राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1993
(1993 का अधिनियम संख्यांक 73)
[29 दिसम्बर, 1993]
सारे देश में अध्यापक शिक्षा प्रणाली, [जिसके अंतर्गत विद्यालय
अध्यापकों की अर्हताएं भी हैं,] का योजनाबद्ध और समवन्वित
विकास करने तथा अध्यापक शिक्षा प्रणाली में मानक और
स्तरमानों का विनियमन और उन्हें समुचित रूप में
बनाए रखने की दृष्टि से राष्ट्रीय अध्यापक
शिक्षा परिषद् की स्थापना करने का
और उनसे संबंधित विषयों का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चवालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1993 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
[(4) इस अधिनियम में यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस अधिनियम के उपबंध निम्नलिखित को लागू होंगे-
(क) संस्थाओं ;
(ख) संस्थाओं के छात्र और अध्यापक ;
(ग) पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक या वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा देने वाले विद्यालय और इस बात पर ध्यान दिए बिना कि वे किसी भी नाम से ज्ञात हों, ऐसे महाविद्यालय, जो वरिष्ठ माध्यमिक या इंटरमीडिएट शिक्षा प्रदान करते हैं ; और
(घ) खंड (ग) में निर्दिष्ट विद्यालयों और महाविद्यालयों के अध्यापक ।]
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) नियत दिन" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् की स्थापना की तारीख अभिप्रेत है ;
(ख) अध्यक्ष" से धारा 3 की उपधारा (4) के खंड (क) के अधीन नियुक्त परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;
(ग) परिषद्" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् अभिप्रेत है ;
(घ) परीक्षा निकाय" से ऐसा कोई विश्वविद्यालय, अभिकरण या प्राधिकारी अभिप्रेत है जिससे अध्यापक शिक्षा अर्हताओं में परीक्षाओं के संचालन के लिए कोई संस्था सहबद्ध है ;
(ङ) संस्था" से ऐसी कोई संस्था अभिप्रेत है जो अध्यापक शिक्षा में पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रस्थापित करती है ;
[(ङक) स्थानीय प्राधिकारी" से कोई नगर निगम, नगरपालिका समिति, नगरपालिका परिषद्, जिला परिषद्, जिला बोर्ड या नगर पंचायत या पंचायत अथवा ऐसा अन्य प्राधिकारी (चाहे जिस नाम से ज्ञात हो) अभिप्रेत है, जो विधिक रूप से किसी नगरपालिका या स्थानीय निधि के नियंत्रण या प्रबंध के लिए हकदार है या सरकार द्वारा न्यस्त किया गया है ;]
(च) सदस्य" से परिषद् का कोई सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं ;
(छ) सदस्य-सचिव" से धारा 3 की उपधारा (4) के खंड (ग) के अधीन नियुक्त परिषद् का सदस्य-सचिव अभिप्रेत है ;
(ज) विहित" से धारा 31 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(झ) मान्यताप्राप्त संस्था" से धारा 14 के अधीन परिषद् द्वारा मान्यताप्राप्त कोई संस्था अभिप्रेत है ;
(ञ) प्रादेशिक समिति" से धारा 20 के अधीन स्थापित समिति अभिप्रेत है ;
(ट) विनियम" से धारा 32 के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ;
[(टक) विद्यालय" से पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक या वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा प्रदान वाला कोई मान्यताप्राप्त विद्यालय या वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा प्रदान करने वाला कोई महाविद्यालय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं-
(i) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार अथवा किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा स्थापित, उसके स्वामित्वाधीन और नियंत्रणाधीन कोई विद्यालय ;
(ii) केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी से अपने संपूर्ण व्यय या उसके किसी भाग को पूरा करने के लिए सहायता या अनुदान प्राप्त करने वाला कोई विद्यालय ;
(iii) केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी से अपने संपूर्ण व्यय या उसके किसी भाग को पूरा करने के लिए सहायता या अनुदान न प्राप्त करने वाला कोई विद्यालय ;]
(ठ) अध्यापक शिक्षा" से विद्यालयों में पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक प्रक्रमों पर अध्यापन करने के लिए व्यक्तियों को तैयार करने के लिए शिक्षा, अनुसंधान या प्रशिक्षण के कार्यक्रम अभिप्रेत हैं और इसके अंतर्गत अनौपचारिक शिक्षा, अंशकालिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा तथा पत्राचार शिक्षा है ;
(ड) अध्यापक शिक्षा अर्हता" से इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार विश्वविद्यालय या परीक्षा निकाय द्वारा प्रदत्त अध्यापक शिक्षा में उपाधि, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र अभिप्रेत है ;
(ढ) विश्वविद्यालय" से विश्वद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 2 के खंड (च) के अधीन परिभाषित कोई विश्वविद्यालय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत ऐसी संस्था है जो उस अधिनियम की धारा 3 के अधीन समझा गया विश्वविद्यालय है ;
(ण) उपाध्यक्ष" से धारा 3 की उपधारा (4) के खंड (ख) के अधीन नियुक्त परिषद् का उपाध्यक्ष अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
परिषद् की स्थापना
3. परिषद् की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् के नाम से ज्ञात एक परिषद् की स्थापना की जाएगी ।
(2) परिषद् पूर्वोक्त नाम की एक निगमित निकाय होगी जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और उसे संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगी और उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) परिषद् का प्रधान कार्यालय दिल्ली में होगा और परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, भारत में अन्य स्थानों पर प्रादेशिक कार्यालय स्थापित कर सकेगी ।
(4) परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) अध्यक्ष, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ;
(ख) उपाध्यक्ष, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ;
(ग) सदस्य-सचिव, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ;
(घ) भारत सरकार के शिक्षा से संबंधित विभाग का सचिव, पदेन ;
(ङ) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 4 के अधीन स्थापित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष या उसके द्वारा नामनिर्दिष्ट कोई सदस्य, पदेन ;
(च) निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, पदेन ;
(छ) निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षणिक योजना और प्रशासन संस्थान, पदेन ;
(ज) सलाहकार (शिक्षा), योजना आयोग, पदेन ;
(झ) अध्यक्ष, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, पदेन ;
(ञ) भारत सरकार के शिक्षा से संबंधित विभाग का वित्त सलाहकार, पदेन ;
(ट) सदस्य-सचिव, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, पदेन ;
(ठ) सभी प्रादेशिक समितियों के अध्यक्ष, पदेन ;
(ड) केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे तेरह व्यक्ति, जिनके पास शिक्षा या अध्यापन के क्षेत्र में अनुभव और ज्ञान है, निम्नलिखित में से नियुक्त किए जाएंगे :-
(i) विश्वविद्यालयों में शिक्षा संकायों के अध्यक्ष और शिक्षा के आचार्य चार ;
(ii) माध्यमिक अध्यापक शिक्षा में विशेषज्ञ एक ;
(iii) पूर्व प्राथमिक और प्राथमिक अध्यापक शिक्षा में विशेषज्ञ तीन ;
(iv) अनौपचारिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा में विशेषज्ञ दो ;
(v) विहित रीति में चक्रानुक्रम से प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, भाषा विज्ञान, व्यावसायिक शिक्षा, कार्य अनुभव, शैक्षणिक, प्रौद्योगिकी और विशेष शिक्षा के क्षेत्रों में विशेषज्ञ तीन ;
(ढ) नौ सदस्य, जो राज्यों और संघ राज्यक्षेत्र प्रशासनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित रीति से नियुक्त किए जाएंगे ;
(ण) संसद् के तीन सदस्य, जिनमें से एक सदस्य राज्य सभा के सभापति द्वारा और दो सदस्य लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ;
(त) तीन सदस्य, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के अध्यापकों तथा मान्यताप्राप्त संस्थाओं के अध्यापकों में से नियुक्त किए जाएंगे ।
(5) यह घोषित किया जाता है कि परिषद् के सदस्य का पद उसके धारक को संसद् के किसी भी सदन का सदस्य चुने जाने या होने के लिए निरर्हित नहीं करेगा ।
4. सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें-(1) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य-सचिव पूर्णकालिक आधार पर पद धारण करेंगे ।
(2) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य-सचिव की पदावधि चार-चार वर्ष या साठ वर्ष की आयु पूरी होने तक, इनमें से जो भी पहले हो, होगी ।
(3) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य-सचिव की सेवा की शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।
(4) धारा 3 की उपधारा (4) के खंड (क) से (ठ) तक तथा खंड (ढ) और खंड (ण) में विनिर्दिष्ट सदस्यों से भिन्न सदस्यों की पदावधि दो वर्ष या नई नियुक्ति होने तक, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, होगी और ऐसे सदस्यों की सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।
(5) यदि अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग अथवा बीमारी या अन्य असमर्थता की वजह से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थता के कारण उसके पद में कोई आकस्मिक रिक्ति हो जाती है तो तत्समय उस रूप में पद धारण करने वाला उपाध्यक्ष, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा और जब तक कि इसके पूर्व अध्यक्ष के रूप में किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त नहीं कर दिया जाता है, वह अध्यक्ष का पद उस व्यक्ति की, जिसके स्थान पर उसे इस प्रकार कार्य करना है, पदावधि के शेष भाग के लिए धारण करेगा ।
(6) यदि उपाध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य की मृत्यु, पदत्याग अथवा बीमारी या अन्य असमर्थता की वजह से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थता के कारण उसके पद में कोई आकस्मिक रिक्ति हो जाती है, तो ऐसी रिक्ति नई नियुक्ति करके भरी जाएगी, और इस प्रकार नियुक्ति किया गया व्यक्ति उस व्यक्ति की, जिसके स्थान पर ऐसे व्यक्ति की इस प्रकार नियुक्ति हुई है, पदावधि के शेष भाग के लिए पद धारण करेगा ।
(7) अध्यक्ष, परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करने के अतिरिक्त, परिषद् की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो परिषद् द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो विहित किए जाएं ।
(8) उपाध्यक्ष ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जो अध्यक्ष द्वारा समय-समय पर उसे सौंपे जाएं ।
5. सदस्य के पद के लिए निरर्हता-कोई व्यक्ति सदस्य के रूप नियुक्त किए जाने के लिए निर्हित होगा, यदि वह :-
(क) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है, और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्ग्रस्त है ; या
(ख) अनुन्मोचित दिवालिया है ; या
(ग) विकृतचित्त का है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है ; या
(घ) सरकार या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगमित निकाय की सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है ; या
(ङ) केन्द्रीय सरकार की राय में परिषद् में ऐसा वित्तीय या अन्य हित रखता है जिसके कारण सदस्य के रूप में उसके द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ।
6. सदस्य के पद में रिक्ति-केन्द्रीय सरकार किसी सदस्य को हटा देगी, यदि वह, -
(क) धारा 5 में वर्णित किसी निरर्हता के अधीन हो जाता है :
परन्तु कोई भी सदस्य इस आधार पर नहीं हटाया जाएगा कि वह उस धारा के खंड (ङ) में वर्णित निरर्हता के अधीन हो गया है, जब तक कि उसे इस विषय में सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया गया हो ; या
(ख) कार्य करने से इंकार करता है या कार्य करने में असमर्थ हो जाता है ; या
(ग) परिषद् से अनुपस्थित होने की इजाजत लिए बिना परिषद् के तीन लगातार अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है ; या
(घ) उसने केन्द्रीय सरकार की राय में अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है कि उसका पद पर बने रहना लोकहित के लिए अहितकर है :
परन्तु इस खंड के अधीन कोई भी सदस्य तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे इस विषय में सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।
7. परिषद् के अधिवेशन-(1) परिषद् का अधिवेशन ऐसे समय और ऐसे स्थानों पर होगा और वह उसके अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है) के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगी जिन्हें विनियमों द्वारा उपबंधित किया जाए :
परन्तु परिषद् का अधिवेशन प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार होगा ।
(2) अध्यक्ष और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा ।
(3) यदि किसी कारणवश अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों परिषद् के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ हैं, तो अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया कोई अन्य सदस्य उस अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(4) ऐसे सभी प्रश्नों का, जो परिषद् के किसी अधिवेशन में उठते हैं, विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा तथा मतों के बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा और वह उस मत का प्रयोग करेगा ।
8. रिक्तियों, आदि से परिषद् की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-परिषद् का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि :-
(क) परिषद् में कोई रिक्ति है, या उसके गठन में कोई त्रुटि है ; या
(ख) परिषद् के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है ; या
(ग) परिषद् की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।
9. सहयोजित करने की शक्ति-(1) परिषद्, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, तीन से अनधिक ऐसे व्यक्तियों को जिनकी सहायता या सलाह की वह इस अधिनियम के उपबंधों से किसी को कार्यान्वित करने में वांछा करे, सहयोजित कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए परिषद् द्वारा सहयोजित व्यक्ति को, उस प्रयोजन से सुसंगत विचार-विमर्श में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे परिषद् के किसी अधिवेशन में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा ।
10. परिषद् के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति-(1) परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए अपने को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, ऐसे विनियमों के जो इस निमित्त बनाए जाएं अधीन रहते हुए उतने अधिकारी और अन्य कर्मचारी (प्रतिनियुक्ति पर या अन्यथा) नियुक्त करेगी जितने वह आवश्यक समझे :
परन्तु केन्द्रीय सरकार में समूह क" पदों के समतुल्य पदों का प्रवर्ग, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन होगा ।
(2) परिषद् द्वारा नियुक्त प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी, सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन होगा जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।
11. परिषद् के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन-परिषद् के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष के या परिषद् द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे और परिषद् द्वारा निकाली गई ऐसी सभी लिखतें परिषद् के सदस्य-सचिव के या अध्यक्ष द्वारा इस निमित्त वैसी ही रीति से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।
अध्याय 3
परिषद् के कृत्य
12. परिषद् के कृत्य-परिषद् का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे सभी उपाय करे जो वह अध्यापक शिक्षा के योजनाबद्ध और समन्वित विकास को सुनिश्चित करने तथा अध्यापक शिक्षा के स्तरमानों के अवधारण और उनको बनाए रखने के लिए ठीक समझे और इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के प्रयोजनों के लिए, परिषद् :-
(क) अध्यापक शिक्षा के विभिन्न पहलुओं के संबंध में सर्वेक्षण और अध्ययन कर सकेगी तथा उसका परिणाम प्रकाशित कर सकेगी ;
(ख) अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में उपयुक्त योजनाओं और कार्यक्रमों की तैयारी के विषय में केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मान्यताप्राप्त संस्थाओं को सिफारिशें कर सकेगी ;
(ग) देश में अध्यापक शिक्षा और उसके विकास का समन्वय और उसको मानिटर कर सकेगी ;
(घ) । । । मान्यताप्राप्त संस्थाओं में अध्यापक के रूप में नियोजित करने के लिए किसी व्यक्ति की न्यूनतम अर्हताओं के संबंध में मार्गदर्शक सिद्धांत अधिकथित कर सकेगी ;
(ङ) अध्यापक शिक्षा में पाठ्यक्रमों या प्रशिक्षणों के किसी विनिर्दिष्ट प्रवर्ग के लिए मानक, जिसके अन्तर्गत उसमें प्रवेश के लिए न्यूनतम पात्रता मानदंड और अभ्यर्थियों के चयन की पद्धति, पाठ्यक्रम की अवधि, पाठ्यक्रम की विषयवस्तु और पाठ्यक्रम का ढंग है, अधिकथित कर सकेगी ;
(च) मान्यताप्राप्त संस्थाओं द्वारा अनुपालन के लिए, नए पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रारम्भ करने के लिए, तथा शारीरिक और शिक्षण संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराने, स्टाफ पैटर्न, कर्मचारिवृन्द की अर्हताओं के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत अधिकथित कर सकेगी ;
(छ) अध्यापक शिक्षा अर्हताओं में परीक्षाओं, ऐसी परीक्षाओं में प्रवेश के लिए मानदंड और पाठ्यक्रमों या प्रशिक्षण की स्कीमों के संबंध में स्तरमान अधिकथित कर सकेगी ;
(ज) मान्यताप्राप्त संस्थाओं द्वारा प्रभार्य अध्यापन-फीस और अन्य फीसों के संबंध में मार्गदर्शक सिद्धांत अधिकथित कर सकेगी ;
(झ) अध्यापक शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अभिनव परिवर्तन और अनुसंधान का संवर्धन और संचालन कर सकेगी तथा उसके परिणामों का प्रसार कर सकेगी ;
(ञ) परिषद् द्वारा अधिकथित मानकों, मार्गदर्शक सिद्धांतों और स्तरमानों के क्रियान्वयन की कालिकतः परीक्षा और पुनर्विलोकन कर सकेगी और मान्यता प्राप्त संस्थाओं को उपयुक्त रूप में सलाह दे सकेगी ;
(ट) मान्यताप्राप्त संस्थाओं को जवाबदार बनाने के लिए उपयुक्त कार्य निष्पादन, मूल्यांकन पद्धति, मानक और क्रियाविधि विकसित कर सकेगी ;
(ठ) अध्यापक शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिए स्कीमें बना सकेगी और अध्यापक विकास कार्यक्रमों के लिए मान्यता प्राप्त संस्थाओं का पता लगा सकेगी और नई संस्थाएं स्थापित कर सकेगी ;
(ड) अध्यापक शिक्षा के वाणिज्यीकरण को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा सकेगी ; और
(ढ) ऐसे अन्य कृत्य कर सकेगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
[12क. विद्यालय शिक्षकों की शिक्षा के न्यूनतम स्तर अवधारित करने की परिषद् की शक्ति-विद्यालयों में शिक्षा स्तर को बनाए रखने के प्रयोजन के लिए परिषद्, विनियमों द्वारा केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा स्थापित, चलाए जा रहे, सहायता प्राप्त या मान्यताप्राप्त किसी पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक या इंटरमीडिएट विद्यालय या महाविद्यालय, चाहे जिस नाम से ज्ञात हों, में अध्यापकों के रूप में भर्ती करने के लिए व्यक्तियों की अर्हताएं अवधारित कर सकेगी :
परन्तु इस धारा की कोई बात एकमात्र रूप से ऐसी अर्हताओं को पूरा न करने के आधार पर जो परिषद् द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (संशोधन) अधिनियम, 2011 के प्रारंभ से ठीक पूर्व केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा बनाए गए किसी नियम, विनियम या किए गए आदेश के अधीन किसी पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक या इंटरमीडिएट विद्यालय या महाविद्यालय में भर्ती किए गए किसी व्यक्ति के बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी :
परंतु यह और कि पहले परंतुक में निर्दिष्ट किसी शिक्षक की न्यूनतम अर्हताएं इस अधिनियम में या निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (2009 का 35) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अर्जित की जाएंगी ।]
13. निरीक्षण-(1) परिषद् इस बात को अभिनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिए कि क्या संस्थाएं इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार कृत्य कर रही है किसी ऐसी संस्था का ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जिन्हें वह निदेश दे, ऐसी रीति से जो विहित की जाए, निरीक्षण करा सकेगी ।
(2) परिषद्, संस्था को वह तारीख संसूचित करेगी जिसको उपधारा (1) के अधीन निरीक्षण किया जाना है और संस्था निरीक्षण से ऐसी रीति से सहयुक्त किए जाने की हकदार होगी जो विहित की जाए ।
(3) परिषद्, संस्था को ऐसे किसी निरीक्षण के परिणामों के संबंध में अपने विचार संसूचित करेगी और उस संस्था की राय अभिनिश्चित करने के पश्चात् उस संस्था को ऐसे निरीक्षण के परिणामस्वरूप की जाने वाली कार्रवाई की सिफारिश करेगी ।
(4) इस धारा के अधीन संस्था को दी जाने वाली सभी संसूचनाएं उसके कार्यपालक प्राधिकारी को दी जाएंगी और संस्था का कार्यपालक प्राधिकारी परिषद् को उस कार्रवाई की, यदि कोई हो, रिपोर्ट देगा जिसे किसी ऐसी सिफारिश को, जो उपधारा (13) में निर्दिष्ट है, क्रियान्वित करने के प्रयोजनों के लिए, किए जाने की प्रस्थापना की गई है ।
अध्याय 4
अध्यापक शिक्षा संस्थाओं की मान्यता
14. अध्यापक शिक्षा में पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रस्थापित करने वाली संस्थाओं की मान्यता-(1) नियत दिन को या उसके पश्चात् अध्यापक शिक्षा में पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रस्थापित करने वाली या प्रस्थापित करने का आशय रखने वाली प्रत्येक संस्था, इस अधिनियम के अधीन मान्यता दी जाने के लिए संबद्ध प्रादेशिक समिति को, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं, आवेदन करेगी :
परन्तु नियत दिन के ठीक पूर्व अध्यापक शिक्षा में पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रस्थापित करने वाली कोई संस्था छह मास की अवधि के लिए और यदि उसने उक्त अवधि के भीतर मान्यता के लिए आवेदन किया है तो प्रादेशिक समिति द्वारा आवेदन के निपटाए जाने तक ऐसे पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण चालू रखने की हकदार होगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन के साथ संदत्त की जाने वाली फीस वह होगी जो विहित की जाए ।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी संस्था से प्रादेशिक समिति द्वारा आवेदन की प्राप्ति पर और संबंधित संस्था से ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो आवश्यक समझी जाएं, प्राप्त होने के पश्चात् वह-
(क) यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसी संस्था के पास पर्याप्त वित्तीय साधन, स्थान सुविधा, पुस्तकालय, अर्हित कर्मचारिवृन्द, प्रयोगशाला है और वह ऐसी अन्य शर्तों को पूरा करती हैं जो अध्यापक शिक्षा में किसी पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के लिए संस्था के उचित कार्यकरण के लिए अपेक्षित है, और जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं, तो ऐसी संस्था को, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं, मान्यता देने वाला आदेश पारित करेगी ; या
(ख) यदि उसकी यह राय है कि ऐसी संस्था, उपखंड (क) में अधिकथित अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती है तो ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसी संस्था को मान्यता नामंजूर करने वाला आदेश पारित करेगी :
परन्तु उपखंड (ख) के अधीन कोई आदेश पारित करने के पूर्व, प्रादेशिक समिति, लिखित अभ्यावेदन करने के लिए संबंधित संस्था को उचित अवसर प्रदान करेगी ।
(4) उपधारा (3) के अधीन अध्यापक शिक्षा में किसी पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के लिए किसी संस्था को मान्यता मंजूर करने या नामंजूर करने वाला प्रत्येक आदेश राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा और समुचित कार्रवाई के लिए ऐसी संस्था को और संबंधित परीक्षा निकाय, स्थानीय प्राधिकारी या राज्य सरकार और केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में संसूचित किया जाएगा ।
(5) ऐसी प्रत्येक संस्था, जिसकी बाबत मान्यता नामंजूर कर दी गई है, उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन पारित मान्यता नामंजूर करने वाले आदेश की प्राप्ति की तारीख से ठीक आगामी शैक्षणिक सत्र की समाप्ति से अध्यापक शिक्षा में पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण बंद कर देगी ।
(6) प्रत्येक परीक्षा निकाय, उपधारा (4) के अधीन आदेश की प्राप्ति पर :-
(क) जहां मान्यता मंजूर कर दी गई है वहां संस्था को संबद्ध किया जाना मंजूर करेगी ; या
(ख) जहां मान्यता नामंजूर कर दी गई है वहां संस्था को संबद्ध किया जाना रद्द कर देगी ।
15. मान्यताप्राप्त संस्था द्वारा नए पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण की अनुज्ञा-(1) जहां कोई मान्यताप्राप्त संस्था अध्यापक शिक्षा में कोई नया पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रारंभ करने का आशय रखती है, वहां उसकी अनुज्ञा के लिए संबंधित प्रादेशिक समिति को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, आवेदन कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन के साथ संदत्त की जाने वाली फीस वह होगी जो विहित की जाए ।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी संस्था से आवेदन की प्राप्ति पर और मान्यताप्राप्त संस्था से ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो आवश्यक समझी जाएं, प्राप्त होने के पश्चात्, प्रादेशिक समिति, -
(क) यदि उसका, यह समाधान हो जाता है कि ऐसी मान्यताप्राप्त संस्था के पास पर्याप्त वित्तीय साधन, स्थान सुविधा, पुस्तकालय, अर्हित कर्मचारिवृन्द, प्रयोगशाला है और वह ऐसी अन्य शर्तों को पूरा करती है जो अध्यापक शिक्षा में ऐसे नए पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के समुचित संचालन के लिए अपेक्षित है, और जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं, तो ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं, अनुज्ञा मंजूर करने वाला आदेश पारित करेगी ; या
(ख) यदि उसकी यह राय है कि ऐसी संस्था, उपखंड (क) में अधिकथित अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती है, तो ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसी संस्था को अनुज्ञा नामंजूर करने वाला आदेश पारित करेगी :
परन्तु उपखंड (ख) के अधीन अनुज्ञा नामंजूर करने वाला आदेश पारित करने के पूर्व, प्रादेशिक समिति, लिखित अभ्यावेदन करने के लिए संबंधित संस्था को उचित अवसर प्रदान करेगी ।
(4) उपधारा (3) के अधीन अध्यापक शिक्षा में किसी नए पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के लिए किसी मान्यताप्राप्त संस्था को अनुज्ञा मंजूर करने या नामंजूर करने वाला प्रत्येक आदेश राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा और समुचित कार्रवाई के लिए ऐसी मान्यताप्राप्त संस्था को और संबद्ध परीक्षा निकाय, स्थानीय प्राधिकारी, राज्य सरकार और केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में संसूचित किया जाएगा ।
16. परिषद् द्वारा मान्यता या अनुज्ञा के पश्चात् सहबद्धक निकाय द्वारा सहबद्ध किया जाना मंजूर करना-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई परीक्षा निकाय, नियत दिन को या उसके पश्चात् तब तक, -
(क) किसी संस्था को अनंतिम या अन्यथा, सहबद्ध किया जाना मंजूर नहीं करेगा ; या
(ख) किसी मान्यताप्राप्त संस्था द्वारा संचालित किसी पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के लिए, अनंतिम या अन्यथा, परीक्षा आयोजित नहीं करेगा,
जब तक कि संबंधित संस्था ने धारा 14 के अधीन संबंधित प्रादेशिक समिति से मान्यता या धारा 15 के अधीन किसी पाठ्यक्रम या शिक्षण के लिए अनुज्ञा न प्राप्त कर ली हो ।
17. अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन और उसके परिणाम-(1) जहां प्रादेशिक समिति का, स्वप्रेरणा से या किसी व्यक्ति से प्राप्त किसी अभ्यावेदन पर यह समाधान हो जाता है कि किसी मान्यताप्राप्त संस्था ने इस अधिनियम के किसी उपबंध का अथवा इसके अधीन बनाए गए नियमों, विनियमों या निकाले गए आदेशों का या किसी ऐसी शर्त का, जिसके अधीन रहते हुए धारा 14 की उपधारा (3) के अधीन मान्यता दी गई थी या धारा 15 की उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञा मंजूर की गई थी, उल्लंघन किया है, वहां वह, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसी मान्यताप्राप्त संस्था की मान्यता वापस ले सकेगी :
परन्तु किसी मान्यताप्राप्त संस्था के विरुद्ध कोई ऐसा आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि प्रस्तावित आदेश के विरुद्ध ऐसी मान्यताप्राप्त संस्था को अभ्यावेदन करने का उचित अवसर न दे दिया गया हो :
परन्तु यह और कि प्रादेशिक समिति द्वारा पारित मान्यता वापस लेने वाला या इंकार करने वाला आदेश, ऐसे आदेश की संसूचना की तारीख से ठीक आगामी शैक्षणिक सत्र की समाप्ति से ही प्रवृत्त होगा ।
(2) प्रादेशिक समिति द्वारा उपधारा (1) के अधीन पारित प्रत्येक आदेश की प्रति, -
(क) संबंधित मान्यताप्राप्त संस्था को भेजी जाएगी और उसके साथ ही उसकी एक प्रति सहबद्धता रद्द करने के लिए उस विश्वविद्यालय या परीक्षा निकाय को भेजी जाएगी जिससे ऐसी संस्था सहबद्ध की गई थी ; और
(ख) वह आदेश सर्वसाधारण की जानकारी के लिए राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।
(3) यदि उपधारा (1) के अधीन किसी मान्यताप्राप्त संस्था की मान्यता एक बार वापस ले ली जाती है तो ऐसी संस्था, अध्यापक शिक्षा में ऐसे पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण को बन्द कर देगी और संबंधित विश्वविद्यालय या परीक्षा निकाय उपधारा (1) के अधीन पारित आदेश के अनुसार संस्था की सहबद्धता को, उक्त आदेश की संसूचना की तारीख के ठीक आगामी शैक्षणिक सत्र की समाप्ति से रद्द कर देगा ।
(4) यदि कोई संस्था उपधारा (1) के अधीन मान्यता वापस लेने वाले आदेश के प्रवृत्त होने के पश्चात् अध्यापक शिक्षा में कोई पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रस्थापित करती है तो, या जहां अध्यापक शिक्षा में कोई पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण प्रस्थापित करने वाली कोई संस्था नियत दिन के ठीक पूर्व अधिनियम के अधीन मान्यता या अनुज्ञा प्राप्त करने में असफल हो जाती है या उपेक्षा बरतती है वहां, ऐसे पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के अनुसरण में या ऐसी संस्था में पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण करने के पश्चात् प्राप्त अध्यापक शिक्षा में अर्हता को, केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार या विश्वविद्यालय के अधीन या केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त किसी विद्यालय, महाविद्यालय या अन्य शिक्षा निकाय में नियोजन के प्रयोजनों के लिए, विधिमान्य अर्हता नहीं मानी जाएगी ।
18. अपील-(1) अधिनियम की धारा 14 या धारा 15 या धारा 17 के अधीन निकाले गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसी अवधि के भीतर जो विहित की जाए, परिषद् को अपील कर सकेगा ।
(2) अपील उस दशा में ग्रहण नहीं की जाएगी यदि वह उसके लिए विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् की जाती है :
परन्तु विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् कोई अपील उस दशा में ग्रहण की जा सकेगी यदि अपीलर्थी, परिषद् का यह समाधान कर देता है कि उसके पास विहित अवधि के भीतर अपील न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
(3) इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप में की जाएगी और उसके साथ उस आदेश की प्रति जिसके विरुद्ध अपील की गई है और ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए ।
(4) अपील को निपटाने की प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए :
परन्तु अपील को नामंजूर करने से पहले अपीलार्थी को अपना मामला प्रस्तुत करने का उचित अवसर दिया जाएगा ।
(5) परिषद् उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि कर सकेगी या उसको उलट सकेगी ।
अध्याय 5
परिषद् के निकाय
19. कार्यकारिणी समिति-(1) परिषद्, कार्यकारिणी समिति के नाम से ज्ञात एक समिति का ऐसे कृत्यों के निर्वहन के लिए गठन करेगी जो उसे परिषद् द्वारा सौंपे जाएं या विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।
(2) कार्यकारिणी समिति निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) अध्यक्ष ;
(ख) उपाध्यक्ष ;
(ग) सदस्य-सचिव ;
(घ) भारत सरकार के शिक्षा से संबंधित विभाग का सचिव, पदेन ;
(ङ) सचिव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, पदेन ;
(च) निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, पदेन ;
(छ) भारत सरकार के शिक्षा से संबंधित विभाग में वित्त सलाहकार, पदेन ;
(ज) अध्यापक शिक्षा में चार विशेषज्ञ, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे ;
(झ) चार राज्य प्रतिनिधि, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी रीति से नामनिर्देशित किए जाएंगे, जो विहित की जाए ;
(ञ) प्रादेशिक समितियों के अध्यक्ष ।
(3) परिषद् के अध्यक्ष और सदस्य-सचिव कार्यकारिणी समिति के क्रमशः अध्यक्ष और सदस्य-सचिव के रूप में कार्य करेंगे ।
(4) परिषद् का अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में उसका उपाध्यक्ष, कार्यकारिणी समिति के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा और अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में, अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया कोई अन्य सदस्य, अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(5) कार्यकारिणी समिति के अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के लिए आवश्यक गणपूर्ति वह होगी, जो विनियमों द्वारा अधिकथित की जाए ।
(6) कार्यकारिणी समिति, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, दो से अनधिक ऐसे व्यक्तियों को, जिनकी सहायता और सलाह की वह कार्यकारिणी समिति को सौंपे गए कृत्यों में से किसी को कार्यान्वित करने में वांछा करे, सहयोजित कर सकेगी :
परन्तु किसी प्रयोजन के लिए कार्यकारिणी समिति द्वारा सहयोजित व्यक्तियों को, उस प्रयोजन से सुसंगत चर्चा में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उन्हें कार्यकारिणी समिति के किसी अधिवेशन में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वे किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होंगे ।
(7) परिषद्, यदि आवश्यक समझती है तो, ऐसी अन्य समितियों की ऐसे विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए, जो वह ठीक समझे, स्थापना कर सकेगी ।
20. प्रादेशिक समितियां-(1) परिषद्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निम्नलिखित प्रादेशिक समितियां स्थापित करेगी, अर्थात् :-
(i) पूर्वी प्रादेशिक समिति ;
(ii) पश्चिमी प्रादेशिक समिति ;
(iii) उत्तरी प्रादेशिक समिति ; और
(iv) दक्षिणी प्रादेशिक समिति ।
(2) परिषद् यदि आवश्यक समझती है तो, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, ऐसी अन्य प्रादेशिक समितियां जो वह ठीक समझे, स्थापित कर सकेगी ।
(3) प्रादेशिक समिति निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) परिषद् द्वारा नामनिर्देशित किया जाने वाला एक सदस्य ;
(ख) प्रदेश के प्रत्येक राज्य और संघ राज्यक्षेत्र से एक-एक प्रतिनिधि, जिनका नामनिर्देशन संबंधित राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों द्वारा किया जाएगा ;
(ग) उतनी संख्या में ऐसे व्यक्ति, जिनके पास अध्यापक शिक्षा से संबंधित विषयों में विशेष ज्ञान और अनुभव है, जितने विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।
(4) परिषद्, संबंधित प्रादेशिक समिति के सदस्यों में से एक का, उक्त समिति के अध्यक्ष के रूप में कृत्य करने के लिए, नामनिर्देशन करेगी ।
(5) खंड (ग) में निर्दिष्ट सदस्यों की पदावधि और ऐसे सदस्यों को संदेय भत्ते वे होंगे, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।
(6) प्रादेशिक समिति, धारा 14, धारा 15 और धारा 17 के अधीन अपने कृत्यों के अतिरिक्त, ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करेगी, जो परिषद् द्वारा उसे सौंपे जाएं या जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।
(7) किसी प्रादेशिक समिति के कृत्य, उसके द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, उसकी प्रादेशिक अधिकारिता और उसके सदस्यों में आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति वह होगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए ।
21. प्रादेशिक समिति को समाप्त करने की शक्ति-(1) यदि परिषद् की यह राय है कि प्रादेशिक समिति इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है या उसने उसका पालन करने में बार-बार व्यतिक्रम किया है या अपनी शक्तियों का अतिक्रमण या दुरुपयोग किया है या वह इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए परिषद् द्वारा जारी किए गए किसी निदेश का पालन करने में जानबूझकर अथवा पर्याप्त हेतुक के बिना असफल हो गई है तो परिषद्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, प्रादेशिक समिति को तत्काल समाप्त कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन पर, -
(क) प्रादेशिक समिति के सभी सदस्य, इस बात के होते हुए भी कि उनकी पदावधि समाप्त नहीं हुई है, समाप्ति की तारीख से ही ऐसे सदस्य के रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे : और
(ख) वे सभी शक्तियां और कर्तव्य, जिनका प्रयोग या पालन इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्रादेशिक समिति द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकता है, उस अवधि के दौरान जब उसके सदस्यों की पदावधि समाप्त कर दी गई है, उनका प्रयोग या पालन ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा, जिन्हें परिषद् निर्दिष्ट करे ।
(3) परिषद्, उपधारा (2) के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन के पश्चात् किसी भी समय, धारा 20 की उपधारा (3) में उपबंधित रीति से प्रादेशिक समिति का पुनर्गठन कर सकेगी :
परन्तु परिषद्, पुनर्गठन प्रादेशिक समिति के सदस्य के रूप में किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए सक्षम होगी जो ऐसी प्रादेशिक समिति का सदस्य था जिसे समाप्त कर दिया गया था ।
अध्याय 6
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
22. परिषद् को संदाय-केन्द्रीय सरकार, इस निमित्त संसद् द्वारा, विधि द्वारा, सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात्, परिषद् को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में उतनी धनराशियों का संदाय कर सकेगी जितनी इस अधिनियम के अधीन परिषद् के कृत्यों के पालन के लिए आवश्यक समझी जाए ।
23. परिषद् की निधि-(1) परिषद् की अपनी निधि होगी और वे सभी धनराशियां, जो समय-समय पर केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा उसे संदत्त की जाएं तथा परिषद् की सभी प्राप्तियां, जिनके अन्तर्गत ऐसी धनराशि भी है जिसे भारत में या विदेश में कोई अन्य प्राधिकारी या व्यक्ति परिषद् को संदत्त करे, उस निधि में जमा की जाएंगी और परिषद् द्वारा सभी संदाय उसमें से किए जाएंगे ।
(2) निधि की सभी रकमें, ऐसे बैंक में जमा की जाएंगी या ऐसी रीति से विनिहित की जाएंगी, जो परिषद् द्वारा विनिश्चित की जाए ।
(3) परिषद्, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए उतनी राशियां व्यय कर सकेगी जितनी वह ठीक समझे, और ऐसी राशियां परिषद् की निधि में से संदेय व्यय मानी जाएंगी ।
24. परिषद् का बजट-परिषद्, प्रत्येक वर्ष ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित करते हुए एक बजट तैयार करेगी और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी ।
25. वार्षिक रिपोर्ट-परिषद्, प्रत्येक वर्ष में एक बार ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का सही और पूरा विवरण देते हुए वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी तथा वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
26. लेखा और संपरीक्षा-(1) परिषद्, ऐसी लेखा बहियां ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से रखवाएगी, जो केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षा के परामर्श से विहित करे ।
(2) परिषद्, अपने वार्षिक लेखाओं को बन्द करने के पश्चात्, यथाशीघ्र, ऐसे प्ररूप में लेखा विवरण तैयार करेगी और उसे भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को ऐसी तारीख तक भेजेगी, जो केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से अवधारित करे ।
(3) परिषद् के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे समय पर और ऐसी रीति से, जो वह ठीक समझे, की जाएगी ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा प्रमाणित परिषद् के लेखे और उसके संबंध में संपरीक्षा रिपोर्ट प्रति वर्ष केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएगी और वह सरकार उसे संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
27. शक्तियों और कृत्यों का प्रत्यायोजन-परिषद्, लिखित रूप में साधारण या विशेष आदेश द्वारा, प्रादेशिक समिति के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या किसी अधिकारी को, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के, यदि कोई हो, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को, (सिवाय धारा 32 के अधीन विनियम बनाने की शक्ति के) जो वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगी ।
28. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार, परिषद् या उसके द्वारा नियुक्त किन्हीं समितियों या परिषद् या ऐसी समितियों के किसी सदस्य या केन्द्रीय सरकार या परिषद् के किसी अधिकारी या कर्मचारी या उस सरकार या परिषद् द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
29. केन्द्रीय सरकार द्वारा निदेश-(1) परिषद्, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में, नीति संबंधी प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगी जो केन्द्रीय सरकार, उसे समय-समय पर, लिखित रूप में दे ।
(2) इस बाबत कि कोई प्रश्न नीति का है या नहीं, केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
30. परिषद् को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि परिषद् इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है या उसने उनका पालन करने में बार-बार व्यतिक्रम किया है या अपनी शक्तियों का अतिक्रमण या दुरुपयोग किया है, या वह केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 29 के अधीन दिए गए किसी निदेश का अनुपालन करने में जानबूझकर अथवा पर्याप्त हेतुक के बिना असफल हो गई है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, परिषद् को ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, अतिष्ठित कर सकेगी ;
परन्तु केन्द्रीय सरकार, इस उपधारा के अधीन अधिसूचना निकालने के पूर्व, परिषद् को यह हेतुक दर्शित करने के लिए उचित अवसर देगी कि उसे क्यों न अतिष्ठित कर दिया जाए और परिषद् के स्पष्टीकरण और आक्षेपों पर, यदि कोई है, विचार करेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन परिषद् को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -
(क) परिषद् के सभी सदस्य, इस बात के होते हुए भी कि उनकी पदावधि समाप्त नहीं हुई है, अतिष्ठित किए जाने की तारीख से ही ऐसे सदस्य के रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे ;
(ख) वे सभी शक्तियां और कर्तव्य, जिनका प्रयोग या पालन इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन परिषद् द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकता है, अतिष्ठिति काल के दौरान, उनका प्रयोग या पालन ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा जिन्हें केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट करे ;
(ग) परिषद् में निहित सब संपत्ति, अतिष्ठिति काल के दौरान केन्द्रीय सरकार में निहित रहेगी ।
(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठिति काल की समाप्ति पर, -
(क) अतिष्ठिति काल को ऐसी और अवधि तक बढ़ा सकेगी जो, वह आवश्यक समझे ; या
(ख) धारा 3 में उपबंधित रीति से परिषद् का पुनर्गठन कर सकेगी ।
31. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) वह रीति, जिससे केन्द्रीय सरकार जो धारा 3 की उपधारा (4) के खंड (ड) के उपखंड (v) के अधीन, परिषद् के लिए विशेषज्ञ नियुक्त करना है ;
(ख) वह रीति, जिससे केन्द्रीय सरकार धारा 3 की उपधारा (4) के खंड (द) के अधीन राज्यों और संघ राज्यक्षेत्र प्रशासनों से परिषद् में सदस्यों की नियुक्ति करेगी ;
(ग) धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य-सचिव की और उसकी उपधारा (4) के अधीन सदस्यों की सेवा की शर्तें ;
(घ) धारा 4 की उपधारा (7) के अधीन अध्यक्ष की शक्तियां और कर्तव्य ;
(ङ) वह रीति जिससे और वे व्यक्ति जिनके द्वारा संस्था का निरीक्षण किया जाना है और वह रीति जिससे संस्था की धारा 13 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन ऐसे निरीक्षण में सहयोजित किया जाना है ;
(च) धारा 14 की उपधारा (2) के अधीन मान्यता प्राप्त करने के लिए और धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञा प्राप्त करने के लिए आवेदन पर संदेय फीस ;
(छ) धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन अपील के लिए परिसीमा की अवधि, उस धारा की उपधारा (3) के अधीन वह प्ररूप जिसमें अपील की जाएगी और उसके लिए संदेय फीस और उस धारा की उपधारा (4) के अधीन अपील को निपटाने के लिए प्रक्रिया ;
(ज) वह रीति, जिससे केन्द्रीय सरकार द्वारा, धारा 19 की उपधारा (2) के खंड (झ) के अधीन कार्यकारिणी समिति में राज्य प्रतिनिधियों को नामनिर्दिष्ट किया जाना है ;
(झ) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय, जिसके भीतर धारा 24 के अधीन बजट और धारा 25 के अधीन परिषद् की वार्षिक रिपोर्ट तैयार की जानी है ;
(ञ) वह रीति, जिससे और वह प्ररूप, जिसमें परिषद् का लेखा धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन बनाए रखा जाना है ;
(ट) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाता है या जिसे विहित किया जाए ।
32. विनियम बनाने की शक्ति-(1) परिषद् इस अधिनियम के उपबंधों को साधारणतया कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे विनियम बना सकेगी, जो इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों से असंगत न हों ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन परिषद् के अधिवेशनों के समय और स्थान को और उसमें कार्य संचालन के लिए प्रक्रिया को विनियमित करना ;
(ख) वह रीति जिससे और वे प्रयोजन जिनके लिए व्यक्तियों को धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन परिषद् द्वारा सहयोजित किया जा सकेगा ;
(ग) धारा 10 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन क्रमशः परिषद् के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, सेवा के निबंधन और शर्तें ;
(घ) निम्नलिखित के संबंध में मानक, मार्गदर्शक सिद्धांत, और स्तरमान,-
(i) धारा 12 के खंड (घ) के अधीन अध्यापक के रूप में नियोजित किए जाने वाले व्यक्ति के लिए न्यूनतम अर्हताएं,
(ii) धारा 12 के खंड (ङ) के अधीन अध्यापक शिक्षा में पाठ्यक्रमों या प्रशिक्षण का विनिर्दिष्ट प्रवर्ग,
(iii) धारा 12 के खंड (च) के अधीन मान्यताप्राप्त संस्थाओं में नए पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण आरंभ करना,
(iv) धारा 12 के खंड (छ) में निर्दिष्ट अध्यापक शिक्षा अर्हताओं की परीक्षाओं की बाबत स्तरमान,
(v) धारा 12 के खंड (ज) के अधीन संस्थाओं द्वारा प्रभार्य अध्यापन फीस और अन्य फीस,
(vi) अध्यापक शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिए स्कीमें और धारा 12 के खंड (ठ) के अधीन अध्यापक विकास कार्यक्रम की प्रस्थापना के लिए संस्थाओं का पता लगाना ;
[(घघ) धारा 12क के अधीन अध्यापकों की अर्हताएं ;]
(ङ) वह प्ररूप, जिसमें और वह रीति जिससे धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन मान्यता के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जाना है ;
(च) धारा 14 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन संस्था के समुचित कृत्यकरण के लिए अपेक्षित शर्तें और मान्यता मंजूर करने के लिए शर्तें ;
(छ) वह प्ररूप, जिसमें और वह रीति जिससे धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन किया जाना है ;
(ज) धारा 15 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन नए पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के उचित रूप में संचालन के लिए अपेक्षित शर्तें और अनुज्ञा देने के लिए शर्तें ;
(झ) वे कृत्य, जो धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन कार्यकारिणी समिति को परिषद् द्वारा सौंपे जा सकेंगे ;
(ञ) धारा 19 की उपधारा (5) के अधीन कार्यकारिणी समिति के अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के लिए आवश्यक प्रक्रिया और गणपूर्ति ;
(ट) वह रीति जिससे और वे प्रयोजन जिनके लिए कार्यकारिणी समिति धारा 19 की उपधारा (6) के अधीन व्यक्तियों को सहयोजित कर सकेगी ;
(ठ) धारा 20 की उपधारा (3) के खंड (ग) के अधीन व्यक्तियों की संस्था ;
(ड) धारा 20 की उपधारा (5) के अधीन सदस्यों की पदावधि और उनको संदेय भत्ते ;
(ढ) धारा 20 की उपधारा (6) के अधीन प्रादेशिक समिति द्वारा पालन किए जाने वाले अतिरिक्त कृत्य ;
(ण) धारा 20 की उपधारा (7) के अधीन प्रादेशिक समिति के कृत्य, उसके द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया, उसकी क्षेत्रीय अधिकारिता और उसके सदस्यों में आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति ;
(त) कोई अन्य विषय, जिसके संबंध में विनियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।
33. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
34. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों :
परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं निकाला जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन निकाला गया प्रत्येक आदेश, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
---------------

