दिल्ली अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा अधिनियम, 1986
(1986 का अधिनियम संख्यांक 56)
[12 दिसम्बर, 1986]
दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र में कतिपय भवनों और परिसरों में
अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपायों के
लिए और अधिक प्रभावी उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षित नाम दिल्ली अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा अधिनियम, 1986 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) प्रशासक" से राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त दिल्ली का प्रशासक अभिप्रेत है ;
(ख) अपील अधिकरण" से दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) का धारा 347क के अधीन गठित अपील अधिकरण अभिप्रेत है ;
(ग) भवन" से अभिप्रेत हैं कोई गृह, उपगृह, अस्तबल, शौचालय, मूत्रालय, शैड, झोपड़ी, दीवाल (सीमा दीवाल से भिन्न) या कोई अन्य संरचना चाहे वह पत्थर की हो, ईंटों की हो, लकड़ी की हो, मिट्टी की हो, धातु की हो या किसी अन्य पदार्थ की हो ;
(घ) भवन उपविधि" से अभिप्रेत हैं, भवनों के संबंध में, छावनी अधिनियम, 1924 (1924 का 2) की धारा 282 के अधीन बनाई गई उपविधियां या दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) की धारा 481 के अधीन बनाई गई उपविधियां या नई दिल्ली में यथा प्रवृत्त पंजाब नगरपालिका अधिनियम, 1911 (1911 का पंजाब अधिनियम 3) की धारा 188, धारा 189 की उपधारा (3) और धारा 190 की उपधारा (1) के अधीन बनाई गई उपविधियां या दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) की धारा 57 की उपधारा (1) के अधीन बनाए गए विनियम ;
(ङ) मुख्य अग्नि शमन अधिकारी" से दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) के अधीन स्थापित दिल्ली नगर निगम द्वारा नियुक्त मुख्य अग्नि शमन अधिकारी अभिप्रेत है ;
(च) दिल्ली" से दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ;
(छ) अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपाय" से ऐसे उपाय अभिप्रेत हैं जो भवन उपविधियों के अनुसार अग्नि के निवारण, नियंत्रण और शमन के लिए तथा आग लग जाने की दशा में जीवन और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है ;
(ज) स्थानीय प्राधिकारी" से अभिप्रेत है छावनी अधिनियम, 1924 (1924 का 2) के अधीन स्थापित दिल्ली छावनी बोर्ड, दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) के अधीन स्थापित दिल्ली विकास प्राधिकरण, दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) के अधीन स्थापित दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली में तथा प्रवृत्त पंजाब नगरपालिका अधिनियम, 1911 (1911 का पंजाब अधिनियम 3) के अधीन स्थापित नई दिल्ली नगरपालिका समिति या किसी अन्य विधि के अधीन कोई अन्य प्राधिकारी जिसे प्रशासक, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, इस निमित्त अधिसूचित करे ;
(झ) नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी" से मुख्य अग्नि शमन अधिकारी द्वारा नामनिर्दिष्ट कोई अधिकारी अभिप्रेत है जो अग्िन शमन अधिकारी से निम्न रैंक का नहीं है, और इसके अन्तर्गत ऐसा कोई अधिकारी है जो किसी स्थानीय प्राधिकारी या रेल प्रशासन द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी के रूप में नामनिर्दिष्ट किया जाए ;
(ञ) अधिभोगी" के अन्तर्गत है-
(i) ऐसा कोई व्यक्ति जो स्वामी को उस समय उस भूमि या भवन के भाटक का या भाटक के किसी भाग का संदाय कर रहा है या करने का जिम्मेदार है जिसकी बाबत ऐसा भाटक संदत्त किया जाता है या संदेय है ;
(ii) वह स्वामी जो अपनी भूमि या भवन का अधिभोग या अन्यथा उपयोग कर रहा है ;
(iii) किसी भूमि या भवन का भाटक-मुक्त अभिधारी ;
(iv) किसी भूमि या भवन का अधिभोग करने वाला अनुज्ञप्तिधारी ; और
(v) ऐसा कोई व्यक्ति जो किसी भूमि या भवन के उपयोग और अधिभोग के लिए उसके स्वामी को नुकसानी देने का जिम्मेदार है ;
(ट) स्वामी" के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो तत्समय किसी भूमि या भवन का भाटक चाहे अपने ही निमित्त या अपने और अन्य के निमित्त या किसी अन्य व्यक्ति के लिए अभिकर्ता, न्यासी, संरक्षक या रिसीवर के रूप में प्राप्त कर रहा है या प्राप्त करने का हकदार है या जो, भूमि या भवन या उसका भाग किसी अभिधारी को पट्टे पर दिए जाने की दशा में, इस प्रकार भाटक प्राप्त करेगा या प्राप्त करने का हकदार होगा, और इसके अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं, अर्थात् :-
(i) ऐसी निक्रांत संपत्ति के संबंध में निष्क्रांत संपत्ति अधिरक्षक जो निष्क्रांत संपत्ति प्रशासन अधिनियम, 1950 (1950 का 31) के अधीन उसमें निहित है, और
(ii) अपने नियत्रंणाधीन संपत्ति के संबंध में भारत सरकार का संपदा निदेशक, दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) के अधीन गठित दिल्ली विकास प्राधिकरण का सचिव, किसी रेल का महाप्रबंधक और किसी सरकारी विभाग का विभागाध्यक्ष ;
(ठ) परिसर" से कोई भूमि या कोई भवन या उससे अनुलग्न भवन का कोई भाग अभिप्रेत है जो विस्फोटकों, विस्फोटक पदार्थों और खतरनाक रूप से ज्वलनशील पदार्थों के भण्डारकरण के लिए उपयोग में लाया जाता है ।
स्पष्टीकरण-इस खंड में विस्फोटक", विस्फोटक पदार्थ" और खतरनाक रूप से ज्वलनशील पदार्थ" के वही अर्थ हैं जो विस्फोटक अधिनियम, 1884 (1884 का 4), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 (1908 का 6) और ज्वलनशील पदार्थ अधिनियम, 1952 (1952 का 20) में हैं ।
3. भवनों, परिसरों आदि का निरीक्षण-(1) नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी किसी भवन के, जिसकी ऊंचाई उतनी है जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, परिसर के अधिभोगी को या यदि कोई अधिभोगी नहीं है तो उसके स्वामी को तीन घन्टे की सूचना देने के पश्चात् सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच किसी भी समय उक्त भवन या परिसर में प्रवेश कर सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा जहां ऐसा निरीक्षण अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपायों की पर्याप्तता या उल्लंघन अभिनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रतीत होता है :
परन्तु नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी किसी भवन या परिसर में किसी भी समय प्रवेश कर सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा यदि उसे संपत्ति और जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना समीचीन और आवश्यक प्रतीत होता है ।
(2) नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी को उपधारा (1) के अधीन निरीक्षण करने के लिए, भवन या परिसर के, यथास्थिति, स्वामी या अधिभोगी द्वारा सभी संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी ।
(3) जब मानव निवास के रूप में प्रयुक्त किसी भवन या परिसर में उपधारा (1) के अधीन प्रवेश किया जाता है तब अधिभोगियों की सामाजिक और धार्मिक भावनाओं का सम्यक्, ध्यान रखा जाएगा ; और किसी महिला के, जो रूढ़ि के अनुसार लोक के समक्ष नहीं आती है, वास्तविक अधिभोगाधीन किसी अपार्टमेंट में उपधारा (1) के अधीन प्रवेश करने के पूर्व, उसको यह सूचना दी जाएगी कि वह वहां से हट जाने के लिए स्वतंत्र है, और उसे वहां से हटने के लिए हर उचित सुविधा प्रदान की जाएगी ।
4. अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा के लिए उपाय-(1) नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी, धारा 3 के अधीन भवन या परिसर का निरीक्षण पूरा करने के पश्चात्, अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपायों की बाबत भवन उपविधियों से विचलन या उनके उल्लंघनों पर तथा भवन की ऊंचाई के प्रति निर्देश से, उसमें व्यवस्थित ऐसे उपायों की अपर्याप्तता या ऐसे भवन या परिसर में की जा रही संक्रियाओं की प्रकृति की बाबत, अपने विचार लेखबद्ध करेगा, और ऐसे भवन या परिसर के स्वामी या अधिभोगी को यह निदेश देते हुए एक सूचना जारी करेगा कि वह ऐसे उपाय करे जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी धारा 3 के अधीन अपने द्वारा किए गए किसी निरीक्षण की रिपोर्ट मुख्य अग्नि शमन अधिकारी को भी देगा ।
5. भवनों या परिसरों को सीलबंद करने की शक्ति-(1) जहां धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त होने पर मुख्य अग्नि शमन अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि किसी भवन या परिसर की दशा जीवन या सम्पत्ति के लिए खतरनाक है वहां वह, धारा 7 के अधीन की जाने वाली किसी कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे भवन या परिसर का कब्जा रखने वाले या अधिभोग करने वाले व्यक्तियों से अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसे भवन या परिसर से तुरंत हट जाएं ।
(2) यदि उपधारा (1) के अधीन मुख्य अग्नि शमन अधिकारी द्वारा किए गए आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है तो मुख्य अग्नि शमन अधिकारी उस क्षेत्र में अधिकारिता रखने वाले किसी पुलिस अधिकारी को ऐसे व्यक्तियों को उस भवन या परिसर से हटाने के लिए निदेश दे सकेगा और ऐसा अधिकारी ऐसे निदेशों का पालन करेगा ।
(3) व्यक्तियों के, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन हटाए जाने के पश्चात् मुख्य अग्नि शमन अधिकारी भवन या परिसर को सीलबंद करेगा ।
(4) कोई भी व्यक्ति ऐसी सील मुख्य अग्नि शमन अधिकारी द्वारा किए गए आदेश के अधीन ही हटा सकेगा अन्यथा नहीं ।
6. कुछ भवनों और परिसरों की बाबत उपबन्ध-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, मुख्य अग्नि शमन अधिकारी किसी ऐसे भवन में, जिसका निर्माण 6 जून, 1983 (जो वह तारीख है जिसको विद्यमान भवन उपविधियां प्रवृत्त हुई थीं) को या उसके पूर्व पूरा हुआ था या किसी भवन में जो ऐसी तारीख को निर्माणाधीन था, प्रवेश कर सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा यदि ऐसा निरीक्षण ऐसे भवन में अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपायों की पर्याप्तता को अभिनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रतीत होता है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रवेश और निरीक्षण मुख्य अग्नि शमन अधिकारी द्वारा धारा 3 में अधिकथित रीति से किया जाएगा ।
(3) मुख्य अग्नि शमन अधिकारी भवन या परिसर की उपधारा (1) के अधीन निरीक्षण करने के पश्चात्, और-
(i) भवन उपविधियों के, जिनके अनुसार उक्त भवन या परिसर का नक्शा मंजूर किया गया है, उपबंधों को ;
(ii) उक्त भवन या परिसर के नक्शे की मंजूरी के समय स्थानीय प्राधिकरण द्वारा अधिरोपित शर्तों को, यदि कोई है ; और
(iii) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन ऐसे भवन या परिसर के लिए विनिर्दिष्ट अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपायों के लिए न्यूनतम स्तरों को, ध्यान में रखते हुए, ऐसे भवन या परिसर के स्वामी या अधिभोगी को ऐसी सूचना जारी करेगा जिसमें अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपायों की अपर्याप्तता का कथन होगा और स्वामी या अधिभोगी को, ऐसी अवधि के भीतर जो मुख्य अग्नि शमन अधिकारी न्यायसंगत और युक्तियुक्त समझे, उक्त अपर्याप्तता का सुधार करने के लिए उपाय करने के लिए निदेश देगा ।
7. व्यतिक्रम की दशा में मुख्य अग्नि शमन अधिकारी की शक्तियां-(1) मुख्य अग्नि शमन अधिकारी, धारा 4 या धारा 6 के अधीन जारी की गई किसी सूचना के अनुपालन की दशा में, ऐसी कार्यवाही करेगा जो ऐसी सूचना के अनुपालन के लिए आवश्यक हो ।
(2) मुख्य अग्नि शमन अधिकारी द्वारा उपधारा (1) के अधीन किसी कार्यवाही के संबंध में उपगत सभी व्यय, मांग पर, स्वामी या अधिभोगी द्वारा देय होंगे और यदि ऐसी मांग के पश्चात् दस दिन के भीतर उनका संदाय नहीं किया जाता है तो वह भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूलीय होंगे ।
8. अपीलें-(1) नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी या मुख्य अग्नि शमन अधिकारी की सूचना या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति अपील अधिकरण को ऐसी सूचना या आदेश के विरुद्ध, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, सूचना या आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर, अपील कर सकेगा :
परन्तु अपील अधिकरण, यदि उसका यी समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न करने के लिए पर्याप्त कारण था तो, अपील को उक्त तीस दिन के अवधि के अवसान के पश्चात् ग्रहण कर सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन जारी की गई सूचना या किए गए आदेश को पुष्ट करने, परिवर्तित करने, निष्प्रभाव करने वाले अपील अधिकरण के किसी आदेश के विरुद्ध अपील, ऐसे आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर, प्रशासक को होगी :
परन्तु प्रशासक, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न करने के लिए पर्याप्त कारण था तो, अपील को उक्त तीस दिन की अवधि के अवसान के पश्चात् ग्रहण कर सकेगा ।
(3) अपील अधिकरण या प्रशासक को अपील ऐसे प्ररूप में की जाएगी तथा उसके साथ उस सूचना या आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, एक प्रति संलग्न होगी तथा ऐसी फीस भी होगी जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
(4) दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) की धारा 347ग और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्ध, जहां तक हो सकें, इस धारा के अधीन किसी अपील के निपटारे को उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे उस अधिनियम के अधीन किसी अपील के निपटारे को लागू होते हैं ।
9. न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन-कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी सूचना या आदेश की बाबत कोई वाद, आवेदन या अन्य कार्यवाही ग्रहण नहीं करेगा और ऐसी कोई सूचना या आदेश इस अधिनियम के अधीन अपील करके ही प्रश्नगत किया जा सकेगा, अन्यथा नहीं ।
10. शास्तियां-जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करेगा वह, धारा 7 के अधीन अपने विरुद्ध किसी कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, और जहां अपराध चालू रहता है वहां अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम दिन के पश्चात् प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान अपराध चालू रहता है तीन हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
11. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन अपराध किसी कंपनी द्वारा किया जाता है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस समय, जब अपराध किया गया था, उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत कोई फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ; और
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
12. अभियोजन की मंजूरी-कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के विचारण में नामनिर्दिष्ट प्राधिकारी द्वारा की गई अपराध की शिकायत पर या उससे प्राप्त जानकारी पर ही अग्रसर होगा, अन्यथा नहीं ।
13. अधिकारिता-महानगर मजिस्ट्रेट से अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
14. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
15. अधिकारी का लोक सेवक होना-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन कार्य करने वाला प्रत्येक अधिकारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के भीतर लोक सेवक समझा जाएगा ।
16. नियम बनाने की शक्ति-(1) प्रशासक इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगा :-
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किए जा सकेंगे ।
(क) धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन भवन की ऊंचाई ;
(ख) धारा 6 की उपधारा (3) के खंड (iii) के प्रयोजनों के लिए अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा उपायों के लिए न्यूनतम मानक ;
(ग) धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन वह प्ररूप जिसमें अपील की जाएगी और वह फीस जो अपील के साथ दी जाएगी ;
(घ) कोई अन्य विषय जो नियमों द्वारा उपबंधित किया जाना अपेक्षित है या किया जा सकेगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन बनाए गए प्रत्येक नियम को उसके बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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