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समुद्री-बीमा अधिनियम, 1963 ( Marine Insurance Act, 1963 )


 

समुद्री-बीमा अधिनियम, 1963

(1963 का अधिनियम संख्यांक 11)

[18 अप्रैल, 1963]

समुद्री-बीमा से संबंधित विधि को

संहिताबद्ध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के चौदहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

1. संक्षिप्त नाम तथा प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम समुद्री-बीमा अधिनियम, 1963 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) समुद्री-बीमा की संविदा" से धारा 3 द्वारा परिभाषित रूप से समुद्री-बीमा की संविदा अभिप्रेत है;

(ख) ढुलाई-भाड़ा" के अन्तर्गत, पोत-स्वामी द्वारा अपने माल या अन्य जंगम वस्तुओं के वहन के लिए अपने पोत के नियोजन से व्युत्पन्न लाभ तथा किसी अन्य पक्षकार द्वारा संदेय ढुलाई-भाड़ा भी है, किन्तु इसके अन्तर्गत यात्रा-भाड़ा नहीं है; 

(ग) बीमा-योग्य सम्पत्ति" से, कोई ऐसा पोत, माल या अन्य जंगम सम्पत्ति अभिप्रेत है; जो समुद्री संकटों के लिए उच्छन्न है;

(घ) समुद्री उद्यम" के अन्तर्गत कोई ऐसा उद्यम है, जिसमें-

(I) कोई बीमा की गई सम्पत्ति समुद्री संकटों के लिए उच्छन्न होती है;

(ii) बीमा की गई सम्पत्ति के, समुद्री संकट के लिए, उच्छन्न होने से किसी ढुलाई-भाड़े, यात्रा-भाड़े, कमीशन, लाभ या अन्य धनीय लाभ के अर्जन या उपार्जन या किन्हीं अग्रिमों, उधारों या संवितरणों के लिए प्रतिभूति, संकटापन्न होती है;

(iii) समुद्री संकटों के कारण, बीमा की गई सम्पत्ति के स्वामी द्वारा या ऐसी सम्पत्ति में हितबद्ध या उसके लिए जिम्मेदार अन्य व्यक्ति द्वारा किसी अन्य पक्षकार के प्रति कोई दायित्व उपगत किया जा सकता है;

(ङ) समुद्री संकट" में, समुद्र के नौचालन के परिणामस्वरूप या उसके आनुषंगिक संकट अभिप्रेत हैं, अर्थात्, समुद्री संकट, अग्नि, युद्ध-संकट, जल दस्यु, समुद्री दस्यु, चोर, नरेशों तथा जनता के नाम में प्रग्रहण, अभिग्रहण, अवरोध और निरोध, माल प्रक्षेपण, नाविक कर्तव्य भंग और ऐसे अन्य संकट जो या तो उसी प्रकार के हैं या पालिसी द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं;

(च) जंगम-वस्तु" से, पोत से भिन्न कोई मूर्त जंगम सम्पत्ति अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत धन, मूल्यवान प्रतिभूतियां तथा अन्य दस्तावेजें भी हैं;

(छ) पालिसी" से कोई समुद्री पालिसी अभिप्रेत है;

(ज) पोत" के अन्तर्गत नौचालन में प्रयुक्त प्रत्येक वर्णन का जलयान है;

(झ) वाद" के अन्तर्गत प्रतीप दावा और मुजरा भी है ।

समुद्री-बीमा

3. समुद्री-बीमा की परिभाषा-समुद्री-बीमा की संविदा एक ऐसा करार है जिसमें बीमाकर्ता, करार की गई रीति में और विस्तार तक बीमाकृत की समुद्री-हानि की, अर्थात्, समुद्री उद्यम से आनुषंगिक हानि की, क्षतिपूर्ति करने का वचन देता है ।

4. समुद्र तथा भूमि के मिश्रित जोखिम-(1) समुद्री-बीमा की संविदा को, उसके अभिव्यक्त निबन्धनों द्वारा या व्यापार की प्रथा द्वारा, इस प्रकार विस्तारित किया जा सकता है कि बीकाकृत को, अन्तर्देशीय जल पर या किसी भूमि पर जोखिम से होने वाली ऐसी हानि से संरक्षण दिया जा सके, जो किसी समुद्री यात्रा की अनुषंगी हो सकती है ।

(2)  यदि निर्माण के अनुक्रम में कोई पोत या किसी पोत का जलावतरण या किसी समुद्री उद्यम के सदृश कोई उद्यम समुद्री पालिसी जैसी किसी पालिसी के अन्तर्गत आता है, तो इस अधिनियम के उपबन्ध, जहां तक वे लागू होने योग्य हैं, उसे लागू होंगे, किन्तु इस धारा में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, इस अधिनियम की कोई भी बात, इस अधिनियम द्वारा यथा परिभाषित समुद्री-बीमा की संविदा से भिन्न बीमा की किसी संविदा को लागू किसी विधि के नियम को परिवर्तित या प्रभावित नहीं करेगी ।

स्पष्टीकरण-समुद्री उद्यम के सदृश कोई उद्यम" के अन्तर्गत ऐसा कोई उद्यम है, जिसमें कोई पोत, माल या अन्य जंगम वस्तु, स्थानीय या अन्तर्देशीय अभिवहन के आनुषंगिक संकटों के लिए उच्छन्न है ।

5. विधिपूर्ण समुद्री उद्यम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक विधिपूर्ण समुद्री उद्यम, समुद्री-बीमा की संविदा का विषय हो सकता है ।

बीमा-योग्य हित

6. पंदयम् संविदाओं का परिवर्जन-(1) पंदयम् के रूप में, समुद्री-बीमा की प्रत्येक संविदा शून्य है ।

                (2) समुद्री-बीमा की संविदा पंदयम् संविदा तब समझी जाएगी-

(क) जब बीमाकृत का, इस अधिनियम द्वारा परिभाषित रूप में कोई बीमा-योग्य हित नहीं है और संविदा ऐसा कोई हित अर्जित करने की प्रत्याशा से नहीं की गई है;

(ख) जब पालिसी हित है या नहीं" या पालिसी से भिन्न हित का कोई अतिरिक्त सबूत नहीं है" या बीमाकर्ता को उद्धारण का लाभ नहीं" या वैसे ही किसी अन्य निबन्धन के अधीन रहते हुए, की गई है:

                परन्तु यदि उद्धारण की कोई संभावना नहीं है, तो पालिसी बीमाकर्ता को उद्धारण का लाभ नहीं" के रूप में की जा सकती है ।

7. बीमा-योग्य हित की परिभाषा-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति का, जो किसी समुद्री उद्यम में हितबद्ध है, बीमा-योग्य हित होता है ।

                (2) विशिष्टतया कोई व्यक्ति किसी समुद्री उद्यम में तब हितबद्ध होता है जब उस उद्यम या बीमा की गई ऐसी किसी सम्पत्ति से उसका कोई विधिक या साम्यिक् सम्बन्ध होता है जो जोखिम में पड़ सकती है और जिसके परिणामस्वरूप बीमा की गई सम्पत्ति के सुरक्षापूर्वक या सम्यक् आगमन से उसे फायदा हो सकता है या उसकी हानि या नुकसान से या उसके रोक लिए जाने से उस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है या उसके बारे में वह दायित्व उपगत कर सकता है ।

8. हित कब सम्बद्ध होना चाहिए-(1) बीमाकृत व्यक्ति का बीमाकृत विषयवस्तु में हित उस समय होना चाहिए जब ऐसी विषयवस्तु की हानि होती है, भले ही उसका ऐसा हित बीमा किए जाने के समय न रहा हो:

                परन्तु यदि विषयवस्तु का बीमा, हानि है या नहीं" के रूप में किया गया है, तो बीमाकृत, भले ही उसने हानि होने के बाद अपना हित अर्जित किया है, वसूली कर सकता है, किन्तु तब नहीं जब बीमा की संविदा करते समय बीमाकृत को हानि के बारे में जानकारी थी और बीमाकर्ता को नहीं ।

                (2) यदि बीमाकृत का, हानि के समय कोई हित नहीं है तो वह उसकी हानि के बारे में जानकारी प्राप्त होने के पश्चात् ऐसा हित किसी कार्य या निर्वाचन द्वारा अर्जित नहीं कर सकता है ।

9. विफलनीय या समाश्रित हित-(1) विफलनीय हित बीमायोग्य है, वैसे ही समाश्रित हित भी ।

                (2) विशिष्टतया, यदि माल के क्रेता ने उसका बीमा करा लिया है तो उसका, इस बात के होते हुए भी, बीमायोग्य हित होता है कि उसने विक्रेता द्वारा माल के परिदान में विलम्ब कर दिए जाने के कारण या अन्यथा, माल अपने निर्वाचन के अनुसार, अस्वीकार कर दिया है या उसे विक्रेता की जोखिम पर मान लिया है ।

10. आंशिक हित-किसी भी प्रकार का आंशिक हित बीमायोग्य है ।

11. पुनर्बीमा-(1) समुद्री-बीमा की संविदा के अधीन बीमाकर्ता का, अपनी जोखिम में बीमायोग्य हित होता है और वह उसके संबंध में पुनर्बीमा करा सकता है ।

                (2) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबंध नहीं है, मूल बीमाकृत का ऐसे पुनर्बीमा के संबंध में कोई अधिकार या हित नहीं होता है ।

12. वाटमरी-वाटमरी पर या जहाजी माल बंधपत्र पर धन उधार देने वाले व्यक्ति का, उधार के संबंध में, बीमायोग्य हित होता है ।

13. मास्टर तथा नाविक की मजदूरी-किसी पोत के मास्टर या कर्मीदल के सदस्य का अपनी मजदूरी के संबंध में बीमायोग्य हित होता है ।

14. अग्रिम ढुलाई-भाड़ा-अग्रिम ढुलाई-भाड़े की दशा में, अग्रिम ढुलाई भाड़ा देने वाले व्यक्ति का, जहां तक कि ऐसा ढुलाई-भाड़ा हानि की दशा में प्रतिसंदेय नहीं है, बीमायोग्य हित होता है ।

15. बीमा के प्रभार-बीमाकृत का किसी ऐसे बीमा के, जो वह कराता है, प्रभारों में बीमायोग्य हित होता है ।

16. हित का परिमाण-(1) यदि बीमाकृत विषयवस्तु बंधक की जाती है तो बंधककर्ता का उसके सम्पूर्ण मूल्य में बीमायोग्य हित होता है और बंधकदार का बंधक के अधीन शोध्य या शोध्य होने वाली किसी राशि के संबंध में बीमायोग्य हित होता है ।

                (2) बंधकदार, परेषिती या बीमाकृत विषयवस्तु में हित रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति, हितबद्ध अन्य व्यक्तियों की ओर से तथा उनके फायदे के लिए, तथा स्वयं अपने फायदे के लिए भी, बीमा करा सकता है ।

                (3) बीमा की गई सम्पत्ति के स्वामी का ऐसी सम्पत्ति के पूरे मूल्य के संबंध में, इस बात के होते हुए भी, बीमायोग्य हित होता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने हानि की दशा में, उसकी क्षतिपूर्ति करने का करार किया है या वह उसके लिए दायी है ।

17. हित का समनुदेशन-यदि बीमाकृत बीमा की गई विषयवस्तु में अपना हित समनुदेशित करता है या अन्यथा उससे विलग हो जाता है तो इससे समनुदेशिती को, बीमे की संविदा के अधीन बीमाकृत के अधिकार तब तक अन्तरित नहीं होंगे जब तक कि समनुदेशिती के साथ अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से उस प्रभाव का करार नहीं किया गया है:

                किन्तु इस धारा के उपबन्ध, विधि के प्रवर्तन द्वारा हित संचरण को प्रभावित नहीं करते हैं ।

बीमा किया गया मूल्य

18. बीमायोग्य मूल्य का परिमाण-पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध या मूल्यांकन के अधीन रहते हुए, बीमाकृत विषयवस्तु का बीमा किया गया मूल्य, निम्नलिखित रूप में ही अभिनिश्चित किया जाएगा, अर्थात्: -

(1) पोत के बीमे की दशा में, उसका बीमा किया गया मूल्य वह मूल्य है जो जोखिम के प्रारम्भ पर उसका होता है और उसके अन्तर्गत पोत की सज्जा-सामग्री और अधिकारियों तथा कर्मीदल के लिए रसद और स्टोर, नाविकों की मजदूरी के लिए दिया गया अग्रिम धन और पालिसी द्वारा अनुज्ञात जलयात्रा या उद्यम के लिए पोत को योग्य बनाए रखने के लिए उपगत अन्य संवितरण (यदि कोई है) और सम्पूर्ण पर बीमा के प्रभार हैं;

वाष्प पोत की दशा में, बीमा किए गए मूल्य के अन्तर्गत बीमाकृत के स्वामित्व वाली मशीनरी, बायलर, तथा कोयला और इंजिन स्टोर है, वाष्प से भिन्न शक्ति द्वारा चालित किसी पोत की दशा में, बीमाकृत के स्वामित्व वाली मशीनरी तथा ईंधन और इंजिन स्टोर भी है; और किसी विशेष व्यापार में लगे हुए किसी पोत की दशा में, उस व्यापार के लिए आवश्यक मामूली फिटिंग भी उसके अन्तर्गत है;

(2) ढुलाई-भाड़े के बीमे की दशा में, चाहे वह अग्रिम या अन्यथा दिया गया है, बीमाकृत की जोखिम पर ढुलाई-भाड़े की कुल रकम और बीमा के प्रभार, बीमा किया गया मूल्य है;

(3) माल या वाणिज्या के बीमे की दशा में बीमा किया गया मूल्य बीमाकृत सम्पत्ति की मूल लागत है, और उसके अन्तर्गत पोत परिवहन के खर्च तथा उसके आनुषंगिक खर्च और सम्पूर्ण पर बीमे के प्रभार भी हैं;

(4) किसी अन्य विषयवस्तु के बीमे में बीमा किया गया मूल्य, पालिसी सम्बद्ध होने के समय बीमाकृत की जोखिम ग्रस्त होने वाली रकम और बीमा के प्रभार हैं ।

प्रकटन और व्यपदेशन

19. बीमा आत्यन्तिक सद्भाव है-समुद्री बीमे की संविदा आत्यन्तिक सद्भाव पर आधारित संविदा है, और यदि आत्यन्तिक सद्भाव का किसी एक पक्षकार द्वारा अनुपालन नहीं किया जाता है तो अन्य पक्षकार द्वारा संविदा परिवर्तित की जा सकती है ।

20. बीमाकृत द्वारा प्रकटन-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, बीमाकृत को संविदा पूर्ण होने से पहले, बीमाकर्ता को ऐसी महत्वपूर्ण परिस्थिति प्रकट कर देनी चाहिए जो बीमाकृत को ज्ञात है, और बीमाकृत के बारे में यह समझा जाएगा कि उसे ऐसी प्रत्येक परिस्थिति ज्ञात है जो कारबार के मामूली अनुक्रम में उसे ज्ञात होनी चाहिए । यदि बीमाकृत ऐसा प्रकटन करने में चूक करता है तो बीमाकर्ता संविदा को परिवर्जित कर सकता है ।

                (2) ऐसी प्रत्येक परिस्थिति महत्वपूर्ण है, जो प्रीमियम नियत करने या यह अभिनिश्चित करने में कि जोखिम उठाई जाए या नहीं किसी प्रज्ञावान बीमाकर्ता के निर्णय पर असर डालती है ।

                (3) पूछताछ के अभाव में निम्नलिखित परिस्थितियों का प्रकटन आवश्यक नहीं है, अर्थात्: -

(क) कोई ऐसी परिस्थिति जो जोखिम को कम करती है;

(ख) कोई ऐसी परिस्थिति जो बीमाकर्ता को ज्ञात है या उसे ज्ञात होने की उपधारणा की जाती है । बीमाकर्ता से यह उपधारणा की जाती है कि उसे साधारण प्रसिद्धि या ज्ञान और ऐसी बातों की जानकारी है जो बीमाकर्ता की हैसियत में बीमाकर्ता को अपने कारबार के मामूली अनुक्रम में होनी चाहिए;

(ग) कोई ऐसी परिस्थिति जिसके बारे में बीमाकर्ता द्वारा जानकारी अधित्यक्त की गई है;

(घ) कोई ऐसी परिस्थिति जिसका, किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वारण्टी के कारण, प्रकटन अनावश्यक है ।

                (4) कोई ऐसी विशिष्ट परिस्थिति, जिसका प्रकटन नहीं किया गया है, महत्वपूर्ण है या नहीं, यह प्रत्येक मामले में तथ्य का प्रश्न होगा ।

                (5) परिस्थिति" शब्द के अन्तर्गत, बीमाकृत द्वारा किया गया कोई पत्राचार या उसके द्वारा प्राप्त कोई जानकारी है ।

21. बीमा करने वाले अभिकर्ता द्वारा प्रकटन-पूर्ववर्ती धारा की ऐसी परिस्थितियों से, जिनका प्रकटन अनावश्यक है, सम्बन्धित उपबन्धों के अधीन रहते हुए, यदि कोई अभिकर्ता, बीमाकृत के लिए बीमा करता है, तो अभिकर्ता बीमाकर्ता से निम्नलिखित प्रकटन करेगा, अर्थात्: -

(क) ऐसी प्रत्येक महत्वपूर्ण परिस्थिति जो उसे ज्ञात है और बीमा करने वाले अभिकर्ता के बारे में यह समझा जाएगा कि उसे ऐसी प्रत्येक परिस्थिति ज्ञात है जो कारबार के मामूली अनुक्रम में उसे ज्ञात होनी चाहिए या उसे संसूचित की गई है; और

(ख) ऐसी महत्वपूर्ण प्रत्येक परिस्थिति जिसका प्रकटन बीमाकृत करने के लिए आबद्ध है किन्तु तब नहीं जब ऐसी परिस्थिति, अभिकर्ता को संसूचित करने के लिए, अधिक विलम्ब से ज्ञात हुई है ।

22. संविदा की बातचीत लम्बित होने तक व्यपदेशन-(1) संविदा के लिए बातचीत के दौरान और संविदा पूर्ण होने से पूर्व, बीमाकर्ता को बीमाकृत या उसके अभिकर्ता द्वारा किया गया प्रत्येक महत्वपूर्ण व्यपदेशन सत्य होना चाहिए । यदि वह सत्य नहीं है तो बीमाकर्ता संविदा का परिवर्जन कर सकता है ।

                (2) ऐसा प्रत्येक व्यपदेशन महत्वपूर्ण है, जो प्रीमियम नियत करने या यह अभिनिश्चित करने में कि जोखिम उठाई जाए या नहीं, प्रज्ञावान बीमाकर्ता के निर्णय पर असर डालता है ।

                (3) व्यपदेशन या तो तथ्य की बात के बारे में या प्रत्याशा या विश्वास की बात के बारे में, हो सकता है ।

                (4) तथ्य की बात के बारे में व्यपदेशन तभी सत्य होगा जब वह सारतः सही है, अर्थात्, जब व्यपदिष्ट की गई और वास्तविक बात के बीच अन्तर को कोई प्रज्ञावान बीमाकर्ता महत्वपूर्ण न माने ।

                (5) प्रत्याशा या विश्वास की बात के बारे में व्यपदेशन तभी सत्य होगा जब वह सद्भावपूर्वक किया जाए ।

                (6) संविदा के पूर्ण होने के पूर्व व्यपदेशन वापस लिया जा सकता है या उसे ठीक किया जा सकता है ।

                (7) कोई विशिष्ट व्यपदेशन महत्वपूर्ण है या नहीं, यह प्रत्येक मामले में तथ्य का प्रश्न होगा ।

23. कब संविदा पूर्ण हुई समझी जाएगी-समुद्री बीमे की संविदा तब पूर्ण हुई समझी जाएगी जब बीमाकर्ता, बीमाकृत के प्रस्ताव को स्वीकार कर ले, चाहे पालिसी उस समय जारी की गई है या नहीं, और कब प्रस्ताव स्वीकार किया गया है, यह दर्शित करने के लिए संविदा की पर्ची, जोखिम ग्रहण पत्र या रूढ़िगत अन्य ज्ञापन के प्रति, भले ही वह स्टाम्पित नहीं है, निर्देश किया जा सकता है ।

पालिसी

24. संविदा पालिसी में ही सन्निविष्ट की जाएगी-समुद्री बीमे की कोई संविदा तब तक साक्ष्य में स्वीकार नहीं की जाएगी जब तक इस अधिनियम के अनुसार वह किसी समुद्री पालिसी में सन्निविष्ट नहीं है । पालिसी या तो उस समय, जब संविदा पूर्ण होती है या तत्पश्चात्वर्ती किसी समय, निष्पादित या जारी की जा सकती है ।

25. पालिसी में क्या विनिर्दिष्ट किया जाना चाहिए-समुद्री पालिसी में निम्नलिखित विनिर्दिष्ट किया जाएगा, अर्थात्: -

(1) बीमाकृत का या किसी ऐसे व्यक्ति का नाम, जो उसकी ओर से बीमा करता है;

(2) बीमाकृत विषयवस्तु और जोखिम, जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है;

(3) बीमा के अन्तर्गत आने वाली, यथास्थिति, जल यात्रा या समयावधि या दोनों;

(4) बीमाकृत राशि या राशियां;

(5) बीमाकर्ता या बीमाकर्ताओं के नाम ।

26. बीमाकर्ता के हस्ताक्षर-(1) समुद्री पालिसी पर बीमाकर्ता द्वारा या उसकी ओर से हस्ताक्षर किए जाएंगे ।

                (2) यदि पालिसी पर दो या अधिक बीमाकर्ताओं द्वारा या उनकी ओर से हस्ताक्षर किए जाते हैं, तो जब तक कि कोई प्रतिकूल बात अभिव्यक्त नहीं की जाती है, प्रत्येक हस्ताक्षर से बीमाकृत के साथ सुभिन्न संविदा गठित होगी ।

27. जल यात्रा तथा समय पालिसियां-(1) यदि संविदा की विषयवस्तु का बीमा किसी स्थान पर तथा उससे या एक स्थान से दूसरे स्थान या अन्य स्थानों के लिए किया जाता है तो पालिसी जल-यात्रा पालिसी" कही जाती है और यदि संविदा की विषयवस्तु का बीमा किसी निश्चित समयावधि के लिए किया जाता है तो पालिसी समय पालिसी" कही जाती है । जलयात्रा तथा समय दोनों के लिए संविदा, एक ही पालिसी में की जा सकती है ।

                (2) बारह मास से अधिक समय के लिए की गई पालिसी अविधिमान्य है ।

28. विषयवस्तु और उसका नाम-(1) बीमाकृत विषयवस्तु के नाम का समुद्री पालिसी में, उचित निश्चितता से उल्लेख किया जाएगा ।

                (2) बीमाकृत विषयवस्तु में बीमाकृत के हित की प्रकृति तथा सीमा, पालिसी में विनिर्दिष्ट करना आवश्यक नहीं है ।

                (3) यदि पालिसी में बीमाकृत विषयवस्तु के नाम का उल्लेख साधारण रूप में किया जाता है तो यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस हित के बारे में है जिसे पालिसी के अन्तर्गत करने का बीमाकृत का आशय था ।

                (4) इस धारा को लागू करने में, ऐसी किसी प्रथा को ध्यान में रखा जाएगा जो बीमाकृत विषयवस्तु के नाम के उल्लेख को विनियमित करती है ।

29. निश्चित मूल्य पालिसी-(1) पालिसी या तो निश्चित मूल्य पालिसी हो सकती है या अनिश्चित मूल्य पालिसी ।

                (2) निश्चित मूल्य पालिसी वह पालिसी है जिसमें, बीमाकृत विषयवस्तु का करार किया गया मूल्य, विनिर्दिष्ट है ।

                (3) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए और कपट के अभाव में पालिसी द्वारा नियत मूल्य, बीमाकर्ता तथा बीमाकृत के बीच, बीमा किए जाने के लिए आशयित विषय के बीमा किए गए मूल्य का निश्चायक है, चाहे हानि पूर्ण हुई है या आंशिक ।

                (4) जब तक पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया जाता, पालिसी द्वारा नियत मूल्य यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए निश्चायक नहीं है कि कोई आन्वयिक कुल हानि हुई है या नहीं ।

30. अनिश्चित मूल्य पालिसी-अनिश्चित मूल्य पालिसी वह पालिसी है जिसमें बीमाकृत विषयवस्तु का मूल्य विनिर्दिष्ट नहीं है, किन्तु उसमें बीमाकृत राशि की सीमा के अधीन रहते हुए, इसमें इसके पूर्व स्पष्ट की गई रीति में बीमा किए गए मूल्य की तत्पश्चात् अभिनिश्चित करने की व्यवस्था की जाती है ।

31. पोत या पोतों के लिए प्लवमान पालिसी-(1) प्लवमान पालिसी वह पालिसी है जिसमें बीमा का साधारण शब्दों में वर्णन किया जाता है और पश्चात्वर्ती घोषणा द्वारा पोत या पोतों के नाम या अन्य विशिष्टियां अभिनिश्चित करने की व्यवस्था की जाती है ।

                (2) पश्चात्वर्ती घोषणा या घोषणाएं, पालिसी पर पृष्ठांकन द्वारा या अन्य रूढ़िगत रीति में की जा सकती है या की जा सकती हैं ।

                (3) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया जाता, घोषणाएं, प्रेषण या नौभरण के क्रम में की जानी चाहिए । माल के मामले में उनमें, पालिसी के निबन्धनों के भीतर, सभी परेषणों को समाविष्ट किया जाएगा और उनमें माल या अन्य सम्पत्ति के मूल्य का ईमानदारी से कथन किया जाएगा, किन्तु किसी लोप या त्रुटिपूर्ण घोषणा को, हानि होने या आगमन के पश्चात् भी सुधारा जा सकता है परन्तु यह तब जब लोप या घोषणा सद्भावपूर्वक की गई है ।

                (4) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया जाता, यदि मूल्य की घोषणा, हानि या आगमन की सूचना के पश्चात् की जाती है तो उस घोषणा की विषयवस्तु के बारे में उस पालिसी को अनिश्चित मूल्य पालिसी समझा जाएगा ।

32. पालिसी के निबंधनों का अर्थान्वयन-(1) पालिसी अनुसूची में दिए गए प्ररूप में हो सकती है ।

                (2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, और जब तक कि पालिसी के सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, अनुसूची में प्रयुक्त शब्दों और पदों का वही विस्तार और अर्थ लगाया जाएगा जो अनुसूची में उनका है ।

33. प्रीमियम की व्यवस्था करना-(1) यदि बीमा ऐसे किसी प्रीमियम पर किया जाता है जिसकी व्यवस्था की जानी है, और ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की जाती है तो कोई उचित प्रीमियम संदेय होगा ।

                (2) यदि ऐसे निबन्धनों पर बीमा किया जाता है कि उल्लिखित घटना के घटित होने पर अतिरिक्त प्रीमियम की व्यवस्था की जानी है, और वह घटना घटित होती है किन्तु कोई व्यवस्था नहीं की जाती है, तो उचित अतिरिक्त प्रीमियम संदेय होगा ।

34. दोहरा बीमा-(1) यदि बीमाकृत द्वारा या उसकी ओर से, एक ही उद्यम तथा हित या उसके किसी भाग के लिए दो या अधिक पालिसियां ली जाती हैं, और बीमा की गई राशियां इस अधिनियम द्वारा अनुज्ञात क्षतिपूर्ति से अधिक हैं, तो यह कहा जाएगा कि बीमाकृत का, दोहरे बीमे द्वारा, अधिक बीमा किया गया है ।

                (2) यदि बीमाकृत का, दोहरे बीमे द्वारा, अधिक बीमा किया जाता है, -

(क) तो बीमाकृत, जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं है, बीमाकर्ताओं से ऐसे क्रम में संदायों का दावा कर सकता है जैसा वह ठीक समझे, परन्तु वह इस अधिनियम द्वारा अनुज्ञात क्षतिपूर्ति के आधिक्य में कोई राशि प्राप्त करने का हकदार नहीं होगा;

(ख) और पालिसी, जिसके अधीन बीमाकृत दावा करता है, निश्चित मूल्य पालिसी है तो बीमाकृत को, किसी अन्य पालिसी के अधीन उसके द्वारा प्राप्त की गई किसी राशि को, बीमाकृत विषयवस्तु के वास्तविक मूल्य को ध्यान में न रखते हुए, मूल्यांकन में से विकलित करना होगा;

(ग) और पालिसी, जिसके अधीन बीमाकृत दावा करता है, अनिश्चित मूल्य पालिसी है, तो बीमाकृत को, बीमा किए गए पूरे मूल्य में से, किसी अन्य पालिसी के अधीन उसके द्वारा प्राप्त की गई किसी राशि को, विकलित करना होगा;

(घ) और बीमाकृत, इस अधिनियम द्वारा अनुज्ञात क्षतिपूर्ति के आधिक्य में कोई राशि प्राप्त करता है तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि वह उसे, बीमाकर्ताओं के अभिदाय करने के पारस्परिक अधिकार के अनुसार, न्यास के रूप में धारण करता है ।

वारंटी, आदि

35. वारंटी की प्रकृति-(1) वारंटियों से सम्बन्धित निम्नलिखित धाराओं में, वारंटी से वचन-वारंटी अभिप्रेत है, अर्थात् ऐसी वारंटी जिसके द्वारा बीमाकृत वचन देता है कि कुछ विशिष्ट बात की जाएगी या नहीं की जाएगी या कोई शर्त पूरी की जाएगी अथवा जिसके द्वारा वह यह प्रतिज्ञान या इंकार करता है कि कोई विशिष्ट तथ्य विद्यमान है ।

                (2) वारंटी अभिव्यक्त या विवक्षित हो सकती है ।

                (3) ऊपर परिभाषित रूप में वारंटी, एक ऐसी शर्त है जिसका अनुपालन यथावत् रूप में किया जाना चाहिए, चाहे वह जोखिम के लिए महत्वपूर्ण है या नहीं । यदि उसका इस प्रकार अनुपालन नहीं किया जाता है तो, पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, बीमाकर्ता वारंटी के भंग की तारीख से, किन्तु उस तारीख से पूर्व उसके द्वारा उपगत किसी दायित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, दायित्व से मुक्त हो जाएगा ।

36. कब वारंटी का भंग माफ किया जाता है-(1) वारंटी का अननुपालन तब माफ किया जाता है जब परिस्थितियों में परिवर्तन के कारण, संविदा की परिस्थितियों को वारंटी का लागू होना समाप्त हो जाता है या जब वारंटी का अनुपालन किसी पश्चात्वर्ती विधि के कारण विधिविरुद्ध हो जाता है ।

                (2) यदि वारंटी भंग होती है, तो बीमाकृत इस प्रतिरक्षा का लाभ नहीं उठा सकता है कि हानि होने से पहले भंग का उपचार और वारंटी का अनुपालन कर दिया गया है ।

                (3) बीमाकर्ता वारंटी-भंग का अधित्यजन कर सकता है ।

37. अभिव्यक्त वारंटी-(1) अभिव्यक्त वारंटी किसी भी प्रकार के ऐसे शब्दों में हो सकती है जिससे वारंटी देने के आशय का अनुमान लगाया जा सकता है ।

                (2) अभिव्यक्त वारंटी पालिसी में सम्मिलित की जानी चाहिए या उस पर लिखी जानी चाहिए या ऐसी किसी दस्तावेज में अन्तर्विष्ट होनी चाहिए जो पालिसी में निर्दिष्ट की गई है ।

                (3) अभिव्यक्त वारंटी से विवक्षित वारंटी अपवर्जित नहीं है जब तक कि वह उससे असंगत नहीं है ।

38. तटस्थता की वारंटी-(1) यदि बीमा योग्य सम्पत्ति के, चाहे वह पोत है या माल, बारे में तटस्थता की अभिव्यक्त वारंटी दी जाती है तो यह एक विवक्षित शर्त होती है कि जोखिम के प्रारम्भ पर सम्पत्ति का तटस्थ स्वरूप होगा, और यह कि उसके तटस्थ स्वरूप का, जहां तक बीमाकृत उस बाबत नियन्त्रण रख सकता है, जोखिम के दौरान परिरक्षण किया जाएगा ।

                (2) जहां किसी पोत के बारे में तटस्थता की अभिव्यक्त वारंटी दी जाती है, वहां एक विवक्षित शर्त यह भी होती है कि पोत पर, जहां तक कि बीमाकृत उस बाबत नियंत्रण रख सकता है, आवश्यक दस्तोवज रखे जाएंगे, अर्थात्, उसकी तटस्थता स्थापित करने के लिए उस पर आवश्यक कागजपत्र रहेंगे और वह अपने कागजपत्रों का न तो मिथ्याकरण करेगा, न उन्हें दबाएगा और न नकली कागजपत्रों का उपयोग करेगा । यदि इस शर्त के भंग के कारण कोई हानि होती है तो बीमाकर्ता संविदा को परिवर्जित कर सकता है ।

39. राष्ट्रिकता की कोई भी विवक्षित वारंटी नहीं-किसी पोत की राष्ट्रिकता के या इस बारे में कि जोखिम के दौरान उसकी राष्ट्रिकता में परिवर्तन नहीं किया जाएगा, कोई भी विवक्षित वारंटी नहीं होती है ।

40. अच्छी सुरक्षा की वारंटी-यदि बीमाकृत विषयवस्तु के, किसी विशिष्ट दिन को अच्छी" या अच्छी सुरक्षा में" होने की वारंटी दी जाती है तो यह पर्याप्त है कि उस दिन के दौरान वह किसी भी समय सुरक्षित हो ।

41. पोत के जलयात्रा योग्य होने की वारंटी-(1) जलयात्रा पालिसी में यह एक विवक्षित वारंटी होती है कि जलयात्रा के प्रारम्भ पर, पोत बीमाकृत विशिष्ट उद्यम के प्रयोजन के लिए, यात्रा योग्य होगा ।

                (2) यदि पोत के पत्तन में होने के समय कोई पालिसी सम्बद्ध है तो यह एक विवक्षित वारंटी भी होती है कि जोखिम के प्रारम्भ पर वह पत्तन के साधारण संकटों का सामना करने के योग्य होगा ।

                (3) यदि पालिसी ऐसी जलयात्रा से सम्बन्धित है जो विभिन्न प्रक्रमों में की जाती है और जिसके दौरान पोत को विभिन्न प्रकार की या अतिरिक्त तैयारी या उपस्कर की आवश्यकता होती है तो यह एक विवक्षित वारंटी होती है कि पोत, प्रत्येक प्रक्रम के प्रारम्भ पर उस प्रक्रम के प्रयोजनों के लिए, ऐसी तैयारी या उपस्कर की दृष्टि से, जलयात्रा योग्य है ।

                (4) पोत तब जलयात्रा योग्य समझा जाता है जब बीमाकृत उद्यम के सम्बन्ध में समुद्र के साधारण संकटों का मुकाबला करने के लिए वह सभी प्रकार से योग्य है ।

(5) समय पालिसी में यह विवक्षित वारंटी नहीं होती है कि उद्यम के किसी प्रक्रम पर पोत जलयात्रा योग्य होगा, किन्तु यदि, बीमाकृत की गुप्त जानकारी से पोत ऐसी दशा में, जब वह जलयात्रा योग्य नहीं है, भेजा जाता है तो बीमाकर्ता ऐसी किसी हानि के लिए दायी नहीं होगा जो पोत के जलयात्रा योग्य न होने के कारण मानी जा सकती है ।

42. माल यात्रा योग्य है, इसकी कोई विवक्षित वारंटी होना-(1) माल या अन्य जंगम वस्तु की पालिसी में ऐसी कोई भी विवक्षित वारंटी नहीं होती है कि माल या जंगम वस्तुएं जलयात्रा योग्य हैं ।

                (2) माल या अन्य जंगम वस्तुओं की जलयात्रा पालिस में यह एक विवक्षित वारंटी होती है कि जलयात्रा के प्रारम्भ पर पोत ने केवल पोत के रूप में जलयात्रा योग्य है वरन् यह भी कि वह पालिसी में अनुज्ञात गन्तव्य स्थान को माल या अन्य जंगम वस्तुओं का वहन करने के लिए भी उचित रूप से योग्य है ।

43. वैधता की वारंटी-यह एक विवक्षित वारंटी होती है कि बीमाकृत उद्यम विधिपूर्ण है और जहां तक बीमाकृत उस पर नियंत्रण रख सकता है, उद्यम विधिपूर्ण रीति में कार्यान्वित किया जाएगा ।

जलयात्रा

44. जोखिम के प्रारंभ होने के बारे में विवक्षित शर्तें-(1) यदि जलयात्रा पालिसी द्वारा विषयवस्तु का बीमा किसी विशिष्ट स्थान पर और से" या से" के रूप में किया गया है, तो यह आवश्यक नहीं है कि वह पोत उसी स्थान पर होना चाहिए जहां पर संविदा की जाती है किन्तु एक विवक्षित शर्त यह होती है कि उद्यम उचित समय के भीतर प्रारम्भ कर दिया जाएगा और यदि उद्यम इस प्रकार प्रारम्भ नहीं किया जाता है, तो बीमाकर्ता संविदा का परिवर्जन कर सकता है ।

                (2) विवक्षित शर्त को यह दर्शित करते हुए कि विलम्ब ऐसी परिस्थितियों के कारण हुआ है जो बीमाकर्ता को संविदापूर्ण होने से पूर्व ज्ञात थीं या यह दर्शित करते हुए, नकारा जा सकता है कि उसने उस शर्त का अधित्यजन कर दिया है ।

45. प्रस्थान के पत्तन का परिवर्तन-यदि प्रस्थान का स्थान पालिसी में विनिर्दिष्ट कर दिया गया है और पोत उस स्थान से प्रस्थान करने की बजाय किसी अन्य स्थान से प्रस्थान करता है तो जोखिम सम्बद्ध नहीं होगी ।

46. भिन्न गन्तव्य स्थान के लिए प्रस्थान-यदि पालिसी में गन्तव्य स्थान विनिर्दिष्ट है और पोत, उस गन्तव्य स्थान के लिए प्रस्थान करने की बजाय किसी अन्य गन्तव्य स्थान के लिए प्रस्थान करता है, तो जोखिम सम्बद्ध नहीं होगी ।

47. जलयात्रा में परिवर्तन-(1) यदि जोखिम के प्रारम्भ के पश्चात्, पोत का गन्तव्य स्थान पालिसी द्वारा अनुध्यात गन्तव्य स्थान से, स्वेच्छा से, परिवर्तित कर दिया जाता है, तो यह कहा जाएगा कि जलयात्रा में परिवर्तन हुआ है ।

                (2) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं है, यदि जलयात्रा में परिवर्तन होता है, तो बीमाकर्ता ऐसे परिवर्तन के समय से अर्थात् उस समय से जब परिवर्तन करने का विनिश्चय प्रकट किया जाता है, दायित्व से मुक्त हो जाता है, और यह महत्वपूर्ण नहीं है कि पोत, पालिसी द्वारा अनुध्यात जलयात्रा मार्ग को, हानि होने के समय तक, वस्तुतः छोड़ चुका है ।

48. विचलन-(1) यदि कोई पोत किसी विधिपूर्ण कारण के बिना, पालिसी द्वारा अनुध्यात जलयात्रा से विचलन करता है, तो बीमाकृत विचलन के समय से दायित्व से मुक्त हो जाता है और यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई हानि होने से पूर्व पोत, अपना मार्ग पुनः ग्रहण कर चुका है ।

                (2) पालिसी द्वारा अनुध्यात जलयात्रा के मार्ग में विचलन तब होता है जब, -

(क) जलयात्रा का मार्ग पालिसी में विनिर्दिष्ट रूप से उल्लिखित है, और उस मार्ग से विचलन किया जाता है; या

(ख) जलयात्रा का मार्ग पालिसी में विनिर्दिष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है, किन्तु प्रायिक तथा रूढ़िगत मार्ग से विचलन किया जाता है ।

                (3) विचलन के आशय का कोई महत्व नहीं है । संविदा के अधीन बीमाकर्ता को उसके दायित्व से मुक्त करने के लिए, वस्तुतः विचलन आवश्यक है ।

49. उतराई के लिए कई पत्तन-(1) यदि पालिसी में माल उतारने के लिए कई पत्तन विनिर्दिष्ट हैं तो पोत सभी या उनमें से किसी को अग्रसर हो सकेगा, किन्तु किसी प्रथा या किसी प्रतिकूल पर्याप्त कारण से अभाव में, पोत को ऐसे सभी पत्तनों को या उनमें से ऐसे पत्तनों को, जहां वह जाए, पालिसी में उल्लिखित क्रम में अग्रसर होना चाहिए । यदि वह ऐसा नहीं करता है तो विचलन होगा ।

                (2) यदि पालिसी किसी दिए गए क्षेत्र के भीतर उतराई के पत्तनों तक" के, जिनका नाम नहीं दिया गया है, लिए है तो, किसी प्रथा या किसी प्रतिकूल पर्याप्त कारण के अभाव में, पोत को ऐसे सभी पत्तनों को या उनमें से ऐसे पत्तनों को, जहां वह जाए, भौगोलिक क्रम में अग्रसर होना चाहिए । यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह विचलन होगा ।

50. जलयात्रा में विलम्ब-किसी जलयात्रा पालिसी के मामले में, बीमाकृत उद्यम को उसके सम्पूर्ण अनुक्रम में उचित त्वरा से अग्रसर किया जाना चाहिए और यदि विधिपूर्ण कारण के बिना उसे इस प्रकार अग्रसर नहीं किया जाता है तो बीमाकर्ता अनुचित विलम्ब होने के समय से, दायित्व से मुक्त हो जाएगा ।

51. विचलन या विलम्ब के लिए माफी-(1) पालिसी द्वारा अनुध्यात जलयात्रा को अग्रसर करने में होने वाले विचलन या विलम्ब को उस दशा में माफ कर दिया जाता है, जब वह-

(क) पालिसी में किसी विशेष निबन्धन द्वारा प्राधिकृत है; या

(ख) ऐसी परिस्थितियों में हुआ है जो मास्टर या उसके नियोजक के नियंत्रण से परे थीं; या

(ग) किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वारण्टी के अनुपालन के लिए उचित रूप में आवश्यक है; या

(घ) पोत की या बीमाकृत विषयवस्तु की सुरक्षा के लिए उचित रूप में आवश्यक है; या

(ङ) मानव-जीवन की रक्षा के लिए या संकटग्रस्त किसी पोत की, जब मानव-जीवन के लिए खतरा है, सहायता करने के प्रयोजन के लिए है; या

(च) पोत के किसी व्यक्ति की चिकित्सा या शल्य चिकित्सा कराने के प्रयोजन के लिए उचित रूप से आवश्यक है; या

(छ) मास्टर या कर्मीदल के नाविक कर्तव्य-भंग के कारण हुआ है किन्तु यह तब जब जिन संकटों के विरुद्ध बीमा कराया गया है उनमें से नाविक कर्तव्य-भंग एक है ।

                (2) यदि विचलन या विलम्ब को माफ करने के कारण का प्रवर्तन समाप्त हो जाता है तो पोत को अपना मार्ग पुनः ग्रहण करना होगा और अपनी जलयात्रा समुचित त्वरा के करनी होगी ।

पालिसी का समनुदेशन

52. पालिसी कब और किस प्रकार समनुदेशन योग्य है-(1) समुद्री पालिसी समनुदेशन द्वारा अन्तरित की जा सकती है किन्तु तब नहीं जब उसमें समनुदेशन को प्रतिषिद्ध करने के लिए कोई अभिव्यक्त निबन्धन अन्तर्विष्ट है । वह हानि के पूर्व या उसके पश्चात् समनुदेशित की जा सकती है ।

                (2) यदि कोई समुद्री पालिसी इस प्रकार समनुदेशित की जाती है कि ऐसी पालिसी में फायदाप्रद हित संक्रांत हो जाता है, तो पालिसी का समनुदेशिती उस पर वाद स्वयं अपने नाम में लाने का हकदार होगा और प्रतिवादी संविदा से उद्भूत होने वाली कोई ऐसी प्रतिरक्षा करने का हकदार होगा जो वह उस व्यक्ति के नाम में, जिसके द्वारा या जिसकी ओर से पालिसी की गई थी, वाद लाए जाने की दशा में प्रतिरक्षा करने का हकदार होता ।

                (3) समुद्री पालिसी, उस पर पृष्ठांकन द्वारा या अन्य रूढ़िगत रीति में, समनुदेशित की जा सकती है ।

53. बीमाकृत, जिसका कोई हित नहीं है, समनुदेशन नहीं कर सकता-यदि बीमाकृत, बीमाकृत विषयवस्तु में अपने हित से विलग हो गया है या उसका ऐसा हित नहीं रह जाता है और वह ऐसा करने के पूर्व या करने के समय पालिसी के अभिव्यक्त या विवक्षित रूप में समनुदेशन के लिए सहमत नहीं हुआ है तो उस पालिसी का पश्चात्वर्ती कोई भी समनुदेशन अप्रवर्तनीय होगा:

                परन्तु इस धारा की कोई बात हानि होने के पश्चात् किसी पालिसी के समनुदेशन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी ।

54. प्रीमियम कब संदेय है-जब तक कि अन्यथा करार नहीं किया जाता, प्रीमियम का संदाय करने की बाबत बीमाकृत या उसके अभिकर्ता का कर्तव्य और बीमाकृत या उसके अभिकर्ता को पालिसी जारी करने की बाबत बीमाकर्ता का कर्तव्य, समवर्ती शर्त हैं, और जब तक प्रीमियम का संदाय या निविदान नहीं कर दिया जाता तब तक बीमाकर्ता पालिसी जारी करने के लिए आबद्ध नहीं है ।

हानि तथा परित्याग

55. सम्मिलित तथा अपवर्जित हानियां-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, और जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया गया है, बीमाकर्ता ऐसे किसी संकट से, जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है, प्रत्यक्षतः हुई किसी हानि के लिए दायी है, किन्तु यथापूर्वोक्त के अधीन रहते हुए, वह किसी ऐसी हानि के लिए दायी नहीं है जो किसी ऐसे संकट से, जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है, प्रत्यक्षतः नहीं हुई है ।

                (2) विशिष्टतया-

(क) बीमाकर्ता, बीमाकृत द्वारा जानबूझकर किए गए अवचार के कारण हुई किसी हानि के लिए दायी नहीं है, किन्तु जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया गया है, वह ऐसे किसी संकट से, जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है, प्रत्यक्षतः हुई किसी हानि के लिए दायी है, भले ही वह हानि मास्टर या कर्मीदल के अवचार या उपेक्षा के सिवाय न हुई होती;

(ख) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया गया है, पोत या माल का बीमाकर्ता, विलम्ब द्वारा प्रत्यक्षतः हुई किसी हानि के लिए दायी नहीं है, भले ही विलम्ब उस संकट के कारण हुआ जो जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है;

(ग) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया गया है, बीमाकर्ता, बीमाकृत विषयवस्तु की मामूली घिसाई, मामूली रसाव तथा टूट-फूट, अंदरूनी दोष या प्रकृति के लिए अथवा चूहों या कीड़े-मकोड़ों द्वारा प्रत्यक्षतः हुई हानि के लिए दायी नहीं है, या मशीनरी की किसी ऐसी क्षति के लिए भी दायी नहीं है जो किसी समुद्री संकट द्वारा प्रत्यक्षतः नहीं हुई है ।

56. आंशिक तथा पूर्ण हानि-(1) हानि पूर्ण या आंशिक हो सकती है । इसमें इसके पश्चात् यथा परिभाषित पूर्ण हानि से भिन्न कोई हानि आंशिक हानि है ।

                (2) पूर्ण हानि वास्तविक पूर्ण हानि हो सकती है या आन्वयिक पूर्ण हानि ।

                (3) यदि पालिसी के निबन्धनों से अन्य आशय प्रतीत नहीं होता है तो, पूर्ण हानि के लिए बीमे के अन्तर्गत आन्वयिक तथा वास्वतिक पूर्ण हानि भी है ।

                (4) यदि बीमाकृत पूर्ण हानि के लिए वाद लाता है और साक्ष्य से केवल आंशिक हानि साबित होती है तो, जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं किया गया है, वह आंशिक हानि के लिए वसूली कर सकेगा ।

                (5) यदि माल अपने गन्तव्य स्थान पर मूल रूप में पहुंच जाता है किन्तु चिह्नों के विरूपण के कारण तथा अन्यथा, वह पहचाना नहीं जा सकता है, तो हानि, यदि कोई हुई है, आंशिक हानि है, पूर्ण हानि नहीं ।

57. वास्तविक पूर्ण हानि-(1) यदि बीमा की गई विषयवस्तु नष्ट हो जाती है या इस प्रकार नुकसानग्रस्त हो जाती है कि वह बीमाकृत प्रकार की नहीं रह जाती है, या जहां बीमाकृत उससे इस प्रकार वंचित हो जाता है कि उसकी पूर्ति नहीं हो सकती है तो ऐसी दशा में वास्तविक पूर्ण हानि होती है ।

                (2) वास्तविक पूर्ण हानि की दशा में परित्याग की कोई सूचना देना आवश्यक नहीं है ।

58. लापता पोत-यदि उद्यम से सम्बद्ध पोत लापता हो जाता है और उचित समय बीत जाने के पश्चात् भी उसके बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती है तो ऐसी दशा में वास्तविक पूर्ण हानि की उपधारणा की जा सकती है ।

59. पोतान्तरण आदि का प्रभाव-यदि उस संकट के कारण, जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है, जल-यात्रा किसी मध्यवर्ती पत्तन या स्थान पर, पोत द्वारा माल वहन के लिए की गई संविदा में अन्तर्विष्ट किसी विशेष अनुबन्ध के अलावा ऐसी परिस्थितियों में, जिनमें मास्टर द्वारा माल या अन्य जंगम वस्तुओं का उतारा जाना या पुनःपोतभरण या पोतान्तरण तथा गन्तव्य स्थान को भेजा जाना न्यायोचित है, तो बीमाकर्ता का दायित्व, ऐसी उतराई या पोतान्तरण के होते हुए भी, बना रहता है ।

60. आन्वयिक पूर्ण हानि की परिभाषा-(1) पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, बीमाकृत विषयवस्तु की आन्वयिक पूर्ण हानि तब होती है जब उसका युक्तियुक्ततः परित्याग इस कारण कर दिया जाता है कि उसकी वास्तविक कुल हानि अपरिवर्जनीय प्रतीत हुई है या इस कारण कर दिया जाता है कि उसका परिरक्षण ऐसा खर्च किए बिना नहीं किया जा सकता है जो कर दिए जाने पर उसके मूल्य से अधिक होगा ।

                (2) विशिष्टतया आन्वयिक पूर्ण हानि तब होती है जब, -

(I) बीमाकृत ऐसे किसी संकट के कारण अपने पोत या माल के कब्जे से वंचित हो जाता है जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है, और- 

(क) यह असंभाव्य है कि, यथास्थिति, पोत या माल उसे पुनः प्राप्त हो जाए, या

(ख) यथास्थिति, पोत या माल को पुनः प्राप्त करने के लिए किया गया खर्च पुनः प्राप्ति पर उसके मूल्य से अधिक होगा; या

(ii) पोत को नुकसान पहुंचने की दशा में, उसका नुकसान ऐसे संकट के कारण होता है जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है, और ऐसा होता है कि उसकी मरम्मत का खर्च मरम्मत कर दी जाने पर पोत के मूल्य से अधिक होगा ।

मरम्मत के खर्च का प्राक्कलन करने में, उस मरम्मत के लिए अन्य हितों द्वारा संदेय साधारण औसत अभिदायों की बाबत कोई कटौती नहीं की जाएगी, किन्तु भावी उद्धारण कार्य के व्यय को तथा ऐसे किन्हीं भावी साधारण औसत अभिदायों को हिसाब में लिया जाएगा जिसके लिए, मरम्मत कर दी जाने की दशा में, पोत दायी होगा; या

(iii) माल को नुकसान पहुंचने की दशा में, नुकसान की मरम्मत तथा माल को उसके गन्तव्य स्थान तक भेजने का खर्च, उसके पहुंच जाने पर उसके मूल्य से अधिक होगा ।

61. आन्वयिक पूर्ण हानि का प्रभाव-यदि कोई आन्वयिक पूर्ण हानि होती है तो बीमाकृत, हानि को या तो आंशिक हानि मान सकता है या बीमाकृत विषयवस्तु का बीमाकर्ता को परित्याग करके हानि को वास्तविक पूर्ण हानि मान सकता है ।

62. परित्याग की सूचना-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, यदि बीमाकृत, बीमाकृत विषयवस्तु का, बीमाकर्ता को परित्याग करने का निर्वाचन करता है, तो उसे ऐसे परित्याग की सूचना देनी होगी । यदि वह ऐसा करने में असफल होता है तो हानि केवल आंशिक हानि मानी जाएगी ।

                (2) परित्याग की सूचना लिखित या मौखिक या अंशतः लिखित और अंशतः मौखिक दी जा सकती है और वह ऐसे किसी भी रूप में दी जा सकती है जिससे बीमाकृत का यह आशय उपदर्शित हो जाए कि उसने बीमाकृत विषयवस्तु में अपने बीमाकृत हित का बिना शर्त बीमाकर्ता को परित्याग कर दिया है ।

                (3) परित्याग की सूचना, हानि की विश्वसनीय जानकारी मिलने के पश्चात् उचित तत्परता से दी जानी चाहिए, किन्तु यदि ऐसी जानकारी संदेहपूर्ण स्वरूप की है तो बीमाकृत, जांच करने के लिए उचित समय लेने का हकदार है ।

                (4) यदि परित्याग की सूचना उचित रूप से दी जाती है, तो बीमाकृत के अधिकारों पर इस तथ्य का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा कि बीमाकर्ता परित्याग स्वीकार करने से इन्कार करता है ।

                (5) परित्याग की स्वीकृति, बीमाकर्ता के आचरण से या तो अभिव्यक्त या विवक्षित हो सकती है । सूचना के पश्चात् बीमाकर्ता का केवल मौन रहना, स्वीकृति नहीं है ।

                (6) परित्याग की सूचना स्वीकार कर ली जाने से, परित्याग अप्रतिसंहरणीय हो जाता है । सूचना की स्वीकृति में, हानि के लिए दायित्व तथा सूचना की पर्याप्तता की निश्चायक स्वीकृति सम्मिलित है ।

                (7) परित्याग की सूचना अनावश्यक है यदि उस समय, जब बीमाकृत को हानि की जानकारी प्राप्त होती है, बीमाकर्ता को सूचना दी जाने से भी, कोई लाभ की सम्भावना नहीं है ।

                (8) बीमाकर्ता द्वारा परित्याग की सूचना का अधित्यजन किया जा सकता है ।

                (9) यदि बीमाकर्ता ने अपने जोखिम का पुनर्बीमा कराया है तो उसके लिए वह आवश्यक नहीं होगा कि वह परित्याग की कोई सूचना दे ।

63. परित्याग का प्रभाव-(1) यदि कोई विधिमान्य परित्याग किया जाता है तो बीमाकृत को यह हक होगा कि वह शेष बची बीमाकृत विषयवस्तु में बीमाकृत का हित तथा उससे आनुषंगिक सभी साम्पत्तिक अधिकार ग्रहण कर ले ।

                (2) पोत का परित्याग कर दिए जाने पर, पोत का बीमाकर्ता ऐसे सभी ढुलाई-भाड़े का हकदार हो जाता है जो अर्जन के क्रम में है, और जो हानि कारित करने वाली दुर्घटना के पश्चात् उस पोत ने अर्जित किया है किन्तु इसमें से वह व्यय घटा दिया जाएगा जो उसने अर्जन के लिए दुर्घटना के पश्चात् उपगत किए होंगे; और यदि पोत अपने स्वामी के माल को वहन कर रहा है तो बीमाकर्ता, हानि कारित करने वाली दुर्घटना के पश्चात् ऐसे माल के वहन के लिए, उचित पारिश्रमिक का हकदार होगा ।

आंशिक हानियां (जिनके अन्तर्गत उद्धारण तथा साधारण औसत और विशिष्ट प्रभार भी हैं)

64. विशिष्ट औसत हानि-(1) विशिष्ट औसत हानि बीमाकृत विषयवस्तु की ऐसे संकट से होने वाली आंशिक हानि है जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है और जो साधारण औसत हानि नहीं है ।

                (2) बीमाकृत विषयवस्तु की सुरक्षा या परिरक्षा के लिए बीमाकृत द्वारा या उसकी ओर से उपगत ऐसे व्यय को, जो साधारण औसत तथा उद्धारण प्रभारों से भिन्न है, विशिष्ट प्रभार कहा जाता है । विशिष्ट प्रभार विशिष्ट औसत में सम्मिलित नहीं है ।

65. उद्धारण प्रभार-(1) पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, ऐसे संकटों से, जिनके विरुद्ध बीमा किया गया है, होने वाली हानि को रोकने में उपगत उद्धारण प्रभार, उन संकटों से हुई हानि के रूप में वसूल किए जा सकते हैं ।

                (2) उद्धारण प्रभार" से ऐसे प्रभार अभिप्रेत हैं जो संविदा से स्वतंत्र रूप में किसी उद्धारक द्वारा समुद्रीय विधि के अधीन वसूलीय हैं । ऐसे संकटों को, जिनका बीमा किया गया है, रोकने के प्रयोजन के लिए उनके अन्तर्गत, बीमाकृत द्वारा या उसके अभिकर्ताओं द्वारा या उनके द्वारा किराए पर नियोजित किसी व्यक्ति द्वारा उद्धारण स्वरूप की गई सेवाओं के व्यय नहीं हैं । ऐसे व्यय यदि उचित रूप से उपगत किए गए हैं तो, विशिष्ट प्रभारों के रूप में या साधारण औसत हानि के रूप में, ऐसी परिस्थितियों के अनुसार जिनके अधीन वह उपगत किए गए हैं, वसूल किए जा सकेंगे ।

66. साधारण औसत हानि-(1) साधारण औसत हानि कोई ऐसी हानि है जो किसी साधारण औसत कार्य से कारित हुई है या ऐसे कार्य का सीधा परिणामी है । इसके अन्तर्गत साधारण औसत व्यय तथा साधारण औसत त्याग भी है ।

                (2) यदि किसी सामान्य उद्यम में संकटग्रस्त सम्पत्ति के परिरक्षण के प्रयोजन के लिए संकट के समय स्वेच्छा से तथा उचित रूप में कोई असाधारण त्याग या व्यय किया जाता है या उपगत किया जाता है तो वह एक साधारण औसत कार्य होगा ।

                (3) यदि साधारण औसत हानि होती है तो पक्षकार, जिसे वह उठानी पड़ती है, समुद्रीय विधि द्वारा अधिरोपित शर्तों के अधीन रहते हुए, हितबद्ध अन्य पक्षकारों से आनुपातिक अभिदाय का हकदार है और ऐसे अभिदाय का नाम साधारण औसत अभिदाय है ।

                (4) पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, यदि बीमाकृत ने व्यय का साधारण औसत उपगत किया है, तो वह बीमाकर्ता से हानि के ऐसे अनुपात के सम्बन्ध में वसूली कर सकता है जो उसे उठानी पड़ती है; और साधारण औसत त्याग के मामले में, वह अभिदाय करने के लिए दायी अन्य पक्षकारों से अभिदाय कराने के अपने अधिकार को प्रवर्तित किए बिना, बीमाकर्ता से सम्पूर्ण हानि के सम्बन्ध में वसूली कर सकता है ।

                (5) पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, यदि बीमाकृत ने बीमाकृत हित के सम्बन्ध में साधारण औसत अभिदाय का संदाय किया है या करने के लिए दायी है, तो उसकी वसूली वह बीमाकर्ता से कर सकता है ।

                (6) अभिव्यक्त अनुबन्ध के अभाव में, बीमाकर्ता किसी साधारण औसत हानि या अभिदाय के लिए उस दशा में दायी नहीं होगा जब हानि ऐसे संकट से, जिसके विरुद्ध बीमा किया गया है, बचने के प्रयोजन के लिए या बचने के सम्बन्ध में उपगत नहीं की गई है ।

                (7) यदि पोत, ढुलाई-भाड़ा और स्थोरा या इन हितों में से कोई दो, एक ही बीमाकृत के स्वामित्व में है, तो साधारण औसत हानियों या अभिदायों के सम्बन्ध में बीमाकर्ता के दायित्व का इस प्रकार अवधारण किया जाएगा मानो वे हित विभिन्न व्यक्तियों के स्वामित्व में हों ।

क्षतिपूर्ति का परिमाण

67. हानि के लिए बीमाकर्ता के दायित्व का विस्तार-(1) बीमाकृत, किसी हानि के सम्बन्ध में किसी पालिसी के अधीन, जिसके द्वारा उसका बीमा किया गया है, किसी अनिश्चित मूल्य पालिसी की दशा में, बीमा योग्य मूल्य के विस्तार तक या किसी निश्चित मूल्य पालिसी की दशा में, पालिसी द्वारा नियत पूर्ण मूल्य के विस्तार तक जो राशि वसूल कर सकता है उसे क्षतिपूर्ति का परिमाण कहते हैं ।

                (2) यदि कोई हानि पालिसी के अधीन वसूलीय है तो बीमाकर्ता, या एक से अधिक बीमाकर्ता होने की दशा में, प्रत्येक बीमाकर्ता, क्षतिपूर्ति की रकम के ऐसे अनुपात के लिए दायी होगा, जो अनुपात उसके अभिदाय की राशि का, निश्चित मूल्य पालिसी की दशा में, पालिसी द्वारा नियत मूल्य से है या अनिश्चित मूल्य पालिसी की दशा में बीमे योग्य मूल्य से है ।

68. पूर्ण हानि-इस अधिनियम के तथा पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, यदि बीमाकृत विषयवस्तु की पूर्ण हानि हो जाती तो क्षतिपूर्ति का परिमाण, -

(1) निश्चित मूल्य पालिसी की दशा में, पालिसी द्वारा नियत राशि होगा;

(2) अनिश्चित मूल्य पालिसी की दशा में, बीमाकृत विषयवस्तु का बीमा किया गया मूल्य होगा ।

69. पोत की आंशिक हानि-यदि पोत नुकसानग्रस्त हो जाता है किन्तु उसकी पूर्ण हानि नहीं होती है, तो पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, क्षतिपूर्ति का परिमाण निम्नलिखित होगा, अर्थात्: -

(1) यदि पोत की मरम्मत की गई है तो बीमाकृत, मरम्मत के उचित खर्च का, रूढ़िक कटौतियां करके, हकदार है, किन्तु ऐसे खर्च की रकम किसी एक दुर्घटना के सम्बन्ध में, बीमा की गई राशि से अधिक नहीं होगी;

(2) यदि पोत की केवल आंशिक रूप से मरम्मत की जाती है, तो बीमाकृत ऐसी मरम्मत के लिए ऊपर बताए गए रूप में संगणित उचित खर्च का हकदार होगा और उसकी, ऐसे नुकसान से, जिसकी मरम्मत नहीं की गई है, उत्पन्न होने वाले उचित अवक्षयण के लिए, यदि कोई है, क्षतिपूर्ति भी की जाएगी, परन्तु कुल राशि, सम्पूर्ण नुकसान की मरम्मत के लिए ऊपर बताए गए रूप में संगणित खर्च से अधिक नहीं होगी;

(3) यदि पोत की मरम्मत नहीं की गई है और जोखिम के दौरान उसे नुकसानग्रस्त हुई अवस्था में ही बेचा नहीं गया है, तो बीमाकृत ऐसे नुकसान से, जिसकी मरम्मत नहीं की गई है, उत्पन्न होने वाले उचित अवक्षयण के लिए क्षतिपूर्ति का हकदार है किन्तु इस प्रकार नहीं कि वह, ऐसे नुकसान की मरम्मत के लिए ऊपर बताए गए रूप में संगणित खर्च से अधिक हो जाए;

(4) यदि पोत की मरम्मत नहीं की गई है और जोखिम के दौरान उसे नुकसानग्रस्त रूप में ही बेच दिया गया है तो बीमाकृत नुकसान की मरम्मत के लिए ऊपर बताए गए रूप में संगणित उचित खर्च के लिए क्षतिपूर्ति का हकदार है, किन्तु इस प्रकार नहीं कि वह, विक्रय द्वारा अभिनिश्चित मूल्य में अवक्षयण से, अधिक हो जाए ।

70. ढुलाई-भाड़े की आंशिक हानि-पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, यदि ढुलाई-भाड़े की आंशिक हानि होती है तो क्षतिपूर्ति का परिमाण निश्चित मूल्य पालिसी की दशा में, पालिसी द्वारा नियत राशि के या अनिश्चित मूल्य पालिसी की दशा में बीमा किए गए मूल्य के ऐसे अनुपात में होगा जो बीमाकृत के नष्ट हुए ढुलाई-भाड़े का, पालिसी के अधीन बीमाकृत की जोखिम पर, सम्पूर्ण ढुलाई-भाड़े से है ।

71. माल, वाणिज्या आदि की आंशिक हानि-यदि माल, वाणिज्या या अन्य जंगम वस्तुओं की आंशिक हानि होती है तो, पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अधीन रहते हुए, क्षतिपूर्ति का परिमाण निम्नलिखित होगा, अर्थात्: -

(1) यदि निश्चित मूल्य पालिसी द्वारा बीमा किया गया माल, वाणिज्या या अन्य जंगम वस्तुओं का कोई भाग पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है तो क्षतिपूर्ति का परिमाण पालिसी द्वारा नियत राशि के ऐसे अनुपात में होगा जो अनुपात नष्ट हुए भाग का, उस अनिश्चित मूल्य पालिसी की दशा में यथा अभिनिश्चित, बीमा किए गए सम्पूर्ण मूल्य से है;

(2) यदि अनिश्चित मूल्य पालिसी द्वारा बीमा किया गया माल, वाणिज्या या अन्य जंगम वस्तुओं का कोई भाग पूर्णतः नष्ट हो जाता है तो क्षतिपूर्ति का परिमाण, पूर्ण हानि की दशा में यथा अभिनिश्चित, नष्ट हुए भाग का बीमा किया गया मूल्य होगा;

(3) यदि बीमा किया गया सम्पूर्ण माल या वाणिज्या या उसका कोई भाग उसके गन्तव्य स्थान पर नुकसानग्रस्त दशा में परिदत्त कर दिया जाता है, तो क्षतिपूर्ति का परिमाण किसी निश्चित मूल्य पालिसी की दशा में, पालिसी द्वारा नियत राशि का या किसी अनिश्चित मूल्य पालिसी की दशा में बीमा किए गए मूल्य का ऐसा अनुपात होगा जो आगमन के स्थान पर अच्छी अवस्था और नुकसानग्रस्त अवस्था के सकल मूल्य का अच्छी अवस्था के कुल मूल्य से है;

(4) सकल-मूल्य" से अभिप्रेत है, थोक कीमत या यदि ऐसी कोई कीमत नहीं है तो प्राक्कलित मूल्य तथा दोनों की दशाओं में ढुलाई-भाड़ा, उतराई प्रभार और पहले ही संदत्त शुल्क इसमें सम्मिलित हैं; परन्तु रूढ़िगत रूप से बंधपत्र के अधीन विक्रय किए गए माल या वाणिज्या की दशा में, बंधपत्रित कीमत को ही सकल मूल्य समझा जाएगा । सकल आगमों" से विक्रय द्वारा प्राप्त वास्तविक कीमत अभिप्रेत है, जहां वे विक्रय संबंधी सभी प्रकार के विक्रेताओं द्वारा संदत्त किए जाते हैं ।

72. मूल्यांकन का प्रभाजन-(1) यदि सम्पत्ति की विभिन्न किस्मों का एक ही मूल्यांकन के अधीन बीमा किया जाता है, तो विभिन्न किस्मों के लिए मूल्यांकन, उनके अपने-अपने बीमा किए गए मूल्य के अनुपात में, उसी प्रकार प्रभाजित किया जाना चाहिए जिस प्रकार कि अनिश्चित मूल्य पालिसी की दशा में किया जाता है । किसी किस्म की सम्पत्ति के किसी भाग का बीमाकृत मूल्य, उसके कुल बीमाकृत मूल्य का ऐसा अनुपात होगा जो अनुपात उस भाग के बीमा किए गए मूल्य का, उस किस्म की सम्पूर्ण सम्पत्ति के बीमा किए गए पूर्ण मूल्य से है, किन्तु यह तब जब दोनों ही दशाओं में उसे इस अधिनियम द्वारा उपबंधित रूप में अभिनिश्चित किया जाए ।

                (2) यदि मूल्यांकन का प्रभाजन किया जाता है, और माल की प्रत्येक किस्म, क्वालिटी या वर्णन की मूल लागत अभिनिश्चित नहीं की जा सकती है तो, मूल्यांकन का प्रभाजन विभिन्न किस्मों, क्वालिटियों या वर्णन के माल के निकाले गए शुद्ध मूल्य के हिसाब से किया जा सकता है ।

73. साधारण औसत अभिदाय तथा उद्धारण प्रभार-(1) पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबंध के अधीन रहते हुए, यदि बीमाकृत ने कोई साधारण औसत अभिदाय किया है या उसके लिए वह दायी है तो, क्षतिपूर्ति का परिमाण उस दशा में पूर्ण अभिदायी मूल्य होगा जब कि अभिदाय के लिए दायी विषयवस्तु का उसके पूर्ण अभिदायी मूल्य के लिए, बीमा नहीं किया गया है । किन्तु यदि ऐसी विषयवस्तु का उसके पूर्ण अभिदायी मूल्य के लिए बीमा नहीं किया गया है, या यदि केवल उसके किसी भाग का ही बीमा किया गया है तो बीमाकर्ता द्वारा संदेय क्षतिपूर्ति को, न्यून-बीमा के अनुपात में कम कर दिया जाएगा और यदि कोई विशिष्ट औसत हानि होती है जिसके कारण अभिदायी मूल्य से कटौती की जानी है और जिसके लिए बीमाकर्ता दायी है तो वह राशि, यह अभिनिश्चित करने के लिए कि बीमाकर्ता कितनी रकम अभिदाय करने के लिए दायी है, बीमा किए गए मूल्य में से कम कर दी जाएगी ।

                (2) यदि बीमाकर्ता उद्धारण प्रभारों के लिए दायी है तो उसके दायित्वों का विस्तार उसी सिद्धान्त पर अभिनिश्चित किया जाएगा ।

74. अन्य पक्षकारों के प्रति दायित्व-यदि बीमाकृत ने किसी अन्य पक्षकार के प्रति दायित्व के विरुद्ध अभिव्यक्त शब्दों में, बीमा कराया है, तो क्षतिपूर्ति का परिमाण वह रकम होगी जो पालिसी में किसी अभिव्यक्त उपबंध के अधीन रहते हुए, ऐसे दायित्व की बाबत ऐसे अन्य पक्षकार को उसके द्वारा संदत्त या संदेय है ।

75. क्षतिपूर्ति के परिमाण के बारे में साधारण उपबन्ध-(1) यदि ऐसी किसी विषयवस्तु की बाबत कोई हानि होती है जिसके लिए इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबन्धों में अभिव्यक्त रूप से उपबन्ध नहीं किया गया है तो क्षतिपूर्ति का परिमाण उन उपबन्धों के, जहां तक कि वह विशिष्ट मामले को लागू होते हैं, अनुसार यथाशक्य निकटतम रूप में, अभिनिश्चित किया जाएगा ।

                (2) इस अधिनियम में क्षतिपूर्ति के परिमाण से संबंधित उपबंधों की कोई भी बात, दोहरे बीमे से संबंधित नियमों को प्रभावित नहीं करेगी या हित को पूर्ण रूप से या भागतः नासाबित करने से या यह दर्शित करने से बीमाकर्ता को प्रतिषिद्ध नहीं करेगी कि हानि के समय, बीमाकृत संपूर्ण विषयवस्तु या उसका कोई भाग पालिसी के अधीन जोखिम पर नहीं था ।

76. विशिष्ट औसत वारंटियां-(1) यदि बीमाकृत विषयवस्तु, विशिष्ट औसत से मुक्त वारंटित है, तो बीमाकृत किसी भाग की हानि के लिए, जो साधारण औसत त्याग द्वारा उपगत हानि से भिन्न है, वसूली तब तक नहीं कर सकता है जब तक कि पालिसी में अंतर्विष्ट संविदा प्रभाजनीय नहीं है; किन्तु यदि संविदा प्रभाजनीय है, तो बीमाकृत किसी प्रभाजनीय भाग की कुल हानि के लिए वसूली कर सकता है ।

                (2) बीमाकृत विषयवस्तु विशिष्ट औसत से, पूर्ण रूप से या कुछ प्रतिशत के अधीन, मुक्त वारंटित होने पर भी जिस हानि के विरुद्ध बीमा कराया गया है उससे बचने के लिए बीमाकर्ता, उद्धारण प्रभारों, विशिष्ट प्रभारों और ऐसे अन्य व्ययों के लिए दायी होगा जो वाद तथा प्रयत्न खण्ड के उपबन्धों के अनुसरण में उचित रूप से उपगत किए गए हैं ।

                (3) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं है, यदि किसी विनिर्दिष्ट प्रतिशत के अधीन बीमाकृत विषयवस्तु विशिष्ट औसत से मुक्त वारंटित है, तो विनिर्दिष्ट प्रतिशत को पूरा करने के लिए, किसी साधारण औसत हानि को विशिष्ट औसत हानि में नहीं जोड़ा जा सकेगा ।

                (4) यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि क्या विनिर्दिष्ट प्रतिशत प्राप्त हुआ है, बीमाकृत विषयवस्तु को हुई वास्तविक हानि को ही ध्यान में रखा जाएगा । विशिष्ट प्रभार तथा हानि को अभिनिश्चित तथा साबित करने के व्यय तथा उसके आनुषंगिक व्यय को, अपवर्जित कर दिया जाएगा ।

77. आनुक्रमिक हानियां-(1) जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं है, तथा इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए बीमाकर्ता आनुक्रमिक हानियों के लिए दायी है, चाहे ऐसी हानियों की कुल रकम बीमाकृत राशि से अधिक है ।

                (2) यदि, एक ही पालिसी के अधीन किसी आंशिक हानि के, जिसकी पूर्ति नहीं की गई है या जिसे अन्यथा पूरा नहीं किया गया है, पश्चात् पूर्ण हानि होती है, तो बीमाकृत केवल पूर्ण हानि की बाबत वसूली कर सकेगा:

                परन्तु इस धारा की कोई बात वाद लाने संबंधी तथा प्रयत्न खण्ड के अधीन बीमाकर्ता के दायित्वों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी ।

78. वाद तथा प्रयत्न खंड-(1) यदि पालिसी में वाद तथा प्रयत्न खण्ड है, तो उसके द्वारा किए गए वचनबन्ध को बीमे की संविदा का अनुपूरक समझा जाएगा और बीमाकृत, इस बात के होते हुए भी उस खण्ड के अनुसरण में उचित रूप से उपगत किसी व्यय को बीमाकर्ता से वसूल कर सकेगा कि बीमाकर्ता पूर्ण हानि के लिए संदाय कर चुका है या विषयवस्तु, पूर्ण रूप से या कुछ प्रतिशत तक, विशिष्ट औसत से मुक्त वारंटित की गई है ।

                (2) इस अधिनियम द्वारा परिभाषित रूप में साधारण औसत हानियां और अभिदाय तथा उद्धारण प्रभार, वाद लाने संबंधी खण्ड तथा प्रयत्न खण्ड के अधीन वसूलीय नहीं हैं ।

                (3) पालिसी के अन्तर्गत न आने वाली किसी हानि से बचने या उसे कम करने के प्रयोजन के लिए उपगत व्यय, वाद तथा प्रयत्न खण्ड के अधीन वसूलीय नहीं है ।

                (4) बीमाकृत तथा उसके अभिकर्ताओं का यह कर्तव्य है कि वे सभी मामलों में ऐसे उपाय करें जो हानि से बचने या उसे कम करने के प्रयोजन के लिए उचित है ।

संदायों पर बीमाकर्ता के अधिकार

79. प्रत्यासन का अधिकार-(1) यदि बीमाकर्ता बीमाकृत संपूर्ण विषय या माल की दशा में, उसके किसी प्रभाजनीय भाग की पूर्ण हानि के लिए संदाय कर देता है तो वह तदुपरि ऐसी विषयवस्तु के, जिसके लिए उसने संदाय किया है, किसी भी अवशेष में बीमाकृत के हित को ग्रहण करने का हकदार होगा और हानि कारित करने वाली दुर्घटना के समय से, उस विषयवस्तु में या उसकी बाबत बीमाकृत के सभी अधिकारों और उपचारों में प्रत्यासीन हो जाएगा ।

                (2) पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन रहते हुए, यदि बीमाकर्ता किसी आंशिक हानि के लिए संदाय कर देता है, तो उसका बीमाकृत विषयवस्तु या उसके अवशिष्ट भाग पर कोई हक नहीं होगा किन्तु वह, हानि कारित करने वाली दुर्घटना के समय से, बीमाकृत विषयवस्तु में तथा उसकी बाबत, जहां तक कि इस अधिनियम के अनुसार बीमाकृत की ऐसी हानि के लिए ऐसे संदाय द्वारा क्षतिपूर्ति की गई है, बीमाकृत के सभी अधिकारों तथा उपचारों में प्रत्यासीन हो जाएगा ।

80. अभिदाय का अधिकार-(1) यदि बीमाकृत ने दोहरे बीमे द्वारा अधिबीमा कराया है जो प्रत्येक बीमाकर्ता अपने और अन्य बीमाकर्ताओं के बीच, हानि के लिए आनुपातिक रूप में ऐसी रकम का अभिदाय करने के लिए जिसके लिए वह अपनी संविदा के अधीन दायी है, आबद्ध होगा ।

                (2) यदि कोई बीमाकर्ता हानि में अपने अनुपात से अधिक संदाय करता है तो वह अभिदाय के लिए अन्य बीमाकर्ताओं के विरुद्ध वाद लाने का और उन्हीं उपचारों का हकदार है जो ऐसे प्रतिभू को प्राप्त होते हैं जिसने ऋण में अपने अनुपात से अधिक का संदाय किया है ।

81. न्यून-बीमा का प्रभाव-यदि बीमाकृत का बीमा योग्य मूल्य से कम राशि के लिए बीमा किया गया है या निश्चित मूल्य पालिसी की दशा में पालिसी-मूल्यांकन से कम राशि के लिए बीमा किया गया है, तो वह बीमा न कराए गए अतिशेष की बाबत स्वयं अपना बीमाकर्ता समझा जाएगा ।

प्रीमियम की वापसी

82. वापसी कराना-जहां प्रीमियम या उसका कोई आनुपातिक भाग, इस अधिनियम द्वारा, वापसी योग्य घोषित किया गया है, वहां वह-

(क) यदि पहले ही संदत्त कर दिया गया है, बीमाकृत द्वारा बीमाकर्ता से वूसल किया जा सकेगा; और

(ख) यदि असंदत्त है, बीमाकृत या उसके अभिकर्ता द्वारा प्रतिधारित किया जा सकेगा ।

83. करार द्वारा वापसी-यदि पालिसी में प्रीमियम या उसके किसी आनुपातिक भाग की, किसी निश्चित घटना के होने पर, वापसी का अनुबन्ध है और वह घटना घटित हो जाती है तो, यथास्थिति, प्रीमियम या उसका कोई आनुपातिक भाग, तदुपरि बीमाकृत को वापसी योग्य हो जाएगा ।

84. प्रतिफल के निष्फल होने पर वापसी-(1) यदि प्रीमियम के संदाय के लिए प्रतिफल पूर्ण रूप से निष्फल हो जाता है और बीमाकृत या उसके अभिकर्ताओं की ओर से कोई कपट या अवैधता नहीं की गई है तो तदुपरि प्रीमियम बीमाकृत को वापसी योग्य हो जाएगा ।

                (2) यदि प्रीमियम के संदाय के लिए प्रतिफल प्रभाजनीय है और प्रतिफल का कोई प्रभाजनीय भाग पूर्ण रूप से निष्फल हो जाता है तो तदुपरि प्रीमियम का आनुपातिक भाग, वैसी ही शर्तों के अधीन बीमाकृत को वापसी योग्य हो जाएगा ।

                (3) विशिष्टतः-

(क) यदि पालिसी शून्य है, या जोखिम के प्रारम्भ से बीमाकृत द्वारा परिवर्जित की जाती है तो प्रीमियम वापसी योग्य हो जाएगा, परन्तु यह तब जब बीमाकृत की ओर से कोई कपट या अवैधता नहीं की गई है; किन्तु यदि जोखिम प्रभाजनीय नहीं है और एक बार वह सम्बद्ध हो जाती है तो प्रीमियम वापसी योग्य नहीं होगा;

(ख) यदि बीमाकृत विषयवस्तु या उसका कोई भाग कभी जोखिमग्रस्त नहीं होता है तो, यथास्थिति, प्रीमियम या उसका आनुपातिक भाग वापसी योग्य होगा:

परन्तु यदि विषयवस्तु का बीमा हानि हुई है या नहीं" के रूप में कराया जाता है, और संविदा पूर्ण होने के समय तक वह सुरक्षित रूप में पहुंच चुकी है तो प्रीमियम तब तक वापसी योग्य नहीं होगा जब तक कि बीमाकर्ता को, संविदा पूर्ण होने के समय विषयवस्तु के सुरक्षित रूप में पहुंच जाने का, पता नहीं है;

(ग) यदि बीमाकृत का, जोखिम बनी रहने की सम्पूर्ण अवधि के दौरान, कोई बीमा किया गया हित नहीं है, तो प्रीमियम वापसी योग्य होगा, परन्तु यह नियम पंद्यम के तौर पर की गई किसी पालिसी को लागू नहीं होगा;

(घ) यदि बीमाकृत का ऐसा विफलनीय हित है जो जोखिम के बने रहने की अवधि के दौरान समाप्त कर दिया जाता है तो प्रीमियम वापसी योग्य नहीं होगा;

(ङ) यदि बीमाकृत ने अनिश्चित मूल्य पालिसी के अधीन अधिबीमा कराया है, तो प्रीमियम का आनुपातिक भाग वापसी योग्य होगा;

(च) पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन रहते हुए, यदि बीमाकृत के दोहरे बीमा द्वारा अधिबीमा कराया है, तो अनेक प्रीमियमों का आनुपातिक भाग वापसी योग्य होगा:

परन्तु यदि, पालिसियां विभिन्न समयों पर की गई हैं और किसी पूर्वतर पालिसी ने किसी समय, सम्पूर्ण जोखिम उठाई है, या यदि किसी पालिसी के अधीन बीमाकृत सम्पूर्ण राशि की बाबत किसी दावे का भुगतान कर दिया गया है, तो उस पालिसी के संबंध में कोई प्रीमियम वापसी योग्य नहीं होगा और यदि बीमाकृत ने दोहरा बीमा जानबूझकर कराया है तो कोई भी प्रीमियम वापसी योग्य नहीं होगा ।

अनुपूरक

85. बीमाकृत द्वारा अनुसमर्थन-यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति की ओर से सद्भावपूर्वक कोई समुद्री बीमे की संविदा की जाती है, तो वह व्यक्ति, जिसकी ओर से ऐसी संविदा की गई है, हानि का पता लग जाने के पश्चात् भी, संविदा का अनुसमर्थन कर सकता है ।

86. करार या प्रथा द्वारा विवक्षित बाध्यता में फेरफार-(1) यदि विधि की विवक्षा द्वारा समुद्री बीमे की संविदा के अधीन कोई अधिकार, कर्तव्य या दायित्व उत्पन्न होता है तो उसे अभिव्यक्त करार द्वारा या प्रथा द्वारा, यदि प्रथा ऐसी है जो संविदा के दोनों पक्षकारों को आबद्ध करती है, नकारा जा सकता है या उसमें फेरफार की जा सकती है ।

                (2) इस धारा के उपबन्ध, इस अधिनियम द्वारा घोषित ऐसे किसी अधिकार, कर्तव्य या दायित्व को लागू होते हैं जिन्हें करार द्वारा विधिपूर्ण रूप में उपान्तरित किया जा सकता है ।

87. उचित समय, आदि तथ्य का प्रश्न है-यदि इस अधिनियम में उचित समय, उचित प्रीमियम या उचित तत्परता के प्रति कोई निर्देश किया गया है तो उचित क्या है, यह प्रश्न तथ्य का प्रश्न है ।

88. साक्ष्य के रूप में जोखिम ग्रहण पत्र-यदि पालिसी सम्यक् रूप से स्टाम्पित है तो किसी विधिक कार्यवाही में पूर्वकथित रूप में, पर्ची या जोखिम ग्रहण पत्र के प्रति, निर्देश किया जा सकता है ।

89. कुछ मामलों में उपांतरों आदि सहित अधिनियम लागू करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकती है कि इस अधिनियम के उपबन्ध अनन्यतः अन्तर्देशीय नौपरिवहन में प्रयुक्त होने वाले किसी पोत वर्ग से संबंधित समुद्री बीमे की संविदाओं को लागू करने में, ऐसी शर्तों, अपवादों तथा उपान्तरों के अधीन होंगे, जो वह अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे ।

90. कुछ उपबन्धों का सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 पर अध्यारोही प्रभाव होना-सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की धारा 6 के खण्ड (ङ) की कोई बात धारा 17, 52, 53 तथा 79 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी ।

91. व्यावृत्तियां-विधि के ऐसे नियम, जिनके अन्तर्गत ला मर्चेन्ट भी है, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व समुद्री बीमे की संविदाओं को लागू होते थे और जो इस अधिनियम के अभिव्यक्त उपबन्धों से असंगत नहीं हैं, समुद्री बीमे की संविदाओं को लागू बने रहेंगे ।

92. [निरसित]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1974 (1974 का 56) की धारा 2 और प्रथम अनुसूची द्वारा निरसित

अनुसूची

पालिसी का प्ररूप

(धारा 24 देखिए)

                यह सबको ज्ञात हो कि क ख अपने नाम से और उन सब व्यक्तियों के नाम में या नामों में जिनसे इसका सम्बन्ध हो, यह बीमा करते हैं और उन सबको और उनमें से प्रत्येक को . . . . . .. नामक उस पोत या जलयान का और उसमें के माल तथा वाणिज्या तथा बाड़ी, रस्सों, परिधानों, तोपखाने, युद्ध सामग्री, गोलाबारूद, नावों और अन्य फर्नीचर की हानि हुई है या नहीं, पर और से, के आधार पर बीमाकर्ता बनाते हैं । उक्त. . . . . .. पोत या जलयान की वर्तमान यात्रा के लिए मास्टर है; या चाहे जो उक्त पोत का मास्टर हो या चाहे जिस नाम या नामों से उक्त पोत को या उसके मास्टर को संबोधित किया जाता हो, या किया जाए । यह उद्यम उक्त माल और वाणिज्या के उक्त . . . . . .. पोत पर या . . . . . .. पोत के फलक पर लदान से प्रारम्भ होगा और उसके उस पोत आदि पर रखे रहने तक बना रहेगा और जारी रहेगा । और तब तक बना रहेगा जब तक कि उक्त पोत अपने तोपखाने, रस्सों, परिधानों आदि तथा माल और वाणिज्या सहित चाहे वह कुछ भी हो . . . . . .. पर पहुंच न जाए और जब तक निरापद रूप से चौबीस घंटे लंगर डालकर बंधा न रहे । और माल या वाणिज्या पर तब तक बना रहेगा जब तक वे वहां सुरक्षित रूप से भूमि पर उतार न दिए जाएं । उक्त पोत आदि के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह इस यात्रा में किन्हीं भी पत्तनों या स्थानों को जाए, वहां पहुंचे और ठहरे और इसका इस बीमे पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । उक्त पोत आदि, माल और वाणिज्या आदि, बीमाकृत और बीमाकर्ता के बीच हुए करार के अधीन जहां तक बीमाकृत से संबंधित हैं . . . . . . . मूल्य की हैं और इतना ही उनका मूल्यांकन किया जाएगा ।

                वे उद्यम और खतरे जिनका वहन करना और उठाना हम बीमाकर्ता इस यात्रा में स्वीकार कर रहे हैं-समुद्री संकट, युद्धपोत, अग्नि, शत्रु, जल-दस्यु, समुद्री दस्यु, चोर, माल प्रक्षेपण, मार्ट और प्रतिमार्ट पत्र, अप्रत्याशित घटना, राजाओं, नरेशों और जनता के नाम से समुद्र में पकड़ना, गिरफ्तार करना, अवरुद्ध और निरुद्ध करना, मास्टर और नाविकों द्वारा कर्तव्य भंग तथा ऐसे सभी अन्य संकट, हानियां और विपत्तियां, जिनसे उक्त माल और वाणिज्या तथा पोत आदि को या उसके किसी भाग को क्षति, अपाय या नुकसान हो ।

                और किसी हानि या विपत्ति की दशा में, बीमाकृत, उनके फैक्टरों, सेवकों और समनुदेशितियों के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वे इस बीमे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उक्त माल और वाणिज्या तथा पोत आदि की या उसके किसी भाग को प्रतिरक्षा, रक्षा और वसूली में और उसके लिए वाद लाएं और तदर्थ प्रयत्न तथा यात्रा करें । और उसके भारों का अभिदाय हम बीमाकर्ताओं में से प्रत्येक, इसके द्वारा बीमाकृत राशि में अपनी दर और परिमाण के अनुसार करेगा ।

                और यह विशिष्टतः घोषणा की जाती है और करार किया जाता है कि बीमाकृत सम्पत्ति की वसूली, रक्षा या परिरक्षा के लिए बीमाकर्ता या बीमाकृत के किसी कार्य को, अधित्यजन या परित्याग की स्वीकृति, नहीं माना जाएगा । और इसलिए हम, बीमाकर्ता यह कहते हैं और यह वचन देते हैं तथा स्वयं को, और अपने-अपने भाग के लिए प्रत्येक को, अपने वारिसों, निष्पादकों तथा माल को, बीमाकृत, उनके निष्पादकों, प्रशासकों और समुदेशितियों के प्रति, आबद्ध करते हैं कि संविदा का उचित रूप में पालन किया जाएगा और यह स्वीकार करते हैं कि बीमाकृत. . . . . . .ने इस बीमा के लिए हमें शोध्य प्रतिफल संदत्त कर दिया है ।

                इसके साक्ष्यस्वरूप हम बीमाकर्ताओं ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं और. . . . . .. रुपए की राशि का बीमा किया है ।

                ज्ञापन टिप्पण-यह गारन्टी दी जाती है कि अनाज, मछली, नमक, फल, आटा और बीज, यदि साधारण औसत हानि नहीं होती है या पोत उत्कूलित नहीं होता है तो, आंशिक हानि से मुक्त है; चीनी, तम्बाकू, भांग, फ्लैक्स, चमड़ा और खालें, पांच प्रतिशत के अधीन, आंशिक हानि मुक्त हैं तथा अन्य सभी माल, पोत और ढुलाई-भाड़ा, यदि साधारण औसत हानि नहीं होती है, या पोत उत्कूलित नहीं होता है, तीन प्रतिशत के अधीन आंशिक हानि मुक्त है ।

पालिसी के अर्थान्वयन के लिए नियम

                यदि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित नहीं है तो उपरोक्त या अन्य तत्समान प्ररूप में किसी पालिसी के अर्थान्वयन के लिए इस अधिनियम द्वारा निर्दिष्ट नियम निम्नलिखित हैं, अर्थात्: -

1. हानि हुई है या नहीं-यदि विषयवस्तु का बीमा हानि हुई है या नहीं" के रूप में किया गया है और संविदा पूर्ण होने के पूर्व विषयवस्तु की हानि हो जाती है तो जोखिम सम्बद्ध हो जाएगी किन्तु तब नहीं जब ऐसे समय पर बीमाकृत को हानि के बारे में पता था और बीमाकर्ता को नहीं ।

2. से-यदि विषयवस्तु का बीमा किसी विशिष्ट स्थान से" किया जाता है तो जब तक कि पोत बीमाकृत जल यात्रा, प्रारम्भ नहीं कर देता, जोखिम सम्बद्ध नहीं होगी ।

3. पर और से-(क) यदि किसी पोत का बीमा किसी विशिष्ट स्थान पर और से" किया जाता है और संविदा पूर्ण होने के समय वह उस स्थान पर सुरक्षित है तो जोखिम तुरन्त सम्बद्ध हो जाएगी ।

(ख) यदि संविदा पूर्ण होने के समय वह उस स्थान पर नहीं है तो जोखिम पोत के वहां सुरक्षित दशा में पहुंचते ही सम्बद्ध हो जाएगी और जब तक कि पालिसी में अन्यथा उपबन्ध नहीं है, यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि वहां पहुंचने के पश्चात् किसी विशिष्ट समय के लिए अन्य पालिसी के अन्तर्गत है ।

(ग) यदि चार्टरित ढुलाई-भाड़े का बीमा किसी विशिष्ट स्थान पर और से" किया जाता है और संविदा पूर्ण होने के समय पोत उस स्थान पर सुरक्षित दशा में है तो जोखिम तुरन्त सम्बद्ध हो जाएगी यदि संविदा पूर्ण होने के समय पोत वहां नहीं है तो, जैसे ही पोत वहां सुरक्षित दशा में पहुंचेगा, जोखिम सम्बद्ध हो जाएगी ।

(घ) यदि चार्टरित ढुलाई-भाड़े से भिन्न ढुलाई-भाड़ा बिना किन्हीं विशिष्ट शर्तों के संदेय है और उसका बीमा किसी विशिष्ट स्थान पर और से" कराया गया है तो माल या वाणिज्या के पोत पर लादे जाते ही जोखिम अनुपाततः सम्बद्ध हो जाएगी; परन्तु यदि ऐसा स्थोरा तैयार है, जो पोत के स्वामी का है या जिसके पोत पर लादे जाने के लिए किसी अन्य व्यक्ति ने पोत के ऐसे स्वामी से संविदा की है तो ऐसा स्थोरा प्राप्त करने के लिए पोत के तैयार होते ही, जोखिम सम्बद्ध हो जाएगी ।

4. उनके लादे जाने के समय से-यदि माल या अन्य जंगम वस्तुओं का बीमा उनके लादे जाने के समय से" किया जाता है तो जोखिम तब तक सम्बद्ध नहीं होगी जब तक कि ऐसा माल या जंगम वस्तुएं वास्तविक रूप से फलक पर नहीं लाद दी जाती और तट से पोत तक उनके अभिवहन के दौरान बीमाकर्ता उनके लिए दायी नहीं होगा ।

5. सुरक्षित रूप में उतारना-यदि माल या अन्य जंगम वस्तुओं की जोखिम, उनके सुरक्षित रूप में उतारे जाने" तक बनी रहती है तो उन्हें उतारने के पत्तन पर उनके पहुंचने के पश्चात् रूढ़िगत रीति में तथा उचित समय के भीतर उतार दिया जाना चाहिए और यदि वे इस प्रकार उतारी नहीं जाती हैं तो जोखिम समाप्त हो जाएगी ।

6. किसी स्थान से होकर जाना तथा वहां ठहरना-किसी और अनुज्ञप्ति या प्रथा के अभाव में, किसी भी पत्तन या स्थान से चाहे वह जो भी हो, होकर जाने तथा वहां ठहरने" के स्वातन्त्र्य से पोत को यह प्राधिकार नहीं मिल जाता है कि वह अपने प्रस्थान के स्थान से गन्तव्य स्थान तक की अपनी जलयात्रा के मार्ग में कोई भी परिवर्तन कर सकता है ।

7. समुद्री संकट-समुद्री संकट" पद, आकस्मिक समुद्री दुर्घटनाओं या हताहत होने के प्रति निर्देश करता है । उसके अन्तर्गत वायु तथा तरंगों की साधारण क्रिया नहीं है ।

8. जल दस्यु-जल दस्यु" पद के अन्तर्गत ऐसे यात्री हैं, जो विद्रोह करते हैं तथा ऐसे बलवाकारी व्यक्ति हैं जो तट से पोत पर हमला करते हैं ।

9. चोर-चोर" पद के अन्तर्गत गुप्त चोरी, या पोत कम्पनी के किसी व्यक्ति द्वारा, चाहे वह कर्मी दल का सदस्य है या यात्री, की गई कोई चोरी नहीं है ।

10. नरेशों के नाम में अवरुद्ध करना-राजाओं, नरेशों तथा जनता के नाम में गिरफ्तारी आदि" पर, राजनीतिक या कार्यपालक कार्यों के प्रति निर्देश करता है और इसके अन्तर्गत बलवे या साधारण न्यायिक प्रक्रिया से हुई हानि नहीं है ।

11. नाविक कर्तव्य भंग-नाविक कर्तव्य भंग" पद के अन्तर्गत, मास्टर या कर्मीदल द्वारा जानबूझकर किया गया प्रत्येक ऐसा दोषपूर्ण कार्य है, जो, यथास्थिति, पोत के स्वामी पर या उसे भाड़े पर लेने वाले व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है ।

12. सभी अन्य संकट-सभी अन्य संकट" पद के अन्तर्गत, पालिसी में विनिर्दिष्ट रूप से वर्णित संकटों जैसे संकट ही हैं ।

13. साधारण नहीं तो आंशिक हानि-साधारण नहीं तो आंशिक हानि" पद से, बीमाकृत विषयवस्तु की साधारण औसत हानि से भिन्न आंशिक हानि अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत विशिष्ट प्रभार नहीं है ।

14. उत्कूलन-यदि पोत उत्कूलित हो जाता है तो बीमाकर्ता अपवादित हानियों के लिए दायी है, चाहे वे हानि उत्कूलित हो जाने के कारण नहीं हुई हैं, परन्तु यह तब जब उत्कूलित होने के समय जोखिम सम्बद्ध हो गई है और यदि पालिसी माल के बारे में है तो, नुकसानग्रस्त माल फलक पर है ।

15. पोत-पोत" पद के अन्तर्गत है पेटा, सामग्री तथा सज्जा, स्टोर और रसद, जो अधिकारियों और कर्मीदल के लिए है और किसी विशेष व्यापार में लगे जलयानों की दशा में, व्यापार के लिए आवश्यक साधारण फिटिंग है और वाष्प पोत की दशा में मशीनरी, बायलर तथा कोयला तथा इंजिन स्टोर, यदि वह बीमाकृत के स्वामित्व में है और वाष्प से भिन्न शक्ति द्वारा चालित किसी पोत की दशा में, मशीनरी और ईंधन तथा इंजिन स्टोर भी, यदि वह बीमाकृत के स्वामित्व में है ।

16. ढुलाई भाड़ा-ढुलाई भाड़ा" पद के अन्तर्गत पोत स्वामी द्वारा स्वयं अपना माल या जंगम वस्तुएं वहन करने के लिए अपने पोत के नियोजन से व्युत्पन्न लाभ तथा किसी अन्य पक्षकार द्वारा संदेय ढुलाई भाड़ा भी है, किन्तु इसके अन्तर्गत यात्रा भाड़ा नहीं है ।

17. माल-माल" पद से, वाणिज्या की प्रकृति का माल अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत निजी चीज बस्त या फलक पर उपयोग के लिए रसद तथा स्टोर नहीं हैं ।

किसी प्रतिकूल प्रथा के अभाव में, डेक स्थोरा तथा जीवित जीवजन्तुओं का विशिष्ट रूप से, न कि माल के किसी साधारण अभियान के अधीन बीमा किया जाना चाहिए ।

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