने की उसकी प्रस्थापना है, प्रारूप की पांच प्रतियां प्रमाणकर्ता आफिसर को उस तारीख से छह मास के भीतर निवेदित करेगा जिसको यह अधिनियम औद्योगिक स्थापन को लागू हो जाता है ।
(2) ऐसे प्रारूप में, अनुसूची में उपवर्णित ऐसे हर विषय के लिए उपबंध किया जाएगा जो उस औद्योगिक स्थापन को लागू हो, और जहां कि आदर्श स्थायी आदेश विहित किए गए हों, वहां प्रारूप यावत्साध्य ऐसे आदर्श के अनुरूप होगा ।
(3) औद्योगिक स्थापन में नियोजित कर्मकारों की विहित विशिष्टियां, जिसके अन्तर्गत उस व्यवसाय संघ का यदि कोई हो, जिसके वे सदस्य हों, नाम आता है, देने वाला विवरण इस धारा के अधीन निवेदित स्थायी आदेशों के प्रारूप के साथ होगा ।
(4) ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, यह है कि एक ही प्रकार के औद्योगिक स्थापनों में के नियोजकों का कोई समूह इस धारा के अधीन स्थायी आदेशों का एक संयुक्त प्रारूप निवेदित कर सकेगा ।
4. स्थायी आदेशों के प्रमाणन के लिए शर्तें-स्थायी आदेश इस अधिनियम के अधीन प्रमाणनीय होंगे, यदि-
(क) उनमें अनुसूची में उपवर्णित ऐसे हर विषय के लिए उपबंध किया गया हो, जो उस औद्योगिक स्थापन को लागू है, तथा
(ख) स्थायी आदेश अन्यथा इस अधिनियम के उपबंधों के अनुरूप हों,
और किन्ही स्थायी आदेशों के उपबंधों की ऋजुता या युक्तियुक्तता का न्यायनिर्णयन करना प्रमाणकर्ता आफिसर या अपील प्राधिकारी का [कृत्य होगा] ।
5. स्थायी आदेशों का प्रमाणन-(1) धारा 3 के अधीन प्रारूप की प्राप्ति पर, प्रमाणकर्ता आफिसर उसकी एक प्रति कर्मकारों के व्यवसाय संघ को, यदि कोई हों, अथवा जहां कि ऐसा कोई व्यवसाय संघ न हो वहां कर्मकारों को, ऐसी रीति से, जैसी विहित की जाए, भेजेगा, जिसके साथ विहित प्ररूप में ऐसी सूचना भी होगी जिसमें, सूचना की प्राप्ति के पन्द्रह दिन के भीतर, वे आक्षेप, यदि कोई हों, भेजने की अपेक्षा की जाएगी जो स्थायी आदेशों के प्रारूप के बारे में कर्मकार करना चाहें ।
(2) नियोजक को और व्यवसाय संघ को या कर्मकारों के ऐसे अन्य प्रतिनिधियों को, जो विहित किए जाएं, सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् प्रमाणकर्ता आफिसर यह विनिश्चय करेगा कि नियोजक द्वारा भेजे गए प्रारूप में कोई उपान्तर या परिवर्धन करना स्थायी आदेशों के प्रारूप को इस अधिनियम के अधीन प्रमाणनीय बनाने के लिए आवश्यक है या नहीं, और तद्नुसार लिखित आदेश करेगा ।
(3) प्रमाणकर्ता आफिसर तदुपरि स्थायी आदेशों के प्रारूप में ऐसे उपान्तर करने के पश्चात् जो उपधारा (2) के अधीन के उसके आदेश में अपेक्षित हों, उन्हें प्रमाणित करेगा, और विहित रीति से अधिप्रमाणीकृत प्रमाणित स्थायी आदेशों की और उपधारा (2) के अधीन के अपने आदेश की प्रतियां तत्पश्चात् सात दिन के भीतर नियोजक को और व्यवसाय संघ को या कर्मकारों के अन्य विहित प्रतिनिधियों को भेजेगा ।
6. अपीलें-(1) धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन प्रमाणकर्ता आफिसर के आदेश से व्यथित [नियोजक, कर्मकार, व्यवसाय संघ या कर्मकारों का अन्य विहित प्रतिनिधि], उस तारीख से, जिसको उस धारा की उपधारा (3) के अधीन प्रतियां भेजी गई हों, [तीस दिन] के भीतर अपील प्राधिकारी को अपील कर सकेगा, और अपील प्राधिकारी, जिसका विनिश्चय अंतिम होगा, स्थायी आदेशों को, या तो प्रमाणकर्ता आफिसर द्वारा प्रमाणित रूप में या उक्त स्थायी आदेशों में से उपान्तर या परिवर्धन करके, जिन्हें करना वह उन स्थायी आदेशों को इस अधिनियम के अधीन प्रमाणनीय बनाने के लिए आवश्यक समझे, संशोधित करने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा पुष्ट करेगा ।
(2) अपील प्राधिकारी, उपधारा (1) के अधीन के अपने आदेश के सात दिन के भीतर, उसकी प्रतियां प्रमाणकर्ता आफिसर को, नियोजक को और व्यवसाय संघ या कर्मकारों के अन्य विहित प्रतिनिधियों को, भेजेगा, जिनके साथ, जब तक कि अपील प्राधिकारी ने प्रमाणकर्ता आफिसर द्वारा प्रमाणित स्थायी आदेशों को संशोधन के बिना पुष्ट न कर दिया हो, अपने द्वारा यथाप्रमाणित और विहित रीति से अधिप्रमाणीकृत स्थायी आदेशों की प्रतियां भी होंगी ।
7. स्थायी आदेशों के प्रवर्तन की तारीख-स्थायी आदेश, जहां कि धारा 6 के अधीन अपील नहीं की गई है वहां, उस तारीख से, जिसको उसकी अधिप्रमाणिकृत प्रतियां धारा 5 की उपधारा (3) के अधीन भेजी गई हों, तीस दिन के अवसान पर, या जहां कि यथापूर्वोक्त अपील की गई हो वहां उस तारीख से, जिसको अपील प्राधिकारी के आदेश की प्रतियां धारा 6 की उपधारा (2) के अधीन भेजी गई हों, सात दिन के अवसान पर, प्रवर्तन में आएंगे ।
8. स्थायी आदेशों का रजिस्टर-इस अधिनियम के अधीन अन्तिम रूप से यथाप्रमाणित सभी स्थायी आदेशों की एक प्रति उस प्रयोजन के लिए विहित प्ररूप में रखे गए गए रजिस्टर में प्रमाणकर्ता आफिसर द्वारा फाइल की जाएगी और प्रमाणकर्ता आफिसर उसकी प्रति, उसके लिए आवेदन करने वाले किसी भी व्यक्ति को, विहित फीस के दिए जाने पर, देगा ।
9. स्थायी आदेशों का लगाया जाना-इस अधिनियम के अधीन अन्तिम रूप से यथाप्रमाणित स्थायी आदेश अंग्रेजी में और नियोजक के कर्मकारों की बहुसंख्या द्वारा समझी जाने वाली भाषा में उस प्रवेश द्वार पर या उसके निकट, जहां से कर्मकारों की बहुसंख्या औद्योगिक स्थापन में प्रवेश करती है, और उसके सभी विभागों में, जहां कर्मकार नियोजित हैं, इस प्रयोजन के लिए रखे जाने वाले विशेष फलकों पर नियोजक द्वारा प्रमुख रूप से लगाए जाएंगे ।
10. स्थायी आदेशों की अस्तित्वावधि और उनका उपान्तरण-(1) इस अधिनियम के अधीन अन्तिम रूप से प्रमाणित स्थायी आदेश, उस तारीख से, जिसको स्थायी आदेश या उनके अन्तिम उपान्तर प्रवर्तन में आए थे, छह मास के अवसान तक उपान्तरित नहीं किए जा सकेंगे किन्तु, नियोजक और कर्मकारों [या व्यवसाय संघ या कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य निकायट के बीच करार होने पर उपान्तरित किए जा सकेंगे ।
[(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि नियोजक या कर्मकार [या व्यवसाय संघ या कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य निकाय] स्थायी आदेशों को उपान्तरित कराने के लिए प्रमाणकर्ता आफिसर को आवेदन कर सकेगा और ऐसे आवेदन के साथ उन *** उपान्तरों की पांच प्रतियां होंगी जिनका किया जाना प्रस्थापित है, और जहां कि नियोजक और कर्मकारों 3[या व्यवसाय संघ या कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य निकाय] के बीच हुए करार द्वारा ऐसे उपान्तरों का किया जाना प्रस्थापित हो, वहां उस करार की एक प्रमाणित प्रति आवेदन के साथ फाइल की जाएगी ।]
(3) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंध उपधारा (2) के अधीन किए गए आवेदन की बाबत उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे प्रथम स्थायी आदेशों के प्रमाणन को लागू होते हैं ।
[(4) उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसे औद्योगिक स्थापन को लागू नहीं होगी जिसके बारे में समुचित सरकार गुजरात राज्य की सरकार या महाराष्ट्र राज्य की सरकार है ।]
[10क. निर्वाह भत्ते का संदाय-(1) जहां कोई नियोजक किसी कर्मकार को, अवचार के सम्बन्ध में उसके विरुद्ध किसी परिवाद या आरोप के अन्वेषण या जांच के लम्बित रहने तक, निलम्बित करता है, वहां नियोजक ऐसे कर्मकार को
(क) निलम्बन के प्रथम नब्बे दिन के लिए, उस मजदूरी के पचास प्रतिशत की दर से निर्वाह भत्ता संदाय करेगा जिसका कर्मकार ऐसे निलम्बन की तारीख से ठीक पूर्व हकदार था ; और
(ख) निलम्बन की शेष अवधि के लिए, ऐसी मजदूरी के पचहत्तर प्रतिशत की दर से निर्वाह भत्ता संदाय करेगा यदि ऐसे कर्मकार के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाहियां पूरी करने में विलंब का संबंध सीधे ऐसे कर्मकारों के आचरण से न हो ।
(2) यदि उपधारा (1) के अधीन कर्मकार को संदेय निर्वाह भत्ते के सम्बन्ध में कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो सम्बन्धित कर्मकार या नियोजक, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन गठित ऐसे श्रम न्यायालय को, जिसकी स्थानीय अधिकारिता में औद्योगिक स्थापन, जिसमें ऐसा कर्मकार नियोजित है, स्थित है, विवाद निर्दिष्ट कर सकेगा और ऐसा श्रम न्यायालय, जिसको ऐसा विवाद निर्दिष्ट किया गया है, पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् विवाद का विनिश्चय करेगा और ऐसा विनिश्चय, अन्तिम और पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ।
(3) इस धारा के पूर्वोक्त उपबन्धों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी राज्य में उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन निर्वाह भत्ते के संदाय के संबंध में उपबन्ध ऐसे हैं जो इस धारा के उपबन्धों से अधिक फायदाप्रद हैं, वहां ऐसी अन्य विधि के उपबन्ध, उस राज्य में निर्वाह भत्ते के संदाय के लिए लागू होंगे ।]
11. प्रमाणकर्ता आफिसर और अपील प्राधिकारियों को सिविल न्यायालय की शक्तियां होंगी- [(1)] हर प्रमाणकर्ता आफिसर और अपील प्राधिकारी को साक्ष्य ग्रहण करने, शपथ दिलाने, साक्षियों को हाजिर कराने और दस्तावेज प्रकट करने और पेश करने को विवश करने के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी और वह [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346] के अर्थ में सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
[(2) प्रमाणकर्ता आफिसर या अपील प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश में कोई लेखन या गणित सम्बन्धी भूलें, या किसी आकस्मिक भूल या लोप से उसमें उद्भूत कोई गलतियां, किसी भी समय, यथास्थित, उस आफिसर या प्राधिकारी द्वारा या ऐसे आफिसर या प्राधिकारी के पदोत्तरवर्ती द्वारा शुद्ध की जा सकेंगी ।]
12. स्थायी आदेशों के खण्डन में मौखिक साक्ष्य का ग्राह्य नहीं होना-इस अधिनियम के अधीन अन्तिम रूप से यथाप्रमाणित स्थायी आदेशों में परिवर्धन या अन्यथा फेरफार या उनका खण्डन करने का प्रभाव रखने वाला कोई भी मौखिक साक्ष्य किसी न्यायालय में ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
[12क. आदर्श स्थायी आदेशों का अस्थायी तौर पर लागू होना-(1) धारा 3 से धारा 12 तक में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उस कालावधि के लिए, जो उस तारीख को प्रारम्भ होती है जिसको यह अधिनियम किसी औद्योगिक स्थापन को लागू होता है और उस तारीख के साथ समाप्त होती है जिसको उस अधिनियम के अधीन अन्तिम रूप से यथाप्रमाणित स्थायी आदेश धारा 7 के अधीन उस स्थापन में प्रवृत्त हो, विहित आदर्श आदेश उस स्थापन में अंगीकृत किए गए समझे जाएंगे, और धारा 9, धारा 13 की उपधारा (2) और धारा 13क के उपबंध ऐसे आदर्श स्थायी आदेशों को उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे इस प्रकार प्रमाणित स्थायी आदेशों को लागू होते हैं ।]
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसे औद्योगिक स्ंथापन को लागू नहीं होगी जिसके बारे में समुचित सरकार, गुजरात राज्य की सरकार या महाराष्ट्र राज्य की सरकार हो ।]
13. शास्तियां और प्रक्रिया-(1) कोई नियोजक, जो स्थायी आदेशों का प्रारूप धारा 3 द्वारा यथापेक्षित निवेदित करने में असफल रहेगा, या जो अपने स्थायी आदेशों को धारा 10 के अनुसार उपान्तरित करने से अन्यथा उपान्तरित करेगा वह जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, और चालू रहने वाले अपराध की दशा में अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम दिन के पश्चात् ऐसे हर दिन के लिए, जिसके दौरान अपराध चालू रहता है, दो सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
(2) कोई नियोजक, जो इस अधिनियम के अधीन अंतिम रूप से प्रमाणित स्थायी आदेशों के उल्लंघन में अपने औद्योगिक स्थापन के लिए कोई कार्य करेगा, वह जुर्माने से, जो एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, और चालू रहने वाले अपराध की दशा में अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम दिन के पश्चात् ऐसे हर दिन के लिए, जिसके दौरान अपराध चालू रहता है, पच्चीस रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
(3) इस धारा के अधीन दण्डनीय अपराध के लिए कोई भी अभियोजन, समुचित सरकार की पूर्व मंजूरी से संस्थित किए जाने के सिवाय, संस्थित नहीं किया जाएगा ।
(4) [महानगर मजिस्ट्रेट या द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट] के न्यायालय से अवर कोई भी न्यायालय इस धारा के अधीन किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
[13क. स्थायी आदेशों का निर्वचन, आदि-यदि इस अधिनियम के अधीन प्रमाणित किसी स्थायी आदेश के लागू होने या निर्वचन के बारे में कोई प्रश्न उठे तो कोई भी नियोजक या कर्मकार [या कोई व्यवसाय संघ या कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने वाला अन्य निकाय] औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन गठित और ऐसी कार्यवाही के निपटारे के लिए शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समुचित सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट श्रम न्यायालयों में से किसी एक को वह प्रश्न निर्देशित कर सकेगा, और वह श्रम न्यायालय, जिसे प्रश्न इस प्रकार निर्देशित किया गया हो, पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् प्रश्न को विनिश्चित करेगा और ऐसा विनिश्चय अंतिम और पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ।
13ख. कतिपय औद्योगिक स्थापनों को अधिनियम का लागू न होना-इस अधिनियम की कोई भी बात किसी औद्योगिक स्थापन को वहां तक लागू न होगी जहां तक कि उसमें नियोजित कर्मकार ऐसे व्यक्ति हों, जिन्हें फंडामेंटल एण्ड सप्लीमेंटरी रूल्स, सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, सिविल सर्विसेज (टेम्पोरेरी सर्विस) रूल्स, रिवाइज्ड लीव रूल्स, सिविल सर्विस रेगूलेशन्स, रक्षा सेवाओं में के सिविलियन (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम या भारतीय रेल स्थापन संहिता या कोई ऐसे अन्य नियम या विनियम, जो शासकीय राजपत्र में इस निमित्त समुचित सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाएं, लागू होते हों ।]
14. छूट देने की शक्ति-समुचित सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी औद्योगिक स्थापन या औद्योगिक स्थापनों के वर्ग को इस अधिनियम के सब उपबन्धों से या उनमें से किसी से भी सशर्त या अशर्त छूट दे सकेंगी ।
[14क. शक्तियों का प्रत्यायोजन-समुचित सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य कोई भी शक्ति ऐसे मामलों के सम्बन्ध में और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अध्यधीन रहते हुए, जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, निम्नलिखित द्वारा भी प्रयोक्तव्य होंगी-
(क) जहां कि समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है वहां केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ ऐसे आफिसर या प्राधिकारी द्वारा, जिसे अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, या राज्य सरकार द्वारा, या राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे आफिसर या प्राधिकारी द्वारा, जिसे अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ;
(ख) जहां कि समुचित सरकार राज्य सरकार है, वहां उस राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे आफिसर या प्राधिकारी द्वारा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।]
15. नियम बनाने की शक्ति-(1) समुचित सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, पूर्व प्रकाशन के पश्चात्, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम-
(क) अनुसूची में सम्मिलित किए जाने के लिए अतिरिक्त विषय, और इस अधिनियम के अधीन प्रमाणित स्थायी आदेशों को ऐसे किसी अतिरिक्त विषय के अनुसार उपान्तरित करने में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया विहित कर सकेंगे ;
(ख) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आदर्श स्थायी आदेश उपवर्णित कर सकेंगे ;
(ग) प्रमाणकर्ता आफिसरों और अपील प्राधिकारियों के लिए प्रक्रिया विहित कर सकेंगे ;
(घ) वह फीस विहित कर सकेंगे, जो स्थायी आदेशों के रजिस्टर में प्रविष्ट स्थायी आदेशों की प्रतिलिपियों के लिए प्रभारित की जा सकेगी ;
(ङ) अन्य किसी विषय के लिए, जो विहित किया जाना है या किया जाए, उपबन्ध कर सकेंगे :
परन्तु खण्ड (क) के अधीन कोई नियम बनाए जाने से पूर्व समुचित सरकार नियोजकों और कर्मकारों दोनों ही के प्रतिनिधियों से परामर्श करेगी ।
[(3) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । वह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक अनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
अनुसूची
[धारा 2(घ) और 3(2) देखिए]
इस अधिनियम के अधीन स्थायी आदेशों में उपबन्धित किए जाने वाले विषय
1. कर्मकारों का वर्गीकरण, उदाहरणार्थ स्थायी, अस्थायी, शिक्षु, परिवीक्षाधीन या बदली ।
2. कर्मकारों की काम की कालावधियां और घंटे, अवकाश दिन, वेतन दिवस और मजदूरी की दरें प्रज्ञापित करने की रीति ।
3. पारी में काम ।
4. हाजिरी और विलम्ब से आना ।
5. छुट्टी और अवकाश दिनों की शर्तें, उनके लिए आवेदन करने की प्रक्रिया और प्राधिकारी जो उन्हें अनुदत्त कर सकेगा ।
6. यह अपेक्षा कि परिसर में प्रवेश निश्चित द्वारों से हो और तलाशी के लिए दायित्वाधीन होना ।
7. औद्योगिक स्थापन के अनुभागों को बन्द करना और पुनः खोलना, और काम का अस्थायी रूप से रोका जाना तथा उनसे उद्भूत नियोजकों और कर्मकारों के अधिकार और कर्तव्य ।
8. नियोजन का पर्यवसान तथा नियोजक और कर्मकारों द्वारा उसकी सूचना का दिया जाना ।
9. अवचार के लिए निलम्बन या पदच्युति और ऐसे कृत्य या लोप जो अवचार गठित करते हों ।
10. नियोजक या उसके अभिकर्ताओं या सेवकों द्वारा अऋजु बर्ताव या सदोष अत्यादाय के विरुद्ध कर्मकारों के लिए प्रतितोष के साधन ।
11. कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
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