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सशस्त्र बल अधिकरण अधिनियम, 2007 ( Armed Forces Tribunal Act, 2007 )


 

सशस्त्र बल अधिकरण अधिनियम, 2007

(2007 का अधिनियम संख्यांक 55)

[25 दिसम्बर, 2007]

सेना अधिनियम, 1950, नौसेना अधिनियम, 1957 और वायु सेना अधिनियम, 1950 के

 अध्यधीन व्यक्तियों के बारे में कमीशन, नियुक्तियों, अभ्यावेशनों और सेवा की

शर्तों की बाबत विवादों और शिकायतों का सशस्त्र बल अधिकरण द्वारा

 न्यायनिर्णयन या विचारण के लिए उपबंध करने तथा उक्त

 अधिनियमों के अधीन आयोजित सेना न्यायालय के

आदेशों, निष्कर्षों या दण्डादेशों से उत्पन्न

अपीलों का तथा उनसे संबंधित या

उनके आनुषंगिक विषयों का

उपबंध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के अठावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सशस्त्र बल अधिकरण अधिनियम, 2007 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. अधिनियम का लागू होना-(1) इस अधिनियम के उपबंध सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन सभी व्यक्तियों को लागू होंगे

(2) यह अधिनियम, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन सेवानिवृत्त कार्मिकों जिनके अंतर्गत उनके आश्रित, वारिस और उत्तरवर्ती भी हैं, जहां तक उनका संबंध उनके सेवा संबंधी मामलों से है, को भी लागू होगा ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

() प्रशासनिक सदस्य" से अधिकरण का ऐसा सदस्य अभिप्रेत है जो खण्ड () के अर्थान्तर्गत न्यायिक सदस्य नहीं है;

(ख) आवेदन" से धारा 14 के अधीन किया गया आवेदन अभिप्रेत है;

() नियत दिन" से, वह तारीख अभिप्रेत है जिससे धारा 4 के अधीन अधिसूचना द्वारा अधिकरण स्थापित होता है;

(घ) न्यायपीठ" से अधिकरण की न्यायपीठ अभिप्रेत है;

(ङ) अध्यक्ष" से अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(च) सेना न्यायालय" से सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) के अधीन अधिविष्ट सेना न्यायालय अभिप्रेत है जिसके अंतर्गत इस अधिनियम या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के गठित अनुशासनिक न्यायालय भी है;

(छ) न्यायिक सदस्य" से अधिकरण का ऐसा सदस्य अभिप्रेत है जिसे इस अधिनियम के अधीन उस रूप में नियुक्त किया गया है और उसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है, जिसके पास धारा 6 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अर्हताओं में से कोई अर्हता है;

() सदस्य" से अधिकरण का सदस्य (चाहे न्यायिक या प्रशासनिक) अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है;

(झ) सैनिक अभिरक्षा" से रक्षा सेवा की परंपराओं के अनुसार किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या उसका परिरोध अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत नौसैनिक या वायु सैनिक अभिरक्षा भी है;

(ञ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ट) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ठ) राष्ट्रपति" से भारत का राष्ट्रपति अभिप्रेत है;

(ड) नियमों" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम अभिप्रेत हैं;

(ढ) सेवा" से भारत के भीतर या भारत से बाहर सेवा अभिप्रेत है;

(ण) सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन व्यक्तियों के संबंध में सेवा संबंधी मामलों" से उनकी सेवा-शर्तों से संबंधित सभी मामले अभिप्रेत हैं और उनके अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं: -

(i) पारिश्रमिक (जिसके अंतर्गत भत्ते भी हैं), पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे;

(ii) पदावधि, जिसके अंतर्गत कमीशन, नियुक्ति, अभ्यावेशन, परिवीक्षा, पुष्टि, ज्येष्ठता, प्रशिक्षण, प्रोन्नति, प्रतिवर्तन, समय-पूर्व सेवानिवृत्ति, अधिवर्षिता, सेवा समाप्ति और शास्तिक कटौतियां;

(iii) संक्षिप्त निपटारा और विचारण जहां पदच्युति का दंड अधिनिर्णीत किया गया है;

(iv) कोई अन्य विषय, चाहे जो भी हो,

किन्तु इसके अन्तर्गत निम्नलिखित से संबंधित मामले नहीं हैं-

(i) सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) की धारा 18, नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) की धारा 15 की उपधारा (1) और वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) की धारा 18 के अधीन जारी किए गए आदेश; और

(ii) स्थानांतरण और तैनातियां जिनके अन्तर्गत सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन व्यक्तियों से संबंधित तैनाती पर स्थान या यूनिट का परिवर्तन भी है चाहे वह व्यष्टिक रूप में या यूनिट घटक या पोत के भाग के रूप में हो;

(iii) किसी प्रकार की छुट्टी;

(iv) समरी सेवा न्यायालय, वहां के सिवाय, जहां दंड पदच्युति या तीन मास से अधिक के कारावास का है;

() संक्षिप्त निपटान और विचारण" से सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अधीन किया गया संक्षिप्त निपटारा और विचारण अभिप्रेत है;

(थ) अधिकरण" से धारा 4 के अधीन स्थापित सशस्त्र बल अधिकरण अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

अधिकरण और उसकी न्यायपीठों की स्थापना

4. सशस्त्र बल अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, सशस्त्र बल अधिकरण के नाम से ज्ञात एक अधिकरण की अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसे प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए स्थापना करेगी ।

5. अधिकरण और उसकी न्यायपीठों की संरचना-(1) अधिकरण, एक अध्यक्ष और उतनी संख्या में न्यायिक और प्रशासनिक सदस्यों से मिलकर बनेगा जितने केन्द्रीय सरकार ठीक समझे और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का उसकी न्यायपीठों द्वारा प्रयोग किया जा सकेगा

(2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यायपीठ, एक न्यायिक सदस्य और एक प्रशासनिक सदस्य से मिलकर बनेगी ।

(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष-

(क) ऐसी न्यायपीठ के जिसमें उसको नियुक्त किया गया है, न्यायिक सदस्य के कृत्यों का निर्वहन करने के अतिरिक्त, किसी अन्य न्यायपीठ के प्रशासनिक सदस्य के कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा;

(ख) किसी सदस्य को एक न्यायपीठ से किसी अन्य न्यायपीठ में स्थानान्तरित कर सकेगा;

(ग) यह सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि किसी मामले या मामलों का, उनमें अंतर्वलित प्रश्नों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, उसकी राय में या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन, दो से अधिक सदस्यों से मिलकर बनी न्यायपीठ द्वारा विनिश्चय किया जाना अपेक्षित है, ऐसे साधारण या विशेष आदेश, जो वह ठीक समझे, जारी कर सकेगा:

परन्तु इस खण्ड के अनुसरण में गठित प्रत्येक न्यायपीठ में कम से कम एक न्यायिक सदस्य और एक प्रशासनिक सदस्य होगा ।

(4) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण की न्यायपीठों की बैठकें आम तौर पर दिल्ली (जो प्रधान न्यायपीठ के नाम से ज्ञात होगी) में और ऐसे अन्य स्थानों पर होंगी जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा विहित करे

6. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायमूर्ति हो ।

(2) कोई व्यक्ति न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है ।

(3) कोई व्यक्ति प्रशासनिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हित होगा, जब-

(क) उसने सेना में कम से कम तीन वर्ष की कुल अवधि के लिए मेजर जनरल की या उससे ऊपर की रैंक या नौ सेना या वायु सेना में तत्समान रैंक धारण की है या धारण किए हुए है;

(ख) उसने सेना या नौसेना या वायु सेना में कम से कम एक वर्ष के लिए जज एडवोकेट जनरल के रूप में सेवा की है और वह क्रमशः मेजर जनरल, कमोडोर और एयर कमोडोर के रैंक से कम रैंक का नहीं है ।

स्पष्टीकरण-जब सेवारत व्यक्ति को प्रशासनिक सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो उसे ऐसी नियुक्ति ग्रहण करने से पूर्व से सेवानिवृत्त होना होगा ।

7. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति-(1) इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगा:

परंतु इस उपधारा के अधीन कोई नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बिना नहीं की जाएगी ।

(2) राष्ट्रपति, अधिकरण के एक या अधिक सदस्यों को, यथास्थिति, उसके उपाध्यक्ष या उपाध्यक्षों के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।

8. पदावधि-अध्यक्ष या सदस्य, उस तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, चार वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा और वह पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा:

परन्तु कोई भी अध्यक्ष, -

(क) यदि वह उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहा है, तो सत्तर वर्ष की आयु; और

(ख) यदि वह किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति रहा है, तो पैंसठ वर्ष की आयु,

प्राप्त करने के पश्चात् उस हैसियत में पद धारण नहीं करेगा:

परन्तु यह और कि कोई अन्य सदस्य पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् सदस्य के रूप में पद धारण नहीं करेगा

9. त्यागपत्र और हटाया जाना-(1) अध्यक्ष या सदस्य, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:

परंतु अध्यक्ष या सदस्य, जब तक कि उसे राष्ट्रपति द्वारा उससे पहले पद त्याग करने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाती है, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास का अवसान होने तक या उसके पदोत्तरवर्ती के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा अपना पद ग्रहण कर लेने तक या उसकी पदावधि का अवसान होने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, अपना पद धारण करता रहेगा ।

(2) अध्यक्ष या सदस्य को उसके साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर उच्चतम न्यायालय के किसी आसीन न्यायाधीश द्वारा जांच किए जाने के पश्चात्, जिसमें ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दी गई हो और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया गया हो, राष्ट्रपति द्वारा किए गए किसी आदेश से ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (2) में निर्दिष्ट अध्यक्ष या अन्य सदस्य के कदाचार या असमर्थता का अन्वेषण करने के लिए प्रक्रिया को नियमों द्वारा विनियमित कर सकेगी ।

10. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें-अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे भी हैं) वे होंगी जो केन्द्रीय सरकार विहित करे:

परंतु अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के न तो वेतन और भत्तों में और न ही सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उनकी नियुक्ति के पश्चात् उनके लिए अलाभकारी परिवर्तन किए जाएंगे ।

11. अध्यक्ष या सदस्य द्वारा ऐसे अध्यक्ष या सदस्य रहने पर पद आदि धारण करने का प्रतिषेध-पद पर न रहने पर, -

(क) अध्यक्ष, भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन और आगे नियोजन का पात्र नहीं होगा;

(ख) अध्यक्ष से भिन्न कोई सदस्य, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी अन्य अधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्ति का पात्र होगा किंतु भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा;

() अध्यक्ष या अन्य सदस्य, अधिकरण के समक्ष उपसंजात नहीं होगा, कार्य नहीं करेगा या अभिवचन नहीं करेगा

12. अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां-अध्यक्ष, न्यायपीठों पर ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा जो विहित की जाएं:

परंतु अध्यक्ष को, अपनी ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का, जो वह ठीक समझे, अधिकरण के किसी अन्य सदस्य या किसी अधिकारी को इन शर्तों के अधीन रहते हुए प्रत्यायोजन करने का प्राधिकार होगा कि ऐसा सदस्य या अधिकारी, ऐसी प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग करते समय, अध्यक्ष के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करता रहेगा ।

13. अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिकरण के कृत्यों के निर्वहन में उसकी सहायता के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की प्रकृति और प्रवर्ग अवधारित करेगी और अधिकरण को ऐसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी जो वह ठीक समझे ।

(2) अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) अधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारी अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे

अध्याय 3

अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार

14. सेवा संबंधी मामलों में अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-(1) इस अधिनियम में, अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, अधिकरण, नियत दिन से ही, सभी न्यायलयों द्वारा (संविधान के अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करते समय उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सिवाय) सभी सेवा संबंधी मामलों के संबंध में उस दिन से ठीक पूर्व प्रयोक्तव्य सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा

(2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी सेवा संबंधी मामले के संबंध में किसी आदेश द्वारा व्यथित व्यक्ति अधिकरण को ऐसे प्ररूप में और ऐसे दस्तावेजों या अन्य साक्ष्य सहित तथा ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, आवेदन कर सकेगा ।

(3) सेवा संबंधी मामलों से संबंधित आवेदन की प्राप्ति पर, अधिकरण, यदि सम्यक् जांच के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, समाधान हो जाता है कि वह उसके द्वारा न्यायनिर्णयन के लिए उपयुक्त है, ऐसे आवेदन को स्वीकार करेगा; किंतु जहां अधिकरण का इस प्रकार समाधान नहीं होता है तो वह आवेदन को, उसके कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात्, खारिज कर सकेगा ।

(4) किसी आवेदन के न्यायनिर्णयन के प्रयोजन के लिए, अधिकरण को निम्नलिखित विषयों के संबंध में वही शक्तियां होंगी जो किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं-

(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

(ख) दस्तावेजों को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना;

(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अपेक्षा करना;

(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

(च) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

(छ) व्यतिक्रम में किसी आवेदन को खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना;

(ज) व्यतिक्रम में किसी आवेदन के खारिजी के किसी आदेश या उसके द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना; और

(झ) कोई अन्य विषय जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए ।

(5) अधिकरण, विधि और तथ्यों संबंधी दोनों प्रकार के प्रश्नों का विनिश्चय करेगा जो उसके समक्ष उठाए जाएं ।

15. सेना न्यायालय के विरुद्ध अपील के मामलों में अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-(1) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, अधिकरण नियत दिन से ही किसी सेना न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश, विनिश्चय, निष्कर्ष या दंडादेश के विरुद्ध अपील अथवा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक किसी मामले के संबंध में इस अधिनियम के अधीन प्रयोक्तव्य सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।

(2) सेना न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश, विनिश्चय, निष्कर्ष या दंडादेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे प्ररूप, रीति में और ऐसे समय के भीतर जो विहित किए जाएं, अपील कर सकेगा ।

(3) अधिकरण को, किसी अपराध के और सेना अभिरक्षा में के किसी अभियुक्त व्यक्ति को ऐसी शर्तों के साथ जो विहित की जाएं या बिना किसी शर्त के, जैसा वह आवश्यक समझे, जमानत प्रदान करने की शक्ति होगी:

परन्तु यदि यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार प्रतीत होते हों कि वह मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय किसी अपराध का दोषी है तो ऐसे अभियुक्त व्यक्ति को इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा ।

(4) अधिकरण किसी सेना न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील मंजूर करेगा जहां-

(क) सेना न्यायालय का निष्कर्ष किसी कारण से विधिक रूप से कायम रखने योग्य नहीं है; या

(ख) निष्कर्ष में विधि के किसी प्रश्न पर गलत विनिश्चय अन्तर्वलित है; या

(ग) विचारण के दौरान ऐसी तात्त्विक अनियमितता हुई थी जिसके परिणामस्वरूप छोर अन्याय हुआ है,

किन्तु किसी अन्य दशा में, जहां अधिकरण यह समझता है कि अपीलार्थी के साथ घोर अन्याय होने की संभावना नहीं है या इसके परिणामस्वरूप वास्तव में घोर अन्याय नहीं हुआ है वहां अपील खारिज कर सकेगा:

परन्तु अधिकरण द्वारा अपील खारिज करने का कोई आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक ऐसा आदेश उसके लिए कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् नहीं किया जाता ।

(5) अधिकरण दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील मंजूर कर सकेगा और उस पर समुचित आदेश पारित कर सकेगा ।

(6) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, अधिकरण को, -

(क) सेना न्यायालय के निष्कर्षों के स्थान पर, किसी ऐसे अन्य अपराध के लिए दोष का निष्कर्ष देने, जिसके लिए अपराधी सेना न्यायालय द्वारा विधिपूर्वक दोषी पाया जा सकता था, और, यथास्थिति, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) अथवा वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के उपबंधों के अधीन विनिर्दिष्ट या ऐसे निष्कर्षों में अन्तर्वलित अपराध के लिए नए सिरे से कोई दंडादेश पारित करने की शक्ति होगी ; या

(ख) यदि दंडादेश अत्यधिक, अवैध या अनुचित पाया जाता है तो अधिकरण, -

(i) पूरे दंडोदश को या उसके किसी भाग को सशर्त या बिना किसी शर्त के माफ कर सकेगा;

(ii) अधिनिर्णीत दंड को कम कर सकेगा;  

(iii) ऐसे दंड का किसी लघु दंड में या, यथास्थिति, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) में उल्लिखित दंडों में लघुकरण कर सकेगा;

(ग) किसी सेना न्यायालय द्वारा अधिनिर्णीत दंडादेश में वृद्धि कर सकेगा:

परन्तु ऐसे दंडादेश में तब तक वृद्धि नहीं की जाएगी जब तक अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर नहीं दे दिया गया हो;

(घ) यदि दंडादेश कारावास का है तो अपीलार्थी को सशर्त या बिना किसी शर्त के पैरोल पर छोड़ सकेगा;

(ङ) कारावास के दंडादेश को निलंबित कर सकेगा;

(च) कोई ऐसा अन्य आदेश पारित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।

(7) इस अधिनियम में किसी अन्य उपबंध के होते हुए भी, इस धारा के प्रयोजनों के लिए अधिकरण को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 175, धारा 178, धारा 179, धारा 180, धारा 193, धारा 195, धारा 196 या धारा 228 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए दंड न्यायालय समझा जाएगा

16. पुनः विचारण-(1) इस अधिनियम द्वारा यथाउपबन्धित के सिवाय, जहां किसी अपराध के लिए सेना न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि को अभिखण्डित कर दिया गया है, वहां वह किसी सेना न्यायालय द्वारा या किसी अन्य न्यायालय द्वारा उस अपराध के लिए पुनः विचारण का भागी नहीं होगा ।

(2) अधिकरण को, किसी दोषसिद्धि को अभिखंडित करने, सेना न्यायालय द्वारा अपीलार्थी का पुनः विचारण किए जाने के लिए प्राधिकृत करने वाला कोई आदेश करने की शक्ति होगी, किन्तु इस शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जाएगा जब दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील केवल अधिकरण द्वारा प्राप्त या प्राप्त किए जाने के लिए उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर इस अधिनियम के अधीन मंजूर की जाती है और अधिकरण को ऐसा प्रतीत होता है कि न्याय के हित में यह अपेक्षित है कि इस धारा के अधीन कोई आदेश किया जाए:

परन्तु अपीलार्थी का निम्नलिखित से भिन्न किसी अपराध के लिए इस धारा के अधीन पुनः विचारण नहीं किया जाएगा-

(क) ऐसा अपराध जिसके लिए उसे मूल सेना न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध किया गया था और जिसकी बाबत उसकी अपील मंजूर की गई है;

(ख) ऐसा अपराध जिसके लिए प्रथम उल्लिखित अपराध के किसी आरोप के लिए मूल सेना न्यायालय में उसे दोषसिद्ध किया जा सकता था;

(ग) विकल्प के रूप में आरोपित कोई ऐसा अपराध जिसकी बाबत सेना न्यायालय ने प्रथम उल्लिखित अपराध के लिए उसे दोषसिद्ध करने के परिणामस्वरूप कोई निष्कर्ष अभिलिखित नहीं किया है ।

(3) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिसका किसी अपराध के लिए इस धारा के अधीन पुनः विचारण किया जाना है, यदि अधिकरण या उच्चतम न्यायालय ऐसा निर्देश देता है, चाहे ऐसे व्यक्ति का एक या एक से अधिक मूल आरोपों के लिए विचारण या पुनः विचारण किया जा रहा है या नहीं, उक्त आरोप या आरोपों के संबंध में जिनके लिए उसका विचारण किया जाना है, यथास्थिति, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के सुसंगत उपबंध के अधीन नए सिरे से कोई अन्वेषण या अन्य कार्रवाई नहीं की जाएगी ।

17. धारा 15 के अधीन अपील पर अधिकरण की शक्तियां-अधिकरण को, धारा 15 के अधीन अपील की सुनवाई और विनिश्चय करते समय निम्नलिखित शक्तियां होंगी-

(क) सेना न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों से संबंधित दस्तावेजों या प्रदर्शों को प्रस्तुत करने का आदेश देना;

(ख) साक्षियों को उपस्थित होने का आदेश करना;

(ग) साक्ष्य स्वीकार करना;

(घ) सेना न्यायालय से रिपोर्टें अभिप्राप्त करना;

(ङ) जांच के लिए किसी प्रश्न के प्रतिनिर्देश का आदेश करना;

(च) निर्धारक के रूप में कार्य करने के लिए विशेष विशेषज्ञ ज्ञान करने वाले किसी व्यक्ति को नियुक्त करना; और

() किसी प्रश्न का अवधारण करना जिसका उक्त मामले में न्याय करने के लिए अवधारित किया जाना आवश्यक है

18. खर्च-अधिकरण को, धारा 14 के अधीन आवेदन का या धारा 15 के अधीन अपील का निपटारा करते समय, खर्चे के संबंध में ऐसा आदेश करने की शक्ति होगी जो वह न्यायोचित समझे ।

19. अवमानना के लिए दण्ड देने की शक्ति-(1) कोई व्यक्ति, जो अपमानजनक या धमकी युक्त भाषा का प्रयोग करते हुए, या अधिकरण की कार्यवाहियों में कोई अवरोध या विघ्न डालते हुए, अधिकरण के अवमान का दोषी है, दोषसिद्धि पर कारावास का जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, भागी होगा ।

(2) इस धारा के अधीन किसी अपराध का विचारण करने के प्रयोजनों के लिए, न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 (1971 का 10) की धारा 14, धारा 15, धारा 17, धारा 18 और धारा 20 के उपबंध, यथावश्यक परिवर्तन सहित इस प्रकार लागू होंगे मानो उनमें-

(क) उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के प्रति निर्देश अधिकरण के प्रतिनिर्देश है;

(ख) मुख्य न्यायमूर्ति के प्रति निर्देश अध्यक्ष के प्रतिनिर्देश है;

(ग) न्यायाधीश के प्रति निर्देश अधिकरण के न्यायिक या प्रशासनिक सदस्य के प्रतिनिर्देश है;

(घ) एडवोकेट जनरल के प्रति निर्देश अभियोजक के प्रतिनिर्देश है;

(ङ) न्यायालय के प्रति निर्देश अधिकरण के प्रतिनिर्देश है ।

20. न्यायपीठों के बीच कारबार का वितरण-अध्यक्ष, अधिकरण के कारबार का, उसका न्यायपीठों के बीच वितरण करने से संबंधित उपबंध कर सकेगा ।

अध्याय 4

प्रक्रिया

21. अन्य उपचारों के निःशेष हो जाने पर ही आवेदनों का ग्रहण किया जाना-(1) अधिकरण, साधारणतया किसी आवेदन को तब तक ग्रहण नहीं करेगा जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि आवेदक ने, यथास्थिति, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) अथवा वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) और उनके अधीन बनाए गए संबंधित नियमों और विनियमों के अधीन उसे उपलब्ध उपचारों का, उपयोग कर लिया है ।

(2) उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए, किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) अथवा वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) और उसके अधीन बनाए गए संबंधित नियमों और विनियमों के अधीन उसे उपलब्ध उपचारों का उपयोग कर लिया है, -

(क) यदि केन्द्रीय सरकार या उक्त अधिनियमों, नियमों और विनियमों के अधीन ऐसा आदेश पारित करने के लिए सक्षम अन्य प्राधिकारी या अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा, ऐसे व्यक्ति द्वारा की गई किसी अर्जी या अभ्यावेदन को खारिज करते हुए अन्तिम आदेश कर दिया गया है;

(ख) जहां केन्द्रीय सरकार या ऐसा आदेश पारित करने के लिए सक्षम अन्य प्राधिकारी या अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा ऐसे व्यक्ति द्वारा फाइल की गई अर्जी या किए गए अभ्यावेदन की बाबत कोई अन्तिम आदेश पारित नहीं किया गया है, वहां यदि ऐसी तारीख से जिसको ऐसी अर्जी फाइल की गई थी या अभ्यावेदन किया गया था, छह मास की अवधि व्यपगत हो गई है ।

22. परिसीमा-(1) अधिकरण, -

(क) उस दशा में, जिसमें अंतिम आदेश, जो धारा 21 की उपधारा (2) के खण्ड (क) में उल्लिखित है, किया गया है, आवेदन तभी ग्रहण करेगा जब ऐसा आवेदन उस तारीख से, जिसको ऐसा अंतिम आदेश किया गया है, छह मास के भीतर किया जाता है;

(ख) उस दशा में जिसमें कोई अर्जी या अभ्यावेदन जो धारा 21 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) में उल्लिखित है, किया गया है और उसके पश्चात् ऐसा अन्तिम आदेश किए बिना छह मास की अवधि पर्यवसित हो गई है, कोई आवेदन ग्रहण नहीं करेगा;

(ग) उस दशा में जिसमें ऐसी शिकायत, जिसकी बाबत कोई आवेदन किया जाता है, उस तारीख से जिसको ऐसे विषय के संबंध में जिससे ऐसा आदेश संबंधित है, इस अधिनियम के अधीन अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार प्रयोक्तव्य हो जाता है, ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्ष की अवधि के दौरान किए गए किसी आदेश के कारण उद्भूत हुई थी और ऐसी शिकायत को दूर करने के लिए कोई कार्यवाही उक्त तारीख से पूर्व उच्च न्यायालय के समक्ष प्रारम्भ नहीं हुई थी, कोई आवेदन ग्रहण नहीं करेगा ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अधिकरण, यथास्थिति, उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट छह मास की अवधि के पश्चात् या खंड (ग) में विनिर्दिष्ट तीन वर्ष की अवधि से पूर्व आवेदन ग्रहण कर सकेगा यदि अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक के पास ऐसी अवधि के भीतर आवेदन न कर पाने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।

23. अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होगा किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शित होगा, इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण को अपनी प्रक्रिया अधिकथित करने और उसे विनियमित करने की शक्ति होगी जिसके अन्तर्गत अपनी जांच का स्थान और समय नियत करना और इस बारे में विनिश्चय करना सम्मिलित है कि बैठक सार्वजनिक रूप से होगी या बन्द कमरे में

(2) अधिकरण, उसे किए गए प्रत्येक आवेदन, दस्तावेजों, शपथ पत्रों और लिखित अभ्यावेदनों का परिशीलन करने के पश्चात् और ऐसे मौखिक तर्कों को सुनने के पश्चात्, जो उसके समक्ष रखे जाएं, यथासंभव शीघ्रता से विनिश्चय करेगा:

परन्तु जहां अधिकरण उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, आवश्यक समझता है वहां वह मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा ।

(3) अधिकरण द्वारा कोई स्थगन ऐसे स्थगन को दिए जाने को न्यायोचित ठहराने वाले कारणों को अभिलिखित किए बिना नहीं दिया जाएगा और यदि कोई पक्षकार दो से अधिक बार स्थगन के लिए अनुरोध करता है तो उसके खर्चे का अधिनिर्णय दिया जाएगा ।

24. दंडादेश की अवधि और अपील पर इसका प्रभाव-(1) इस अधिनियम की धारा 15 की उपधारा (6) के खंड (क) के अधीन अधिकरण द्वारा पारित किसी दंडादेश की अवधि की गणना, जब तक कि अधिकरण अन्यथा निदेश न दे उस तारीख से प्रारम्भ की जाएगी, जिसको यह, यथास्थिति, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अधीन प्रारम्भ होती जिसके अधीन वह सेना न्यायालय, जिसके विरुद्ध अपील फाइल की गई है, अधिविष्ट हुआ था ।

(2) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण से उच्चतम न्यायालय में हुई किसी अपील में किसी अन्य दंडादेश के प्रतिस्थापन के लिए पारित किसी दंडादेश की गणना, जब तक उच्चतम न्यायालय अन्यथा निदेश न दे उस तारीख से प्रारम्भ होगी जिसको मूल दंडादेश प्रारम्भ होता ।

(3) जहां किसी ऐसे व्यक्ति को, जो दंडादेश भोग रहा है, अपील के लंबित रहने तक निलंबन द्वारा या अन्यथा उक्त दंडादेश के प्रवर्तन पर रोक मंजूर कर दी गई है वहां उस अवधि को, जिसके दौरान इस प्रकार दंडादेश पर रोक लगी होने के कारण उसे निर्मुक्त कर दिया गया है, गणना में नहीं लिया जाएगा जिसके लिए उसे, यथास्थिति, अधिकरण या उच्चतम न्यायालय द्वारा इस प्रकार दंडादिष्ट किया गया है ।

25. आवेदक का या अपीलार्थी का विधि व्यवसायी की सहायता लेने का और काउंसेल नियुक्त करने का सरकार, आदि का अधिकार-(1) अधिकरण को आवेदन करने या अपील करने वाला कोई व्यक्ति अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष कथन प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या अपनी पंसद के किसी विधि व्यवसायी की सहायता ले सकेगा

(2) केन्द्रीय सरकार या सक्षम प्राधिकारी जो विहित किया जाए, काउंसेल के रूप में कार्य करने के लिए एक या एक से अधिक विधि व्यवसायियों को या अपने किसी विधि अधिकारी को प्राधिकृत कर सकेगा और उसके द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत प्रत्येक व्यक्ति अधिकरण के समक्ष, यथास्थिति, आवेदन या अपील के संबंध में उसका पक्ष प्रस्तुत कर सकेगा

26. अंतरिम आदेश करने के बारे में शर्त-(1) इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी आवेदन पर या अपील पर अथवा उससे संबंधित किसी कार्यवाही में कोई अंतरिम आदेश (चाहे व्यादेश या रोक अथवा किसी अन्य रीति में हो, तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कि-

(क) यथास्थिति, ऐसे आवेदन या अपील की प्रतियां और ऐसे अंतरिम आदेश के अभिवचन के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतियां उस पक्षकार को नहीं दे दी जाती हैं जिसके विरुद्ध, यथास्थिति, ऐसा आवेदन या अपील की गई है या किए जाने का प्रस्ताव है; और

(ख) उस मामले में अन्य पक्षकार को सुनवाई का अवसर नहीं दे दिया जाता है:

परन्तु यदि अधिकरण का ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि, यथास्थिति, आवेदक या अपीलार्थी को कोई हानि पहुंचाए जाने से रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह खंड (क) और खंड (ख) की अपेक्षाओं से अभिमुक्ति दे सकेगा और आपवादिक उपाय के रूप में अंतरिम आदेश कर सकेगा ।

(2) जहां कोई पक्षकार जिसके विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन पर या अपील या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में व्यादेश या रोक के रूप में अथवा किसी अन्य रीति में कोई अंतरिम आदेश-

(क) यथास्थिति, ऐसे आवेदन या अपील और ऐसे अंतरिम आदेश के अभिवचन के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतियां ऐसे पक्षकार को दिए बिना किया जाता है; और

(ख) ऐसे पक्षकार को सुनवाई का अवसर दिए बिना और ऐसे आदेश को बातिल करने के लिए अधिकरण के समक्ष कोई आवेदन किए बिना और, यथास्थिति, ऐसे आवेदन या अपील की प्रति, ऐसे पक्षकार को या ऐसे पक्षकार के काउंसेल को जिसके पक्ष में ऐसा आदेश किया गया है, दिए बिना किया जाता है,

वहां अधिकरण आवेदन का निपटारा उस तारीख से, जिसको इसे प्राप्त किया जाता है या उस तारीख से जिसको ऐसे आवेदन की प्रति इस प्रकार दी जाती है, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, चौदह दिन की अवधि के भीतर या जहां उस अवधि के अंतिम दिन अधिकरण बन्द रहता है, वहां आगामी कार्य दिवस के अवसान से पूर्व करेगा ; और यदि आवेदन का इस प्रकार निपटारा नहीं किया जाता है तो, यथास्थिति, उस अवधि के अवसान पर या उक्त अगले कार्य दिवस के अवसान पर अंतरिम आदेश बातिल हो जाएगा ।

27. अध्यक्ष की एक न्यायपीठ से दूसरी न्यायपीठ को मामले का अंतरण करने की शक्ति-किसी पक्षकार के आवेदन पर और संबंधित पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात् तथा उनमें से, जो सुनवाई के इच्छुक हैं, उनको सुनने के पश्चात्, या स्वप्रेरणा से ऐसी सूचना दिए बिना अध्यक्ष एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामले को उसके निपटारे के लिए किसी अन्य न्यायपीठ को अंतरित कर सकेगा ।

28. बहुमत द्वारा विनिश्चय किया जाना-यदि न्यायपीठ के सदस्यों में किसी प्रश्न पर मतभेद है तो उस प्रश्न का विनिश्चय, यदि बहुमत है, तो बहुमत के अनुसार किया जाएगा, किन्तु यदि सदस्यों के मत बराबर हैं तो वे ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का कथन करेंगे जिनके बारे में उनमें मतभेद हैं और उन्हें अध्यक्ष को निर्देशित करेंगे जो ऐसे प्रश्न या प्रश्नों की स्वयं सुनवाई करेगा या उस मामले को, ऐसे प्रश्न या प्रश्नों पर सुनवाई के लिए अधिकरण के अन्य सदस्यों में से एक या अधिक को निर्देशित करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय अधिकरण के उन सदस्यों के जिन्होंने उस मामले की सुनवाई की है जिनके अंतर्गत वे सदस्य भी हैं, जिन्होंने प्रथमतः उस मामले की सुनवाई की थी, बहुमत के अनुसार किया जाएगा ।

29. अधिकरण के आदेश का निष्पादन-इस अधिनियम के अन्य उपबंधों और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, अधिकरण का आवेदन का निपटारा करने वाला आदेश अंतिम होगा और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा और ऐसा आदेश तद्नुसार निष्पादित किया जाएगा ।

अध्याय 5

अपील

30. उच्चतम न्यायालय को अपील-(1) धारा 31 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण के अंतिम विनिश्चय या आदेश (धारा 19 के अधीन पारित आदेश से भिन्न) के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में होगी:

परंतु ऐसी अपील उक्त विनिश्चय या आदेश के नब्बे दिनों की अवधि के भीतर की जाएगी:

परंतु यह और कि अधिकरण के अन्तर्वर्ती आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी ।

(2) अधिकरण के, अवमान के लिए दंड देने की अपनी अधिकारिता के प्रयोग में दिए गए किसी आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में अधिकार के रूप में होगी:

परंतु इस उपधारा के अधीन अपील उस आदेश की तारीख से, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, साठ दिन के भीतर उच्चतम न्यायालय में फाइल की जाएगी ।

(3) उपधारा (2) के अधीन किसी अपील के लंबित रहने के दौरान उच्चतम न्यायालय यह आदेश कर सकेगा कि-

(क) ऐसे दंड या आदेश के, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, निष्पादन को निलंबित रखा जाए; या

(ख) यदि अपीलार्थी परिरोध में है तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जाए:

परंतु जहां अपीलार्थी, अधिकरण का यह समाधान कर देता है कि उसका अपील करने का आशय है वहां अधिकरण, यथास्थिति, खंड (क) या खंड (ख) के अधीन प्रदत्त किन्हीं शक्तियों का प्रयोग भी कर सकेगा ।

31. अपील करने की इज्जात-(1) उच्चतम न्यायालय को अपील, अधिकरण की इजाजत से होगी; और ऐसी इजाजत तब तक नहीं दी जाएगी जब तक अधिकरण द्वारा यह प्रमाणित नहीं कर दिया जाता है कि विनिश्चय में जनसाधारण के महत्व का विधि का कोई प्रश्न अंतर्वलित है या उच्चतम न्यायालय को ऐसा प्रतीत होता है कि कोई प्रश्न ऐसा है जिस पर उस न्यायालय द्वारा विचार किया जाना चाहिए ।

(2) उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन अधिकरण के विनिश्चय की तारीख से प्रारंभ होने वाली तीस दिन की अवधि के भीतर किया जाएगा और इजाजत के लिए उच्चतम न्यायालय को आवेदन उस तारीख से जिसको अधिकरण द्वारा इजाजत देने के लिए आवेदन को खारिज किया गया है, आरंभ होने वाली तीस दिन की अवधि के भीतर किया जाएगा ।

(3) अपील को, तब तक लंबित समझा जाएगा जब तक अपील करने के लिए इजाजत के आवेदन का निपटारा नहीं हो जाता है और यदि अपील के लिए इजाजत मंजूर हो जाती है तो जब तक अपील का निपटारा नहीं हो जाता है और अपील करने के लिए इजाजत के आवेदन का, उस समय के अवसान पर जिसके भीतर इसे किया गया होता, किन्तु उस समय के भीतर इसे नहीं किया गया है, निपटारा किया गया समझा जाएगा ।

32. माफी-उच्चतम न्यायालय अपीलार्थी द्वारा किसी समय किए गए आवेदन पर उस समय को बढ़ा सकेगा जिसके भीतर धारा 30 या धारा 31 की उपधारा (2) के अधीन उस न्यायालय को उसके द्वारा अपील की जा सकेगी

अध्याय 6

प्रकीर्ण

33. सिविल न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन-ऐसी तारीख से ही जिससे इस अधिनियम के अधीन सेवा संबंधी मामलों के संबंध में कोई अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार अधिकरण द्वारा प्रयोक्तव्य हो जाते हैं, किसी सिविल न्यायालय को उन सेवा संबंधी मामलों के संबंध में ऐसी अधिकारिता, शक्ति या प्राधिकार नहीं होगा या वह उसका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ।

34. लंबित मामलों का अंतरण-(1) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण की स्थापना की तारीख से ठीक पहले किसी न्यायालय के समक्ष, जिसके अन्तर्गत उच्च न्यायालय या अन्य प्राधिकारी भी है, लंबित प्रत्येक वाद या अन्य कार्यवाही, जो ऐसा वाद या कार्यवाही है, जिस पर वाद हेतुक आधारित है कि यह अधिकरण की अधिकारिता के अंतर्गत होता यदि वह ऐसे अधिकरण की अधिकारिता के भीतर ऐसी स्थापना के पश्चात् उद्भूत होता, ऐसे अधिकरण को उस तारीख को अंतरित की जाएगी ।

(2) जहां कोई वाद या अन्य कार्यवाही, उपधारा (1) के अधीन किसी न्यायालय से, जिसके अंतर्गत उच्च न्यायालय या अन्य प्राधिकारी भी है, अधिकरण को अंतरित हो गई है वहां, -

(क) ऐसा न्यायालय या अन्य प्राधिकारी ऐसे अंतरण के पश्चात्, यथाशीघ्र, ऐसे वाद या अन्य कार्यवाही के अभिलेख अधिकरण को भेजेगा;

() अधिकरण, ऐसे अभिलेखों की प्राप्ति पर, ऐसे वाद या अन्य कार्यवाही में, जहां तक हो सके, उसी रीति से जिससे धारा 14 की उपधारा (2) के अधीन किसी आवेदन की दशा में कोई कार्यवाही की जाती है, उस प्रक्रम से, जिस पर वह ऐसे अंतरण से पहले थी या किसी पूर्वतर प्रक्रम से या नए सिरे से, जो अधिकरण ठीक समझे, कार्यवाही कर सकेगा

35. कतिपय अपीलों को फाइल करने के लिए उपबंध-जहां कोई डिक्री या आदेश अधिकरण की स्थापना से पूर्व किसी न्यायालय (उच्च न्यायालय से भिन्न) या किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा किसी ऐसे वाद या कार्यवाही में की गई है या पारित किया गया है जो ऐसा वाद या कार्यवाही है जिसका वाद हेतुक, उस पर आधारित है, कि यदि वह ऐसी स्थापना के पश्चात् उद्भूत हुआ होता तो अधिकरण की अधिकारिता के भीतर होता और ऐसी डिक्री या आदेश के विरुद्ध कोई अपील ऐसी स्थापना के पूर्व नहीं की गई है या यदि की गई है तो वह किसी न्यायालय, जिसके अंतर्गत उच्च न्यायालय भी है, के समक्ष निपटारे के लिए लंबित है और तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसी अपील करने के लिए समय ऐसी स्थापना के पूर्व समाप्त नहीं हुआ है, वहां ऐसी अपील अधिकरण को उस तारीख से, जिसको अधिकरण स्थापित किया जाता है, नब्बे दिन के भीतर या ऐसी डिक्री या आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से नब्बे दिन के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, होगी ।

36. अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों का न्यायिक कार्यवाही होना-अधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193, धारा 219 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी

37. अधिकरण के सदस्यों और कर्मचारिवृन्द का लोक सेवक होना-अधिकरण का अध्यक्ष, अन्य सदस्य और धारा 13 के अधीन अधिकरण को उपलब्ध कराए गए अधिकारी तथा अन्य कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे ।

38. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए सरंक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश के अनुसरण में पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केंद्रीय सरकार या अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य अथवा अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।

39. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के फलस्वरूप प्रभाव रखने वाली किसी अन्य लिखत में अन्तर्विष्ट इससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।

40. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यह इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हों, और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत होते हों:

परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा

41. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) ऐसा मामला या ऐसे मामले जिनका विनिश्चय धारा 5 की उपधारा (3) के खंड (ग) के अधीन दो से अधिक सदस्यों से मिलकर बनाई गई न्यायपीठ द्वारा किया जाएगा;

() अध्यक्ष या अन्य सदस्य के कदाचार या असमर्थता का अन्वेषण करने की धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन प्रक्रिया;

() धारा 10 के अधीन अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

() ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां, जिनका अध्यक्ष धारा 12 के अधीन अधिकरण की न्यायपीठों पर प्रयोग कर सकेगा;

(ङ) धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(च) वह प्ररूप, जिसमें धारा 14 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन किया जा सकेगा, आवेदन के साथ संलग्न किए जाने वाले दस्तावेज और अन्य साक्ष्य तथा ऐसा आवेदन फाइल करने की बाबत या आदेशिका के निष्पादन की तामील की बाबत संदेय फीस;

(छ) ऐसे अन्य विषय, जो धारा 14 की उपधारा (4) के खंड (झ) के अधीन विहित किए जाएं;

(ज) वह प्ररूप और रीति, जिसमें अपील फाइल की जा सकेगी, उस पर संदेय फीस और वह समय जिसके भीतर धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन ऐसी अपील फाइल की जा सकेगी;

(झ) वे नियम, जिनके अधीन रहते हुए अधिकरण को धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी;

(ञ) ऐसा सक्षम प्राधिकारी जो धारा 25 की उपधारा (2) के अधीन काउंसेल के रूप में कार्य करने के लिए विधि व्यवसायी या विधि अधिकारी को प्राधिकृत कर सकेगा;

() कोई अन्य विषय जो विहित किए जाएं या जिनके संबंध में केंद्रीय सरकार द्वारा नियम बनाए जाने अपेक्षित हैं

42. भूतलक्षी रूप से नियम बनाने की शक्ति-धारा 41 के अधीन नियम बनाने की शक्तियों के अंतर्गत ऐसे नियमों को या उनमें से किसी नियम को भूतलक्षी रूप से ऐसी तारीख से बनाने की शक्ति भी है जो उससे पूर्व की तारीख नहीं होगी जिसको यह अधिनियम प्रवर्तन में आएगा किंतु किसी ऐसे नियम को ऐसा भूतलक्षी प्रभाव इस प्रकार नहीं दिया जाएगा जिससे किसी ऐसे व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, जिसको ऐसा नियम लागू हो सकेगा

43. नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में, अथवा दो या अधिक आनुक्रामिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो   जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

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