अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952
(1952 का अधिनियम संख्यांक 74)
[26 दिसंबर, 1952]
अग्रिम संविदाओं से संबंधित कतिपय विषयों के विनियमन के लिए, माल
विकल्प करार के प्रतिषेध के लिए और उनसे सम्बद्ध
विषयों के लिए उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम अग्रिम संविदा ( विनियमन) अधिनियम, 1952 है
(2) इसका विस्तार *** सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) अध्याय 1 तुरन्त प्रवृत्त होगा ओर शेष उपबन्ध ऐसी तारीख या तारीखों को प्रवृत्त होंगे जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए, विभिन्न राज्यों या क्षेत्रों के लिए और विभिन्न माल या के वर्गों के लिए विभिन्न तारीखें, नियत की जा सकती हैं ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,
(क) “संगम" से किसी माल के क्रय या विक्रय के कारबार का विनियमन और नियंत्रण करने के प्रयोजन के लिए गठित व्यष्टियों का निकाय अभिप्रेत है चाहे वह निगमित हो या नहीं ;
(ख) “आयोग" से धारा 3 के अधीन स्थापित वायदा बाजार आयोग अभिप्रेत है ;
(ग) “अग्रिम संविदा" से ऐसी संविदा अभिप्रेत है जो किसी माल के परिदान के लिए है *** और जो तुरन्त परिदान संविदा नहीं है ;
(घ) “माल" से अनुजोज्य दावे, धन और प्रतिभूतियों से भिन्न सभी प्रकार की जंगम संपत्ति अभिप्रेत है;
(ङ) “सरकारी प्रतिभूति" से लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) में यथापरिभाषित सरकारी प्रतिभूति अभिप्रेत है ;
(च) “अनन्तरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा" से अभिप्रेत है ऐसी विनिर्दिष्ट माल संविदा, जिसके अधीन या जिससे सम्बन्धित किसी परिदान आदेश, रेल रसीद, वहन-पत्र, भाण्डागार रसीद या हक की किसी अन्य दस्तावेज के अधीन अधिकार या दायित्व अनन्तरणीय है ;
(छ) “माल विकल्प करार" से भविष्य में माल के क्रय या विक्रय करने के अधिकार के, या क्रय और विक्रय करने के अधिकार के, क्रय या विक्रय के लिए करार अभिप्रेत है, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, और इसके अन्तर्गत माल में तेजी, मंदी, तेजी-मंदी, गल्ली, पुट, कौला या पुट एण्ड कौल है ;
(ज) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(झ) “तुरन्त परिदान संविदा" से ऐसी संविदा अभिप्रेत है जिसमें या तो तुरन्त या संविदा की तारीख के पश्चात् ग्यारह दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के भीतर और ऐसी शर्तों के अधीन, जो किसी माल के सम्बन्ध में केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, माल के परिदान तथा उसकी कीमत के संदाय के लिए उपबन्ध है और ऐसी संविदा के अधीन अवधि उसके पक्षकारों की पारस्परिक सहमति से या अन्यथा नहीं बढ़ाई जा सकती है :
[परन्तु यदि किसी ऐसी संविदा का पालन या तो पूर्णतः या भागतः-
(1) उसके किसी ऐसे पक्षकार द्वारा (जो कमीशन अभिकर्ता या बैंक नहीं है), जिसने उक्त दस्तावेजों का स्वामित्व क्रय द्वारा, विनिमय द्वारा या अन्यथा अर्जित किया है किसी अन्य व्यक्ति को ( जिसके अन्तर्गत कमीशन अभिकर्ता है किन्तु बैंक नहीं है) उस संविदा के अन्तर्गत आने वाले माल के हक की दस्तावेजों के निविदान द्वारा; अथवा
(2) किसी ऐसी धनराशि की, जो संविदा दर और निपटान दर अथवा समाशोधन दर या किसी मुजराई संविदा की दर के बीच के अन्तर के बराबर हो, वसूली द्वारा; अथवा
(3) किन्हीं अन्य साधनों द्वारा,
किया गया है और जिसके परिणामस्वरूप संविदा के अन्तर्गत आने वाले माल के वास्तविक निविदान या उसकी पूरी कीमत के संदाय से छूट दे दी गई है तो ऐसी संविदा तुरन्त परिदान संविदा नहीं समझी जाएगी ।
स्पष्टीकरण-इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए,-
(i) “बैंक" के अन्तर्गत, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में यथापरिभाषित कोई बैंककारी कम्पनी, भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में यथापरिभाषित कोई सहकारी बैंक, भारतीय स्टेट बैंक तथा उसका कोई समनुषंगी बैंक और बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन गठित कोई तत्स्थानी नया बैंक है;
(ii) “कमीशन अभिकर्ता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो कारबार के मामूली अनुक्रम में, दूसरों के लिए माल के क्रय या विक्रय की संविदा ऐसे पारिश्रमिक के लिए (चाहे वह कमीशन के नाम से ज्ञात हो या अन्यथा) करता है जो दोनों में से किसी भी दशा में, संविदा में नियत माल के परिमाण या उसकी कीमत के प्रति निर्देश से या तो संविदा में ही अवधारित है या संविदा के निबन्धनों से अवधारित की जा सकती है ;]
[(ञ) “मान्यताप्राप्त संगम" से ऐसा संगम अभिप्रेत है जिसे धारा 6 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी मान्यता में विनिर्दिष्ट माल या माल के वर्गों की बाबत तत्समय मान्यता दी गई है;
(ञञ) “रजिस्ट्रीकृत संगम" से ऐसा संगम अभिप्रेत है जिसे धारा 14ख के अधीन आयोग द्वारा तत्समय रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है;]
(ट) “नियम" के अन्तर्गत, किसी संगम के गठन और प्रबन्ध से साधारणतया सम्बन्धित नियमों के प्रति निर्देश से, किसी निगमित संगम की दशा में उसके संगम-ज्ञापन और संगम-अनुच्छेद है;
(ठ) “प्रतिभूति" के अन्तर्गत किसी निगमित कम्पनी या अन्य निगमित निकाय में या उसके शेयर, स्क्रिप, स्टाक, बन्धपत्र, डिबेंचर, डिबेंचर स्टाक, या इसी प्रकार की अन्य विपण्य प्रतिभूतियां हैं और सरकारी प्रतिभूतियां भी हैं;
(ड) “विनिर्दिष्ट माल संविदा" से ऐसी अग्रिम संविदा अभिप्रेत है जिसमें भविष्य की किसी विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान विनिर्दिष्ट क्वालिटी या प्रकार के माल के ऐसी कीमत पर, जो संविदा द्वारा नियत की गई है या संविदा द्वारा करार पाई गई रीति से नियत की जाने वाली है, वास्तविक परिदान के लिए उपबन्ध है और जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों के नाम उल्लिखित हैं;
(ढ) ”अन्तरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा" से ऐसी विनिर्दिष्ट माल संविदा अभिप्रेत है जो अनन्तरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा नहीं है [और जो अपनी अन्तरणीयता के बारे में ऐसी शर्तों के अधीन है जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे] ।
अध्याय 2
वायदा बाजार आयोग
3. वायदा बाजार आयोग की स्थापना और गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, वायदा बाजार आयोग नामक एक आयोग की स्थापना ऐसे कृत्यों का प्रयोग करने और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए कर सकती है जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उस आयोग को सौंपे जाएं ।
(2) आयोग में केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त कम से कम दो [किन्तु चार से अनधिक] सदस्य होंगे, [उनमें से एक सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा उसका अध्यक्ष नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, और अध्यक्ष और अन्य सदस्य या सदस्यगण या तो पूर्णकालिक होंगे या अंशकालिक जैसा केन्द्रीय सरकार निदेश दे ] :
[परन्तु इस प्रकार नियुक्त किए जाने वाले सदस्य योग्य, सत्यनिष्ठ और प्रतिष्ठित व्यक्ति होंगे जो वाणिज्य या मण्डी से सम्बन्धित समस्याएं हल करने में, या प्रशासन में क्षमता रखते हैं, या जिन्हें किसी ऐसे विषय का विशेष ज्ञान व्यावहारिक अनुभव है जिसके कारण वे आयोग में नियुक्त के लिए उपयुक्त हैं ।
(3) कोई भी व्यक्ति आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए या सदस्य के रूप में बने रहने के लिए अर्हित नहीं होगा, यदि उसका प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः ऐसा कोई वित्तीय या अन्य हित है जिससे आयोग के सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना सम्भाव्य है, और प्रत्येक सदस्य, जब कभी केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसा करने की अपेक्षा की जाए, उसे ऐसी जानकारी देगा जिसकी वह इस उपधारा के उपबन्धों का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए अपेक्षा करे ।
(4) आयोग का कोई भी सदस्य अपनी नियुक्ति की तारीख से तीन वर्ष से अधिक की अवधि के लिए पद धारण नहीं करेगा, और अपनी अवधि की समाप्ति पर अपना पद-त्याग करने वाला सदस्य पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा ।
(5) आयोग के सदस्यों की सेवा की अन्य शर्तें और निबन्धन वे होंगे जो विहित किए जाएं ।
4. आयोग के कृत्य-आयोग के निम्नलिखित कृत्य होंगे, अर्थात् :-
(क) केन्द्रीय सरकार को किसी संगम को मान्यता देने या उसकी मान्यता वापस लेने के संबंध में या इस अधिनियम के प्रशासन से उद्भूत होने वाली किसी अन्य बात के संबंध में सलाह देना ;]
[(ख) वायदा बाजार पर निगाह रखना और उनके बारे में इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उसको सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए ऐसी कार्रवाई करना जो वह आवश्यक समझे ;]
(ग) ऐसे माल की बाबत जिनको इस अधिनियम के कोई उपबन्ध लागू होते हैं व्यापार की परिस्थितियों के बारे में जानकारी, जिसके अंतर्गत प्रदाय, मांग और कीमत के बारे में जानकारी भी है, एकत्र करना और उन्हें जब कभी आयोग आवश्यक समझे प्रकाशित करना और केन्द्रीय सरकार को इस अधिनियम के प्रवर्तन के संबंध में और ऐसे माल के बारे में वायदा बाजार के कार्यकरण के संबंध में नियत कालिक रिपोर्ट देना ;
(घ) साधारणतया वायदा बाजार के संगठन की उन्नति और कार्यकरण की दृष्टि से सिफारिशें करना ;
(ङ) जब कभी वह यह आवश्यक समझे तब [किसी मान्यताप्राप्त संगम या रजिस्ट्रीकृत संगम या ऐसे संगम के किसी सदस्य] के लेखाओं और अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करना ; और
(च) ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करना और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना जो आयोग को इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन सौंपी जाएं या जो विहित की जाएं ।
[4क. आयोग की शक्तियां-(1) आयोग को, अपने कृत्यों के निर्वहन में, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय की सब शक्तियां होंगी, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि की अध्यपेक्षा करना;
(ङ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
(2) आयोग को किसी भी व्यक्ति से, ऐसे विशेषाधिकार के अधीन रहते हुए, जिसका वह व्यक्ति तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन दावा कर सकता है, ऐसी बातों या विषयों के बारे में जानकारी देने की अपेक्षा करने की शक्ति होगी, जो आयोग की राय में, आयोग के विचाराधीन किसी मामले में उपयोगी या सुसंगत हो और ऐसे व्यक्ति के बारे में जिससे इस प्रकार अपेक्षा की जाए, यह समझा जाएगा कि वह भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 276 के अर्थ में ऐसी जानकारी देने के लिए वैध रूप से आबद्ध है ।
(3) आयोग सिविल न्यायालय समझा जाएगा और यदि भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 175, धारा 178, धारा 179, धारा 180 या धारा 228 में वर्णित कोई अपराध आयोग की दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किया जाता है तो आयोग, उन तथ्यों को जिनसे अपराध बनता है और अभियुक्त के कथन को, दण्ड प्रक्रिया संहिता 1898 (1898 का 5) में उपबन्धित प्रकार से अभिलिखित करने के पश्चात्, मामला उसका विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को भेज सकता है और वह मजिस्ट्रेट, जिसको ऐसा मामला भेजा जाता है अभियुक्त के विरुद्ध परिवाद की सुनवाई करने के लिए इस प्रकार अग्रसर होगा मानो वह मामला उक्त संहिता की धारा 482 के अधीन भेजा गया है ।
(4) आयोग के समक्ष कोई कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी ।
स्पष्टीकरण-साक्षियों को हाजिर कराने के प्रयोजनों के लिए आयोग की अधिकारिता की स्थानीय सीमा भारत के राज्यक्षेत्र की सीमा होगी ।]
अध्याय 3
मान्यताप्राप्त संगम
5. संगमों की मान्यता के लिए आवेदन-(1) अग्रिम संविदाओं के विनियमन और नियंत्रण से सम्पृक्त कोई संगम जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त करने का इच्छुक है केन्द्रीय सरकार को विहित रीति से आवेदन कर सकता है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्येक आवेदन में ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं और उसके साथ अग्रिम संविदाओं के विनियमन और नियंत्रण से सम्बद्ध उपविधियों की एक प्रति होगी और साथ ही साधारणतया संगम के गठन से और विशिष्टतया निम्नलिखित से सम्बन्धित नियमों की एक प्रति होगी, अर्थात् :-
(क) ऐसे संगम का शासी निकाय, उसका गठन और प्रबन्ध की शक्तियां और वह रीति जिससे उसका कारबार चलाया जाना है ;
(ख) संगम के पदाधिकारियों की शक्ति और कर्तव्य ;
(ग) संगम में सदस्यों के विभिन्न वर्गों का प्रवेश, सदस्यों की अर्हताएं और सदस्यों का संगम से अपवर्जन, निलम्बन और निष्कासन तथा उसमें पुनः प्रवेश ;
(घ) संगम में सदस्यों के रूप में भागीदारियों के रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया और प्राधिकृत प्रतिनिधियों और लिपिकों का नामनिर्देशन और नियुक्ति ।
6. संगम को मान्यता का दिया जाना-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का, ऐसी जांच के पश्चात् जो इस निमित्त आवश्यक हो, तथा ऐसी और जानकारी प्राप्त करने के पश्चात्, यदि कोई हो, जिसकी वह अपेक्षा करे यह समाधान हो जाता है कि यह व्यापार के हित में और लोक हित में होगा कि ऐसे संगम को, जिसने धारा 5 के अधीन आवेदन किया है, मान्यता दे दी जाए तो वह संगम को, ऐसे प्ररूप में और ऐसी शर्तों के अधीन जो विहित या विनिर्दिष्ट की जाएं, मान्यता दे सकती है और ऐसी मान्यता में उस माल या माल के वर्गों को विनिर्दिष्ट करेगी जिनकी बाबत ऐसे संगम के सदस्यों के बीच या ऐसे सदस्य के माध्यम से या ऐसे सदस्य से अग्रिम संविदाएं की जा सकती हैं ।
(2) उपधारा (1) के अधीन मान्यता देने के पहले, केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकती है कि
(क) संगम के सदस्यों की संख्या के बारे में कोई सीमा नहीं होगी या सदस्यों की संख्या के बारे में ऐसी सीमा होगी जो विनिर्दिष्ट की जाए ;
(ख) संगम केन्द्रीय सरकार द्वारा अपने प्रतिनिधि के रूप में एक व्यक्ति की, चाहे वह संगम का सदस्य हो या न हो, ऐसे संगम के शासी निकाय में, और उन हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले, जिनका प्रतिनिधित्व संगम की सदस्यता के माध्यम से नहीं हुआ है, तीन से अनधिक व्यक्तियों की ऐसे संगम के शासी निकाय के सदस्य या सदस्यों के रूप में नियुक्ति का उपबन्ध करेगा,
और संगम से यह अपेक्षा कर सकती है कि वह ऐसे किसी निदेश को और उससे संलग्न शर्तों को, यदि कोई हों, अपने नियमों में सम्मिलित करे ।
(3) किसी मान्यताप्राप्त संगम के कोई नियम केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के बिना संशोधित नहीं किए जाएंगे ।
(4) इस धारा के अधीन दी गई प्रत्येक मान्यता भारत के राजपत्र में और उस राज्य के राजपत्र में भी प्रकाशित की जाएगी जिसमें मान्यताप्राप्त संगम का प्रधान कार्यालय स्थित है और ऐसी मान्यता भारत के राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभावी होगी ।
7. मान्यता का वापस लिया जाना-यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किसी संगम को दी गई मान्यता, व्यापार के हित में या लोक हित में, वापास ले ली जानी चाहिए तो उस मामले में संगम को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उक्त संगम को दी गई मान्यता वापस ले सकती है ;
परन्तु ऐसी कोई वापसी, अधिसूचना की तारीख से पहले की गई किसी संविदा की विधिमान्यता पर प्रभाव नहीं डालेगी, और केन्द्रीय सरकार वापसी की अधिसूचना में या इसी प्रकार प्रकाशित किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचना में, उस तारीख को विद्यमान संविदाओं के सम्यक् पालन के लिए ऐसा उपबन्ध कर सकती है जो वह ठीक समझे ।
8. नियतकालिक विवरणियां मांगने की या जांच किए जाने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति -[(1) प्रत्येक मान्यताप्राप्त संगम, यथास्थिति, अपने कार्यकलापों के या अपने सदस्यों के कार्यकलापों के बारे में और उस संगम का प्रत्येक सदस्य अपने कार्यकलापों के बारे में केन्द्रीय सरकार को, ऐसी नियतकालिक विवरणियां देगा जो विहित की जाएं ।]
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि केन्द्रीय सरकार ऐसा करना समीचीन समझती है तो वह, लिखित आदेश द्वारा,-
(क) किसी मान्यताप्राप्त संगम से, [यथास्थिति, उसके कार्यकलापों के या उसके किसी सदस्य] के कार्यकलापों के बारे में अथवा उस संगम के किसी सदस्य से उस सदस्य के कार्यकलापों के बारे में ऐसी जानकारी या स्पष्टीकरण जिसकी केन्द्रीय सरकार द्वारा अपेक्षा की जाए, लिखित रूप में देने की अपेक्षा कर सकती है ; या
(ख) ऐसे संगम के कार्यकलापों के या उसके किसी सदस्य के कार्यकलापों के बारे में जांच करने के लिए और ऐसी जांच के परिणाम की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को ऐसे समय के भीतर जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, देने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकती है, या इसके अनुकल्पतः यह निदेश दे सकती है कि केन्द्रीय सरकार के एक या अधिक प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त रूप से कार्य करते हुए ऐसे संगम के शासी निकाय द्वारा जांच की जाए और रिपोर्ट दी जाए; और
(ग) आयोग को किसी मान्यताप्राप्त संगम के या उसके किसी सदस्य के लेखाओं और अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करने और उन पर अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को देने का निदेश दे सकती है ।
(3) यदि किसी मान्यताप्राप्त संगम के कार्यकलापों के या उसके किसी सदस्य के कार्यकलापों के बारे में उपधारा (2) के अधीन कोई जांच प्रारम्भ कर दी जाती है तो,-
(क) ऐसे संगम का प्रत्येक निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी,
(ख) ऐसे संगम का प्रत्येक सदस्य,
(ग) यदि संगम का सदस्य कोई फर्म है तो उस फर्म का प्रत्येक भागीदार, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी, और
(घ) प्रत्येक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय जिसने कारबार के दौरान खण्ड (क), खण्ड (ख) और खण्ड (ग) में उल्लिखित व्यक्तियों में से किसी के साथ व्यौहार किया है,
जांच करने वाले प्राधिकारी के समक्ष ऐसी जांच की विषय-वस्तु से सम्बन्धित या उससे सम्बद्ध सभी ऐसी बहियां, लेखे, पत्र-व्यवहार और अन्य दस्तावेजें जो उसकी अभिरक्षा या शक्ति में हैं, पेश करने के लिए और प्रधिकारी को उससे सम्बन्धित कोई ऐसा कथन या जानकारी, जिसकी उससे अपेक्षा की जाए, ऐसे समय के भीतर जो विनिर्दिष्ट किया जाए, देने के लिए आदद्ध होगा ।
2[(4) प्रत्येक मान्यताप्राप्त संगम और उसका प्रत्येक सदस्य ऐसी लेखा बहियां और अन्य दस्तावेजें रखेगा जो आयोग विनिर्दिष्ट करे और इस प्रकार विनिर्दिष्ट लेखा बहियों और अन्य दस्तावेजों का तीन वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए परिरक्षण किया जाएगा जो आयोग विनिर्दिष्ट करे और उनका सभी युक्तियुक्त समयों पर आयोग द्वारा निरीक्षण किया जा सकेगा ।]
9. मान्यता प्राप्त संगमों द्वारा आयोग को वार्षिक रिपोर्ट का दिया जाना- [(1) प्रत्येक मान्यताप्राप्त संगम अपनी वार्षिक रिपोर्ट की तीन प्रतियां आयोग को देगा ।]
(2) उस वार्षिक रिपोर्ट में ऐसी विशिष्टयां होंगी जो विहित की जाएं ।
[9क. विशेष दशाओं में, किसी फर्म या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब के प्रवेश, सदस्यों के समूहीकरण, मतदान के अधिकारों, आदि को निर्बन्धित करने के बारे में नियम बनाने की मान्यताप्राप्त संगम की शक्ति-(1) मान्यताप्राप्त संगम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध करने के लिए नियम बना सकता है या अपने द्वारा बनाए गए किन्हीं नियमों में संशोधन कर सकता है, अर्थात् :-
[(क) किसी फर्म या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब का सदस्य के रूप में प्रवेश;]
[(ख)] संगम के सदस्यों का उनके कृत्यिक या स्थानिक हितों के अनुसार समूहीकरण, प्रत्येक समूह के सदस्यों के लिए संगम के शासी निकाय में स्थानों का आरक्षण और ऐसे आरक्षित स्थानों पर सदस्यों की,-
(i) सम्पृक्त समूह के सदस्यों द्वारा अनन्यतः निर्वाचन द्वारा ;
(ii) संगम के सभी सदस्यों द्वारा निर्वाचन द्वारा ;
(iii) संगम के सभी सदस्यों द्वारा, उस प्रयोजन के लिए सम्पृक्त समूह के सदस्यों द्वारा चुने गए व्यक्तियों में से निर्वाचन द्वारा,
नियुक्ति;
1[(ग)] किसी बैठक में संगम के समक्ष रखे गए किसी विषय की बाबत मतदान के अधिकारों का केवल उन्हीं सदस्यों तक निर्बन्धन जो, अपने कृत्यिक या स्थानिक हितों के कारण, उस विषय में वास्तविक रूप से हितबद्ध है ;
1[(घ)] किसी बैठक में संगम के समक्ष रखे गए किसी विषय की बाबत मतदान के अधिकारों का इस प्रकार विनियमन जिससे कि प्रत्येक सदस्य को, संगम की साधारण समादत्त पूंजी में उसके शेयर को विचार में लाए बिना, केवल एक मत देने का हक हो ;
1[(ङ)] सदस्य के, किसी अन्य व्यक्ति को संगम की बैठक में उपस्थित होने और मत देने के लिए अपना परोक्षी नियुक्त करने के अधिकार पर निर्बन्धन ;
[(च)] प्रत्येक साधारण वार्षिक बैठक में सभी निदेशकों का या उनकी कुल संख्या में से ऐसी संख्या या अनुपात का निवर्तन जो नियमों में विनिर्दिष्ट किया जाए ;]
1[(छ)] ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक विषय जो [खण्ड (क) से खण्ड (च)ट में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी को प्रभावी करने के लिए आवश्यक हों ।
(2) किसी मान्यताप्राप्त संगम के उपधारा (1) के [खण्ड (क) से खण्ड (छ)] में निर्दिष्ट विषय के सम्बन्ध में बनाए गए या संशोधित किए गए नियमों का कोई प्रभाव नहीं होगा जब तक वे केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित न कर दिए जाएं और उस सरकार द्वारा राजपत्र में प्रकाशित न कर दिए जाएं और इस प्रकार बनाए गए या संशोधित किए गए नियमों का अनुमोदन करने में केन्द्रीय सरकार उनमें ऐसे उपान्तर कर सकती है जो वह ठीक समझे और ऐसे प्रकाशन पर केन्द्रीय सरकार द्वारा यथा अनुमोदित नियम, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, विधिमान्यतः बनाए गए समझे जाएंगे ।
(3) जहां अग्रिम संविदा (विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 32) के प्रारम्भ के पहले कोई नियम उपधारा (1) के 4[खण्ड (ख) से खण्ड (ङ) में और खण्ड (छ)] में निर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में बनाए गए हैं या संशोधित किए गए हैं वहां इस प्रकार बनाए गए या संशोधित किए गए नियमों के बारे में, केवल इस तथ्य के कारण कि इस प्रकार बनाए गए या संशोधित किए गए नियम कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के किसी उपबन्ध के विरुद्ध हैं, यह नहीं समझा जाएगा कि वे अविधिमान्य हैं या कभी भी अधिमान्य थे ।]
10. नियम बनाए जाने का निदेश देने की या नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) जब कभी केन्द्रीय सरकार ऐसा करना सीमचीन समझती है तब वह, लिखित आदेश द्वारा, किसी मान्यताप्राप्त संगम को ऐसी अवधि के भीतर जो वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, नियम बनाने का या उस मान्यताप्राप्त संगम द्वारा बनाए गए नियमों का संशोधन करने का निदेश दे सकती है ।
(2) यदि कोई मान्यताप्राप्त संगम, जिसके विरुद्ध केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन आदेश जारी किया गया है, विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर ऐसे आदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है या उसकी उपेक्षा करता है तो केन्द्रीय सरकार, या तो आदेश में विनिर्दिष्ट प्ररूप में या उसमें ऐसे उपान्तर करके जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, यथास्थिति, नियम बना सकती है या उस मान्यताप्राप्त संगम द्वारा बनाए गए नियमों का संशोधन कर सकती है ।
[(3) जहां उपधारा (2) के अनुसरण में कोई नियम बनाए गए हैं या संशोधित किए गए हैं वहां इस प्रकार बनाए गए या संशोधित किए गए नियम भारत के राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और, तब कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो वे सम्पृक्त मान्यताप्राप्त संगम द्वारा बनाए गए हैं या संशोधित किए गए हैं ।]
11. उपविधियां बनाने की मान्यताप्राप्त संगम की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के अधीन रहते हुए, कोई मान्यताप्राप्त संगम अग्रिम संविदाओं के विनियमन और नियन्त्रण के लिए उपविधियां बना सकता है ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसी उपविधियां निम्निलखित के लिए उपबन्ध कर सकती हैं, अर्थात् :
(क) बाजारों का खुलना और बन्द होना और व्यापार के समय का विनियमन ;
(ख) संविदाओं और उनके अधीन अन्तरों के कालिक निपटान के लिए, माल के परिदान और उनके भुगतान के लिए, परिदान आदेश पारित करने के लिए समाशोधन गृह और उस समाशोधन गृह का विनियमन और अनुरक्षण ;
(ग) उन संविदाओं की संख्या और वर्ग जिनकी बाबत समाशोधन गृह के माध्यम से निपटान किए जाएंगे या अन्तरों का भुगतान किया जाएगा ;
(घ) निपटान के लिए दिनों का नियत किया जाना, उनमें परिवर्तन किया जाना या उन्हें मुल्तवी किया जाना;
(ङ) बाजार भाव अवधारित और घोषित करना जिनके अन्तर्गत माल के लिए खुलने के, बन्द होने के, सबसे ऊंचे और सबसे नीचे भाव भी हैं ;
(च) संविदाओं के निबन्धन, शर्तें और अनुषंग जिसके अन्तर्गत मार्जिन अपेक्षाओं का, यदि कोई हों, और उनसे सम्बन्धित शर्तों का, और लिखित संविदाओं के प्ररूप का विहित किया जाना भी है;
(छ) संविदाओं के किए जाने, उनके पालन, विखण्डन और पर्यवसान का विनियमन जिनके अन्तर्गत सदस्यों के बीच या कमीशन अभिकर्ता और उसके व्यौहारी के बीच, या किसी दलाल और उसके व्यौहारी के बीच, या किसी मान्यताप्राप्त संगम के सदस्य और किसी ऐसे व्यक्ति के बीच जो सदस्य नहीं है, संविदाएं और किसी क्रेता या विक्रेता या मध्यवर्ती के व्यतिक्रम या दिवाले के परिणाम, किसी क्रेता या विक्रेता द्वारा किसी भंग या लोप के परिणाम, और ऐसे कमीशन अभिकर्ताओं और दलालों के, जो ऐसी संविदाओं के पक्षकार नहीं हैं, उत्तरदायित्व है ;
(ज) विनिर्दिष्ट वर्ग या प्रकार के माल की या माल के व्यौहारों की मान्यताप्राप्त संगम के किसी सदस्य द्वारा स्वीकृति और उनका प्रतिषेध ;
(झ) दावों या विवादों के निपटान की रीति और प्रक्रिया जिनके अंतर्गत उनका माध्यस्थम् द्वारा निपटान भी है ;
(ञ) फीस, जुर्माने और शास्तियों का उद्ग्रहण और वसूली ;
(ट) किसी भी हैसियत में संविदाओं के पक्षकारों के बीच व्यापारक्रम का विनियमन ;
(ठ) दलाली और अन्य प्रभारों का मान नियत करना ;
(ड) सौदों का करना, उनका मिलान, निपटान और बन्द किया जाना ;
(ढ) भावों और कीमतों में उतार-चढ़ाव का विनियमन ;
(ण) व्यापार में उद्भूत होने वाली आपात-स्थितियों और ऐसी आपात-स्थितियों में शक्तियों का प्रयोग जिनके अन्तर्गत अधिकतम और न्यूनतम कीमतें नियत करने की शक्ति भी है ;
(त) सदस्यों द्वारा अपने खाते किए जाने वाले व्यौहारों का विनियमन ;
(थ) किसी एक सदस्य द्वारा किए जाने वाले व्यापार की मात्रा के बारे में सीमाएं ;
(द) सदस्यों की ऐसी जानकारी या स्पष्टीकरण देने की और अपने कारबार से संबंधित ऐसी बहियां, जिनकी शासी निकाय द्वारा अपेक्षा की जाए, पेश करने की बाध्यता ।
(3) इस धारा के अधीन बनाई गई उपविधियां,-
(क) उन उपविधियों को विनिर्दिष्ट कर सकती हैं जिनमें से किसी का उल्लंघन किसी ऐसी संविदा को, जो उन उपविधियों के अनुसार नहीं की गई है, धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन शून्य बना देगा ;
[(कक) उन उपविधियों को विनिर्दिष्ट कर सकती है जिनमें से किसी का उल्लंघन किसी ऐसी अग्रिम संविदा को, जो उन उपविधियों के अनुसार नहीं की गई है, धारा 15 की उपधारा (3क) के अधीन अवैध बना देगा ;]
(ख) यह उपबन्ध कर सकती है कि उन उपविधियों में से किसी का उल्लंघन,-
(-) सम्पृक्त सदस्य को जुर्माने का भागी बना देगा ; या
(ii) सम्पृक्त सदस्य को मान्यताप्राप्त संगम से निष्कासन या निलम्बन का या वैसी ही प्रकृति की किसी ऐसी अन्य शास्ति का भागी बना देगा जिसके अन्तर्गत धन का संदाय नहीं है ।
(4) इस धारा के अधीन बनाई गई उपविधियां पूर्व प्रकाशन के बारे में ऐसी शर्तों के अधीन होंगी जो विहित की जाएं और केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किए जाने पर, भारत के राजपत्र *** में प्रकाशित की जाएंगी :
परन्तु केन्द्रीय सरकार, व्यापार के हित में या लोक हित में, लिखित आदेश द्वारा, किसी मामले में, पूर्व प्रकाशन की शर्त से छूट दे सकती है ।
12. मान्यताप्राप्त संगमों के बारे में उपविधियां बनाने या उनका संशोधन करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, या तो किसी मान्यताप्राप्त संगम के शासी निकाय से इस निमित्त लिखित अनुरोध की प्राप्ति पर, या यदि उसकी राय में ऐसा करना समीचीन है, तो धारा 11 में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपविधियां बना सकती है या उस धारा के अधीन ऐसे संगम द्वारा बनाई गई उपविधियों का संशोधन कर सकती है ।
(2) जहां, इस धारा के अनुसरण में, कोई उपविधियां बनाई गई हैं या संशोधित की गई हैं, वहां उस प्रकार बनाई गई या संशोधित की गई उपविधियां भारत के राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी [और तब इस प्रकार प्रभावी होंगी] मानो वे मान्यताप्राप्त संगम द्वारा बनाई गई हैं या संशोधित की गई हैं ।
(3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी मान्यताप्राप्त संगम का शासी निकाय केन्द्रीय सरकार द्वारा इस धारा के अधीन स्वप्रेरणा से बनाई गई या संशोधित की गई किन्हीं उपविधियों के संबंध में आपत्ति करता है तो वह, उपधारा (2) के अधीन उनके प्रकाशन से छह मास के भीतर, केन्द्रीय सरकार को उनके पुनरीक्षण के लिए आवेदन कर सकता है और केन्द्रीय सरकार, उस मामले में संगम के शासी निकाय को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, इस प्रकार बनाई गई या संशोधित की गई उपविधियों का पुनरीक्षण कर सकती है और जहां इस प्रकार बनाई गई या संशोधित की गई कोई उपविधियां इस उपधारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई के परिणामस्वरूप पुनरीक्षित की जाती हैं वहां इस प्रकार पुनरीक्षित उपविधियां उपधारा (2) में उपबन्धित रूप में प्रकाशित की जाएंगी और प्रभावी होंगी ।
(4) इस धारा के अधीन किन्हीं उपविधियों का बनाया जाना या संशोधन या पुनरीक्षण सभी दाशाओं में पूर्व प्रकाशन के बारे में [ऐसी शर्तों के अधीन होगा जो विहित की जाएंट :
परन्तु केन्द्रीय सरकार, व्यापार के हित में या लोक हित में, लिखित आदेश द्वारा, पूर्व प्रकाशन की शर्त से छूट दे सकती है ।
[12क. विद्यमान अग्रिम संविदाओं को उपविधियों के संशोधन का लागू होना-धारा 11 की उपधारा (3) के खण्ड (क) या खण्ड (कक) के अनुसरण में किए गए किसी संशोधन से भिन्न धारा 11 या धारा 12 के अधीन किसी उपविधि का कोई संशोधन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार द्वारा उसके अनुमोदन की तारीख से पहले या भारत के राजपत्र में उसके प्रकाशन की तारीख से पहले की गई और उक्त तारीख को या उसके पश्चात् पालन किए जाने के लिए बाकी रह गई सभी अग्रिम संविदाओं को भी लागू होगा ।
12ख. मान्यताप्राप्त संगम के सदस्य को निलम्बित करने की या उसे व्यापार करने से प्रतिषिद्ध करने की आयोग की शक्ति-(1) यदि व्यापार के हित में या लोक हित में आयोग किसी सदस्य को किसी मान्यताप्राप्त संगम में की उसकी सदस्यता से निलम्बित करना या ऐसे सदस्य को अपने नाम से या किसी मान्यताप्राप्त संगम के अन्य सदस्य के माध्यम से किसी माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए, अग्रिम संविदा करने से प्रतिषिद्ध करना आवश्यक समझता है, तो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या किसी मान्यताप्राप्त संगम के नियमों या उपविधियों में किसी बात के होते हुए भी, आयोग, सम्पृक्त सदस्य को सुनवाईका अवसर देने के पश्चात्, आदेश द्वारा, किसी संगम में की उसकी सदस्यता को निलम्बित कर सकता है या उसे ऐसी कोई संविदा करने से प्रतिषिद्ध कर सकता है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश किए गए आदेश में वह अवधि विनिर्दिष्ट की जाएगी जिसके लिए निलम्बन या प्रतिषेध प्रभावी है और ऐसी अवधि समय-समय पर बढाई जा सकती है किन्तु वह कुल मिलाकर तीन वर्ष से अधिक नहीं होगी ।
(3) किसी मान्यताप्राप्त संगम के किसी सदस्य के बारे में उपधारा (1) के अधीन किया गया कोई आदेश, ऐेसे आदेश की तारीख को या उससे पहले ऐसे सदस्य द्वारा, या सदस्य के साथ या सदस्य के माध्यम से की गई और उक्त तारीख को या उसके पश्चात् पालन किए जाने के लिए बाकी रह गई अग्रिम संविदा की विधिमान्यता पर प्रभाव नहीं डालेगा; किन्तु आयोग ऐसी किसी आग्रिम संविदा को बन्द करने के लिए ऐसे आदेश में या किसी पश्चात्वर्ती आदेश में ऐसा उपबन्ध कर सकता है जो वह ठीक समझे ।]
13. मान्यताप्राप्त संगम के शासी निकाय को अतिप्ठित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित किन्हीं अन्य शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी मान्यताप्राप्त संगम के शासी निकाय को अतिष्ठित किया जाना चाहिए तो इस अधिनियम में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, सम्पृक्त मान्यताप्राप्त संगम के शासी निकाय को यह हेतुक दर्शित करने का कि उसे अतिष्ठित क्यों न कर दिया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे संगम के शासी निकाय को छह मास से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, अतिष्ठित किया हुआ घोषित कर सकती है और उस शासी निकाय की सभी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग और पालन करने के लिए किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त कर सकती है और जहां एक से अधिक व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं वहां ऐसे व्यक्तियों में से किसी एक को अध्यक्ष और ऐसे व्यक्तियों में से किसी दूसरे को उपाध्यक्ष नियुक्त कर सकती है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन राजपत्र में किसी अधिसूचना के प्रकाशन के निम्नलिखित परिणाम होंगे, अर्थात् :-
(क) ऐसे शासी निकाय के जो अतिष्ठित कर दिया गया है सदस्य, अतिष्ठित किए जाने की अधिसूचना की तारीख से ऐसे सदस्यों की हैसियत में पद पर नहीं रहेंगे ;
(ख) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति ऐसे शासी निकाय की जो अतिष्ठित कर दिया गया है, सभी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग और पालन कर सकता है या कर सकते हैं ;
(ग) उस मान्यताप्राप्त संगम की ऐसी सभी सम्पत्ति, जिसे उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति, लिखित आदेश द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करें या करे वह इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए उसे या उन्हें समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए आवश्यक है, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों में निहित होगी ।
(3) किसी विधि में या उस संगम के, जिसका शासी निकाय उपधारा (1) के अधीन अतिष्ठित कर दिया जाता है, नियमों या उपविधियों में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, उस उपधारा के अधीन नियुक्त व्यक्ति ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा या करेंगे जो उस उपधारा के अधीन प्रकाशित अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए और केन्द्रीय सरकार, इसी प्रकार की अधिसूचना द्वारा, ऐसी अवधि में समय-समय पर फेरफार कर सकती है ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के पद की अवधि के पर्यवसान पर मान्यताप्राप्त संगम अपने नियमों के अनुसार एक शासी निकाय का तुरन्त पुनर्गठन करेगा :
परन्तु जब तक शासी निकाय इस प्रकार पुनर्गठन न किया जाए, तब तक उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति, उपधारा (1) किसी बात के होते हुए भी, अपनी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग और पालन करता रहेगा या करते रहेंगे ।
(5) उपधारा (4) के अधीन शासी निकाय के पुनर्गठन पर, उस मान्यताप्राप्त संगम की सभी सम्पत्ति जो उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों में निहित हो गई थी अथवा उसके या उनके कब्जे में थी, इस प्रकार संगठित शासी निकाय में, यथास्थिति, निहित या पुनर्निहित हो जाएगी ।
14. मान्यताप्राप्त संगमों के कारबार को निलम्बित करने की शक्ति-यदि व्यापार के हित में या लोक हित में केन्द्रीय सरकार ऐसा करना समीचीन समझती है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी मान्यताप्राप्त संगम को उसके ऐसे कारबार को सात दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, निलम्बित करने का निदेश दे सकती है और यदि, केन्द्रीय सरकार की राय में, व्यापार के हित में या लोक हित में ऐसा अपेक्षित है तो वह, इसी प्रकार की अधिसूचना द्वारा, उक्त अवधि को समय-समय पर बढ़ा सकती है :
परन्तु जहां निलम्बन की अवधि का एक मास से अधिक होना सम्भाव्य है वहां उस निलम्बन को ऐसी अवधि से अधिक के लिए बढ़ाने वाली कोई अधिसूचना तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक उस मान्यताप्राप्त संगम के शासी निकाय को मामले में सुनवाई का अवसर न दे दिया जाए ।
[अध्याय 3क
रजिस्ट्रीकृत संगम
14क. सभी संगमों द्वारा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्राप्त किया जाना-(1) अग्रिम संविदाओं से सम्बन्धित कारबार के विनियमन और नियंत्रण से सम्पृक्त कोई संगम, अग्रिम संविदा (विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 62) के प्रारम्भ के पश्चात् (जिसे इसमें इसके पश्चात् ऐसा प्रारम्भ कहा गया है), ऐसा कारबार, आयोग द्वारा इस अधिनियम के अधीन दिए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की शर्तों के अधीन और उनके अनुसार ही चलाएगा, अन्यथा नहीं ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक संगम जो ऐसे प्रारम्भ पर विद्यमान है, ऐसे प्रारम्भ से छह मास की समाप्ति के पहले, और उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक संगम जो ऐसे प्रारम्भ पर विद्यमान नहीं है, ऐसा कारबार प्रारंभ करने के पहले, ऐसे प्ररूप में और ऐसी विशिष्टियां देते हुए जो विहित की जाएं, आयोग को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करेगा :
परन्तु आयोग स्वविवेकानुसार पूर्वोक्त छह मास की अवधि को समय-समय पर कुल मिलाकर एक वर्ष तक बढ़ा सकता है ।
(3) इस धारा की कोई बात,
(क) ऐसे प्रारम्भ पर विद्यमान किसी संगम को उपधारा (2) के अधीन अपने द्वारा किए गए आवेदन के निपटान तक अपना कारबार चलाने से प्रतिषिद्ध करने वाली नहीं समझी जाएगी ; या
(ख) ऐसे प्रारम्भ पर विद्यमान किसी मान्यताप्राप्त संगम से उपधारा (2) के अधीन आवेदन करने की अपेक्षा करने वाली नहीं समझी जाएगी; और ऐसे प्रत्येक संगम को, ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् यथाशीघ्र, आयोग द्वारा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र निःशुल्क दिया जाएगा ।
14ख. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का दिया जाना या देने से इंकार किया जाना-धारा 14क के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर आयोग, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह इस निमित्त आवश्यक समझे, लिखित आदेश द्वारा, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दे सकता है या देने से इंकार कर सकता है :
परन्तु ऐसा प्रमाणपत्र देने से इंकार करने से पहले, संगम को मामले में सुनवाई का अवसर दिया जाएगा ।
14ग. रजिस्ट्रीकृत संगमों को धारा 8 और धारा 12ख का लागू होना-धारा 8 और 12ख के उपबन्ध रजिस्ट्रीकृत के सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे मान्यताप्राप्त संगम के सम्बन्ध में लागू होते हैं किन्तु,-
(i) “मान्यताप्राप्त संगम" के प्रति निर्देशों के स्थान पर रजिस्ट्रीकृत संगम" के प्रति निर्देश रखे जाएंगे ; और
(ii) धारा 12ख की उपधारा (2) में तीन वर्ष" शब्दों के स्थान पर “दो वर्ष" शब्द रखे जाएंगे ।]
अध्याय 4
अग्रिम संविदा और माल विकल्प करार
15. अधिसूचित माल में अग्रिम संविदाओं का कतिपय परिस्थितियों में अवैध या शून्य होना-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि यह धारा ऐसे माल या माल के वर्ग को और ऐसे क्षेत्रों में लागू होगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं और तब, धारा 18 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी माल के क्रय या विक्रय के लिए प्रत्येक अग्रिम संविदा, जो उसमें विनिर्दिष्ट क्षेत्र में मान्यताप्राप्त संगम के सदस्यों के बीच या किसी ऐसे सदस्य के माध्यम से या किसी ऐसे सदस्य के साथ किए जाने से भिन्न रूप में की गई है, अवैध होगी ।
(2) उपधारा (1) के अनुसरण में किसी माल में की गई कोई ऐसी अग्रिम संविदा, जो धारा 11 की उपधारा (3) के खण्ड (क) के अधीन इस निमित्त विनिर्दिष्ट उपविधियों में से किसी के उल्लंघन में है,-
(i) उस मान्यताप्राप्त संगम के किसी ऐसे सदस्य के, जिसने ऐसी किसी उपविधि के उल्लंघन में संविदा की है, अधिकारों की बाबत शून्य होगी, और
(ii) किसी अन्य व्यक्ति के, जिसने जानबूझकर ऐसे संव्यवहार में भाग लिया है जिससे ऐसा उल्लंघन होता है, अधिकारों की बाबत भी शून्य होगी ।
(3) उपधारा (2) की कोई बात मान्यताप्राप्त संगम के सदस्य से भिन्न किसी व्यक्ति के किसी ऐसी संविदा को प्रवर्तित कराने के या ऐसी संविदा के अधीन या उसकी बाबत किसी धनराशि को वसूल करने के अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी :
परन्तु यह तब जब कि ऐसे व्यक्ति को इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऐसा संव्यवहार धारा 11 की उपधारा (3) के खण्ड (क) के अधीन विनिर्दिष्ट उपविधियों में से किसी के उल्लंघन में है ।
[(3क) उपधारा (1) के अनुसरण में किसी माल में की गई कोई ऐसी अग्रिम संविदा, जो संविदा की तारीख को धारा 11 की उपधारा (3) के खण्ड (कक) के अधीन इस निमित्त विनिर्दिष्ट उपविधियों में से किसी के उल्लंघन में है, अवैध होगी ।]
(4) किसी मान्यताप्राप्त संगम का कोई सदस्य, मान्यताप्राप्त संगम के किसी सदस्य से भिन्न किसी व्यक्ति के साथ उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी माल की बाबत अपने खाते कोई संविदा नहीं करेगा जब तक कि उसने ऐसे व्यक्ति की सहमति या प्राधिकार प्राप्त न कर लिया हो और वह क्रय या विक्रय के टिप्पण, ज्ञापन या करार में यह प्रकट नहीं करता है कि उसने, यथास्थिति, माल का क्रय या विक्रय अपने खाते किया है :
परन्तु जहां सदस्य ने ऐसे व्यक्ति की सहमति या प्राधिकार लिखित रूप से भिन्न रूप में प्राप्त किया है वहां वह ऐसे व्यक्ति से ऐसी सहमति या प्राधिकार की लिखित पुष्टि ऐसी संविदा की तारीख से तीन दिन के भीतर प्राप्त करेगा :
परन्तु यह और कि किसी सदस्य द्वारा मान्यताप्राप्त संगम के सदस्य से भिन्न किसी व्यक्ति के साथ की गई किसी ऐसी संविदा की बाबत जो विद्यमान है, ऐसी विद्यमान संविदा को उपविधियों के अनुसार बन्द करने के लिए ऐसे व्यक्ति की सहमति या प्राधिकार उस दशा में आवश्यक नहीं होगा, जब वह सदस्य ऐसे बन्द करने की बाबत क्रय या विक्रय के टिप्पण, ज्ञापन या करार में यह प्रकट करता है कि उसने, यथास्थिति, माल का क्रय या विक्रय अपने खाते किया है ।
16. धारा 15 के अधीन अधिसूचना के परिणाम-जहां धारा 15 के अधीन कोई अधिसूचना जारी की गई है वहां तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि मे या व्यापार की किसी रूढ़ि, प्रथा या परिपाटी में या किसी संविदा के निबन्धनों में या किसी सम्पृक्त संगम की किसी संविदा से सम्बन्धित उपविधियों में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी माल के क्रय या विक्रय के लिए [अधिसूचना की तारीख को या उससे पहले की गई] और उक्त तारीख के पश्चात् पालन किए जाने के लिए बाकी रह गई प्रत्येक अग्रिम संविदा, जो धारा 15 के उपबन्धों के अनुरुप नहीं है, ऐसी दर पर बन्द की गई समझी जाएगी जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त नियत करे और ऐसी संविदाओं के विभिन्न वर्गों के लिए विभिन्न दरें नियत की जा सकती हैं ;
(ख) इस प्रकार बन्द की गई समझी गई किसी संविदा से उद्भूत होने वाले सभी अन्तर खण्ड (क) के आधीन, नियत दर के आधार पर देय होंगे और विक्रेता माल का परिवहन करने के लिए और क्रेता माल का परिदान लेने के लिए आबाद्ध नहीं होगा ।
17. कतिपय दशाओं में अग्रिम संविदाओं का प्रतिषेध करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राज्यपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि कोई व्यक्ति, केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा के बिना, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए कोई ऐसी अग्रिम संविदा, जिसको धारा 15 के उपबन्ध लागू नहीं किए गए हैं, सिवाय ऐसे विस्तार और रीति के, यदि कोई हों, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, नहीं करेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख के पश्चात् उसके उपबन्धों के उल्लंघन में की गई सभी अग्रिम संविदाएं अवैध होंगी ।
(3) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की गई है वहां अधिसूचना में किसी प्रतिकूल बात के अभाव में, धारा 16 के उपबन्ध, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी माल के क्रय या विक्रय के लिए 1[अधिसूचना की तारीख को या उससे पहले की गई] और उक्त तारीख के पश्चात् पालन किए जाने के लिए बाकी रह गई सभी अग्रिम संविदाओं को उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे धारा 15 के अधीन अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी माल के क्रय या विक्रय की सभी अग्रिम संविदाओं को लागू होते हैं ।
18. अग्रिम संविदाओं के कतिपय वर्गों की बाबत विशेष उपबन्ध-(1) अध्याय 3 या अध्याय 4 की कोई बात किसी माल के क्रय या विक्रय की अनन्तरणीय विनिर्दिष्ट परिदान संविदाओं को लागू नहीं होगी :
परन्तु कोई व्यक्ति उस क्षेत्र में जिसको धारा 15 के उपबन्ध लागू किए गए हैं, न तो (मान्यताप्राप्त संगम से भिन्न) किसी ऐसे संगम का गठन करेगा और न उसके गठन में सहायता करेगा और न उसका सदस्य होगा, जो संविदा के दूसरे पक्षकार को या उससे अथवा संविदा में नामित किसी दूसरे पक्षकार को या उससे, वास्तविक परिदान किए बिना या प्राप्त किए बिना उसके किसी पक्षकार द्वारा अनन्तरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा के पालन के लिए सुविधाएं प्रदान करता है ।
(2) जहां किसी क्षेत्र की बाबत धारा 15 के उपबन्ध किसी माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए अग्रिम संविदाओं के उपबन्ध में लागू किए गए हैं वहां केन्द्रीय सरकार, इसी प्रकार की अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि उक्त क्षेत्र में या उसके किसी ऐसे भाग में जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, अध्याय 3 या अध्याय 4 के सभी या कोई उपबन्ध उक्त माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए अनन्तरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं को या तो साधारणतया लागू नहीं होंगे या विशिष्टतया ऐसी संविदाओं के किसी वर्ग को लागू नहीं होंगे ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि व्यापार के हित में या लोक हित में किसी क्षेत्र में अनन्तरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं का विनियमन और नियंत्रण समीचीन है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि अध्याय 3 और अध्याय 4 के सभी या कोई उपबन्ध ऐसे क्षेत्र में अनन्तरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं के किसी ऐसे वर्ग या वर्गों को और ऐसे माल या माल के वर्गों की बाबत जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, लागू होंगे और वह ऐसी रीति विनिर्दिष्ट कर सकती है जिससे और ऐसा विस्तार विनिर्दिष्ट कर सकती है जिस तक उक्त सभी या कोई उपबन्ध इस प्रकार लागू होंगे ।
19. माल विकल्प करारों का प्रतिषेध-(1) इस अधिनियम में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, इस धारा के प्रवृत्त होने की तारीख के पश्चात् किए गए सभी माल विकल्प करार अवैध होंगे ।
(2) इस धारा के प्रवृत्त होने की तारीख से पहले किया गया कोई माल विकल्प करार जो, उक्त तारीख के पश्चात् पालन किए जाने के लिए, पूर्णतः, या भागतः, बाकी रह गया है, उस विस्तार तक, शून्य हो जाएगा ।
अध्याय 5
शास्तियां और प्रक्रिया
[20. शास्तियांकोई-व्यक्ति जो
(क) (i) इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अपेक्षित किसी विवरणी, कथन या अन्य दस्तावेज में, यह जानते हुए कि वह मिथ्या है, कोई कथन करेगा जो किसी तात्त्विक विशिष्टि में मिथ्या है, या तात्त्विक कथन करने का जानबूझकर लोप करेगा ; या
(ii) इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन कोई विवरणी, कथन या अन्य दस्तावेज या कोई जानकारी देने या किसी प्रश्न का उत्तर देने या उनके अधीन की गई किसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करने में बिना युक्तियुक्त प्रतिहेतु के (जिसे साबित करने का भार उसी पर होगा) असफल रहेगा ; या
(iii) धारा 14 के अधीन अधिसूचना के अनुसरण में किसी मान्यताप्राप्त संगम के कारबार के निलम्बन की अवधि के दौरान कोई अग्रिम संविदा करेगा ; या
(ख) मान्यताप्राप्त संगम से भिन्न किसी ऐसे संगम का, जिसे इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र नहीं दिया गया है, सदस्य होगा ; या
(ग) किसी ऐसी दर के संबंध में, जिस पर कोई अग्रिम संविदा किसी मान्यताप्राप्त संगम की उपविधियों में से किसी के उललंघन में की गई है, कोई जानकारी प्रकाशित या परिचालित करेगा ; या
(घ) धारा 18 की उपधारा (1) के परन्तुक के उपबंधों के उल्लंघन में किसी संगम का गठन करेगा, या उसके गठन में सहायता करेगा या उसका सदस्य होगा ; या
(ङ) धारा 15 की उपधारा (1) या उपधारा (3क) या उपधारा (4), धारा 17 या धारा 19 के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में कोई अग्रिम संविदा या माल विकल्प करार करेगा,
दोषसिद्धि पर,-
(i) प्रथम अपराध के लिए, कारावास से, जिसकी अविधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए से कम का नहीं होगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा,
(ii) [धारा 15 की उपधारा (4) के उपबन्धों के उल्लंघन की बाबत किसी अपराध से भिन्न, खण्ड (घ) के अधीन या खण्ड (ङ) के अधीन] द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराध के लिए, कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा : परन्तु तत्प्रतिकूल विशेष और पर्याप्त कारणों के अभाव में, जो न्यायालय के निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे, ऐसा कारावास एक मास से कम का नहीं होगा और ऐसा जुर्माना एक हजार रुपए से कम का नहीं होगा ।]
21. माल में अग्रिम संविदा करने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले स्थान को अपने स्वामित्व में रखने या चलाने के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति जो-
(क) किसी मान्यताप्राप्त संगम के स्थान से भिन्न किसी ऐसे स्थान को अपने स्वामित्व में रखेगा या चलाएगा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में कोई अग्रिम संविदा करने के या उसका पालन करने के, चाहे पूर्णतः हो या भागतः प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता है, और जानते हुए ऐसे स्थान का ऐसे प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाया जाना अनुज्ञात करेगा ; या
(ख) केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा के बिना, इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में कोई अग्रिम संविदा करने में या उसका पालन करने में, चाहे पूर्णतः हो या भागतः सहायता करने के प्रयोजन के लिए किसी मान्यताप्राप्त संगम से भिन्न किसी संगम का गठन करेगा या उसके गठन में सहायता करेगा या उसका सदस्य होगा ; या
(ग) मान्यताप्राप्त संगम के स्थान से भिन्न किसी ऐसे स्थान का प्रबन्ध करेगा, नियंत्रण करेगा या उसको चलाने में सहायता करेगा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में कोई अग्रिम संविदा करने के, या उसका पालन करने के, चाहे पूर्णतः हो या भागतः, प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता है या जहां ऐसी अग्रिम संविदाएं अभिलिखित या समायोजित की जाती हैं या ऐसी अग्रिम संविदाएं उद्भूत होने वाले अधिकार या दायित्व, चाहे किसी भी रीति से समायोजित, विनियमित या प्रवर्तित किए जाते हैं ; या
(घ) किसी मान्यताप्राप्त संगम का सदस्य न होते हुए, किसी व्यक्ति को जानबूझकर यह व्यपदिष्ट करेगा या यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करेगा कि वह किसी मान्यताप्राप्त संगम का सदस्य है या इस अधिनियम के अधीन उसके माध्यम से अग्रिम संविदाएं की जा सकती हैं या उनका पालन, चाहे पूर्णतः हो या भागतः किया जा सकता है ; या
(ङ) किसी मान्यताप्राप्त संगम का सदस्य न होते हुए, या ऐसे संगम के नियमों या उपविधियों के अधीन उस सदस्य के अभिकर्ता के रूप में प्राधिकृत न होते हुए, इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में अग्रिम संविदाओं से सम्बन्धित किसी कारबार के लिए किसी भी रीति से, या तो अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से, संयाचना करेगा, विज्ञापन करेगा या टाउट का काम करेगा ; या
(च) इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में बोली लगाने या प्रस्थापना करने के लिए या किन्हीं अग्रिम संविदाओं को करने या उनका पालन, चाहे पूर्णतः हो या भागतः करने के लिए किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को किसी मान्यताप्राप्त संगम की उपविधियों में विनिर्दिष्ट कारबार के स्थान से भिन्न किसी स्थान पर संयोजित करेगा, एकत्र करेगा या एकत्र होने में सहायता करेगा ; या
(छ) ऐसे माल की बाबत, जिनको धारा 15 के उपबन्ध लागू किए गए हैं, अग्रिम संविदाओं के व्यापारक्रम को प्रभावित करने वाला या प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखने वाला कोई ऐसा कथन करेगा या जानकारी देगा, उसे प्रकाशित करेगा या परिचालित करेगा जो मिथ्या है और जिसके बारे में वह या तो यह जानता है या विश्वास करता है कि वह मिथ्या है ; [या]
1[(ज) धारा 15 के अधीन किसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी क्षेत्र में उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी माल के क्रय या विक्रय के लिए अग्रिम संविदा की बाबत कीमतों के बारे में चक्रचाल करेगा या चक्रचाल करने का प्रयास करेगा,]
[दोषसिद्धि पर,-
(i) प्रथम अपराध के लिए, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए से कम का नहीं होगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ;
(ii) द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराध के लिए, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा : परन्तु तत्प्रतिकूल विशेष और पर्याप्त कारणों के अभाव में, जो न्यायालय के निर्णय में उललिखित किए जाएंगे, ऐसा कारावास एक मास से कम का नहीं होगा और ऐसा जुर्माना एक हजार रुपए से कम का नहीं होगा ।]
[21क. सम्पत्ति का समपहरण करने का आदेश देने की न्यायालय की शक्ति-धारा 20 या धारा 21 के अधीन दण्डनीय अपराध का विचारण करने वाला कोई न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो ऐसे अपराध के लिए जो दण्डादेश वह अधिरोपित करे उसके अतिरिक्त, यह निदेश दे सकता है कि कोई धन, माल या अन्य सम्पत्ति, जिसकी बाबत अपराध किया गया है, केन्द्रीय सरकार को समपहृत हो जाएगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उस सम्पत्ति के अन्तर्गत, जिसकी बाबत कोई अपराध किया गया है, बैंक में निक्षेप भी है यदि उक्त सम्पत्ति ऐसे निक्षेपों में परिवर्तित की जाती है ।]
22. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधकऔरउसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार, अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी घोर उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार, अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए
(क) “कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ; तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
[22क. लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों की तलाशी और अभिग्रहण करने की शक्ति-(1) कोई भी प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, वारण्ट द्वारा, किसी पुलिस अधिकारी को, जो उपनिरीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो, ऐसे स्थान में जहां इस अधिनियम के उपबन्धों के उल्लंघन में की गई अग्रिम संविदाओं से या माल विकल्प करार से सम्बन्धित लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें हैं, या होने का युक्तियुक्त संदेह है, प्रवेश करने और तलाशी लेने के लिए प्राधिकृत कर सकता है और ऐसा पुलिस अधिकारी ऐसी बही या दस्तावेज का अभिग्रहण कर सकता है यदि उसकी राय में वह ऐसी किसी अग्रिम संविदा या माल विकल्प करार से सम्बन्धित है ।
(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबन्ध, जहां तक हो सके, उपधारा (1) के अधीन ली गई तालाशी या अभिग्रहण को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उक्त संहिता की धारा 98 के अधीन जारी किए गए वारण्ट के प्राधिकार के अधीन ली गई किसी तालाशी या अभिग्रहण को लागू होते हैं ।
22ख. कतिपय दशाओं में उपधारणाओं का किया जाना-(1) जहां किसी स्थान से कोई लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें अभिगृहीत की जाती हैं और उनमें मात्रा, कोटेशन, दर, परिदान का मास, अन्तर की प्राप्ति या उसका संदाय या माल का क्रय या विक्रय या माल विकल्प करार के प्रति निर्देश करनेवाली प्रविष्टियां हैं वहां ऐसी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें, उन्हें साबित करने के लिए साक्षियों के उपस्थित किए बिना, साक्ष्य में ग्रहण की जाएंगी, और ऐसी प्रविष्टियां उनमें अभिलिखित किए जाने के लिए तात्पर्यित मामलों, संव्यवहारों और लेखाओं की प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होंगी ।
(2) धारा 21 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के विचारण में जब तक तत्प्रतिकूल साबित न किया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि वह स्थान जहां से उपधारा (1) में निर्दिष्ट लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें अभिगृहीत की गई थीं, उक्त अपराध करने के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता था और वहां पाए गए व्यक्ति उक्त अपराध करने के प्रयोजन के लिए उपस्थित थे ।]
23. कतिपय अपराधों का संज्ञेय होना-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, [निम्नलिखित अपराध उस संहिता के अर्थ में संज्ञेय समझे जाएंगे, अर्थात् :-
(क) धारा 20 के खण्ड (क) के उपखण्ड (त्त्) के अधीन आने वाला अपराध जहां तक कि वह धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन की गई किसी अपेक्षा का अनुपालन करने में असफल रहने से सम्बन्धित है ;
(ख) धारा 20 के खण्ड (घ) के अधीन आने वाला अपराध ;
(ग) धारा 15 की उपधारा (3क) या उपधारा (4) के उपबन्धों के उल्लंघन से भिन्न, धारा 20 के खण्ड (ङ) के अधीन आने वाला अपराध ;
(घ) धारा 21 के अधीन आने वाला अपराध ।]
24. इस अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण करने की अधिकारिता-प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान या विचारण नहीं करेगा ।
अध्याय 6
प्रकीर्ण
25. सलाहकार समिति-केन्द्रीय सरकार को इस अधिनियम के प्रवर्तन से सम्बद्ध किसी मामले के सम्बन्ध में सलाह देने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार उतनी संख्या में, जो विहित की जाए, व्यक्तियों की एक सलाहकार समिति स्थापित कर सकती है ।
26. प्रत्यायोजन की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकती है कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली कोई शक्ति, ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन जो विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जो निदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, जिसके अन्तर्गत राज्य सरकार या उसके अधिकारी या प्राधिकारी भी हैं, प्रयोग की जा सकती है ।
27. छूट देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी शर्तों के अधीन और ऐसी परिस्थितियों में और ऐसे क्षेत्रों में जो अधिसूचना में, विनिर्दिष्ट किए जाएं, किसी संविदा या संविदाओें के वर्ग को इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबन्धों के प्रवर्तन से छूट दे सकती है ।
[27क. सद्भावपूर्ण की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम या उपविधि के अधीन सद्भावपूर्ण की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, केन्द्रीय सरकार के या आयोग के किसी सदस्य अधिकारी या सेवक के विरुद्ध किसी न्यायालय में न होगी ।]
(2) कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो आयोग के अनुमोदन से या उसकी प्रेरणा पर और इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम या उपविधि के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, किसी मान्यताप्राप्त संगम के शासी निकाय या किसी सदस्य, पदाधिकारी या सेवक के विरुद्ध या धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी न्यायालय में न होगी ।]
28. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकती है ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकते हैं, अर्थात् :-
(क) आयोग के सदस्यों की सेवा की शर्तें और निबन्धन ;
(ख) वह रीति जिससे मान्यता के लिए आवेदन धारा 5 के अधीन किए जा सकते हैं और उनकी बाबत फीस का उद्ग्रहण ;
(ग) वह रीति जिससे किसी संगम को मान्यता देने के प्रयोजन के लिए कोई जांच की जा सकती है और वह प्ररूप जिसमें मान्यता दी जाएगी ;
[(गग) वह रीति जिससे रजिस्ट्रीकरण प्रामणपत्र के लिए आवेदन धारा 14क के अधीन किए जा सकते हैं और ऐसे आवेदनों की बाबत फीस का उद्ग्रहण ;]
(घ) मान्यताप्राप्त संगमों की वार्षिक रिपोर्टों में अन्तर्विष्ट की जाने वाली विशिष्टियां ;
(ङ) वह रीति जिससे इस अधिनियम के अधीन बनाई, संशोधित या पुनरीक्षित की जाने वाली उपविधियां इस प्रकार बनाई, संशोधित या पुनरीक्षित की जाने के पहले आलोचना के लिए प्रकाशित की जाएंगी ;
(च) धारा 25 के अधीन स्थापित सलाहकार समिति के गठन, समिति के सदस्यों की पदावधियां और उनकी रिक्तियों के भरने की रीति ; वह अन्तराल जिसके भीतर सलाहकार समिति की बैठकें की जा सकती हैं और ऐसी बैठकों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ; और वे मामले जो केन्द्रीय सरकार द्वारा सलाहकार समिति को सलाह के लिए निर्देशित किए जा सकते हैं ;
(छ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
[28क. मान्यताप्राप्त संगमों की व्यावृत्ति-(1) अग्रिम संविदा विनियमन अधिनियम के अधीन मान्यताप्राप्त सभी संगम प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्रतिभूति संविदा अधिनियम कहा गया है) के अधीन मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज समझे जाएंगे :
परंतु ऐसे मानित मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज तब तक जब तक उक्त मानित मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट रूप से अनुज्ञात न किया जाए, वस्तु व्युत्पन्न्ियों के क्रय, विक्रय या व्यौहार के कारबार में सहायता प्रदान करने, उसे विनियमित करने या नियंत्रित करने के क्रियाकलापों से भिन्न कोई क्रियाकलाप नहीं करेंगे :
परन्तु यह और कि वस्तु व्युत्पन्नियों का वस्तु व्युत्पन्नियों के दलाल के रूप में क्रय करने या उनका विक्रय करने या अन्यथा व्यौहार करने वाला ऐसा व्यक्ति या ऐसा अन्य मध्यवर्ती जो वस्तु व्युत्पन्नी बाजार के साथ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के अधिकारों और आस्तियों का ऐसा अंतरण करने और उनको उसमें निहित करने के ठीक पूर्व जिसके लिए ऐसे अंतरण पूर्व कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र आवश्यक नहीं था, सहयोजित हो ऐसे अंतरण से तीन मास की अवधि तक या यदि उसने तीन मास की उक्त अवधि के भीतर ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर दिया है तो ऐसे आवेदन का निपटारा होने तक ऐसा करना जारी रख सकेगा ।
(2) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (जिसे इसमें प्रतिभूति बोर्ड कहा गया है) ऐसे मानित एक्सचेंजों को प्रतिभूति संविदा अधिनियम और उक्त अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं विनियमों, नियमों, मार्गदशक सिद्धांतों या वैसी ही लिखतों का अनुपालन करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध करा सकेगा ।
(3) अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन किसी मान्यताप्राप्त संगम द्वारा बनाई गई उपविधियां, परिपत्र और वैसी ही कोई लिखतें, उस तारीख से, जिसको वह अधिनियम निरसित होता है, एक वर्ष की अवधि तक या प्रतिभूति बोर्ड द्वारा यथा अधिसूचित समय कि, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, लागू बनी रहेंगी मानो कि अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ।
(4) अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन मान्यताप्राप्त संगमों को लागू आयोग या केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए सभी नियम, निदेश, मार्गदर्शक सिद्धांत, अनुदेश, परिपत्र या वैसी ही कोई लिखतें उस तारीख से, जिसको उस अधिनियम को निरसित होता है, एक वर्ष की अवधि तक या बोर्ड द्वारा यथा अधिसूचित समय तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, इस प्रकार प्रवृत्त बनी रहेंगी मानो कि अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ।
(5) अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन शक्तियों के अतिरिक्त, प्रतिभूति बोर्ड और केंद्रीय सरकार ऐसे मानित एक्सचेंजों पर मान्यताप्राप्त संगमों के संबंध में क्रमशः आयोग और केंद्रीय सरकार की सभी शक्तियों का प्रयोग एक वर्ष की अवधि तक इस प्रकार करेगी, मानो अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ।]
[29. निरसन और व्यावृत्ति-यदि उस तारीख के ठीक पहले जिसको यह अधिनियम या इसमें अन्तर्विष्ट कोई उपबन्ध किसी राज्य में किसी माल या माल के वर्ग को लागू किया जाता है, उस राज्य में, यथास्थिति, इस अधिनियम की, या इसमें अन्तर्विष्ट किसी उपबन्ध की, तत्स्थानी कोई ऐसी विधि प्रवृत्त है, जो उस माल या माल के वर्ग को लागू है तो वह विधि उक्त तारीख को निरसित हो जाएगी :
परन्तु वह निरसन,-
(क) इस प्रकार निरसित किसी विधि के पूर्व प्रवर्तन पर तद्धीन सम्यक्तः की गई या सहन की गई किसी भी बात पर ; या
(ख) इस प्रकार निरसित किसी विधि के अधीन अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व पर ; या
(ग) इस प्रकार निरसित किसी विधि के विरुद्ध किए गए किसी अपराध की बाबत उपगत किसी शास्ति, समपहरण या दण्ड पर ; या
(घ) किसी ऐसे अन्वेषण, विधिक कायर्वाही या उपचार पर जो यथापूर्वोक्त किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति, समपहरण या दण्ड की बाबत हो,
प्रभाव नहीं डालेगा और ऐसा कोई अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार वैसे ही संस्थित किया जा सकता है, चालू रखा जा सकता है या प्रवर्तित किया जा सकता है और ऐसी कोई शास्ति, समपहरण या दण्ड वैसे ही अधिरोपित किया जा सकता है मानो यह अधिनियम पारित नहीं किया गया था :
परन्तु यह और कि ऐसी किसी विधि के अधीन की गई कोई भी बात या कार्रवाई, पूर्ववर्ती परन्तुक के अधीन रहते हुए (जिसके अन्तर्गत कोई भी की गई नियुक्ति, जारी की गई अधिसूचना या आदेश, विरचित नियम, विनियम, प्ररूप या उपविधि, या दी गई मान्यता भी है), इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबन्ध के अधीन की गई समझी जाएगी और तद्नुसार तब तक प्रवृत्त रहेगी जब तक कि वह इस अधिनियम के अधीन की गई किसी बात या कार्रवाई द्वारा अतिष्ठित नहीं कर दी जाती ।]
[29क. निरसन और व्यावृत्ति-(1) अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का 74) निरसित किया जाता है ।
(2) अग्रिम संविदा अधिनियम के निरसन की तारीख से ही-
(क) केंद्रीय सरकार और आयोग द्वारा अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन विचरित नियम और विनियम निरसित हो जाएंगे ;
(ख) केंद्रीय सरकार द्वारा अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन स्थापित सभी प्राधिकरण और इकाइयां, जिनमें उस अधिनियम की धारा 25 के अधीन स्थापित आयोग और सलाहकार परिषद् भी सम्मिलित है, विघटित हो जाएंगी ;
(ग) उपधारा (1) में निरसित अधिनियम के अधीन किए गए, प्रारंभ किए गए या जारी किए गए कोई निरीक्षण, आदेश, शास्ति, कार्यवाही या सूचना अथवा की गई कोई पुष्टि या घोषणा अथवा उपांतरित या प्रतिसंहृत कोई अनुज्ञप्ति, अनुज्ञा, प्राधिकार या छूट अथवा निष्पादित कोई दस्तावेज या लिखत अथवा दिए गए किसी निदेश सहित की गई कोई बात या कार्रवाई या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई बात या कार्रवाई इस रूप में जारी रहेगी या प्रतिभूति बोर्ड द्वारा इस प्रकार प्रवृत्त की जाएगी, मानो वह अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ;
(घ) ऐसे सभी अपराध और ऐसे अपराधों के संबंध में जो अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन कारित किए गए हों विद्यमान कार्यवाहियां, उस अधिनियम के उपबंधों द्वारा इस प्रकार शासित होती रहेंगी, मानो वह अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ;
(ङ) प्रतिभूति बोर्ड द्वारा अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन उस तारीख से जिसको वह अधिनियम निरसित हुआ हो, तीन वर्षों की अवधि के भीतर उस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के संबंध में कोई नई कार्यवाही इस प्रकार प्रारंभ की जा सकेगी और इस प्रकार कार्यवाही चलाई जा सकेगी मानो अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ;
(च) खंड (घ) और खंड (ङ) में यथा उपबंधित के सिवाय, कोई भी न्यायालय अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान उस तारीख से नहीं लेगा जिसको वह अधिनियम निरसित होता है ;
(छ) खंड (घ), खंड (ङ) और खंड (च), इन उपधाराओं के अधीन न आने वाले विषयों पर निरसन के प्रभाव के संबंध में, साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 के साधारणतया लागू होने पर प्रभाव डालने वाले नहीं माने जाएंगे और न ही उनके लागू होने पर प्रभाव डालेंगे ।
29ख. आयोग के उपक्रम का अंतरण और निहित होना-(1) उस तारीख को जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, उपक्रम भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को अंतरित और उसमें निहित हो जाएगा ।
(2) यदि उस तारीख को, जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, उपक्रम के संबंध में आयोग के विरुद्ध कोई कार्यवाही या वाद हेतुक विद्यमान हो, तो ऐसी कार्यवाही या वाद हेतुक प्रतिभूति बोर्ड द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखा जा सकेगा तथा प्रवृत्त कराया जा सकेगा ।
(3) आयोग की उसके उपक्रम के संबंध में किसी कर, शुल्क और उपकर के संदाय की बाबत कोई फायदे और छूटें भी हैं, ऐसी रियायतें, विशेषाधिकार, फायदे और छूटें, जिनके अंतर्गत उस तारीख को जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है प्रतिभूति बोर्ड को अंतरित हो जाएंगी ।
(4) आयोग के अधीन उस तारीख के ठीक पूर्व, जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, कोई पद धारित करने वाला ऐसा प्रत्येक कर्मचारी (आयोग के सदस्यों को छोड़कर), केन्द्रीय सरकार या प्रतिभूति बोर्ड में, जैसा केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचित करे, उसी सेवाधृति के लिए और सेवा के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर धारित करेगा जिन पर वह कर्मचारी ऐसा पद तब धारण करता, यदि आयोग विघटित नहीं हुआ होता :
परन्तु जहां केंद्रीय सरकार यह अधिसूचित करती है कि आयोग का कोई कर्मचारी, पूर्वगामी उपबंध के अधीन केंद्रीय सरकार का कर्मचारी बना रहेगा, वहां केंद्रीय सरकार, प्रतिभूति बोर्ड के अनुरोध पर ऐसे कर्मचारी को ऐसी अवधि के लिए, जो उस तारीख से जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, दो वर्ष से अधिक की न हो, प्रतिभूति बोर्ड में प्रतिनियुक्त कर सकेगी ।
(5) आयोग का ऐसा कर्मचारी जो उस तारीख से, जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, छह मास के भीतर, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या प्रतिभूति बोर्ड का कर्मचारी न रहने का विकल्प अपनाता है, अपना ऐसा विनिश्चय केंद्रीय सरकार या प्रतिभूति बोर्ड को जैसे लागू हो संसूचित करेगा ।
(6) किसी अन्य प्रवृत्त विधि में अंतर्विष्ट कोई बात किसी कर्मचारी को अग्रिम संविदा अधिनियम के निरसन और आयोग के पारिणामिक विघटन के कारण पद की हानि के लिए किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगी और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ऐसा कोई दावा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(7) अग्रिम संविदा अधिनियम की धारा 3 के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त आयोग के सदस्य उस तारीख से जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित किया जाता है, पद पर नहीं रहेंगे ।
(8) आयोग के सदस्य, अग्रिम संविदा अधिनियम के निरसन और आयोग के पारिणामिक विघटन के कारण या ऐसे सदस्य द्वारा आयोग के साथ की गई प्रबंध की किसी संविदा के समय पूर्व समापन के कारण, पद की हानि के लिए किसी प्रतिकर के हकदार नहीं होंगे और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ऐसा कोई दावा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(9) उपक्रम का अंतरण और निहित होना, भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 के अधीन किसी स्टांप शुल्क या राज्य विधियों के अधीन लागू किन्हीं स्टांप शुल्कों के संदाय के लिए दायी नहीं होगा ।]
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