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पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 ( Antiquities and Art Treasures Act, 1972 )


 

पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972

(1972 का अधिनियम संख्यांक 52)

[9 सितम्बर, 1972]

पुरावशेषों तथा बहुमूल्य कलाकृतियों का निर्यात-व्यापार विनियमित करने,

पुरावशेषों की तस्करी तथा उनमें कपटपूर्ण संव्यवहार के निवारण,

सार्वजनिक स्थानों में पुरावशेषों तथा बहुमूल्य कलाकृतियों के

रखे जाने के लिए उनके अनिवार्य अर्जन और उनसे सम्बद्ध

अथवा संसक्त या आनुषंगिक कतिपय अन्य

विषयों के बारे में उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार तथा प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति,अधिनियम, 1972 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।       

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए तथा विभिन्न राज्यों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे उपबन्ध में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबन्ध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) पुरावशेष" के अन्तर्गत है,-

(i) कम से कम एक सौ वर्षों से विद्यमान,-

(i) कोई सिक्का, मूर्ति, रंगचित्र, पुरालेख अथवा कला या शिल्पकारी की कोई अन्य कृति;

(ii) किसी भवन या गुफा से निकाली गई कोई वस्तु, पदार्थ या चीज;

(iii) कोई वस्तु, पदार्थ या चीज जो गत युगों के विज्ञान, कला, शिल्प, साहित्य, धर्म, रूढ़ि, नैतिक आचार या राजनीति की दृष्टांतस्वरूप है;

(iv) ऐतिहासिक महत्व की कोई वस्तु, पदार्थ या चीज;

(v) कोई ऐसी वस्तु, पदार्थ या चीज जिसे केन्द्रीय सरकार ने, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ पुरावशेष घोषित किया है; और

(ii) ऐसी कोई पांडुलिपि, अभिलेख अथवा अन्य दस्तावेज जो वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक अथवा सौन्दर्य की दृष्टि से महत्व की है और जो कम से कम पचहत्तर वर्षों से विद्यमान है;

(ख) बहुमूल्य कलाकृति" से ऐसी मानवीय कलाकृति अभिप्रेत है जो पुरावशेष नहीं है और जिसे उसके कला या सौंदर्य की दृष्टि से महत्व को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार ने, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ बहुमूल्य कलाकृति घोषित किया है :

परन्तु किसी ऐसी कलाकृति के बारे में इस खंड के अधीन कोई घोषणा तब तक नहीं की जाएगी, जब तक उसका रचयिता जीवित है ;

(ग) निर्यात" से भारत से किसी ऐसे स्थान को ले जाना अभिप्रेत है जो भारत के बाहर हो;

                (घ) अनुज्ञापन अधिकारी" से धारा 6 के अधीन इस रूप में नियुक्त, अधिकारी अभिप्रेत है;

                (ङ) रजिस्ट्रीकरण अधिकारी" से धारा 15 के अधीन इस रूप में नियुक्त अधिकारी अभिप्रेत है;

                (च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।

(2) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति निर्देश का उस क्षेत्र के सम्बन्ध में जिसमें वह प्रवृत्त न हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति, यदि कोई हो, निर्देश है ।

3. पुरावशेषों और बहुमूल्य कलाकृतियों के निर्यात-व्यापार का विनियमन-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही केन्द्रीय सरकार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य प्राधिकारी या अभिकरण से भिन्न किसी व्यक्ति के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह किसी पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का निर्यात करे

(2) जब कभी केन्द्रीय सरकार अथवा उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी प्राधिकारी या अभिकरण का किसी पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति के निर्यात करने का आशय हो, तो ऐसा निर्यात ऐसे प्राधिकारी द्वारा जिसे विहित किया जाए, इस प्रयोजनार्थ जारी किए गए अनुज्ञापत्र के निबन्धनों और शर्तों के अधीन तथा उनके अनुसार ही किया जाएगा

4. 1962 के अधिनियम संख्यांक 52 का लागू होना-जहां तक सीमीशुल्क अधिनियम, 1962 इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत है वहां तक छोड़कर और इस बात के सिवाय कि जब तक केन्द्रीय सरकार इस निमित्त उसे किए गए आवेदन पर अन्यथा निदेश न करे, उस अधिनियम के अधीन प्राधिकृत अधिहरण (उस अधिनियम की धारा 125 में किसी बात के होते हुए भी) किया जाएगा तथा सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 उन सभी पुरावशेषों और बहुमूल्य कलाकृतियों के संबंध में प्रभावी होगा जिनका (केन्द्रीय सरकार से अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य प्राधिकारी या अभिकरण से भिन्न) किसी व्यक्ति द्वारा निर्यात धारा 3 के अधीन प्रतिषिद्ध है

5. पुरावशेषों का केवल अनुज्ञप्ति के अधीन ही विक्रय किया जाना- [इस अधिनियम के प्रारम्भ से छह मास की अवधि की समाप्ति की तारीख सेट, कोई व्यक्ति स्वयं अथवा अपनी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी पुरावशेष के विक्रय का अथवा विक्रय के लिए प्रस्थापना करने का कारबार धारा 8 के अधीन अनुदत्त किसी अनुज्ञप्ति के निबन्धनों और शर्तों के अधीन और उनके अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा में तथा धारा 7, 8, 12, 13, 14, 17 और 18 में पुरावशेष" के अन्तर्गत ऐसे प्राचीन तथा ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं जो संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन राष्ट्रीय महत्व के घोषित किए गए प्राचीन तथा ऐतिहासिक अभिलेखों से भिन्न हैं ।

6. अनुज्ञापन अधिकारियों की नियुक्त-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा,-

(क) ऐसे व्यक्तियों को जो सरकार के राजपत्रित अधिकारी हों और जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ अनुज्ञापन अधिकारी नियुक्त कर सकेगी;

(ख) उस क्षेत्र की परिसीमाओं को परिनिश्चित कर सकेगी जिनके भीतर कोई अनुज्ञापन अधिकारी इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अनुज्ञापन अधिकारियों को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करेगा ।

7. अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन-(1) ऐसा कोई व्यक्ति जो स्वयं अथवा अपनी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पुरावशेषों के विक्रय का अथवा विक्रय के लिए प्रस्थापना करने का कारबार करना चाहता है, अधिकारिता रखने वाले अनुज्ञापन अधिकारी को अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन हर आवेदन ऐसे प्ररूप में किया जाएगा और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं

8. अनुज्ञप्ति का दिया जाना-(1) धारा 7 के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन प्राप्त होने पर, अनुज्ञापन अधिकारी, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए, आवेदक को अनुज्ञप्ति दे सकेगा, अर्थात्ः-

(क) पुरावशेषों के व्यापार के बारे में आवेदक का अनुभव;

(ख) वह ग्राम, नगर या शहर जिसमें आवेदक कारबार करना चाहता है;

(ग) उन व्यक्तियों की संख्या जो उक्त ग्राम, नगर या शहर में पुरावशेषों के विक्रय अथवा विक्रय के लिए प्रस्थापना करने के कारबार में पहले से ही लगे हों ; और 

(घ) ऐसी अन्य बातें जो विहित की जाएं :

परन्तु यदि आवेदक पुरावशेष (निर्यात नियन्त्रण) अधिनियम, 1947 (1947 का 31) के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है, तो उसे अनुज्ञप्ति नहीं दी जाएगी जब तक कि उस दोषसिद्ध की तारीख के पश्चात् दस वर्ष की अवधि न बीत गई हो ।

                (2) इस अधिनियम के अधीन हर अनुज्ञप्ति ऐसी फीस के संदाय पर दी जाएगी जो विहित की जाए ।

                (3) इस अधिनियम के अधीन दी गई हर अनुज्ञप्ति ऐसी अवधि के लिए, ऐसी शर्तों के अधीन तथा ऐसे प्ररूप में होगी और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं ।

                (4) धारा 7 के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए किए गए किसी आवेदन को तब तक नामंजूर नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक को उस विषय में सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया जाए ।

9. अनुज्ञप्ति का नवीकरण-(1) अनुज्ञापन अधिकारी अनुज्ञप्तिधारी द्वारा किए गए आवेदक पर, धारा 8 के अधीन दी गई किसी अनुज्ञप्ति का नवीकरण ऐसी अवधि के लिए और ऐसी फीस के संदाय पर कर सकेगा, जो विहित की जाए

                (2) इस धारा के अधीन किया गया कोई आवेदन तब तक नामंजूर नहीं किया जाएगा जब तक आवेदन को उस विषय में सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।

10. अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा अभिलेखों, फोटोचित्रों और रजिस्टरों का रखा जाना-(1)धारा 8 के अधीन दी गई अथवा धारा 9 के अधीन नवीकृत किसी अनुज्ञप्ति का हर धारक ऐसे अभिलेख, फोटोचित्र और रजिस्टर ऐसी रीति से रखेगा और उनमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं । 

(2) उपधारा (1) के अधीन रखे गए अभिलेख, फोटोचित्र और रजिस्टर का निरीक्षण, सभी युक्तियुक्त समयों पर अनुज्ञापन अधिकारी अथवा सरकार का कोई ऐसा अन्य राजपत्रित अधिकारी कर सकेगा जिसे अनुज्ञापन अधिकारी ने लिखित रूप से इस निमित्त प्राधिकृत किया हो । 

11. अनुज्ञप्तियों का प्रतिसंहरण, निलम्बन और संशोधन-(1) यदि अनुज्ञापन अधिकारी का या तो उसे इस निमित्त किए गए निर्देश पर या अन्यथा समाधान हो जाता है कि,-

(क) धारा 8 के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति किसी आवश्यक तथ्य के दुर्व्यपदेशन द्वारा अभिप्राप्त की गई है; अथवा 

(ख) अनुज्ञप्तिधारक ने, पर्याप्त हेतुक के बिना, उन शर्तों का अनुपालन नहीं किया है जिनके अधीन अनुज्ञप्ति दी गई है अथवा इस अधिनियम के किसी उपबन्ध का या तद्धीन बनाए गए नियमों का उल्लंघन किया है,

तो किसी ऐसी शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जिसके लिए अनुज्ञप्ति का धारक इस अधिनियम के अधीन दायी हो, अनुज्ञापन अधिकारी, अनुज्ञप्ति के धारक को हेतुक दर्शित करने का अवसर देने के पश्चात्, अनुज्ञप्ति को प्रतिसंहृत या निलम्बित कर सकेगा । 

                (2) ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, अनुज्ञापन अधिकारी धारा 8 के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति में परिवर्तन अथवा संशोधन कर सकेगा ।

12. जिन व्यक्तियों की अनुज्ञप्तियां प्रतिसंहृत कर दी गई हैं उनके द्वारा अन्य अनुज्ञप्तिधारियों को पुरावशेषों का विक्रय किया जा सकना-धारा 5 में किसी बात के होते हुए भी कोई व्यक्ति जिसकी अनुज्ञप्ति धारा 11 के अधीन प्रतिसंहृत की गई है, ऐसे प्रतिसंहरण के ठीक पूर्व अपने स्वामित्व, नियन्त्रण या कब्जे में के सभी पुरावशेषों की घोषणा ऐसी कालावधि के भीतर, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, अनुज्ञापन अधिकारी के समक्ष करने के पश्चात् ऐसे सभी पुरावशेषों का विक्रय किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन विधिमान्य अनुज्ञप्ति धारण करता हो :

परन्तु ऐसे किसी पुरावशेष का अनुज्ञप्ति के प्रतिसंहरण की तारीख से छह मास की अवधि के अवसान के पश्चात् विक्रय नहीं किया जाएगा ।

13. अन्य व्यक्तियों का अपवर्जन कर के पुरावशेषों के विक्रय का कारबार करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि पुरावशेषों का संरक्षण करने की दृष्टि से अथवा लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगी कि उस तारीख से ही जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, केवल केन्द्रीय सरकार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई प्राधिकारी या अभिकरण ही पुरावशेषों के विक्रय का अथवा विक्रय के लिए प्रस्थापना करने का कारबार करने का हकदार होगा

(2) उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना जारी होने पर,-

(क) केन्द्रीय सरकार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी प्राधिकारी या अभिकरण से भिन्न किसी व्यक्ति, प्राधिकारी या अभिकरण के लिए, उसमें विनिर्दिष्ट तारीख से किसी पुरावशेष के विक्रय या विक्रय के लिए प्रस्थापना करने का कारबार चलाना विधिपूर्ण न होगा;

(ख) इस अधिनियम के उपबन्ध वहां तक जहां तक कि वे पुरावशेषों के विक्रय अथवा विक्रय के लिए प्रस्थापना करने का कारबार चलाने वाले व्यक्तियों के अनुज्ञापन से सम्बद्ध हैं, उन बातों के सिवाय प्रभावी न रह जाएंगे जो ऐसे प्रवर्तन की समाप्ति के पूर्व की गई हों अथवा न की गई हों और ऐसे प्रवर्तन की समाप्ति पर साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 इस प्रकार लागू होगी मानो वे उपबन्ध किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा निरसित किए गए हों :

परन्तु धारा 8 के अधीन दी गई हर अनुज्ञप्ति जो पूर्वोक्त तारीख को प्रवृत्त है, इस बात के होते हुए भी कि उसमें विनिर्दिष्ट अवधि समाप्त नहीं हुई है, प्रवृत्त नहीं रहेगी ।

(3) प्रत्येक व्यक्ति जिसकी अनुज्ञप्ति उपधारा (2) के खण्ड (ख) के परन्तुक के अधीन प्रवृत्त नहीं रह गई है, ऐसी अवधि के भीतर, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, विहित की जाए, उन सब पुरावशेषों की घोषणा जो उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट तारीख के ठीक पूर्व उसके स्वामित्व, नियन्त्रण या कब्जे में है, अनुज्ञापन अधिकारी के समक्ष करेगा ।

14. पुरावशेषों का रजिस्ट्रीकरण-(1) केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उन पुरावशेषों को विनिर्दिष्ट कर सकेगी जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किए जाएंगे ।

(2) उपधारा (1) के अधीन पुरावशेषों को विनिर्दिष्ट करने में केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेगी, अर्थात् :-

(i) कलात्मक वस्तुओं के संरक्षण की आवश्यकता;

(ii) भारत की सांस्कृतिक विरासत के समुचित आंकलन के लिए भारत में ऐसी वस्तुओं को परिरक्षित रखने की आवश्यकता ;

(iii) अन्य ऐसी बातें जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में सहायक होंगी या जिनका ऐसे सहायक होना सम्भाव्य है ।

(3) हर ऐसा व्यक्ति जिसके स्वामित्व, नियन्त्रण अथवा कब्जे में कोई ऐसा पुरावशेष है जो उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट है, ऐसे पुरावशेष को रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के समक्ष-

(क) ऐसे व्यक्ति की दशा, में जो ऐसी अधिसूचना के जारी होने की तारीख को उस पुरावशेष का स्वामित्व, नियन्त्रण या कब्जा रखता है, उस तारीख से तीन मास के भीतर रजिस्ट्रीकरण कराएगा; तथा

(ख) किसी अन्य व्यक्ति की दशा में, उस तारीख से जिसको कि उसे ऐसे पुरावशेष का स्वामित्व, नियन्त्रण या कब्जा प्राप्त होता है, पन्द्रह दिन के भीतर रजिस्ट्रीकरण कराएगा,और वह ऐसे रजिस्ट्रीकरण के साक्ष्यस्वरूप प्रमाणपत्र अभिप्राप्त करेगा ।

15. रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की नियुक्त-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा-

(क) ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ रजिस्ट्रीकरण अधिकारी नियुक्त कर सकेगी; तथा

(ख) उस क्षेत्र की परिसीमा परिनिश्चित कर सकेगी जिनके भीतर कोई रजिस्ट्रीकरण अधिकारी इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करेगा ।

16. रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन और रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का दिया जाना-(1) प्रत्येक व्यक्ति जो धारा 14 के अधीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के पास किसी पुरावशेष का रजिस्ट्रीकरण कराने के लिए अपेक्षित हो, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिए जाने के लिए रजिस्ट्रीकरण अधिकारी से आवेदन करेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन  [हर आवेदन के साथ, ऐसे पुरावशेषों या ऐसे वर्ग के पुरावशेषों की दशा में, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे] उस पुरावशेष के जिसे रजिस्टर किया जाना है, ऐसे फोटोचित्र की छह से अनधिक उतनी प्रतियां होंगी जितनी विहित की जाएं और वह ऐसे प्ररूप में किया जाएगा और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दे सकता है जिसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं ।

(4) इस धारा के अधीन किया कोई आवेदन तब तक नामंजूर नहीं  किया जाएगा जब तक कि आवेदक को उस विषय में सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।

17. पुरावशेषों के स्वामित्व के अन्तरण आदि की सूचना का रजिस्ट्रीकरण आधिकारी को दिया जाना-जब कभी कोई व्यक्ति धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी पुरावशेष का स्वामित्व, नियन्त्रण या कब्जा अन्तरित करता है तो वह व्यक्ति ऐसी अवधि के भीतर और ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए, ऐसे अन्तरण की सूचना रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को देगा ।

18. धारा 14, 16 और 17 के उपबन्धों का कुछ मामलों में लागू होना-धारा 14 या धारा 16 या धारा 17 की कोई बात सरकार के  [या किसी स्थानीय प्राधिकारी के या ऐसे किसी निकाय के, जिसे केन्द्रीय सरकार ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस धारा के प्रयोजन के लिए अनुमोदित करे], स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबन्ध के अधीन-

(i) किसी संग्रहालय में; या

(ii) किसी कार्यालय में; या

(iii) किसी अभिलेखागार में; अथवा

(iv) किसी शैक्षिक या सांस्कृतिक संस्था में,रखे गए किसी पुरावशेष को लागू न होगी ।

19. पुरावशेषों और बहुमूल्य कलाकृतियों का अनिवार्य अर्जन करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का किसी सार्वजनिक स्थान में परिरक्षित रखा जाना वांछनीय है, तो केन्द्रीय सरकार उस पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति के अनिवार्य अर्जन के लिए आदेश कर सकेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन आदेश करने पर उस जिले का कलक्टर, जिसमें ऐसा पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति रखी हुई है, उसके स्वामी को, केन्द्रीय सरकार द्वारा उसके अर्जन के बारे में विनिश्चय प्रज्ञापित करते हुए, सूचना देगा, और उस पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति को कब्जे में लेना कलक्टर के लिए विधिपूर्ण होगा, और उस प्रयोजन के लिए कलक्टर ऐसे बल का प्रयोग कर सकेगा जो आवश्यक हो ।

(3) जहां किसी पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का स्वामी, जिसका कब्जा उपधारा (2) के अधीन कलक्टर द्वारा ले लिया गया है, ऐसे कब्जा लेने पर आपत्ति करता है, वहां वह उस तारीख से, जिसको ऐसा कब्जा लिया गया था, तीस दिन की अवधि के अन्दर, केन्द्रीय सरकार को अपनी आपत्तियां प्रकट करते हुए, अभ्यावेदन कर सकेगा :

परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसे पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का स्वामी पर्याप्त कारणवश समय पर अभ्यावेदन नहीं कर सका था, तो वह उक्त तीस दिन की अवधि के अवसान के पश्चात् भी अभ्यावेदन ग्रहण कर सकेगी ।

(4) उपधारा (3) के अधीन अभ्यावेदन प्राप्त होने पर केन्द्रीय सरकार, ऐसी जांच करने के पश्चात, जैसी वह ठीक समझे, तथा उस मामले में आपत्ति करने वाले को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् अभ्यावेदन की प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के अन्दर उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा किए गए आदेश को या तो विखण्डित या पुष्ट करेगी ।

(5) जहां उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया कोई आदेश उपधारा (4) के अधीन विखण्डित किया जाता है, वहां पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति उसके स्वामी को अविलम्ब और केन्द्रीय सरकार के खर्चे पर वापस की जाएगी

(6) जहां उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया आदेश उपधारा (4) के अधीन पुष्ट किया जाता है, वहां वह पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति उस तारीख से, जिसको उसका कब्जा उपधारा (2) के अधीन कलक्टर द्वारा लिया गया है केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाएगी ।

(7) इस धारा द्वारा प्रदत्त अनिवार्य अर्जन की शक्ति का विस्तार ऐसी वस्तु पर, जो पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति है, नहीं होगा जिसे धार्मिक कृत्यों के लिए वास्तव में उपयोग में लाया जाता है ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में सावर्जनिक स्थान" से ऐसा स्थान अभिप्रेत है, जो फीस देकर या बिना फीस दिए जनता के उपयोग के लिए खुला है, चाहे जनता द्वारा वास्तव में उसका उपयोग किया जाता हो या नहीं ।

20. धारा 19 के अधीन अनिवार्यतः अर्जित पुरावशेषों और बहुमूल्य कलाकृतियों के लिए प्रतिकर का संदाय-(1) जहां किसी पुरावशेष अथवा बहुमूल्य कलाकृति का अनिवार्यतः अर्जन धारा 19 के अधीन किया जाता है, वहां प्रतिकर संदत्त किया जाएगा जिसकी रकम इसमें इसके पश्चात् उपवर्णित रीति से और सिद्धान्तों के अनुसार अवधारित की जाएगी, अर्थात् :-

() जहां प्रतिकर की रकम करार द्वारा निश्चित की जा सकती है, वहां वह ऐसे करार के अनुसार संदत्त की जाएगी;

(ख) जहां ऐसा कोई करार नहीं हो सकता है वहां केन्द्रीय सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को मध्यस्थ नियुक्त करेगी, जो किसी उच्च न्यायलय का न्यायाधीश हो या रहा हो या नियुक्त किए जाने के लिए अर्हित हो;

(ग) केन्द्रीय सरकार किसी विशिष्ट मामले में, मध्यस्थ की सहायता करने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को नामनिर्दिष्ट कर सकेगी जिसे अनिवार्यतः अर्जित पुरावशेष अथवा बहुमूल्य कलाकृति के स्वरूप का विशेष ज्ञान हो और जहां ऐसा कोई नामनिर्देशन किया जाता है, वहां जिस व्यक्ति को प्रतिकर संदत्त किया जाना है, वह भी उसी प्रयोजन के लिए कोई असेसर नामनिर्दिष्ट कर सकेगा ।

(घ) मध्यस्थ के समक्ष कार्यवाहियां प्रारम्भ होने पर, केन्द्रीय सरकार और वह व्यक्ति, जिसे प्रतिकर दिया जाना है, यह कथन करेंगे कि उनकी अपनी-अपनी राय में, प्रतिकर की उचित रकम क्या होगी;

(ङ) विवाद की सुनवाई करने के पश्चात् मध्यस्थ पंचाट करेगा जिसमें प्रतिकर की ऐसी रकम अवधारित की जाएगी जो उसे न्यायसंगत प्रतीत हो और जिसमें वह व्यक्ति या वे व्यक्ति विनिर्दिष्ट किए जाएंगे जिसको या जिनको ऐसा प्रतिकर संदत्त किया जाएगा और पंचाट करते समय वह हर एक मामले की परिस्थितियों को और उपधारा (2) के उपबन्धों को ध्यान में रखेगा;

(च) जहां इस बारे में कोई विवाद है कि कौन सा व्यक्ति या कौन से व्यक्ति प्रतिकर के हकदार हैं, वहां मध्यस्थ ऐसे विवाद को विनिश्चित करेगा और यदि मध्यस्थ यह पाता है कि एक से अधिक व्यक्ति प्रतिकर के हकदार हैं तो वह प्रतिकर की रकम को ऐसे व्यक्तियों में प्रभाजित करेगा;

() माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 (1940 का 10) की कोई भी बात इस धारा के अधीन माध्यस्थम् को लागू होगी

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रतिकर अवधारित करते समय, मध्यस्थ निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेगा, अर्थात्-

(i) वह तारीख या काल जिसका वह पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति है;

(ii) उस पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का कला, सौन्दर्य, इतिहास, स्थापत्य, पुरातत्व अथवा मानव शास्त्र सम्बन्धी महत्व;

(iii) पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति की दुर्लभता;

(iv) अन्य ऐसी बातें, जो विवाद से संगत हैं ।

(3) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त मध्यस्थ को इस धारा के अधीन माध्यस्थम् कार्यवाही करते समय किसी वाद के विचारण के लिए निम्नलिखित बातों के बारे में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात् :-

                (क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसको हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

                (ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की अध्यपेक्षा करना;

(ङ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।

21. अनुज्ञापन अधिकारियों और रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों के विनिश्चयों के विरूद्ध अपीलें-(1) धारा 8 या धारा 9 या धारा 11 के अधीन किसी अनुज्ञापन अधिकारी के विनिश्चय से अथवा धारा 16 के अधीन किसी रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के विनिश्नय से व्यथित कोई व्यक्ति, उसको विनिश्चय संसूचित किए जाने की तारीख से तीस दिन के अंदर, ऐसे प्राधिकारी को, जो विहित किया जाए, अपील कर सकेगा :

परन्तु यदि अपील प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त कारणवश समय पर अपील फाइल नहीं कर सका था तो वह तीस दिन की उक्त अवधि के अवसान के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा ।

 (2)  उपधारा (1) के अधीन अपील प्राप्त होने पर, अपील प्राधिकारी अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, ऐसा आदेश करेगा जो वह ठीक समझे ।

22. मध्यस्थों के पंचाटों के विरुद्ध अपीलें-धारा 20 के अधीन किए गए मध्यस्थ के पंचाट से व्यथित कोई व्यक्ति, उसको पंचाट के संसूचित किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर, उस उच्च न्यायालय को जिसकी अधिकारिता के अंदर वह निवास करता हो, अपील कर सकेगा  :

परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर पर्याप्त कारणवश अपील फाइल नहीं कर सका था, तो वह तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा ।

23. प्रवेश, तलाशी, अभिग्रहण, आदि की शक्तियां-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति, जो सरकार का अधिकारी है, इस अधिनियम के उपबन्धों का अनुपालन सुनिश्चित करने अथवा अपना यह समाधान करने की दृष्टि से कि इस अधिनियम के उपबन्धों का अनुपालन किया गया है-

 (i) किसी स्थान में प्रवेश कर सकेगा और उसकी तलाशी ले सकेगा;

(ii) किसी ऐसे पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का अभिग्रहण कर सकेगा जिसकी बाबत उसे यह सन्देह है कि इस अधिनियम के किसी उपबन्ध का उल्लंघन किया गया है, किया जा रहा है या किया जाने वाला है, और तत्पश्चात् वह इस प्रकार अभिगृहीत पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का न्यायालय में पेश किया जाना सुनिश्चित करने के लिए और ऐसे पेश किए जाने तक उसकी सुरक्षित अभिरक्षा के लिए सब आवश्यक उपाय करेगा ।

                (2) तलाशी और अभिग्रहण से सम्बन्धित दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898( 1898 का 5 ) की धारा 102 और 103 के उपबन्ध, इस धारा के अधीन तलाशी और अभिग्रहण को यावत्शक्य, लागू होंगे ।

24. यह अवधारित करने की शक्ति कि कोई वस्तु, आदि, पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति है या नहीं-यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई वस्तु, पदार्थ या चीज या पांडुलिपि, अभिलेख या अन्य दस्तावेज इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए पुरावशेष है या नहीं अथवा बहुमूल्य कलाकृति है या नहीं, तो वह प्रश्न भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति के किसी ऐसे अधिकारी का निर्देशित किया जाएगा जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक द्वारा प्राधिकृत किया गया हो, और ऐसे प्रश्न पर, यथास्थिति, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक का या ऐसे अधिकारी का विनिश्नय अन्तिम होगा ।

25. शास्ति-(1) यदि कोई व्यक्ति, स्वयं या, अपनी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा धारा 3 के उल्लंघन में किसी पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति का निर्यात करेगा या निर्यात करने का प्रयत्न करेगा, तो वह किसी ऐसे अधिहरण या शास्ति पर जिसका वह धारा 4 द्वारा यथा लागू सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) के उपबन्धों के अधीन दायी हो, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम न होगी किन्तु जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, और जुर्माने से, दण्डनीय होगा ।

                (2) यदि कोई व्यक्ति धारा 5 या धारा 12 या धारा 13 की उपधारा (2) या उपधारा (3) या धारा 14 या धारा 17 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा और जिस पुरावशेष की बाबत अपराध किया गया हो वह अधिहरणीय होगा ।

                (3) यदि कोई व्यक्ति किसी अनुज्ञापन अधिकारी को धारा 10 के अधीन रखे गए किसी अभिलेख, फोटोचित्र या रजिस्टर का निरीक्षण करने से निवारित करेगा या धारा  23 की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी को उक्त उपधारा के अधीन किसी स्थान में प्रवेश करने से या उसकी तलाशी लेने से निवारित करेगा, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा, दोनों से, दण्डनीय होगा ।

26. अपराधों का संज्ञान-(1) धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन, इस निमित्त विहित किए गए सरकार के अधिकारी द्वारा या उसकी मंजूरी से ही संस्थित किया जाएगा, अन्यथा नहीं

(2) कोई भी न्यायालय धारा 25 की उपधारा (2) या उपधारा (3) द्वारा दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त साधारणतः या विशेषतः प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा की गई लिखित रिपोर्ट के बिना नहीं करेगा

                (3) प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई  भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

27. वर्धित शास्तियां अधिरोपित करने की मजिस्ट्रेट की शक्ति-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 32 में किसी बात को होते हुए भी, किसी प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या किसी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह उक्त संहिता की धारा 32 के अधीन अपनी शक्ति के बाहर इस अधिनियम के अधीन कोई दण्डादेश दे  

28. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया हो, वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध करने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक था या उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :

                परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उक्त अपराध को दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-

() कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और

(ख) फर्म के सम्बन्ध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

29. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही सरकार के या सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध न होगी ।

30. अन्य विधियों का लागू होना वर्जित नहीं है-इस अधिनियम के उपबन्ध प्राचीन संस्मारक परिरक्षण अधिनियम, 1904(1904 का 7) या प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (1958 का 24) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।

31. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

                (2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्ः -

(क) धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञापत्र जारी करने के लिए प्राधिकारी;

(ख) वह प्ररूप, जिसमें धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन किया जा सकेगा और वे विशिष्टियां जो ऐसे आवेदन में होंगी;

(ग) वे बातें, जिनका धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति देते समय ध्यान रखा जाएगा;

(घ) वह फीस जिसका संदाय करने पर, वह अवधि जिसके लिए, वे शर्तें जिनके अधीन और वह प्ररूप जिसमें, धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति दी जा सकेगी और वे विशिष्टियां जो ऐसी अनुज्ञप्ति में होंगी;

() वह फीस जिसका संदाय करने पर और वह अवधि जिसके लिए धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति नवीकृत की सकेगी;

(च) वे अभिलेख,  फोटोचित्र और रजिस्टर जो धारा 10 के अधीन रखे जाएंगे और वह रीति जिससे ऐसे अभिलेख, फोटोचित्र और रजिस्टर रखे जाएंगे और वे विशिष्टियां जो ऐसे अभिलेखों, फोटोचित्रों और रजिस्टरों में होंगी;

(छ) पुरावशेषों के फोटोचित्रों का स्वरूप और उनकी प्रतियों की संख्या जो धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिए जाने के लिए किए जाने वाले आवेदन के साथ होंगी और वह प्ररूप जिसमें ऐसा आवेदन किया जा सकेगा और वे विशिष्टियां जो ऐसे आवेदन में होंगी;

(ज) वे विशिष्टियां जो धारा 16 की उपधारा (3) के अधीन दिए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में होंगी;

(झ) वह प्राधिकारी, जिसको धारा 21 की उपधारा (1) के अधीन अपील की जा सकेगी; और

(ञ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

                (3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में या अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी, यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पूर्व उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पङेगा ।

32. निरसन-(1) पुरावशेष (निर्यात नियंत्रण) अधिनियम, 1947 (1947 का 3) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है

                (2) शंकाओं के निराकरण के लिए एतद्द्वारा घोषित किया जाता है कि उपधारा (1) के अधीन निरसित अधिनियम की धारा 3 के अधीन जारी की गई प्रत्येक अनुज्ञप्ति जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर प्रवृत्त हो, इस बात के होते हुए भी कि उसमें विनिर्दिष्ट अवधि समाप्त नहीं हुई है, प्रवृत्त न रहेगी ।

33. 1958 के अधिनियम संख्यांक 24 का संशोधन-प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 में,-

                (i) धारा 1 में, उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्ः -

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।";

(ii) धारा 2 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः -

2क. जम्मू-कश्मीर राज्य में अप्रवृत्त विधि के प्रति निर्देशों का अर्थान्वयन-इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति निर्देश का, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त नहीं है, उस राज्य के संबंध में इस प्रकार अर्थान्वयन किया जाएगा मानो वह उस राज्य में प्रवृत्त तत्समान विधि के प्रति, यदि कोई हो, निर्देश है ।";

 (iii) धारा 23 में, -

(क) उपधारा (2) और (4) में, अनिवार्य क्रय" शब्दों के स्थान पर अनिवार्य अर्जन" शब्द रखे जाएंगे;

(ख) उपधारा (3) में, ऐसे किन्हीं पुरावशेषों के उनके बाजार-भाव पर अनिवार्य क्रय" शब्दों के स्थान पर ऐसे किन्हीं पुरावशेषों के अनिवार्य अर्जन" शब्द रखे जाएंगे;

(iv) धारा 26 में,-

(क) उपधारा (1) में, ऐसे पुरावशेष के बाजार-भाव पर उसके अनिवार्य क्रय" शब्दों के स्थान पर ऐसे पुरावशेष के अनिवार्य अर्जन" शब्द और क्रय किए जाने वाले" शब्दों के स्थान पर अर्जित किए जाने वाले" शब्द रखे जाएंगे;

(ख) उपधारा (2) और (3) में, अनिवार्य क्रय" शब्दों के स्थान पर अनिवार्य अर्जन" शब्द रखे जाएंगे;

(v) धारा 28 में, उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्ः -

(2) प्रत्येक पुरावशेष के लिए, जिसकी बाबत धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन या धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन  अनिवार्य अर्जन का आदेश किया गया है, प्रतिकर संदत्त किया जाएगा और ऐसे प्रतिकर के अवधारण और संदाय के सम्बन्ध में पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 की धारा 20 और 22 के उपबन्ध, यावत्शक्य, उसी प्रकार लागू होंगे, जैसे वे उक्त अधिनियम की धारा 19 के अधीन अनिवार्यतः अर्जित किसी पुरावशेष या बहुमूल्य कलाकृति के लिए प्रतिकर के अवधारण और संदाय के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।" ।

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