प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976
(1976 का अधिनियम संख्यांक 21)
[9 फरवरी, 1976]
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, व्यापार, वाणिज्य, उद्योग तथा अन्य उत्पादन कार्यों के विकास के
प्रयोजनार्थ प्रत्यय तथा अन्य प्रसुविधाएं, विशिष्टतया छोटे और सीमांत कृषकों, कृषि
श्रमिकों, कारीगरों तथा छोटे उद्यमियों को, प्रदान करके ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था
का विकास करने की दृष्टि से प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के निगमन,
विनियमन और परिसमापन का तथा उनसे सम्बन्धित
और उसके आनुषंगिक विषयों का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सत्ताईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह 26 सितम्बर, 1975 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के संबंध में, बोर्ड" से उस प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का निदेशक बोर्ड अभिप्रेत है;
(ख) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के संबंध में, अध्यक्ष" से धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन उस बैंक के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त या पुनर्नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है;
(ग) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के संबंध में, निदेशक" से उस बैंक के बोर्ड का सदस्य अभिप्रेत है ;
[(गक) राष्ट्रीय बैंक" से राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 61) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अभिप्रेत है;]
(घ) अधिसूचित क्षेत्र" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट वे स्थानीय सीमाएं अभिप्रेत हैं जिनके भीतर प्रादेशिक ग्रामीण बैंक कार्य करेगा;
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(च) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अभिप्रेत है;
(छ) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के सम्बन्ध में प्रायोजक बैंक" से वह बैंक अभिप्रेत है जिसके द्वारा वह प्रादेशिक ग्रामीण बैंक प्रायोजित किया गया है;
(ज) राज्य सरकार" से अभिप्रेत है,-
(i) किसी संघ राज्यक्षेत्र में स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के संबंध में, केन्द्रीय सरकार;
(ii) किसी राज्य में स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के संबंध में, उस राज्य की सरकार;
(झ) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में परिभाषित हैं वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं ;
(ञ) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और इस अधिनियम में या भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में परिभाषित नहीं हैं किन्तु बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 में हैं ।
अध्याय 2
प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों का निगमन और उनकी पूंजी
3. प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों की स्थापना और निगमन-यदि किसी प्रायोजक बैंक ने ऐसा करने के लिए प्रार्थना की है तो केंद्रीय सरकार किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या एक से अधिक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक ऐसे नाम से स्थापित कर सकेगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए और उक्त या पश्चात्वर्ती अधिसूचना द्वारा उन स्थानीय सीमाओं को विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनके भीतर ऐसा प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक कार्य करेगा ।
(2) प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा तथा उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संपत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन की तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उसके विरुद्ध वाद लाया जाएगा ।
[(3) प्रायोजक बैंक का यह कर्तव्य होगा कि वह, उसके द्वारा प्रायोजित, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की निम्नलिखित प्रकार से सहायता करे, अर्थात् :-
(क) ऐसे प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की शेयर पूंजी में अभिदाय करके;
(ख) ऐसे प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के कार्मिकों को प्रशिक्षण प्रदान करके; और
(ग) ऐसे प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के । । । ऐसी प्रबंधकीय और वित्तीय सहायता प्रदान करके जो प्रायोजक बैंक और प्रादेशिक बैंक के बीच करार पाई जाए;
2। । । । । । ।
4. कार्यालय और अभिकरण-(1) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का प्रधान कार्यालय अधिसूचित क्षेत्र में ऐसे स्थान पर होगा जो केन्द्रीय सरकार, [राष्ट्रीय बैंक] और प्रायोजक बैंक से परामर्श करके, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
(2) यदि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की राय में अधिसूचित क्षेत्र के किसी स्थान पर अपनी शाखाएं या अपने अभिकरण स्थापित करना आवश्यक है तो वह ऐसा कर सकेगा ।
5. प्राधिकृत पूंजी-प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की प्राधिकृत पूंजी [बीस अरब रुपए होगी जो दस-दस रुपए के दो अरबट पूर्णतः समादत्त शेयरों में बंटी होगी :
परन्तु केन्द्रीय सरकार, [राष्ट्रीय बैंक] और प्रायोजक बैंक से परामर्श करके ऐसी प्राधिकृत पूंजी को बढ़ा या घटा सकेगी, किन्तु इस प्रकार कि प्राधिकृत पूंजी 4[एक करोड़ रुपए से कम न होगी और सभी दशाओं में शेयर दस-दस रुपए के पूर्णतः समादत्त शेयर होंगे ।]
6. निर्गमित पूंजी- [(1) प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की निर्गमित पूंजी, प्रथमतः उतनी होगी जितनी केन्द्रीय सरकार इस निमित्त नियत करे, किंतु वह किसी भी दशा में [एक करोड़ रुपए से कम] नहीं होगी ।]
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा निर्गमित पूंजी के पचास प्रतिशत के लिए केन्द्रीय सरकार, पन्द्रह प्रतिशत के लिए सम्बद्ध राज्य सरकार और पैंतीस प्रतिशत के लिए प्रायोजक बैंक प्रतिश्रुति करेगा ।
[परंतु यदि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार या प्रायोजक बैंक से भिन्न स्रोतों से अपनी पूंजी जुटाता है तो केंद्रीय सरकार और प्रायोजक बैंक की शेयरधारिता इक्यावन प्रतिशत से कम नहीं होगी :
परंतु यह और कि यदि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक में ऐसी राज्य सरकार की शेयरधारिता का स्तर पन्द्रह प्रतिशत से कम किया जाता है तो केंद्रीय सरकार संबंधित राज्य सरकार से परामर्श करेगी ।]
8[(2क) केंद्रीय सरकार, प्रायोजक बैंक और राज्य सरकार से परामर्श करके, अधिसूचना द्वारा, केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार या प्रायोजक बैंक की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट शेयरधारिता की सीमा को बढ़ा या घटा सकेगी :
परंतु केंद्रीय सरकार, ऐसी राज्य सरकार की शेयरधारिता की सीमा को कम करने से पूर्व संबंधित राज्य सरकार से परामर्श करेगी ।]
(3) बोर्ड, [राष्ट्रीय बैंक,] सम्बद्ध राज्य सरकार और प्रायोजक बैंक से परामर्श करके और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की निर्गमित पूंजी समय-समय पर बढ़ा सकेगा और जहां अतिरिक्त पूंजी निर्गमित की जाती है वहां ऐसी पूंजी के लिए भी उसी अनुपात में प्रतिश्रुति की जाएगी [जो, यथास्थिति, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट है या उपधारा (2क) के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए ।]
7. शेयरों का अनुमोदित प्रतिभूतियां होना-इस धारा में इसमें इसके पश्चात् वर्णित अधिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के शेयरों को भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की धारा 20 में प्रगणित प्रतिभूतियों के अन्तर्गत समझा जाएगा । । । ।
अध्याय 3
प्रबन्ध
8. प्रबन्ध-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का साधारण अधीक्षण, निदेशन और कामकाज तथा कारबार का प्रबन्ध, निदेशक बोर्ड में निहित होगा जो ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा जो प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा प्रयोग या निर्वहन किए जा सकते हैं ।
(2) अपने कृत्यों के निर्वहन में बोर्ड कारबार के सिद्धांतों पर कार्य करेगा और लोकहित का सम्यक् ध्यान रखेगा ।
9. निदेशक बोर्ड-(1) निदेशक बोर्ड धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त अध्यक्ष और निम्नलिखित अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-
[(क) दो निदेशक, जो केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार, रिजर्व बैंक, राष्ट्रीय बैंक, प्रायोजक बैंक या किसी अन्य बैंक के अधिकारी न हों, जिन्हें केन्द्रीय सरकार नामनिर्देशित करेगी :
[परंतु ऐसे किसी व्यक्ति को निदेशक के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं किया जाएगा, यदि वह पहले से किसी अन्य प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के बोर्ड में कोई निदेशक है;]
(ख) एक निदेशक, जो रिजर्व बैंक का अधिकारी हो, जिसे वह बैंक नामनिर्देशित करेगा;
(ग) एक निदेशक, जो राष्ट्रीय बैंक का अधिकारी हो, जिसे वह बैंक नामनिर्देशित करेगा;
(घ) दो निदेशक, जो प्रायोजक बैंक के अधिकारी हों, जिन्हें वह बैंक नामनिर्देशित करेगा; और
(ङ) दो निदेशक, जो संबद्ध राज्य सरकार के अधिकारी हों, जिन्हें वह सरकार नामनिर्देशित करेगी ;]
5[(च) केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार, प्रायोजक बैंक और केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन अन्य संस्थाओं द्वारा नामनिर्दिष्ट निदेशकों से भिन्न शेयर धारकों द्वारा निर्वाचित उतने निदेशक, जिनके नाम उस अधिवेशन की तारीख से कम से कम नब्बे दिन पूर्व प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के शेयर धारकों के रजिस्टर में दर्ज हों, जिस अधिवेशन में निदेशकों का निर्वाचन निम्नलिखित आधार पर होता है, अर्थात् :-
(i) जहां ऐसे शेयर धारकों को निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी का दस प्रतिशत या उससे कम है, वहां ऐसे शेयर धारकों में से एक निदेशक निर्वाचित किया जाएगा;
(ii) जहां ऐसे शेयर धारकों को निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी के दस प्रतिशत से अधिक, किंत पच्चीस प्रतिशत से कम है, वहां उपखंड (i) में निर्दिष्ट शेयर धारकों को सम्मिलित करते हुए ऐसे शेयर धारकों में से दो निदेशक निर्वाचित किए जाएंगे;
(iii) जहां ऐसे शेयर धारकों को निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी का पच्चीस प्रतिशत या उससे अधिक है, वहां उपखंड (i) और उपखंड (ii) में निर्दिष्ट शेयर धारकों को सम्मिलित करते हुए ऐसे शेयर धारकों में से तीन निदेशक निर्वाचित किए जाएंगे ।]
(2) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड के सदस्यों की संख्या बढ़ा सकेगी किन्तु वह इस प्रकार कि निदेशकों की संख्या कुल मिलाकर पन्द्रह से अधिक न हो और वह रीति भी विहित कर सकेगी जिससे अतिरिक्त संख्या भरी जाए ।
5[(3) केन्द्रीय सरकार, यदि वह प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के प्रभावी कार्यकरण के प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझती है तो प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के बोर्ड में केन्द्रीय सरकार का एक अधिकारी नियुक्त कर सकेगी ।]
[10. निदेशक की पदावधि-धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन नामनिर्दिष्ट निदेशक, केंद्रीय सरकार के प्रसादपर्यंत और उस तारीख से, जिसको वह पद ग्रहण करता है, तीन वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो केंद्रीय सरकार उसके नामनिर्देशन के समय विनिर्दिष्ट करे, अपना पद धारण करेगा और पुनः नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा :
परंतु ऐसा कोई निदेशक लगातार या आंतरायिक रूप से छह वर्ष से अधिक अवधि के लिए पद धारण नहीं करेगा ।]
11. अध्यक्ष-(1) [प्रायोजक बैंक] किसी व्यक्ति को प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का अध्यक्ष नियुक्त कर सकेगी और अधिक से अधिक पांच वर्षों की वह अवधि विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिसके लिए ऐसा व्यक्ति उपधारा (4) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए अध्यक्ष का पद धारण करेगा :
[परंतु किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति,-
(क) यदि ऐसा व्यक्ति प्रायोजक बैंक का अधिकारी है तो राष्ट्रीय बैंक से परामर्श करने के पश्चात्; और
(ख) किसी अन्य मामले में, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से,
ही की जाएगी, अन्यथा नहीं ।]
2[(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) प्रायोजक बैंक को उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के अवसान से पूर्व किसी भी समय अध्यक्ष की पदावधि समाप्त करने का अधिकार होगा :
परन्तु ऐसी समाप्ति,-
(क) यदि अध्यक्ष, प्रायोजक बैंक का अधिकारी है तो राष्ट्रीय बैंक से परामर्श करने के पश्चात्; और
(ख) किसी अन्य मामले में, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से,
ही की जाएगी, अन्यथा नहीं :
परंतु यह और कि जहां अध्यक्ष केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, रिजर्व बैंक, राष्ट्रीय बैंक, प्रायोजक बैंक या किसी अन्य बैंक का अधिकारी नहीं है वहां उसे कम से कम तीन मास की लिखित सूचना दी जाएगी या ऐसी सूचना के बदले में तीन मास का वेतन और भत्ते दिए जाएंगे; और
(ख) अध्यक्ष को उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के अवसान से पूर्व किसी भी समय प्रायोजक बैंक को कम से कम तीन मास की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग करने का अधिकार होगा ।]
(2) उपधारा (1) के अधीन अध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति उस उपधारा में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होगा ।
(3) अध्यक्ष, अपना सम्पूर्ण समय प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के कामकाज में लगाएगा और बोर्ड के अधीक्षण, नियंत्रण और निदेशन के अधीन रहते हुए प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के सम्पूर्ण कामकाज का प्रबन्ध करेगा ।
[(4) 2[प्रायोजक बैंक] किसी भी समय अध्यक्ष को पद से हटा सकेगी :
2[परंतु अध्यक्ष को,-
(क) यदि वह प्रायोजक बैंक का अधिकारी है तो राष्ट्रीय बैंक से परामर्श करने के पश्चात्; और
(ख) किसी अन्य मामले में केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, ही हटाया जा सकेगा, अन्यथा नहीं :
परंतु यह और कि] इस उपधारा के अधीन किसी व्यक्ति को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे उसके हटाए जाने के विरुद्ध कारण दर्शित करने का अवसर न दे दिया गया हो ।]
(5) अध्यक्ष ऐसे वेतन और भत्ते प्राप्त करेगा और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों द्वारा शासित होगा जो 2[प्रायोजक बैंक, राष्ट्रीय बैंक के परामर्श से] अवधारित करे ।
(6) यदि अध्यक्ष अंग-शैथिल्य के कारण या अन्यथा अपना कर्तव्य करने में असमर्थ हो जाता है या छुट्टी के कारण या अन्यथा ऐसी परिस्थितियों में, जिनसे उसका पद रिक्त नहीं होता, अनुपस्थित है, तो केन्द्रीय सरकार उसकी अनुपस्थिति के दौरान किसी अन्य व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकेगी ।
12. निरर्हताएं-कोई व्यक्ति, निदेशक के रूप में, यथास्थिति, नियुक्त या नामनिर्देशित किए जाने के लिए और निदेशक होने के लिए, निरर्हित होगा, यदि-
(क) वह दिवालिया न्यायनिर्णीत है या किसी समय किया गया है या उसने अपने ऋण का संदाय निलंबित कर दिया है या अपने लेनदारों के साथ समझौता कर लिया है, अथवा
(ख) वह विकृतचित्त है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है; अथवा
(ग) वह ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है या किया गया है, जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्गस्त है ।
13. निदेशकों के स्थान की रिक्ति-(1) यदि कोई निदेशक-
(क) धारा 12 में विनिर्दिष्ट किसी निरर्हता के अधीन हो जाता है; अथवा
(ख) बोर्ड के लगातार तीन से अधिक अधिवेशनों में उसकी इजाजत के बिना अनुपस्थित रहता है,
तो उसका स्थान रिक्त हो जाएगा ।
[(2) निदेशक उस प्राधिकारी को, जिसके द्वारा उसे नामनिर्देशित किया गया था, पद त्याग करने की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा; और ऐसा त्यागपत्र स्वीकार कर लिए जाने पर, निदेशक के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने अपना पद रिक्त कर दिया है ।]
14. बोर्ड के अधिवेशन-(1) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के निदेशक बोर्ड के अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होंगे और वह अपने अधिवेशनों में कामकाज के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगा जो विहित किए जाएं ।
(2) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का अध्यक्ष, बोर्ड के प्रत्येक अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में ऐसा निदेशक अध्यक्षता करेगा जिसे अध्यक्ष साधारणतया या किसी विशिष्ट अधिवेशन के सम्बन्ध में इस निमित्त प्राधिकृत करे और अध्यक्ष तथा इस प्रकार प्राधिकृत निदेशक की अनुपस्थिति में, अधिवेशन में उपस्थित निदेशक अपने में से किसी एक को अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए निर्वाचित करेंगे ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए अधिवेशन में अनुपस्थिति" से ऐसी गैर-हाजिरी अभिप्रेत है जो किसी अधिवेशन में या अधिवेशन के किसी भाग में कोई कामकाज करने के दौरान किसी भी कारण से हुई हो ।
(3) बोर्ड के अधिवेशन में सभी प्रश्न उपस्थित और मतदान करने वाले निदेशकों के मतों की बहुसंख्या द्वारा विनिश्चित किए जाएंगे और मतों के बराबर होने की दशा में, सभापतित्व करने वाले व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
(4) यदि कोई निदेशक किसी संविदा, उधार, ठहराव या प्रस्थापना में किसी तरह से, चाहे प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः हितबद्ध है तो वह निदेशक के रूप में उस संविदा, उधार, ठहराव या प्रस्थापना की, जो प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के साथ या उसके द्वारा या उसके निमित्त की गई है या की जानी है, चर्चा में या मतदान में भाग नहीं लेगा और जहां निदेशक ऐसे किसी विषय में हितबद्ध है, वहां वह बोर्ड को शीघ्रतम सम्भव अवसर पर यह प्रकट करेगा कि ऐसी संविदा, उधार, ठहराव या प्रस्थापना में किस प्रकार का उसका हित है और जहां वह ऐसा करता है वहां अधिवेशन में उसकी उपस्थिति की गणना ऐसी चर्चा या मतदान के समय पर गणपूर्ति के प्रयोजन के लिए नहीं की जाएगी और यदि वह मतदान करता है तो उसका मत शून्य होगा :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे निदेशक को केवल इस कारण लागू नहीं होगी कि वह,-
(i) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अर्थ में किसी लोक कम्पनी में उसकी समादत्त पूंजी में या भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या के अधीन स्थापित किसी निगम में या किसी ऐसी सहकारी सोसाइटी में, जिसके साथ प्रादेशिक ग्रामीण बैंक ने कोई संविदा, उधार, ठहराव, या प्रस्थापना की है या करने की प्रस्थापना करता है, अधिक से अधिक दो प्रतिशत शेयर धारण करने वाला शेयरधारक (निदेशक से भिन्न) है, या
(ii) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का निदेशक उसी हैसियत में है ।
15. बोर्ड का समितियां-बोर्ड या तो पूर्णतः निदेशकों से या पूर्णतः अन्य व्यक्तियों से या भागतः निदेशकों से और भागतः अन्य व्यक्तियों से, जिन्हें वह ठीक समझे, मिलकर बनने वाली समितियां, ऐसे प्रयोजनों के लिए गठित कर सकेगा, जिनका वह विनिश्चय करे ।
16. समितियों के निदेशकों और सदस्यों की फीस और भत्ते-(1) समिति के (अध्यक्ष से भिन्न) प्रत्येक निदेशक और प्रत्येक सदस्य को ऐसी फीस और भत्ते दिए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार अवधारित करे :
परन्तु यदि कोई निदेशक या समिति का सदस्य केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, रिजर्व बैंक, [राष्ट्रीय बैंक,] प्रायोजक बैंक या किसी अन्य बैंक का अधिकारी है, तो उसे कोई फीस नहीं दी जाएगी ।
(2) ऐसे निदेशक या समिति के सदस्य को, जो केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, रिजर्व बैंक, 1[राष्ट्रीय बैंक,] प्रायोजक बैंक या किसी अन्य बैंक का अधिकारी है, संदेय भत्तों का संदाय वह सरकार या बैंक करेगा जिसके द्वारा वह नियोजित किया गया है और किसी अन्य निदेशक या समिति के सदस्य को संदेय भत्तों और फीस का संदाय सम्बद्ध प्रादेशिक ग्रामीण बैंक करेगा ।
17. प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के कर्मचारिवृन्द-प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, उतनी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों को [जितने वह अपने कृत्यों के दक्ष पालन के लिए आवश्यक या वांछनीय समझे, ऐसी रीति से नियुक्त कर सकेगा जो विहित की जाए] और उनकी नियुक्ति और सेवा के निबन्धनों और शर्तों का अवधारण कर सकेगा :
परन्तु यदि प्रायोजक बैंक से ऐसा प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, जो उसके द्वारा प्रायोजित है, ऐसा करने की प्रार्थना करता है तो प्रायोजक बैंक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह । । । उतने अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों को प्रादेशिक ग्रामीण बैंक में प्रतिनियोजन पर भेजे जितने उसके कृत्यों के दक्ष पालन के लिए आवश्यक या वांछनीय हों :
परन्तु यह और कि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा नियुक्त अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का पारिश्रमिक वह होगा जो केंद्रीय सरकार अवधारित करे और ऐसे पारिश्रमिक का अवधारण करने में केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित क्षेत्र में राज्य सरकार तथा स्थानीय प्राधिकारियों के समान स्तर और हैसियत वाले कर्मचारियों के वेतनमान का सम्यक् ध्यान रखेगी ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी औद्योगिक अधिकरण, न्यायालय या अन्य प्राधिकारी का कोई अधिनिर्णय, निर्णय, डिक्री, विनिश्चय या आदेश, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किया गया हो, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा नियुक्त व्यक्तियों से सम्बन्धित निबन्धनों और शर्तों को लागू नहीं होगा ।
(3) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के अधिकारी और अन्य कर्मचारी ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे जो बोर्ड द्वारा उनको सौंपे जाएं या प्रत्यायोजित किए जाएं ।
अध्याय 4
प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का कारबार
18. प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा किया जा सकने वाला कारबार-(1) प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (ख) में यथापरिभाषित बैंककारी कारबार चलाएगा और करेगा और उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट एक या एक से अधिक प्रकार का कारबार कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक विशिष्टतया निम्नलिखित प्रकार का कारबार अपने जिम्मे ले सकेगा, अर्थात् :-
(क) विशिष्टतया छोटे और सीमांत कृषकों तथा कृषि श्रमिकों को, चाहे अलग-अलग या समूह में, और सहकारी सोसाइटियों को, जिनके अन्तर्गत कृषि विपणन सोसाइटियां, कृषि प्रसंस्करण सोसाइटियां, सहकारी कृषिकर्म सोसाइटियां, प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटियां या कृषक सेवा सोसाइटियां भी हैं, कृषि प्रयोजनों या कृषि संक्रियाओं या उनसे सम्बन्धित अन्य प्रयोजनों के लिए उधार और अग्रिम देना;
(ख) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के सम्बन्ध में अधिसूचित क्षेत्र के भीतर विशिष्टतया कारीगरों, छोटे उद्यमियों और कम साधन वाले ऐसे व्यक्तियों को, जो व्यापार, वाणिज्य या उद्योग या अन्य उत्पादन कार्यों में लगे हुए हों, उधार और अग्रिम धन देना ।
अध्याय 5
लेखा और लेखापरीक्षा
19. लेखाओं का बन्द किया जाना-(1) प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक प्रतिवर्ष [31 मार्च] तक [या ऐसी अन्य तारीख तक जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे] अपनी बहियां बन्द और सन्तुलित कराएगा और अपने लेखाओं की परीक्षा के लिए केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से लेखापरीक्षक नियुक्त करेगा ।
2[परंतु केन्द्रीय सरकार, इस उपधारा के अधीन एक लेखा अवधि से दूसरी लेखा अवधि में संक्रमण को सुकर बनाने की दृष्टि से, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो वह संबंधित वर्षों की बाबत बहियों को बंद और संतुलित करने के लिए, या उससे संबंधित अन्य विषयों के लिए, आवश्यक या समीचीन समझती है ।]
(2) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का प्रत्येक लेखापरीक्षक ऐसी व्यक्ति होगा जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 के अधीन किसी कम्पनी के लेखापरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए अर्ह है और वह ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो प्रादेशिक ग्रामीण बैंक केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से नियत करे ।
(3) प्रत्येक लेखापरीक्षक को प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के वार्षिक तुलनपत्र और लाभ-हानि लेखा की एक प्रति और प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा रखी गई सभी बहियों की सूची दी जाएगी और लेखापरीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह तुलनपत्र और उससे सम्बद्ध वाउचरों की जांच करे और लेखापरीक्षक को अपने कर्तव्यों के पालन में-
(क) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की बहियां, लेखे और अन्य दस्तावेजों तक सब उचित समय पर पहुंच होगी;
(ख) वह ऐसे लेखाओं के अन्वेषण में अपनी सहायता करने के लिए प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के व्यय पर लेखापालों और अन्य व्यक्तियों को नियोजित कर सकेगा; और
(ग) वह ऐसे लेखाओं के सम्बन्ध में प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के अध्यक्ष या किसी अधिकारी या कर्मचारी की परीक्षा कर सकेगा ।
(4) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का प्रत्येक लेखापरीक्षक वार्षिक तुलनपत्र और लेखाओं के सम्बन्ध में उस बैंक को रिपोर्ट करेगा और ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट में यह कथन होगा कि-
(क) क्या उसकी राय में तुलनपत्र ऐसा पूर्ण और उचित तुलनपत्र है जिसमें सभी आवश्यक विशिष्टियां हैं और वह ऐसे समुचित रूप में तैयार किया गया है जिससे कि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के कार्यकलाप की स्थिति सही और ठीक रूप में प्रदर्शित होती है और यदि उसने कोई स्पष्टीकरण या जानकारी मांगी थी तो क्या वह दी गई है और क्या वह समाधानप्रद है;
(ख) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के जिन संव्यवहारों की सूचना उसे मिली है वे उस बैंक की शक्तियों के अन्तर्गत हैं या नहीं;
(ग) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के कार्यालयों और शाखाओं से प्राप्त विवरणियां उसकी लेखापरीक्षा के प्रयोजन के लिए पर्याप्त हैं या नहीं;
(घ) लाभ-हानि लेखे से उस अवधि के लाभ हानि का, जिस अवधि के बारे में वह लेखा है, सही हिसाब दर्शित होता है या नहीं;
(ङ) कोई अन्य विषय जिसके बारे में वह यह विचार करता है कि उसकी सूचना प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को मिलनी चाहिए ।
20. शेयरधारकों को वार्षिक रिपोर्ट का दिया जाना- [(1)] प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक [अपने लेखावर्ष की समाप्ति की तारीख से तीन मास या तीन मास से अनधिक की ऐसी और अवधि के अंदर जो रिजर्व बैंक अनुज्ञात करे] अपने प्रत्येक शेयरधारक को ठीक पहले के लेखा-वर्ष के दौरान अपने कार्यकरण और कामकाज की रिपोर्ट देगा जिसके साथ तुलनपत्र, लाभ-हानि लेखा की और उक्त लेखा-वर्ष के लेखाओं के सम्बन्ध में लेखापरीक्षक की रिपोर्ट की प्रति भी होगी ।
[(2) केन्द्रीय सरकार, लेखा परीक्षकों की प्रत्येक रिपोर्ट और प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के कार्यकरण और कामकाज की बाबत रिपोर्ट, प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।]
21. लाभों का व्ययन-प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, डूबन्त और शंकास्पद ऋणों, आस्तियों में अवक्षयण, कर्मचारिवृन्द और अधिवार्षिकी निधियों में अभिदाय तथा सभी ऐसे अन्य विषयों के लिए उपबन्ध करने के पश्चात् जिनके लिए उपबन्ध करना विधि के अधीन आवश्यक है या जिनके लिए बैंककारी कम्पनियों द्वारा प्रायिक रूप से उपबन्ध किया जाता है, अपने शुद्ध लाभ में से लाभांश घोषित कर सकेगा ।
22. आय-कर अधिनियम, 1961 के प्रयोजन के लिए प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को सहकारी सोसाइटी समझा जाना-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या आय, लाभ या अभिलाभ पर किसी कर के सम्बन्ध में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के प्रयोजन के लिए प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को सहकारी सोसाइटी समझा जाएगा ।
23. ब्याज-कर का संदेय न होना-ब्याज-कर अधिनियम, 1974 (1974 का 45) में किसी बात के होते हुए भी, कोई प्रादेशिक ग्रामीण बैंक उस अधिनियम के अधीन किसी कर का संदाय करने के लिए दायी नहीं होगा ।
[अध्याय 5क
प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों का समामेलन
23क. प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों का समामेलन-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, यदि केन्द्रीय सरकार की, राष्ट्रीय बैंक, संबंधित राज्य सरकार और प्रायोजक बैंक से परामर्श के पश्चात्, यह राय है यह लोकहित में या किसी प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा व्यवहार के क्षेत्र के विकास के हित में या स्वयं प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के हित में आवश्यक है कि दो या अधिक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों का समामेलन किया जाना चाहिए, तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों का (जिन्हें इस अध्याय में इसके पश्चात् अंतरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक कहा गया है) एक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक में (जिसे इस अध्याय में इसके पश्चात् अंतरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक कहा गया है) ऐसी संरचना, संपत्ति, शक्तियों, अधिकारों, हितों, प्राधिकारों और विशेषाधिकारों सहित, और ऐसे दायित्वों, कर्तव्यों और बाध्यताओं सहित, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, समामेलन के लिए उपबंध कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना में वह तारीख उपदर्शित की जाएगी जिससे समामेलन प्रभावी होगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना में निम्नलिखित सभी या उनमें से किसी विषय के लिए भी उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) अंतरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के सभी कर्मचारियों की [उनमें से ऐसे कर्मचारियों को छोड़कर जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अर्थ में कर्मकार नहीं हैं और जिनका अधिसूचना में विनिर्दिष्ट रूप से उल्लेख किया जाता हैट सेवा का अंतरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक में उसी पारिश्रमिक पर और सेवा के उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर बना रहना जो वे समामेलन के प्रवृत्त होने की तारीख के ठीक पूर्व पा रहे थे या जिनसे वे शासित हो रहे थे;
(ख) खंड (क) में किसी बात के होते हुए भी, जहां अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के ऐसे कर्मचारियों में से किसी ने जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अर्थ में कर्मकार नहीं है और जिनका अधिसूचना में विनिर्दिष्ट रूप से उल्लेख किया जाता है, या जहां अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के किसी कर्मचारी ने, अन्तरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को, उक्त समामेलन के प्रवृत्त होने की तारीख के ठीक बाद की तारीख से तीन मास की अवधि के अवसान के पूर्व किसी भी समय, लिखित सूचना देकर, अन्तरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का कर्मचारी न रहने का अपना आशय संसूचित किया है वहां, ऐसे कर्मचारी को ऐसे प्रतिकर का, यदि कोई है, जिसका वह औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन हकदार है, और उस तारीख के ठीक पूर्व संबंधित अंतरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के नियम या प्राधिकार के अधीन उसे साधारणतया अनुज्ञेय उपदान, भविष्य निधि और अन्य सेवानिवृत्ति फायदों का, संदाय;
(ग) प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के समामेलन के लिए कोई अन्य निबन्धन और शर्तें; और
(घ) अन्तरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध किसी अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध किसी लम्बित विधिक कार्यवाही का चालू रहना और ऐसे पारिणामिक, आनुषंगिक और अनुपूरक उपबन्ध जो, केन्द्रीय सरकार की राय में, समामेलन को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हों ।
(4) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
23ख. धारा 23क के अधीन अधिसूचना संबंधित पक्षकारों के लिए पर्याप्त सूचना होगी-(1) धारा 23क की उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना संबंधित सभी पक्षकारों के लिए उसके उपबन्धों की पर्याप्त सूचना होगी और अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों और अन्तरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक पर तथा निक्षेपकर्ताओं, लेनदारों, कर्मचारियों और ऐसे सभी अन्य व्यक्तियों पर, जिनका ऐसे बैंकों से व्यवहार है, आबद्धकर होगी ।
(2) संपत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) या रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 23क की उपधारा (1) के अधीन निकाली गई कोई अधिसूचना, अधिसूचना के उपबन्धों के अनुसार, अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के कारबार, संपत्ति, आस्तियों और दायित्वों, अधिकारों, हितों, शक्तियों, विशेषाधिकारों, फायदों और किसी भी प्रकृति की बाध्यताओं का अन्तरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को पर्याप्त हस्तान्तरण होगी ।
(3) धारा 23क के अधीन समामेलन के प्रवृत्त हो जाने की तारीख से ही, किसी करार, हस्तान्तरणपत्र, बीमा, मुख्तारनामा या किसी भी प्रकृति के किसी दस्तावेज में अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह अन्तरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के प्रति निर्देश है और अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के अधिकारों और बाध्यताओं के बारे में यह समझा जाएगा कि वे उक्त समामेलन में विनिर्दिष्ट सीमा तक अन्तरिती प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के अधिकार और बाध्यताएं हैं ।
23ग. अंतरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के कारबार की समाप्ति-धारा 23क के अधीन समामेलन के प्रवृत्त होने की तारीख से ही, अन्तरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, कारबार करना, जिसके अन्तर्गत किन्हीं निक्षेपकर्ताओं को कोई संदाय करने या लेनदारों के प्रति किसी दायित्व या बाध्यता का उन्मोचन करने का कारबार भी है, सिवाय उस सीमा तक जो उक्त समामेलन के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हो, समाप्त कर देंगे ।
23घ. प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों का समापन-जहां धारा 23क की उपधारा (1) के अधीन प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के समामेलन के लिए कोई अधिसूचना निकाली जाती है, वहां, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में और अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी तारीख को, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, अंतरक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, जो समामेलन के कारण कार्य करना समाप्त कर देंगे, विघटित हो जाएंगे और ऐसा निदेश धारा 26 में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होगा ।]
अध्याय 6
प्रकीर्ण
24. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-(1) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अपने कृत्यों के निर्वहन में ऐसे विषयों के बारे में, जो नीति और लोकहित से सम्बद्ध हैं, ऐसे निदेशों का अनुसरण करेगा जो केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके दे ।
(2) यदि यह प्रश्न उठता है कि ऐसा कोई निदेश नीति के ऐसे विषय से संबद्ध है जिसमें लोकहित अन्तर्ग्रस्त है तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
[24. प्रायोजक बैंक द्वारा निरीक्षण, लेखापरीक्षा और संवीक्षा-धारा 19 में किसी बात के होते हुए भी और बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 35 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रायोजक बैंक, समय-समय पर, अपने द्वारा प्रायोजित प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों की प्रगति को मानीटर करेगा और अपने किसी एक या अधिक अधिकारियों द्वारा निरीक्षण, आंतरिक लेखापरीक्षा और संवीक्षा कराएगा तथा ऐसे प्रादेशिक ग्रामीण बैंक द्वारा किए जाने वाले सुधार संबंधी उपायों का सुझाव देगा ।]
25. विश्वस्तता और गोपनीयता के बारे में बाध्यताएं-(1) जब तक विधि द्वारा अन्यथा अपेक्षित न हो तब तक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक ऐसी पद्धतियों और प्रथाओं का अनुपालन करेगा जो बैंकरों में रूढ़िगत हैं और वह विशिष्टतया कोई जानकारी, जो उसके संघटकों के कार्यकलापों के सम्बन्ध में हों, केवल उन्हीं परिस्थितियों में प्रकट करेगा जिनमें विधि या बैंकरों में रूढ़िगत पद्धति और प्रथा के अनुसार उसे प्रकट करना प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के लिए आवश्यक या समुचित है, अन्यथा नहीं ।
(2) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का प्रत्येक निदेशक, समिति का सदस्य या लेखापरीक्षक, अधिकारी या अन्य कर्मचारी अपना कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व इस अधिनियम की अनुसूची में दिए गए प्ररूप में विश्वस्तता और गोपनीयता की घोषणा करेगा ।
[(3) इस धारा की कोई बात प्रत्यय विषयक जानकारी कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005 (2005 का 30) के अधीन प्रकट की गई प्रत्यय विषयक जानकारी को लागू नहीं होगी ।]
26. प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के समापन का वर्जन-कम्पनियों के समापन से सम्बन्धित विधि का कोई उपबन्ध प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को लागू नहीं होगा और प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का समापन केन्द्रीय सरकार के आदेश से ही और ऐसी रीति से, जैसी कि वह निर्दिष्ट करे, होगा ।
27. नियुक्ति या गठन में त्रुटि से कार्यों या कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-(1) सद्भावपूर्वक कार्य करने वाले अध्यक्ष द्वारा किया गया कोई कार्य केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि उसकी नियुक्ति या प्रक्रिया में कोई त्रुटि थी ।
(2) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के किसी निदेशक, बोर्ड या किसी समिति का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगी कि, यथास्थिति, ऐसे बोर्ड या समिति में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।
(3) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के निदेशक या समिति के सदस्य के रूप में सद्भावपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य तत्पश्चात् यह पता चलने पर भी विधिमान्य होंगे कि उसकी नियुक्ति किसी त्रुटि या निरर्हता के कारण अविधिमान्य थी या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी उपबन्ध के आधार पर समाप्त हो गई थी :
परन्तु जब प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को यह दर्शित कर दिया जाता है कि उसकी नियुक्ति अविधिमान्य है या समाप्त कर दी गई है, तब इस धारा की कोई बात प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के निदेशक या उसकी समिति के किसी सदस्य द्वारा किए गए किसी कार्य को विधिमान्य ठहराने वाली नहीं समझी जाएगी ।
28. निदेशकों आदि की क्षतिपूर्ति-(1) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का कोई निदेशक या उसकी समिति का कोई सदस्य किसी ऐसी हानि या व्यय के लिए, जो प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की ओर से अर्जित की गई या ली गई किसी सम्पत्ति या प्रतिभूति के मूल्य की या उसमें हक की किसी अपर्याप्तता या कमी के कारण उस बैंक को हुआ हो अथवा किसी ग्राहक या ऋणी के दिवाले या सदोष कार्य के कारण अथवा उसके पद के कर्तव्यों के निष्पादन में या उसके सम्बन्ध में की गई किसी बात के कारण तभी उत्तरदायी होगा जब ऐसी हानि, व्यय, अपर्याप्तता या कमी ऐसे निदेशक या सदस्य के किसी जानबूझकर किए गए कार्य या व्यतिक्रम के कारण हुई हो, अन्यथा नहीं ।
(2) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के अध्यक्ष और केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के प्रत्येक अधिकारी अथवा रिजर्व बैंक [या राष्ट्रीय बैंक] या प्रायोजक बैंक के अधिकारी और प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी की उसके द्वारा उपगत ऐसी सभी हानि और व्यय के लिए, जो उसके कर्तव्यों के निर्वहन में या के सम्बन्ध में उसके द्वारा उपगत किए गए हों, ऐसे बैंक द्वारा क्षतिपूर्ति की जाएगी, किन्तु उस दशा में नहीं जब उसके स्वयं जानबूझकर किए गए कार्य या व्यतिक्रम के कारण ऐसा हुआ हो ।
29. नियम बनाने की शक्ति-(1) [राष्ट्रीय] और प्रायोजक बैंक से परामर्श करके केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) वह रीति जिससे बोर्ड के सदस्यों की अतिरिक्त संख्या की पूर्ति धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन की जा सकेगी ;
(ख) वह समय जब और वह स्थान जहां प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के निदेशक-बोर्ड का अधिवेशन होगा और प्रक्रिया के वे नियम जिनका पालन बोर्ड द्वारा अपने अधिवेशनों में कामकाज करने के सम्बन्ध में धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन किया जाएगा;
[(खक) वह रीति जिससे प्रादेशिक बैंकों के अधिकारी और अन्य कर्मचारी नियुक्त किए जाएंगे ;]
(ग) कोई अन्य विषय जिसे विहित किया जाना है या किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
30. विनियम बनाने की शक्ति- [(1)] प्रायोजक बैंक और [राष्ट्रीय बैंक] से परामर्श करके और केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा] प्रादेशिक ग्रामीण बैंक का निदेशक-बोर्ड ऐसे विनियम, जो इस अधिनियम के और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों से असंगत न हों, उन सभी विषयों का उपबन्ध करने के लिए बना सकेगा जिनके लिए उपबन्ध करना इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन है ।
[(2) इस अधिनियम के अधीन निदेशक बोर्ड द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, केन्द्रीय सरकार को भेजा जाएगा और वह सरकार उसकी प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं, कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
31. कठिनाइयों का दूर किया जाना-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार ऐसा आदेश कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों से अंसगत न हो और जो उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो :
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से पांच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
32. अन्य विधियों के उपबन्धों पर अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में किसी बात के होते हुए भी और किसी प्रतिकूल रूढ़ि या प्रथा के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
अध्याय 7
कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन
33. कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन-भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में,-
(क) धारा 2 में,-
(i) खण्ड (गv) के पश्चात् निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-
(गध्) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक" से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अभिप्रेत है ;
(ii) खण्ड (ङ) के पश्चात् निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-
(ङक) प्रायोजक बैंक" से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 में यथापरिभाषित प्रायोजक बैंक अभिप्रेत हैं;ऱ्;
(iii) विद्यमान खण्ड (ङत्) को खण्ड (ङख) के रूप में पुनः अक्षरांकित किया जाएगा;
(ख) धारा 45ज में सहकारी बैंक" शब्दों के स्थान पर, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या सहकारी बैंक" शब्द रखे जाएंगे ;
(ग) धारा 46क की उपधारा (2) के खण्ड (ख) में,-
(i) राज्य सहकारी बैंकों" शब्दों के पश्चात् या प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे;
(ii) परन्तुक के स्थान पर निम्नलिखित परन्तुक रखा जाएगा, अर्थात् :-
परन्तु यह तब जब ऐसे उधार और अग्रिम, मूल के प्रतिदाय और ब्याज की अदायगी के बारे में,-
(i) राज्य सहकारी बैंकों को उधार और अग्रिम की दशा में राज्य सरकार द्वारा; और
(ii) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को उधार और अग्रिम की दशा में, प्रायोजक बैंक द्वारा, पूर्णतः प्रत्याभूत हों ।";
(घ) धारा 46ख की उपधारा (2) में,-
(i) राज्य सहकारी बैंकों" शब्दों के पश्चात् या प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे;
(ii) परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-
परन्तु यह और कि ऐसा कोई उधार या अग्रिम केवल निम्नलिखित दशाओं में दिया जाएगा अन्यथा नहीं :-
(क) जब धारा 17 के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा क्रय किए गए या पुनःमितिकाटा लेकर भुगतान किए गए विनिमयपत्रों और वचनपत्रों या रिजर्व बैंक द्वारा उनको दिए गए उधार और अग्रिम मद्धे कोई शोध्य रकमें चुकाने के वास्ते प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों को सक्षम बनाने के प्रयोजन के लिए हो और जब रिजर्व बैंक की यह राय हो कि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अनावृष्टि, दुर्भिक्ष या अन्य प्राकृतिक दुर्घटनाओं के कारण समय के भीतर ऐसी शोध्य रकमें चुकाने में असमर्थ हैं; और
(ख) जब ऐसे उधार और अग्रिम, मूल के प्रतिदाय और ब्याज की अदायगी की बाबत प्रायोजक बैंक द्वारा पूर्णतः प्रत्याभूत हों ।"।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 2 के खंड (क) के उपखंड (i) में खाद्य निगम अधिनियम, 1964 या" या शब्दों और अंकों के पश्चात् प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, या" शब्द और अंक अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।
(3) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में,-
(क) धारा 24 में उपधारा (2क) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-
(2ख) रिजर्व बैंक, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के बारे में उपधारा (2क) में निर्दिष्ट प्रतिशतता को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, परिवर्तित कर सकेगा ।" ;
(ख) धारा 34क की उपधारा (3) में, तथा कोई समनुषंगी बैंक" शब्दों के स्थान पर, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक तथा कोई समनुषंगी बैंक" शब्द और अंक रखे जाएंगे;
(ग) धारा 36कघ की उपधारा (3) में, तथा कोई समनुषंगी बैंक" शब्दों के स्थान पर प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक तथा कोई समनुषंगी बैंक" शब्द और अंक रखे जाएंगे;
(घ) धारा 51 में, अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किसी अन्य बैंककारी संस्था" शब्दों के स्थान पर, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किसी अन्य बैंककारी संस्था" शब्द और अंक रखे जाएंगे ।
(4) बैंककारी कम्पनी (विधि-व्यवसायियों के मुवक्किलों के खाते) अधिनियम, 1949 (1949 का 46) की धारा 2 के खंड (क) में, तत्स्थानी नया बैंक और" शब्दों के पश्चात् प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक और" शब्द और अंक अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।
(5) निक्षेप बीमा निगम अधिनियम, 1961 (1961 का 47) में,-
(क) धारा 2 में,-
(i) खंड (छ) में,-
(क) बैंककारी कम्पनी" शब्दों के स्थान पर, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या बैंककारी कम्पनी" शब्द रखे जाएंगे;
(ख) बैंककारी कम्पनी" शब्दों के स्थान पर, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या बैंककारी कम्पनी" शब्द रखे जाएंगे;
(ii) खंड (झ) में बैंककारी कम्पनी" शब्दों के पश्चात् या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक" शब्द अन्तःस्थापित जाएंगे;
(iii) खंड (ड) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-
(डक) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक" से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अभिप्रेत है;ऱ्;
(ख) धारा 11 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-
11क. प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों का रजिस्ट्रीकरण-निगम, प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को उसकी स्थापना की तारीख से तीस दिन का अवसान होने के पूर्व रजिस्ट्रीकृत करेगा ।";
(ग) धारा 13 में उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-
(3) उपधारा (1) के खंड (क), (ख), (ग), (घ) और (ज) के उपबन्ध प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को वैसे ही लागू होंगे जैसे कि वे बैंककारी कम्पनी को लागू होते हैं ।";
(घ) धारा 14 की उपधारा (1) में जहां कहीं, बैंककारी कम्पनी" शब्द आते हैं उनके स्थान पर, बैंककारी कम्पनी, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक" शब्द रखे जाएंगे ।
34. निरसन और व्यावृत्ति-(1) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अध्यादेश, 1975 (1975 का 13) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्यवाही इस अधिनियम के तत्समान उपबन्धों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
अनुसूची
[धारा 25(2) देखिए]
मैं,.......इसके द्वारा घोषणा करता हूं कि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के (यथास्थिति) निदेशक, समिति के सदस्य, अधिकारी, कर्मचारी या लेखापरीक्षक के रूप में मुझसे अपेक्षित और उक्त बैंक में मेरे द्वारा धारण किए गए पद या प्रास्थिति से उचित रूप से सम्बद्ध कर्तव्यों का मैं निष्ठापूर्वक, सच्चाई से और अपनी पूर्ण कुशलता और योग्यता से निष्पादन और पालन करूंगा ।
मैं यह भी घोषणा करता हूं कि मैं प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के कार्यों से या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक से व्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कार्यों से सम्बद्ध कोई जानकारी ऐसे किसी व्यक्ति को, जो उसका विधिक रूप से हकदार न हो, संसूचित नहीं करूंगा और न संसूचित होने दूंगा और ऐसे किसी व्यक्ति को प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के कब्जे की तथा उक्त बैंक के कारबार से या उक्त बैंक से व्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कारबार से सम्बद्ध किन्हीं बहियों या दस्तावेजों का निरीक्षण नहीं करने दूंगा या न उन तक पहुंच होने दूंगा ।
मेरे सामने हस्ताक्षर किए
तारीख ............. हस्ताक्षर
____________

