सशस्त्र बल (आपात कर्तव्य) अधिनियम, 1947
(1947 का अधिनियम संख्यांक 15)1
[20 मार्च, 1947]
सशस्त्र बलों पर आपातकाल में अधिरोपित अत्यावश्क
सेवाओं के सम्बन्ध में कर्तव्यों को करने के
वास्ते समर्थ बनाने के लिए
अधिनियम
यतः यह समीचीन है कि आपातकाल में 2॥। सशस्त्र बलों पर अत्यावश्यक सेवाओं के सम्बन्ध में कर्तव्य अधिरोपित करने के लिए समर्थ बनाया जाए;
अतः एत्दद्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैः-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार- 3॥। इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सशस्त्र बल (आपात कर्तव्य) अधिनियम, 1947 है ।
3। । । ।
2. सशस्त्र बल के आपात कर्तव्य-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा 4[किसी राज्य में] किसी विनिर्दिष्ट सेवा की बाबत यह घोषित कर सकेगी कि वह समुदाय के लिए अत्यावश्यक महत्व की सेवा हैः
परन्तु ऐसी अधिसूचना प्रथम बार एक मास तक प्रवृत्त रहेगी, किन्तु यह कालावधि समय-समय पर वैसी ही अधिसूचना द्वारा बढ़ाई जा सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन घोषणा हो जाने पर और जब तक उसे विखंडित नहीं किया जाता है, तब तक हर व्यक्ति का 5[सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेवा अधिनियम, 1950 (1950 का 45)] या 6॥। 7[नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62)] के अधीन रहते हुए यह कर्तव्य होगा कि वह घोषणा में विनिर्दिष्ट सेवा में नियोजन के सम्बन्ध में या उसके बारे में किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दिए गए समादेश का पालन करे, और ऐसे हर सामदेश को उक्त अधिनियमों के अर्थ में और प्रयोजनों के लिए विधिपूर्ण समादेश समझा जाएगा ।
3. कतिपय भूतपूर्व समादेशों का विधिमान्यकरण-ऐसी किसी सेवा में नियोजन के सम्बन्ध में या उसके बारे में, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, जो भी समादेश धारा 2 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा 1946 के सितम्बर के 30वें दिन के पश्चात् और इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व दिया गया था, वह उस उपधारा में निर्दिष्ट अधिनियमों के अर्थ में और उनके प्रयोजनों के लिए विधिपूर्ण समादेश समझा जाएगा, किन्तु किसी व्यक्ति को केवल इसी कारण दण्डित नहीं किया जाएगा कि उसने ऐसे किसी समादेश का पालन नहीं किया है ।
- विलयित राज्य (विधियां) अधिनियम, 1949 (1949 का 59) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा नए प्रान्तों और विलयित राज्यों को; भाग ग राज्य (विधियां) अधिनियम, 1950 (1950 का 30) की धारा 3 द्वारा मणिपुर, त्रिपुरा और विंध्य प्रदेश को; 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा (1-10-1963 से) पाण्डिचेरी और 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 तथा अनुसूची द्वारा (1-10-1987 से) लक्षद्वीप को; 1962 के विनियम सं० 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा उपांतरणों सहित गोवा, दमण और दीव को और 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और नागर हवेली को विस्तारित किया गया ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा क्राउन के शब्दों का लोप किया गया ।
- 1948 के अधिनियम 4 की धारा 2 द्वारा (1)” कोष्टक और अंक तथा उपधारा (2) निरसित की गई है ।
- 1951 के अधिनियम 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किसी भाग क राज्य या किसी भाग ग राज्य में या, यदि भाग ख राज्य द्वारा ऐसा अनुरोध किया जाए तो उस राज्य में की किसी विनिर्दिष्ट सेवा को के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1951 के अधिनियम 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भारतीय सेना अधिनियम, 1911, या भारतीय वायुसेना अधिनियम, 1932ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा नैवल डिसिप्लिन ऐक्ट उस रूप में जिसमें प्रथम अनुसूची में दिया गया है, शब्द निरसित ।
- 1960 के अधिनियम 58 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा दि इंडियन नेवी (डिसिप्लिन) ऐक्ट, 1934ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

