स्थावर सम्पत्ति अधिग्रहण और अर्जन
अधिनियम, 1952
(1952 का अधिनियम संख्यांक 30)
[14 मार्च, 1952]
संघ के प्रयोजनों के निमित्त स्थावर
सम्पत्ति के अधिग्रहण और
अर्जन के लिए उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम स्थावर सम्पत्ति अधिग्रहण और अर्जन अधिनियम, 1952 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।
* * * *
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “अधिनिर्णय" से धारा 8 के अधीन मध्यस्थ द्वारा दिया गया अधिनिर्णय अभिप्रेत है ;
(ख) “सक्षम प्राधिकारी" से ऐसा व्यक्ति या प्राधिकारी अभिप्रेत है जो ऐसे क्षेत्र के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, इस अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी के कृत्यों का पालन करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत हो ;
(ग) “भूस्वामी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो तत्समय किसी परिसर का अपने वास्ते या किसी अन्य व्यक्ति के वास्ते या उसकी ओर से, या उसके फायदे के लिए या किसी अन्य व्यक्ति के न्यासी, संरक्षक या रिसीवर के रूप में भाटक प्राप्त कर रहा है या प्राप्त करने का हकदार है, या जो उस दशा में भाटक प्राप्त करता या भाटक प्राप्त करने का हकदार होता जब कि परिसर किसी अभिधारी को पट्टे पर दिए गए होते ;
(घ) किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में हितबद्ध व्यक्ति" पद के अन्तर्गत वे सभी व्यक्ति आते हैं, जो इस अधिनियम के अधीन उस सम्पत्ति के अधिग्रहण और अर्जन के कारण दिए जाने वाले प्रतिकर में किसी हित का दावा करते हैं, या दावा करने के हकदार हैं ;
(ङ) “परिसर" से कोई भवन या उसका भाग अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत-
(i) भवन के या भवन के भाग से यदि कोई उद्यान, मैदान या उपगृह अनुलग्न हों तो वे उद्यान, मैदान या उपगृह आते हैं ;
(ii) ऐसे भवन के या भवन के भाग के अधिक फायदाप्रद उपभोग के लिए उसमें लगे हुए कोई फिटिंग आते हैं ;
(च) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बने नियमों के द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(छ) “सम्पत्ति" से हर प्रकार की स्थावर सम्पत्ति अभिप्रेत है और इसमें ऐसी सम्पत्ति में या उसके बारे में कोई भी अधिकार आते हैं ;
(ज) “अभिधारी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके द्वारा या जिसकी ओर से किन्हीं परिसरों का भाटक संदेय है और इसमें ऐसे उपाभिधारी और अन्य व्यक्ति आते हैं जिनको तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा अभिधारी के अधीन हक व्युत्पन्न हुआ है ।
3. स्थावर सम्पत्ति का अधिग्रहण करने की शक्ति-(1) जहां कि सक्षम प्राधिकारी की यह राय है कि ऐसे किसी लोक प्रयोजन के लिए, जो संघ का प्रयोजन है, किसी सम्पत्ति की आवश्यकता है या आवश्यकता होने वाली है, और सम्पत्ति का अधिग्रहण किया जाना चाहिए, तो सक्षम प्राधिकारी-
(क) स्वामी या किसी अन्य व्यक्ति से, जिसका सम्पत्ति पर कब्जा है, लिखित सूचना द्वारा (उसमें अधिग्रहण का प्रयोजन विनिर्दिष्ट करते हुए) यह अपेक्षा करेगा कि ऐसी सूचना की अपने पर तामील होने की तारीख से पन्द्रह दिन के अन्दर तुम यह हेतुक-दर्शित करो कि सम्पत्ति का अधिग्रहण क्यों न किया जाए, और
(ख) आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि न तो सम्पत्ति का स्वामी और न कोई अन्य व्यक्ति सक्षम प्राधिकारी की अनुज्ञा के बिना सम्पत्ति का व्ययन करेगा, और न उसकी संरचना को परिवर्तित करेगा और न तब तक किसी अभिधारी को पट्टे पर देगा, जब तक कि दो मास से अनधिक ऐसी कालावधि का अवसान न हो जाए जैसी कि आदेश में विनिर्दिष्ट की गई हो ।
(2) यदि सम्पत्ति में हितबद्ध या सम्पत्ति पर कब्जा रखने वाले किसी व्यक्ति द्वारा दर्शित किए गए हेतुक पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात् सक्षम प्राधिकारी का समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह लिखित आदेश द्वारा सम्पत्ति का अधिग्रहण कर सकेगा और ऐसे अतिरिक्त आदेश दे सकेगा जो अधिग्रहण के सम्बन्ध में उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :
परन्तु ऐसी किसी सम्पत्ति या उसके ऐसे किसी भाग का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा,-
(क) जो उसके स्वामी द्वारा सद्भावपूर्वक अपने या अपने कुटुम्ब के निवास के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है, या
(ख) जो या तो लोक साधारण द्वारा अनन्यतः धार्मिक पूजा के लिए या किसी पाठशाला, अस्पताल, लोक पुस्तकालय या अनाथालय या पूजा के ऐसे स्थान या ऐसी पाठशाला, अस्पताल, पुस्तकालय या अनाथालय के प्रबन्ध से सम्बन्धित व्यक्तियों की वास-सुविधा के प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होता है :
परन्तु यह और कि जहां कि अधिगृहीत सम्पत्ति में ऐसे परिसर भी हैं, जिनका प्रयोग किसी अभिधारी द्वारा उपधारा (1) के अधीन सूचना की तामील होने की तारीख से ठीक पूर्व दो मास से अन्यून कालावधि के लिए निवास के रूप में किया जाता रहा है, वहां समक्ष प्राधिकारी ऐसे अभिधारी को आनुकल्पिक वास-सुविधा देगा जो उसकी राय में ठीक है ।
4. अधिगृहीत सम्पत्ति का कब्जा लेने की शक्ति-(1) जहां कि धारा 3 के अधीन कोई सम्पत्ति अधिगृहीत की गई है, वहां सक्षम प्राधिकारी लिखित सूचना द्वारा स्वामी तथा किसी अन्य व्यक्ति को, जो सम्पत्ति पर कब्जा रखता है, यह आदेश दे सकेगा कि तुम उस सम्पत्ति का कब्जा सक्षम प्राधिकारी को या उसके द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति को उस तारीख से, जिसको सूचना की तामील हुई है, तीस दिन के अन्दर अभ्यर्पित या परिदत्त कर दो ।
(2) यदि उपधारा (1) के अधीन दिए गए आदेश का अनुपालन करने से कोई व्यक्ति इन्कार करता है या अनुपालन करने में असफल रहता है, तो सक्षम प्राधिकारी सम्पत्ति का कब्जा ले सकेगा और उस प्रयोजन के लिए ऐसे बल का प्रयोग कर सकेगा जो आवश्यक हो ।
5. अधिगृहीत सम्पत्ति पर अधिकार-(1) धारा 3 के अधीन अधिगृहीत समस्त सम्पत्ति ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त की जाएगी जो अधिग्रहण की सूचना में वर्णित हों ।
(2) जहां कि धारा 3 के अधीन कोई परिसर अधिगृहीत किए गए हैं, वहां सक्षम प्राधिकारी भूस्वामी को यह आदेश दे सकेगा कि तुम ऐसी मरम्मत, जैसी आवश्यक हो और उस परिक्षेत्र में भूस्वामियों द्वारा प्रायः की जाती है और उस सूचना में विनिर्दिष्ट हो, युक्तियुक्त समय के अन्दर करो जो सूचना में उल्लिखित किया गया है और यदि भूस्वामी ऐसे आदेश के अनुसरण में किन्हीं मरम्मतों को करने में असफल रहता है, तो सक्षम प्राधिकारी आदेश में विनिर्दिष्ट मरम्मत को भूस्वामी के खर्चे पर करवा सकेगा और उसकी लागत की कटौती वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना भूस्वामी को देय प्रतिकर में से की जा सकेगी ।
6. अधिग्रहण से निर्मुक्ति-(1) इस अधिनियम के अधीन अधिगृहीत किसी सम्पत्ति को केन्द्रीय सरकार किसी भी समय निर्मुक्त कर सकेगी और यथासाध्य सम्पत्ति को उतनी अच्छी हालत में, जिनती अच्छी हालत में वह उस समय थी, जब उसका कब्जा लिया गया था, युक्तियुक्त अवक्षयण और अप्रतिरोध्य शक्ति द्वारा कारित परिवर्तनों सहित प्रत्यावर्तित कर सकेगी :
परन्तु जहां कि वे प्रयोजन, जिनके लिए किसी अधिगृहीत सम्पत्ति का प्रयोग किया जा रहा था, अस्तित्वहीन हो जाते हैं, वहां केन्द्रीय सरकार यथाशीघ्र अधिग्रहण से उस सम्पत्ति को तब निर्मुक्त कर सकेगी जब तक कि वह सम्पत्ति धारा 7 के अधीन अर्जित नहीं की जाती है ।
[(1क) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार अधिग्रहण से,-
(क) स्थावर सम्पत्ति अधिग्रहण और अर्जन (संशोधन) अधिनियम, 1970 (1970 का 1) के प्रारंभ से पूर्व इस अधिनियम के अधीन अधिगृहीत या अधिगृहीत समझी जाने वाली किसी सम्पत्ति को ऐसे प्रारंभ से [सत्रह वर्ष] की कालावधि के अवसान पर या उसके पूर्व,
(ख) ऐसे प्रारंभ के पश्चात् इस अधिनियम के अधीन अधिगृहीत किसी सम्पत्ति को, उस तारीख से जिस तारीख को ऐसी सम्पत्ति का कब्जा सक्षम प्राधिकारी को धारा 4 के अधीन अभ्यर्पित या परिदत्त किया गया था या उसके द्वारा लिया गया था, पांच वर्ष की कालावधि के अवसान पर या उसके पूर्व,
तब निर्मुक्त करेगी, जब कि उपर्युक्त 2[सत्रह वर्ष] की अवधि के अन्दर धारा 7 के अधीन ऐसी सम्पत्ति अर्जित नहीं कर ली जाती ।]
(2) जहां कि कोई सम्पत्ति उपधारा (1) या उपधारा (1क) के अधीन अधिग्रहण से निर्मुक्त की जानी है, वहां सक्षम प्राधिकारी ऐसी जांच के पश्चात् यदि कोई हो, जिसे वह किसी मामले में करना या कराना आवश्यक समझे, लिखित आदेश द्वारा वह व्यक्ति विनिर्दिष्ट कर सकेगा जिसको सम्पत्ति का कब्जा दिया जाएगा और ऐसा कब्जा यथासाध्य उस व्यक्ति को दिया जाएगा जिससे अधिग्रहण के समय कब्जा लिया गया था या ऐसे व्यक्ति के हित-उत्तराधिकारियों को दिया जाएगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन किसी आदेश में विनिर्दिष्ट व्यक्ति को सम्पत्ति के कब्जे का परिदान केन्द्रीय सरकार के लिए उस सम्पत्ति के बारे में समस्त दायित्वों से उन्मोचन होगा, किन्तु यह बात उस सम्पत्ति के सम्बन्ध में किन्हीं अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी जिन्हें कोई अन्य व्यक्ति विधि की सम्यक् प्रक्रिया द्वारा उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रवृत्त कराने का हकदार है जिसको सम्पत्ति का कब्जा दिया गया है ।
(4) जहां कि कोई व्यक्ति, जिसको अधिगृहीत सम्पत्ति का कब्जा दिया जाना है, नहीं पाया जाता और उसकी ओर से कोई अभिकर्ता या कोई व्यक्ति परिदान स्वीकार करने के लिए सशक्त नहीं है, वहां सक्षम प्राधिकारी एक सूचना यह घोषित करते हुए कि सम्पत्ति अधिग्रहण से निर्मुक्त की जाती है । सम्पत्ति के किसी सहज-दृश्य भाग पर लगवाएगा और राजपत्र में भी प्रकाशित कराएगा ।
(5) जबकि उपधारा (4) में निर्दिष्ट सूचना राजपत्र में प्रकाशित की जाती है, तब ऐसी सूचना में विनिर्दिष्ट सम्पत्ति ऐसे प्रकाशन की तारीख को और उससे अधिग्रहण के अधीन न रह जाएगी और उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसका परिदान उस व्यक्ति को किया गया है जो उसका हकदार है और उस तारीख के पश्चात् किसी भी कालावधि के लिए उस सम्पत्ति के सम्बन्ध में किसी प्रतिकर या अन्य दावे के लिए केन्द्रीय सरकार दायी नहीं होगी ।
(6) जहां कि इस अधिनियम के अधीन अधिगृहीत कोई सम्पत्ति या उसका कोई महत्वपूर्ण भाग सम्पूर्णतः नष्ट हो जाता है या सारतः और स्थायी रूप से उस प्रयोजन के लिए, जिसके लिए उसे अधिगृहीत किया गया था, अग्नि, भूचाल, आंधी, बाढ़ या किसी सेना या भीड़ या अन्य अप्रतिरोध्य बल के कारण अनुपयुक्त हो गया है, वहां केन्द्रीय सरकार के विकल्प पर वह अधिग्रहण शून्य होगा :
परन्तु जहां कि उस सम्पत्ति को क्षति उस सरकार के दोषपूर्ण कार्य या व्यतिक्रम से हुई है, वहां इस उपधारा का फायदा केन्द्रीय सरकार को उपलभ्य नहीं होगा ।
7. अधिगृहीत सम्पत्ति को अर्जित करने की शक्ति-(1) जहां कि कोई सम्पत्ति अधिग्रहण के अधीन है, वहां यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि लोक प्रयोजन के लिए सम्पत्ति का अर्जन करना आवश्यक है, तो वह राजपत्र में इस अभिप्रायः की सूचना प्रकाशित करके केन्द्रीय सरकार ने यह विनिश्चय किया है कि इस धारा के अनुसार सम्पत्ति का अर्जन किया जाए, किसी समय ऐसी सम्पत्ति को अर्जित कर सकेगी :
परन्तु ऐसी सूचना निकालने से पूर्व केन्द्रीय सरकार ऐसी सम्पत्ति के स्वामी या अन्य व्यक्ति से, जो केन्दीय सरकार की राय में इसमें हितबद्ध हो, यह अपेक्षा करेगी कि वह व्यक्ति यह हेतुक दर्शित करे कि सम्पत्ति को क्यों न अर्जित किया जाए और सम्पत्ति में हितबद्ध किसी व्यक्ति द्वारा दर्शित हेतुक पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात् और पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार ऐसे आदेश पारित कर सकेगी जैसे वह उचित समझती है ।
(2) जब कि राजपत्र में यथापूर्वोक्त सूचना प्रकाशित की गई है, तब अधिगृहीत सम्पत्ति उस दिन को और उसके प्रारंभ से जिस दिन को इस प्रकार सूचना प्रकाशित होती है, केन्द्रीय सरकार में सभी विल्लंगमों से मुक्त हो कर आत्यन्तिक रूप से निहित हो जाएगी और ऐसी सम्पत्ति की अधिग्रहण की कालावधि समाप्त हो जाएगी ।
(3) निम्नलिखित परिस्थितियों में अर्जित किए जाने के सिवाय, कोई सम्पत्ति इस धारा के अधीन अर्जित नहीं की जाएगी, अर्थात् :-
(क) जहां कि केन्द्रीय सरकार के खर्चे पर पूर्णतः या भागतः अधिग्रहण की कालावधि के दौरान सम्पत्ति पर, उसमें या उसके ऊपर कोई संकर्म किए गए हैं और सरकार यह विनिश्चय करती है कि ऐसे संकर्मों का मूल्य या प्रयोग करने का अधिकार सरकार के प्रयोजनों के लिए प्रतिभूत या परिरक्षित किया जाना चाहिए, या
(ख) जहां कि उस सम्पत्ति को उस हालत में प्रत्यावर्तित कर देने की लागत, जिसमें वह अधिग्रहण के समय थी, सरकार के अवधारणानुसार अत्यधिक होगी और उसका स्वामी सम्पत्ति को ऐसे प्रत्यावर्तित करने के लिए प्रतिकर दिए गए बिना उसे अधिग्रहण से निर्मुक्त करने से इन्कार करता है ।
(4) उपधारा (3) के अधीन केन्द्रीय सरकार का कोई विनिश्चय या अवधारण अन्तिम होगा और किसी न्यायालय में वह प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
(5) उपधारा (3) के खण्ड (क) के प्रयोजनों के लिए संकर्मों" में भवन, संरचनाएं और हर प्रकार के सुधार आते हैं ।
8. प्रतिकर अवधारित करने के सिद्धान्त और पद्धति-(1) जहां कि इस अधिनियम के अधीन कोई सम्पत्ति अधिगृहीत या अर्जित की जाती है, वहां प्रतिकर दिया जाएगा जिसकी राशि इसमें इसके पश्चात् दी गई रीति और सिद्धांतों के अनुसार अवधारित की जाएगी, अर्थात् :-
(क) जहां कि प्रतिकर की राशि करार द्वारा निश्चित की जा सकती है, वहां उसका संदाय ऐसे करार के अनुसार किया जाएगा ;
(ख) जहां कि इस प्रकार का कोई करार नहीं हो पाता है, वहां केन्द्रीय सरकार ऐसे व्यक्ति को, जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है, या रहा है, या उस रूप में नियुक्त होने के लिए अर्हित है, मध्यस्थ के रूप में नियुक्त करेगी ;
(ग) केन्द्रीय सरकार किसी विशिष्ट मामले में ऐसे व्यक्ति को जिसको अधिगृहीत या अर्जित सम्पत्ति की प्रकृति के बारे में विशेषज्ञीय जानकारी प्राप्त है, मध्यस्थ की सहायता करने के लिए नामनिर्दिष्ट कर सकेगी और जहां कि ऐसा नामनिर्देशन किया जाता है, वहां वह व्यक्ति जिसको प्रतिकर दिया जाना है, उस प्रयोजन के लिए किसी असेसर को नामनिर्देशित कर सकेगा ;
(घ) मध्यस्थ के समक्ष कार्यवाहियों के प्रारंभ पर, केन्द्रीय सरकार और वह व्यक्ति, जिसको प्रतिकर दिया जाना है, यह बताएंगे कि उनकी अपनी-अपनी राय में प्रतिकर की उचित रकम क्या है ;
(ङ) विवाद की सुनवाई के पश्चात् मध्यस्थ प्रतिकर की रकम को, जो उसे न्यायसंगत प्रतीत होती है, अवधारित करते हुए और उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों को विनिर्दिष्ट करते हुए, जिनको ऐसा प्रतिकर दिया जाएगा, अधिनिर्णय देगा, और अधिनिर्णय देने में वह प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को और उपधारा (2) और (3) के उपबन्धों का वहां तक जहां तक वे लागू होते हैं, ध्यान रखेगा ;
(च) जहां कि उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों के बारे में विवाद है जो प्रतिकर के हकदार हैं वहां मध्यस्थ ऐसे विवाद का विनिश्चय करेगा और यदि मध्यस्थ को यह मालूम होता है कि एक से अधिक व्यक्ति प्रतिकर के हकदार हैं, तो वह उसकी रकम को ऐसे व्यक्तियों में प्रभाजित कर देगा ;
(छ) माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 (1940 का 10) की कोई बात इस अधिनियम के अधीन वाले माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।
(2) [किसी सम्पत्ति के अधिग्रहण के लिए देय प्रतिकर की रकम उपधारा (2क) और (2ख) के उपबंधों के अधीन रहते हुए निम्नलिखित से मिलकर होगी :-]
(क) अधिग्रहण की कालावधि की बाबत इतनी आवर्ती राशि की अदायगी, जितनी उस भाटक के बराबर है जो उस सम्पत्ति के उपयोग और दखल के लिए उस दशा में देय होता जिसमें कि वह सम्पत्ति उस कालावधि के लिए पट्टे पर ली गई होती ; और
(ख) ऐसी राशि या राशियां, यदि कोई हों, जो निम्नलिखित सभी बातों या उनमें से किसी में हितबद्ध किसी व्यक्ति की प्रतिपूर्ति करने के लिए आवश्यक पाई जाएं, अर्थात्-
(i) अधिग्रहण के कारण हुई धनीय हानि,
(ii) अधिगृहीत परिसर को खाली करने में हुए व्यय,
(iii) अधिग्रहण से निर्मुक्ति होने पर परिसरों पर पुनः दखल करने में लगे व्यय,
(iv) अधिग्रहण की कालावधि के दौरान सम्पत्ति पर (साधारण घिसाई से अन्यथा) हुए नुकसान जिसके अन्तर्गत वे व्यय आते हैं जिन्हें सम्पत्ति को उस दशा में प्रत्यावर्तित करने में उपगत करना पड़ा है, जिसमें वह अधिग्रहण के समय थी ।]
[(2क) किसी सम्पत्ति की बाबत, उपधारा (2) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट आवर्ती अदायगी का, यदि उस सम्पत्ति को पहले ही धारा 6 के अधीन अधिग्रहण से निर्मुक्त न कर दिया गया हो या धारा 7 के अधीन अर्जित न कर लिया गया हो तो, पुनरीक्षण उपधारा (2ख) के उपबन्धों के अनुसार-
(क) उस दशा में जब स्थावर सम्पत्ति अधिग्रहण और अर्जन (संशोधन) अधिनियम, 1975 के प्रारम्भ के ठीक पूर्व पांच वर्ष की कालावधि या उससे लम्बी कालावधि के लिए इस अधिनियम के अधीन अधिग्रहण के अधीन रही है-
(i) ऐसे प्रारम्भ की तारीख से प्रथम बार किया जाएगा, और
[(ii) ऐसे प्रारम्भ के पांच वर्ष के अवसान से दूसरी बार और दस वर्ष के अवसान से तीसरी बार किया जाएगा;]
(ख) उस दशा में जब वह सम्पत्ति ऐसे प्रारम्भ के ठीक पूर्व पांच वर्ष से कम कालावधि के लिए इस अधिनियम के अधीन अधिग्रहण के अधीन रही है और ऐसी अधिकतम कालावधि, जिसके भीतर ऐसी सम्पत्ति धारा 6 की उपधारा (1क) के अनुसार अधिग्रहण से निर्मुक्त की जाएगी या अर्जित की जाएगी, ऐसे प्रारम्भ से पांच वर्ष बाद तक की है वहां,-
(i) उस तारीख से, जिसको ऐसी सम्पत्ति का कब्जा धारा 4 के अधीन सक्षम प्राधिकारी को अभ्यर्पित या परिदत्त किया गया है या उसके द्वारा ले लिया गया है, पांच वर्ष की कालावधि के अवसान की तारीख से प्रथम बार किया जाएगा, और
[(ii) उस तारीख से जिसको उपखण्ड (त्) के अधीन किया गया पुनरीक्षण प्रभावी होता है, पांच वर्ष की कालावधि के अवसान की तारीख से दूसरी बार और दस वर्ष की कालावधि के अवसान की तारीख से तीसरी बार किया जाएगा ;]
[(ग) किसी अन्य दशा में,-
(i) उस तारीख से, जिसको ऐसी सम्पत्ति का कब्जा धारा 4 के अधीन सक्षम प्राधिकारी को अभ्यर्पित या परदित्त किया गया है या उसके द्वारा ले लिया गया है, पांच वर्ष की कालावधि के अवसान की तारीख से प्रथम बार किया जाएगा ; और
(ii) उस तारीख से जिसको उपखण्ड (त्) के अधीन पुनरीक्षण प्रभावी होता है, पांच वर्ष के अवसान की तारीख से दूसरी बार और दस वर्ष के अवसान की तारीख से तीसरी बार किया जाएगा ।]
(2ख) किसी सम्पत्ति की बाबत आवर्ती अदायगी का पुनरीक्षण, उपधारा (2) के खण्ड (क) के साथ पठित उपधारा (1) में वर्णित सिद्धान्तों के अनुसार और रीति से अदायगी का पुनः अवधारण करके इस प्रकार किया जाएगा मानो ऐसी सम्पत्ति इस अधिनियम के अधीन उस तारीख को अधिगृहीत की गई थी जिस तारीख से उपधारा (2क) के अधीन पुनरीक्षण किया जाना है ।]
[(3) धारा 7 के अधीन सम्पत्ति का अर्जन करने के लिए देय प्रतिकर वह कीमत होगी जिस पर अधिगृहीत सम्पत्ति खुले बाजार में तब बिकती जब कि वह उसी दशा में रहती जिसमें वह अधिग्रहण के समय थी और अधिग्रहण की तारीख को बेची गई होती ।]
9. प्रतिकर का संदाय-इस अधिनियम के अधीन बने किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए किसी अधिनिर्णय के अधीन देय प्रतिकर की रकम सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसके हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों को, ऐसी रीति और ऐसे समय के अन्दर, जो अधिनिर्णय में विनिर्दिष्ट हो, दी जाएगी ।
10. अधिग्रहण के आदेशों के विरुद्ध अपीलें-(1) धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा किए गए अधिग्रहण के आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, आदेश की तामील की तारीख से इक्कीस दिन के अन्दर केन्द्रीय सरकार के यहां अपील कर सकेगा :
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील दाखिल करने से पर्याप्त कारण से निवारित हुआ है, तो वह उक्त इक्कीस दिन की कालावधि के अवसान के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार सक्षम प्राधिकारी से रिपोर्ट मंगाने पर और पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने और ऐसी अतिरिक्त जांच, यदि कोई हो, करने के पश्चात् जैसी आवश्यक हो, ऐसे आदेश पारित कर सकेगी जैसे वह उचित समझती है और केन्द्रीय सरकार का आदेश अन्तिम होगा ।
(3) जहां कि उपधारा (1) के अधीन अपील की जाती है, वहां केन्द्रीय सरकार सक्षम प्राधिकारी के आदेश का प्रवर्तन ऐसी कालावधि के लिए और ऐसी शर्तों पर रोक सकेगी जैसे वह उचित समझती है ।
11. प्रतिकर सम्बन्धी अधिनिर्णयों के विरुद्ध अपीलें-धारा 8 के अधीन किए गए मध्यस्थ के अधिनिर्णय से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे अधिनिर्णय की तारीख से तीस दिन के अन्दर उस उच्च न्यायालय में अपील कर सकेगा जिसकी अधिकारिता में अधिगृहीत या अर्जित सम्पत्ति स्थित है :
परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त कारण से समय पर अपील दाखिल करने से निवारित हुआ है, तो वह उक्त तीस दिन की कालावधि के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा ।
12. सक्षम प्राधिकारी और मध्यस्थ को सिविल न्यायालयों की कतिपय शक्तियों का प्राप्त होना-सक्षम प्राधिकारी और धारा 8 के अधीन नियुक्त मध्यस्थ को, यथास्थिति, उस समय जब वह इस अधिनियम के अधीन जांच कर रहा है, या माध्यस्थम् कार्यवाही कर रहा है, निम्नलिखित बातों के सम्बन्ध से वे सब शक्तियां प्राप्त होंगी जो विचारण करते समय सिविल न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन प्राप्त होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसकी हाजिरी प्रवर्तित कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा कराना,
(ख) किसी दस्तावेज का प्रकटीकरण और पेश किया जाना,
(ग) साक्ष्य का शपथ पर लिया जाना,
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख का अध्यपेक्षित किया जाना,
(ङ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशनों का निकाला जाना ।
13. जानकारी अभिप्राप्त करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार या सक्षम प्राधिकारी धारा 3 या धारा 6 या धारा 7 या धारा 8 के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने की दृष्टि से आदेश द्वारा किसी व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेगा कि वह व्यक्ति ऐसे अधिकारी को, जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो, अपने पास की ऐसी कोई जानकारी दे जो ऐसी किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में विनिर्दिष्ट की जाए, जो इस अधिनियम के अधीन अधिगृहीत या अर्जित की गई है, या जिसका अधिगृहीत या अर्जित किया जाना आशयित है ।
14. प्रवेश करने और निरीक्षण करने की शक्ति-सक्षम प्राधिकारी या ऐसे प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त साधारण या विशेष आदेश द्वारा सशक्त कोई अधिकारी यह अवधारित करने के प्रयोजनों के लिए किसी सम्पत्ति में प्रवेश कर सकेगा तथा उसका निरीक्षण कर सकेगा कि क्या ऐसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में या इस अधिनियम के अधीन किए गए आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने की दृष्टि से कोई आदेश दिया जाना चाहिए और यदि दिया जाना है, तो वह किस रीति में दिया जाना चाहिए ।
15. सूचना और आदेशों की तामील-(1) इस धारा के उपबन्धों और किन्हीं नियमों के, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं, अधीन रहते हुए यह है कि इस अधिनियम के अधीन जो भी सूचना निकाली जाती है या जो भी आदेश दिया जाता है-
(क) वह ऐसी किसी सूचना या आदेश की दशा में, जो साधारण स्वरूप का है या जो व्यक्तियों के किसी वर्ग पर प्रभाव डालता है, राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा, और
(ख) ऐसी किसी सूचना या आदेश की दशा में, जिससे किसी व्यष्टिक, निगम या फर्म पर प्रभाव पड़ता है, उसकी तामील उस रीति से की जाएगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की, यथास्थिति, के प्रथम अनुसूची के आदेश 29 नियम 2 या आदेश 30 के नियम 3 में की तामील के लिए उपबन्धित है, तथा
(ग) ऐसी किसी सूचना या आदेश की दशा में, जिससे किसी व्यक्ति विशेष (जो निगम या फर्म नहीं है) पर प्रभाव पड़ता है, उसकी तामील ऐसे व्यक्ति पर-
(i) उसको उसकी परिदत्त या निविदत्त करके की जाएगी, या
(ii) यदि इस प्रकार उसे परिदत्त या निविदत्त नहीं किया जा सकता है तो उसकी तामील ऐसे व्यक्ति के किसी अधिकारी या कुटुम्ब के किसी वयस्क पुरुष सदस्य को परिदत्त या निविदत्त करे या उसकी एक प्रति उस परिसर के जिसके बारे में यह ज्ञात है कि उसमें उस व्यक्ति ने अन्तिम बार निवास किया था, या कारबार किया था या व्यक्तिगत रूप से अभिलाभों के लिए कार्य किया है, बाह्य द्वार या किसी सहजदृश्य भाग पर लगा कर की जाएगी, या इन साधनों द्वारा तामील न हो पाने पर, या
(iii) डाक द्वारा,
तामील की जाएगी ।
(2) जहां कि सम्पत्ति का स्वामित्व विवादग्रस्त है या जहां कि सम्पत्ति में हितबद्ध व्यक्तियों का आसानी से पता नहीं चलाया जा सकता, और सूचना या आदेश की तामील असम्यक् विलम्ब के बिना नहीं की जा सकती, वहां सूचना या आदेश की तामील राजपत्र में प्रकाशित करके, और जहां संभव हो, वहां उस सम्पत्ति के जिससे इसका सम्बन्ध है, किसी सहजदृश्य भाग पर उसकी एक प्रति लगा कर, की जाएगी ।
16. सुखाचार में विघ्न का न डाला जाना-इस अधिनियम के अधीन अधिगृहीत या अर्जित किसी सम्पत्ति में हितबद्ध कोई व्यक्ति सक्षम प्राधिकारी की पूर्व लिखित सम्मति के बिना या मरम्मत करने या नगरपालिक अपेक्षा का अनुपालन करने के प्रयोजनों के लिए ऐसा करने के सिवाय जानबूझकर ऐसी सम्पत्ति से संलग्न सुविधा या सुखाचार में विघ्न न डालेगा और न उसके साथ स्थायी उपयोग के लिए उपबन्धित किसी वस्तु को हटाएगा, नष्ट करेगा या बेकार करेगा और न सम्पत्ति के लिए उपबन्धित कोई प्रदाय या सेवा को बन्द करेगा या बन्द करवाएगा ।
17. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी शर्तों पर, यदि कोई हों, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हों, वे शक्तियां जो इस अधिनियम *** के अधीन उस सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य हैं उस सरकार के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा या [राज्य सरकार या राज्य सरकार के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा] भी प्रयुक्त की जाएंगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई सभी अधिसूचनाएं यथाशक्यशीघ्र संसद् के समक्ष रखी जाएंगी ।
18. सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही के लिए संरक्षण-(1) कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, किसी भी ऐसी बात के बारे में जो इस अधिनियम या तद्धीन किए गए किसी आदेश के अनुसार सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
(2) ऐसे किसी नुकसान के लिए, जो इस अधिनियम के अनुसार या तद्धीन दिए गए किसी आदेश के अनुसार सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात से हुआ है या होने वाला है, कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या सक्षम प्राधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।
19. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन-इस अधिनियम में अन्यथा अभिव्यक्ततः उपबन्धित के सिवाय, किसी विषय के बारे में, जिसे सक्षम प्राधिकारी या मध्यस्थ इस अधिनियम के द्वारा या अधीन अवधारित करने के लिए सशक्त है, किसी न्यायालय को अधिकारिता प्राप्त नहीं होगी, और इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली कार्यवाही के बारे में कोई व्यादेश किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा मंजूर नहीं किया जाएगा ।
20. अपराधों के लिए शास्ति-जो कोई भी इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम या इस अधिनियम के अधीन दिए गए किसी आदेश या निदेश के किसी उपबन्ध का उल्लंघन करेगा या इस अधिनियम के अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के विधिपूर्ण प्रयोग में बाधा डालेगा, वह जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
21. कतिपय व्यक्तियों का लोक सेवक होना-सक्षम प्राधिकारी, प्रत्येक मध्यस्थ और केन्द्रीय सरकार या समक्ष प्राधिकारी द्वारा सशक्त प्रत्येक अधिकारी जब वे इस अधिनियम के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग कर रहे हों या किसी कर्तव्य का पालन कर रहे हों, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
22. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्ववर्ती शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी बातों या उनमें से किसी के बारे में, उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) धारा 3 या धारा 6 के अधीन जांच करने में सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया,
(ख) इस अधिनियम के अधीन माध्यस्थम्, कार्यवाहियों और अपीलों में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया,
(ग) प्रतिकर की रकम अवधारित करने के लिए अनुसरित किए जाने वाले सिद्धान्त और ऐसे प्रतिकर के देने की पद्धति,
(घ) इस अधिनियम के अधीन मध्यस्थ के समक्ष और अपील में, कार्यवाहियों के खर्चों के प्रभाजन करने के वास्ते अनुसरण किए जाने वाले सिद्धान्त,
(ङ) सूचनाओं और आदेशों की तामील की रीति,
(च) अन्य कोई विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व, दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
23. कतिपय अधिग्रहणों और अर्जनों का विधिमान्यकरण-(1) समस्त स्थावर सम्पत्ति, जिसके बारे में यह तात्पर्यित है उसे किसी प्रान्तीय या राज्य अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा ऐसे लोक प्रयोजन के लिए, जो संघ का प्रयोजन है, अधिगृहीत किया जाना है, 1952 की जनवरी के पच्चीसवें दिन के ठीक पूर्व केन्द्रीय सरकार या उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा जिसका उपयोग किया गया या दखल लिया गया था, उस तारीख से इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन सम्यक् रूप से अधिगृहीत सम्पत्ति समझी जाएगी और किसी न्यायालय के निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी ऐसा अधिग्रहण सदैव ऐसे विधिमान्य समझा जाएगा मानो कि वह अधिनियम अधिग्रहण की तारीख पर और से प्रवृत्त रहा हो और सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिग्रहण इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से किया गया हो और तद्नुकूल इस अधिनियम के सब उपबन्ध लागू होंगे :
परन्तु 1952 की जनवरी के पच्चीसवें दिन के पूर्व अधिग्रहण की किसी कालावधि के लिए ऐसी किसी सम्पत्ति के बारे में प्रतिकर के संदाय के लिए सब करार और अधिनिर्णय, जो उस तारीख से ठीक पूर्व प्रवृत्त थे, विधिमान्य होंगे और सदैव विधिमान्य रहे समझे जाएंगे तथा प्रवर्तन में बने रहेंगे और वे उस तारीख के पश्चात् अधिग्रहण की किसी कालावधि के लिए उस सम्पत्ति से सम्बन्धित प्रतिकर के संदाय को लागू होंगे ।
(2) किसी तत्समय प्रवृत्त अधिनियमिति के अधीन स्थावर सम्पत्ति का प्रत्येक अधिग्रहण, जिसकी बाबत यह तात्पर्यित है कि वह किसी राज्य सरकार द्वारा किसी ऐसे लोक प्रयोजन के लिए, जो संघ का एक प्रयोजन है, इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व किया गया था, और ऐसे प्रारंभ से ठीक पूर्व केन्द्रीय सरकार या उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा जिसका उपयोग किया गया था, दखल लिया गया था, उस अधिनियमिति या आदेश में, जिसके अधीन अर्जन किया गया है, कोई त्रुटि या अविधिमान्यता होते हुए भी सभी प्रयोजनों के लिए ऐसे विधिमान्य समझा जाएगा मानो उक्त अधिनियमिति या आदेश के उपबन्ध इस धारा में सम्मिलित और अधिनियमित हों और अर्जन की तारीख को और से यह धारा प्रवर्तन में रही हो ।
24. निरसन और व्यावृत्ति-(1) दि रिक्वीजीशन्ड लैण्ड (कन्टिन्युएन्स आफ पावर्स) ऐक्ट, 1947 (1947 का 17), दि देहली प्रेमिसेज (रिक्वीजिशन एण्ड इविक्शन) ऐक्ट, 1947 (1947 का 49) और दि रिक्वीजिशिनिंग एण्ड एक्वीजीशन आफ इम्मूवेबल प्रापर्टी आर्डिनेंस, 1952 (1952 का 3) एतद्द्वारा किए निरसित जाते हैं ।
(2) शंकाओं का निराकरण करने के लिए एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि जो कोई सम्पत्ति ऐसे निरसन से ठीक पूर्व उक्त अधिनियमों में से किसी अधिनियम या उक्त अध्यादेश के उपबन्धों के अधीन अधिग्रहण के अधीन थी वह इस अधिनियम के प्रारम्भ पर इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन अधिगृहीत सम्पत्ति समझी जाएगी, और तद्नुकूल इस अधिनियम के सब उपबन्ध लागू होंगे :
परन्तु-
(क) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अधिग्रहण की किसी कालावधि के लिए किसी ऐसी सम्पत्ति के बारे में प्रतिकर के दिए जाने के लिए सब करार और अधिनिर्णय जो ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व प्रवृत्त थे, प्रवृत्त बने रहेंगे और ऐसे प्रारंभ के पश्चात् अधिग्रहण की किसी कालावधि के लिए उस सम्पत्ति से सम्बन्धित प्रतिकर के दिए जाने को लागू होंगे ;
(ख) उक्त अधिनियमों में से किसी अधिनियम या उक्त अध्यादेश के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में किया गया कोई कार्य या की गई कार्यवाही (जिसके अन्तर्गत दिए गए आदेश, निकाली गई अधिसूचनाएं या बनाए गए नियम आते हैं) जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में ऐसे किया गया या की गई समझी जाएगी, मानो उस दिन, जब ऐसा कार्य किया गया था, या ऐसी कार्यवाही की गई थी, यह अधिनियम प्रवृत्त था ।
[25. 1962 के अधिनियम 51 के अधीन कतिपय अधिग्रहणों के सम्बन्ध में विशेष उपबन्ध-(1) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार द्वारा या ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जिसको इस निमित्त उस सरकार द्वारा भारत रक्षा अधिनियम, 1962 (1962 का 51) तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन शक्तियों का प्रत्यायोजन किया गया है, अधिगृहीत की गई किसी स्थावर सम्पत्ति के (जिसके अन्तर्गत उक्त अधिनियम के अधीन अधिगृहीत की गई समझी जाने वाली स्थावर सम्पत्ति आती है) बारे में, जो 1968 की दस जनवरी के पूर्व ऐसे अधिग्रहण से निर्मुक्त नहीं की गई थी, यह समझा जाएगा कि उसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के उपब्धों के अधीन उस तारीख से उस प्रयोजन के लिए अधिगृहीत किया गया है जिस प्रयोजन के लिए ऐसी सम्पत्ति उक्त तारीख से ठीक पूर्व धृत थी और तद्नुकूल इस अधिनियम के सभी उपबन्ध लागू होंगे :
परन्तु-
(क) वे सब अवधारण, करार और अधिनिर्णय, जो उक्त तारीख के पूर्व अधिग्रहण की किसी कालावधि के लिए किसी ऐसी सम्पत्ति की बाबत प्रतिकर की अदायगी के विषय में हैं, तथा ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त थे, प्रवृत्त बने रहेंगे तथा उक्त तारीख से अधिग्रहण की कालावधि की बाबत उस सम्पत्ति लेखे प्रतिकर की अदायगी को लागू रहेंगे ;
(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा या किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जिसको भारत रक्षा अधिनियम, 1962 के अध्याय 6 के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में उस सरकार द्वारा शक्तियों का प्रत्यायोजन इस निमित्त किया गया है, की गई कोई बात या कार्रवाई (जिसके अन्तर्गत दिए गए आदेश, निकाली गई अधिसूचनाएं या बनाए गए नियम आते हैं) जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत नहीं हैं, इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में ऐसे किया गया या की गई समझी जाएगी, मानो उस तारीख को, जिसको ऐसा कार्य किया गया था, या ऐसी कार्यवाही की गई थी, यह धारा प्रवृत्त थी ।
(2) उपधारा (1) में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय भारत रक्षा अधिनियम, 1962 और तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबन्ध वहां तक, जहां तक कि वे उपबन्ध इस प्रकार की किसी स्थावर सम्पत्ति के अधिग्रहण से सम्बन्धित हैं, जैसी उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, उन बातों के बारे में प्रवृत्त रहने के सिवाय 1968 की दस जनवरी से प्रवृत्त न रहेंगे जो ऐसे प्रवृत्त न रह जाने के पूर्व की गई हैं या की जाने से छोड़ दी गई हैं और साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 ऐसे प्रवृत्त न रह जाने के बारे में ऐसे लागू होगी मानो ऐसा प्रवृत्त न रहना केन्द्रीय अधिनियम द्वारा किया गया किसी अधिनियमिति का निरसन हो ।]
[26. 1971 के अधिनियम 42 के अधीन कतिपय अधिग्रहणों के सम्बन्ध में विशेष उपबन्ध-(1) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार द्वारा या ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जिसको इस निमित्त उस सरकार द्वारा भारत रक्षा अधिनियम, 1971 (1971 का 42) तथा तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन शक्तियों का प्रत्यायोजन किया गया है, अधिगृहीत की गई या अधिगृहीत की गई तात्पर्यित किसी स्थावर सम्पत्ति के बारे में (जिसके अन्तर्गत उक्त अधिनियम के अधीन अधिगृहीत की गई समझी जाने वाली स्थावर सम्पत्ति है) जो नियत दिन के पूर्व ऐसे अधिग्रहण से निर्मुक्त नहीं की गई है, यह समझा जाएगा कि वह-
(i) यदि ऐसी सम्पत्ति 1977 के मार्च के इक्कीसवें दिन को या उसके पूर्व अधिगृहीत की गई थी तो उस तारीख से, और
(ii) यदि ऐसी सम्पत्ति ऐसी तारीख के पश्चात् किसी समय अधिगृहीत की गई थी तो उसके अधिग्रहण की तारीख से,
सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उस प्रयोजन के लिए अधिगृहीत की गई है जिस प्रयोजन के लिए ऐसी सम्पत्ति नियत तारीख के ठीक पूर्व धृत थी और तद्नुकूल इस अधिनियम के सभी उपबन्ध लागू होंगे :
परन्तु इस अधिनियम के अधीन इस प्रकार अधिगृहीत समझी गई किसी सम्पत्ति के बारे में इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर का अवधारण करने में उस राशि या राशियों में से, यदि कोई हों, जो धारा 8 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं बातों में हितबद्ध व्यक्ति की प्रतिपूर्ति करने के लिए आवश्यक पाई जाएं, उतनी राशि या राशियां, यदि कोई हों, कम कर दी जाएंगी जो ऐसी बातों के लिए ऐसी सम्पत्ति के बारे में प्रतिकर के रूप में भारत रक्षा अधिनियम, 1971 (1971 का 42) और तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन संदत्त की गई हों या संदेय हों ।
(2) उपधारा (1) में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, भारत रक्षा अधिनियम 1971 (1971 का 42) और तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबन्ध वहां तक, जहां तक कि वे इस प्रकार की किसी स्थावर सम्पत्ति के अधिग्रहण से संबंधित हैं, जैसी उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, उन बातों के बारे में, प्रवृत्त रहने के सिवाय 1977 के मार्च के इक्कीसवें दिन से प्रवृत्त रहेंगे, जो ऐसे प्रवृत्त न रह जाने के पूर्व की गई हैं या जिन्हें करने का लोप किया गया है और साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 ऐसे प्रवृत्त न रह जाने के बारे में ऐसे लागू होंगी मानो ऐसा प्रवृत्त न रहना केन्द्रीय अधिनियम द्वारा किया गया किसी अधिनियमिति का निरसन हो ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में नियत दिन" से सितम्बर, 1977 का तेईसवां दिन अभिप्रेत है ।]
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