अधिगृहीत भूमि (प्रतिकर प्रभाजन) अधिनियम, 1949
(1949 का अधिनियम संख्यांक 51)1
[10 दिसम्बर, 1949]
अधिगृहीत भूमि के बारे में देय प्रतिकर के प्रभाजन के लिए
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
यतः शंकाएं उत्पन्न हुई हैं कि क्या भारत रक्षा अधिनियम, 1939 (1939 का 35) की धारा 19 के अधीन या उक्त धारा जिस रूप में अधिगृहीत भूमि (शक्तियों का चालू रहना) अधिनियम, 1947 (1947 का 17)2 की धारा 6 के प्रयोजन के लिए प्रवृत्त समझी जाती है, उस रूप में उसके अधीन नियुक्त मध्यस्थ को यह शक्ति प्राप्त है या नहीं कि किसी अधिगृहीत भूमि के बारे में देय प्रतिकर उसमें हितबद्ध व्यक्तियों में प्रभाजित कर दे;
और यतः उक्त शंकाओं का समाधान करने तथा सभी ऐसे मामलों में प्रतिकर के प्रभाजन के लिए अभिव्यक्ततः उपबन्ध करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम अधिगृहीत भूमि (प्रतिकर प्रभाजन) अधिनियम, 1949 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में,
(क) किसी अधिगृहीत भूमि के सम्बन्ध में “हितबद्ध व्यक्ति" पद के अन्तर्गत वे सब व्यक्ति आते हैं जो भारत रक्षा अधिनियम, 1939 (1939 का 35) की धारा 19 के उपबन्धों के अधीन या अधिगृहीत भूमि (शक्तियों का चालू रहना) अधिनियम, 1947 (1947 का 17) की धारा 6 के उपबन्धों के अधीन भूमि के अधिग्रहण या अधिगृहीत भूमि के अर्जन लेखे दिए जाने वाले प्रतिकर में हित का दावा करते हैं;
(ख) “अधिगृहीत भूमि" पद से कोई स्थावर सम्पत्ति अभिप्रेत है जो भारत रक्षा अधिनियम, 1939 (1939 का 35) के अधीन बने नियमों के अन्तर्गत किए गए किसी अधिग्रहण के अधीन है या थी या अधिगृहीत भूमि (शक्तियों का चालू रहना) अधिनियम, 1947 (1947 का 17)2 के अधीन ऐसी बनी रही ।
3. प्रतिकर का प्रभाजन-(1) जहां किसी अधिगृहीत भूमि में कई व्यक्ति हितबद्ध हैं, वहां धारा 2 में वर्णित अधिनियमों में से किसी भी अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी मध्यस्थ के लिए जो धारा 2 के खण्ड (क) में वर्णित धाराओं में से किसी धारा के अनुसरण में नियुक्त किया गया है, यह विधिपूर्ण होगा, और सदैव विधिपूर्ण रहा समझा जाएगा कि वह, यथास्थिति, भूमि के अधिग्रहण या अर्जन के बारे में देय प्रतिकर को हितबद्ध व्यक्तियों में अपने अधिनिर्णय द्वारा प्रभाजित करे ।
(2) जहां धारा 2 के खण्ड (क) में वर्णित धाराओं में से किसी भी धारा के अनुसरण में नियुक्त मध्यस्थ ने सितम्बर, 1949 के 13वें दिन के पूर्व देय प्रतिकर अवधारित करते हुए कोई अधिनिर्णय दिया है, किन्तु देय प्रतिकर का प्रभाजन नहीं किया है, और ऐसा प्रतिकर दिया नहीं गया है, वहां वह सरकार जिसके द्वारा ऐसा प्रतिकर दिया जाना है, या तो स्वेच्छा से या किसी हितबद्ध व्यक्ति के आवेदन पर, उस प्रतिकर को हितबद्ध व्यक्तियों में प्रभाजित करने के लिए, उसे या किसी अन्य मध्यस्थ को नियुक्त कर सकेगी, और इस प्रकार नियुक्त मध्यस्थ के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह प्रभाजन के बारे में अनुपूरक अधिनिर्णय करे ।
- इसका विस्तार हजारीबाग और मानभूम जिलों, पलामू जिले के सदर सब-डिवीजन, सिंहभूम जिले के डालभूम सब-डिवीजन और बिहार राज्य के संथाल परगना के गौड्डा और देवघर सब-डिवीजन और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले पर आमेलित-क्षेत्र (विधि) अधिनियम, 1954 (1954 का 20) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किया गया ।
- 1952 के अधिनियम सं० 30 द्वारा निरसित किया गया ।
(3) उक्त उपधारा (2) के अधीन किए गए अनुपूरक अधिनिर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील होगी ।
(4) धारा 19 के अधीन बने नियमों के उपबन्ध, जहां तक वे लागू हों, इस धारा के अधीन दिए गए माध्यस्थम् अधिनिर्णयों को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उक्त धारा 19 के अधीन माध्यस्थम् और अधिनिर्णयों के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।
4. 1949 के अध्यादेश 22 का निरसन-(1) दि रिक्वीजीशन्ड लैण्ड (अपोर्शन्मेण्ट आफ कम्पेन्सेशन) आर्डिनेन्स,1949 (1949 का 22) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में किए गए किसी कार्य या की गई किसी कार्यवाही के बारे में यह समझा जाएगा कि उसे इस अधिनियम द्वारा उसके अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में किया गया है या चलाया गया है मानो कि यह अधिनियम उस दिन को जिसको ऐसी बात की गई थी, या ऐसी कार्यवाही चलाई गई थी, प्रवृत्त था ।
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