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सरकारी बचत-पत्र अधिनियम, 1959 ( Government Savings Certificates Act, 1959 )


 

सरकारी बचत-पत्र अधिनियम, 1959

(1959 का अधिनियम संख्यांक 46)

[18 सितम्बर, 1959]

सरकारी बचत-पत्रों के सम्बन्ध में

कतिपय उपबन्धों को

बनाने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के दसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

1. संक्षिप्त नाम, प्रारम्भ और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सरकारी बचत-पत्र अधिनियम, 1959 है

(2) यह उस तारीख1 को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे

(3) यह बचत-पत्रों के ऐसे वर्ग को लागू है जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचनाद्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो, -

                                 3[() धारक" से बचत पत्र के संबंध में अभिप्रेत है, -

(i) कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किन्हीं, नियमों के उपबंधों के अनुसार जारी किया गया बचत पत्र किसी समय उस तारीख से पूर्व, 2005 जिसको वित्त विधेयक, राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करता है, धारण करता है; और

(ii) कोई व्यष्टि, जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अनुसार जारी किया गया बचत पत्र किसी समय उस तारीख को या उसके पश्चात्, जिसको वित्त विधेयक, राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करता है, धारण करता है;]

(कक) अवयस्क" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके बारे में यह नहीं समझा गया है कि उसने भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 (1875 का 9) के अधीन वयस्कता प्राप्त करती है;

() विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

() बचत-पत्र" से ऐसा बचत-पत्र अभिप्रेत है जिसे यह अधिनियम लागू है;

() अंतरण" से जीवित व्यक्तियों के बीच अन्तरण अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत विधि की क्रिया द्वारा अंतरण नहीं आता है

3. बचत-पत्रों के अन्तरण पर निर्बन्धन-किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में किसी बात के होते हुए भी, बचत-पत्र का कोई भी अंतरण, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के पूर्व अथवा पश्चात् किया गया हो, विधिमान्य नहीं होगा जब तक वह विहित प्राधिकारी की पूर्व लिखित सम्मति से किया गया हो

4. अवयस्कों द्वारा अथवा उनकी ओर से धारण करना-किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में किसी उपबन्ध के होते हुए भी,-

() कोई अवयस्क बचत-पत्र के लिए आवेदन और उसको धारण कर सकेगा तथा कोई अन्य व्यक्ति अवयस्क की ओर से बचत-पत्र के लिए आवेदन और उसका धारण कर सकेगा;

() जहां कि कोई बचत-पत्र किसी अवयस्क द्वारा अथवा उसकी ओर से धृत है, वहां अवयस्क इस अधिनियम के और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों से, जो ऐसे बचत-पत्र को लागू हैं, तथा बचत-पत्र के आवेदक द्वारा उक्त नियमों के अनुसरण में की गई घोषणा की शर्तों से आबद्ध होगा भले ही इस अधिनियम के प्रारम्भ होने से पूर्व अथवा पश्चात् उस बचत-पत्र के लिए आवेदन किया गया और वह बचत-पत्र दिया गया हो

5. अवयस्क द्वारा अथवा उसकी ओर से धृत बचत-पत्र की दशा में अदायगी-किसी अवयस्क द्वारा अथवा उसकी ओर से धृत किसी बचत-पत्र पर तत्समय शोध्य राशि की अदायगी-

() उस दशा में, जिसमें कि उसने स्वयं बचत-पत्र के लिए आवेदन किया था, व्यक्तिगत रूप से उसे; अथवा

() उस दशा में, जिसमें कि बचत-पत्र के लिए आवेदन अवयस्क से भिन्न किसी व्यक्ति ने किया था, अवयस्क के उपयोग के लिए-

(i) किसी ऐसे व्यक्ति को, जो अवयस्क की माता या पिता है अथवा उसकी संपत्ति का संरक्षक है, जो भी उस निमित्त आवेदन के प्ररूप में विनिर्दिष्ट किया गया हो,

(ii) वहां जहां कि कोई ऐसा व्यक्ति विनिर्दिष्ट नहीं किया गया है अवयस्क की संपत्ति के ऐसे किसी संरक्षक को, जो सक्षम न्यायालय द्वारा नियुक्त किया गया है, अथवा वहां जहां कि किसी ऐसे संरक्षक की नियुक्ति नहीं हुई है, अवयस्क के माता या पिता में से किसी एक को, अथवा वहां जहां कि माता या पिता में से कोई जीवित नहीं है, अवयस्क के किसी अन्य संरक्षक को,

की जा सकेगी

6. बचत-पत्रों के धारकों द्वारा नामनिर्देशन-(1) जहां कि विहित रीति से किए गए नामनिर्देशन से यह तात्पर्यित है कि यदि बचत-पत्र के धारक की मृत्यु उस बचत-पत्र की परिपक्वता के पूर्व अथवा उसके परिपक्व हो जाने पर किन्तु उसके भुना दिए जाने के पूर्व हो जाए तो उस पर तत्समय शोध्य राशि की अदायगी पाने का अधिकार किसी व्यक्ति विशेष को प्राप्त होगा वहां नामनिर्देशिती किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में अथवा किसी बचत-पत्र के सम्बन्ध में वसीयती अथवा किसी अन्य प्रकार के व्ययन-पत्र में किसी बात के होते हुए भी तब तक जब तक कि नामनिर्देशन में विहित रीति से फेरफार नहीं कर दिया जाता या वह रद्द नहीं किया जाता, बचत-पत्र के धारक की मृत्यु पर, अन्य समस्त व्यक्तियों का अपवर्जन करते हुए, बचत-पत्र का और उसके आधार पर शोध्य राशि अपने को दिए जाने का हकदार होगा

(2) बचत-पत्र के धारक से, जिसने नामनिर्देशन किया है, यदि नामनिर्देशिती पहले मर जाता है, अथवा वहां जहां कि दो या अधिक नामनिर्देशिती हैं सभी नामनिर्देशिती पहले मर जाते हैं तो उपधारा (1) में निर्दिष्ट नामनिर्देशन शून्य हो जाएगा

(3) जहां कि नामनिर्देशिती अवयस्क है, वहां नामनिर्देशिती की अवयस्कता के दौरान मृत्यु हो जाने की दशा में यह बात बचत-पत्र के धारक के लिए, जिसने नामनिर्देशन किया है विधिपूर्ण होगी कि वह उस बचत-पत्र पर शोध्य राशि को पाने के लिए किसी व्यक्ति को विहित रीति से नियुक्त कर दे

(4) विहित रीति से किया गया किसी बचत-पत्र का अंतरण तत्पूर्व किए गए किसी नामनिर्देशन को स्वयंमेव रद्द कर देगा :

परन्तु जहां कि कोई बचत-पत्र पणयमदार के रूप में अथवा किसी प्रयोजन के लिए प्रतिभूति के रूप में किसी व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से धृत है वहां ऐसी धृति का यह प्रभाव होगा कि उससे कोई नामनिर्देशन रद्द हो गया है किन्तु नामनिर्देशिती का अधिकार उस व्यक्ति के अधिकार के अधीन रहते हुए होगा जो उसे ऐसा धारण किए हुए है

7. धारक की मृत्य पर संदाय-(1) यदि किसी बचत-पत्र के धारक की मृत्यु हो जाती है और उसकी मृत्यु के समय किसी व्यक्ति के पक्ष में कोई नामनिर्देशन प्रवृत्त है तो उस पर शोध्य राशि का संदाय नामनिर्देशिती को किया जाएगा

(2) जहां कि नामनिर्देशिती अवयस्क है वहां उस पर शोध्य राशि की अदायगी-

() किसी ऐसी दशा में, जिसमें कि धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन किसी व्यक्ति को इसे लेने के लिए नियुक्त किया गया है, ऐसे व्यक्ति को ; तथा

() वहां, जहां कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है अवयस्क की सम्पत्ति के संरक्षक को, जो सक्षम न्यायालय द्वारा नियुक्त किया गया है, या वहां जहां कि ऐसे सरंक्षक की ऐसी नियुक्ति नहीं हुई है, अवयस्क के माता या पिता में से किसी एक को, अथवा वहां जहां कि माता या पिता में से कोई जीवित नहीं है, अवयस्क के किसी अन्य संरक्षक को, की जाएगी

(3) जहां कि किसी बचत-पत्र पर शोध्य राशि दो अथवा अधिक नामनिर्देशितियों को देय है और उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है, वहां वह राशि उत्तरजीवी नामनिर्देशिती अथवा नामनिर्देशितियों को दी जाएगी

(4) यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और अपनी मृत्यु के समय बचत-पत्र का वह धारक है और उसकी मृत्यु के समय कोई नामनिर्देशन प्रवृत्त नहीं है और धारक की मृत्यु के तीन मास के भीतर विल का प्रोबेट अथवा उसकी सम्पदा का प्रशासन-पत्र अथवा भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) के अधीन दिया गया उत्तराधिकार प्रमाणपत्र विहित प्राधिकारी के समक्ष पेश नहीं किया जाता है तो, यदि बचत-पत्र पर शोध्य राशि  [ऐसी सीमा से, जो विहित की जाए,] से अनधिक है, विहित प्राधिकारी उसे ऐसे किसी व्यक्ति को दे सकेगा जो उस राशि को पाने का अथवा मृतक की सम्पदा का प्रशासन करने का हकदार प्रतीत होता है

(5) इस धारा में अन्तर्विष्ट किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करती है कि उस बचत-पत्र पर शोध्य राशि की अदायगी वह व्यक्ति किसी व्यक्ति से बचत-पत्र के परिपक्व होने से पूर्व अथवा बचत-पत्र के निबन्धनों से अन्यथा प्राप्त कर ले

8. अदायगी पूर्ण उन्मोचन होगी-(1) किसी अवयस्क अथवा उसके माता या पिता अथवा संरक्षक अथवा किसी नामनिर्देशिती अथवा किसी अन्य व्यक्ति को इस अधिनियम के पूर्ववर्ती उपबन्धों के अनुसरण में की गई अदायगी, ऐसे दी गई राशि सम्बन्धी समस्त उत्तरभावी दायित्व को पूर्णतः चुका देगी

(2) उपधारा (1) की किसी बात की बाबत यह समझा जाएगा कि वह बचत-पत्र के मृतक धारक के किसी निष्पादक या प्रशासक या अन्य प्रतिनिधि को उस व्यक्ति से, जो धारा 7 के अधीन उसे प्राप्त करता है वह रकम वसूल करने से प्रवारित करती है जो उन सब ऋणों या अन्य मांगों की रकम की कटौती करके उसके हाथ में अवशिष्ट है जो प्रशासन के सम्यक् अनुक्रम में उसके द्वारा विधिपूर्णतः चुका दी गई या उन्मोचित कर दी गई है

(3) बचत-पत्र के धारक को कोई लेनदार या उसकी संपदा के विरुद्ध कोई दावेदार अपने ऋण अथवा दावे की वसूली इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति को दी गई राशि से, जो उसके हाथों में अप्रशासित है, उसी रीति से और उसी सीमा तक कर सकेगा जैसी से और जिस सीमा तक ऐसा व्यक्ति मृतक की सम्पदा का प्रशासनपत्र प्राप्त कर लेने पर कर सकता

9. सम्यक् प्रशासन के लिए प्रतिभूति-किसी व्यक्ति से, जिसे धारा 7 की उपधारा (4) के अधीन कोई धन दिया गया है, विहित प्राधिकारी ऐसे दिए गए धन के सम्यक् प्रशासन के लिए ऐसी प्रतिभूति ले सकेगा जैसी वह आवश्यक समझता है तथा वह प्रतिभूति ऐसे प्रशासन से हितबद्ध किसी व्यक्ति को समनुदेशित कर सकेगा

10. शपथ देने की शक्ति-(1) विहित प्राधिकारी उस व्यक्ति के अधिकार का, जिसका यह दावा है कि अदायगी उसे मिले, धारा 7 की उपधारा (4) के अधीन अदायगी का अभिनिश्चय करने के लिए, शपथ अथवा प्रतिज्ञान पर साक्ष्य उस विधि के अनुसार ले सकेगा जो शपथों तथा प्रतिज्ञानों के सम्बन्ध में तत्समय प्रवृत्त है

(2) जो भी व्यक्ति ऐसी शपथ अथवा ऐसे प्रतिज्ञान पर ऐसा कोई कथन करेगा जो मिथ्या है, और या तो जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है, या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 के अधीन अपराध का दोषी समझा जाएगा

11. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण- कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की की गई है या की जाने के लिए आशयित है, सरकार के किसी आफिसर अथवा किसी विहित प्राधिकारी के विरुद्ध होगी

12. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम , शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-

                () बचत-पत्रों के लिए आवेदनों का प्ररूप और ऐसे बचत-पत्रों को देना तथा उनका चुकाया जाना ;

() धृतियों की अधिकतम सीमाएं ;

() बचत-पत्रों के किसी वर्ग संबंधी ब्याज अथवा छूट दिए जाने की शर्तें और अधिकतम सीमाओं से अतिरिक्त धृत किसी रकम पर दिए गए ब्याज की उसी रीति से वसूली जिससे भू-राजस्व की बकाया की वसूली की जाती है अथवा किसी अन्य रीति से वसूली;

() बचत-पत्रों का अंतरण और संपरिवर्तन तथा उसके बारे में उद्ग्रहणीय फीस ;

() विकृत, खोए हुए अथवा नष्ट बचत-पत्रों का प्रतिस्थापन तथा उसके बारे में देय फीस ;

() नामनिर्देशनों के प्ररूप, वह प्रकार जिसमें और वे शर्तें जिन पर नामनिर्देशन किए जा सकेंगे तथा नामनिर्देशनों का रजिस्ट्रीकरण;

() वह रीति, जिससे धारा 6 की उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए कोई व्यक्ति नियुक्त किया जा सकेगा ;

() नामनिर्देशनों में फेरफार या उनका रद्द किया जाना और ऐसे फेरफार का या रद्द किए जाने का रजिस्ट्रीकरण ;

() वह फीस जो नामनिर्देशनों के रजिस्ट्रीकरण, फेरफार या रद्द करने के लिए उद्गृहीत की जा सकेगी ;

 [(झक) धारा 7 की उपधारा (4) के अधीन सीमा ;]

() कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए

 [(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

13. निरसन और व्यावृत्ति-(1) पोस्ट आफिस नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट्स आर्डिनेन्स, 1944 (1944 का 42) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है

(2) उक्त आर्डिनेन्स के निरसन के होते हुए भी यह है कि उक्त आर्डिनेन्स के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में बनाए गए अथवा बनाए समझे गए नियम अथवा की गई कोई बात या की गई कोई कार्रवाई, इस अधिनियम के द्वारा अथवा अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में वैसे ही की गई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम उस दिन प्रवृत्त था जब ऐसे नियम बने, ऐसी बात की गई या ऐसी कार्रवाई की गई

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