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प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948 ( Territorial Army Act, 1948 )


 

प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948

(1948 का अधिनियम संख्यांक 56)

[10 सितम्बर, 1948]

प्रादेशिक सेना के गठन के लिए

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

प्रादेशिक सेना के गठन के लिए उपबन्ध करना समीचीन है;

अतः इसके द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैः-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948 है ।

(2) इसका विस्तार ॥। सम्पूर्ण भारत पर है और यह प्रादेशिक सेना के सभी वर्गों के व्यक्तियों को, चाहे वे जहां भी हों, लागू होता है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो, -

                (क) भर्ती किया गया" से इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन प्रादेशिक सेना में भर्ती किया गया अभिप्रेत है;

(ख) आफिसर" से धारा 5 में विनिर्दिष्ट दो वर्गों में से किसी भी वर्ग का आफिसर अभिप्रेत है;

(ग) अनायुक्त आफिसर" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो प्रादेशिक सेना में अनायुक्त रैंक धारण किए हुए है और इसके अन्तर्गत कार्यकारी अनायुक्त आफिसर भी है;

(घ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

 [(घघ) लोक उपयोगी सेवा" से ऐसा उपक्रम अभिप्रेत है जो जनता को बिजली, प्रकाश, गैस या जल का प्रदाय करता है या लोक परिवहन चलाता है या सार्वजनिक सफाई या स्वच्छता की प्रणाली बनाए रखता है और जिसे केन्द्रीय सरकार ने राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसी लोक उपयोगी सेवा घोषित किया है जिसको यह अधिनियम लागू होता हैः

परन्तु ऐसी कोई अधिसूचना तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक कि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान नहीं हो जाता है कि प्रादेशिक सेना की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी किसी लोक उपयोगी सेवा में नियोजित व्यक्तियों को इस अधिनियम के अधीन उस सेना में सेवा करने के लिए लोकहित में अनिर्वायतः दायी किया जाना चाहिए;]

(ङ) [नियमित सेना"] पद से ऐसे आफिसर और अन्य रैंक अभिप्रेत हैं जो अपने आयोग के कारण या भर्ती के निबन्धनों के अनुसार, या अन्यथा, [सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46)] के अधीन लगातार किसी निश्चित अवधि के लिए सैनिक सेवा करने के दायी हैं; और

(च) जो शब्द और पद इसमें प्रयुक्त हुए हैं और 5[सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46)] में परिभाषित हैं और इसमें इसके पहले परिभाषित नहीं है उन सब के वही अर्थ समझे जाएंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं ।

3. प्रादेशिक सेना का गठन-(1) इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से एक सेना गठित की और बनाए रखी जाएगी जिसका नाम प्रादेशिक सेना होगा ।

(2) केन्द्रीय सरकार, प्रादेशिक सेना की उतनी यूनिटें गठित कर सकेगी जितनी वह ठीक समझे और इस प्रकार गठित किसी भी यूनिट को भंग या पुनर्गठित कर सकेगी ।

4. प्रादेशिक सेना के कार्मिक-(1) प्रादेशिक सेना में निम्नलिखित वर्गों के व्यक्ति होंगे, अर्थात्ः-

                (क) आफिसर, और

                (ख) भर्ती किए गए व्यक्ति ।

5. आफिसर-प्रादेशिक सेना के आफिसर निम्नलिखित दो वर्गों के होंगेः-

(क) वे आफिसर, जो प्रादेशिक सेना में, राष्ट्रपति द्वारा अनुदत्त आयोग धारण किए हुए हैं तथा जिनके रैंक के पदाभिधान [नियमित सेना के] भारतीय आयुक्त आफिसरों के रैंकों के समरूपी हैं, और

(ख) कनिष्ठ आयुक्त आफिसर, जो प्रादेशिक सेना में राष्ट्रपति द्वारा अनुदत्त आयोग धारण किए हुए हैं तथा जिनके रैंक के पदाभिधान [नियमित सेना के कनिष्ठ आयुक्त आफिसरों] के रैंकों के समरूपी हैं ।

6. भर्ती के लिए पात्र व्यक्ति- [ऐसा व्यक्ति, जो भारत का नागरिक है,] प्रादेशिक सेना में भर्ती के लिए अपने को प्रस्तुत कर सकेगा और यदि वह विहित शर्तें पूरी करता है तो वह ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, भरती किया जा सकेगा ।

 [6. प्रादेशिक सेना में अनिवार्य सेवा के लिए कुछ व्यक्तियों का दायित्व-(1) धारा 6 में अन्तर्विष्ट उपबन्ध पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, सरकार के अधीन या किसी लोक उपयोगी सेना में नियोजित प्रत्येक व्यक्ति, जिसने बीस वर्ष की आयु पूरी कर ली है किन्तु चालीस वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, इस धारा में अन्तर्विष्ट अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए तथा ऐसे नियमों के, जो इस निमित्त बनाए जाएं, अधीन रहते हुए, अपेक्षा किए जाने पर प्रादेशिक सेना में सेवा करने के लिए दायी होगा ।

(2) जहां विहित प्राधिकारी को यह प्रतीत होता है कि प्रादेशिक सेना या किसी क्षेत्र या स्थान में उसकी यूनिट को ध्यान में रखते हुए या प्रादेशिक सेना में सेवा की अभ्यावश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक है कि उपधारा (1) के अधीन प्रादेशिक सेना में सेवा करने के लिए अनिवार्य रूप से दायी व्यक्तियों को ऐसी सेवा के लिए बुलाया जाना चाहिए, वहां विहित प्राधिकारी प्रादेशिक सेना में सेवा करने के प्रयोजन के लिए उतने व्यक्तियों को बुला सकेगा जितने वह ठीक समझे ।

(3) उपधारा (2) के अधीन किन्हीं व्यक्तियों की सेवाओं की अध्यपेक्षा करते हुए विहित प्राधिकारी, सेवा के लिए बुलाए जाने वाले व्यक्तियों की आयु, शारीरिक स्वस्थता, अर्हताओं और अनुभव और सरकार के अधीन या लोक उपयोगी सेवा में नियोजित होते समय उनके द्वारा पहले किए गए काम की प्रकृति तथा प्रादेशिक सेना में उनके द्वारा किए जाने वाले काम को ध्यान में रखेगा ।

(4) उपधारा (1) के अधीन सेवा करने के लिए दायी प्रत्येक व्यक्ति, यदि विहित प्राधिकारी द्वारा उससे ऐसी अपेक्षा की जाए तो, ऐसे प्ररूप, जो विहित किए जाएं, भरने के लिए और उन पर हस्ताक्षर करके उन्हें विहित प्राधिकारी के समक्ष ऐसे समय के भीतर दाखिल करने के लिए आबद्ध होगा जो अध्यपेक्षा में विहित किया जाए ।

(5) विहित प्राधिकारी ऐसे व्यक्ति से, जो लोक उपयोगी सेवा में प्रबन्ध का भारसाधक है, ऐसे समय के भीतर, जो अध्यपेक्षा में विहित किया जाए, ऐसी विशिष्टियां देने की अपेक्षा कर सकेगा जो उसके अधीन नियोजित ऐसे व्यक्तियों की बाबत विहित की जाएं जो उपधारा (1) के अधीन सेवा करने के लिए दायी हों ।

(6) किसी व्यक्ति से, जिसकी सेवा की अध्यपेक्षा इस धारा के अधीन की जाती है, यह अपेक्षा की जा सकेगी कि वह केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार आफिसर के रूप में या भर्ती किए गए व्यक्ति के रूप में प्रादेशिक सेना में कार्यग्रहण करे और जहां किसी व्यक्ति ने प्रादेशिक सेना में इस प्रकार कार्यग्रहण कर लिया है वहां वह उन्हीं अधिकारों या विशेषाधिकारों को पाने का हकदार होगा और उन्हीं दायित्वों के अध्यधीन होगा जैसा कि इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन आफिसर या भर्ती किया गया व्यक्ति होता है ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनार्थ सरकार के अधीन या लोक उपयोगी सेवा" पद में निम्नलिखित सम्मिलित नहीं होंगे-

(क) कोई स्त्री;

(ख) नियमित सेना, नौसेना या वायुसेना का सदस्य या रिजर्व बल का सदस्य;

(ग) वह व्यक्ति, जो भारत का नागरिक नहीं है;

(घ) ऐसा व्यक्ति, जो भारत के बाहर किसी देश या स्थान में सरकार के अधीन नियोजित है, जब तक कि वह इस प्रकार नियोजित रहता है; और

(ङ) ऐसे अन्य व्यक्ति, जिन्हें राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रवर्तन से इस आधार पर छूट दी जाए कि, ऐसे व्यक्तियों द्वारा की गई सेवा की प्रकृति या उस सेवा की, जिसमें उन्हें नियोजित किया गया है, अभ्यावश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, लोकहित में केन्द्रीय सरकार की राय में यह समीचीन है कि इस अधिनियम के अधीन सेवा करने के लिए उन्हें दायी नहीं होना चाहिए ।]

7. सैनिक सेवा के लिए दायित्व-(1) भारत की सीमाओं के बाहर किसी भी आफिसर या भर्ती किए गए व्यक्ति से सैनिक सेवा करने की अपेक्षा, केन्द्रीय सरकार के साधारण या विशेष आदेश के अधीन ही की जा सकेगी अन्यथा नहीं ।

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक आफिसर या भर्ती किया गया व्यक्ति, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, प्रादेशिक सेना की ऐसी किसी यूनिट में सेवा करने के लिए आबद्ध होगा जिससे वह तत्समय संबद्ध है, और उन सभी नियमों के अध्यधीन होगा जो ऐसी यूनिट के सम्बन्ध में इस अधिनियम के अधीन बनाए गए हों ।

(3) प्रत्येक आफिसर या भर्ती किया गया व्यक्ति सैनिक सेवा करने के लिए उस दशा में दायी होगा,-

(क) जब किसी सिविल प्रशासन की सहायतार्थ कार्य करने या आवश्यक गारद की व्यवस्था करने के लिए उसे विहित रीति से बुलाया गया हो;

(ख) जब प्रशिक्षण के लिए या नियमित बलों की सहायतार्थ या उसकी अनुपूर्ति के लिए उसे विहित रीति से सम्मिलित किया गया हो; और

                (ग) जब वह या तो अपने अनुरोध पर या विहित शर्तों के अधीन किन्हीं नियमित बलों से सम्बद्ध किया गया हो ।

 [7. उन व्यक्तियों का सिविल नियोजन में पुनःस्थापन जिनसे सैनिक सेवा की अपेक्षा की गई है-(1) प्रत्येक नियोजक का, जिसके द्वारा ऐसा व्यक्ति नियोजित किया गया था जिससे धारा 7 के अधीन सैनिक सेवा करने की अपेक्षा की गई है, यह कर्तव्य होगा कि वह उसे, सैनिक सेवा की समाप्ति पर, अपने नियोजन में किसी ऐसी उपजीविका में और ऐसी शर्तों पर पुनःस्थापित करे जो उन शर्तों से कम अनुकूल न हों जो उसे उस दशा में लागू होतीं जब उसके नियोजन में इस प्रकार बाधा न पड़ी होतीः

परन्तु यदि नियोजक ऐसे व्यक्ति को पुनःस्थापित करने से इन्कार करता है या ऐसे व्यक्ति को पुनःस्थापित करने के अपने दायित्व से इन्कार करता है, या निजोजक किसी कारणवश यह अभ्यावेदन करता है कि ऐसे व्यक्ति का पुनःस्थापन असाध्य है तो कोई भी पक्षकार मामले को विहित प्राधिकारी को निर्दिष्ट कर सकेगा और वह प्राधिकारी उन सभी बातों पर विचार करने के पश्चात् जो उसके समक्ष रखी जाएं और मामले में ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात् जैसी विहित की जाए, आदेश देकर-

(क) नियोजक को इस धारा के उपबन्धों से छूट दे सकेगा, अथवा

(ख) उससे यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस व्यक्ति को ऐसे निबन्धनों पर पुनःनियोजित करे जैसे वह उचित समझे, अथवा

(ग) उससे यह अपेक्षा कर सकेगा कि चूंकि वह उस व्यक्ति को पुनःनियोजित करने में असफल या असमर्थ रहा है अतः वह उसे प्रतिकर के रूप में, उस दर से, जिस पर नियोजक द्वारा उसे अन्तिम पारिश्रमिक संदेय था, छह मास के पारिश्रमिक की रकम से अनधिक रकम दे ।

(2) यदि कोई नियोजक उपधारा (1) के परन्तुक में निर्दिष्ट किसी प्राधिकारी के आदेश का पालन करने में असफल रहेगा तो वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और वह न्यायालय, जिसके द्वारा इस धारा के अधीन कोई नियोजक सिद्धदोष ठहराया जाता है, उसे यह आदेश देगा (यदि उक्त प्राधिकारी ने पहले से ही उससे वैसी अपेक्षा नहीं की है तो) कि वह उस व्यक्ति को, जिसे पुनः नियोजित करने में वह असफल रहा है, उस दर से, जिस पर नियोजक द्वारा उसे अन्तिम पारिश्रमिक संदेय था, छह मास के पारिश्रमिक की रकम दे, और ऐसी रकम, जिसके दिए जाने की अपेक्षा उक्त प्राधिकारी ने या न्यायालय ने की है, इस प्रकार वसूल की जाएगी मानो वह उस न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो ।

(3) इस धारा के अधीन की किसी कार्यवाही में नियोजक को अपने प्रतिवाद में यह साबित करना होगा कि पहले नियोजित व्यक्ति ने पुनःस्थापित होने के लिए नियोजक को आवेदन अपनी सैनिक सेवा की समाप्ति से दो मास की अवधि के भीतर नहीं किया था ।

(4) उपधारा (1) द्वारा नियोजक पर अपने नियोजन में किसी व्यक्ति को जिसका वर्णन उस उपधारा में किया गया है, पुनःस्थापित करने के सम्बन्ध में अधिपोपित कर्तव्य उस नियोजक का भी होगा जो उस व्यक्ति के नियोजक को धारा 7 के अधीन सैनिक सेवा करने की उससे वस्तुतः अपेक्षा की जाने से पूर्व ऐसी परिस्थितियों में समाप्त कर देता है जिनसे यह आशय प्रकट होता हो कि वह उस उपधारा द्वारा अधिरोपित कर्तव्य से बच रहा है; और यदि नियोजन की समाप्ति उन आदेशों को जारी करने के पश्चात् होती है जिनमें उससे इस अधिनियम के अधीन सैनिक सेवा करने की अपेक्षा की गई है तो, जब तक उसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, उक्त आशय की उपधारणा की जाएगी ।]

1[7. ऐसे व्यक्तियों के, जिनसे सैनिक सेवा करने की अपेक्षा की गई है, कुछ अधिकारों का परिरक्षण-जब धारा 7 के अधीन सैनिक सेवा करने के लिए अपेक्षित किसी व्यक्ति को किसी भविष्य निधि या अधिवार्षिकी निधि या उस नियोजन के सम्बध्न में, जिसका वह त्याग करता है, कर्मचारियों की प्रसुविधा के लिए बनाई गई अन्य स्कीम के अधीन कोई अधिकार प्राप्त हो तब, जब तक वह सैनिक सेवा में रहता है तब तक, और यदि उसे पुनःस्थापित कर दिया जाता है तो इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन ऐसे पुनःस्थापन तक, उस निधि या स्कीम की बाबत उसके वे अधिकार बने रहेंगे जो विहित किए जाएं ।]

8. उन्मोचन-इस अधिनियम के अधीन भर्ती किया गया प्रत्येक व्यक्ति उस अवधि की समाप्ति पर, जिसके लिए उसे भर्ती किया गया था, प्रादेशिक सेना से अपना उन्मोचन प्राप्त करने का हकदार होगा और ऐसा कोई व्यक्ति, उस अवधि की समाप्ति से पूर्व, ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, उक्त सेना से उन्मोचित किया जा सकेगाः

परन्तु भर्ती किया गया कोई भी व्यक्ति, जो तत्समय इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन सैनिक सेवा में है, ऐसी सेवा की समाप्ति के पूर्व उन्मोचन पाने का हकदार नहीं होगा ।

9. सेना अधिनियम, 1950 का लागू होना-(1) प्रत्येक आफिसर जब वह आफिसर के रूप में कार्य कर रहा हो, और भर्ती किया गया प्रत्येक व्यक्ति, जब उसे  [नियमित सेना] के लिए बुलाया गया हो या उसमें सम्मिलित किया गया हो या उससे सम्बद्ध किया गया हो, उन अनुकूलनों और उपान्तरों के अधीन रहते हुए, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,  [सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46)] में करे, सेना अधिनियम, 1950 और उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन उसी रीति से और उसी सीमा तक होगा मानो ऐसे आफिसर या भर्ती किए गए व्यक्ति का  [नियमित सेना] में वही रैंक था जो उसका प्रादेशिक सेना में उस समय था ।

(2) जब 2[सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46)] के अधीन दण्डनीय कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा उस समय किया जाता है जब वह उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन उस अधिनियम के अध्यधीन है तब ऐसे व्यक्ति को पूर्वोक्त प्रकार के अपराध के लिए उसी रीति से सैनिक अभिरक्षा में लिया और रखा जा सकेगा, उसका विचारण किया जा सकेगा और उसे दण्डित किया जा सकेगा जिस रीति से उसे उस दशा में सैनिक अभिरक्षा में लिया और रखा गया होता, उसका विचारण किया गया होता और उसे दण्डित किया गया होता जब कि वह इस प्रकार अध्यधीन बना रहता ।

10. संक्षिप्त विचारण और दण्ड-भर्ती किया गया कोई व्यक्ति, 2[सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46)] के अधीन किसी अपराध के लिए या इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी उपबन्ध का, या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों का, उल्लंघन करने के लिए 2[सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46)] के अधीन दण्ड या दण्डों का भागी होने के अतिरिक्त या उनके बदले या तो दण्ड न्यायालय द्वारा, या विहित प्राधिकारी के संक्षेपतः आदेश द्वारा जुर्माने से, जो एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और जुर्माना ऐसी रीति से और ऐसे प्राधिकारी द्वारा वसूल किया जाएगा जो विहित किया जाएः

परन्तु किसी ऐसे मामले में, जिसमें अभियुक्त यह दावा करता है कि उसका विचारण दण्ड न्यायालय करे, विहित प्राधिकारी के आदेश द्वारा संक्षेपतः कोई जुर्माना अधिरोपित नहीं किया जाएगा ।

 [10. सम्यक् रूप से भरे गए प्ररूप आदि दाखिल करने में असफल रहने के लिए दण्ड-यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त कारण के बिना-

(क) धारा 6क की उपधारा (4) या उपधारा (5) के अधीन किसी अध्यपेक्षा का पालन करने में असफल रहेगा, या

(ख) विहित प्राधिकारी द्वारा उस धारा की उपधारा (2) के अधीन ऐसा करने की अपेक्षा की जाने पर सेवा के लिए प्रस्तुत होने में असफल रहेगा, या

(ग) विहित प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उसे ऐसा करने के लिए बुलाए जाने पर चिकित्सीय या अन्य परीक्षा के लिए उपस्थित होने में असफल रहेगा,

तो वह कारावास से, जो तीन मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो दो सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डनीय होगा ।]

                11. अपराधों के विचारण के बारे में अधिकारिता-प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

                12. कुछ दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-जहां भर्ती किए गए किसी व्यक्ति से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम द्वारा या उसके अनुसरण में यह अपेक्षा की गई है कि वह किसी स्थान पर हाजिर हो, वहां ऐसा प्रमाणपत्र, जिस पर विहित आफिसर का यह कथन करते हुए हस्ताक्षर करना तात्पर्यित है कि जिस व्यक्ति से हाजिर होने की इस प्रकार अपेक्षा की गई थी वह उस अपेक्षा के अनुसार वैसा करने में असफल रहा है, ऐसे आफिसर के हस्ताक्षर या नियुक्ति के बारे में किसी सबूत के बिना, उसमें कही गई बातों के बारे में साक्ष्य होगा ।

                13. इस अधिनियम के अध्यधीन व्यक्तियों को कुछ प्रयोजनों के लिए नियमित बलों का भाग समझा जाना-दण्ड प्रकिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 128, धारा 130 और धारा 131 के प्रयोजनों के लिए सभी आफिसरों, अनायुक्त आफिसरों और भर्ती किए गए अन्य व्यक्तियों को, जो किसी यूनिट से सम्बद्ध किए गए हैं, 3[नियमित सेना] के क्रमशः आफिसर, अनायुक्त आफिसर और सैनिक समझा जाएगा ।

                14. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

                (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम, -

 [(क) धारा 6क की उपधारा (4) के अधीन प्ररूप, ऐसी विशिष्टियां, जो उसमें दी जानी चाहिएं और वह प्राधिकारी, जिसके समक्ष प्ररूप दाखिल किया जाना चाहिए और वह अवधि जिसके अन्दर प्ररूप दाखिल किया जाना चाहिए, विहित कर सकेंगे;

(कक) यह अवधारणा करने की दृष्टि से कि प्रादेशिक सेना में अनिवार्य सेवा के लिए दायी व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित शर्तें पूरी करते हैं उनसे अपनी चिकित्सीय या अन्यथा परीक्षा करवाने की प्रक्रिया विहित कर सकेंगे;]

 [(ककक)] वह रीति जिससे और वह अवधि जिसके लिए और वे शर्तें जिनके अध्यधीन किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन भर्ती किया जाए 2[या उससे प्रादेशिक सेना में अनिवार्य सेवा करने की अपेक्षा की जाए, विहित कर सकेंगे];

(ख) वह रीति, जिससे और वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए आफिसरों और भर्ती किए गए व्यक्तियों को सेवा के लिए बुलाया जा सकेगा, या प्रशिक्षण के लिए या [नियमित सेना] की सहायतार्थ या उसकी अनुपूर्ति करने के लिए सम्मिलित किया जा सकेगा या [नियमित सेना] से सम्बद्ध किया जा सकेगा, विहित कर सकेंगे;

(ग) भर्ती किए गए किसी व्यक्ति के लिए अनिवार्य एवं स्वेच्छया प्रारंभिक और नियतकालिक सैनिक प्रशिक्षण विहित कर सकेंगे और उस प्रयोजन के लिए किसी यूनिट को सम्मिलित करने का उपबन्ध कर सकेंगे;

(घ) भर्ती किए गए किसी व्यक्ति को प्रशिक्षण लेने से जिस रीति से तथा जिन शर्तों के अधीन मुक्त किया जा सकता है, उस रीति और उन शर्तों को परिनिश्चित कर सकेंगे;

 [(घघ) धारा 7क की उपधारा (1) के परन्तुक के प्रयोजन के लिए प्राधिकारी, और वह रीति, जिससे उसके द्वारा कोई जांच की जा सकेगी, विनिर्दिष्ट कर सकेंगे;

(घघघ) धारा 7ख के अधीन अधिकारों को परिनिश्चित कर सकेंगे;]

(ङ) उन प्राधिकारियों को, जिनके द्वारा, और वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए, भर्ती किए गए व्यक्तियों को धारा 8 के अधीन उन्मोचित किया जा सकेगा, विहित कर सकेंगे;

(च) उन प्राधिकारियों को विहित कर सकेंगे जिनके द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपराधों के लिए दण्ड दिया जा सकेगा और अधिरोपित जुर्माना वसूल किया जा सकेगा; 

(छ) उन आफिसरों को विहित कर सकेंगे जो धारा 12 के अधीन प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर कर सकेंगे;

(ज) साधारणतया किसी अन्य ऐसे विषय के लिए उपबन्ध कर सकेंगे जिसे इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

 [(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

15. [1920 के अधिनियम सं० 48 का निरसन ]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1950 (1950 का 35) की धारा 2 द्वारा निरसित ।

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