जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956
(1956 का अधिनियम संख्यांक 31)
[18 जून, 1956]
भारत में जीवन बीमा कारबार को, इस प्रयोजन के लिए स्थापित निगम को
अंतरित करके ऐसे कारबार का राष्ट्रीयकरण करने के लिए और निगम
के कारबार के विनियमन और नियंत्रण के लिए तथा इससे संबंधित
या उससे आनुषंगिक मामलों के लिए उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 होगा ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-
(1) “नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है जिसको धारा 3 के अधीन निगम की स्थापना की गई है ;
(2) “विविध बीमाकर्ता" से ऐसा बीमाकर्ता अभिप्रेत है जो नियंत्रित कारबार के साथ ही किसी अन्य प्रकार का बीमा कारबार चला रहा है ;
(3) “नियंत्रित कारबार" से-
(i) ऐसे किसी बीमाकर्ता की दशा में, जो बीमा अधिनियम की धारा 2 खण्ड (9) के उपखण्ड (क) (ii) या उपखण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट है तथा जीवन बीमा कारबार चलाता है-
(क) जहां कि वह किसी अन्य प्रकार का बीमा कारबार नहीं चलाता है, वहां उसका सब कारबार,
(ख) जहां कि वह किसी अन्य प्रकार का बीमा कारबार भी चलाता है, वहां वह सब कारबार, जो उसके जीवन बीमा कारबार से अनुलग्न है,
(ग) जहां कि बीमा अधिनियम के अधीन साधारण बीमा कारबार के सम्बन्ध में किए गए उसके रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र 1956 की जनवरी के 19वें दिन को छह मास से अधिक की कालावधि तक पूर्णतः रद्द रहा है, वहां उस का सब कारबार ;
(ii) ऐसे किसी अन्य बीमाकर्ता की दशा में, जो बीमा अधिनियम की धारा 2 के खण्ड (9) में विनिर्दिष्ट है, तथा जीवन बीमा कारबार चला रहा है,-
(क) जहां कि वह भारत में किसी अन्य प्रकार का बीमा कारबार नहीं चलाता है, वहां भारत में उसका सब कारबार,
(ख) जहां कि वह भारत में किसी अन्य प्रकार का बीमा कारबार भी चलाता है, वहां भारत में वह सब कारबार, जो उसके जीवन बीमा कारबार से अनुलग्न है,
(ग) जहां कि बीमा अधिनियम के अधीन भारत में साधारण बीमा कारबार के सम्बन्ध में किए गए उसके रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र 1956 की जनवरी के 19वें दिन को छह मास से अधिक की कालावधि तक पूर्णतः रद्द रहा है, वहां भारत में उसका सब कारबार,
अभिप्रेत है ।
स्पष्टीकरण-किसी बीमाकर्ता की बाबत यह बात है कि वह जीवन बीमा कारबार से भिन्न किसी अन्य प्रकार के बीमा कारबार को नहीं चलाता है, उस दशा में कही जाती है जिसमें कि वह जीवन बीमा कारबार के अतिरिक्त केवल पूंजी-मोचन कारबार या निश्चित वार्षिकी कारबार या दोनों चलाता है, और “उसके जीवन बीमा कारबार से अनुलग्न कारबार" पद का अर्थ उपखण्ड (i) और (ii) में तद्नुसार ही लगाया जाएगा,
(iii) बीमा अधिनियम की धारा 65 में यथापरिभाषित क्षेमदा सोसाइटी की दशा में, उसका सब कारबार,
(iv) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की दशा में, धारा 44 के विनिर्दिष्ट अपवादों के अधीन रहते हुए उसके द्वारा चलाया गया सब जीवन बीमा कारबार,
अभिप्रेत है ।
(4) “निगम" से धारा 3 के अधीन स्थापित भारत का जीवन बीमा निगम अभिप्रेत है ;
(5) “बीमा अधिनियम" से बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) अभिप्रेत है ;
(6) “बीमाकर्ता" से बीमा अधिनियम में यथापरिभाषित ऐसा बीमाकर्ता अभिप्रेत है जो भारत में जीवन बीमा कारबार चलाता है और इसके अन्तर्गत बीमा अधिनियम की धारा 65 में यथापरिभाषित सरकार तथा क्षेमदा सोसाइटी आती है ;
(7) “सदस्य" से निगम का सदस्य अभिप्रेत है ;
(8) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(9) “अधिकरण" से धारा 17 के अधीन गठित तथा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन किसी मामले के संबंध में अधिकारिता रखने वाला अधिकरण अभिप्रेत है् ;
(10) ऐसे अन्य शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं, किंतु परिभाषित नहीं हैं और बीमा अधिनियम में परिभाषित हैं, वे ही अर्थ होंगे जो अधिनियम में क्रमशः उनके हैं ।
अध्याय 2
भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थापना
3. भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थापना और निगमन-(1) ऐसी तारीख से जैसी केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, भारतीय जीवन बीमा निगम नामक निगम की स्थापना की जाएगी ।
(2) निगम इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए सम्पत्ति को अर्जित करने, धारण करने और इसके व्ययन की शक्ति रखने वाला निगमित निकाय होगा तथा उसका शाश्वत उत्तराधिकार होगा और एक सामान्य मुद्रा होगी, और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जा सकेगा ।
4. निगम का गठन-(1) निगम [सोलहट से अनधिक व्यक्तियों की ऐसी संख्या से मिलकर बनेगा जैसी केन्द्रीय सरकार उसके लिए नियुक्त करना उचित समझे और उनमें से एक व्यक्ति की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा उसका अध्यक्ष होने के लिए की जाएगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार किसी व्यक्ति को सदस्य के रूप में नियुक्त करने से पहले अपना समाधान इस बात की बाबत करेगी कि उस व्यक्ति का ऐसा कोई वित्तीय या अन्य हित नहीं होगा जिससे संभाव्यता है कि सदस्य के रूप में अपने कृत्यों के उस द्वारा प्रयोग अथवा पालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े तथा केन्द्रीय सरकार समय-समय पर प्रत्येक सदस्य के बारे में भी अपना समाधान करेगी कि उसका ऐसा कोई हित नहीं है, तथा जो कोई व्यक्ति सदस्य है या जिसे नियुक्त करने की केन्द्रीय सरकार की प्रस्थापना है और जिसने सदस्य होने के लिए सम्मति दे दी है, जब कभी उससे ऐसा करने की अपेक्षा केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाए, वह ऐसी जानकारी देगा जैसी केन्द्रीय सरकार इस उपधारा के अधीन अपने कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझती है ।
(3) जो कोई सदस्य निगम द्वारा की गई या की जाने के लिए प्रस्थापित संविदा में किसी भी रूप में प्रत्यक्षतः अथवा अप्रत्यक्षतः हितबद्ध है, वह अपने हित का स्वरूप सुसंगत परिस्थितियों का ज्ञान अपने को होने के पश्चात् यथा संभवशीघ्र निगम पर प्रकट कर देगा तथा उस संविदा के सम्बन्ध में कोई विचार विमर्श या चर्चा निगम में हो उसमें वह सदस्य कोई भाग नहीं लेगा ।
5. निगम की पूंजी-(1) निगम की मूल पूंजी संसद् द्वारा सम्यक् विधि द्वारा इस प्रयोजन के लिए विनियोजित किए जाने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए पांच करोड़ रुपए की होगी तथा ऐसी पूंजी के दिए जाने से सम्बन्धित निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जैसी केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित की जाएं ।
(2) केन्द्रीय सरकार निगम की पूंजी को निगम की सफारिशों पर उस सीमा तक ऐसी रीति से घटा सकेगी जैसी केन्द्रीय सरकार अवधारित करे ।
अध्याय 3
निगम के कृत्य
6. निगम के कृत्य-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, चाहे भारत में अथवा उसके बाहर जीवन बीमा कारबार चलाना निगम का साधारण कर्तव्य होगा तथा निगम इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग इस प्रकार करेगा जिससे यह सुनिश्चित हो जाए कि जीवन बीमा कारबार समुदाय को अधिकतम प्रलाभ प्रदान करने वाले रूप में विकसित हो ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, निगम को यह शक्ति प्राप्त होगी कि :-
(क) वह पूंजी-मोचन कारबार, निश्चित-वार्षिकी कारबार या जहां तक कि पुनर्बीमा कारबार जीवन बीमा कारबार से अनुलग्न है, वहां तक ऐसा पुनर्बीमा कारबार चलाए,
(ख) केन्द्रीय सरकार ने यदि इस निमित्त कोई नियम बनाए हों तो उनके अधीन रहते हुए निगम की निधियों को ऐसी रीति से जैसी निगम ठीक समझे, वह विनिहित करे तथा विनिधान के लिए जो कोई संपत्ति प्रतिभूति के रूप में पुरोधृत की गई है जब तक कि उसके व्ययन के लिए उचित अवसर न आए तब तक के लिए उसे अपने हाथ में ले लेने और उसका प्रशासन करने के सहित ऐसी पूरी कार्यवाही करे जैसी किसी विनिधान की संरक्षा अथवा आपन के लिए आवश्यक अथवा समीचीन हो,
(ग) वह अपने कारबार के प्रयोजन के लिए किसी संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करे,
(घ) यदि भारत के बाहर चलाए जाने वाला संपूर्ण जीवन बीमा कारबार अथवा उसका कोई भाग किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को अन्तरित करना निगम के हितों की दृष्टि से समीचीन है, तो उसे ऐसे अंतरित करे,
(ङ) वह किसी जंगम अथवा स्थावर संपत्ति की प्रतिभूति पर अथवा अन्यथा धन अग्रिम तौर पर या उधार दे,
(च) वह ऐसी रीति में तथा ऐसी प्रतिभूति पर, जिसे निगम ठीक समझे, कोई धन उधार ले अथवा इकट्ठा करे,
(छ) वह स्वतः अथवा किसी समनुषंगी द्वारा कोई अन्य कारबार ऐसी अवस्था में चलाए जिसमें कि ऐसा अन्य कारबार किसी बीमाकर्ता के ऐसे समनुषंगी द्वारा चलाया जा रहा था जिसका नियंत्रित कारबार इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित किया गया है,
(ज) वह कोई अन्य ऐसा कारबार चलाए जिसकी बाबत निगम को यह प्रतीत होता है कि अपने कारबार के संसंग में वह सुविधापूर्वक चलाए जाने योग्य है तथा निगम के कारबार को प्रत्यक्षतः अथवा अप्रत्यक्षतः लाभप्रद बनाने के लिए प्रकल्पित है,
(झ) वह ऐसे सब कार्य करे जो निगम की शक्तियों में से किसी अथवा किन्हीं के उचित प्रयोग के आनुषंगिक अथवा साधक हैं ।
(3) निगम अपने कृत्यों में से किसी या किन्हीं के निर्वहन में यावत्शक्य कारबारी सिद्धांतों के अनुसार कार्य करेगा ।
[6क. शर्तें आदि अधिरोपित करने की शक्ति-(1) किसी समुत्थान से धारा 6 के अधीन ठहराव करने में निगम ऐसी शर्तें अधिरोपित कर सकेगा, जिन्हें वह निगम के हितों के संरक्षण के लिए इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि उसके द्वारा प्रदत्त आवास का, समुत्थान सर्वोत्तम रूप से प्रयोग कर रहा है, आवश्यक या समीचीन समझे ।
(2) जहां निगम द्वारा किसी समुत्थान के साथ धारा 6 के अधीन कोई ठहराव किया गया है जिसमें ऐसे समुत्थान के एक या अधिक निदेशकों की निगम द्वारा नियुक्ति के लिए उपबन्ध है वहां ऐसा उपबन्ध और उसके अनुसरण में की गई निदेशकों की कोई नियुक्ति, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेद या समुथान से संबंधित किसी अन्य लिखत में प्रतिकूल बात के होते हुए भी, विधिमान्य और प्रभावी होगी और निदेशकों की शेयर अर्हता, आयु-सीमा, निदेशक-पदों की संख्या, निदेशक के पद से हटाए जाने से सम्बन्धित कोई उपबन्ध और इसी प्रकार की शर्तें जो यथापूर्वोक्त किसी विधि या लिखत में अन्तर्विष्ट हों, यथपूर्वोक्त ठहराव के अनुसरण में निगम द्वारा नियुक्त किसी निदेशक को लागू नहीं होंगी ।
(3) यथापूर्वोक्त नियुक्त कोई निदेशक-
(क) निगम के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा और निगम द्वारा लिखित आदेश द्वारा हटाया जा सकेगा या उसके स्थान पर कोई व्यक्ति रखा जा सकेगा ;
(ख) केवल निदेशक होने के कारण या किसी ऐसी बात के लिए जिसे निदेशक के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक किया गया है या करने का लोप किया गया है, या उससे संबंधित किसी बात के लिए किसी बाध्यता या दायित्व के अधीन नहीं होगा ;
(ग) चक्रानुक्रम से निवृत्त नहीं किया जा सकेगा और ऐसे निवृत्त किए जा सकने वाले निदेशकों की संख्या की संगणना करने में उसकी गिनती नहीं ही जाएगी ।]
अध्याय 4
वर्तमान जीवन बीमा कारबार का निगम को अंतरण
7. नियंत्रित कारबार चलाने वाले वर्तमान बीमाकर्ताओं की आस्तियों तथा दायित्वों का अन्तरण-(1) सब बीमाकर्ताओं के नियंत्रित कारबार से अनुलग्न सब आस्तियां और दायित्व नियत दिवस को निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित हो जाएंगे ।
(2) बीमाकर्ताओं के नियंत्रित कारबार से अनुलग्न आस्तियों की बाबत यह समझा जाएगा कि विशिष्टतया नकदी अतिशेषों, आरक्षित निधियों, विनिधानों, निक्षेपों और ऐसी संपत्ति में, जो बीमाकर्ता के कब्जे में है, या उससे उद्भूत अन्य सब हितों और अधिकारों और बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार से संबद्ध सब लेखा पुस्तकों या दस्तावेजों सहित वे सब अधिकार और शक्तियां और सब संपत्ति, चाहे वह जंगम हो या स्थावर, जो उसके नियंत्रित कारबार से अनुलग्न है, उनके अन्तर्गत हैं, और दायित्वों की बाबत यह समझा जाएगा कि उस समय, वर्तमान और बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार से अनुलग्न सब ऋण, दायित्व और बाध्याताएं, चाहे वे कैसी ही क्यों न हों, उसके अन्तर्गत हैं ।
स्पष्टीकरण-“बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार से अनुलग्न आस्तियां" पदावली-
(क) के अन्तर्गत विविध बीमाकर्ता के संबंध में बीमाकर्ता की समादत्त पूंजी का वह भाग या ऐसे भाग के तुल्य आस्तियां हैं जो बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार को आबंटन में तन्निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार दिया गया है या दी गई हैं,
(ख) से किसी सरकार के संबंध में वह रकम अभिप्रेत है जो नियत दिवस को उस कारबार के जमा खाते में पड़ी है ।
(3) जहां ऐसी आस्तियां बीमा अधिनियम की धारा 27 की उपधारा (6) में निर्दिष्ट किसी न्यास के अथवा बीमा पालिसीधारियों के फायदे के लिए किसी अन्य न्यास के अधीन हैं, वहां यह समझा जाएगा कि आस्तियां निगम में ऐसे किसी न्यास से मुक्त होकर निहित हुई हैं ।
8. भविष्य निधि, अधिवार्षिकी तथा अन्य समान निधियां-(1) जहां कि उस बीमाकर्ता ने, जिसका नियंत्रित कारबार धारा 7 के अधीन किसी निगम को अन्तरित और उसमें निहित किया जाना है, अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए कोई भविष्य निधि या अधिवार्षिकी निधि अथवा कोई अन्य समान निधि संस्थापित की है तथा उसके लिए न्यास (जिसे एतत्पश्चात् इस धारा में विद्यमान न्यास के रूप में निर्दिष्ट किया गया है) स्थापित किया है, वहां किसी ऐसी निधि में नियत दिन को जमा धन, ऐसी निधि की किन्हीं अन्य आस्तियों सहित, उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, नियत दिन को ऐसे किसी न्यास से मुक्त होकर निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित हो जाएगा ।
(2) जहां कि ऐसे किसी बीमाकर्ता के सब कर्मचारी धारा 11 के अधीन निगम के कर्मचारी नहीं बनते हैं, वहां किसी ऐसी निधि के जो उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं धन और अन्य आस्तियां निधि के न्यासधारियों तथा निगम के बीच विहित रीति से प्रभाजित की जाएंगी, तथा ऐसे प्रभाजन के बारे में किसी विवाद की अवस्था में उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(3) निगम नियत दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र उन धनों तथा अन्य आस्तिओं के लिए, जो इस धारा के अधीन उसको अन्तरित तथा उसमें निहित की गई है, वर्तमान न्यासों के उद्देश्यों के इतने समरूप उद्देश्य वाले एक या अधिक न्यास संघटित करेगा, जैसा परिस्थितियों में साध्य हो ।
(4) जहां कि वर्तमान न्यास के सब धन और अन्य आस्तियां इस धारा के अधीन निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित की जाती हैं वहां ऐसे न्यास के न्यासधारी वहां तक के सिवाय, जहां तक नियत दिन के पूर्व किए गए अथवा किए जाने से छोड़े गए कार्यों का संबंध है, नियत दिन से न्यास से उन्मोचित हो जाएंगे ।
9. नियंत्रित कारबार के निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) जब तक कि इस अधिनियम के द्वारा या अधीन अन्यथा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित न हो, सब संविदाएं, करार तथा अन्य लिखत, चाहे वह कैसी या कैसे ही क्यों न हों, जो नियत दिन के अव्यवहित पूर्व विद्यमान अथवा प्रभावी है और जिनमें वह बीमाकर्ता, जिनका नियंत्रित कारबार निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित किया गया है, पक्षकार है अथवा जो ऐसे बीमाकर्ता के पक्ष में है, वहां तक, जहां तक उनका बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार से संबंध है, यथास्थिति, निगम के विरुद्ध अथवा उसके पक्ष में वैसे ही पूर्णतः बलशाली और प्रभावशाली होंगे तथा उनका वैसे ही पूर्णतः और प्रभावी रूप से अनुपालन कराया जा सकेगा या तद्नुकूल कार्य किया जा सकेगा मानो बीमाकर्ता के स्थान में, निगम उसका पक्षकार रहा हो या मानो वे निगम के पक्ष में किए गए या पुरोधृत किए गए हों ।
(2) यदि नियत दिन को किसी बीमाकर्ता द्वारा या उसके विरुद्ध कोई वाद, अपील अथवा अन्य विधिक कार्यवाही, चाहे उसका स्वरूप कैसा ही क्यों न हो, लंबित है, तो बीमाकर्ता का कारबार निगम को अन्तरित हो जाने या इस अधिनियम के अधीन की गई किसी बात के कारण से वहां तक, जहां तक वह उसके नियंत्रित कारबार से सम्बद्ध है, उसका उपशमन या विराम नहीं होगा या उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु वाद, अपील या अन्य कार्यवाही निगम के द्वारा या खिलाफ चालू रखी जा सकेगी तथा प्रवर्तित कराई जा सकेगी ।
10. विविध बीमाकर्ताओं विषयक उपबंध-(1) शंकाएं दूर करने के लिए एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि ऐसी किसी अवस्था में, जिसमें कि कोई बीमाकर्ता, जिसका नियंत्रित कारबार इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित या उसमें निहित किया गया है, विविध बीमाकर्ता है, तो पूर्ववर्ती धाराओं के उपबंध किसी संपत्ति को जहां तक वह संपत्ति उसके नियंत्रित कारबार से अनुलग्न है वहां तक, तथा अर्जित अधिकारों तथा शक्तियों को, तथा उपगत ऋणों, दायित्वों तथा बाध्यताओं को, तथा बीमाकर्ता द्वारा अपने नियंत्रित कारबार के प्रयोजनों के लिए की गई संविदाओं, किए गए करारों तथा अन्य लिखतों को, तथा उन प्रयोजनों से संबद्ध विधिक कार्यवाहियों को लागू होंगे तथा उन धाराओं के उपबन्धों का अर्थ तद्नुसार किया जाएगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार इस निमित्त बनाए गए नियमों द्वारा-
(क) इस प्रश्न के अवधारण के लिए कि क्या कोई संपत्ति उसके नियंत्रित कारबार से अनुलग्न है अथवा क्या बीमाकर्ता ने अपने नियंत्रित कारबार के प्रयोजनों के लिए कोई अधिकार, शक्तियां, ऋण, दायित्व या बाध्यताएं अर्जित या उपगत की थीं या कोई संविदा, करार या अन्य लिखत की थी, या क्या कोई दस्तावेज उन प्रयोजनों से संबंधित है,
(ख) यथास्थिति, समादत्त पूंजी अथवा ऐसी समादत्त पूंजी के तुल्य आस्तियों का आबंटन बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार तथा किसी अन्य कारबार के बीच करने के लिए,
(ग) किसी बीमाकर्ता द्वारा भागतः अपने नियंत्रित कारबार के प्रयोजनों के लिए और भागतः अन्य प्रयोजनों के लिए किए गए किन्हीं करारों के बदले में पृथक् करार अपेक्षित निबन्धनों में करने और उनके पारिणामिक किन्हीं प्रभाजनों तथा क्षति-पूर्तियों के लिए,
(घ) उन पट्टों के पृथक्करण के लिए, जो ऐसी सम्पत्ति के हैं जिसका एक भाग निगम को इस अधिनियम के आधार पर अन्तरित और उसमें निहित हुआ है, और ऐसे पृथक्करण के पारिणामिक प्रभाजनों के लिए,
(ङ) ऐसे किसी बीमाकर्ता द्वारा भागतः अपने नियंत्रित कारबार के प्रयोजनों के लिए और भागतः अन्य प्रयोजनों के लिए उपगत किन्हीं ऋणों, दायित्वों या बाध्यताओं के प्रभाजन और तत्संबंधी वित्तीय समायोजन किए जाने के लिए और ऐसे ऋणों, दायित्व या बाध्यताओं से संबद्ध बंधकों और विल्लंगमों में कोई आवश्यक फेरफार करने के लिए,
(च) किसी भविष्य अथवा अधिवार्षिकी निधि में के या किसी अन्य समरूप निधि में के, जिसे धारा 8 के उपबंध लागू नहीं हैं, धनों और अन्य आस्तियों को किसी बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार के संबंध में नियोजित व्यक्तियों तथा अन्य व्यक्तियों के मध्य प्रभाजन के लिए,
(छ) पूर्वोक्त विषयों के अनुपूरक अथवा उनके पारिणामिक किन्हीं अन्य विषयों के लिए, जिनके लिए उपबंध किया जाना आवश्यक अथवा समीचीन प्रतीत होता है,
उपबंध कर सकेगी ।
(3) इस धारा के अधीन बनाए गए सब नियम अपने बनाए जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष अन्यून तीस दिन के लिए रखे जाएंगे तथा ऐसे उपांतरों के अधीन रहेंगे जो संसद् उस सत्र के, जिसमें वे उस प्रकार रखे जाते हैं, या उसके अव्यवहित पश्चात्वर्ती सत्र के दौरान करे ।
(4) जहां कि नियत दिन से छह मास की समाप्ति के पूर्व किसी समय यह प्रश्न इस धारा के अधीन अथवा उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन उठता है कि क्या बीमाकर्ता द्वारा कोई संपत्ति अपने नियंत्रित कारबार के प्रयोजनों के लिए धारण अथवा प्रयुक्त की जाती है या की जाती थी, वहां वह प्रश्न विनिश्चय के लिए अधिकरण को निर्देशित किया जाएगा ।
11. बीमाकर्ताओं के वर्तमान कर्मचारियों की सेवा का निगम को अन्तरण-(1) ऐसे बीमाकर्ता का, जिसका नियंत्रित कारबार निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित किया गया है, ऐसा प्रत्येक पूर्णकालिक कर्मचारी, जिसे बीमाकर्ता द्वारा नियत दिन के अव्यवहित पूर्व अपने नियंत्रित कारबार के संबंध में सर्वथा अथवा मुख्यतः नियोजित किया गया था, नियत दिन को और से निगम का कर्मचारी हो जाएगा और उसमें अपना पद उसी पदावधि तक, उसी पारिश्रमिक पर तथा उन्हीं निबंधनों तथा शर्तों पर और पेंशन तथा उपदान और अन्य विषयों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ धारण करेगा जिन पर या जिन सहित यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो वह नियत दिन को धारण करता और जब तक कि और यदि निगम में उसके नियोजन का पर्यवसान नहीं हो जाता या जब तक कि उसका पारिश्रमिक, निबंधन तथा शर्तें निगम द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं की जाती हैं, तब तक वह ऐसे नियोजित बना रहेगा :
परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई बात किसी ऐसे कर्मचारी को लागू नहीं होगी जिसने निगम का कर्मचारी न बनने का अपना आशय नियत दिन के पूर्व केन्द्रीय सरकार को दी गई लिखित सूचना द्वारा प्रज्ञापित कर दिया है ।
[(2) जहां कि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि जिन बीमाकर्ताओं का नियंत्रित कारबार निगम को अन्तरित और निगम में निहित हो गया है, उनके कर्मचारियों के पारिश्रमिक के मापमान तथा उन कर्मचारियों को लागू सेवा संबंधी अन्य निबंधनों और शर्तों में एकरूपता करने के प्रयोजन से यह बात करना आवश्यक है अथवा यह कि निगम और उसके पालिसीधारियों के हितों में यह आवश्यक है कि कर्मचारियों या उनमें से किसी वर्ग को देय पारिश्रमिक में कमी अथवा उन कर्मचारियों को लागू सेवा संबंधी अन्य निबंधनों और शर्तों का पुनरीक्षण किया जाए, वहां केन्द्रीय सरकार उपधारा (1) में अथवा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में अथवा किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में अथवा किसी अधिनिर्णय, व्यवस्थापन या करार में, जो तत्समय प्रवृत्त है, अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उस पारिश्रमिक और सेवा संबधी उन अन्य निबंधनों और शर्तों में इतनी मात्रा तक और ऐसी रीति से, जैसी वह ठीक समझती है (चाहे कमी करके या अन्यथा) परिवर्तन कर सकेगी और यदि वह परिवर्तन किसी कर्मचारी को प्रतिग्राह्य नहीं है, तो निगम उसके नियोजन का पर्यवसान उसके तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर तब के सिवाय देकर कर सकेगा, जब कि उस कर्मचारी की सेवा संविदा में ऐसे पर्यवसान की लघुतर सूचना के लिए उपबंध किया हुआ है ।]
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के अधीन कर्मचारी को देय प्रतिकर किसी पेंशन, उपदान, भविष्य-निधि धन अथवा किसी अन्य फायदे के, जिसका कर्मचारी अपनी सेवा संविदा के अधीन हकदार है, अतिरिक्त होगा और उसे प्रभावित नहीं करेगा ।
(3) यदि कोई प्रश्न पैदा होता है कि क्या कोई व्यक्ति किसी बीमाकर्ता का पू्र्णकालिक कर्मचारी था अथवा क्या कोई कर्मचारी नियत दिवस के अव्यवहित पूर्व किसी बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार के संबंध में सर्वथा या मुख्यतः नियोजित था तो प्रश्न केन्द्रीय सरकार को निर्देशित किया जाएगा जिसका विनिश्चय अंतिम होगा ।
(4) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में, या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, बीमाकर्ता के किसी कर्मचारी की सेवाओं का निगम को अन्तरण किसी ऐसे कर्मचारी को उस अधिनियम या अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर के लिए हकदार नहीं बनाएगा, तथा ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
12. बीमाकर्ताओं के मुख्य अभिकर्ताओं के वर्तमान कर्मचारियों की सेवाओं का कतिपय स्थितियों में निगम को अन्तरण-ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जिन्हें केन्द्रीय सरकार एतन्निमित्त बनाए, किसी बीमाकर्ता के, जिसका नियंत्रित कारबार निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित किया गया है, किसी मुख्य अभिकर्ता का ऐसा प्रत्येक पूर्णकालिक वैतनिक कर्मचारी-
(क) जो बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार के संबंध में मुख्य अभिकर्ता द्वारा सर्वथा या मुख्यतः नियोजित किया गया था,
(ख) जिसका वेतन नियत दिन को पांच सौ रुपए प्रतिमास से अधिक नहीं था, और
(ग) जो नियत दिन के अव्यवहित पूर्व एक वर्ष से अन्यून निरंतर कालावधि से मुख्य अभिकर्ता के नियोजनाधीन था, नियत दिन को तथा उससे निगम का कर्मचारी हो जाएगा तथा धारा 11 के उपबंध यथासम्भव ऐसे कर्मचारी के संबंध में ऐसे लागू होंगे जैसे वे बीमाकर्ता के किसी पूर्णकालिक कर्मचारी के संबंध में लागू होते हैं :
परन्तु यह धारा उन दशाओं के सिवाय लागू नहीं होगी जिनमें कि बीमाकर्ता का मुख्य अभिकर्ता से बीमाकर्ता के साथ हुई संविदा के निबंधनों के अधीन यह अपेक्षित था कि वह बीमाकर्ता के पालिसीधारियों की विहित सेवाएं संपादित करे ।
स्पष्टीकरण-मुख्य अभिकर्ता के उस पूर्णकालिक संबलग्राही कर्मचारी की अवस्था में, जिसकी छटनी मुख्य अभिकर्ता द्वारा 19 जनवरी, 1956 को या उसके पश्चात्, कर दी गई थी, इस धारा के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो “नियत दिन" शब्दों के स्थान पर “19 जनवरी, 1956" शब्द और अंक रख दिए गए हों ।
13. संपत्ति तथा उससे संबद्ध दस्तावेजों का कब्जा परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) जहां कि किसी बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार से अनुलग्न कोई संपत्ति इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित की गई है, वहां-
(क) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जिसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में ऐसी कोई संपत्ति हो, संपत्ति को तुरन्त निगम को परिदत्त करेगा,
(ख) ऐसे किसी व्यक्ति का, जो नियत दिन को ऐसे नियंत्रित कारबार से संबंधित किन्हीं पुस्तकों, दस्तावेजों या अन्य कागज-पत्रों को अपने कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में रखता है, निगम के प्रति यह दायित्व होगा कि वह उक्त पुस्तकों, दस्तावेजों और कागज-पत्रों का लेखा-जोखा दे और वह उन्हें निगम को अथवा ऐसे व्यक्ति को, जैसा निगम निर्दिष्ट करे, परिदत्त करेगा ।
(2) विशिष्टतः बीमाकर्ता की जीवन बीमा कारबार से संबद्ध वे सब आस्तियां जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बीमा अधिनियम के अधीन या न्यासधारियों द्वारा न्यासाधीन धृत हैं निगम को परिदत्त की जाएंगी ।
(3) इस धारा में अन्तर्विष्ट अन्य उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना निगम के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि जो सम्पत्तियां इस अधिनियम के अधीन उसको अन्तरित तथा उसमें निहित की गई हैं उन सबका कब्जा प्राप्त करने के लिए वह सब आवश्यक कार्यवाही करे ।
14. कतिपय स्थितियों में जीवन बीमा की संविदाओं को उपांतरित करने की निगम की शक्ति-जिस बीमाकर्ता का नियंत्रित कारबार निगम को अन्तरित तथा उसमें निहित किया गया है, वैसे किसी बीमाकर्ता की नियत दिन की वित्तीय दशा को ध्यान में रख कर निगम ऐसे बीमाकर्ता द्वारा 19 जनवरी, 1956 के पूर्व की गई जीवन बीमा संविदाओं के अधीन बीमा की रकमों को ऐसी रीति से तथा ऐसी शर्तों पर, जिन्हें वह ठीक समझता है, कम कर सकेगा :
परन्तु ऐसी कोई कमी ऐसी योजना के अनुसार की जाने के अतिरिक्त नहीं की जाएगी जो निगम द्वारा एतन्निमित्त तैयार की गई है और केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है ।
15. बीमाकर्ता के कतिपय संव्यवहारों के बारे में अनुतोष चाहने का निगम का अधिकार-(1) जहां कि ऐसे बीमाकर्ता ने, जिसका नियंत्रित कारबार इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित और उसमें निहित किया गया है, 19 जनवरी, 1956 के पूर्व पांच वर्षों के अंदर किसी समय-
(क) किसी व्यक्ति को प्रतिफल के बिना कोई संदाय किया है,
(ख) बीमाकर्ता की किसी संपत्ति का प्रतिफल के बिना या अपर्याप्त प्रतिफल पर विक्रय या व्ययन किया है,
(ग) अत्यधिक प्रतिफल पर कोई संपत्ति या अधिकार अर्जित किए हैं,
(घ) कोई करार इस प्रकार किया या परिवर्तित किया है कि बीमाकर्ता द्वारा अत्यधिक प्रतिफल का संदत्त किया जाना या दिया जाना अपेक्षित है,
(ङ) इतने दुर्भारयुक्त प्रकार के किसी अन्य संव्यवहार में प्रविष्ट हुआ है जिससे बीमाकर्ता को प्रोद्भूत होने वाले किसी फायदे से अधिक उसे हानि होती है या उस पर कोई दायित्व अधिरोपित होता है,
(च) उस सूरत में, जिसमें कि वह विविध बीमाकर्ता है, किसी संपत्ति का अन्तरण अपने जीवन विभाग से अपने साधारण विभाग को प्रतिफल के बिना अथवा अपर्याप्त प्रतिफल पर किया है,
तथा वह संदाय, विक्रय, व्ययन, अर्जन, करार या परिवर्तन या अन्य संव्यवहार या अन्तरण प्रत्येक अवस्था में उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार के प्रयोजन के लिए युक्तियुक्त रूप से आवश्यक नहीं था या बीमाकर्ता की ओर से व्यवहारकुशलता की अयुक्तियुक्त कमी से किया गया था, वहां निगम ऐसे संव्यवहार के बारे में अनुतोष के लिए आवेदन अधिकरण से कर सकेगा और जब तक कि अधिकरण अन्यथा निदेश नहीं दे, संव्यवहार के सब पक्षकार आवेदन के पक्षकर बनाए जाएंगे ।
(2) अधिकरण आवेदन के पक्षकारों में से किसी के खिलाफ ऐसा आदेश दे सकेगा जैसा वह उस मात्रा को, जिस तक वे पक्षकार संव्यवहार के लिए क्रमशः उत्तरदायी थे या उन्होंने इससे फायदा प्राप्त किया था और मामले की सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायसम्मत समझता है ।
(3) जहां कि किसी संव्यवहार के बारे में कोई आवेदन अधिकरण से इस धारा के अधीन किया जाता है और आवेदन का अवधारण निगम के पक्ष में किया जाता है, वहां संव्यवहार के बारे में किन्हीं तद्विशिष्ट दावों को अवधारित करने की अनन्य अधिकारिता अधिकरण की होगी ।
16. नियंत्रित कारबार के अर्जन के लिए प्रतिकर-(1) जहां कि बीमाकर्ता का नियंत्रित कारबार इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित और उसमें निहित किया गया है, वहां निगम प्रथम अनुसूची में अन्तर्विष्ट सिद्धांतों के अनुसार प्रतिकर उस बीमाकर्ता को देगा ।
(2) पूर्वोक्त सिद्धांतों के अनुसार दिए जाने वाले प्रतिकर की रकम प्रथमतः निगम द्वारा अवधारित की जाएगी, और यदि इस प्रकार अवधारित रकम केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित कर दी गई है, तो वह बीमाकर्ता को इस अधिनियम के अधीन उसे देय प्रतिकर को पूर्णतया चुकाने के लिए आफर की जाएगी, और यदि इस प्रकार आफर की गई रकम बीमाकर्ता को प्रतिग्राह्य न हो तो वह मामले का अधिकरण को विनिश्चयार्थ निर्देशन उतने समय के अन्दर करा सकेगा जो इस प्रयोजन के लिए विहित किया जाए ।
17. अधिकरणों का संघटन-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए एक या अधिक अधिकरण संघटित कर सकेगी और प्रत्येक अधिकरण केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त तीन सदस्यों से मिलकर गठित होगा जिनमें से एक वह व्यक्ति होगा जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहा है, और वह उसका अध्यक्ष होगा ।
(2) जिस प्रश्न का विनिश्चय अधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन किया जाना है वैसे किसी प्रश्न के अवधारणा में अपनी सहायता करने के लिए ऐसे एक या अधिक व्यक्तियों को अधिकरण चुन सकेगा जिसे या जिन्हें जांच के अधीन वाले किसी मामले से संबद्ध किसी विषय का विशेष ज्ञान प्राप्त है ।
(3) प्रत्येक अधिकरण को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय निम्नलिखित बातों, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करने तथा उसे हाजिर कराने और शपथ पर उसकी परीक्षा करने के लिए,
(ख) दस्तावेजों के प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करने के लिए,
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करने के लिए,
(घ) साक्षियों की परीक्षा या दस्तावेजों की पड़ताल के लिए कमीशन निकालने के लिए,
सिविल न्यायालय की शक्तियां प्राप्त होंगी ।
(4) प्रत्येक अधिकरण को अपनी प्रक्रिया विनियमित करने तथा अपनी क्षमता के भीतर सब विषयों का विनिश्चय करने की शक्ति प्राप्त होगी, और वह अभिलेख में प्रत्यक्षतः कोई भूल होने की अवस्था में अपने विनिश्चयों में से किसी को पुनर्विलोकित कर सकेगा या उसमें किसी अंकीय या लिपिकीय भूल को शुद्ध कर सकेगा ।
अध्याय 5
प्रबंध
18. कार्यालय, शाखाएं और अभिकरण-(1) निगम का केन्द्रीय कार्यालय ऐसे स्थान पर होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।
(2) निगम निम्नलिखित स्थानों में से प्रत्येक में, अर्थात् मुम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, कानपुर तथा मद्रास में एक आंचलिक कार्यालय स्थापित करेगा, और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के अधीन रहते हुए ऐसे अन्य आंचलिक कार्यालय भी स्थापित कर सकेगा जैसे वह उचित समझता है ।
(3) प्रत्येक अंचल की सीमाएं ऐसी होंगी जैसी निगम द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं ।
(4) प्रत्येक अंचल में इतने खण्ड, कार्यालय और शाखाएं स्थापित की जा सकेंगी जितनी आंचलिक प्रबन्धक ठीक समझता है ।
19. निगम की समितियां-(1) निगम अपने मामलों तथा कारबार का साधारण अधीक्षण तथा निदेशन अपने सदस्यों में से पांच से अनधिक सदस्यों की एक कार्यपालिका समिति को दे सकेगा और कार्यपालिका समिति उन सभी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे समस्त कार्य तथा बातें कर सकेगी जो निगम द्वारा उसे प्रत्यायोजित की जाएं ।
(2) निगम अपनी निधियों के विनिधान से संबंधित विषयों में अपने को सलाह देने के प्रयोजन के लिए एक विनिधान समिति भी संगठित कर सकेगा और विनिधान समिति अनधिक [आठ सदस्यों से मिलकर गठित होगी जिनमें से अन्यून चारट निगम के सदस्य होंगे और शेष सदस्य वे व्यक्ति होंगे (चाहे वे निगम के सदस्य हों या नहीं) जिनको वित्तीय विषयों, विशेषतः निधियों के विनिधान से संबद्ध विषयों का विशेष ज्ञान और अनुभव हो ।
(3) निगम ऐसी अन्य समितियां भी, जैसी वह उचित समझे, अपने ऐसे कर्तव्यों के निर्वहन के लिए संगठित कर सकेगा जैसे उन समितियों को प्रत्यायोजित किए जाएं ।
20. प्रबंध-निदेशक-निगम एक व्यक्ति या अधिक व्यक्तियों को निगम के प्रबंध-निदेशक या निदेशकों के रूप में नियुक्त कर सकेगा और प्रत्येक प्रबंध-निदेशक निगम का पूर्णकालिक अधिकारी होगा और ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे कार्यपालिका समिति या निगम द्वारा न्यस्त या प्रत्यायोजित किए जाएं ।
21. निगम केन्द्रीय सरकार के निदेशों के अनुकूल चलेगा-इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में निगम नीति संबंधी ऐसी बातों में, जिनमें लोकहित अन्तर्ग्रस्त है, ऐसे निदेशों के अनुकूल चलेगा जो केन्द्रीय सरकार उसे लिखित रूप में दे, तथा यदि कोई प्रश्न उद्भूत होता है कि क्या कोई निदेश नीति के ऐसे मामले से, जिसमें लोक हित अन्तर्ग्रस्त है, संबंध रखता है, तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
22. आंचलिक प्रबन्धक-(1) निगम किसी आंचलिक कार्यालय के मामलों तथा कारबार का अधीक्षण तथा निदेशन आंचलिक प्रबन्धक के रूप में ज्ञात होने वाले उस व्यक्ति को दे सकेगा, जो चाहे सदस्य हो या नहीं हो, तथा आंचलिक प्रबन्धक निगम के ऐसे समस्त कृत्यों का पालन करेगा जो उसे आंचलिक कार्यालय की अधिकारिता के अन्दर के क्षेत्र के सम्बन्ध में प्रत्योयोजित किए जाएं ।
(2) निगम प्रत्येक अंचल के लिए इतने सदस्यों से मिलकर बनने वाला बोर्ड, जितने वह उसमें नियुक्त करना ठीक समझता है, ऐसे विषयों की बाबत, जो उसे निगम द्वारा बनाए गए विनियमों के अधीन निर्दिष्ट किए गए हों, आंचलिक प्रबन्धक को सलाह देने के प्रयोजनों के लिए संघटित कर सकेगा ।
(3) निगम प्रत्येक आंचलिक कार्यालय के लिए इतने व्यक्तियों से मिलकर बनने वाली, जितने वह ठीक समझता है, कर्मचारी-और-अभिकर्ता-सम्बन्ध-समिति विहित रीति से संघटित करेगा और ऐसी प्रत्येक समिति निगम और इसके कर्मचारियों और अभिकर्ताओं के प्रतिनिधियों से ऐसे गठित होगी कि समिति में कर्मचारियों और अभिकर्ताओं के प्रतिनिधियों की संख्या निगम के प्रतिनिधियों की संख्या से कम नहीं होगी और समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह आंचलिक प्रबन्धक को उन विषयों पर सलाह दे जो निगम के कर्मचारियों तथा अभिकर्ताओं के कल्याण से सम्बन्ध रखते हैं या जिनसे यह सम्भाव्य है कि उनमें और निगम में मैत्री और अच्छे सम्बन्ध बढ़ें और सुनिश्चित हों ।
23. निगम का कर्मचारिवृन्द-(1) निगम इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के लिए अपने को समर्थ करने के प्रयोजन के लिए इतने व्यक्तियों को नियोजित कर सकेगा जितने वह ठीक समझता है ।
(2) जो व्यक्ति निगम द्वारा नियोजित किया गया है अथवा जिसकी सेवाएं इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित की गई हैं, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व होगा कि वह भारत में कहीं भी सेवा करे ।
अध्याय 6
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
24. निगम की निधियां-निगम की अपनी एक निधि होगी और निगम की सब प्राप्तियां उसमें जमा की जाएंगी और निगम की समस्त अदायगियां उसमें से की जाएंगी ।
25. संपरीक्षा-(1) निगम के लेखाओं की संपरीक्षा ऐसे संपरीक्षकों द्वारा की जाएगी जो कम्पनियों से सम्बद्ध तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन कम्पनियों के संपरीक्षकों के रूप में कार्य करने के लिए सम्यक् रूप से अर्ह हैं, और संपरीक्षकों की नियुक्ति निगम केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से करेगा और निगम से वे उतना पारिश्रमिक पाएंगे जितना केन्द्रीय सरकार नियत करे ।
(2) अपने कर्तव्यों के पालन में प्रत्येक संपरीक्षक की पहुंच निगम की बहियों, लेखाओं और अन्य दस्तावेजों तक सभी युक्तियुक्त समयों पर होगी ।
(3) संपरीक्षक अपनी रिपोर्ट निगम के समक्ष रखेंगे और अपनी रिपोर्ट की एक प्रति केन्द्रीय सरकार को भी भेजेंगे ।
26. बीमांकिक मूल्यांकन-निगम अपने [जीवन बीमा कारबार विषयक अपने दायित्वों के मूल्यांकन के सहित अपने जीवन बीमा कारबारट की वित्तीय स्थिति का अन्वेषण बीमांकिकों द्वारा [प्रत्येक वर्ष] कराएगा और बीमांकिकों की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार के समक्ष रखेगा ।
27. निगम के क्रियाकलाप की वार्षिक रिपोर्ट-निगम पूर्व वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलाप का लेखा देने वाली रिपोर्ट ऐसे प्ररूप में, जैसा विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के खत्म होने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र तैयार करेगा और केन्द्रीय सरकार के समक्ष रखेगा, और यदि उसके ऐसे कोई क्रियाकलाप हों जो निगम द्वारा आगामी वित्तीय वर्ष में किए जाने सम्भाव्य हैं, तो उन क्रियाकलापों का वृत्तान्त भी रिपोर्ट में दिया जाएगा ।
[28. जीवन बीमा कारबार के अधिशेष रकम का उयोग किस प्रकार किया जाएगा-यदि ऐसे किसी अन्वेषण के परिणामस्वरूप, जो निगम ने धारा 26 के अधीन किया है, कोई अधिशेष निकलता है तो,-
(क) ऐसे अधिशेष का नब्बे प्रतिशत या उतना अधिकतर प्रतिशत, जितना केन्द्रीय सरकार अनुमोदित करे, निगम के जीवन बीमा पालिसी धारियों के लिए आबंटित या आरक्षित किया जाएगा;
(ख) शेष अधिशेष का उतना प्रतिशत, जितना केन्द्रीय सरकार अनुमोदित करे, निगम द्वारा रखे गए पृथक् खाते में जमा किया जाएगा; और
(ग) शेष, लाभांश के रूप में संदत्त किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन निगम द्वारा रखे गए खाते में उपलब्ध निधियों का उपयोग ऐसे प्रयोजन के लिए और ऐसी रीति से किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार अवधारित करे ।]
[28क. (जीवन बीमा कारबार से भिन्न) किसी कारबार के फायदों का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा-यदि किसी वित्तीय वर्ष के लिए (जीवन बीमा कारबार से भिन्न) ऐसे किसी कारबार से, जो निगम द्वारा चलाया जाता है, कोई लाभ प्रोद्भूत होते हैं तो आरक्षितियों के लिए तथा अन्य ऐसी बातों के लिए, जिनके लिए उपबन्ध करना आवश्यक या समीचीन है, उपबन्ध करने के पश्चात् ऐसे लाभों का अतिशेष केन्द्रीय सरकार को दे दिया जाएगा ।]
29. रिपोर्टों का संसद् के समक्ष रखा जाना-केन्द्रीय सरकार धारा 25 के अधीन संपरीक्षकों की रिपोर्ट, धारा 26 के अधीन बीमांकिकों की रिपोर्ट और धारा 27 के अधीन निगम के क्रियाकलाप का वृत्तान्त देने वाली रिपोर्ट अपने को ऐसी रिपोर्ट मिलने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
30. जीवन बीमा कारबार चलाने का अनन्य विशेषाधिकार निगम को प्राप्त होगा-नियत दिन को तथा उससे भारत में जीवन बीमा कारबार चलाने का अनन्य विशेषाधिकार निगम को इस अधिनियम में अन्यथा स्पष्टतः उपबन्धित विस्तार तक के सिवाय प्राप्त होगा और बीमा अधिनियम के अधीन जो कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र किसी बीमाकर्ता द्वारा उक्त दिन के अव्यवहित पूर्व धृत है, जहां तक कि वह उसे भारत में जीवन बीमा कारबार चलाने के लिए प्राधिकृत करता है, वहां तक वह उक्त दिन को और से प्रभावी नहीं रहेगा ।
32. भारत के बाहर निवास करने वाले व्यक्तियों विषयक बीमा कारबार की अवस्था में अपवाद-(1) जो व्यक्ति मामूली तौर से भारत के बाहर निवासी हैं उनके जीवन से सम्बद्ध बीमा कारबार भारत में करने के लिए किसी व्यक्ति को, जिसने तन्निमित्त आवेदन किया है, केन्द्रीय सरकार धारा 30 या बीमा अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी आदेश द्वारा अनुज्ञा ऐसे निर्बन्धनों और शर्तों के अधीन करके दे सकेगी, जैसी आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, और ऐसे किसी आदेश की बाबत यह समझा जाएगा कि वह ऐसे प्रभावी है मानो वह बीमा अधिनियम की धारा 3 के अधीन उस प्रकार के कारबार के बारे में ऐसे व्यक्ति को नियन्त्रक द्वारा दिया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र हो ।
(2) जो व्यक्ति मामूली तौर से भारत के बाहर निवासी है वैसे किसी व्यक्ति के जीवन का बीमा किसी ऐसी कालावधि के दौरान, जब वह भारत में अस्थायी तौर पर निवासी है, करने के लिए ऐसे किसी व्यक्ति को, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रकार का जीवन बीमा कारबार करने के लिए अनुज्ञात है उस उपधारा में की कोई बात प्राधिकृत नहीं करेगी ।
32. कतिपय अवस्था में प्राधिकारिक मुद्रा रखने की निगम की शक्ति-निगम किसी आंचलिक कार्यालय, खण्ड कार्यालय या भारत के बाहर किसी कार्यालय में प्रयोग के लिए एक प्राधिकारिक मुद्रा रख सकेगा जो अपने मुख भाग पर उस आंचलिक कार्यालय, खण्ड कार्यालय या अन्य कार्यालय के नाम सहित, जिसमें उसका प्रयोग होना है, निगम की सामान्य मुद्रा की अनुकृति होगी, और ऐसी कोई प्राधिकारिक मुद्रा ऐसे किसी विलेख या दस्तावेज पर लगाई जा सकेगी जिसका निगम एक पक्षकार है ।
33. कतिपय अवस्था में विदेशी विधियों का अनुपालन करने की अपेक्षा-जहां कि किसी बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार से अनुलग्न कोई सम्पत्ति या अधिकार इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित और उसमें निहित की जानी है या किए जाने हैं या यदि यह बात न होती कि ऐसा अन्तरण और निधान भारत की विधि से शासित न होकर अन्यथा शासित है, तो इस प्रकार अन्तरित और निहित की जाती या किए जाते, वहां बीमाकर्ता ऐसे निदेशों का अनुवर्तन करेगा जो उसे निगम द्वारा यह सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए दिए जाएं कि यथास्थिति सम्पत्ति का स्वामित्व या अधिकार निगम को प्रभावी रूप से अन्तरित हो जाए ।
34. महाप्रशासक में निहित कतिपय अंशों (शेयरों) का पुनर्निधान-बीमा अधिनियम में कोई बात अन्तर्विष्ट होते हुए भी, वे सब अंश (शेयर), जो उस अधिनियम की धारा 6क की उपधारा (8) के अधीन किसी राज्य के महाप्रशासक में निहित हो गए हैं और जिनका व्यय नियत दिन के पूर्व उस उपधारा के उपबन्धों के अनुसार नहीं किया गया है, उन व्यक्तियों में, जो यदि उक्त उपधारा अधिनियमित न की गई होती तो उन अंशों (शेयरों) के हकदार होते, उस व्यय की, यदि कोई हो, जो महाप्रशासक द्वारा ऐसे अंशों (शेयरों) लेखे किया गया हो, रकम ऐसे व्यक्तियों द्वारा दे दी जाने पर, पुनर्निहित हो जाएंगे ।
35. विदेशी बीमाकर्ताओं की अवस्था में आस्तियों तथा दायित्वों का कतिपय अवस्थाओं में प्रत्यावर्तन-(1) जो कोई बीमाकर्ता भारत के बाहर निगमित है वह नियत दिन के पूर्व केन्द्रीय सरकार को यह कथन करने वाला आवेदन पत्र दे सकेगा कि मेरे नियन्त्रित कारबार से अनुलग्न आस्तियों में वे आस्तियां हैं जो मैं भारत में अपने जीवन बीमा कराबार के संवर्धन के प्रयोजन के लिए लाया था और जो धारा 7 में कोई बात अन्तर्विष्ट होते हुए भी निगम को अन्तरित और उसमें निहित नहीं की जानी चाहिए ।
(2) केन्द्रीय सरकार उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर 31 दिसंबर, 1955 को विद्यमान बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार में अनुलग्न उसकी आस्तियों को उस रूप में, जैसी वे उस तारीख को हैं, प्रथम अनुसूची के भाग ख के पैरा 3 में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अनुसार संगणित करके उनका मूल्य अवधारित करेगी तथा उनमें से बीमाकर्ता के उन दायित्वों लेखे, जो 31 दिसंबर, 1955 को विद्यमान उसके नियंत्रित कारबार से अनुलग्न हैं, वह पूरी रकम घटाएगी, जो उस तारीख को द्वितीय अनुसूची में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अनुसार संगणित की गई हैं, और यदि कोई आधिक्य है, तो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि आधिक्य के मूल्य के समतुल्य ऐसी आस्तियां, जैसी आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, निगम को अन्तरित या उसमें निहित नहीं की जाएंगी या जहां कि आदेश नियत दिन के पश्चात् दिया जाता है वहां निगम उक्त आस्तियों से अनिहित कर दिया जाएगा ।
(3) जो कोई बीमाकर्ता भारत के बाहर निगमित है उसकी अवस्था में केन्द्रीय सरकार स्वयं भी आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि जो व्यक्ति भारत के नागरिक नहीं हैं उनके जीवनों पर दी गई जो जीवन बीमा पालिसियां विदेशी करेंसी में की हैं उन पालिसियों लेखे ऐसे कोई दायित्व, जैसे आदेश में विनिर्दिष्ट हैं, उनकी पूर्ति के लिए आवश्यक किन्हीं ऐसी आस्तियों सहित जो इस प्रकार विनिर्दिष्ट की जाएं, निगम को अन्तरित या उसमें निहित नहीं की जाएंगी या यदि आदेश नियत दिन के पश्चात् दिया जाता है तो निगम यथापूर्वोक्त जैसे दायित्वों और आस्तियों से अनिहित हो जाएगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन दिए गए किसी आदेश में निर्दिष्ट बीमा पालिसियों लेखे दायित्वों की रकम अपने उस रूप में, जिसमें वह 31 दिसंबर, 1955 को थी-
(क) किसी ऐसी अवस्था में, जिसमें कि संबंधित बीमाकर्ता के बारे में उपधारा (2) के अधीन कोई आदेश दिया गया है द्वितीय अनुसूची के खंड (ख) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार संगणित की जाएगी ; और
(ख) किसी अन्य अवस्था में, द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट पद्धति के अनुसार संगणित की जाएगी ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में निर्दिष्ट बीमा पालिसियों लेखे दायित्वों की रकम की संगणना करने में ऐसी बीमा पालिसियों लेखे 31 दिसंबर, 1955 से आदेश की तारीख तक प्राप्तियों और संदायों के लिए रोक दिया जाएगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस धारा के अधीन दिया गया प्रत्येक आदेश निगम द्वारा ऐसी रीति से कार्यान्वित किया जाएगा जैसी केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट करे ।
36. मुख्य अभिकर्ताओं और विशेष अभिकर्ताओं की संविदाओं का पर्यवसान-नियंत्रित कारबार से संबद्ध जो संविदा-
(क) किसी बीमाकर्ता और उसके मुख्य अभिकर्ता के मध्य अथवा किसी बीमाकर्ता और किसी विशेष अभिकर्ता के मध्य, या
(ख) किसी बीमाकर्ता के मुख्य अभिकर्ता और किसी विशेष अभिकर्ता के मध्य,
नियत दिन के अव्यवहित पूर्व विद्यमान है वैसी प्रत्येक संविदा बीमा अधिनियम में या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में कोई बात अन्तर्विष्ट होते हुए भी नियत दिन से प्रभावशील न रहेगी और मुख्य अभिकर्ता या विशेष अभिकर्ता को ऐसी किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत होने वाले सब अधिकारों का पर्यवसान उस दिन हो जाएगा :
परन्तु ऐसी प्रत्येक अवस्था में, निगम यथास्थिति मुख्य अभिकर्ता या विशेष अभिकर्ता को प्रतिकर, तृतीय अनुसूची में अन्तर्विष्ट सिद्धांतों के अनुसार देगा और धारा 16 की उपधारा (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक अवस्था में यावत्साध्य लागू होंगे ।
37. केन्द्रीय सरकार बीमा पालिसियों को प्रत्याभूत करेगी-निगम द्वारा दी गई सब बीमा पालिसियों द्वारा बीमाकृत राशियां उन पालिसियों लेखे घोषित किन्हीं बोनसों सहित और किसी बीमाकर्ता द्वारा दी गई उन सब बीमा पालिसियों द्वारा, जिन लेखे दायित्व इस अधिनियम के अधीन निगम में निहित हो गए हैं, बीमाकृत राशियां नियत दिन से पूर्व या तत्पश्चात् तन्निमित्त घोषित सब बोनस सहित नकदी में देने की प्रत्याभूति केन्द्रीय सरकार धारा 14 में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए देगी :
[परंतु निगम यह प्रयास करेगा कि उसकी निधियों का विनिधान पालिसी धारकों को बढ़ा हुआ बोनस सुनिश्चित करने के लिए, उसके द्वारा विरचित कम से कम विनिधान जोखिम वाली आकर्षक स्कीमों में किया जाए, जिससे निगम को बाजार में एक प्रमुख प्रतियोगी के रूप में अपनी स्थितिबनाए रखते हुए जनसाधारण की आर्थिक समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में समर्थ बनाया जा सके ।]
38. निगम का परिसमापन-कंपनियों या निगमों के परिसमापन से संबद्ध विधि का कोई उपबंध इस अधिनियम के अधीन स्थापित निगम को लागू नहीं होगा और निगम का परिसमापन केन्द्रीय सरकार के आदेश से तथा ऐसी रीति से, जैसी वह सरकार निर्दिष्ट करे, किए जाने के सिवाय नहीं किया जाएगा ।
39. कतिपय बीमाकर्ताओं के परिसमापन के लिए विशेष उपबंध-जहां कि (विविध बीमाकर्ता से भिन्न) ऐसे किसी बीमाकर्ता ने, जो कंपनी है और जिसका नियंत्रित कारबार निगम को इस अधिनियम के अधीन अन्तरित तथा उसमें निहित किया गया है, कोई धन, जो निगम द्वारा उसे प्रतिकर के रूप में या अन्यथा दिए गए हैं, संगृहीत और वितरित किए हैं और ऐसे किसी निदेश का अनुपालन कर दिया है, जो निगम ने उसे यह सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए दिया है कि किसी संपत्ति का स्वामित्व या कोई अधिकार निगम को प्रभावी रूप में अन्तरित हो जाए, वहां केन्द्रीय सरकार, अपने से ऐसे बीमाकर्ता द्वारा एतन्निमित्त आवेदन किए जाने पर, बीमाकर्ता को प्रमाणपत्र अनुदत्त कर सकेगी कि बीमाकर्ता का अस्तित्व आगे बने रहने के लिए कोई कारण नहीं है और जहां कि ऐसा प्रमाणपत्र अनुदत्त कर दिया गया है, वहां प्रमाणपत्र को शासकीय राजपत्र में प्रकाशित कराएगी और बीमाकर्ता उसके प्रकाशन पर विघटित हो जाएगा ।
40. संपत्ति आदि के विधारण के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति या किन्हीं बहियों, दस्तावेजों या अन्य कागज-पत्रों को, जो उसके कब्जे में हों, जानबूझकर विधारित रखेगा या निगम को ऐसे परिदत्त नहीं करेगा जैसे धारा 13 द्वारा अपेक्षित है या किसी बीमाकर्ता की जो संपत्ति निगम को इस अधिनियम के अधीन अन्तरित या उसमें निहित की गई है, उसका कब्जा विधिविरुद्धतया प्रतिधृत रखेगा या ऐसी किसी संपत्ति को इस अधिनियम में अभिव्यक्त या इसके द्वारा प्राधिकृत प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों के लिए जानबूझकर उपयोग में ले आएगा, तो वह निगम के परिवाद पर कारवास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
41. कतिपय विषयों में अधिकरण की अनन्य अधिकारिता होगी-किसी सिविल न्यायालय को ऐसे किसी विषय को ग्रहण करने या न्यायनिर्णीत करने की अधिकारिता न होगी, जिसे कोई अधिकरण इस अधिनियम के अधीन विनिश्चित करने या अवधारित करने के लिए सशक्त है ।
42. अधिकरणों के विनिश्चयों का प्रवर्तन कराना-अधिकरण के किसी विनिश्चय का ऐसे किसी सिविल न्यायालय में, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं में वह व्यक्ति, जिसके खिलाफ विनिश्चय का अनुपालन कराया जाना है, वास्तविक रूप से और स्वेच्छापूर्वक निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है या किसी संपत्ति का स्वामी है, प्रवर्तन ऐसे कराया जा सकेगा मानो वह उस न्यायालय द्वारा पारित डिक्री हो ।
43. बीमा अधिनियम का लागू होना-(1) बीमा अधिनियम की निम्नलिखित धाराएं, अर्थात् :-
धाराएं 2, 2ख, 3, 18, 26, 33, 38, 39, 41, 45, 46, 47क, 50, 51, 52, 110क, 110ख, 110ग, 119, 121, 122, और 123,
निगम को यावत्साध्य ऐसे लागू होंगी जैसे वे किसी अन्य बीमाकर्ता को लागू हैं ।
(2) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथासम्भव शीघ्र, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश देगी कि बीमा अधिनियम की निम्नलिखित धाराएं, अर्थात् :-
धाराएं 2घ, 10, 11, 13, 14, 15, 20, 21, 22, 23, 25, 27क, 28क, 35, 36, 37, 40, 40क, 40ख, 43, 44, 102, से 106 तक, 107 से 110 तक, 111, 113, 114 और 116क,
निगम को ऐसी शर्तों पर और ऐसे उपांतरों के अधीन रहते हुए लागू होंगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
[(2क) बीमा अधिनियम की धारा 42 निगम के लिए बीमा कारबार याचित या उपाप्त करने के प्रयोजन के लिए अभिकर्ता के रूप में कार्य करने की अनुज्ञप्ति किसी व्यक्ति को दिए जाने के संबंध में ऐसे प्रभावशील होगी मानो उसकी उपधारा (1) में इस निमित्त नियंत्रक द्वारा प्राधिकृत अधिकारी के प्रति निर्देश के अन्तर्गत निगम के ऐसे अधिकारी के प्रतिनिर्देश हो जो इस निमित्त नियंत्रक द्वारा प्राधिकृत किया गया है ।]
(3) केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि उपधारा (1) या उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट उपबंधों से भिन्न बीमा अधिनियम के सब या कोई उपबंध निगम को ऐसी शर्तों पर और उपांतरों के अधीन रहते हुए लागू होंगे जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की या किए जाएं ।
(4) उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना अपने निकाले जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र संसद् के दोनों संदनों के समक्ष अन्यून तीस दिन के लिए रखी जाएगी और ऐसे उपांतरों के अधीन रहेगी जैसे संसद् उस सत्र के, जिसमें उसे इस प्रकार रखा जाता है या उसके अव्यवहित पश्चात्वर्ती सत्र के दौरान करे ।
(5) इस धारा में यथा उपबंधित के सिवाय, बीमा अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात निगम को लागू नहीं होगी ।
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44. कतिपय अवस्थाओं में अधिनियम का लागू न होना-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात-
(क) ऐसे किसी बीमाकर्ता के संबंध में लागू नहीं होगी जिसके कारबार का परिसमापन स्वेच्छा से किया जा रहा है या न्यायालय के आदेशों के अधीन किया जा रहा है ;
(ख) ऐसे किसी बीमाकर्ता के संबंध में लागू नहीं होगी जिसे बीमा अधिनियम उसकी धारा 2ङ में अन्तर्विष्ट उपबंधों के कारण लागू नहीं होता है :
[परन्तु इस खंड की कोई बात उस तारीख से ही लागू नहीं होगी, जिसको बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 2ङ में अंतर्विष्ट उपबंध प्रवर्तन में नहीं रहेंगे ।]
(ग) किसी विविध बीमाकर्ता के संबंध में लागू नहीं होगी जिसके मामलों के प्रबंध हेतु बीमा अधिनियम की धारा 52क के अधीन प्रशासक नियुक्त किया जा चुका है,
(घ) डाकघर जीवन बीमा निधि नाम से ज्ञात केन्द्रीय सरकार द्वारा चलाई गई योजना के संबंध में लागू नहीं होगी,
(ङ) नियत दिन को वर्तमान ऐसी किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि के संबंध में लागू नहीं होगी जो इंडियन इंकम-टैक्स ऐक्ट, 1922 (1922 का 11) की धारा 58ढ के खंड (क) में परिभाषित है,
(च) नियत दिन को वर्तमान ऐसी किसी योजना के संबंध में या केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से नियत दिन के पश्चात् बनाई गई ऐसी किसी योजना के संबंध में लागू नहीं होगी जिसके द्वारा सरकार ने अपने कर्मचारियों के सम्बलमों में से सेवा की शर्तों के भागरूप में से कतिपय अनिवार्य कटौतियां सरकार द्वारा किए जाने के प्रतिफलस्वरूप कर्मचारी की मृत्यु पर या उसके जीवन पर आश्रित आकस्मिकता के घटित होने पर धन देने का आश्वासन दिया है,
[(छ) कोयला खान भविष्य निधि, कुटुम्ब पेंशन तथा बोनस स्कीम अधिनियम, 1948 (1948 का 46) या कर्मचारी भविष्य-निधि तथा कुटुम्ब पेंशन निधि अधिनियम, 1952 (1952 का 10) के अधीन बनाई गई ऐसी किसी कुटुम्ब पेन्शन स्कीम के संबंध में लागू न होगी जो उक्त स्कीम के अन्तर्गत आने वाले कर्मचारियों के लिए कुटुम्ब पेंशन तथा जीवन बीमा प्रसुविधाओं का उपबंध करती है ।]
[45. कतिपय विविध बीमाकर्ताओं के नियंत्रित कारबार का अन्तरण होने विषयक विशेष उपबंध-धारा 44 के खंड (ग) में किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी तारीख को और से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, ऐसे विविध बीमाकर्ता के, जिसके कार्यकलाप के प्रबंध के लिए प्रशासक बीमा अधिनियम की धारा 52क के अधीन नियुक्त कर दिया गया है, नियंत्रित कारबार संबंधी आस्तियों और दायित्व निगम को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगे और ऐसी अधिसूचना के निकाले जाने पर इस अधिनियम के उपबंध ऐसे बीमाकर्ता के तथा उसके नियंत्रित कारबार की आस्तियों और दायित्वों का निगम में निहितीकरण होने के संबंध में, जहां तक शक्य हो, ऐसे लागू होंगे जैसे वे अन्य सब बीमाकर्ता तथा उनके नियंत्रित कारबार की आस्तियों और दायित्वों का निगम में निहितीकरण होने के संबंध में लागू होते हैं । किन्तु वे इस उपांतरण सहित लागू होंगे कि इस अधिनियम में नियत दिन के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे अधिसूचना में विनिर्दिष्ट दिन के प्रति निर्देश हैं ।]
46. निगम या समितियों के संघटन में त्रुटियों से कार्य या कार्यवाहियां अविधिमान्य नहीं हो जांएगी-निगम या निगम की किसी समिति का कोई कार्य या कार्यवाही यथास्थिति निगम या समिति के संघटक में किसी रिक्तता या त्रुटि होने के कारण प्रश्नास्पद नहीं किया जाएगा या की जाएगी ।
47. अधिनियम के अधीन की गई कार्यवाही के लिए परित्राण-निगम के किसी सदस्य या कर्मचारी के खिलाफ कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसी बात के लिए नहीं की जाएगी जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपू्र्वक की गई अथवा की जाने के लिए आशयित है ।
48. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को पूरा करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सब विषयों या उन में से या किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :
(क) सदस्यों की पदाविधि तथा सेवा की शर्तें,
[(कक) धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन ऐसी लिखतें, जो जारी की जाएं और कार्यपूंजी की रकम;]
(ख) वह रीति जिसमें ऐसी किसी निधि के धन और अन्य आस्तियां, जो धारा 8 में निर्दिष्ट हैं, निधि के न्यासधारियों और निगम के बीच प्रभाजित की जाएंगी,
(ग) वे सेवाएं जो मुख्य अभिकर्ता द्वारा धारा 12 के परन्तुक के प्रयोजन के लिए की जानी चाहिए थीं ;
[(गग) निगम के कर्मचारियों *** की, जिनके अंतर्गत वे व्यक्ति भी हैं जो इस अधिनियम के अधीन नियत दिन को निगम के कर्मचारी 5*** बने, सेवा के निबंधन और शर्तें ;]
(घ) धारा 17 के अधीन संघटित अधिकरणों की अधिकारिता,
(ङ) वह रीति जिससे और वे व्यक्ति जिनको इस अधिनियम के अधीन कोई प्रतिकर चुकाया जा सकेगा,
(च) वह समय जिसके भीतर कोई विषय, जो इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण को विनिश्चय के लिए निर्दिष्ट किया जा सकता है, इस प्रकार निर्दिष्ट किया जा सकेगा,
(छ) वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए निगम द्वारा विनिधान किए जा सकेंगे,
(ज) वह रीति जिससे प्रत्येक आंचलिक कार्यालय के लिए एक कर्मचारी और अभिकर्ता संबंध समिति संघटित की जा सकेगी,
(झ) वह प्ररूप जिसमें निगम के क्रियाकलापों के वृत्तांत दर्शित करने वाली रिपोर्ट तैयार की जाएगी,
(ञ) वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए निगम कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा,
(ट) इस अधिनियम के अधीन देय फीसें और वह रीति जिससे वे संगृहीत की जानी हैं ;
(ठ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए ।
[(2क) निगम के कर्मचारियों और अभिकर्ताओं की, जिनके अंतर्गत वे व्यक्ति भी हैं, जो इस अधिनियम के अधीन नियत दिन को निगम के कर्मचारी और अभिकर्ता बने, सेवा के निबंधनों और शर्तों की बाबत, वे विनियम और अन्य उपबंध, जो जीवन बीमा निगम (संशोधन) अधिनियम, 1981 के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त थे, उपधारा (2) के खंड (गग) के अधीन बनाए गए नियम समझे जाएंगे और इस धारा के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, तद्नुसार प्रभावी होंगे ।
(2ख) उपधारा (2) के खंड (गग) द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत, ऐसी तारीख से, जो 20 जून, 1979 से पूर्व की न हो, निम्नलिखित होंगी :
(i) ऐसे नियमों को भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति ; और
(ii) उपधारा (2क) में निर्दिष्ट विनियमों और अन्य उपबंधों का परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में, भूतलक्षी प्रभाव देकर संशोधन करने की शक्ति ।
(2ग) किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या किसी अन्य विधि में या तत्समय प्रवृत्त किसी करार, परिनिर्धारण, पंचाट या अन्य लिखत में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (2) के खंड (गग) और उपधारा (2ख) के उपबंध और उक्त खंड (गग) के अधीन बनाए गए कोई नियम प्रभावी होंगे और किसी तारीख से भूतलक्षी प्रभाव देकर बनाया गया ऐसा कोई नियम भी उस तारीख से प्रभावी हो गया समझा जाएगा ।]
[(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
49. विनियम बनाने की शक्ति-(1) निगम इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए जिन विषयों के लिए उपबन्ध करना समीचीन है उन सबके लिए उपबन्ध करने के लिए ऐसे विनियम, जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से असंगत नहीं हैं, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया तथा पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम-
(क) निगम की उन शक्तियों तथा कृत्यों के लिए, जो आंचलिक प्रबंधकों को प्रत्यायोजित किए जा सकेंगे,
[(ख) निगम के कर्मचारियों और अभिकर्ताओं की भर्ती की पद्धति के लिए तथा अभिकर्ताओं की सेवा के निबंधनों और शर्तों के लिए;]
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(ग) धारा 22 के अधीन संघटित बोर्डों के सदस्यों की संख्या, पदावधि और सेवा की शर्तों के लिए,
(घ) इस अधिनियम के अधीन स्थापित प्रत्येक अंचल की राजक्षेत्रीय सीमाओं के लिए और प्रत्येक अंचल में किए जाने वाले कारबार के लिए,
(ङ) उस रीति के लिए जिससे निगम की निधि रखी जाएगी,
(च) आंचलिक कार्यालयों में से प्रत्येक में पृथक् निधियां और लेखा रखने के लिए,
(छ) प्रत्येक खंड कार्यालय की अधिकारिता के लिए और किसी खंड कार्यालय द्वारा अनुसेवित क्षेत्र में खंड कार्यालय को ऐसे किसी विषय के बारे में सलाह देने के प्रयोजन के लिए बीमा पालिसीधारियों की प्रतिनिधि परिषदों की स्थापना करने के लिए, जो उन्हें निर्दिष्ट किया जाए,
(ज) निगम के अधिवेशनों में कारबार के संचालन के लिए,
(झ) निगम की समितियों के बनाने के लिए और निगम की शक्तियां और कृत्य ऐसी समितियों को प्रत्यायोजित करने के लिए और ऐसी समितियों के अधिवेशनों में कारबार के संचालन के लिए,
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(ट) जहां कहीं आवश्यक हो, वहां विशेष बोनस घोषित करने के प्रयोजन से उन बीमापालिसियों के वर्गीकरण के लिए, जो चाहे तो निगम द्वारा, चाहे ऐसे किसी बीमाकर्ता द्वारा, जिसका नियंत्रित कारबार निगम को अन्तरित और उसमें निहित हो गया है, दी गई हैं,
(ठ) उस रीति के लिए जिससे और उन अन्तरालों के लिए जिनमें विभिन्न आंचलिक कार्यालयों, खंड कार्यालयों और शाखा कार्यालयों के लेखाओं का निरीक्षण और संपरीक्षा किया जा सकेगा या की जा सकेगी,
(ड) उन शर्तों के लिए जिनके अधीन रहते हुए निगम द्वारा कोई संदाय किए जा सकेंगे,
उपबन्ध कर सकेंगे ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह इस सत्र में हो कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह विनियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे प्रवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
प्रथम अनुसूची
(धारा 16 देखिए)
प्रतिकर अवधारण के लिए सिद्धान्त
भाग क
जिस अंश (शेयर) पूंजी पर लाभांश या बोनस देय है वैसी अंश (शेयर) पूंजी वाले जिस बीमाकर्ता ने उस पूरे अधिशेष या उसके किसी भाग को बोनस के रूप में पालिसीधारियों में आबंटित कर दिया है जो उसके नियंत्रित कारबार संबंधी पहली जनवरी, 1955 के पूर्वतर किसी तारीख के अंतिम बीमांकिक अन्वेषण की बाबत ऐसी संक्षिप्तियों में सम्प्रदर्शित है, जो बीमा अधिनियम की चतुर्थ अनुसूची के भाग 2 के अनुकूल तैयार की गई है, उस बीमाकर्ता को निगम द्वारा देय प्रतिकर पैरा 1 या 2 में से जो भी बीमाकर्ता के लिए अधिक लाभप्रद हो उसके उपबन्धों के अनुसार संगणित किया जाएगा ।
पैरा 1-अधिशेष का जितना अंश सुसंगत बीमांकिक अन्वेषणों संबंधी पूर्वोक्त जैसी संक्षिप्तियों में अंश (शेयर) धारियों में आबंटित के रूप में सम्प्रदर्शित है उसके वार्षिक औसत के बीस गुने के उस अंक से गुणा किए जाने पर आई राशि, जो 1950 में 1955 तक के कलैंडर वर्षों के अभ्यन्तर प्रवृत्त औसत कारबार को सुसंगत बीमांकिक अन्वेषणों में से सर्वप्रथम अन्वेषण से अव्यवहित पूर्व वाले बीमांकिक अन्वेषण की तारीख और उस तारीख के बीच वाली, जिसको ऐसे अन्वेषणों में से अंतिम अन्वेषण हुआ था, कालावधि में समाविष्ट कलैंडर वर्षों के अभ्यन्तर प्रवृत्त औसत कारबार के समानुपात के बराबर है ।
पैरा 2-पैरा 1 के अधीन देय रकम का अर्धांश धन समादत्त पूंजी अथवा उसके समतुल्य आस्तियां अथवा विविध बीमाकर्ता की दशा में, समादत्त पूंजी का वह भाग अथवा उसके समतुल्य आस्तियां, जो इस अधिनियम के अधीन निगम को अन्तरित और उसमें निहित हो गया है या हो गई हैं ऋण व्ययों या हानियों या दोनों की वह रकम, यदि कोई हो, जो बीमा अधिनियम की प्रथम अनुसूची में के प्ररूप क के लिए बीमाकर्ता द्वारा पूंजीकृत कर ली गई है ।
स्पष्टीकरण 1-पैरा 1 के प्रयोजनों के लिए,-
(क) “सुसंगत बीमांकिक अन्वेषणों" से 1 जनवरी, 1955 से पूर्व की तारीखों पर के अंतिम बीमांकिक अन्वेषणों की वह न्यूनतम संख्या (जो किसी अवस्था में दो से कम न होगी) अभिप्रेत है जिससे उस तारीख के, जब ऐसे अन्वेषणों में से सर्वप्रथम अन्वेषण के अव्यवहित पूर्व बीमांकिक अन्वेषण किया गया था और उस तारीख के, जब ऐसे अन्वेषणों में से अंतिम अन्वेषण किया गया था, बीच वाली कालावधि चार वर्ष से कम की नहीं होगी,
(ख) प्रवृत्त औसत कारबार" से बीमाकर्ता द्वारा अपने नियंत्रित कारबार के सिलसिले में बीमाकृत सब राशियों का औसत (किसी बीमाकृत बोनस सहित) अभिप्रेत है जैसे कि वह सुसंगत कलैंडर वर्षों में से प्रत्येक वर्ष के इकतीस दिसम्बर को हो ।
स्पष्टीकरण 2-जहां कि बीमाकर्ता ने ऐसे किसी अधिशेष का, जैसा पैरा 1 में निर्दिष्ट है, 5 प्रतिशत से अधिक अंश (शेयर) धारियों में आबंटित कर दिया है वहां बीमाकर्ता की बाबत उस पैरे के प्रयोजनोंके लिए समझा जाएगा कि उसने अधिशेष का केवल 5 प्रतिशत आबंटित किया है और जहां कि बीमाकर्ता ने अंश (शेयर) धारियों में ऐसा कोई अधिशेष आबंटित नहीं किया है या ऐसे किसी अतिशेष का 31\2 प्रतिशत से कम आबंटित किया है वहां बीमाकर्ता का बाबत उस पैरे के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि उसने 31\2 प्रतिशत आबंटित किया है ।
स्पष्टीकरण 3-भारत के बाहर निगमित किसी बीमाकर्ता की अवस्था में, अंश (शेयर) धारियों में आबंटित अधिशेष अंश (शेयर) के औसत की बाबत पैरा 1 के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह ऐसे अंक द्वारा, जो नीचे वर्णित दो अंकों का अर्थात् :-
(i) बीमाकर्ता के संसार व्यापी कारबार लेखे अधिशेष में से, जो अंश (शेयर) धारियों में आबंटित है [ऐसा अंश (शेयर) स्पष्टीकरण 2 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए संगणित किया जाएगा] उस अंश (शेयर) का जो अनुपात उस पूरे अधिशेष से है जो उस अन्तिम बीमांकिक अन्वेषण के प्रति निर्देश से अभिनिश्चित किया गया है जो ऐसे कारबार के उस रूप से संबद्ध है जो उस कारबार का पहली जनवरी, 1955 से पूर्वतर तारीख को था उस अनुपात के समतुल्य अंक, और
(ii) बीमाकर्ता के संसार व्यापी कारबार लेखे अधिशेष में से, जो अंश (शेयर) धारियों में आबंटित है [ऐसा अंश (शेयर) पैरा 2 के उपबंधों के अधीन रहते हुए संगणित किया जाएगा] उस अंश (शेयर) का जो अनुपात उस पूरे अधिशेष से है जो उस बीमांकिक अन्वेषण के प्रति निर्देश से अभिनिश्चित किया गया है जो ऐसे कारबार के उस रूप से संबद्ध है जो ऐसे कारबार का खंड (1) में निर्दिष्ट बीमांकिक अन्वेषण से अव्यवहित पहले था उस अनुपात के समतुल्य अंक का औसत है, गुणा किया जाकर उस अधिशेष का वार्षिक औसत है जो सुसंगत बीमांकिक अन्वेषण लेखे बीमा अधिनियम की चतुर्थ अनुसूची के भाग 2 के अनुरूप तैयार की गई संक्षिप्तियों में संप्रदर्शित है :
परन्तु ऐसे किसी बीमाकर्ता की अवस्था में, जिसके संबंध में धारा 35 के अधीन आदेश दिया गया है, निम्नलिखित रूप में संगणित रकम की बाबत यह समझा जाएगा कि यह अधिशेष का वार्षिक औसत है :
(क) अधिशेष के वार्षिक औसत में से धारा 35 की उपधारा (2) के अधीन दिए गए किसी आदेश में विनिर्दिष्ट आस्तियों पर 31\2 प्रतिशत प्रति वर्ष से संगणित एक वर्ष का ब्याज घटाया जाएगा ;
(ख) खंड (क) के अधीन निकले अतिशेष के सम्बन्ध में एक रकम संगणित की जाएगी जिसका उक्त अतिशेष से वही अनुपात है जो उन व्यक्तियों के जीवनों पर, जो भारत के नागरिक नहीं हैं, दी गई किसी विदेशी करेंसी में अभिव्यक्त बीमा पालिसियों से भिन्न, उन पालिसियों लेखे जो बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार से अनुलग्न हैं, दायित्व का अनुपात ऐसे कारबार से अनुलग्न सब बीमा पालिसियों लेखे दायित्व से है ; उन बीमा पालिसियों पर 31 दिसम्बर, 1955 को जो दायित्व है उसका संगणन द्वितीय अनुसूची के खंड (ख) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार किया जाएगा :
परन्तु यह और भी कि-
(क) ऐसी किसी अवस्था में, जिसमें कि धारा 35 के अधीन दिया गया आदेश केवल उपधारा (2) के प्रति निर्देश से है, पूर्ववर्ती परन्तुक इस प्रकार प्रभावी होगा मानो उसमें से खंड (ख) को लुप्त कर दिया गया हो, और
(ख) ऐसी किसी अवस्था में, जिसमें कि धारा 35 के अधीन दिया गया आदेश केवल उपधारा (3) के प्रति निर्देश से है, पूर्ववर्ती परन्तुक इस प्रकार होगा मानो-
(i) खंड (क) लुप्त कर दिया गया हो,
(ii) खंड (ख) में, शब्द, कोष्ठक और अक्षर “खंड (क) के अधीन निकले अतिशेष के सम्बन्ध में" लुप्त कर दिए गए हों, उक्त अतिशेष" के स्थान में “अधिशेष की वार्षिक औसत" शब्द रख दिए गए हों और “खंड (ख) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार" शब्दों, कोष्ठकों और अक्षरों के स्थान में “विनिर्दिष्ट पद्धति क से" शब्द और अक्षर रख दिए गए हों ।
स्पष्टीकरण 4-जहां कि बीमाकर्ता भारत के बाहर ऐसा निगमित बीमाकर्ता है जिसकी समादत्त पूंजी भारत के बाहर है, वहां-
(क) पैरा 1 में अन्तर्विष्ट उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो जिसमें से बीमाकर्ता की समादत्त पूंजी के उस भाग के बराबर, जिसे केन्द्रीय सरकार बीमाकर्ता के नियंत्रित कारबार के लिए आबंट्य अवधारित करे, राशि घटा दी जाएगी" शब्द उस पैरा के अन्त में अन्तःस्थापित किए गए हों, और
(ख) पैरा 2 में अन्तर्विष्ट उपबंध ऐसे प्रभावी होंगे मानो-
(i) “स्पष्टीकरण 4 के खंड (क) में निर्देशित कटौती किए बिना" शब्द “पैरा 1 के अधीन देय" शब्दों के पूर्व अन्तःस्थापित कर दिए गए हों, और
(ii) “धन समादत्त पूंजी" से आरम्भ होने वाले और “बीमा अधिनियम की प्रथम अनुसूची में से खत्म" होने वाले शब्दों को लुप्त कर दिया गया हो ।
भाग ख
जिस अंश (शेयर) पूंजी पर लाभांश या बोनस देय है, वैसी अंश (शेयर) पूंजी वाले जिस बीमाकर्ता ने 1 जनवरी, 1955 से पहले कि किसी तारीख वाले अंतिम बीमांकिक अन्वेषण के बारे में ऐसा कोई आबंटन नहीं किया है जैसा भाग क में निर्दिष्ट है, उसे निगम द्वारा जो प्रतिकर दिया जाना है वह प्रतिकर बीमाकर्ता के वर्तमान नियंत्रित कारबार से अनुलग्न उसकी आस्तियों के मूल्य के, जो उस तारीख को पैरा 3 के उपबंधों के अनुसार संगणित किया गया है, बराबर रकम में से बीमाकर्ता के 19 जनवरी, 1955 को वर्तमान ऐसे कारबार से अनुलग्न उन दायित्वों की रकम घटाकर होगा जो उस तारीख को पैरा 4 के उपबंधों के अनुसार संगणित की गई है ।
पैरा 3-आस्तियां-(क) किसी भूमि या भवनों का बाजार मूल्य,
(ख) बीमाकर्ता द्वारा धारित किन्हीं अंशों (शेयरों), प्रतिभूतियों या अन्य विनिधानों का बाजार मूल्य,
(ग) बीमाकर्ता द्वारा पट्टे पर ली हुई सब संपत्तियों लेखे दिए गए प्रीमियमों की पूरी रकम जिसमें से ऐसे प्रत्येक प्रीमियम की अवस्था में वह रकम घटा दी जाएगी जिसका ऐसे प्रीमियम से वही अनुपात है जो पट्टे की उस अवसित अवधि का, जिसके बारे में ऐसा प्रीमियम चुका दिया गया है, पट्टे की पूरी अवधि से है,
(घ) बीमाकर्ता को शोध्य ऋणों की रकम, चाहे वे प्रतिभूत हों या अप्रतिभूत हों, वहां तक जहां तक कि उनकी बाबत यह युक्तियुक्ततः समझा जाता है कि वे प्रत्युद्धरणीय हैं,
(ङ) उन प्रीमियमों की रकम, जो बीमाकर्ता को जीवन बीमा पालिसियों लेखे शोध्य हो गई हैं किन्तु चुकाई नहीं गई हैं और जिनकी अदायगी के लिए अनुग्रहावधि समाप्त नहीं हुई है,
(च) बीमाकर्ता द्वारा किसी बैंक में निक्षेप के रूप में या अन्यथा धृत नकद रकम,
(छ) पूर्ववर्ती खंडों में से किसी के अन्तर्गत आने वाली आस्तियों से भिन्न सब मूर्त्त आस्तियों का मूल ।
पैरा 4-दायित्व-(क) जिन परिपक्व दावों के लिए अदायगी की जानी है उन लेखे बीमाकर्ता के पालिसीधारियों के प्रति उन दायित्वों की कुल रकम, जो उसके नियंत्रित कारबार के बारे में हैं ।
(ख) जिन बीमा पालिसियों के भुगतान का समय नहीं आया है वैसी बीमा पालिसी के धारकों के प्रति जो दायित्व बीमाकर्ता के अपने नियंत्रित कारबार के हैं, उन दायित्वों की पूरी रकम, जिन मद्धे दायित्व निम्नलिखित बीमांकिक आधारों पर संगणित किए जाएंगे :
(i) पू्र्ण जीवन बीमाओं और सावधि बीमा पालिसियों के बारे में प्रयुक्त की जाने वाली मरण सारणी ओरियन्टल (25-35) परम-मरण सारणी होगी और यह मान लिया जाएगा कि ब्याज 31/4 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से है और सलाभ बीमा पालिसियों की अवस्था में ऑफिस प्रीमियमों का 20 प्रतिशत और अलाभ बीमा पालिसियों की अवस्था में ऑफिस प्रीमियमों का 15 प्रतिशत व्ययों के लिए आरक्षित रखा जाएगा,
(ii) अन्य बीमा पालिसियों की बाबत यह खंड (1) में विनिर्दिष्ट आधार से संगत ऐसे बीमांकिक आधार होंगे जैसे मूल्यांकन करने वाले बीमांकिक द्वारा अवधारित किए गए हों, तथा
(iii) खंड (ख) के अधीन बीमाकर्ताओं के दायित्वों का अवधारण करने में बीमांकिक वे सभी प्रायिक उपबंध तथा आरक्षण करेगा जो मामूली तौर पर ऐसी अवस्थाओं में किए जाते हैं ।
(ग) बीमाकर्ता के अन्य सब दायित्वों की पूरी रकम,
(घ) जहां कि बीमा पालिसी दायित्वों के उस बीमांकिक मूल्यांकन के परिणामस्वरूप, जो खंड (ख) के अधीन किया गया है, जीवन बीमा निधि में अधिशेष दिखाई पड़ता है, वहां ऐसे अधिशेष के 96 प्रतिशत के बराबर राशि इस पैरा के अधीन दायित्व समझी जाएगी ।
स्पष्टीकरण-भारत के बाहर निगमित ऐसे किसी बीमाकर्ता की अवस्था में, जिसके बारे में धारा 35 के अधीन कोई आदेश दिया गया है, आदेशों में विनिर्दिष्ट यथास्थिति आस्तियां और दायित्व उस भाग के प्रयोजनों के लिए अपवर्जित किए जाएंगे ।
पैरा 5-जिस बीमाकर्ता को इस भाग के अधीन प्रतिकर दिया जाना है यदि वह विस्थापित बीमाकर्ता है तो दिए जाने वाला प्रतिकर निम्नलिखित उपबंधों के अनुसार संगणित किया जाएगा-
विस्थापित बीमाकर्ता जिन मृत्युओं की बाबत यह साबित कर देता है कि वे भारत और पाकिस्तान की डुमीनियनों की स्थापना के अवसर पर हुए सिविल उपद्रवों के कारण हुई थीं उन मृत्युओं से उद्भूत दावों की बाबत जो हानियां विस्थापित बीमाकर्ता द्वारा उठाई गई हैं प्रथमतः वे यह मानकर कि कुल हानि ऐसी मृत्युओं की बाबत दावों के रूप में दी गई रकम और सुसंगत पालिसियों मद्धे बीमांकिक आरक्षित निधि की कुल रकम के बीच के अन्तर के बराबर है, अभिनिश्चित की जाएंगी ;
विस्थापित बीमाकर्ता की पश्चिमी पाकिस्तान में, किसी स्थावर संपत्ति के 15 अगस्त, 1947 के बाजार मूल्य और इस भाग के पैरा 3 के अधीन अवधारित उसके बाजार मूल्य के बीच अन्तर को, अथवा जब कि ऐसी कोई स्थावर संपत्ति 19 जनवरी, 1956 के पहले बेच दी गई है, तब 15 अगस्त, 1947 को उसके बाजार मूल्य और विक्रय कीमत के बीच के अन्तर को द्वितीयतः अभिनिश्चित किया जाएगा ;
विस्थापित बीमाकर्ता द्वारा बैंकों में धारित निक्षेपों की जो रकम किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन घोषित अधिस्थगन के कारण प्रत्याहृत नहीं की जा सकी थी तृतीयतः वह उस मात्रा तक अभिनिश्चित की जाएगी जहां तक कि ऐसे निक्षेप मारे गए हैं ;
पश्चिमी पाकिस्तान में इस समय कारबार करने वाली किसी कंपनी में विस्थापित बीमाकर्ता द्वारा धारित जो कोई अंश (शेयर) 15 अगस्त, 1947 के पहले अर्जित किए गए थे, उनके 15 अगस्त, 1947 को बाजार मूल्य के तथा 19 जनवरी, 1956 को ऐसे अंशों (शेयरों) के बाजार मू्ल्य के बीच के अन्तर को चतुर्थतः अभिनिश्चित किया जाएगा ।
विस्थापित बीमाकर्ता को इस भाग के अधीन दिए जाने वाले प्रतिकर की रकम-
(क) यदि यह पैरा अधिनियमित न किया गया होता तो जो रकम उसे देनी पड़ती, वह रकम होगी, और उसके योग में,
(ख) यदि पैरा 3 में निर्दिष्ट आस्तियों के मूल्य में इस पैरा में निर्दिष्ट चारों मदों का योग जोड़ दिया गया होता और पैरा 4 में निर्दिष्ट दायित्वों लेखे जीवन बीमा निधि को समान राशि से बढ़ा दिया गया होता तो जो प्रतिकर उसे देना पड़ता उसके और यदि वह पैरा अधिनियमित न किया गया होता तो जो प्रतिकर उसे देना पड़ता उसके अन्तर के अर्धांश के समतुल्य रकम होगी,
अथवा
विस्थापित बीमाकर्ता की समादत्त पूंजी के अर्धांश में से जो भी कम है वह रकम होगी ।
स्पष्टीकरण-इस पैरा के प्रयोजनों के लिए विस्थापित बीमाकर्ता से ऐसी बीमा कंपनी अभिप्रेत है जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय 1947 के वर्ष के किसी भाग में किसी ऐसे क्षेत्र में था जो इस समय पश्चिमी पाकिस्तान का भाग बन गया है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय इस समय भारत में है ।
भाग ग
निगम द्वारा उस बीमाकर्ता को-
(क) जिसकी कोई अंश (शेयर) पूंजी नहीं है, या
(ख) जिसकी ऐसी अंश (शेयर) पूंजी है जिस पर कोई लाभांश या बोनस देय नहीं है,
दिया जाने वाला प्रतिकर प्रत्येक सलाभ बीमा पालिसी के अधीन (बोनसों को अपवर्जित कर) बीमाकृत राशि लेखे एक रुपए प्रति हजार की दर पर कृतयोग राशि के रूप में होगा और खंड (ख) के अधीन आने वाले बीमाकर्ता की अवस्था में, बीमाकर्ता की समादत्त पूंजी के समतुल्य उसे चुकाई जाने वाली राशि भी इसके अन्तर्गत होगी ।
द्वितीय अनुसूची
(धारा 35 देखिए)
कतिपय अवस्थाओं में दायित्वों का मूल्य अवधारित करने के लिए सिद्धांत
भारत के बाहर निगमित बीमाकर्ता के दायित्वों की पूरी रकम धारा 35 की उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित उपबंधों के अनुसार संगणित रकमों का योग होगी-
(क) बीमा पालिसियां के धारकों के प्रति बीमाकर्ता के अपने नियंत्रित कारबार लेखे जो दायित्व उन परिपक्व दावों लेखे हैं जिन पर अदायगी की जानी है, उन दायित्वों की कुल रकम,
(ख) जो पालिसियों भुगतान के लिए परिपक्व नहीं हो गई हैं उनके धारकों के प्रति बीमाकर्ता के अपने नियंत्रित कारबार मद्धे दायित्वों की पूरी रकम, जिन मद्धे दायित्व निम्नलिखित पद्धति ख के अनुसार संगणित दायित्व या निम्नलिखित पद्धति क और ख में संगणित दायित्वों के मध्यक में से जो भी बड़ा हो, वह होगा ।
पद्धिति क-उन्हें आधारों पर प्रतिगणित बीमांकिक दायित्व जो बीमाकर्ता द्वारा 1 जनवरी, 1956 से पूर्व किसी तारीख के गत बीमांकित अन्वेषण में अपनाए गए थे ।
पद्धिति ख-बीमांकिक दायित्व जो मूल्यांकन की उपांतरित शुद्ध प्रीमियम पद्धति के नाम से ज्ञात पद्धति पर संगणित है, उपयोग में लाई जाने वाली मरण सारणी ओरियन्टल (25-35) परम मरण सारणी होगी और यह मान लिया जाएगा कि ब्याज 2 1\2 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से है और बीमा पालिसी द्वारा बीमाकृत राशि का 40 रुपए प्रति हजार प्रथम वर्ष के व्ययों के लिए मोक होगा ।
स्पष्टीकरण 1-पद्धति क और ख के अधीन दायित्व अभिनिश्चित करने के पहले, 31 दिसम्बर, 1955 को प्रवृत्त प्रत्येक सलाभ बीमा पालिसी में (जब तक कि ऐसा जोड़ पहले ही न कर दिया गया हो) उस तारीख से, जब उक्त अंतिम बीमांकिक अन्वेषण किया गया था, उस प्रत्येक वर्ष या भाग मद्धे जिसमें बीमा पालिसी प्रवृत्त रही है, उसी दर पर बोनस जोड़ दिया जाएगा जो उक्त अंतिम बीमांकिक अन्वेषण में घोषित की गई थी ।
स्पष्टीकरण 2-दायित्व पद्धति क या पद्धति ख के अनुसार संगणित करने में-
(i) पूर्ण जीवन बीमा और सावधि बीमा में भिन्न बीमा पालिसियों के बारे में, मूल्यांकन करने वाले बीमांकिक द्वारा अवधारित ऐसा बीमांकिक आधार प्रयोग में लाया जाएगा जो पद्धति में विनिर्दिष्ट आधार से संगत है ; और
(ii) बीमांकिक वे सब प्रायिक उपबंध और आरक्षण करेगा जो ऐसी स्थितियों में मामूली तौर पर किए जाते हैं ;
(ग) बीमाकर्ता के अन्य सब दायित्वों की पूरी रकम ।
तृतीय अनुसूची
(धारा 36 देखिए)
मुख्य अभिकर्ताओं को देय प्रतिकर का अवधारण करने के लिए सिद्धांत
बीमाकर्ता से हुई मुख्य अभिकरण संबंधी संविदा में विनिर्दिष्ट जो अधिभावी कमीशन निगम उस कारबार मद्धे, जो नियत दिन से पूर्व मुख्य अभिकर्ता द्वारा उपाप्त किया गया था, नवीयन प्रीमियमों पर नियत दिवस वर्षों की कालावधि के दौरान प्राप्त करता है उसका 75 प्रतिशत मुख्य अभिकर्ता को देय कमीशन होगा और ऐसा कमीशन उक्त कालावधि तक प्रतिवर्ष अवधारित किया और दिया जाएगा ।
विशेष अभिकर्ताओं को देय प्रतिकर का अवधारण करने के लिए सिद्धांत
विशेष अभिकर्ता के जो वार्षिक औसत उपार्जन बीमा अभिकर्ताओं के माध्यम द्वारा स्वयं द्वारा प्राप्त कारबार मद्धे अधिभावी कमीशन के रूप में 1 जनवरी, 1952 से आरम्भ होने वाली और 31 दिसम्बर, 1955 को खत्म होने वाली कालावधि के अभ्यन्तर हुए हैं उनका आठवां भाग विशेष अभिकर्ता को देय प्रतिकर होगा ।
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