निर्यात (क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण) अधिनियम, 1963
(1963 का अधिनियम संख्यांक 22)
[24 अगस्त, 1963]
क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण के माध्यम से भारत के निर्यात
व्यापार का ठोस विकास करने के लिए तथा
उससे संबंधित विषयों के लिए
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौदहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम निर्यात (क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण) अधिनियम, 1963 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
[(क) न्यायनिर्णयन प्राधिकारी" से धारा 10ट में या उसके अधीन विनिर्दिष्ट प्राधिकारी अभिप्रेत हैं;
(कख) अपील प्राधिकारी" से धारा 10ड में निर्दिष्ट अपील प्राधिकारी अभिप्रेत है;]
[(कग)] परिषद्" से धारा 3 के अधीन स्थापित निर्यात निरीक्षण परिषद् अभिप्रेत है;
(ख) निर्यात" से उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित भारत से, भारत के बाहर किसी स्थान के लिए, ले जाना अभिप्रेत है;
(ग) किसी वस्तु के संबंध में निरीक्षण" से उस वस्तु के माल के पूरे बैच के या चुने हुए नमूने के या नमूनों के, जो पूरे बैच का द्योतन करने के लिए तात्पर्यित हैं, साधारणतया निरीक्षण द्वारा यह अवधारण करने की प्रक्रिया अभिप्रेत है कि क्या उस वस्तु के माल का कोई बैच उस वस्तु को लागू मानक विनिर्देशों के या निर्यात संविदा में नियत अन्य विनिर्देशों के अनुसार है या नहीं;
(घ) अधिसूचित वस्तु" से धारा 6 के खण्ड (क) के अधीन अधिसूचित वस्तु अभिप्रेत है;
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(च) क्वालिटी नियंत्रण" से कोई ऐसी क्रिया अभिप्रेत है जिसका उद्देश्य किसी वस्तु की क्वालिटी का (चाहे वह विनिर्माण की या उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान हो या उसके पश्चात् की हो) अवधारण करना है । यह इस बात को सुनिश्चित करने के लिए है कि क्या यह उसे लागू मानक विनिर्देशों को या निर्यात संविदा में नियत किन्हीं अन्य विनिर्देशों को पूरा करती है और क्या उसे निर्यात के प्रयोजनार्थ स्वीकार किया जाए ।
3. निर्यात निरीक्षण परिषद् की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख को जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, निर्यात निरीक्षण परिषद् के नाम से ज्ञात एक परिषद् की स्थापना कर सकेगी । इसमें निम्नलिखित होंगे-
(क) अध्यक्ष, जिसे केन्द्रीय सरकार नियुक्त करे;
(ख) निरीक्षण और क्वालिटी नियंत्रण निदेशक, पदेन, जो सचिव होगा;
(ग) मानकीकरण के लिए भारत सरकार का अवैतनिक सलाहकार तथा निदेशक, भारतीय मानक संस्थान, पदेन;
(घ) भारत सरकार का कृषि विपणन सलाहकार, पदेन;
(ङ) वाणिज्यिक आसूचना और सांख्यिकी महानिदेशक, पदेन;
(च) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित [पन्द्रह] अन्य सदस्य, जिनमें से तीन सदस्य धारा 7 में निर्दिष्ट अभिकरणों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति होंगे ।
(2) परिषद् पूर्वोक्त नाम से, शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली एक निगमित निकाय होगी जिसे संपत्ति के धारण, अर्जन और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगी और उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) के खण्ड (क) तथा खण्ड (च) में निर्दिष्ट परिषद् के सदस्यों की पदावधि, उनमें आकस्मिक रिक्तियों को भरने की पद्धति और परिषद् के सदस्य को संदेय यात्रा तथा दैनिक भत्ते और परिषद् द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया, ऐसी होगी, जो विहित की जाए ।
(4) परिषद् का कोई भी कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि परिषद् में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि थी ।
(5) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाने वाले नियमों के अधीन रहते हुए, परिषद् ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगी, जैसी वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक समझे ।
4. निरीक्षण और क्वालिटी नियंत्रण निदेशक-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने तथा ऐसे कृत्यों का पालन करने के लिए, जो विहित किए जाएं, निरीक्षण और क्वालिटी नियंत्रण निदेशक नियुक्त करेगी ।
5. परिषद् के कृत्य-(1) साधारणतया परिषद् के कृत्य होंगे-निर्यात के लिए आशयित वस्तुओं के संबंध में क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण को प्रवर्तित करने के उपायों की बाबत केन्द्रीय सरकार को सलाह देना तथा उसके लिए योजनाएं बनाना, केन्द्रीय सरकार की सहमति से धारा 7 के अधीन स्थापित तथा मान्यताप्राप्त अधिकरणों को सहायता अनुदान देना और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना, जो इस अधिनियम के अधीन या उसके द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
(2) अपने कृत्यों के पालन के प्रयोजन के लिए परिषद्, किसी वस्तु या उसके व्यापार से संबंधित विषयों का विशेष ज्ञान तथा व्यावहारिक अनुभव रखने वाले उतने व्यक्तियों को जितने वह ठीक समझे, सदस्यों के रूप में सहयोजित कर सकेगी, और ऐसे व्यक्ति को परिषद् के विचार विनिमय में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु मत देने का अधिकार नहीं होगा और किसी अन्य प्रयोजन के लिए वह सदस्य नहीं होगा ।
(3) परिषद् अपने कृत्यों से संबंधित विशेष समस्याओं का अन्वेषण करने के लिए विशेषज्ञों का भी गठन कर सकेगी ।
(4) इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन में, परिषद् ऐसे निर्देशों से आबद्ध होगी, जो केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर लिखित रूप में उसे दे ।
6. क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण के बारे में केन्द्रीय सरकार की शक्तियां-यदि परिषद् से परामर्श के पश्चात् केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि भारत के निर्यात व्यापार के विकास के लिए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा-
(क) उन वस्तुओं को अधिसूचित कर सकेगी, जिनके निर्यात करने से पूर्व क्वालिटी नियंत्रण या निरीक्षण या दोनों किया जाएगा;
(ख) क्वालिटी नियंत्रण या निरीक्षण का प्रकार विनिर्दिष्ट कर सकेगी जो किसी अधिसूचित वस्तु को लागू किया जाएगा;
(ग) किसी अधिसूचित वस्तु के लिए एक या अधिक मानक विनिर्देश स्थापित, अंगीकार या मान्य कर सकेगी;
(घ) अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के अनुक्रम में किसी अधिसूचित वस्तु का निर्यात तब तक प्रतिषिद्ध कर सकेगी जब तक उसके साथ धारा 7 के अधीन जारी किया गया वह प्रमाणपत्र न हो कि वह वस्तु क्वालिटी नियंत्रण या निरीक्षण से संबंधित शर्तों को पूरा करती है या उस पर केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्य चिह्न या मुद्रा लगी हुई है जो यह दर्शित करती है कि वह खण्ड (ग) के अधीन उसे लागू मानक विनिर्देशों के अनुरूप है ।
7. क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण के लिए संगठन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, क्वालिटी नियंत्रण या निरीक्षण या दोनों के लिए ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जैसी वह ठीक समझे, अभिकरण स्थापित कर सकेगी या उन्हें मान्यता दे सकेगी:
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि इस उपधारा के अधीन किसी अभिकरण को दी गई मान्यता, लोकहित में वापस ली जानी चाहिए, तो केन्द्रीय सरकार, उस अभिकरण को उस विषय में अभ्यावेदन करने के लिए उचित अवसर देने के पश्चात् वैसी ही अधिसूचना द्वारा उसे दी गई मान्यता वापस ले सकेगी ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई अभिकरण उसे किए गए आवेदन पर या अन्यथा, ऐसी परीक्षा कर सकेगा या करवा सकेगा, जैसा वह ठीक समझे । यह परीक्षा या तो निर्यात के समय या पहले ऐसे परीक्षण गृहों में या ऐसे सर्वेक्षकों या नमूना-परीक्षकों द्वारा अधिसूचित वस्तुओं के क्वालिटी नियंत्रण या निरीक्षण के संबंध में की जाएगी जो इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है और अभिकरण ऐसी फीसें प्रभारित कर सकेगा, जो ऐसी परीक्षा के प्रयोजन के लिए विहित की जाएं ।
(3) यदि परीक्षा के पश्चात् अभिकरण की यह राय है कि वह वस्तु, यथास्थिति, धारा 6 के अधीन उसके बारे में अधिकथित मानक विनिर्देशों या निर्यात संविदा में नियत किन्हीं अन्य विनिर्देशों को पूरा करती है, तो वह यह प्रमाणपत्र जारी कर सकेगा कि वह वस्तु क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण से संबंधित शर्तें पूरी करती है ।
[(3क) जहां अभिकरण के पास यह विश्वास करने का कारण है कि उपधारा (3) के अधीन जारी किया गया प्रमाणपत्र कपटपूर्वक या दुर्व्यपदेशन द्वारा प्राप्त किया गया है या ऐसी वस्तु जिसके सबंध में प्रमाणपत्र जारी किया गया है परिवर्तित कर दी गई है या उसकी क्वालिटी गिर गई है, वहां अभिकरण आदेश द्वारा ऐसे प्रमाणपत्र को ऐसी रीति से और ऐसी प्रक्रिया के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाए, संशोधित, निलंबित या रद्द कर सकेगा:
परन्तु किसी ऐसे प्रमाणपत्र को संशोधित, निलंबित या रद्द करने से पूर्व, उसके धारक को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।]
(4) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण के प्रमाणपत्र जारी करने से इंकार करने से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसी तारीख के भीतर जो विहित की जाए, अपील कर सकेगा । यह अपील ऐसे प्राधिकारी को होगी जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अपीलों की सुनवाई के प्रयोजन के लिए, नियत करे ।
(5) उपधारा (6) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां कोई अपील फाइल नहीं की गई है, वहां अभिकरण का विनिश्चय और जहां अपील फाइल की गई है, वहां अपील प्राधिकारी का विनिश्चय, अंतिम होगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
(6) केन्द्रीय सरकार, किसी भी समय इस धारा के अधीन किसी अभिकरण या अपील प्राधिकारी के किसी विनिश्चय से संबंधित किसी कार्यवाही का अभिलेख ऐसे विनिश्चय की वैधता या औचित्य के बारे में अपना समाधान करने के प्रयोजन के लिए, मांग सकेगी और उसकी परीक्षा कर सकेगी तथा उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगी, जैसा वह ठीक समझे ।
8. मानक विनिर्देशों से अनुरूपता दिखाने के लिए चिह्नों की मान्यता देने या स्थापित करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी अधिसूचित वस्तु के संबंध में, यह दिखाने के प्रयोजन के लिए कि वह वस्तु उसके लागू होने वाले मानक विनिर्देश के अनुरूप है, किसी चिह्न या मुद्रा को मान्यता दे सकेगी या स्थापित कर सकेगी ।
(2) किसी अधिसूचित वस्तु पर ऐसे किसी चिह्न या उस पर चिपकाई या लगाई गई मुद्रा अथवा ऐसी वस्तु के किसी आवरक या उस पर लगे हुए लेबल के बारे में यह समझा जाएगा कि वह वस्तु इस अधिनियम के अधीन उसको लागू होने वाले मानक निर्देशों के अनुरूप है:
परन्तु इस उपधारा की कोई भी बात किसी सीमाशुल्क अधिकारी को निर्यात के लिए आशयित किसी अधिसूचित वस्तु के किसी परेषण की परीक्षा करने से नहीं रोकेगी, यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि मुद्रा या चिह्न असली नहीं हैं या कपटपूर्ण रीति से चिपकाए गए हैं या लगाए गए हैं या यदि उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के प्रयोजन के लिए ऐसी परीक्षा आवश्यक है ।
9. निर्यातकर्ताओं आदि से जानकारी प्राप्त करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अधिकारी या प्राधिकारी, राजपत्र में प्रकाशित सूचना द्वारा-
(i) अधिसूचित वस्तुओं का विनिर्माण, व्यवहार या निर्यात करने वाले व्यक्तियों से, और
(ii) ऐसे अन्य व्यक्तियों से, जो विहित किए जाएं,
कोई ऐसी जानकारी, विवरणी या रिपोर्ट देने की अपेक्षा कर सकेगा जिसे केन्द्रीय सरकार या ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी इस अधिनियम के प्रयोजन को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक समझे ।
10. वित्त, लेखे और लेखापरीक्षा-(1) इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के लिए परिषद् को सक्षम बनाने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात् परिषद् को ऐसी धनराशियां संदत्त कर सकेगी जिन्हें केन्द्रीय सरकार अनुदानों या उधारों के रूप में या अन्यथा आवश्यक समझे ।
(2) इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए परिषद् इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित निकायों और संस्थाओं से अनुदान या संदान प्राप्त कर सकेगी ।
(3) परिषद् की अपनी एक निधि होगी, जिसमें उपधारा (1) और उपधारा (2) में निर्दिष्ट धनराशियां जमा की जाएंगी और निधि का धन-
(क) परिषद् के अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा परिषद् के अन्य प्रशासनिक व्यय को पूरा करने के लिए,
(ख) इस अधिनियम के अधीन परिषद् के कृत्यों को कार्यान्वित करने के लिए, लगाया जाएगा ।
(4) परिषद् प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ के पूर्व उस वर्ष के दौरान अपने कार्यकलापों के कार्यक्रम की बाबत और उसके बारे में एक वित्तीय प्राक्कलन भी तैयार करेगी ।
(5) उपधारा (4) के अधीन तैयार किया गया विवरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ से तीन मास के पहले केन्द्रीय सरकार को अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किया जाएगा ।
(6) परिषद् ऐसे लेखे रखेगी और ऐसे प्ररूप में तुलनपत्र तैयार करेगी जो भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित किया जाए ।
(7) परिषद् के लेखे ऐसी रीति से रखे जाएंगे और ऐसे समय पर उनकी लेखापरीक्षा की जाएगी, जो भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित किया जाए ।
[10क. प्रवेश और निरीक्षण करने की शक्ति-निरीक्षण और क्वालिटी नियंत्रण निदेशक या उसके द्वारा इस निमित्त लिखित रूप से प्राधिकृत केन्द्रीय सरकार का कोई अधिकारी (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्राधिकृत अधिकारी कहा गया है) किसी भी युक्तियुक्त समय पर किसी ऐसे परिसर में प्रवेश कर सकेगा जिसके बारे में यह संदेह है कि-
(क) कोई ऐसी वस्तु, जो धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण द्वारा निरीक्षण किए जाने के पश्चात् परिवर्तित कर दी गई है; या
(ख) ऐसी लेखाबहियां या अन्य दस्तावेज या चीजें जो उसकी राय में इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में उपयोगी या सुसंगत होंगी,
वहां रखी गई हैं या छिपाई गई हैं और ऐसी वस्तु, लेखाबहियों, अन्य दस्तावेजों या चीजों का निरीक्षण कर सकेगा और ऐसी लेखाबहियों या अन्य दस्तावेजों से, ऐसे टिप्पण या उद्धरण ले सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
10ख. तलाशी लेने की शक्ति-यदि प्राधिकृत अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कोई कारण है कि-
(क) कोई ऐसी वस्तु, जो धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण द्वारा निरीक्षण किए जाने के पश्चात् परिवर्तित कर दी गई है; या
(ख) ऐसी लेखाबहियां या अन्य दस्तावेज या चीजें, जो उसकी राय में इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में उपयोगी या सुसंगत होंगी,
किसी स्थान में गुप्त रखी गई हैं, तो वह ऐसे स्थान या परिसरों में प्रवेश कर सकेगा और ऐसी वस्तु, लेखाबहियों, अन्य दस्तावेजों या चीजों की तलाशी ले सकेगा ।
10ग. वस्तुओं आदि को अभिग्रहण करने की शक्ति-(1) यदि प्राधिकृत अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कोई कारण है कि कोई वस्तु इस अधिनियम के अधीन अधिहरण के लिए दायी है, तो वह ऐसी वस्तु को उसके ऐसे पैकेज, आवरण या आधान सहित, यदि कोई हो, जिसमें ऐसी वस्तु पाई जाती है, अभिगृहीत कर सकेगा और जहां ऐसी वस्तु किसी अन्य माल या सामग्री के साथ मिश्रित की गई पाई जाती है वहां वह ऐसी वस्तु को उस माल या सामग्री सहित जिसमें वह इस प्रकार मिश्रित की गई है, अभिगृहीत कर सकेगा :
परन्तु जहां किसी ऐसी वस्तु को अभिगृहीत करना साध्य न हो, वहां प्राधिकृत अधिकारी ऐसी वस्तु के स्वामी पर आदेश की तामील कर सकेगा कि वह ऐसे प्राधिकृत अधिकारी की पूर्व अनुज्ञा के बिना ऐसी वस्तु को न तो हटाएगा, न उससे अलग होगा, और न उसके विषय में अन्यथा संव्यवहार करेगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी वस्तु को अभिगृहीत किया गया है और उसकी बाबत धारा 10ठ के अधीन ऐसी वस्तु के अभिग्रहण से छह मास के भीतर कोई सूचना नहीं दी गई है, वहां ऐसी वस्तु को उस व्यक्ति को वापस किया जाएगा जिसके कब्जे से उसे अभिगृहीत किया गया था:
परन्तु छह मास की पूर्वोक्त अवधि को पर्याप्त हेतुक दर्शित किए जाने पर निरीक्षण और क्वालिटी नियंत्रण निदेशक द्वारा अधिक से अधिक छह मास की और अवधि के लिए बढ़ाया जा सकेगा ।
(3) प्राधिकृत अधिकारी, ऐसी किसी दस्तावेज या चीजों को जो उसकी राय में इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में उपयोगी या उससे सुसंगत होंगी, अभिगृहीत कर सकेगा ।
(4) ऐसा व्यक्ति, जिसकी अभिरक्षा से किन्हीं दस्तावेजों को उपधारा (3) के अधीन अभिगृहीत किया जाता है, प्राधिकृत अधिकारी की उपस्थिति में उसकी प्रतियां बनाने या उससे उद्धरण लेने का हकदार होगा ।
(5) यदि उपधारा (3) के अधीन अभिगृहीत दस्तावेजों या चीजों का विधिक रूप से हकदार व्यक्ति, प्राधिकृत अधिकारी द्वारा उनके प्रतिधारण के विरुद्ध, किसी कारण से आक्षेप करता है तो, वह केन्द्रीय सरकार को आवेदन कर सकेगा जिसमें ऐसे आक्षेप के कारण होंगे और ऐसी दस्तावेजों या चीजों को वापस करने के लिए अनुरोध होगा ।
(6) उपधारा (5) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार आवेदक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् ऐसे आदेश पारित कर सकेगी जो वह ठीक समझे ।
(7) जहां कोई दस्तावेज-
(क) किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत या पेश की जाती है या इस अधिनियम या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी व्यक्ति की अभिरक्षा या नियंत्रण से अभिगृहीत की गई है; या
(ख) इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अभिकथित अपराध के अन्वेषण के दौरान भारत के बाहर किसी स्थान से (विहित प्राधिकारी या व्यक्ति द्वारा विहित रूप में अधिप्रमाणित) प्राप्त होती है,
और ऐसी दस्तावेजों को साक्ष्य के रूप में ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिसके द्वारा वह प्रस्तुत की गई है या जिससे उसे अभिगृहीत किया गया था या ऐसे व्यक्ति और ऐसे किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध जिनका विचारण संयुक्त रूप से किया गया है या जिसके विरुद्ध कार्यवाही की गई है वहां, यथास्थिति, न्यायालय या न्यायनिर्णयन प्राधिकारी उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, -
(i) जब तक कि प्रतिकूल साबित नहीं हो जाता है यह उपधारणा करेगा कि ऐसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर और ऐसी दस्तावेज का प्रत्येक भाग उस व्यक्ति के हस्तलेख में है, जो किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तलेख में होना तात्पर्यित है या जिसके बारे में न्यायालय या न्यायनिर्णयन प्राधिकारी, युक्तियुक्त रूप से यह धारणा कर सकेगा कि वह किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित है या उसके हस्तलेख में है, और किसी ऐसी दस्तावेज की दशा में जो निष्पादित या अनुप्रमाणित की गई है, यह उपधारणा करेगा कि वह ऐसे व्यक्ति द्वारा निष्पादित या अनुप्रमाणित है जिसके द्वारा उसे इस प्रकार निष्पादित या अनुप्रमाणित किया जाना तात्पर्यित है ;
(ii) दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में ग्रहण करेगा, इस बात के होते हुए भी कि दस्तावेज सम्यक् रूप से स्टाम्पित नहीं है, यदि ऐसा दस्तावेज साक्ष्य में अन्यथा ग्राह्य है ।
10घ. वाहनों को रोकने और अभिग्रहण करने की शक्ति-कोई प्राधिकृत अधिकारी, यदि उसके पास यह संदेह करने का कारण है कि किसी वाहन या पशु का, जो इस अधिनियम के अधीन अधिग्रहण के लिए दायी है, किसी वस्तु के परिवहन के लिए उपयोग किया जा रहा है या उपयोग किया जाने वाला है और यह कि इस प्रकार परिवहन किए जाने से इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन किया गया है या किया जा रहा है या किसी भी समय किया जाने वाला है, तो वह ऐसे वाहन या पशु को रोक सकेगा या किसी वायुयान की दशा में उसे भूमि पर उतरने के लिए विवश कर सकेगा और-
(क) वाहन या उसके किसी भाग की छानबीन कर सकेगा या उसकी तलाशी ले सकेगा;
(ख) वाहन में के या पशु पर के किसी माल या किसी सामग्री की जांच कर सकेगा और तलाशी ले सकेगा;
(ग) यदि किसी वाहन या पशु को रोकना आवश्यक हो जाता है, तो वह उसे रोकने के लिए सभी विधिपूर्ण साधनों का प्रयोग कर सकेगा और जहां ऐसे साधन असफल हो जाते हैं, वहां ऐसे वाहन या पशु पर गोली चलाई जा सकेगी,
और जहां उसका यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक है, वहां वह ऐसे वाहन या पशु को अभिगृहीत कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में किसी वाहन के प्रति निर्देश का अर्थ, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, यह लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत किसी वायुयान, यान या जलयान के प्रति निर्देश भी है ।
10ङ. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अनुसार तलाशी और अभिग्रहण किया जाना-तलाशी और अभिग्रहण से संबंधित दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध यावत्शक्य इस अधिनियम के अधीन की गई प्रत्येक तलाशी या अभिग्रहण को लागू होंगे ।
10च. अधिहरण-कोई वस्तु जिसके संबंध में-
(क) कोई प्रमाणपत्र धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण से कपटपूर्वक या दुर्व्यपदेशन द्वारा प्राप्त किया गया है; या
(ख) इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन किया गया है, किया जा रहा है या किए जाने का प्रयत्न किया गया है, किसी ऐसे पैकेज, आवरण या आधान सहित, जिसमें ऐसी वस्तु पाई जाती है, अधिग्रहण के लिए दायी होगी और जहां ऐसी वस्तु का किसी अन्य माल या सामग्री से इस प्रकार मिश्रण कर दिया गया है कि उसे आसानी से पृथक् नहीं किया जा सकता है, वहां ऐसा अन्य माल या ऐसी अन्य वस्तुएं भी अधिहरण के लिए दायी होंगी:
परन्तु जहां न्यायनिर्णयन प्राधिकारी के समाधानप्रद रूप में यह सिद्ध कर दिया जाता है कि ऐसी कोई वस्तु जो इस अधिनियम के अधीन अधिग्रहण के लिए दायी है, ऐसे व्यक्ति से भिन्न व्यक्ति की है जिसने किसी कार्य या लोप द्वारा उसे अधिहरण के लिए दायी बनाया है और ऐसा कार्य या लोप ऐसे व्यक्ति की जानकारी या मौनानुकूलता के बिना किया गया था, जिसकी वह वस्तु थी, वहां ऐसी वस्तु के अधिहरण के लिए आदेश नहीं दिया जाएगा, किन्तु ऐसी अन्य कार्रवाई जो इस अधिनियम के अधीन प्राधिकृत की जाए, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध की जा सकेगी जिसने ऐसे कार्य या लोप द्वारा ऐसी वस्तु को अधिहरण के लिए दायी बनाया है ।
10छ. वाहन का अधिहरण-ऐसा कोई वाहन या पशु जिसका किसी ऐसी वस्तु के जो इस अधिनियम के अधीन अधिहरण के लिए दायी है परिवहन के लिए उपयोग किया गया है या किया जा रहा है या किए जाने के लिए प्रयत्न किया गया है अधिहरण के लिए दायी होगी जब तक कि वाहन या पशु का स्वामी यह साबित नहीं कर देता है कि उसका उपयोग स्वयं स्वामी, उसके अभिकर्ता, यदि कोई हों, और वाहन या पशु के भारसाधक व्यक्ति की जानकारी या उसकी-मौनानुकूलता के बिना किया गया था, किया जा रहा है या किया जाने वाला है और उनमें से प्रत्येक ने ऐसे उपयोग के विरुद्ध सभी युक्तियुक्त पूर्वावधानियां बरती थीं :
परन्तु माल के या भाडे़ पर यात्रियों के परिवहन के लिए उपयोग किए गए किसी वाहन या पशु की दशा में, वाहन या पशु के स्वामी को, वाहन पशु के अधिहरण के बदले में ऐसी वस्तुओं के जिनका ऐसे वाहन या पशु द्वारा परिवहन किया गया है, किया जा रहा है या किए जाने के लिए प्रयत्न किया गया है, मूल्य से अनधिक जुर्माना देने के लिए विकल्प दिया जाएगा ।
10ज. अधिहरण के बदले में जुर्माना देने का विकल्प-जब कभी किसी वस्तु का अधिहरण इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत किया जाता है, तब उसे न्यायनिर्णीत करने वाला अधिकारी धारा 105 के परन्तुक के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उस वस्तु के स्वामी को अधिहरण के बदले में ऐसा जुर्माना देने का विकल्प देगा जो उस वस्तु के मूल्य से अधिक नहीं होगा ।
10झ. शास्ति के लिए दायित्व-कोई व्यक्ति जो, -
(क) किसी वस्तु के संबंध में ऐसा कार्य करेगा या करने में लोप करेगा जो कार्य या लोप ऐसी वस्तु को इस अधिनियम के अधीन अधिहरण का दायी बनाएगा या ऐसे कार्य के करने या लोप करने के लिए दुष्प्रेरण करेगा; या
(ख) किसी ऐसी वस्तु का, जिसके बारे में वह जानता है या उसके पास विश्वास करने का कारण है कि वह इस अधिनियम के अधीन अधिहरण के लिए दायी है, कब्जा प्राप्त करेगा या किसी प्रकार से उसके ले जाने, हटाने, जमा करने, रखने, छिपाने, बेचने या क्रय करने में या किसी भी रीति से उसके विषय में संव्यवहार करने में संबंधित होगा,
शास्ति के लिए दायी होगा जो वस्तु के मूल्य के पांच गुने से या पांच हजार रुपए से इसमें से जो भी अधिक हो, अधिक नहीं होगी चाहे ऐसी वस्तु का अधिहरण किया गया है अथवा नहीं या वह अधिहरण के लिए उपलब्ध है अथवा नहीं ।
10ञ. अधिहरण या शास्ति के अन्य दंडों में हस्तक्षेप न होना-इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन किया गया कोई अधिहरण या अधिरोपित शास्ति किसी ऐसे अन्य दण्ड को देने से निवारित नहीं करेगी जिसके लिए उससे प्रभावित व्यक्ति इस अधिनियम या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन दायी है ।
10ट. न्यायनिर्णयन- इस अधिनियम के अधीन, निरीक्षण और क्वालिटी नियंत्रण निदेशक द्वारा अथवा जहां वह ऐसा निदेश देता है, वहां उसके अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा किसी अधिहरण के लिए न्यायनिर्णयन किया जा सकेगा या शास्ति अधिरोपित की जा सकेगी ।
10ठ. माल, आदि के स्वामी को अवसर दिया जाना-अधिहरण या शास्ति अधिरोपित करने के न्यायनिर्णयन के लिए कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि वस्तु, वाहन या पशु के स्वामी या अन्य संबंधित व्यक्ति को लिखित सूचना-
(क) ऐसे आधारों को सूचित करते हुए जिन पर ऐसी वस्तु, वाहन या पशु के अधिहरण के लिए या कोई शास्ति अधिरोपित करने के लिए प्रस्ताव किया गया है;
(ख) उसमें वर्णित अधिहरण या शास्ति के अधिरोपण के विरुद्ध, ऐसे युक्तियुक्त समय के भीतर जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, लिखित अभ्यावेदन करने के लिए युक्तियुक्त अवसर देते हुए और यदि वह ऐसी वांछा करे तो उसे मामले की सुनवाई का अवसर देते हुए,
नहीं दे दी जाती है ।
10ड. अपील-(1) इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, -
(क) जहां ऐसा विनिश्चय या आदेश निरीक्षण और क्वालिटी नियंत्रण निदेशक द्वारा किया गया है, वहां केन्द्रीय सरकार को;
(ख) जहां ऐसा विनिश्चय या आदेश निरीक्षण और क्वालिटी नियन्त्रण निदेशक के अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा, किया गया है, वहां निरीक्षण और क्वालिटी नियन्त्रण निदेशक को,
ऐसी तारीख से जिसको ऐसे व्यक्ति पर ऐसे विनिश्चय या आदेश की तामील की जाती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर अपील कर सकेगा:
परन्तु अपील प्राधिकारी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त हेतुक से, पूर्वोक्त पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर, अपील करने से निवारित किया गया था, तो वह पैंतालीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर ऐसी अपील करने के लिए अनुज्ञा दे सकेगा:
परन्तु यह और कि शास्ति अधिरोपित करने वाले आदेश के विरुद्ध अपील की दशा में, ऐसी कोई अपील तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक कि अपीलार्थी द्वारा शास्ति की रकम जमा न कर दी जाए:
परन्तु यह भी कि जहां अपील प्राधिकारी की यह राय है कि जमा की जाने वाली रकम से अपीलार्थी को असम्यक् कठिनाई होगी, वहां वह अपने विवेकानुसार या तो शर्त के बिना या ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो वह अधिरोपित करे, ऐसी रकम को जमा करने से अभियुक्ति दे सकेगा ।
(2) अपील प्राधिकारी, अपीलार्थी को, यदि वह ऐसी वांछा करे तो सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, और ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात् यदि कोई हो, जो वह आवश्यक समझे, उस विनिश्चय या आदेश की जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करते हुए, उसे उपांतरित करते हुए या उलटते हुए ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे या मामले को ऐसे निदेशों सहित, जो वह ठीक समझे अतिरिक्त साक्ष्य, यदि आवश्यक हो, लेने के पश्चात्, यथास्थिति, फिर से न्यायनिर्णयन या विनिश्चय के लिए वापस भेज सकेगा :
परन्तु इस धारा के अधीन किसी शास्ति में वृद्धि करने वाला या उसे अधिरोपित करने वाला या अधिक मूल्य की वस्तु का अधिहरण करने वाला कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक की अपीलार्थी को अभ्यावेदन करने का और यदि वह ऐसी वांछा करे तो उसे अपनी प्रतिरक्षा में सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो ।
10ढ. पुनरीक्षण की शक्तियां-केन्द्रीय सरकार स्वविवेकानुसार या अन्यथा किसी ऐसी कार्यवाही के अभिलेखों को मंगा सकेगा और उनकी परीक्षा कर सकेगी जिनमें अधिहरण के या शास्ति अधिरोपित करने के न्यायनिर्णयन का कोई आदेश किसी अधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन किया गया है और जिसके विरुद्ध ऐसे आदेश या विनिश्चय की सत्यता, वैधता या औचित्य के बारे में समाधान करने के प्रयोजनों के लिए कोई अपील नहीं की गई है और उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगी, जो वह ठीक समझे:
परन्तु इस धारा के अधीन किसी विनिश्चय या आदेश को इस प्रकार परिवर्तित नहीं किया जाएगा जिससे कि किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पडे़, जब तक कि-
(क) ऐसे व्यक्ति ने ऐसे विनिश्चय या आदेश की तारीख से दो वर्ष की अवधि के भीतर यह हेतुक दर्शित करने के लिए सूचना प्राप्त न कर ली हो कि ऐसे विनिश्चय या आदेश को परिवर्तित क्यों न किया जाए; और
(ख) ऐसे व्यक्ति को अभ्यावेदन करने के लिए, युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो और यदि वह ऐसी वांछा करता है तो अपनी प्रतिरक्षा के लिए सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो ।
10ण. न्यायनिर्णयन और अन्य प्राधिकारियों की शक्तियां-(1) इस अधिनियम के अधीन, न्यायनिर्णयन या किसी अपील की सुनवाई करने वाले या पुनरीक्षण की किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने वाले प्रत्येक प्राधिकारी को, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी, अर्थात्: -
(क) साक्षियों को समन करना और उन्हें हाजिर कराना;
(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि की अध्यपेक्षा करना;
(घ) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; और
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(2) इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णयन या किसी अपील की सुनवाई करने वाले या पुनरीक्षण की किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने वाले प्रत्येक प्राधिकारी को, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के अधीन कोई न्यायनिर्णयन या किसी अपील की सुनवाई करने वाले या पुनरीक्षण की किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने वाले प्रत्येक प्राधिकारी को अंतरिम प्रकृति के ऐसे आदेश करने की शक्ति होगी जो वह ठीक समझे और यह पर्याप्त हेतुक से किसी विनिश्चय या आदेश के प्रवर्तन को रोक देने के लिए भी आदेश कर सकेगा ।
10त. मृत्यु या दिवालिया हो जाने की दशा में कार्यवाहियों का चालू रहना-(1) जहां न्यायनिर्णयन प्राधिकारी द्वारा शास्ति अधिरोपित की गई है, और-
(क) ऐसी शास्ति अधिरोपित करने वाले आदेश के विरुद्ध अपील प्राधिकारी के समक्ष कोई अपील नहीं की गई है और ऐसी अवधि की समाप्ति के पूर्व जिसके भीतर अपील की जा सकती है, अपील फाइल करने के लिए हकदार व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या वह दिवालिया न्यायनिर्णीत हो जाता है; या
(ख) ऐसी शास्ति अधिरोपित करने वाले आदेश के विरुद्ध अपील प्राधिकारी के समक्ष अपील फाइल की गई किन्तु अपील के लंबित रहने के दौरान अपीलार्थी की मृत्यु हो जाती है या वह दिवालिया न्यायनिर्णीत कर दिया जाता है,
वहां, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि या शासकीय रिसीवर के लिए ऐसे व्यक्ति के स्थान पर, यथास्थिति, अपील प्राधिकारी को अपील करना या अपील प्राधिकारी के समक्ष अपील को चालू रखना, विधिपूर्ण होगा और धारा 10ड के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी अपील को लागू होंगे या लागू होते रहेंगे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन शासकीय समनुदेशित या शासकीय रिसीवर की शक्तियों का प्रयोग उसके द्वारा, यथास्थिति, प्रेसीडेन्सी नगर दिवाला अधिनियम, 1909 (1909 का 3) या प्रान्तीय दिवाला अधिनियम, 1920 (1920 का 5) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए किया जाएगा ।]
11. शास्ति-(1) यदि कोई व्यक्ति धारा 6 के खण्ड (घ) के अधीन किसी आदेश का उल्लंघन करेगा या धारा 7 के अधीन कपटपूर्वक कोई प्रमाणपत्र प्राप्त करेगा या धारा 8 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट कपटपूर्वक चिह्न या मुद्रा लगाएगा तो वह दोषसिद्धि पर-
(i) प्रथम अपराध के लिए, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डनीय होगा:
(ii) द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराध के लिए कारावास से, जिसकी अवधि [तीन वर्ष] तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा, और विशेष तथा पर्याप्त कारणों के अभाव में, जो न्यायालय के निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे, ऐसा कारावास तीन मास से कम का नहीं होगा ।
(2) कोई व्यक्ति जो उपधारा (1) के अधीन दंडनीय कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा, या उसके लिए दुष्प्रेरण करेगा, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने ऐसा अपराध किया है ।
(3) यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध का या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या आदेशों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उल्लंघन करने के लिए दुष्प्रेरण करेगा तो वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
[11क. न्यायनिर्णयन प्राधिकारी या अपील प्राधिकारी द्वारा किए गए आदेश के उल्लंघन के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति न्यायनिर्णयन प्राधिकारी या अपील प्राधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहेगा या इस अधिनियम के अधीन, किए गए या किए गए समझे गए किसी निदेश या आदेश का अनुपालन करने में असफल रहेगा तो वह दोषसिद्धि पर कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
11ख. अभिकरण, आदि के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा अपराध-(1) यदि परिषद् का अथवा धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण का कोई अधिकारी या कर्मचारी या उस धारा की उपधारा (2) में निर्दिष्ट परीक्षण-गृह का कोई सर्वेक्षक या नमूना-परीक्षक या कोई कर्मचारी कोई ऐसा कार्य या ऐसी बात करने के लिए या उससे प्रविरत रहने के लिए, जिससे इस अधिनियम के किसी उपबन्ध का उल्लंघन हुआ है या हो सकता है, कोई करार करेगा या उपमत होगा, उसके लिए अनुज्ञा देगा, उसे छिपाएगा या उसके प्रति मौनानुकूल रहेगा तो वह दोषसिद्धि पर कारावास से, जो दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) यदि कोई अधिकारी किसी ऐसे स्थान की, जिसके बारे में यह विश्वास करने का कारण न हो कि उसमें धारा 10ख में निर्दिष्ट प्रकृति की कोई वस्तु, लेखाबहियां या दस्तावेजें, या चीजें छिपाई गई हैं, तलाशी लेगा या केन्द्रीय सरकार के किसी अन्य अधिकारी को तलाशी लेने के लिए प्राधिकृत करेगा, तो वह दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(3) यदि परिषद् का या धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण का कोई अधिकारी या कर्मचारी अथवा उस धारा की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी परीक्षण-गृह का कोई सर्वेक्षक, नमूना-परीक्षक या कर्मचारी ऐसे अधिकारी या कर्मचारी के रूप में अपने कर्तव्य के निर्वहन में सद्भावपूर्वक या उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन की गई किसी अध्यपेक्षा के अनुपालन में प्रकट करने के सिवाय, किसी वस्तु की बाबत अपनी पदीय हैसियत में उसको ज्ञात किन्हीं विशिष्टियों को प्रकट करेगा, तो वह दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्मान से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडनीय होगा ।
11ग. लेखन या गणित संबंधी भूलों की शुद्धि-किसी विनिश्चय या आदेश में किसी लेखन या गणित संबंधी भूलों या उसमें किसी आकस्मिक भूल या लोप के कारण हुई गलतियों को ऐसा प्राधिकारी, जिसने ऐसा विनिश्चय या आदेश या तो स्वयं या व्यथित व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर किया था, किसी भी समय, शुद्ध कर सकेगा:
परन्तु जहां इस धारा के अधीन किए जाने के लिए प्रस्तावित कोई शुद्धि किसी व्यक्ति को प्रतिकूलतः प्रभावित करेगी, वहां ऐसी शुद्धि, उस व्यक्ति को इस विषय में अभ्यावेदन करने के लिए युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् ही की जाएगी अन्यथा नहीं और ऐसी कोई शुद्धि, ऐसी तारीख से, जिसको ऐसा विनिश्चय या आदेश किया गया था, दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं की जाएगी ।]
12. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो उस उल्लंघन के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे, और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई भी बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनीके किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
13. शक्तियों का प्रत्यायोजन-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली कोई शक्ति ऐसे विषयों के सम्बन्ध में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, निम्नलिखित द्वारा भी प्रयोग की जा सकेगी-
(क) परिषद्;
(ख) केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी या ऐसी राज्य सरकार या उस राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी, जो ऐसे निदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
14. अभियोजन के लिए प्रक्रिया-इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए कोई भी अभियोजन इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत अधिकारी के साधारण या विशेष आदेश के बिना या उसकी सहमति के बिना, संस्थित नहीं किया जाएगा ।
15. अभिकरण के अधिकारियों तथा कर्मचारियों का लोक सेवक होना-परिषद् के या धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित या मान्य किसी अभिकरण के सभी अधिकारी या कर्मचारी और उस धारा की उपधारा (2) में निर्दिष्ट परीक्षण-गृह के सभी सर्वेक्षक नमूना-परीक्षक तथा कर्मचारी इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियम के उपबन्धों या आदेश के अनुसरण में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखने वाले, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
16. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी भी नियम या आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी भी बात के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, परिषद् या सरकार या परिषद् के किसी कर्मचारी या अधिकारी या धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण के विरुद्ध नहीं होगी ।
(2) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या सद्भावपूर्वक की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या सम्भाव्यतः होने वाले किसी नुकसान के लिए सरकार के विरुद्ध कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।
[16क. अधिनियम के उपबन्धों के प्रवर्तन का निलंबन, आदि-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं, जिनके कारण लोक हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसी अधिसूचित वस्तु या साधारणतया वस्तुओं के संबंध में या किसी क्षेत्र के संबंध में और ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबंधों के प्रवर्तन को निलम्बित या किसी विनिर्दिष्ट विस्तार तक शिथिल कर सकेगी ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन इस अधिनियम के किसी उपबंध के प्रवर्तन को निलम्बित या शिथिल किया गया है, वहां ऐसे निलम्बन या शिथिलीकरण को, केन्द्रीय सरकार द्वारा, वैसी ही अधिसूचना द्वारा, किसी भी समय हटाया जा सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह वह अधिसूचना नहीं निकाली जानी चाहिए, तो तत्पश्चात् वह, निष्प्रभाव हो जाएगी । किन्तु अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस अधिसूचना के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
17. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित का उपबन्ध कर सकेंगे: -
(क) परिषद् के सदस्यों, धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन सहयोजित व्यक्तियों तथा उस धारा की उपधारा (3) में निर्दिष्ट विशेषज्ञ समितियों के सदस्यों को संदेय यात्रा तथा दैनिक भत्ते;
(ख) परिषद् के कृत्य तथा उसके द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(ग) परिषद् के अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति;
(घ) विभिन्न प्रकार के क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण के लिए अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(ङ) वे शर्तें, जिन्हें परीक्षण-गृह, सर्वेक्षक या नमूना-परीक्षक को, केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन के प्रयोजनों के लिए पूरा करना चाहिए;
(च) धारा 7 के अधीन परीक्षा तथा प्रमाणपत्र जारी करने के प्रयोजनों के लिए प्रभार्य फीसें;
[(चच) वह रीति, जिससे और ऐसी प्रक्रिया, जिसके अधीन रहते हुए, धारा 7 की उपधारा (3) के अधीन जारी किए गए किसी प्रमाणपत्र को संशोधित, निम्नलिखित या रद्द किया जाएगा;]
(छ) धारा 7 के अधीन अपीलों को फाइल किया जाना तथा उसके लिए संदेय फीसें;
2[(छछ) वह प्राधिकारी या व्यक्ति, जिसके द्वारा और वह रीति, जिससे भारत के बाहर के किसी स्थान से प्राप्त किसी दस्तावेज को अधिप्रमाणित किया जाएगा;]
(ज) वह रीति, जिसमें परिषद् के लेखे रखे जाएंगे और उनकी लेखापरीक्षा की जाएगी;
(झ) कोई अन्य विषय, जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।
[(3) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व, दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
18. अधिनियम का अन्य अधिनियमितियों पर अध्यारोही होना-उस तारीख से, जिससे धारा 6 के खण्ड (क) के अधीन कोई वस्तु अधिसूचित की जाती है, इस अधिनियम के उपबन्ध या उसके अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति या किसी अन्य लिखत में, जो इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के आधार पर प्रभावी है, अन्तर्विष्ट किन्हीं ऐसे उपबन्धों के होते हुए भी (जो ऐसी वस्तु के निर्यात-पूर्व क्वालिटी नियंत्रण और निरीक्षण से सम्बन्धित है) उस वस्तु के सम्बन्ध में प्रभावी होगी ।
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