व्यय-कर अधिनियम, 1987
(1987 का अधिनियम संख्यांक 35)
[14 सितंबर, 1987]
[कतिपय होटलों या रेस्तराओं में उपगत व्यय पर कर के उद्ग्रहण
का और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों का]
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, प्रारंभ और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम व्यय-कर अधिनियम, 1987 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(1) निर्धारिती" से इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन संदेय व्यय-कर के संग्रहण के लिए उत्तरदायी व्यक्ति अभिप्रेत है ;
(2) निर्धारण वर्ष" से बारह मास की वह अवधि अभिप्रेत है जो प्रति वर्ष अप्रैल के प्रथम दिन प्रारंभ होती है ;
(3) बोर्ड" से केन्द्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 (1963 का 54) के अधीन गठित केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड अभिप्रेत है ;
(4) प्रभार्य व्यय" से धारा 5 में निर्दिष्ट व्यय अभिप्रेत है ;
(5) व्यय-कर" या कर" से इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन प्रभार्य कर अभिप्रेत है ;
(6) होटल" के अंतर्गत ऐसा भवन या भवन का भाग है जिसमें धनीय प्रतिफल के लिए, निवास की जगह कारबार के रूप में, दी जाती है ;
(7) आय-कर अधिनियम" से आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) अभिप्रेत है ;
(8) संग्रहण के लिए उत्तरदायी व्यक्ति" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिससे इस अधिनियम के अधीन कर संगृहीत करने की अपेक्षा की जाती है या जिससे इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य धनराशि का संदाय करने की अपेक्षा की जाती है और इसके अंतर्गत-
(क) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति है जिसके संबंध में इस अधिनियम के अधीन कोई कार्यवाही की गई है ; और
(ख) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति है जिसे इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन व्यतिक्रमी-निर्धारिती समझा जाता है ;
(9) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
[(9क) रेस्तरां" से कोई ऐसा परिसर अभिप्रेत है, जो धारा 3 के खंड (1) में निर्दिष्ट किसी होटल में स्थित रेस्तरां नहीं है और जिसमें जनता को खाद्य या पेय के विक्रय का कारबार चलाया जाता है और ऐसा परिसर किसी मास के आरंभ में, वातानुकूलन की सुविधाओं से युक्त है या उसमें वे उपलब्ध हैं ;]
(10) कमरा-प्रभार" से किसी होटल में निवास की जगह की किसी इकाई के लिए प्रभार अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत,-
(क) फर्नीचर, एयर-कंडीशनर, रेफ्रीजरेटर, रेडियो, संगीत प्रणाली, टेलीफोन, टेलीविजन के लिए ; और
(ख) ऐसी अन्य सेवाओं के लिए जो प्रसामान्यतया होटल द्वारा कमरा किराए में सम्मिलित की जाती हैं,
प्रभार भी हैं, किन्तु इसके अंतर्गत खाद्य, पेय और उपखंड (क) और उपखंड (ख) में निर्दिष्ट सेवाओं से भिन्न किन्हीं सेवाओं के लिए प्रभार नहीं हैं ;
(11) अन्य सभी शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और आय-कर अधिनियम में परिभाषित हैं वही अर्थ हैं जो उनके उस अधिनियम में हैं ।
[3. अधिनियम का लागू होना-यह अधिनियम,-
(1) [किसी ऐसे होटल में 1 जून, 2003 से पूर्व उपगत] किसी प्रभार्य व्यय के संबंध में लागू होगा जिसमें ऐसा व्यय उपगत किए जाने के समय निवास की जगह की किसी इकाई के लिए कमरा-प्रभार [प्रतिदिन [तीन हजार रुपए] या अधिक है] और जहां,-
(क) ऐसी इकाई और खाद्य की बाबत संयुक्त प्रभार संदेय है वहां उसमें सम्मिलित कमरा-प्रभार का अवधारण विहित रीति से किया जाएगा ;
(ख) (i) ऐसी इकाई, खाद्य, पेय और अन्य सेवाओं या उनमें से किसी की बाबत संयुक्त प्रभार संदेय है और वह मामला उपखंड (क) के उपबंधों के अंतर्गत नहीं आता है, या
(ii) निर्धारण अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि ऐसी इकाई, खाद्य, पेय या अन्य सेवाओं के लिए प्रभारों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि कमरा-प्रभार को कम करके बताया जाता है और अन्य प्रभारों को बढ़ाकर बताया जाता है,
वहां निर्धारण अधिकारी, इस खंड के प्रयोजनों के लिए, कमरा-प्रभार का ऐसे उचित आधार पर अवधारण करेगा जो वह ठीक समझे ; और
(2) किसी रेस्तरां में [1 जून, 1992 के पूर्व] उपगत किसी प्रभार्य व्यय के संबंध में लागू होगा ।
4. व्यय-कर प्रभार-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए,-
(क) इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही, [किन्तु 31 मई, 2003 के पश्चात् नहीं] धारा 3 के खंड (1) में निर्दिष्ट होटल में उपगत प्रभार्य व्यय के [दस प्रतिशत] की दर पर कर भारित किया जाएगा :
परन्तु इस खंड की कोई बात, 1 अप्रैल, 1991 को आरंभ होने वाली और 31 मार्च, 2001 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान आय-कर अधिनियम की [धारा 80झक की उपधारा (7) के खंड (क)] में निर्दिष्ट होटल की दशा में लागू नहीं होंगी :
[परन्तु यह और कि इस खंड की कोई बात आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की 8[धारा 80झक की उपधारा (7) के खंड (क)] में निर्दिष्ट किसी होटल की दशा में, 1 अप्रैल, 1998 को प्रारंभ होने वाली और 31 मार्च, 2008 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान लागू नहीं होगी ।]
(ख) 1 अक्तूबर, 1991 से ही [किन्तु 31 मई, 1992 के अपश्चात्] धारा 3 के खंड (2) में निर्दिष्ट रेस्तरां में उपगत प्रभार्य व्यय के पन्द्रह प्रतिशत की दर पर कर प्रभारित किया जाएगा ।
5. प्रभार्य व्यय का अर्थ-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, प्रभार्य व्यय से,-
(1) धारा 3 के खंड (1) में निर्दिष्ट किसी होटल के संबंध में, निम्नलिखित उपलब्ध करने के लिए होटल में उपगत व्यय या होटल को किया गया संदाय अभिप्रेत है-
(क) निवास की जगह या कोई अन्य जगह ; या
। । । । । ।
(ग) ऐसे होटल में भाड़े या पट्टे पर कोई वास सुविधा ; या
। । । । । ।
किन्तु इसके अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं हैं-
(i) कोई व्यय जो [1 अक्तूबर, 1992 के पूर्व] विदेशी मुद्रा में उपगत किया जाता है या जिसका संदाय विदेशी मुद्रा में किया जाता है ;
(ii) कोई व्यय जो किन्हीं व्यक्तियों द्वारा राजनयिक संबंध वियना कन्वेंशन, 1961 या कौंसलीय संबंध वियना कन्वेंशन, 1963 की परिधि के अन्तर्गत उपगत किया जाता है ;
(iii) कोई व्यय जो किसी ऐसी दुकान या ऐसे किसी कार्यालय में उपगत किया जाता है जो ऐसे किसी व्यक्ति के, जो होटल का कारबार चलाता है, स्वामित्व या प्रबन्ध के अधीन नहीं है ;
(iv) किसी कर के रूप में, जिसके अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन कर है, कोई व्यय ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए,-
(क) विदेशी मुद्रा के भारतीय करेंसी में परिवर्तन द्वारा अभिप्राप्त भारतीय करेंसी में उपगत व्यय या किया गया कोई संदाय, ऐसे मामलों में और ऐसी परिस्थितियों में, जो विहित की जाएं, विदेशी मुद्रा में उपगत व्यय या किया गया संदाय समझा जाएगा ; और
(ख) विदेशी मुद्रा" और भारतीय करेंसी" के वही अर्थ हैं जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) की धारा 2 के खंड (ज) और खंड (ट) में हैं ।
(2) धारा 3 के खंड (2) में निर्दिष्ट किसी रेस्तरां के संबंध में, रेस्तरां द्वारा रेस्तरां में या उसके बाहर, अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रेस्तरां में, खाद्य या पेय उपलब्ध कराने के लिए रेस्तरां में उपगत व्यय या रेस्तरां को किया गया संदाय अभिप्रेत है, किन्तु इसके अन्तर्गत खंड (1) के उपखंड (ii) और उपखंड (iv) में निर्दिष्ट कोई व्यय नहीं है ।]
6. कर प्राधिकारी- [(1) प्रत्येक आय-कर महानिदेशक, मुख्य आय-कर आयुक्त, आय-कर निदेशक, आय-कर आयुक्त, आय-कर आयुक्त (अपील), [आय-कर अपर निदेशक, आय-कर अपर आयुक्त, [आय-कर संयुक्त निदेशक, आय-कर संयुक्त आयुक्त] आय-कर उपनिदेशक], आय-कर उपायुक्त, आय-कर सहायक निदेशक, आय-कर सहायक आयुक्त, आय-कर अधिकारी, कर वसूली अधिकारी और आय-कर निरीक्षक को इस अधिनियम के अधीन वैसी ही शक्तियां होंगी और वह वैसे ही कृत्यों का पालन करेगा जो आय-कर अधिनियम के अधीन उसको है और वह पालन करता है तथा अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कृत्यों के पालन के लिए इस अधिनियम के अधीन उसकी अधिकारिता वही होगी जो आय-कर अधिनियम के अधीन उसकी है ।]
(2) इस अधिनियम को क्रियान्वित करने के लिए नियोजित सभी अधिकारी और व्यक्ति बोर्ड के आदेशों, अनुदेशों और निदेशों का अनुपालन और अनुसरण करेंगे:
परंतु ऐसा कोई आदेश, अनुदेश या निदेश इस प्रकार जारी नहीं किया जाएगा, जिससे, -
(क) किसी कर प्राधिकारी से कोई विशिष्ट निर्धारण करने या किसी विशिष्ट मामले को किसी विशेष रीति में निपटारा करने की अपेक्षा की जाए ; या
(ख) आयुक्त (अपील) के अपीलीय कृत्यों के प्रयोग में उसके विवेकाधिकार में हस्तक्षेप हो ।
(3) इस अधिनियम के क्रियान्वयन में नियोजित प्रत्येक आय-कर अधिकारी, 3[महानिदेशक या निदेशक या मुख्य आयुक्त] या 4[आय-कर अपर आयुक्त] या [संयुक्त आयुक्त] द्वारा, जिसकी अधिकारिता के भीतर वह अपने कृत्यों का पालन करता है, उसके मार्गदर्शन के लिए जारी किए गए आदेशों, अनुदेशों और निदेशों का अनुपालन और अनुसरण करेगा ।
[7. व्यय-कर का संग्रहण और वसूली-(1) जहां कोई प्रभार्य व्यय, धारा 3 के खंड (1) में निर्दिष्ट होटल में उपगत किया जाता है वहां-
(क) यदि ऐसा व्यय, धारा 5 के खंड (1) के उपखंड (क) से उपखंड (घ) में विनिर्दिष्ट किन्हीं ऐसी सेवाओं के संबंध में हैं जो होटल द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं तो, वह व्यक्ति जो ऐसे होटल का कारबार करता है ; और
(ख) यदि ऐसा व्यय, धारा 5 के खंड (1) के उपखंड (ख) या उपखंड (घ) में विनिर्दिष्ट किन्हीं ऐसी सेवाओं के संबंध में हैं जो उसमें निर्दिष्ट अन्य व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं, तो ऐसा अन्य व्यक्ति,
धारा 4 के खंड (क) में विनिर्दिष्ट दर पर व्यय-कर का संग्रहण करेगा ।
(2) जहां कोई प्रभार्य व्यय, धारा 3 के खंड (2) में निर्दिष्ट रेस्तरां में धारा 5 के खंड (2) में विनिर्दिष्ट किन्हीं सेवाओं के संबंध में [1 जून, 1992 के पूर्व] उपगत किया जाता है और जहां ऐसी सेवाएं,-
(क) रेस्तरां द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं वहां वह व्यक्ति जो ऐसे रेस्तरां का कारबार करता है ; और
(ख) अन्य व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं वहां ऐसा अन्य व्यक्ति,
धारा 4 के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट दर पर व्यय-कर का संग्रहण करेगा ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार किसी कलैंडर मास के दौरान संगृहीत कर, उक्त कलैंडर मास के ठीक अगले मास के दसवें दिन तक केन्द्रीय सरकार के जमा खाते संदत्त कर दिया जाएगा ।
(4) कर का संग्रहण करने के लिए उत्तरदायी कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार कर का संग्रहण करने में असफल रहेगा, ऐसी असफलता के होते हुए भी, उपधारा (3) के उपबंधों के अनुसार केन्द्रीय सरकार के जमा खाते कर का संदाय करने के लिए दायी होगा ।]
8. कर संग्रहण के लिए उत्तरदायी व्यक्ति का विहित विवरणी प्रस्तुत करना-(1) कर संग्रह करने के लिए उत्तरदायी प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक वर्ष मार्च के 31वें दिन से चार मास की समाप्ति से पूर्व आय-कर अधिकारी को ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष की बाबत एक विवरणी, जो विहित प्ररूप में और विहित रीति में सत्यापित होगी, प्रस्तुत करेगा या कराएगा, जिसमें निम्नलिखित दर्शाया जाएगा :-
(क) प्रभार्य व्यय की बाबत प्राप्त कुल संदाय ;
(ख) संगृहीत कर की रकम ;
(ग) केन्द्रीय सरकार के जमा खाते संदत्त कर की रकम ; और
(घ) ऐसी अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं ।
(2) ऐसे किसी व्यक्ति की दशा में, जो आय-कर अधिकारी की राय में इस अधिनियम के अधीन कर का संग्रह करने के लिए उत्तरदायी है और जिसने उपधारा (1) के अधीन विवरणी प्रस्तुत नहीं की है, आय-कर अधिकारी उस वित्तीय वर्ष की, जिसमें वह विवरणी प्रस्तुत की जानी है, समाप्ति से पहले उसे एक सूचना उससे यह अपेक्षा करते हुए जारी करेगा कि वह सूचना की तामील की तारीख से तीस दिन के भीतर, विहित प्ररूप में और विहित रीति में सत्यापित विवरणी, ऐसी अन्य विशिष्टियों सहित जो विहित की जाएं, प्रस्तुत करे ।
(3) कर का संग्रह करने के लिए उत्तरदायी कोई व्यक्ति जिसने उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञात समय के भीतर विवरणी प्रस्तुत नहीं की है या जिसको उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन विवरणी प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् उसमें किसी लोप या गलत कथन का पता लगता है तो वह, यथास्थिति, निर्धारण किए जाने के पूर्व किसी भी समय विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी प्रस्तुत कर सकता है ।
9. निर्धारण-(1) इस अधिनियम के अधीन निर्धारण करने के प्रयोजन के लिए, आय-कर अधिकारी, ऐसे किसी व्यक्ति पर, जिसने धारा 8 के अधीन विवरणी प्रस्तुत की है या जिस पर धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन सूचना तामील की गई है (चाहे विवरणी प्रस्तुत की गई है या नहीं), एक सूचना उससे उस तारीख को, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएगी, यह अपेक्षा करते हुए तामील करेगा कि वह ऐसे लेखा या दस्तावेज या अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करे या प्रस्तुत कराए जिनकी [निर्धारण अधिकारी] इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अपेक्षा करे और वह, समय-समय पर, आगे और सूचनाओं की तामील ऐसे और लेखा या दस्तावेज या अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करने की अपेक्षा करते हुए कर सकता है जो उसे अपेक्षित हों ।
(2) 2[निर्धारण अधिकारी], ऐसे लेखाओं, दस्तावेज या अन्य साक्ष्य पर, यदि कोई हो, जो उसने उपधारा (1) के अधीन अभिप्राप्त किए हैं, विचार करने के पश्चात् और ऐसी किसी सुसंगत सामग्री पर, जो उसने एकत्रित की है, ध्यान देने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, प्रभार्य व्यय और ऐसे निर्धारण के आधार पर संदेय कर की रकम का निर्धारण करेगा ।
10. सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार निर्धारण-यदि,-
(क) कोई व्यक्ति धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन दी गई किसी सूचना द्वारा अपेक्षित कोई विवरणी प्रस्तुत करने में असफल रहता है और उसने उस धारा की उपधारा (3) के अधीन कोई विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी प्रस्तुत नहीं की है, या
(ख) कोई व्यक्ति, जिसने विवरणी प्रस्तुत की है, धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन जारी की गई सूचना के सभी निबंधनों का अनुपालन करने में, असफल रहता है, या
(ग) आय-कर अधिकारी का निर्धारिती के लेखाओं की शुद्धता या पूर्णता के बारे में समाधान नहीं होता है,
तो [निर्धारण अधिकारी], ऐसी सभी सुसंगत सामग्री पर, जो उसने एकत्रित की है, विचार करने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, प्रभार्य व्यय का अपनी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार निर्धारण करेगा और निर्धारिती द्वारा संदेय या ऐसे निर्धारण के आधार पर निर्धारिती को प्रतिदेय राशि अवधारित करेगा ।
11. निर्धारण से छूटा प्रभार्य व्यय-यदि-
(क) आय-कर अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी निर्धारण वर्ष के लिए धारा 8 के अधीन कोई विवरण प्रस्तुत करने में या किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती के निर्धारण के लिए पूर्ण रूप से और सही तौर पर आवश्यक सभी तात्त्विक तथ्य प्रकट करने में निर्धारिती की ओर से कोई लोप होने या उसके असफल रहने के कारण उस वर्ष के लिए प्रभार्य व्यय निर्धारण से छूट गया है या उसका कम निर्धारण किया गया है, या
(ख) इस बात के होते हुए भी कि निर्धारिती की ओर से खंड (क) में उल्लिखित कोई लोप या असफलता नहीं हुई है, आय-कर अधिकारी के पास जानकारी के परिणामस्वरूप, यह विश्वास करने का कारण है कि किसी निर्धारण वर्ष में निर्धारणीय प्रभार्य व्यय का निर्धारण छूट गया है या उसका कम निर्धारण किया गया है,
तो वह, खंड (क) के अंतर्गत आने वाले मामलों में, किसी भी समय, और खंड (ख) के अंतर्गत आने वाले मामलों में, उस निर्धारण वर्ष की समाप्ति के चार वर्ष के भीतर किसी भी समय, निर्धारिती पर ऐसी सूचना तामील कर सकेगा जिसमें वे सब अपेक्षाएं या उनमें से कोई अंतर्विष्ट हो, जो धारा 8 के अधीन सूचना में सम्मिलित की जा सकती है, तथा वह प्रभार्य व्यय का निर्धारण या पुनर्निर्धारण करने की कार्रवाई कर सकेगा, तथा इस अधिनियम के उपबंध, जहां तक हो सके, उसी प्रकार लागू होंगे मानो वह सूचना उस धारा के अधीन जारी की गई सूचना है ।
12. भूल सुधार-(1) अभिलेख से प्रकट किसी भूल को सुधारने की दृष्टि से, धारा 6 में निर्दिष्ट 1[निर्धारण प्राधिकारी,] जिसने इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन कोई आदेश पारित किया था, उस तारीख के चार वर्ष के भीतर, जिसको ऐसा आदेश पारित किया गया था, ऐसे किसी आदेश को संशोधित कर सकेगा ।
(2) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी आदेश से संबंधित अपील या निरीक्षण के रूप में किसी कार्यवाही में किसी विषय पर विचार और विनिश्चय किया गया है वहां ऐसा आदेश पारित करने वाला प्राधिकारी, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे विषय से, जिस पर ऐसा विचार और विनिश्चय किया जा चुका है, भिन्न किसी विषय के संबंध में उस उपधारा के अधीन आदेश को संशोधित कर सकेगा ।
(3) इस धारा के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, संबद्ध प्राधिकारी-
(क) उपधारा (1) के अधीन संशोधन स्वप्रेरणा से कर सकेगा; और
(ख) ऐसा संशोधन करेगा यदि कोई भूल उसकी जानकारी में, -
(i) निर्धारिती द्वारा लाई जाती है; या
(ii) जहां संबद्ध प्राधिकारी आयुक्त (अपील) है, वहां 1[निर्धारण अधिकारी] द्वारा लाई जाती है ।
(4) कोई ऐसा संशोधन जिसका परिणाम निर्धारण में वृद्धि करना या प्रतिदाय को घटाना या अन्यथा निर्धारिती के दायित्व को बढ़ाना है, इस धारा के अधीन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि संबद्ध प्राधिकारी ने ऐसा करने के अपने आशय की सूचना निर्धारिती को न दे दी हो और निर्धारिती को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया हो ।
(5) जहां इस धारा के अधीन कोई संशोधन किया जाता है वहां संबद्ध कर प्राधिकारी लिखित में आदेश पारित करेगा ।
(6) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां ऐसे किसी संशोधन का परिणाम निर्धारण को घटाना है, वहां 1[निर्धारण अधिकारी] ऐसा प्रतिदाय करेगा जो ऐसे निर्धारिती को देय हो ।
(7) जहां ऐसे किसी संशोधन का परिणाम पहले से किए गए निर्धारण में वृद्धि करना या प्रतिदाय को घटाना है वहां [निर्धारण अधिकारी] देय राशि को विनिर्दिष्ट करते हुए, विहित प्ररूप में मांग की सूचना निर्धारिती पर तामील करेगा और मांग की ऐसी सूचना धारा 20 के अधीन जारी की गई समझी जाएगी और इस अधिनियम के उपबंध तदनुसार लागू होंगे ।
13. निर्धारण और पुनर्निर्धारण के पूरा किए जाने के लिए समय सीमा-(1) धारा 9 या धारा 10 के अधीन निर्धारण का कोई आदेश उस निर्धारण वर्ष के, जिसमें प्रभार्य व्यय पहली बार निर्धारणीय था, अंत से चार वर्ष की अवधि या धारा के अधीन विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी फाइल करने की तारीख से एक वर्ष की, दोनों में से जो भी पश्चात्वर्ती हो, समाप्ति के पश्चात् किसी समय नहीं किया जाएगा ।
(2) धारा 11 के अधीन निर्धारण या पुनर्निर्धारण का कोई आदेश, वहां जहां, -
(क) धारा 11 के खंड (क) के अंतर्गत आने वाले किसी ऐसे मामले में निर्धारण या पुनर्निर्धारण किया जाना है जिसके लिए निर्धारिती पर सूचना तामील कर दी गई है, उस निर्धारण वर्ष के, जिसमें उक्त सूचना तामील की गई थी, अंत से चार वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् किसी समय नहीं किया जाएगा;
(ख) धारा 11 के खण्ड (ख) के अंतर्गत आने वाले किसी ऐसे मामले में निर्धारण या पुनर्निर्धारण किया जाना है जिसके लिए सूचना तामील कर दी गई है-
(i) उस निर्धारण वर्ष के, जिसमें प्रभार्य व्यय पहली बार निर्धारणीय था, अंत से चार वर्ष की अवधि ; या
(ii) ऐसी सूचना की तामील से, एक वर्ष की अवधि,
दोनों में से जो भी पश्चात्वर्ती हो, की समाप्ति के पश्चात् किसी समय नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, निर्धारण को अपास्त या रद्द करने वाले धारा 21, धारा 22 या धारा 23 के अधीन पारित किसी आदेश के अनुसरण में नए निर्धारण का आदेश उस वित्तीय वर्ष के अंत से, जिसमें धारा 21 के अधीन आदेश आयुक्त द्वारा पारित किया जाता है या [धारा 22 या धारा 23 के अधीन आदेश, यथास्थिति, मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है,] चार वर्ष की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय किया जा सकेगा ।
(4) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंध धारा 21, धारा 22, धारा 23 के अधीन किसी आदेश या इस अधिनियम के अधीन किसी निर्देश या अपील के रूप में किसी कार्यवाही में [राष्ट्रीय कर अधिकरण या उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के किसी आदेश] या इस अधिनियम के अधीन किसी अपील या निर्देश से अन्यथा किसी कार्यवाही में किसी न्यायालय के किसी आदेश में अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप, या उसको प्रभावी करने के लिए, किए गए निर्धारण या पुनर्निर्धारण को लागू नहीं होंगे, और ऐसा निर्धारण या पुनर्निर्धारण, उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी भी समय पूरा किया जा सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए परिसीमाकाल की संगणना करने में, वह अवधि अपवर्जित कर दी जाएगी जिसके दौरान किसी न्यायालय के आदेश या व्यादेश से निर्धारण की कार्यवाही रोक दी गई है ।
14. व्यय-कर के विलंबित संदाय पर ब्याज-ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो व्यय-कर का संग्रहण करने और धारा 7 के उपबंधों के अनुसार केन्द्रीय सरकार के जमा खाते उसका संदाय करने के लिए उत्तरदायी है, उस धारा में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, केन्द्रीय सरकार के खाते में कर जमा करने में असफल रहता है, ऐसे प्रत्येक मास या मास के भाग के लिए, जिस तक कर को इस प्रकार जमा करने में विलंब किया जाता है, [एक प्रतिशत] की दर पर साधारण ब्याज का संदाय करेगा ।
[15. व्यय-कर का संग्रहण या संदाय करने में असफलता के लिए शास्ति-धारा 7 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार व्यय-कर का संग्रहण करने के लिए उत्तरदायी कोई व्यक्ति, जो-
(क) ऐसे कर का संग्रहण करने में असफल रहेगा; या
(ख) कर का संग्रहण करने पर उस धारा की उपधारा (3) के उपबंधों के अनुसार केन्द्रीय सरकार के जमा खाते ऐसे कर का संदाय करने में असफल रहेगा, -
(i) खंड (क) में निर्दिष्ट दशा में, उस धारा की उपधारा (4) के उपबंधों के अनुसार कर का संदाय करने के अतिरिक्त, शास्ति के रूप में, कर की उस रकम के बराबर राशि का संदाय करेगा जिसका संग्रहण करने में वह असफल रहा है; और
(ii) खंड (ख) में निर्दिष्ट दशा में, धारा 14 के उपबंधों के अनुसार ब्याज का संदाय करने के अतिरिक्त, शास्ति के रूप में, ऐसी राशि का, जो एक सौ रुपए से कम की नहीं होगी किन्तु जो, ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, दो सौ रुपए तक की हो सकेगी, संदाय करेगा, किन्तु इस खंड के अधीन शास्ति, कर की उस रकम से अधिक नहीं होगी जिसका संदाय करने में वह असफल रहा है ।]
16. विहित विवरणी देने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति सम्यक् समय पर ऐसी विवरणी देने में असफल रहता है जिसकी, धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन या उस धारा की उपधारा (2) के अधीन दी गई सूचना द्वारा देने की, उससे अपेक्षा की जाती है तो वह, शास्ति के रूप में, उतनी राशि, जो एक सौ रुपए से कम नहीं होगी किन्तु जो, ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान असफलता जारी रहती है, दो सौ रुपए तक की हो सकेगी, संदाय करेगा ।
17. प्रभार्य व्यय को छिपाने के लिए शास्ति-यदि [निर्धारण अधिकारी] या आयुक्त (अपील) का इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के अनुक्रम में यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति ने प्रभार्य व्यय की विशिष्टियां छिपाई हैं, या ऐसे प्रभार्य व्यय की गलत विशिष्टियां दी हैं तो वह यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति उसके द्वारा देय किसी व्यय कर के अतिरिक्त, शास्ति के रूप में, ऐसी राशि का संदाय करेगा, जो कर की उस रकम से कम नहीं होगी किन्तु जो उस रकम के दुगुने से अधिक नहीं होगी, जिसका प्रभार्य व्यय की विशिष्टियों को छिपाने या ऐसे प्रभार्य व्यय की गलत विशिष्टियां देने के कारण अपवंचन चाहा गया था :
परन्तु यदि प्रभार्य व्यय की रकम (निर्धारण पर 1[निर्धारण अधिकारी] द्वारा यथा अवधारित) जिसके संबंध में विशिष्टियां छिपाई गई हैं, या अशुद्ध विशिष्टियां दी गई हैं, पच्चीस हजार रुपए की राशि से अधिक है, तो आय-कर अधिकारी [, यथास्थिति, अपर आयुक्त या उपायुक्त] के पूर्व अनुमोदन के बिना, शास्ति के रूप में संदाय के लिए कोई निदेश जारी नहीं करेगा ।
18. सूचना का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि आय-कर अधिकारी का, इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के अनुक्रम में, यह समाधान हो जाता है कि कोई व्यक्ति धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन सूचना का अनुपालन करने में असफल रहा है तो वह यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति, उसके द्वारा देय किसी कर के अतिरिक्त, शास्ति के रूप में, ऐसी राशि का संदाय करेगा जो कर की, यदि कोई हो, रकम के दस प्रतिशत से कम नहीं होगी, किन्तु जो उसके पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होगी जिसका तब अपवंचन किया जाता यदि ऐसे व्यक्ति द्वारा दी गई प्रभार्य व्यय की विवरणी को सही प्रभार्य व्यय के रूप में स्वीकार कर लिया जाता ।
19. कुछ मामलों में शास्ति का अधिरोपित न किया जाना-धारा 15, धारा 16, धारा 17 या धारा 18 के उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी शास्ति उक्त उपबंधों में निर्दिष्ट किसी असफलता के लिए निर्धारिती पर अधिरोपणीय नहीं होगी यदि वह यह साबित कर देता है कि उक्त असफलता के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
20. मांग की सूचना-जब इस अधिनियम के अधीन कोई कर, ब्याज, शास्ति या कोई अन्य राशि संदेय है, तो आय-कर अधिकारी विहित प्ररूप में निर्धारिती पर मांग की सूचना तामील करेगा, जिसमें इस प्रकार संदेय राशि और प्रभार्य व्यय की रकम, जिसके संबंध में ऐसी राशि संदेय है, विनिर्दिष्ट करेगा ।
21. आयुक्त द्वारा आदेशों का पुनरीक्षण-(1) आयुक्त, स्वप्रेरणा से या पुनरीक्षण के लिए निर्धारिती द्वारा किए गए आवेदन पर, इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसी कार्यवाही के अभिलेख मंगा सकेगा जो उसके अधीनस्थ आय-कर अधिकारी द्वारा लिया गया है और ऐसी जांच कर सकेगा या ऐसी जांच करा सकेगा तथा, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(2) निर्धारिती पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कोई आदेश इस धारा के अधीन तब तक पारित नहीं किया जाएगा, जब तक निर्धारिती को सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो ।
(3) आयुक्त इस धारा के अधीन कोई आदेश पारित नहीं करेगा यदि धारा 20 के अधीन आय-कर अधिकारी द्वारा जारी की गई मांग की सूचना के विरुद्ध कोई अपील आयुक्त (अपील) के समक्ष लंबित है ।
(4) इस धारा के अधीन कोई आदेश उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें पुनर्विलोकन के लिए ईप्सित आदेश पारित किया गया है, अंत से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
[(6) निर्धारिती द्वारा 1 अक्तूबर, 1998 को या उसके पश्चात् इस उपधारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए किए गए प्रत्येक आवेदन पर उस वित्तीय वर्ष के अंत से, जिसमें निर्धारिती द्वारा पुनरीक्षण के लिए ऐसा आवेदन किया गया है, एक वर्ष के भीतर आदेश पारित किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-उस उपधारा के प्रयोजनों के लिए परिसीमा की अवधि की संगणना करने में धारा 24 के परन्तुक के अधीन निर्धारिती को पुनः सुने जाने का अवसर दिए जाने में लिए गए समय और उस अवधि को, जिसके दौरान इस धारा के अधीन कोई कार्यवाही किसी न्यायालय के किसी आदेश या व्यादेश द्वारा रोक दी जाती है, अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(7) उपधारा (6) में किसी बात के होते हुए भी, [राष्ट्रीय कर अधिकरण] उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के किसी आदेश में अन्तर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसे प्रभावी करने के लिए उपधारा (6) के अधीन पुनरीक्षण में आदेश किसी भी समय पारित किया जा सकेगा ।]
22. आयुक्त (अपील) को अपीलें-(1) कोई व्यक्ति जो ऐसे व्यय-कर की रकम पर आक्षेप करता है जिसके लिए वह [निर्धारण अधिकारी] द्वारा निर्धारित किया गया है, या जो इस अधिनियम के अधीन निर्धारित किए जाने के अपने दायित्व से इंकार करता है, या इस अधिनियम के अधीन शास्ति उद्गृहीत करने वाले आदेश पर आक्षेप करता है वह आयुक्त (अपील) को अपील कर सकेगा ।
[(2) प्रत्येक अपील विहित प्ररूप में होगी और विहित रीति से सत्यापित की जाएगी तथा 1 अक्तूबर, 1998 को या उसके पश्चात् फाइल की गई अपीलों की बाबत उनके साथ दो सौ पचास रुपए की फीस होगी ।]
(3) अपील इस अधिनियम के अधीन कर, ब्याज या शास्ति से संबंधित मांग की सूचना की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर प्रस्तुत की जाएगी:
परंतु आयुक्त (अपील) का यदि यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी के पास उक्त अवधि के भीतर अपील प्रस्तुत न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था तो वह उस अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा ।
(4) आयुक्त (अपील) अपील की सुनवाई और अवधारण करेगा और, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे और ऐसे आदेशों के अंतर्गत निर्धारण या शास्ति में वृद्धि करने का आदेश भी हो सकेगा:
परन्तु निर्धारण या शास्ति में वृद्धि करने का आदेश तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कि उससे प्रभावित व्यक्ति की ऐसी वृद्धि के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।
[(4क) आयुक्त (अपील), प्रत्येक अपील में, जहां संभव हो, ऐसी अपील की सुनवाई और उसका विनिश्चय उस वित्तीय वर्ष की समाप्ति से, जिसमें ऐसी अपील उपधारा (1) के अधीन फाइल की जाती है, एक वर्ष की अवधि के भीतर कर सकेगा ।]
(5) अपीलों की सुनवाई और अवधारण में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, किसी आवश्यक उपांतर सहित, आय-कर के संबंध में लागू होने वाली प्रक्रिया के अनुसार होगी ।
23. अपील अधिकरण को अपीलें-(1) कोई निर्धारिती, जो आयुक्त द्वारा धारा 21 के अधीन पारित आदेश से या आयुक्त (अपील) द्वारा इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन पारित आदेश से व्यथित है ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(2) यदि आयुक्त (अपील) द्वारा इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन पारित किसी आदेश पर आयुक्त आक्षेप करता है, तो वह आय-कर अधिकारी को उस आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण को अपील करने का निर्देश दे सकेगा ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से साठ दिन के भीतर फाइल की जाएगी जिसका वह आदेश, जिसके विरुद्ध अपील की जा रही है, निर्धारिती या आयुक्त को संसूचित किया जाता है ।
(4) 2[निर्धारण अधिकारी] या निर्धारिती यह सूचना प्राप्त होने पर कि अन्य पक्षकर ने आयुक्त (अपील) के आदेश के विरुद्ध उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अपील की है, इस बात के होते हुए भी कि उसने ऐसे आदेश या उसके किसी भाग के विरुद्ध अपील न की हो, सूचना की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर, आयुक्त (अपील) के आदेश के किसी भी भाग के विरुद्ध, विहित रीति से सत्यापित, प्रत्याक्षेपों का ज्ञापन फाइल कर सकेगा तथा ऐसे ज्ञापन का अपील अधिकरण द्वारा इस प्रकार निपटारा किया जाएगा मानो वह उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर पेश की गई अपील हो ।
(5) अपील अधिकरण उपधारा (3) या उपधारा (4) में निर्दिष्ट सुसंगत अवधि की समाप्ति के पश्चात् किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा या प्रत्याक्षेपों का ज्ञापन फाइल करने की अनुज्ञा दे सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर उसे पेश न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
(6) अपील अधिकरण को अपील विहित प्ररूप में की जाएगी और विहित रीति से सत्यापित की जाएगी तथा उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी अपील या उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी प्रत्याक्षेपों के ज्ञापन के मामले के सिवाय, उसके साथ 4[1 अक्तूबर, 1998 से या उसके पश्चात् फाइल की गई अपीलों की दशा में एक हजार रुपए की फीस होगी] ।
(7) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस धारा के अधीन किसी अपील की सुनवाई करने और उसकी बाबत आदेश देने में अपील अधिकरण उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करेगा और उसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जिनका आय-कर अधिनियम के अधीन अपील की सुनवाई करने और आदेश देने में किया जाता है ।
24. आय-कर अधिनियम के उपबंधों का लागू होना-आय-कर अधिनियम की निम्नलिखित धाराओं तथा अनुसूचियों के उपबंध और समय-समय पर यथा प्रवृत्त आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 आवश्यक उपांतरों सहित उसी प्रकार लागू होंगे मानो उक्त उपबंध तथा नियम आय-कर के स्थान पर व्यय-कर के प्रति निर्देश करते हों: -
[2(44), 118, 120, 129, 131 से 136 तक (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं)], 138, [139क, 140, 144क, 145ट, 159 से 163 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं) 166, 167, 170, 171, 173 से 179 तक (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), 187, 188, [188क,] 189, 220 से 227 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), 229, । । ।, 232, 237 से 245 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), 254 से 262 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), 265, 266, 268, 269, 278आ, 278इ, 278ई, 278उ, 3[279ख], 281, 281आ, 282, 283, 284, 287, 288, 288अ, 288आ, 289 से 293 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं) द्वितीय अनुसूची और तृतीय अनुसूची :
परन्तु उक्त उपबंधों और नियमों में निर्धारिती" के प्रति निर्देश का अर्थ इस अधिनियम में यथा परिभाषित निर्धारिती के प्रति निर्देश समझा जाएगा ।
25. कर आदि के अपवंचन का जानबूझकर प्रयत्न-यदि कोई व्यक्ति किसी भी रीति से, किसी ऐसे कर, शास्ति या ब्याज के, जो इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य या अधिरोपणीय है, संग्रहण या संदाय का अपवंचन करने का जानबूझकर प्रयत्न करता है, या प्रभार्य व्यय के योग को कम कथित करता है तो वह, किसी ऐसी शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो उस पर इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन अधिरोपणीय है, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी कर, शास्ति या ब्याज के, जो इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य या अधिरोपणीय है, संग्रहण या संदाय का अपवंचन करने के लिए जानबूझकर किए गए प्रयत्न के अंतर्गत ऐसा मामला भी आएगा, जिसमें कोई व्यक्ति-
(i) अपने कब्जे या नियंत्रण में कोई ऐसी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें (जो ऐसी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें हैं जो कि इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में सुसंगत हैं), रखता है, जिनमें कोई मिथ्या प्रविष्टि या कथन है; या
(ii) ऐसी लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों में कोई मिथ्या प्रविष्टि या कथन करता है या कराता है; या
(iii) ऐसी लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों में से किसी सुसंगत प्रविष्टि या कथन का जानबूझकर लोप करता है या कराता है; या
(iv) कोई अन्य ऐसी परिस्थिति विद्यमान कराता है, जिसके परिणामस्वरूप ऐसा व्यक्ति किसी ऐसे कर, शास्ति या ब्याज के, जो इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य या अधिरोपणीय है, संग्रह या संदाय के अपवंचन में समर्थ हो सके ।
26. विहित विवरणियां देने में असफलता-यदि कोई व्यक्ति, उचित समय पर ऐसी विवरणी, जिसकी धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन या उस धारा की उपधारा (2) के अधीन दी गई सूचना द्वारा उससे अपेक्षा की गई है, देने में जानबूझकर असफल रहता है तो वह किसी ऐसी शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन उस पर अधिरोपणीय है, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी, किंतु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
27. सत्यापन आदि में मिथ्या कथन-यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन किसी सत्यापन में ऐसा कथन करता है या ऐसा लेखा या विवरण देता है जो मिथ्या है और जिसके बारे में वह जानता है या विश्वास करता है कि वह मिथ्या है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, तो वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी, किंतु जो सात वर्ष तक की सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
28. मिथ्या विवरणी आदि का दुष्प्रेरण-यदि कोई व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति को किसी प्रभार्य व्यय से संबंधित ऐसा लेखा देने या विवरण या घोषणा परिदत्त करने के लिए जो मिथ्या है और जिसकी बाबत वह या तो यह जानता है कि वह मिथ्या है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, अथवा धारा 25 के अधीन कोई अपराध करने के लिए, किसी रीति से दुष्प्रेरित या उत्प्रेरित करता है, तो वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
29. कुछ अपराधों का असंज्ञेय होना-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 25 या धारा 26 या धारा 27 या धारा 28 के अधीन दंडनीय किसी अपराध को उस संहिता के अर्थ में असंज्ञेय समझा जाएगा ।
30. कार्यवाहियों का संस्थित किया जाना और अपराधों का शमन-(1) धारा 25 या धारा 26 या धारा 27 या धारा 28 के अधीन किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई कार्यवाही आयुक्त की पूर्व मंजूरी से ही की जाएगी, अन्यथा नहीं:
परन्तु ऐसी कोई मंजूरी वहां अपेक्षित नहीं होगी जहां न्यायालय के समक्ष परिवादी आयुक्त (अपील) है ।
(2) आयुक्त, धारा 25 या धारा 26 या धारा 27 या धारा 28 के अधीन दंडनीय अपराध का शमन, कार्यवाहियां संस्थित किए जाने के पूर्व या उसके पश्चात् कर सकेगा ।
31. नियम बनाने की शक्ति-(1) बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या उनमें से किसी के लिए उपबंध किया जा सकता है, अर्थात्: -
(क) वह रीति जिससे उन मामलों में, जिनमें कि निवास-स्थान और खाद्य की बाबत संयुक्त प्रभार उद्गृहीत किए जाते हैं, [धारा 3 के खंड (1) के उपखंड (क)] के अधीन कमरा प्रभार का अवधारण किया जा सकेगा;
(ख) वे मामले और वे परिस्थितियां जिनमें विदेशी मुद्रा का भारतीय करेंसी में संपरिवर्तन करके भारतीय करेंसी में किए गए संदाय की बाबत यह समझा जाएगा कि 1[धारा 5 के खंड (1)] के स्पष्टीकरण के खंड (क) के प्रयोजनों के लिए संदाय विदेशी मुद्रा में किए गए हैं;
(ग) वह प्ररूप, जिसमें धारा 8 के अधीन विवरणियां दी जा सकेंगी, वहा रीति जिसमें वे सत्यापित की जा सकेंगी, तथा वे अन्य विशिष्टियां जो किसी प्ररूप में हो सकेंगी;
(घ) वह प्ररूप जिसमें निर्धारिती पर, धारा 12 की उपधारा (7) के अधीन मांग की सूचना की तामील की जा सकेगी;
(ङ) वह प्ररूप, जिसमें धारा 22 के अधीन या धारा 23 की उपधारा (6) के अधीन अपील फाइल की जा सकेंगी और वह रीति जिससे वे सत्यापित की जा सकेंगी;
(च) वह रीति जिससे धारा 23 की उपधारा (4) के अधीन प्रत्याक्षेपों का ज्ञापन सत्यापित किया जा सकेगा;
(छ) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जा सकेगा ।
(3) इस धारा द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अंतर्गत, उसके प्रयोग के प्रथम अवसर पर, उन नियमों को, या उनमें से किसी को, किसी ऐसी तारीख से जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पहले की है, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति होगी ।
(4) केन्द्रीय सरकार, इस धारा के अधीन बनाए गए प्रत्येक नियम को, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखेगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
32. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, ऐसे आदेश द्वारा जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी:
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
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